बुधवार, जून 08, 2011

रामदेव का रामलीला मैदान काण्ड- एक भिन्न दृष्टिकोण्


रामदेव का रामलीला मैदान काण्ड – एक भिन्न दृष्टिकोण
वीरेन्द्र जैन
योग प्रशिक्षक बाबा रामदेव द्वारा अठारह करोड़ के पण्डाल में जो अनशन, तप या अष्टांग योग किया जा रहा था और सरकार ने उनसे उच्च स्तरीय बात करने, समझौता करने और बाबा द्वारा समझौते का उल्लंघन करने के बाद आधी रात में जो कुछ भी किया उस पर बहुत कुछ कहा जा चुका है। चौबीस घंटे के चैनलों, और सनसनीखेज समाचारों के लिए उत्सुक अखबारों ने पूरे घटनाक्रम को अति नाटकीय रूप प्रदान करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
सच तो यह है कि इस सारे घटनाक्रम के मूल में हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली की वे अपरिपक्वताएं हैं जिनके कारण हमारे राजनीतिक दल अपने सिद्धांतों, घोषणाओं, और कार्यक्रमों की जगह शगूफों, नारों या वादों का प्रयोग कर के वोट निकलवा लेने व किसी भी तरह बहुमत पाकर सत्ता का भरपूर दोहन करने के लक्ष्य हेतु काम करते हैं। उल्लेखनीय है कि 1967 के आम चुनावों में हेलीकाप्टर से चुनाव प्रचार ने भारी संख्या में मतों का हेर फेर किया था। जब 1969 में पूर्व राजा रानियों के प्रिवीपर्स व विशेष अधिकार समाप्त किये गये थे तब ग्वालियर के एक पूर्व राजपरिवार ने पूरे देश की रियासतों में घूम घूम कर निष्क्रिय हो चुके राजपरिवारों को तत्कालीन सरकार के खिलाफ राजनीति में उतरने के लिए सक्रिय किया था और तब से वे अपनी अपनी पूर्व रियासतों में अपना जनाधार बनाये हुये हैं। कभी गौ हत्या के भावनात्मक नाम पर चुनाव हो जाते हैं तो कभी शरीयत या रामजन्म भूमि मन्दिर के नाम पर। भूमि सुधार, मँहगाई, बेरोजगारी, जनवितरण प्रणाली, शिक्षा, स्वास्थ आदि आर्थिक सामजिक सवालों को चुनावों का मुख्य मुद्दा बनना अभी शेष है। भले ही ये मुद्दे घोषणापत्रों के कागजों पर नकल कर लिए जाते हों, पर न तो ये उम्मीदवारों को ही पता होते हैं और ना ही ये जनता के बीच में उतारे जाते हैं। गत लोक सभा चुनावों के दौरान विदेशों में जमा काले धन का मुद्दा बामपंथी दलों के घोषणा पत्रों में हमेशा की तरह सम्मलित था व जनता दल [यू] ने भी उसका जिक्र किया, पर भाजपा ने ज्यादा मुखर हो कर उस पर जोर दिया था, पर चुनाव परिणामों के बाद इन दलों में से कोई भी सत्ता में नहीं आया किंतु विपक्षी दलों के रूप में भी बाद में इस पर कोई बड़ा आन्दोलन नहीं किया गया। आन्दोलन के रूप में इस सवाल को आरटीआई कार्यकर्ता अरविन्द केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के सहयोग से उठाया।
सातवें दशक से देश में मुख्य रूप से दो राजनीतिक धाराएं सक्रिय हुयीं जिनमें से एक तो कांग्रेस थी जो स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों की विरासत का लाभ लेते हुए गान्धीजी के दलित उत्थान से जागृत जातियों को मिले आरक्षण और बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता से भयभीत अल्पसंख्यकों की संरक्षक बन कर चुनाव जीतती रही थी। दूसरी ओर विभिन्न गैर कांग्रेसी दल थे जिनमें हिन्दूवादी भारतीय जनसंघ, कम्युनिस्ट दल, और विभिन्न नामों से कार्यरत समाजवादी दल थे जो आपस में एक नहीं थे। परम्परागत रूप से सुरक्षित वोट बैंक के कारण कांग्रेस ने राजनीतिक काम न करके शासन पाने और उसे चलाने पर पूरा जोर लगाया तो भारतीय जनसंघ ने साम्प्रदायिकता को उभारने की ओर जोर दिया ताकि वे बहुसंख्यक मतों के सहारे सत्ता पा सकें। समाजवादियों और कम्युनिष्टों ने कुछ राजनीतिक चेतना के काम किये किंतु समाजवादियों की आपसी फूट के साथ साथ चीन से सीमा विवाद के बाद कम्युनिष्टों के दो चुनावी पार्टियों और कुछ गैर चुनावी ग्रुपों में बिखर जाने से उनके काम हाशिये पर चले गये। परिणाम यह हुआ कि भारतीय जनसंघ जो बाद में भारतीय जनता पार्टी के नाम से जाना गया, विपक्ष के बड़े हिस्से को हड़प कर एक बड़ा दल बन गया। चुनाव जीतने और सत्ता में आने के लिए इसने सभी सम्भव हथकण्डे अपनाये। वे हर तरह के गैर कांग्रेसी गठबन्धन में सम्मलित होने के लिए सबसे आगे रहे। उन्होंने भावुक मुद्दों से वोटरों को फुसलाने के साथ साथ किसी भी तरह के लोकप्रिय व्यक्तियों को अपने साथ जोड़ने के सौदे करने शुरू किये। फिल्मी सितारे, क्रिकेट खिलाड़ी, साधु वेषभूषाधारी, पूर्व राज परिवार के सदस्यों, दलबदलुओं के साथ साथ क्षेत्र के जातिवादी अनुपात के अनुसार टिकिट वितरण पर भी पूरा ध्यान दिया। रंगीन टीवी पर प्राइवेट चैनल आने के बाद योग प्रशिक्षण के कार्यक्रमों से बाबा राम देव ने लोकप्रियता और धन कमाया तथा अपने एक सहयोगी की मदद से आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण का एक बड़ा साम्राज्य स्थापित कर लिया। उन से जुड़ा हालिया घटनाक्रम भी योग प्रशिक्षक के रूप में लोकप्रिय हो गये बाबा की लोकप्रियता को भुनाने से जुड़ा है। बाबा रामदेव एक अति महात्वाकांक्षी व्यक्ति हैं और जैसे जैसे उन्हें सफलताएं मिलती गयीं वैसे वैसे उनकी भूख बढती गयी। वे यज्ञ कर्मी से योग प्रशिक्षक बने, फिर आयुर्वेदाचार्य के नाम से आयुर्वेद का उद्योग खड़ा कर लिया, योग शिविरों के नाम पर मोटी मोटी फीसें ही नहीं वसूलीं अपितु अपना जनसम्पर्क बढा कर नेताओं और अधिकारियों से ढेर सारे सरकारी लाभ व धनिकों से मोटे मोटे चन्दे लिये। देश भर में आश्रमों के नाम पर औने पौने दामों में जमीनें हथियायीं। यादव जाति के नाम पर मुलायम सिंह यादव और लालू यादव को भी फुसलाया, तथा रुतबा बढाने के लिए सरकार से मिली एक्स श्रेणी की सुरक्षा को वाय श्रेणी की सुरक्षा में बदलवाने के लिए झूठी परिस्तिथियां पैदा करने की कोशिशें कीं। उनकी इस लोकप्रियता को देखते हुए शगूफेबाज राजनीतिक दलों ने उनका उपयोग करना चाहा तो परम अतृप्त रामदेव की राजनीतिक महात्वाकांक्षाएं भी भड़कीं। उन्होंने सोचा कि क्यों न वे अपनी लोकप्रियता को राजनीतिक सत्ता में बदलें इसलिए उन्होंने विदेशों में जमा धन को वापिस लाने के जनरुचि वाले सवाल को अपना प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाया व अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बनाने का इरादा घोषित कर दिया। स्मरणीय है कि इस इरादे का विरोध भाजपा ने किया और उनके सारे नेताओं ने उनसे पार्टी न बनाने का अनुरोध किया। भाजपा के लोग तब से उनसे लगातार दूरी बनाये रहे, बाबा ने भी पलट के उत्तराखण्ड के भाजपा शासन के एक मंत्री द्वारा उनसे दो लाख रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप लगाया पर उसका नाम उजागर नहीं किया। कहा जाता रहा कि बाद में नाम उजागर न करने का भी बाबा ने सौदा किया। ताजा घटनाक्रम में जब अन्ना हजारे ने जनलोकपाल विधेयक के नाम पर अनशन किया तो उस आन्दोलन में भी बाबा सम्मलित हो गये पर अन्ना के समर्थकों ने इस आन्दोलन को राजनीतिक दलों के नेताओं से मुक्त रखने का फैसला किया और उमाभारती ओम प्रकाश चौटाला, अरुण जैटली समेत वहाँ पहुँचने वाले अनेक नेताओं को मंच तक नहीं जाने दिया। इनमें अपना राजनैतिक दल बनाने की घोषणा कर चुके रामदेव भी थे जिन्होंने स्वय़ं को अपमानित महसूस किया। इस उपेक्षा के बदले में बाबा ने दो दिन तक लगातार संघ प्रमुख मोहन भागवत और भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ चार चार छह छह घंटे तक बैठकें कीं। इसी दौरान यह भी तय हुआ कि बाबा अपना अलग दल बनाने का इरादा छोड़ देंगे व संघ परिवार उन्हें अन्ना के मुकाबले खड़ा होने में अपना पूरा समर्थन देगी। उन्होंने अपना वादा पूरा किया पर बाबा ने पता नहीं किस अपराधबोध में सरकार के मंत्रियों के साथ लिखित में समझौता कर लिया और जब भाजपा ने अपने समझौते के कारण दबाव डाला तो वो द्वन्द में फँस कर समय से अपना वादा पूरा नहीं कर सके। एक व्यक्ति के समक्ष देश की सरकार के शरणगत होने के आरोपों से व्यथित सरकार ने देर होने की स्तिथि में पत्र को सार्वजनिक कर दिया जिससे बाबा की असलियत सबके सामने आ गयी। बाद में बाबा के समर्थन में भी संघ परिवार अकेला खड़ा नजर आया जिससे पूरी स्तिथि साफ हो गयी। कम समय में बड़ी दौलत तभी खड़ी हो पाती है जब कानूनों की अवहेलना की जाये और बाबा की दौलत के पीछे भी कुछ न कुछ कमियां रही ही होंगीं। यही कारण है कि उनके साथी बालकिशन को तंबू उखड़ने के तुरंत बाद गुप्त अभियान पर अंतर्ध्यान हो जाना पड़ा जिनकी नागरिकता की गलत घोषणा के बारे में भी सवाल उठाये जा रहे हैं। जब तक हम अपने लोकतंत्र में एक स्वस्थ राजनीतिक चेतना का विकास और जनता का राजनीतिक शिक्षण नहीं कर लेते इस तरह की घटनाएं होती ही रहेंगीं। केंट वाटर प्यूरीफायर बेचने का प्रचार करने वाली हीरोइनें को जब तक प्रमुख दल की वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाये जाने की मजबूरी रहेगी तब तक रामदेव रामलीला मैदान काण्ड होते ही रहेंगे।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

3 टिप्‍पणियां:

  1. I agree with each of your point...
    they aren't fighting with corruption rather a deep verminous politics is going on in the name of it.

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