बुधवार, नवंबर 22, 2017

फिल्म समीक्षा मुज़फ्फरनगर – बर्निंग लव स्टोरी , न कथा, न घटना, न समस्या, सिर्फ चूं चूं का मुरब्बा

फिल्म समीक्षा
मुज़फ्फरनगर – बर्निंग लव स्टोरी , न कथा, न घटना, न समस्या, सिर्फ चूं चूं का मुरब्बा




















2013 में घटित मुज़फ्फरनगर की घटनाएं अभी इतनी पुरानी नहीं हुयी हैं कि पढने लिखने वाले लोग उसकी सच्चाई भूल गये हों। अब बालीवुड की जो फिल्में केवल व्यवसाय की दृष्टि से बन रही हैं वे बहुत खराब बन रही हैं और तकनीक के तमाशे से मजमा जमा कर कुछ बाहुबली भले ही व्यवसाय कर लें किंतु उन्हें आमिर खान की तरह कला के सहारे व्यावसायिक सफलता प्राप्त करने की श्रेणी में बहुत नीचे के पायदान पर जगह मिलेगी।
हरीश कुमार निर्देशित यह फिल्म अनेक तरह की आशंकाओं, आकांक्षाओं, और अनिश्चितताओं से घिर कर चूं चूं का मुरब्बा बन कर रह गयी है। ऐसा लगता है कि यह फिल्म मुज़फ्फरनगर की कढवी सच्चाइयों को दबाने के लिए बनायी गयी है, क्योंकि इसी घटना के पीछे छुपे षड़यंत्रों को प्रकट करती कुछ डाकूमेंट्रीस और वीडियो फिल्में बनायी जा चुकी हैं जिन्हें घटना के जिम्मेवार लोगों द्वारा सार्वजनिक प्रदर्शन से रुकवा दिया गया है, किंतु फिर भी वे बुद्धिजीवियों के बीच देखी दिखायी जा चुकी हैं। निर्माता ने सत्तारूढ दल के सांसद और अब मंत्री से इस फिल्म निर्माण के लिए आशीर्वाद लिया है इसलिए उनका धन्यवाद भी किया है जो कभी मुम्बई के पुलिस कमिश्नर रहे हैं।
मुजफ्फरनगर में घटित जिस घटना से वहाँ संहार और प्रतिसंहार की घटनाएं घटीं उसको थोड़ा सा बदल कर कहानी का प्रारम्भ किया गया है। पहले एक समुदाय द्वारा और फिर दूसरे समुदाय द्वारा इकतरफा हिंसा की घटनाएं घटी थीं। लोकसभा के आगामी चुनावों को देखते हुए राजनीतिक दलों ने इस आग में घी ही नहीं डाला अपितु आग को फैलाने के लिए हवा भी चलवायी। फिल्म में राजनीतिक दलों के एक पक्ष को दोषी बताया गया है जबकि दूसरे पक्ष के लोग जो बड़े दोषी थे व जिन्होंने नकली वीडियो बना कर उसे अपलोड कर भावनाएं भड़ाकायीं थीं उनकी चर्चा ही नहीं की है। इतना ही नहीं उन आरोपियों को चुनाव प्रचार के दौरान एक दल के बड़े बड़े नेताओं द्वारा सम्मानित भी किया गया था, उन्हें टिकिट भी दिया गया था और बाद में मंत्री भी बनाया गया। इस दुखद घटना में लगभग आधे लाख अल्पसंख्यक लोग सुविधाविहीन कैम्पों में महीनों भूखे प्यासे व स्वास्थ सुविधाओं से वंचित होकर लम्बे समय तक रहे उनकी कोई झलक तक फिल्म में नहीं दिखायी गयी है।  
 किसी दुर्घटना के साम्प्रदायिक दंगे में बदलने के पीछे बहुत सारी कारगुजारियां होती हैं जो वर्षों से चल रही होती हैं। कुछ संगठन इसके लिए निरंतर काम करके समाज में नफरतों के झूठे सच्चे इतिहास के सहारे समाज को साम्प्रदायिक दृष्टि से सम्वेदनशील बनाते रहते हैं, और अब ऐसे संगठन दोनों तरफ काम कर रहे हैं। ध्रुवीकरण का चुनावी लाभ हमेशा बहुसंख्यकों को मिलता है इसलिए ज्यादातर वे आक्रामक और अल्पसंख्यक रक्षात्मक होते हैं। जब अल्पसंख्यक को उत्तेजित कर दिया जाता है तो कई बार भय की अवस्था में वह भी पहले हमलावर हो जाता है।
इस घटना से उठायी गयी कथा पर लगभग तीस साल पहले वाली बम्बैया फिल्मों के ढाँचे में पिरो दिया गया है जिसमें हीरो का हीरोइन से उलझ कर प्रथम दृष्ट्या प्रेम हो जाता है। हीरो और हीरोइन अलग धर्मों के परिवार से हैं। शहर में शूटिंग की प्रैक्टिस के लिए दिल्ली शहर में रह कर आया हीरो दस बीस लोगों को अकेले ही ठिकाने लगा देता है और उनकी लाठी डंडे बन्दूकें काम नहीं आते। नायक या खलनायक के साथ घटी हिंसा के अलावा अन्य किसी के साथ घटी हिंसात्मक घटनाएं पुलिस और कानून का मामला नहीं बनतीं। कहानी में अनावश्यक रूप से गीत और नृत्य ठूंसे गये हैं जिनकी अस्वाभाविकता से फिल्म के विषय की गम्भीरता नष्ट होती है। हीरोइन कुछ ही दिनों में आईपीएस होकर सीधे एसपी के रूप में अपने होम टाउन में पदस्थ हो जाती है व ऐसी टाइट वर्दी पहिनती है जिससे वह एसपी से ज्यादा हीरोइन दिखायी दे। हीरो देव शर्मा सीधे सीधे अमिताभ की पुरानी एंग्री यंगमैन की छवि से प्रभावित है व वैसा ही नकल करने की असफल कोशिश कर रहा है, वहीं हीरोइन ऐश्वर्या देवान उसी दौर की किसी नायिका की तरह व्यवहार करते हुए ओवरएक्टिंग करती हैं। कुछ संवाद जरूर अच्छे लिखे गये हैं किंतु गलत डायलोग डिलीवरी और कमजोर पटकथा के कारण वे थेगड़े से लगते हैं। खलनायक के रूप में अभिनेता अनिल जार्ज अवश्य प्रभावित करते हैं।
सेंसर बोर्ड से पास इस फिल्म को भी प्रचार के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पाँच जिलों में प्रदर्शन के लिए प्रतिबन्धित किये जाने की खबरें समाचार पत्रों में प्रकाशित की गयी हैं जिसे अधिकारियों का मौखिक आदेश भी बताया जा रहा है। आजकल प्रचार के लिए ऐसे हथकंडे फिल्म व्यवसाय का आवश्यक हिस्सा बन गये हैं। नायक नायिका का पारिश्रमिक फिल्म निर्माण के बज़ट का सबसे बड़ा हिस्सा होते हैं किंतु इस फिल्म में वे नये हैं, इसलिए यह कम लागत की फिल्म है क्योंकि शूटिंग के लिए भी बड़े सेटों की जरूरत नहीं पड़ी है और सब कुछ पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसी गाँव, हवेली या ड्राइंग रूम में हो गयी है। कम लागत के कारण इसे व्यावसायिक रूप से असफल नहीं कहा जायेगा किंतु फिल्म के रूप में ना तो यह कलात्मक, न घटनाप्रधान, न मनोरंजक, न ही यथार्थवादी, न कुशल अभिनय निर्देशन सम्पन्न फिल्म कही जा सकती है। अगर भविष्य में नायक नायिका सफल होंगे तो यह फिल्म उन्हें पहले पहल प्रस्तुत करने के लिए उल्लेखित होगी।  
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

        

मंगलवार, नवंबर 07, 2017

गैंग रेप, समस्याओं की जड़ों तक जाने की जरूरत

गैंग रेप, समस्याओं की जड़ों तक जाने की जरूरत
वीरेन्द्र जैन
भोपाल की राजधानी के मध्य में सबसे प्रमुख स्थान के निकट एक 19 वर्षीय छात्रा के साथ गेंग रेप हुआ। उल्लेखनीय यह भी है कि छात्रा जिस पद के लिए कोचिंग कर रही थी उसमें सफल होने पर वह राज्य प्रशासनिक सेवा और भविष्य में आईएएस तक भी पहुँच सकती थी। उल्लेखनीय यह भी है कि पीड़िता के माँ बाप दोनों ही पुलिस की नौकरी में हैं और फिर भी उन्हें रिपोर्ट तक लिखाने में लम्बा समय लग गया व उन्हें उस आधार पर झुलाया जाता रहा जिसके बारे में अनेक बार स्पष्ट किया जा चुका है कि थाने के क्षेत्र के चक्कर में न पड़ कर रिपोर्ट को तुरंत लिखा जाना चाहिए।
अब यह घटना कोई अनोखी घटना नहीं है क्योंकि यह आये दिन की बात हो गयी है। यह ठीक है कि मध्य प्रदेश इस तरह के अपराधों के मामले में बहुत आगे है किंतु दूसरे राज्य भी बहुत पीछे नहीं है, और यह बात किसी प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं होना चाहिए। हर घटना के बाद कुछ राजनीतिक आलोचनाएं और प्रदर्शन हो जाते हैं तथा कुछ समय के लिए कुछ प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों का निलम्बन हो जाता है जिन्हें जनता की याद्दाश्त की सीमा समाप्त होने के बाद रद्द कर दिया जाता है। यही सब कुछ इस मामले में भी हो रहा है। खेद है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए न तो समस्या की जड़ों तक पहुँचने का कोई प्रयास होता है और न ही किसी स्थायी समाधान की ओर ही बढा जा रहा है।
वोटों की राजनीति ने जो तुष्टीकरण की कूटनीति अपनायी है उसमें आम जनता के हिस्से में कोरे वादे आये हैं जबकि हर तरह के कानून भंजकों को सरकारी संरक्षण और मदद मिलने लगी है। देशभक्ति का ढंढोरा पीटने वाली पार्टी चन्दे के लिए व भीड़ जुटाने के लिए देशद्रोहियों को अच्छे अच्छे पद दे देती है और वे सरकार के मंत्रियों के साथ मंचों पर गलबहियां डाल कर फोटो खिंचवाते हैं जिससे पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी दबाव में आ जाते हैं। अभी तक किसी भी राजनीतिक दल ने अपने उन नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की है जिनकी लापरवाहियों के कारण अपराधी पार्टी में आते हैं और संरक्षण पाते रहे हैं। दो एक वामपंथी पार्टियों को छोड़ कर किसी भी प्रमुख पार्टी में प्रवेश के लिए कोई छलनी नहीं है और जो ज्यादा से ज्यादा संसाधन उपलब्ध करा सकता है वह स्वयं या अपने किसी व्यक्ति के माध्यम से पार्टी, सरकार, और देश के संसाधनों पर अधिकार करने में लग जाता है। इस तरह एक दुष्चक्र का निर्माण होता है जिससे राष्ट्रीय संसाधन व्यक्तियों और पार्टियों के संसाधनों में बदलते जाते हैं। क्या कारण है कि किसी भी पार्टी में आदर्श आचार संहिता के आधार पर सदस्यों की समीक्षा नहीं होती और इस आधार पर पार्टी से निकाले जाने की घटनाएं नहीं सुनी जातीं। पार्टी से तब निकाला जाता है जब कोई सदस्य दूसरी पार्टी में जा चुका होता है। पार्टी का टिकिट देने में जब किसी सदस्य की पार्टी में वरिष्ठता पर ध्यान नहीं दिया जाता व दो दिन पहले दल बदल कर आये हुए व्यक्ति को टिकिट दे दिया जाता है तो उस दल की आदर्श आचार संहिता पर निगाह डालने का तो सवाल ही नहीं उठता। एक पुलिस अधिकारी ने बताया था कि लगभग प्रत्येक अपराध में आरोपी को पकड़ने पर राजनेताओं के सिफारिशी फोन जरूर आते हैं जिनमें से कुछ तो ऐसे होते हैं जिन पर विचार करना ही पड़ता है। जिस दिन उपरोक्त घटना घटी उसी दिन के अखबार में खबर है कि बड़े अधिकारियों के आदेश पर जब भोपाल के ढाबों पर शराब पीने वालों पर दबिश दी गयी तो पकड़ में आये 27 लोगों के पक्ष में लगातार फोन आते गये कि एक एक करके अंततः सब को छोड़ देनी पड़ा। भोपाल में ही हेल्मेट चैकिंग के दौरान रोके गये एक व्यक्ति ने सम्बन्धित इंस्पेक्टर की बात मुख्यमंत्री के पिता से करायी व इंस्पेक्टर ने हाथ जोड़ कर उसे छोड़ दिया। यह खबर भी अखबारों में छप गयी थी। वैसे तो सार्वजनिक जीवन में आये प्रत्येक व्यक्ति को व अधिकारी को संविधान की शपथ लेनी चाहिए किंतु सरकार में बैठा प्रत्येक व्यक्ति जो संविधान की शपथ ले चुका है, अगर किसी कानून तोड़ने वाले के लिए सिफारिश करता है तो वह तो सीधा सीधा अपराध में भागीदारी करके शपथ का उल्लंघन कर रहा होता है।
न्याय का दायित्व होना चाहिए कि या तो वह अपराधी को सजा दे या अपराधी को सजा न दिला पाने वाली व्यवस्था के कारिन्दों को सजा दे क्योंकि आमजन व्यवस्था कायम रखने के लिए भरपूर भुगतान कर रहा है। खेद की बात है कि बहुत सारे मामले न केवल लम्बे समय तक अनिर्णीत पड़े रहते हैं अपितु बिना किसी को सजा दिये हुए समाप्त भी कर दिये जाते हैं। यह दशा कानून का भय समाप्त करती है और अपराधियों को निर्भय होकर मनमानी करने की प्रेरणा देती है। जो लोग पहले से ही सामंती सोच के कारण स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझते हैं वे दूसरों को कमतर इंसान मान कर व्यवहार करते हैं। सत्ता की ताकत या संरक्षण उन्हें और अधिक निर्मम बना देता है। बलात्कार और हिंसा इसी का परिणाम है।
यौन अपराधों के अधिकतर मामले बदनामी के डर से सामने नहीं आने पाते क्योंकि समाज पीड़िता को न केवल कमजोर व जिम्मेवार मानकर व्यवहार करती है अपितु हेय दृष्टि से देखती है। इसके लिए बड़े सामाजिक आन्दोलन की जरूरत है जिसमें पूरा समाज एक साथ उठ खड़े हो कर अपने साथ हुए अपराध की स्वीकरोक्ति करते हुए पीड़ितों के साथ हो व आपस में हमदर्दी प्रकट करे। गाँधीजी के बाद ऐसे प्रयोग बन्द हो चुके हैं।  अपराधियों के खिलाफ खड़े होने के लिए अकेले व्यक्ति की कमजोरी को स्वीकारना जरूरी होता है और पीड़ितों की एकता बनाने का आवाहन होना चाहिए। पीड़िता को दोषी मानना अपने आप में अपराध घोषित होना चाहिए।
अपराधों की रिपोर्ट दर्ज न करके अपना रिकार्ड ठीक करना भी समाज के खिलाफ पुलिस का अपराध है जिसे करने के लिए देश के बड़े बड़े पुलिस अधिकारी अपने थानेदारों को प्रेरित करते हैं। किसी क्षेत्र में अपराधों की संख्या का अधिक होना पुलिस अधिकारियों की जिम्मेवारी नहीं होना चाहिए अपितु अपराधियों को पकड़ना और सजा दिलाने के आधार पर उनका कार्य मूल्यांकन होना चाहिए, जिसके अभाव में रिपोर्ट न लिख व सच को छुपा कर बड़ा अपराध किया जा रहा है।
कानून के शासन का अभाव जंगली न्याय की ओर अग्रसर करता है जिसकी ओर बढते जाने के संकेत उक्त घटनाओं में हो रही वृद्धि से मिलने लगे हैं।  देखना होगा कि निर्भया कांड की तरह घटनाएं व्यवस्था को किस बदलाव की प्रेरणा दे पाती हैं।          
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023 [मो. 09425674629] 

सोमवार, नवंबर 06, 2017

भारतीय राजनीति में विलीन होते ध्रुव

भारतीय राजनीति में विलीन होते ध्रुव
वीरेन्द्र जैन
भारतीय राजनीति एक विचित्र दशा को प्राप्त हो गयी है। यह एक ऐसा गोलाकार पिंड हो गई है जिसमें कहीं ध्रुव नजर नहीं आता। यद्यपि हमारे बहुदलीय लोकतंत्र में यह दोध्रुवीय तो पहले से ही नहीं थी किंतु दुनिया में आदर्श लोकतांत्रिक बताये जाने वाले देशों में विकसित हुयी व्यवस्था की तरह हम लोग भी अपने लोकतंत्र को वैसा ही देखने के आदी हो गये थे। हमारा देश विभिन्न भौगोलिक अवस्थाओं, मौसमों, फसलों, भाषाओं, वेशभूषाओं, आस्थाओं, रीतिरिवाजों, जातियों, रंगों, शाषकों, आदि में विभाजित रहा है। इस क्षेत्र में हुए आक्रमणों और आक्रामकों की विस्तारवादी नीतियों ने इसे आज के इस भौगोलिक व राजनीतिक स्वरूप में ढाला है। हमारी एकरूपता गुलामी से पीड़ितों की एकता थी।
हमारी एकता का पहला पड़ाव हमारी एक साथ होने वाली मुक्ति थी जिसमें हमारे सम्मलित प्रयास के साथ साथ हमें गुलाम बनाने वाली शक्तियों का कमजोर पड़ना भी एक बड़ा कारण बना। एक साथ मुक्ति के बाद ही हमने एक होने और एक बने रहने के तर्कों की तलाश की जिस हेतु भौगोलिक सीमाओं, इतिहास, और पौराणिक कथाओं समेत धार्मिक विश्वासों तक का सहारा लिया। राष्ट्रीय पूंजीवाद ने भी इसमें अपनी भूमिका निभायी। जब पश्चिम के राजनीतिक विश्लेषक हमारी आज़ादी को ट्रांसफर आफ डिश अर्थात खायी गयी थाली के शेष हिस्से को हमारी ओर सरकाना बताते हैं तो वे बहुत गलत नहीं होते हैं।
जिन्होंने उस समय इस एकता पर गम्भीर असहमतियां प्रकट कीं थीं उनमें से एक ने अपना अलग देश बना लिया और दूसरे अर्थात अम्बेडकरवादी असहमत होते हुए भी साथ रहे, जिसके बदले में उन्हें अपनी तरह से देश का संविधान गठित करने में प्राथमिकता मिली। कश्मीर के राजा और जनता ने स्पष्ट रूप से पाकिस्तान और हिन्दुस्तान से बराबर की दूरी बनाना चाही किंतु जब पाकिस्तान ने बलपूर्वक उसे हथियाना चाहा तो उसे हिन्दुस्तान के साथ आना पड़ा व दोनों ओर से कुछ शर्तों के साथ समझौता हुआ। ऐसी विविधताओं के बीच विभाजन के दौरान हुयी हिंसा से पीड़ित एक वर्ग ऐसा था जो कठोर सच्चाइयों को समझने की जगह विवेकहीन भावोद्रेक से देश चलाने की बात कर रहा था। तत्कालीन राजे रजवाड़े भी अपना राज्य देने में सहज नहीं थे और उनमें से अनेक अब तक अपने प्रभाव क्षेत्र से विधायिका में सम्मिलित होकर लोकतांत्रिक व्यवस्था के विकास में बाधा बनते रहते हैं। ऐसे नये राज्य को एक इकाई की तरह संचालित करना बहुत कठिन काम था जिसके लिए गाँधीजी ने पटेल की जगह नेहरूजी को जिम्मेवारी देने का बहुत सोचा समझा सही फैसला किया था।
जैसे जैसे परतंत्रता की साझी पहचान मिटती गयी वैसे वैसे व्यक्तियों, जातियों, वर्गों, क्षेत्रों, की सोयी पहचान उभरती गयी। परिणाम यह हुआ कि स्वतंत्रता के लिए काम करने वाली काँग्रेस का स्वाभाविक नेतृत्व क्रमशः कमजोर होता गया जिसका स्थान कम्युनिष्टों, और समाजवादियों जैसे राजनीतिक दलों को लेना चाहिए था किंतु 1962 में चीन के साथ हुआ सीमा विवाद और 1965 में कश्मीर की नियंत्रण रेखा के उल्लंघन का असर देश के आंतरिक सम्बन्धों पर भी पड़ा। कम्युनिष्टों के यथार्थवाद पर लुजलुजी भावुकता भारी पड़ गई और पाकिस्तान के साथ होने वाले युद्ध ने विभाजन के समय पैदा हुयी साम्प्रदायिकता को उभार दिया। इसमें अमेरिका ने भी परोक्ष भूमिका निभायी ताकि शीतयुद्ध के दौर में नेहरू की गुटनिरपेक्षता की नीति को पलीता लगाया जा सके। सत्ता के उतावलेपन ने समाजवादियों को कहीं गैरकाँग्रेसवाद के नाम पर सामंती, साम्प्रदायिक शक्तियों को आगे लाने की भूल कर दी तो कहीं उन्होंने हिन्दी का आन्दोलन भी चलवा दिया जिससे गैरहिन्दी भाषी क्षेत्र उनसे सशंकित हो गये। पिछड़ी जातियों के पक्ष में उठाये गये उनके आन्दोलनों के पीछे काँग्रेस के पक्ष में दलितों के एकजुट होने का मुकाबला करना अधिक था। पिछड़ों के पिछड़ेपन में जो वैविध्य था उसका ठीक से अध्ययन करने की जरूरत नहीं समझी गयी इसलिए वह जातिवादी वोट बैंक में बदलता गया और इस नाम पर उभरे विभिन्न पिछड़ी जतियों के विभिन्न समूह बने व समय समय पर गैर राजनीतिक आधार पर विभिन्न दलों से जुड़ते रहे। एक पिछड़ी जाति दूसरे से मुकाबला करने लगी। जनसंघ के नाम से उभरे दल ने हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद को मिलाकर साम्प्रदायिकता और स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास से पैदा देशप्रेम का घालमेल किया। इसके पीछे एक संगठित दल राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ था जिसे विभाजन के कारण शरणार्थी बने लोगों और मुसलमानों की हिंसा से भयाक्रांत समूहों का समर्थन प्राप्त था। काँग्रेस भी उन्हें इतनी परोक्ष सहायता करती रहती थी ताकि उनसे आशंकित मुसलमान उसके अपने ही वोट बैंक बने रहें। कालांतर में कांसीराम द्वारा उत्तर भारत में काँग्रेस के दलित वोट बैंक को अलग कर दिया और उसके सहारे उथल पुथल करने से लेकर मायावती कल में वोटों की सौदेबाजी तक राजनीतिक प्रभाव डाला। मण्डल कमीशन ने यादव, जाट, और कुर्मियों के नेता पैदा किये व राजनीतिक चेतना के सम्भावित विकास को नुकसान पहुँचाया। धन के सहारे भाजपा ने दलबदल को प्रोत्साहित किया, व सत्ता में जगह बनाते गये, व हर तरह की संविद सरकारों में घुसपैठ करके सत्ता के प्रमुख स्थानों व भूमि भवनों को हथियाते गये। राम जन्मभूमि विवाद को भुनाकर बड़ा साम्प्रदायिक विभाजन कराया व स्वयं को देश के सबसे बड़े हिन्दूवादी दल के रूप में स्थापित कर लिया। काँग्रेस के कमजोर होते ही क्षेत्रीय दलों का उद्भव होता गया व जो बीज रूप में थे उनका विकास होता गया। डीएमके, एआईडीएमके, बीजू जनता दल, तृणमूल काँग्रेस, तेलगुदेशम, टीआरएस, शिवसेना, उत्तरपूर्व के राज्यों के छोटे मोटे दल, अकाली दल, नैशनल काँफ्रेंस, पीडीपी व समाजवादियों के टुकड़ों से बने दर्जनों दल, उभरते गये जिनमें समाजवादी पार्टी, इंडियन नैशनल लोक दल, आरजेडी, जेडीयू, जनता पार्टी, वीजू जनता दल आदि हैं। इन्दिरा गाँधी की मृत्यु के बाद काँग्रेस और बिखरती गयी तथा नैशनलिस्ट काँग्रेस पार्टी, तृणमूल काँग्रेस, वायएसआर काँग्रेस, आदि बनती चली गयीं। काँग्रेस सत्तासुख का नाम बनता गया और जिसको जहाँ सुविधाजनक लगा उसने वहाँ अपनी पार्टी बना ली या तत्कालीन सत्तारूढ दल में सम्मलित होता गया। इस शताब्दी के दूसरे दशक में भ्रष्टाचार के खिलाफ आम आदमी पार्टी ने ध्यान आकर्षित किया और तेजी से उम्मीदें जगायीं किंतु दिल्ली में जीत के साथ ही उनके मतभेद ऐसे उभरे कि उनकी चमक धुल गयी और विकल्प के रूप में सामने आने का सपना चूर चूर हो गया। वामपंथी देश के दो कोने पकड़े रहे किंतु शेष देश में केवल बुद्धिजीवी की तरह ही पहचाने गये। यांत्रिक रूप से किताबी वर्ग विभाजन को ही शिखर पर रखते हुए वे दूसरे वर्ग भेदों की उपेक्षा करते रहे इसलिए जमीनी पकड़ नहीं बना सके।  
संघ के अनुशासन से जन्मी भाजपा द्वारा सत्ता के सहारे देश के सैन्य बलों पर अधिकार करना प्रमुख लक्ष्य था जिसके लिए काँग्रेस का कमजोर होना प्रमुख अवसर बना। उसने न केवल साम्प्रदायिक विभाजन, का सहारा लिया अपितु कार्पोरेट घरानों को उसके सत्ता प्रोजेक्ट में धन लगा कर अधिक लाभ के सपने भी दिखाये। उन्होंने इसके लिए बाज़ार में उतर चुके मीडिया को पूरी तरह खरीद कर अलग परिदृश्य ही प्रस्तुत कर दिया। प्रत्येक दल के महत्वपूर्ण नेता को उसकी हैसियत के अनुसार प्रस्ताव दिया और सम्मलित कर लिया। सेना, पुलिस, नौकरशाह, कलाकार, पूर्व राज परिवारों के सदस्य, जातियों के नेता, साधु संतों की वेषभूषा में रहने वाले लोकप्रिय लोग, खिलाड़ी, या अन्य किसी भी क्षेत्र के लोकप्रिय लोगों की लोकप्रियता को चुनावी लाभ के लिए स्तेमाल करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। बहुदलीय लोकतंत्र में विरोधी वोटों के बँटवारे से जो लाभ मिलता है उसके लिए विरोधी दलों में भी परोक्ष हस्तक्षेप करवाया। इन सबके सहारे उनका सत्ता पर नियंत्रण है किंतु झाग उठाकर जो बाल्टी भरी दिखायी गयी थी उसका झाग बैठना भी तय रहता है। यह झाग बैठना शुरू हो चुका है और इसे झुठलाने का इकलौता रास्ता सैन्य बलों के सहारे इमरजैंसी जैसी स्थिति लाना ही होगा, क्योंकि सक्षम विकल्प उभरता दिखायी नहीं देता।
नरेन्द्र मोदी अपनी पार्टी में भी सर्वसम्मत नेता नहीं थे क्योंकि उनका प्रशासनिक इतिहास बहुत लोकतांत्रिक नहीं था। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए कार्पोरेट घरानों को दी गयी सुविधाओं और भविष्य की उम्मीदों ने उन्हें राष्ट्रीय पटल पर स्थापित करवाया था, और चुनावी प्रबन्धन के सहारे शिखर तक पहुँचने में कामयाब हो गये, किंतु किये गये वादों का कार्यान्वयन नहीं कर सके। अपने चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने तत्कालीन सरकार और नेताओं पर जो गम्भीर आरोप लगाये थे उन्हें भी वे साबित नहीं कर सके व किये गये अतिरंजित चुनावी वादे पूरे करने की जगह उसकी पिछली सरकारों के कार्यकाल से ही तुलना करते रहे। नोटबन्दी और जीएसटी जैसी योजनाएं इस तरह से कार्यांवित की गयीं कि परेशानियां तो सामने आयीं किंतु जनता को लाभ कहीं दिखायी नहीं दिया।    
सच यह है कि भारतीय राजनीति में कोई ध्रुव नजर नहीं आता।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
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युवाओं से - अपनी आज्ञा मानो

युवाओं से -
अपनी आज्ञा मानो

वीरेन्द्र जैन
दुनिया के सारे विकास कथित विकास पुरुष के अपने जन्मदाताओं की समझ, सोच, विचार, और आचार से आगे निकलने पर ही सम्भव हुये हैं।
मनुष्य जैसे सभ्य और सामाजिक प्राणी को अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाने में लगभग अठारह बीस वर्ष की परिपक्वता जरूरी मानी जाती है। इस दौर में वह प्राथमिक ज्ञान के साथ अपने पूर्वजों द्वारा अर्जित जरूरी ज्ञान को प्राप्त कर चुका होता है। यही वह समय होता है जब उसे अपने खोल से वैसे ही बाहर निकल आना चाहिए जैसे कि चूजा छिलका तोड़ते हुए अंडे से बाहर निकल आता है। द्विज का एक अर्थ यह भी हो सकता है। यह मनुष्य ही है जो भोजन और संतति वृद्धि के अलावा भी जीवन में चिंताएं पालता है और इन्हीं चिंताओं से दुनिया को लगातार पिछली दुनिया से बेहतर बनाता जा रहा है। दुविधा हर उम्र के उन बच्चों की है जो परिपक्वता की उम्र पार कर जाने के बाद भी अपने पूर्वजों की बन्द गुफा से बाहर नहीं निकल पाने को अभिशप्त होते हैं क्योंकि बचपन से ही सिखाया जाता है कि अपने माँबाप की आज्ञा मानो। ये उपदेश एक उम्र तक ही ठीक हैं किंतु उसके बाद ऐसे उपदेश ही हमें कुन्द करते हैं, गुलाम बनाते हैं और इस गुलामी में युवा अपनी उम्र जी ही नहीं पाते। बुजुर्ग उन्हें अपनी तरह ढालना चाहते हैं, अपनी प्रतिलिपि बनाना चाहते हैं। गुलाम या कुण्ठित युवाओं के समाज में यही कारण है कि पिछले एक हजार वर्षों में हम लोगों ने न तो कोई नया अविष्कार किया और न ही कोई ऐसी नई वस्तु का निर्माण किया जिसे देख कर दुनिया हमारी प्रतिभा का लोहा मान जाये। इसके विपरीत हमने प्रतिभा की सम्भावनाओं को यह कह कर धूमिल करने की कोशिश की हमारे पास तो सारा ज्ञान तो पहले से ही था किंतु विदेशी आक्रमणों में वह नष्ट हो गया। अतीत पर झूठा गर्व करते रहने से प्रगति नहीं हो सकती। अगर वह था भी तो अब खो चुका है उसे नये ढंग से अविष्कृत होने दीजिए।
आज जरूरत इस बात की है कि युवाओं से कहा जाये कि माँबाप की नहीं अपनी खुद की आज्ञा मानो। मनुष्य नामक प्राणी को छोड़ कर ज्यादातर प्राणी जन्म के कुछ ही दिनों बाद अपना भोजन स्वयं जुटाने लगते हैं, और स्वतंत्र हो जाते हैं। पालकों की जिम्मेवारी बच्चों को बड़ा करने और शिक्षित करने तक ही होना चाहिए।
अगर समाज को आचरण की प्रेरणा देने वाली पौराणिक कथाओं का उल्लेख करें तो पार्वती, प्रह्लाद, भरत, सुभद्रा, सहित अनेक उदाहरण मिल जायेंगे जिन्होंने अपने पालकों की आज्ञा न मान कर वह काम किया है जो याद किया जाता है। इतिहास पुरुषों में भी बुद्ध, महावीर से लेकर गाँधी नेहरू तक अपने स्वतंत्र विचारों के आधार पर ही इतिहास में जगह बना सके। कला जगत में अधिकांश सफल कलाकारों ने अपने पालकों की सोच से अलग अपना व्यावसायिक और वैवाहिक जीवन स्वयं चुना होता है। लेखकों, संगीतकारों, और फिल्म अभिनेताओं में से अधिकांश की जीवन कथाएं सार्वजनिक हो चुकी हैं। बहुतांश सफल राजनीतिक लोगों ने भी अपना रास्ता स्वयं चुना है। कलाकारों के बारे में तो कहा ही गया है –
लीक लीक गाड़ी चले, लीकहि चले कपूत
लीक छांड़ तीनों चलें, शायर, सिंह सपूत
बुद्ध ने कहा ही है- अप्प दीपो भव। अर्थात अपने दीपक स्वयं बनो।
रजनीश ने एक बार अपने भाषण में कहा था कि किसी महापुरुष के पद चिन्हों पर चलने की कोशिश मत करो। महापुरुष ज़मीन पर नहीं चलते वे तो वायु मार्ग से गति करते हैं इसलिए उनके पद चिन्ह कहीं नहीं बनते। उनके लक्ष्य पर जाने के लिए स्वयं में पंख पैदा करने होते हैं।  
कृषि प्रधान समाज में पिता की आज्ञा मानने के पीछे उत्पादन के साधनों की विरासत पाने का लालच या उससे वंचना का डर भी रहता रहा है। अवज्ञा पर उन साधनों से वंचित होना पड़ सकता है। पुत्र से नाराज पिता अपनी कृषि भूमि और अन्य सम्पत्ति से पुत्र को वंचित भी कर सकता है। जब व्यक्ति श्रमिक बनता है तो वह परिवार से तो स्वतंत्रता अर्जित कर लेता है किंतु उसे मालिकों का गुलाम बनना पड़ता है, और उनके आदर्शों का अनुसरण करना होता है। दूसरी ओर जब समाज में वृद्धावस्था पेंशन न हो व स्वयं काम करने में असमर्थ होने पर उसे अपनी जिन्दगी खतरे में दिखाई देती हो तब उसे संतति के सहारे की जरूरत होती है। वह अर्जित सम्पत्ति के सहारे अपने बच्चों को आजीवन गुलाम बना कर रखना चाहता है व अपने जीवन आदर्श ही पालन करवाना चाहता है। यदि सबको वृद्धावस्था पैंशन हो और स्वास्थ का बीमा हो तो वह अपने बच्चों को आज़ादी दे सकता है। जब बच्चे शिक्षित हो कर अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं तब वे अपना निवास स्थल या अपना जीवन साथी स्वयं चुनते हैं। वे माँबाप के अहसानों को आजीवन गुलाम बन कर नहीं चुकाना चाहते अपितु अपनी तरह उनकी जरूरी वस्तुएं उपलब्ध कराने के बाद भी सैद्धांतिक समझौता नहीं करते और न ही इमोशनली ब्लेकमेल होना चाहते हैं।
जो युवा अपना स्वतंत्र विकास चाहते हैं उन्हें परिपक्व होने के बाद माँबाप की आज्ञा मानने के आदर्श वाक्य से मुक्त होना पड़ेगा। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने वानभट्ट की आत्मकथा में कहा है-  किसी से भी नहीं डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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शुक्रवार, अक्तूबर 13, 2017

जनान्दोलनों का विकृतीकरण

जनान्दोलनों का विकृतीकरण
वीरेन्द्र जैन
सुप्रसिद्ध लेखक व वामपंथी विचारक राजेन्द्र यादव ने अपने एक सम्पादकीय आलेख में कुछ इस तरह लिखा था कि हमारे विरोधी कई तरह के हथकण्डे स्तेमाल करते हैं। पहले वे विरोध करते हैं पर जब उसमें सफल नहीं हो पाते तब हमारे विचार को विकृत करके पेश कर नफरत पैदा करते हैं, और उसमें भी सफल न हो पाने पर वे विलीनीकरण करते हुए कहते हैं कि हमारा रास्ता तो एक जैसा है और हमारी भाईबन्दी है। उन्होंने बुद्ध धर्म का उदाहरण देते हुए बताया था कि एक समय उनका बहुत विरोध किया गया यहाँ तक कि हिंसक संघर्ष में उनके हजारों मठ नष्ट कर दिये गये व मूर्तियां तोड़ दी गयीं। उसके बाद विकृतीकरण का दौर आया और तरह तरह से उनके नियमों आचरणों का मखौल बनाया गया। बुद्धू शब्द भी बुद्ध को विकृत करके जन्मा है। पर उसके बाद बुद्ध को विष्णु के अवतार के रूप में मान्यता दे दी गयी और उनको विलीन करने की कोशिश की गयी। उल्लेखनीय है कि अभी हाल ही में भाजपा के एक सांसद मेघराज जैन ने जैन धर्माबलम्बियों को अल्पसंख्यक घोषित किये जाने को एक षड़यंत्र बताते हुए उसे हिन्दू धर्म की ही एक शाखा बताया व मांसाहारियों के साथ अल्पसंख्यक होने की घोषणा को वापिस लेने की मांग की है। रोचक यह है कि इसी दौरान उन्हीं के राज्य के एक विधायक ने स्लाटर हाउस के विरोधियों को जबाब देते हुए कहा कि देश का अस्सी प्रतिशत हिन्दू भी मांसाहारी है, उसके बारे में भी सोचो।
अब आये दिन देखा जाने लगा है कि मजदूरों, कर्मचारियों के आन्दोलन में जलूस धरने प्रदर्शन की जगह कुछ लोग सामूहिक सद्बुद्धि यज्ञ हवन या भजन कीर्तन करने लगे हैं। यह बात अलग है कि अगर प्रबन्धन और श्रमिक संगठनों के बीच पहले से सांठ गांठ न रही हो तो ऐसे धार्मिक आयोजनों के प्रभाव में कभी कोई मांग पूरी नहीं हुयी है। ऐसे आयोजनों के पीछे एक और कूटनीति छुपी होती है और वह है मजदूरों के बीच में साम्प्रदायिक विभाजन कराना। जब एक धर्म विशेष की पूजा पद्धति को आन्दोलन का हिस्सा बनाया जायेगा तो श्रमिक एकता में विभाजन को रोका नहीं जा सकेगा। इसका ही परिणाम हुआ है कि कई प्रबन्धकों ने एक धर्म विशेष के लोगों को कार्यालय के समय में उपासना के लिए छुट्टी दे कर विभाजन के बीज बो दिये हैं जबकि होना यह चाहिए था कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के कार्यालयों/ कारखानों में समस्त उपासनाएं उनके व्यक्तिगत समय में ही सीमित होना चाहिए और भक्ति या नौकरी में से किसी एक का चुनाव करने का नियम कठोरता से लागू होना चाहिए। देखने में यह बहुत मामूली सी सुविधा लगती है पर इसका प्रभाव दूरगामी होता है।
हिन्दू पुराणों में दुनिया के निर्माण के लिए एक देवता का उल्लेख आया है जिन्हें विश्वकर्मा का नाम दिया गया है। बाद में तो देश की कुछ श्रमिक जातियों जैसे लोहार, बढई आदि ने अपना जातिनाम विश्वकर्मा रखना शुरू कर दिया। दुनिया में रूस की क्रांति के बाद जब मजदूरों किसानों का महत्व पहचाना गया तब अमेरिका के शिकागो से शुरू हुये मई दिवस [मजदूर दिवस] का आयोजन हमारे देश में भी जोर शोर से होने लगा। श्रमिकों के बीच कम्युनिष्ट पार्टी से जुड़े मजदूर संगठनों की लोकप्रियता भी बढने लगी। हमारे देश के पहले संसदीय चुनावों में कम्युनिष्ट पार्टी मुख्य विपक्षी पार्टी की तरह उभरी थी। जब दुनिया में शीत युद्ध का दौर आया तो कम्युनिष्ट पार्टियों के समानांतर दक्षिणपंथी पार्टियों को उभारा गया। इनमें आरएसएस की पृष्ठभूमि वाली जनसंघ जो बाद में भाजपा की तरह अवतरित हुयी मुख्य दक्षिणपंथी पार्टी की तरह सामने आयी। इसने वामपंथी श्रमिक संगठनों के समानांतर अपने श्रमिक संगठन बनाये जो भारतीय मजदूर संघ के बैनर तले गठित किये गये। इस संघ ने कालांतर में मई दिवस के समानांतर विश्वकर्मा दिवस मनाना शुरू कर दिया व धार्मिक प्रतीक के साथ जुड़े होने के कारण हिन्दू मजदूरों में सहज लोकप्रियता प्राप्त कर ली। वैसे तो पुराणों में विश्वकर्मा जयंती दीवाली त्योहर के अगले दिन होने का उल्लेख आया है किंतु समस्त कार्यालयीन कार्य ग्रेगेरियन कलेंडर के हिसाब से होने के कारण उसे प्रतिवर्ष 17 सितम्बर को मनाया जाने लगा व भारतीय मजदूर संघ की मांग पर प्रबन्धन ने उस दिन छुट्टी भी घोषित कर दी। इस तरह मजदूरों के बीच धार्मिक आधार पर भेद पैदा कर दिया गया। नई इकाइयों के प्रारम्भ करने में हिन्दू विधि से पूजा पाठ करने, भूमि पूजन करने आदि की परम्परा ने भी जोर पकड़ा।
धर्मनिरपेक्ष समाज में साम्प्रदायिक आधार पर विभाजन के बीज बोने के बारीक काम तो बहुत सारे होते रहे जो तुरंत समझ में नहीं आते किंतु इनके परिणाम दूरगामी होते हैं, जैसे कि ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित स्कूलों की लोकप्रियता के समानांतर संघ ने शिक्षण संस्थाएं संचालित करना प्रारम्भ कीं और अपने स्कूलों का नाम सरस्वती शिशु मन्दिर रखा। विद्यालय की जगह मन्दिर का नामांकरण किसी संस्था को धर्म विशेष से जोड़ देने का महीन खेल था, जिसमें दोपहर के भोजन अवकाश के समय भोजन मंत्र का पाठ किया जाना अनिवार्य था। बाद में इनकी सरकारें बन जाने पर तो समस्त योजनाओं का नामांकरण ही इस तरह से किया जाने लगा जिसमें धर्म विशेष से सम्बन्ध प्रकट होता था। सत्ता के सुख भोगते रहने तक काँग्रेस इस के प्रति उदासीन रही।
मजदूरों के विभिन्न संगठनों में बँट जाने के बाद भी उनमें धार्मिक और जातियों के आधार पर भेद हो जाने से उनकी ताकत कमजोर हुयी है। नियमित मजदूरों की संख्या निरंतर कम होती जा रही है व ठेका मजदूरों की संख्या बढ रही है। बेरोजगारी के कारण प्रतियोगिता बढने के कारण भी वे अपनी मांगों के लिए दबाव नहीं बना पाते जिससे प्रबन्धन ही लाभ की स्थिति में रहता है। इन दिनों धर्म के नाम पर श्रम के शोषण के जो खेल चल रहे हैं उन्हें समझने की जरूरत है। गौरक्षा, घर वापिसी, मन्दिर मस्ज़िद, लव जेहाद, तीन तलाक, धर्म परिवर्तन, आदि ऐसे ही तुरुप के पत्ते हैं जो विभिन्न तरह के आन्दोलनों के खिलाफ पटक दिये जाते हैं जिन्हें खरीदा हुआ मीडिया हवा देता रहता है।
सरकारी मशीनरी और लोकतांत्रिक स्तम्भों/ संस्थाओं को पूर्ण धर्म निरपेक्ष बनाये बिना शोषण की शक्तियों से मुकाबला कठिन है।   
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, अक्तूबर 05, 2017

दलितों का स्वतंत्रता आन्दोलन शुरू होता है अब ...

दलितों का स्वतंत्रता आन्दोलन शुरू होता है अब ...
वीरेन्द्र जैन

देश की अंग्रेजों से स्वतंत्रता चाहने वाले दूसरे लोगों की तरह स्वतंत्रता आन्दोलन में अम्बेडकर अंग्रेजों से तुरंत आज़ादी के पक्षधर इसलिए नहीं थे क्योंकि उस मांग में दलितों को सवर्णों की गुलामी से मुक्ति पाने की स्पष्टता नहीं थी। उनका सही सवाल था कि यह आज़ादी किसको मिलेगी? जब तक देश में जातिभेद है तब तक जिनके हाथों में सत्ता आयेगी वे दलितों को समान नागरिक का दर्जा भले ही दे दें पर समाज में बराबरी की हैसियत हासिल नहीं करने देंगे। दूसरी ओर सामंती समाज में गाँधीजी अछूत उद्धार के कार्यक्रम इतनी सावधानी से चला रहे थे ताकि स्वतंत्रता आन्दोलन में समाज की एकता बनी रहे। वे चाहते थे कि अम्बेडकर द्वारा समर्थित अंग्रेजों द्वारा जातिवाद की विसंगति को उभारने वाला अलग निर्वाचन क्षेत्र का कानून लागू न हो।
जैसा कि प्रचारित किया जाता है, उसके विपरीत महात्मा गाँधी ने अनशन के हथियार का प्रयोग अंग्रेजों के खिलाफ नहीं किया था अपितु अपने लोगों के मानस को बदलने के लिए ही किया था। ऐसा ही एक अनशन उन्होंने यरवदा जेल में रहते हुए अम्बेडकर की दलितों के अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग के खिलाफ किया था। असहमत होते हुए भी अम्बेडकर ने देश भर के राष्ट्रीय नेताओं के आग्रह पर यह मांग इसलिए वापिस ले ली थी क्योंकि वे गाँधीजी के जीवन को महत्वपूर्ण मानते थे। इसे इतिहास में पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। 26 सितंबर 1932 को गांधी जी ने, कवि रवींद्रनाथ ठाकुर तथा अन्य मित्रों की उपस्थिति में संतरे का रस लेकर अनशन समाप्त कर दिया था। इस अवसर पर भावविह्वल कवि ठाकुर ने स्वरचित "जीवन जखन शुकाये जाय, करुणा धाराय एशो" यह गीत गाया। गांधी जी ने अनशन समाप्त करते हुए जो वक्तव्य प्रकाशनार्थ दिया, उसमें उन्होंने यह आशा प्रकट की कि, "अब मेरी ही नहीं, किंतु सैकड़ों हजारों समाजसंशोधकों की यह जिम्मेदारी बहुत अधिक बढ़ गई है कि जब तक अस्पृश्यता का उन्मूलन नहीं हो जाता, इस कलंक से हिंदू धर्म को मुक्त नहीं कर लिया जाता, तब तक कोई चैन से बैठ नहीं सकता। यह न मान लिया जाए कि संकट टल गया। सच्ची कसौटी के दिन तो अब आनेवाले हैं।"    
समाज का पीड़ित पक्ष संगठन में कमजोर और बिखरा हुआ भी होता है और ज्यादातर अवसरों पर वह अपनी लड़ाई लड़ने की हिम्मत, संसाधन और रणनीति भी खुद नहीं बना पाता, जबकि उत्पीड़क पक्ष अधिक साहसी साधन सम्पन्न और तर्क सम्पन्न होता है, उसे परम्परा का बल मिला होता है। यही कारण है कि पीड़ित पक्ष के बहुत सारे आन्दोलनों की भूमिका उनसे सहानिभूति रखने वाले भिन्न पक्ष ने लिखी होती है। दलितों के मसीहा अम्बेडकर की प्रतिभा को निखारने में मदद करते हुए उनकी वैचारिक स्वतंत्रता बनाये रखने में बड़ोदा के महाराज सियाजीराव गायकवाड़ की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।
आज़ादी के बाद लिखे संविधान में दलितों के उत्थान के लिए जो आरक्षण की व्यवस्था की गयी थी उसने जातिवाद के उन्मूलन में तो वांछित भूमिका नहीं निभा पायी किंतु सत्तर सालों में इतना चेतना सम्पन्न अवश्य  कर दिया कि वे अब अपने समान मानवीय अधिकारों की बात सोच सकते हैं। प्रारम्भ में जब उन्हें आरक्षण मिला तब शिक्षा में प्रवेश व नौकरी आदि के लिए प्राथमिक योग्यता की अनिवार्ताएं वही रहीं जिन्हें प्राप्त करने का अवसर ही उनके समाज को नहीं मिला था, इसलिए योग्य उम्मीदवार के न मिलने को आधार बना कर रिक्त स्थानों को सवर्ण अधिकारियों ने गैरआरक्षित वर्ग से भर लिया। बहुत बाद में यह व्यवस्था आयी कि आरक्षित पदों को तब तक खाली रखा जायेगा जब तक कि उसी वर्ग में से वांछित योग्यता वाले उम्मीदवार नहीं मिल जाते। संसद और विधानसभाओं में भी बहुत सारी आरक्षित सीटों पर पूर्व राजा महाराजा या सवर्ण नेताओं के आरक्षित वर्ग के सेवकों को भेजा जाता रहा। सदन की कार्यवाही की रिपोर्टें बताती हैं कि सदन की बहस में उनको कितने कम अवसर मिल सके हैं। आज़ादी के तीस-चालीस साल बाद जब साधन हीन दलितों की पहली शिक्षित पीढी सामने आयी उसी समय से आरक्षण का सक्रिय विरोध भी शुरू हो गया।
आरक्षण ने सभी कार्यालयों में निश्चित संख्या में आरक्षित वर्ग की उपस्तिथि तय करने का प्रारम्भिक काम किया। सवर्णों के वर्चस्व वाले इन कार्यालयों में आरक्षित वर्ग से आये कर्मचारियों के साथ जो नफरत और उपेक्षा बरती गयी उससे पीड़ित लोगों की आवाज बन कर कांसीराम उभरे। वे इसलिए आगे बढ सके क्योंकि एक निश्चित स्थान पर निश्चित संख्या में थोड़ा पढा लिखा, पीड़ित वर्ग उपलब्ध था जिसके साथ संवाद किया जा सकता था और उसका सहयोग लिया जा सकता था। इसमें मिली सफलता के बाद ही वे बामसेफ, डीएसफोर से गुजरते हुए बहुजन समाज पार्टी के गठन तक पहुँचे और जब तक यह पार्टी भटक नहीं गयी तब तक दलितों के आन्दोलन की बड़ी संस्था बनी रही। वंचित वर्ग के भटकने और चकाचौंध में दृष्टि खो देने की सम्भावनाएं भी अधिक रहती हैं। मायावती के बाद उदितराज और रामदास अठावले आदि की भटकनें इसका उदाहरण हैं।  
पिछले दिनों दलितों के शिक्षित और नाराज युवकों की जो पीड़ी सामने आयी है वह दलितों की आज़ादी का एक नया इतिहास लिखने जा रही है। वे जानते हैं कि उनके वर्ग के लोग प्रत्येक कार्यालय, संसद, विधान सभा व शिक्षण संस्थानों में हैं। जे एन यू और हैदराबाद विश्वविद्यालय में उनके छात्र संगठन का उभार हो या गुजरात में जिग्नेश व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चन्द्रशेखरउर्फ रावण की भीम सेना का उभार हो, वे अपने अधिकारों को कटोरा लेकर नहीं मांग रहे अपितु टेबिल ठोक कर लेना चाह रहे हैं। गुजरात, आन्ध्रप्रदेश, उत्तरप्रदेश, तामिलनाडु, महाराष्ट्र, आदि स्थानों पर वे टकराव की स्थिति में हैं तथा दूसरे अन्य स्थानों में भी वे पीछे नहीं हैं। वे बार बार विभिन्न स्थानों पर धर्म बदल कर चुनौती दे रहे हैं, और भाजपा कानून का समरण कराने का साहस भी नहीं दिखा पा रही।।
भाजपा ने उनकी चुनौती को समझा है इसलिए वह दो तरह की रणनीतियों पर काम कर रही है एक ओर तो वह दलित नेतृत्व को पदासीन कर रही है जैसे कि राष्ट्रपति पद पर श्री रामनाथ कोविन्द को बैठाना, दूसरी ओर वह आदिवासियों को दलितों से दूर करने के लिए उन्हें विशेष महत्व दे रही है। पिछले दिनों मध्यप्रदेश में एक आदिवासी महिला को राज्यसभा में भेजा गया है। वे आरक्षण को खतरे की तरह चित्रित कर रहे हैं और सवर्णों की बेरोजगारी को आरक्षण से जोड़ कर उन्हें भड़काकर अपना सवर्ण वोट बैंक मजबूत करने में लगे हैं। आरएसएस प्रमुख ने चुनावों से पहले आरक्षण की समीक्षा का बयान दे कर सवर्णों को सांत्वना दी थी। भाजपा के पास जुटाये हुए दलित नेता तो हैं किंतु स्वाभाविक रूप से उभरा दलित नेतृत्व नहीं है। यह हो भी नहीं सकता क्योंकि उनके हिन्दुत्व का स्वरूप दलितों को डराता है। मृत जानवरों के चमड़े का काम करने वाला दलित भयभीत है और अपना धन्धा चौपट हो जाने के कारण गुस्से में है।
आगामी गुजरात चुनाव में इसका परिणाम दिखाई देगा। 
 वीरेन्द्र जैन
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