रविवार, मई 28, 2017

फिल्म समीक्षा वर्ग भेद की पहचान कराती फिल्म ‘हिन्दी मीडियम’


फिल्म समीक्षा
वर्ग भेद की पहचान कराती फिल्म हिन्दी मीडियम

वीरेन्द्र जैन
जो लोग फिल्मों की कथा वस्तु और कथा कथन में ताज़गी को पसन्द करते हैं, उनके लिए हिन्दी मीडियम एक बेहतरीन फिल्म है। हमारे जैसे अर्ध-सामंतवादी, अर्ध-पूंजीवादी समाज में अंतर्विरोधों के स्वरूप भी भिन्न भिन्न प्रकार के हैं, जिसमें से एक की कथा इस फिल्म में कही गयी है।
अंग्रेजों के उपनिवेशवाद से हमने बिना सीधे टकराव के जिस शांति और अहिंसा के सहारे आज़ादी प्राप्त की है उसकी कुछ अच्छाइयां, और कुछ बुराइयां हमसे जुड़ी हुयी हैं। यह सच है कि अंग्रेजी शासन के दौर ही में हम कूप मण्डूपता से बाहर निकलने की ओर बढे और हमने दुनिया को अपना परिचय देते हुये उससे अधिक सीखा भी है। आर्यसमाज जैसे संगठन का उदय, सती प्रथा जैसी अनेक बुराइयों को निर्मूल करने वाले राजा राम मोहन राय, जातिवाद के खिलाफ लड़ाई छेड़ने वाले ज्योतिबा फुले, और अम्बेडकर आदि उन्हीं के शासनकाल में सामने आये। हमारे समाज के बदलाव में विदेश से शिक्षा ग्रहण करके स्वतंत्रता आन्दोलन में उतरे गाँधी और नेहरू जैसे महान विचारकों की सक्रियता के साथ सोवियत संघ की क्रांति की बड़ी भूमिका रही। किंतु आज़ादी के बाद भी जिन राजाओं नबाबों को गुलाम बना कर अंग्रेज राज्य किया करते थे, उनकी भक्ति से समाज का एक हिस्सा मुक्त नहीं हो पाया और उनमें से बहुत सारे अभी भी सांसदों, विधायकों के रूप में हमारे ऊपर शासन कर रहे हैं। अंग्रेजी का सम्मान भी उसके अंतर्राष्ट्रीय भाषा होने से अधिक हमारे प्रभुवर्ग की भाषा होने की स्मृति के रूप में बना हुआ है, जिनका हम अभी भी सम्मान कर रहे हैं। आज़ादी के बाद में पैदा हुआ प्रभुवर्ग भी अपनी महत्ता विदेशी वस्त्रों के साथ साथ उनकी भाषा से बनाये हुये है। हमारी चेतना में यह छाया हुआ है कि अगर हमको सामाजिक स्तर में ऊपर उठना है तो अंग्रेजी जैसी भाषा के सहारे ज्ञान प्राप्त होना चाहिए। ऐसी इच्छा रखने वाले लोग अगर खुद अंग्रेजी स्कूलों में नहीं पढ पाये हैं तो भी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के नामी स्कूलों में पढाना चाहते हैं।
जब पूर्ति से अधिक मांग होती है तो वस्तु या सेवा की कीमतें बढती हैं और कई मामलों में ये कीमतें क्रेता के नैतिक मूल्यों से गिरने के रूप में भी चुकायी जाती हैं। यही नैतिक पतन कभी कभी आत्मा को कचोटता है। हिन्दी मीडियम की कहानी इसी कचोट की कहानी है, जिसे साकेत चौधरी के निर्देशन व इरफान, कमर सबा, और दीपक डोब्रियाल आदि के अभिनय ने मर्मस्पर्शी ढंग से व्यक्त की है।
पिछले दशक में ही गैर सरकारी संगठनों ने शिक्षा के अधिकार के लिए जो प्रयास किये थे, वे फलीभूत होने की दिशा में बढे थे[भोपाल के स्व. विनोद रैना भी उस आन्दोलन के प्रमुख योजनाकारों में एक थे व भारत ज्ञान विज्ञान समिति के माध्यम से योजना को मूर्त रूप देते हुए पाये जाते थे] इस योजना का एक भाग यह भी था कि स्कूल को निवास के निकट होना चाहिए व स्कूल के आस पास रहने वाले गरीब समुदाय के बच्चों को भी 25% तक की सीमा में प्रवेश देना हर स्कूल के लिए जरूरी होगा जिनकी फीस का अतिरिक्त हिस्सा सरकार वहन करेगी। किंतु जैसा कि ऐसी योजनाओं में होता है वही इसमें भी हुआ कि अमीर वर्ग के लोग गरीबों के रूप में कोटा हड़पने लगे। इसी फिल्म का ही एक डायलाग है जिसमें फिल्म का सहनायक कहता है कि हम गरीबों को मिली जमीनों पर अमीरों ने कब्जा कर लिया, हमारा सस्ता राशन ले लिया और अब शिक्षा का अधिकार भी तिकड़म से हथियाने लगे। देश भर में तेज हो रहे दलित अधिकार आन्दोलन भी इसी अहसास से प्रज्वलित हो रहे हैं।
कहानी एक अच्छी कमाई वाले नव धनाड्य परिवार की पढी लिखी बहू की उस महात्वाकांक्षा की है जिसे भ्रम है कि अगर उसकी इकलौती लड़की अच्छे अंग्रेजी स्कूल में नहीं पढी तो वह हीन भावना की शिकार होकर ड्रग लेने लगेगी। उसका पति उसे खुश रखने और उसकी हर इच्छा पूरी करने के लिए चाँदनी चौक की घनी बस्ती को छोड़ कर वसंत बिहार की पाश कालौनी में रहने लगता है किंतु उसके अंग्रेजी अज्ञान और व्यावसायिक पृष्ठभूमि के कारण जब उसकी लड़की का प्रवेश नहीं हो पाता किंतु गरीबों के कोटे में उसके नौकर की बेटी का हो जाता है तो एक दलाल के कहने पर कुछ दिनों के लिए वह गरीब बस्ती में रहने चला जाता है। अमीरी और नकली गरीबी के इस द्वन्द से उपजी विसंगतियां हास्य भी पैदा करती हैं, और उस बस्ती की दशा पर करुणा भी जगाती हैं। गरीबी में भी त्याग, आपसी सहयोग, भाईचारा, आदि उसकी आंखों पर अमीरी से उपजी असंवेदनशीलता की चर्बी को उतार देती है। संयोग से उसकी लड़की का प्रवेश तो गरीबों के कोटे से हो जाता है किंतु उसे सहयोग करने वाले के बेटे का नहीं हो पाता जो उस सीट का असली हकदार था। इसी विडम्बना से जन्मी आगे की कहानी जल्दी समेटने के चक्कर में थोड़ी बम्बइया हो जाती है, पर मर्मस्पर्शी बनी रहती है।
रोचक बनाने के लिए हास्य के दृश्य और संवाद स्वाभाविक हैं व ठूंसे हुए नहीं लगते। विवेकहीन फैशन, और व्यापार कौशल के दृश्य मनोरंजक हैं। इस फिल्म में व्यवस्था ही खलनायक है और व्यवस्था पर सवाल उठाने वाली सभी फिल्में परोक्ष में राजनीतिक फिल्में ही होती हैं, जो कुछ सोचने और बदलने के लिए प्रेरित करती हैं। यह आमिरखान की अच्छी फिल्मों की परम्परा में इरफान की एक नई कड़ी है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

         

शुक्रवार, मई 26, 2017

आज़ादी के बाद के आन्दोलन, और भ्रष्टाचार

आज़ादी के बाद के आन्दोलन, और भ्रष्टाचार
वीरेन्द्र जैन

हमने पिछले कुछ वर्षों में जन आन्दोलनों से उभरे समूहों को पार्टी में बदलते, दिवा स्वप्न देख कर चुनावों में भाग लेते और फिर असफल होते देखा है। इनकी संख्या बहुत है किंतु तात्कालिक रूप से बहुजन समाज पार्टी और आम आदमी पार्टी इसकी ताजा शिकार दिखायी दे रही हैं।
आज़ादी के बाद पंचवर्षीय योजनायें बनायी गयीं और क्षमतानुसार विकास से जुड़े असंख्य कार्य हुये। देश की आज़ादी से पहले स्वास्थ सेवाओं का यह हाल था कि हैजा, प्लेग. चेचक आदि महामारियों में हजारों लोग एक साथ मारे जाते थे, और इन्हें दैवीय प्रकोप माना जाता था। उल्लेखनीय है कि उस दौरान मिशनरी अस्पतालों ने अपने सेवा कार्यों से लाखों जिन्दगियां बचायी हैं, क्योंकि ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित अस्पताल न तो सवर्ण व दलितों में कोई भेद मानते थे और न ही हिन्दू मुसलमान में भेद मान कर चलते थे। धर्म का आदेश मान कर इस दिशा में जो काम ईसाई मिशनरियों ने किया है वह हिन्दू मुसलमान किसी धर्म समाज ने नहीं किया क्योंकि नियति या कर्मफल मानने के करण उनके यहाँ पीड़ित मानवता की सेवा का कोई विचार ही नहीं था। आज़ादी के आन्दोलन के दौरान गाँधीजी ने, जो दक्षिण अफ्रीका से रेडक्रास में काम करने का अनुभव लेकर आये थे, दलितों और कुष्ट रोगियों के लिए अपने आन्दोलन के साथियों को लगाया, दूसरी ओर अपनी साम्प्रदायिक प्रतियोगिया से प्रेरित होकर आर्य समाज आदि ने शिक्षा के क्षेत्र में कुछ अलग काम किया। आज़ादी के बाद स्वप्नदर्शी कहे जाने वाले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देश की क्षमता के अनुरूप तेजी से विकास योजनाएं बनायीं, और देश के मूलभूत ढाँचे को स्थापित करने का काम किया। इसी परम्परा को बाद में शास्त्री जी, जिन्हें कम समय मिला और बाद में इन्दिरा गाँधी ने आगे बढाया। बिना मांग के किये गये इसी विकास के साथ साथ भ्रष्टाचार का भी विकास होता गया जो सुविधा शुल्क से बढ कर कमीशनखोरी, हिस्सेदारी और अंत में बिना काम किये हुए ही भुगतान तक पहुँच गया। भ्रष्टाचार के इसी विकास ने आम जन को व्यथित किया और आज़ादी के बाद कई बड़े राष्ट्रव्यापी आन्दोलन भ्रष्टाचार के सवाल पर ही खड़े हुए व जनता की उम्मीदों का समर्थन पाकर सत्ता में भी बदलाव हुआ।
1974 में चिमन भाई पटेल की गुजरात सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ छात्रों का आन्दोलन प्रारम्भ हुआ जिसे देख कर खुद को रिटायर्ड मान चुके जय प्रकाश नारायण फिर से मैदान में कूद पड़े और सम्पूर्ण क्रांति के नारे के साथ जो आन्दोलन प्रारम्भ हुआ उसकी परिणिति पहले इमरजैंसी और बाद में जनता पार्टी के गठन व उसकी सरकार बनने तक जा पहुँची। अपनी सारी ऊर्जा सरकार बनाने में लगा देने के कारण जनता पार्टी भ्रष्टाचार उन्मूलन का लक्ष्य ही भूल गयी। 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार के नाम पर ही काँग्रेस छोड़ी व कम्युनिष्टों और भाजपा दोनों से बाहरी समर्थन ले कर सरकार बनायी। काँग्रेस और भाजपा के बीच झूलती सरकारों के बीच विरोध का नहीं अपितु प्रतियोगिता का रिश्ता रहा है और उनके बीच आलोचना का प्रमुख मुद्दा भ्रष्टाचार ही रहा है। अटल बिहारी सरकार से लेकर मनमोहन सिंह के कार्यकाल की दोनों सरकारों ने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये हैं, पर दोनों ने ही नई आर्थिक नीतियों का समर्थन किया है। उल्लेखनीय है कि वित्त मंत्री के रूप में जब मनमोहन सिंह नई आर्थिक नीति लेकर आये थे तब भाजपा ने कहा था कि इन्होंने हमारी नीति का अपहरण कर लिया है।
2010 के बाद अरविंद केजरीवाल ‘इंडिया अगेंस्ट करप्पशन’ आन्दोलन लेकर आये और महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन करके कुछ मंत्रियों को हटवाने वाले अन्ना हजारे को आगे कर दिया था। अन्ना हजारे भावनात्मक अधिक और बौद्धिक कम थे, इसलिए भाजपा के चंगुल में फँस गये, जिन्होंने आन्दोलन के दौरान अनेक तरह की व्यवस्थाएं की थीं। बाद में इसी आन्दोलन से निकल कर किरन बेदी व जनरल वी के सिंह, भाजपा में शामिल हो गये, अरविन्द केजरीवाल ने अलग पार्टी बना ली और दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गये। इसी दौरान रामदेव ने भारतीय स्वाभिमान पार्टी भी बना ली थी और इंडिया अगैंस्ट करप्पशन को भी हड़प लेना चाहा पर उनकी सन्दिग्ध गतिविधियों के कारण उन्हें आन्दोलन में प्रवेश नहीं दिया गया। परिणाम स्वरूप उन्होंने अलग से आन्दोलन किया जिसमें वे असफल रहे और अलग पार्टी का विचार छोड़ भाजपा के शरणागत हो गये।   
काँग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार के विरोध के आधार पर ही भाजपा ने 2014 का आम चुनाव लड़ा और कामन वैल्थ, टूजी, थ्रीजी की रिपोर्टों के साथ जमीनों के सौदे आदि के साथ पुराने नेताओं को छोड़ कर मोदी को प्रत्याशी बनाया गया जो 2002 के गुजरात नरसंहार के साथ ऐसी राज्य सरकार चलाने के लिए भी जाने जाते रहे थे, जिस पर आर्थिक भ्रष्टाचार का कोई बड़ा आरोप नहीं था। साम्प्रदायिक हिंसा के गम्भीर आरोपों के बाद भी उन्हें प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी इसी छवि के कारण से बनाया गया था।
कम्युनिष्ट पार्टियां भ्रष्टाचार को पूंजीवाद की अनिवार्य बुराई मान कर चलती हैं व उनका मानना है कि यह रोग पूंजीवाद के साथ ही जायेगा इसलिए जड़ पर प्रहार करना ही इसका हल है। विभिन्न सरकारें बदलने पर भी भ्रष्टाचार का बने रहना उनकी बात के पक्ष में जाता है। यही कारण है कि भले ही वे खुद ईमानदार रहे हों किंतु उन्होंने स्थापित सत्ता का विरोध करने के लिए भ्रष्टाचार को इकलौता मुद्दा नहीं बनाया। यह अलग बात है कि उनके वर्ग शत्रु द्वारा भ्रष्टाचार से अर्जित संसाधनों के कारण वे अपनी आवाज को जनता तक पहुंचाने व संघर्ष में पिछड़ते रहे हों। 
हाल ही में जब अरविन्द केजरीवाल ने अपनी पार्टी की औकात से अधिक सपने देखे और सीधे सीधे मोदी सरकार को चुनौती दी तो उसने उनकी सरकार को गिराने के लिए हर सम्भव उपाय शुरू कर दिये। उपराज्यपाल, पुलिस कमिश्नर, का दुरुपयोग, विधायकों की त्रुटियों से लेकर उनकी पारिवारिक कमजोरियों तक से भी जब बात नहीं बनी तो उनकी ईमानदार छवि के मूल आधार पर ही हमला करा दिया। मीडिया को पहले ही अपने अधिकार में कर चुके थे।
हम कह सकते हैं कि आज़ादी के बाद देश की केन्द्र व राज्य सरकारों को बदलने के जो आन्दोलन हुये हैं वे भ्रष्टाचार के आसपास ही घूमते रहे हैं। मजदूरों, किसानों, दलितों, पिछड़ों, महिलाओं, आदि द्वारा सत्ता बदलवाने वाला राष्ट्रव्यापी कोई बड़ा आन्दोलन नहीं हुआ। मोदी के नियंत्रण व नेतृत्व वाली भाजपा की राज्य सरकारों में व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार है किंतु केन्द्र सरकार की छवि पर कोई सीधा दाग नहीं लगा। यही छवि मोदी को अगले दो साल तक बनाये रहेगी, भले ही उतार चढाव बने रहेंगे।     
वीरेन्द्र जैन
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अभिव्यक्ति की भ्रूणहत्या के तीन साल

अभिव्यक्ति की भ्रूणहत्या के तीन साल
वीरेन्द्र जैन

बुन्देली में एक कहावत है, ‘कई लाबर बड़ो कै दोंदा? कई दोंदा, काय के वो बात खों दोंद देत’। इसका अर्थ यह है कि अगर पूछा जाये कि झूठ बोलने वाला ज्यादा शातिर है या बात को निरर्थक ठेलने वाला तो उत्तर होगा कि बात को ठेलने वाला, क्योंकि वह बात के नुकीले सवाल की नोक को ही तोड़ देता है। मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ऐसे ही दोंदने वालों से भरी हुयी है, और प्रमुख मीडिया को उसने पालतू बना लिया है।   
गत 14 अप्रैल 16 को जब पूरा देश बाबा साहब अम्बेडकर की 125वीं जयंती मना रहा था और सतारूढ दल से लेकर विपक्ष तक सभी उनके योगदान के प्रति आभार व्यक्त कर रहे थे तब ऐसे समाचार भी आ रहे थे कि पूरा देश असहिष्णुता के हमले झेल रहा है। जिस समय नरेन्द्र मोदी मजबूत सुरक्षा में महू में फूलों के गुलदस्ते स्वीकार कर रहे थे तब देश के तीन सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक जे एन यू छात्र संघ के चुने हुए अध्यक्ष कन्हैया के नागपुर पहुँचने पर पत्थर फेंके जा रहे थे व उसकी सभा में जूता फेंका जा रहा था। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों जब दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल पर जूता फेंका गया था और उनके मंत्रिमण्डल के एक सदस्य ने षड़यंत्र में भाजपा की भूमिका का बयान दिया था, उसी तरह नागपुर में जूता फेंकने वाले युवक का सम्बन्ध बजरंग दल और एबीव्हीपी से बताया गया। उसी दिन अपने एक भाषण में कन्हैया ने कहा था कि जिन भाईयों को जूता फेंकना ही आता है, उनसे निवेदन है कि वे दोनों जूते फेंकने की कृपा करें, जिससे उनका कुछ उपयोग तो हो सके। दूसरी बात उसने कही थी कि जूता फेंकने वाले को एक जोड़ चप्पलें भी साथ में लाना चाहिए क्योंकि बाहर गरमी बहुत है।
उसी 14 अप्रैल को महाराष्ट्र में तृप्ति देसाई पर हमला कर के इतना मारा गया था कि उन्हें आईसीयू में भरती कराना पड़ा था क्योंकि वे कोर्ट के आदेश के अनुसार पंजाबी ड्रैस पहिन कर नवरात्रि की पूजा करने महालक्ष्मी मन्दिर में प्रवेश कर रही थीं। क्या पंजाब देश से बाहर है, और पवित्र ड्रैस का मतलब केवल साड़ी है? क्या पंजाबी  महिलाएं अपनी परम्परागत पोषाक में अपवित्र होती हैं जिनके प्रवेश से मन्दिर अपवित्र हो जाता है? क्या ये सवाल उठाने का इकलौता तरीका मारपीट ही है?
उसी 14 अप्रैल को हैदराबाद विश्वविद्यालय के जीनियस छात्र दिवंगत रोहित वेमुला की माँ और उसके भाई ने अपने प्रति हो रहे अन्याय का हल अपने धर्म परिवर्तन में खोजा। वे अम्बेडकर और उनके पाँच लाख समर्थकों की तरह हिन्दू धर्म छोड़ कर बौद्ध हो गये।
उसी 14 अप्रैल को अमरेली गुजरात से भाजपा के सांसद नारन कछाड़िया को तीन साल की सजा सुनायी गयी क्योंकि उनकी असहिष्णु करतूत अदालत में साबित हो गयी। उन्होंने एक आन ड्यूटी डाक्टर को पीटा था। एक सांसद को कानून पर भरोसा नहीं था पर डाक्टरों को था।  
संघ परिवार के लोगों ने पिछले दिनों एक झूठ सफलतापूर्वक फैलाया कि देश के बुद्धिजीवियों ने देश को असहिष्णु कहा। अपने विविधिता वाले धर्मनिरपेक्ष देश को चाहने वाले देश पर ऐसे आरोप को बिल्कुल स्वीकार नहीं कर सकते इसलिए कम पढने लिखने वाले भले भारतीयों ने संघ परिवार के इस झूठ को स्वीकार कर लिया और वे बुद्धिजीवियों के खिलाफ संघ परिवार के पक्ष में खड़े नजर आने लगे।
सच यह था कि किसी ने भी यह नहीं कहा था कि हमारा देश असहिष्णु है, अपितु इसके विपरीत सबने दूसरे अनेक देशों से अलग अपने देश में सहिष्णुता की परम्परा की प्रशंसा करते हुए कहा था कि भाजपा शासन आने के बाद हमारे इस इतने अच्छे देश में भी असहिष्णुता जन्म ले रही है। विचार का जबाब गोलियों से दिया जाने लगा है। गोबिन्द पानसरे, कलबुर्गी, नरेन्द्र दाभोलकर, आदि जो देश के अनेक ख्यातनाम लेखक और बुद्धिजीवी थे की हत्याएं उनसे वैचारिक मतभेद के कारण ही हुयी थीं। कहने की जरूरत नहीं कि भाजपा पक्ष के लोगों ने इन हत्याओं की निन्दा करने व दोषियों को पकड़ने की मांग उस तल्खी के साथ नहीं की थी जिस तल्खी के साथ ऐसे मामलों में तब उनसे अपेक्षा रहती है, जब वे आरोपी नहीं होते। ऐसा इसलिए था क्योंकि आरोप उनके साथ खड़े रहने वाले लोगों व संगठनों पर लग रहे थे। जावेद अख्तर, आमिर खान, जावेद ज़ाफरी, शाहरुख खान, सहित ढेर सारे बुद्धिजीवियों ने तालिबानों की आलोचना करते हुए सवाल किया था कि हम क्यों तालिबान बनते जा रहे हैं? इसके विपरीत संघ परिवार के प्रचारकों ने इन कथनों को देश की सहिष्णुता की आलोचना प्रचारित करवा दी।
लोकसभा चुनावों से पूर्व मुज़फ्फरनगर के दंगे, व दंगा कराने के लिए झूठा वीडियो जारी करने वाले की पक्षधरता के साथ उसे पार्टी का टिकिट देना, दादरी में सोचे समझे ढंग से माइक से प्रचार करके अखलाख के फ्रिज में रखे मांस को बिना किसी जाँच के गाय का मांस बता कर उसकी सामूहिक हत्या करवा देना व आरोपियों के बचाव में पूरी पार्टी का जुट जाना क्या असहिष्णुता फैलाना नहीं है? लव जेहाद, घर वापिसी, धर्म परिवर्तन, गीता को कोर्स में लगाने, आरक्षण में संशोधन, बंगलादेशी घुसपैठिये, भारतमाता, बीफ, पाकिस्तान भेजने, आदि असंगत बातों को भड़का कर और योजनाबद्ध ढंग से क्रमशः उन्हें विभिन्न व्यक्तियों और संस्थानों से उठवाना और नेतृत्व द्वारा उनकी निन्दा भी न करना क्या असहिष्णुता फैलाने में मदद करना नहीं था? इन प्रयासों के बारे में किसी दल या संगठन की प्रतिक्रिया ही उसकी भागीदारी के संकेत दे देती है। राजनीतिक दलों के चरित्रों की पहचान केवल ढीली ढाली न्यायिक प्रक्रिया से बच निकलने से ही तय नहीं होती अपितु जनमानस में बन रही अवधारणाओं का भी महत्व होता है।
जब पाकिस्तान की हरकतों पर सत्तारूढ दल की प्रतिक्रिया उसके पिछले बयानों के अनुरूप नहीं रही तब उनकी राजनीतिक आलोचना होना स्वाभविक थी, जो विपक्षी दलों द्वारा हुयी भी। किंतु इसी बीच जब उत्तरपूर्व में आतंकी हमलावरों को म्यांमार की सीमा में घुस कर मारने का सवाल विवादास्पद रहा और सर्जीकल स्ट्राइक को पाकिस्तान ने नकार दिया तब एक दल ने सरकार के कतह्न की सच्चाई के प्रमाण भी चाहे। इस बात को सरकार के दोंदने वाले प्रवक्ताओं और मीडिया ने ऐसे प्रचारित किया जैसे वे सर्जीकल स्ट्राइक का विरोध करके दुश्मनों की मदद कर रहे हों। नोटबन्दी से जनता को होने वाली परेशानियों और सैकड़ों दुखद मौतों की आलोचना हुयी तो ऐसा कहा गया कि विरोधी दल काले धन के पक्ष में हैं और उसके खिलाफ किये गये प्रयासों का विरोध कर रहे हैं।
पाकिस्तान की मशहूर शायरा परवीन शाकिर का शे’र है-
मैं सच कहूंगी और फिर भी हार जाऊँगी / वो झूठ बोलेगा और लाजबाब कर देगा  
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, मई 09, 2017

राष्ट्रीय राजनीति में वाक्पटुता

राष्ट्रीय राजनीति में वाक्पटुता
वीरेन्द्र जैन

चुनावी राजनीति में जनता से संवाद करना होता है जिसके लिए सार्वजनिक सभायें, टीवी पर बहसों आदि का बड़ा महत्व होता है और इस सब के लिए नेतृत्व में संवाद कुशल व्यक्तियों का होना जरूरी होता है। इस समय नरेन्द्र मोदी भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष हैं। इसके साथ यह भी तय है कि अगर वे अपनी भाषण कला में इतने प्रवीण नहीं होते तो वे लोकप्रियता के इस शिखर को नहीं छू पाते। मंचों पर सफल एक कवि मित्र का कथन था कि मंच पर कथ्य से भी अधिक महत्वपूर्ण होती है उसकी प्रस्तुति, क्योंकि मंच सीधे संवाद का माध्यम है। इसमें देह भाषा, और मंच पर माइक से बोलने वाले वक्ता, कवि  या कलाकार का आत्मविश्वास बहुत काम करता है। उल्लेखनीय है कि 2014 के आम चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी ही भाजपा के प्रमुख प्रचारक थे और उन्होंने नकली लाल किले जैसे मंचों तक से सैकड़ों आमसभाओं को सम्बोधित करते हुए अपने भाषणों में अनेक भौगोलिक और ऎतिहासिक तथ्यात्मक भूलें की थीं, किंतु उनकी ओजपूर्ण धाराप्रवाह भाषण की कला के आगे वे सब भूलें दब कर रह गयी थीं। वे अन्य नेताओं की तुलना में आज भी सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं, जबकि उनकी चुनावी घोषणाओं में से कोई भी धरातल पर नहीं उतरी।
मोदी सरकार के कार्यकाल में जिसे हम उपलब्धि की तरह देख पाते हैं, वे सारे काम पिछली सरकार के कार्यकाल में प्रारम्भ हुयी योजनाओं के परिणाम थे किंतु उस सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भाषण कला में प्रवीण नहीं थे, इसलिए न तो उस सरकार की उपलब्धियां ही प्रचारित हो सकीं और न ही वे अपनी सरकार पर लगे आरोपों का ही बचाव कर सके। कहते हैं कि पूजा के साथ साथ शंख झालर की ध्वनि भी जरूरी होती है ताकि लोगों को पूजा होने का पता भी चल सके। अडवाणी जी की तुलना में अटल बिहारी वाजपेयी के लोकप्रिय होने का एक प्रमुख कारण अटलजी की लोकप्रिय मनोरंजक भाषण शैली ही थी जबकि अडवाणी जी उनके ही साथ साथ विकसित हुये थे और अपेक्षाकृत अधिक चतुर और मौलिक थे।
समाजवादी पहलवान मुलायम सिंह अपने क्षेत्र के मान्य नेता थे किंतु वे तब तक बड़े राष्ट्रीय नेता नहीं बन सके जब तक कि उन्हें अमर सिंह का साथ नहीं मिल गया। मुलायम सिंह न तो अच्छा भाषण दे सकते हैं और न ही साक्षात्कार देते समय हाजिर जबाबी में कुशल हैं। अमर सिंह ने उनकी यह कमी पूरी कर दी थी क्योंकि अमर सिंह में यह गुण भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। आज भी अमर सिंह के बिना मुलायम खुद को अधूरा सा महसूस करते हैं। लालू प्रसाद का आत्मविश्वास और उन्हें अच्छा बयानवाज नेता बनाये हुये है जो उन्हें चर्चा में बनाये रखता है। अंग्रेजी और अभिजात्य हिन्दी बोल पाने में हिचक होने के कारण अनेक नेता अपनी बात को उचित समय और स्थान पर नहीं रख पाते, जबकि लालू प्रसाद ने कभी भाषा की चिंता नहीं की अपितु कथ्य पर जोर दिया है। उन्होंने जिस देशीपन को गर्व के साथ अपनाया उसी अन्दाज में साहस की कमी के कारण बहुत सारे नेता अपनी बात कहने में संकोच कर जाते हैं, और अनसुने रह जाते हैं। लोहिया जी की हिन्दी का मतलब ही उस भाषा से था जिसमें आप अपनी बात निःसंकोच कह सकते हैं। लालूप्रसाद तो मुहावरा और प्रतीक भी देशी ही प्रयोग करते हैं। इस मामले में राजनारायण को उनका गुरू कहा जा सकता है।
लम्बे समय तक सत्ता में रही काँग्रेस में ऐसा स्वभाव विकसित हुआ कि उनके विपक्ष में आने के बाद  लोकप्रिय भाषण कला, हाजिर जबाबी, और बयानवाजी के लिए वकीलों को जिम्मेवारी सौंपनी पड़ी। बहुत समय बाद रणजीत सिंह सुरजेवाला जैसे प्रवक्ता उन्हें उपलब्ध हुये हैं, क्योंकि दिग्विजय सिंह आदि तो केवल बयान देकर या ट्वीट करके ही प्रकट होते हैं जिसमें यह पता नहीं चलता कि कितना काम उनका अपना है और कितना स्टाफ का है। शशि थरूर आदि तो सेमिनारों में पेपर पढने वाले नेताओं जैसे हैं।
भाजपा ने इलौक्ट्रोनिक माध्यम को सबसे पहले पकड़ा, और अभी भी सबसे आगे है। टीवी बहसों के माध्यम से अपनी बात जनता तक पहुँचाने के भविष्य को देखते हुए प्रवक्ताओं का एक बड़ा समूह तैयार किया है, जो अपने काम में तो कुशल हैं किंतु उनका काम कठिन बहुत है। भाजपा में असत्य, अर्धसत्य, और वकालत की बड़ी भूमिका है क्योंकि उन्हें मिथक, अपने गढे इतिहास, और कूटनीतिक योजनाओं में से सतर्क उत्तर तैयार करने होते हैं, इसलिए उन्हें प्रश्नों को टालने, तुलनात्मक बनाने, उनकी दिशा बदलने आदि में कुशल होना होता है। प्रधानमंत्री के कथन की दिशा को सरसंघ चालक बदल देते हैं, उत्तर भारत के जिन जीवन मूल्यों पर वे राजनीति करते हैं वह दक्षिण और उत्तरपूर्व में बदल जाती है। यही हाल भाषा का भी है। इसके बाद भी सम्बित पात्रा, जैसे वाक्पटु विषय भटकाउ प्रवक्ताओं की मदद के लिए संघ विचारक के नाम पर एक और सहयोगी उपलब्ध रहते हैं।
वामपंथी दलों में भी अब राष्ट्रीय स्तर के अच्छे वक्ताओं की कमी महसूस की जाने लगी है क्योंकि उनके ज्यादातर बड़े नेता गैर हिन्दीभाषी क्षेत्र के हैं और उनके विषय अंतर्राष्ट्रीय जैसे होते हैं, जिनकी हिन्दी शब्दावली भी विदेशी जैसी होती है। बहुत सारी भाषाओं के जानकार एक सीताराम येचुरी को छोड़ कर कोई बड़ा नेता नजर नहीं आता जो राष्ट्रीय स्तर पर सम्बोधन सक्षम हो।
आम आदमी पार्टी सार्वजनिक जीवन में स्वच्छता के सवाल पर मिले जन समर्थन से भ्रमित होकर बड़ा बैर मोल ले बैठी है, बदले में भाजपा ने उन्हें समूल नष्ट करने के लिए सारे मोर्चे खोल दिये हैं, और लगातार हमलावर है। इस पार्टी में भी कुमार विश्वास को छोड़ कर कोई भी धारा प्रवाह वक्ता नहीं है, भले ही आशुतोष व राघव जैसे कुछ प्रवक्ता अपने पक्ष को टीवी बहसों में कुशलतापूर्वक प्रस्तुत करते हैं।
       जैसे जैसे राजनीतिक चेतना सम्पन्न लोगों की संख्या बढेगी वैसे वैसे अधिक सम्वाद कुशल वक्ताओं, प्रवक्ताओं की जरूरत पड़ेगी। यही गुण नेतृत्व के लिए द्वार खोलेगा।  
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
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मंगलवार, मई 02, 2017

ईवीएम पर अविश्वास, दोराहे पर लोकतंत्र

ईवीएम पर अविश्वास, दोराहे पर लोकतंत्र

वीरेन्द्र जैन
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का विशेषण ढोने वाले देश में अबोध लोकतंत्र दोराहे पर खड़ा हो गया है और उसकी प्रचलित प्रणाली अविश्वास के घेरे में है। डाले गये वोटों का बहुमत कुर्सी पर बैठा देता है किंतु वह जन भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता प्रतीत नहीं होता। समाज की नैतिकता का खुले आम उल्लंघन करने वाले, ज्यादातर लोग जन प्रतिनिधि और शासक बन रहे हैं, क्योंकि उन्होंने डाले गये मतों का अधिकतम जुगाड़ लिया है। संविधान ने जिस आदर्श पश्चिमोन्मुख समाज की कल्पना करके लोकतंत्र के नियम बनाये हैं, उस समाज का गठन अभी बहुत दूर है। मीडिया के विश्लेषक भी उसी आदर्श के अनुसार विश्लेषण करते हैं और उनके निष्कर्ष गलत निकलते हैं। विविधिताओं से भरा हमारा देश और समाज विभिन्न तरह के खानों में बँटा हुआ है जिसका बड़ा हिस्सा इतना जड़ है कि वह परिवर्तन पसन्द नहीं करता, भले ही वह कितना भी उसके हित में हो।  
देश में एक बड़ा वर्ग अशिक्षित है। जिनके पास शिक्षा के प्रमाणपत्र हैं वे भी सुशिक्षित नहीं हैं जिनमें से अधिकतर या तो नाकारा सरकारी स्कूलों में पढ कर या नेताओं के प्राईवेट स्कूल कालेजों से डिग्रियां खरीद कर नौकरी की लाइन में लगे हुये हैं। यही कारण है कि समाज में न तो नये प्रयोग हैं न नवोन्मेष है। आज़ादी के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कोई भी बड़ी उपलब्धि हमारे खाते में नहीं आयी है और हम कभी कभी विज्ञान के नोबल पुरस्कारों वाले वैज्ञानिकों में भारतीय मूल तलाश कर खुश हो लेते हैं। जो कुछ लोग सुशिक्षित भी हैं उनमें राजनीतिक सामाजिक चेतना का अभाव है, और जिन में ऐसी चेतना भी है वे इतने अकेले पड़ जाते हैं कि ठगों की भीड़ पंचतंत्र की कथा की तरह बछड़े को बकरे में बदल देती है। जहाँ सारे मत एक समान हैं, सभी को चुनाव में उम्मीदवार बनने का अधिकार हो, और अपेक्षाकृत अधिक मत पाने वाले को विजयी घोषित करने का नियम हो, वहाँ मीडिया विश्लेषण केवल तुक्के भिड़ाने से ज्यादा क्या कर सकता है। जहाँ जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, लिंग, कार्यक्रमों और घोषणापत्रों पर भारी पड़ते हों, जहाँ चेतना सम्पन्न राजनेता पर सस्ते मनोरंजन जगत का कलाकार अधिक समर्थन पाता हो, वहाँ मूलभूत मुद्दे उठाने वालों से सतही उत्तेजना वाले नारे ही भारी पड़ेंगे। जहाँ राजनेताओं पर कोई विश्वास नहीं रह गया हो वहाँ नकदी, कम्बल, साड़ी, शराब, पंखा, टीवी, मिक्सी, जैसी तात्कालिक उपलब्धियां ही भविष्य के दूरगामी वादों से अधिक बड़ी, सार्थक व सच्ची लग सकती हैं, और अधिक मतों के खेल में लोकतंत्र के आदर्शों वाले नेताओं को प्रतिनिधित्व से वंचित कर सकती हैं।
हाल ही में सम्पन्न कुछ राज्यों और नगर निगमों के चुनावों में न जीत पाने वालों को अपनी हार हजम नहीं हुयी, तो उन्होंने प्रणाली पर सवाल नहीं उठाये क्योंकि वे खुद भी इसी प्रणाली से सत्ता सुख भोगते रहे हैं, या पाने की तमन्ना रखते हैं। यही कारण रहा कि उन्होंने ईवीएम मशीनों की प्रणाली पर सन्देह व्यक्त किया। यह सन्देह भी उन्होंने बिना किसी प्रमाण के किया, जिसका परिणाम यह हुआ कि चुनाव आयुक्त ने उनके आरोपों को निरस्त कर दिया।
ईवीएम मशीनों में धाँधली का पराजित दलों का सन्देह, ईश्वर में आस्था की तरह सामने आया जिसकी उपस्थिति को आस्थावन प्रमाणित तो नहीं कर पाता किंतु उसे उसके अस्तित्व का जबरदस्त भरोसा होता है। ईवीएम में खराबी से सम्बन्धित इन दलों के भरोसे का कारण यह है, क्योंकि वे पाते हैं कि विजयी होने वाला राजनीतिक दल अपने कामों के आधार पर जीतने का सुपात्र नहीं था। ऐसा सोचते हुए वे भूल जाते हैं कि चुनाव और न्यायालय में अंतर होता है और चुनावों में निर्णायक मंडल कितनी विविधिताओं वाली मतदाता सूची से भरा होता है। इस सूची में तर्क कर्म और भावना के बीच, भावना अधिक काम करती है। मुम्बई और दिल्ली के महानगरपालिका निगमों में पूर्ववर्ती लोगों के काम उन्हें फिर से कुर्सी पर बैठाने लायक नहीं थे फिर भी वे चुने गये। मशीन में खराबी भी हो सकती है, और चिप की प्रोग्रामिंग में छेड़छाड़ भी सम्भव है किंतु यह काम सम्बन्धित बूथ के निर्वाचन अधिकारी से मिलीभगत के बाद ही सम्भव है। अब तक ऐसा कोई भी पीठासीन अधिकारी सामने नहीं आया है।
केजरीवाल ने हल्दी की गाँठ पाकर पंसारी बनना चाहा था, उनकी सोच यह थी कि काँग्रेस जिस तेजी से क्षरण की ओर अग्रसर है उसकी खाली की गयी जगह को वे भर सकते हैं, यह प्राकृतिक न्याय पर भरोसा जैसा था। संयोग से दिल्ली विधानसभा चुनाव में उनका तुक्का लग भी चुका था। किंतु किसी पार्टी के गठन में नेतृत्व के प्रति समर्पित संगठन, संसाधन, और जमीनी कार्यकर्ताओं की जो जरूरत होती है वह नदारद था। यह जानते हुए भी उन्होंने देश की सबसे चतुर चालक समर्पित कार्यकर्ताओं से भरी संसाधनों के आधिक्य वाली पार्टी को सीधी चुनौती दे डाली। यह जुआ का दाँव था. क्योंकि उनके सफल हो जाने का मतलब होता कि देश का सारा असंतोष उनके साथ जुड़ जाता। यही कारण रहा कि उनकी आधी अधूरी सरकार के काम में पचास अड़ंगे लगाये गये, उन्हें उनके गर्भ में ही मार देने की योजना तैयार की गयी। उनके विधायकों के कच्चे चिट्ठे खोल कर गिरफ्तारी के गयी। दलबदल कराया गया, और संसाधनों के सहारे चुनाव जीतने के लिए देशव्यापी पोलिंग बूथ वार कार्यकर्ताओं का नेतृत्व को तैयार किया गया। संसाधनों के सहारे ही आमसभाओं में बड़ी भीड़ जुटायी गयी, और चैनलों से लाइव टेलीकास्ट की व्यवस्थाएं की गयीं।
अब जो लोग शासन में हैं, वे सत्ता से दूर होकर नहीं रह सकते, इसके लिए किसी भी बढने वाले दल को साम, भेद, अर्थ, दण्ड, किसी भी तरह से मिटाने की कोशिश करेंगे। अब राष्ट्रीय स्तर पर कोई चुनावी दल पनप नहीं सकता। देशद्रोह, गौहत्या, आतंकवाद, ईशनिन्दा, भ्रष्टाचार, आदि किसी भी बहाने से बदनाम कर मारा जा सकता है। उसको सच प्रकट करने का मौका ही नहीं दिया जायेगा।
अडवाणी जी ने बहुत पहले ही इस आशंका को सूंघ लिया था। 
वीरेन्द्र जैन
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अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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रविवार, अप्रैल 23, 2017

पुस्तक समीक्षा - भाषा की खोयी ताकत को याद कराती सुगम की गज़लें

बुन्देली भाषा की खोयी ताकत को याद कराती सुगम की गज़लें
वीरेन्द्र जैन

मुझे प्रभु जोशी की हिन्दी पढ कर खुशी मिलती है। वे हिन्दी की ताकत को बतलाते हैं कि वह कितनी सक्षम भाषा है। जिन विषयों पर लिखने में हिन्दी के दूसरे नामी गिरामी विश्वविद्यालयी प्रोफेसर और पत्रकार खिचड़ी भाषा का प्रयोग करने को विवश होते हैं उसी विषय पर प्रभु जोशी के लेख सहज समझ में आने वाले हिन्दी के शब्दों से अपनी बात साफ साफ समझाने में सफल होते हैं। हो सकता है कि कुछ दूसरे हिन्दी लेखक व पत्रकार भी ऐसे ही सक्षम हों, किंतु अपने सीमित अध्य्यन के आधार पर मैं उपरोक्त निष्कर्ष पर पहुँचा हूं। महेश कटारे ‘सुगम’ की गज़लें पढ कर वैसी ही ताकत का आभास बुन्देली भाषा के प्रति होता है। वे अपनी गज़लों में जिन बुन्देली शब्दों उसके परिवेश, स्वभाव, संस्कृति, व प्रवृत्तियों का चित्रण करते हैं उससे बुन्देलखण्ड के मूल निवासियों की स्मृतियां ‘लड़िया’ कर लिपटने लगती हैं।
जो भाषा अपने समय को अभिव्यक्त करने में जितनी सक्षम होगी उसका भविष्य उतना ही दूरगामी  होगा। भाषा को मरने से बचाने की जिम्मेवारी उसके लेखकों व पत्रकारों की होती है। जो लोग अपनी भाषा की ताकत को नहीं जानते वे अपनी अलग पहचान के लिए लोकभाषा में सप्रयास लिखते हुए पौराणिक काल और सामंती युग में चले जाते हैं जहाँ उनके श्याम आज के कानून की परवाह किये बिना पनघट पर राधाओं को छेड़ने लगते हैं, या उनके वीर योद्धा हाथी घोड़ों पर सवार होकर तलवारों से नये दुश्मनों के सिर काटने लगते हैं। अनेक लेखक भले ही अपने मुहल्ले में भी न जाने जाते हों किंतु उनके सपने अखिल भारतीय पहचान बनाने के होते हैं और ऐसी ही महत्वाकांक्षाओं ने लोकभाषाओं का बड़ा नुकसान किया है। लोकभाषा का लेखन सबसे पहले अपनी भाषा के व्यवहार करने वालों की पहुँच में संतुष्ट रहने की शर्त रखता है। आज भले ही हिन्दी गिने चुने नगरों में पैदा हुए बच्चों की भाषा बन गयी हो किंतु आज से तीस- चालीस वर्ष पहले प्रत्येक के दिल में एक लोकभाषा और संस्कृति धड़कती थी, व कहा जाता था कि सरकारी भाषा हिन्दी किसी की मातृभाषा नहीं है। आज भले ही कालेज शिक्षित महानगरों में नौकरी करने वालों के बच्चों ने स्कूली, सिनेमाई और टीवी भाषा से सीख कर एक खिचड़ी हिन्दी को मातृभाषा मान लिया हो किंतु उनके माँ-बाप को अभी भी उनकी लोकभाषा की ध्वनि गुदगुदा देती है।
बीसवीं इक्कीसवीं शताब्दी में बुन्देलखण्ड पर लिखने वालों में कुछ नाम विशिष्ट हैं। सबसे पहले स्पष्ट कर दूं कि खड़ी बोली हिंदी के सबसे महत्वपूर्ण कवि, बुन्देलखण्ड के गौरव, मैथली शरण गुप्त अपने क्षेत्र में सबसे बुन्देली में ही बातचीत करते थे किंतु उन्होंने न तो बुन्देली में कोई यादगार रचना लिखी और न ही उनके विस्तृत लेखन में बुन्देलखण्ड का परिवेश ही झलकता है। वृन्दावन लाल वर्मा ने बुन्देली क्षेत्र की चर्चित इतिहास कथाओं को रचनाबद्ध करने का महत्वपूर्ण काम किया जिसे ऎतिहासिक खाते में डाल दिये जाने के कारण साहित्य में समुचित महत्व नहीं मिला। बुन्देलखण्ड के हरि शंकर परसाई  हिन्दी के बड़े लेखक थे। उनके दृश्य पटल पर राष्ट्रीय राजनीति और विश्व रहता था इसलिए जबलपुर के आसपास के बुन्देलखण्ड का बहुत थोड़ा समाज उनकी रचनाओं में देखने को मिलता है, [पर जो भी है वह बुन्देलखण्ड को अपने असली रंग में जीवंत करता है]। बुन्देलखण्ड का गाँव सबसे पहले ‘राग दरबारी’ उपन्यास में झलका जिसमें लंगड़ अंडरवियर की बत्तियां बनाता हुआ मिलता है। राग दरबारी के नोट्स श्रीलाल शुक्ल ने राठ में पोस्टिंग के दौरान लिये थे जो ठेठ बुन्देलखण्ड है। इस ऎतिहासिक कृति के सारे पात्र आज भी आज़ादी के बाद के बुन्देली गाँवों में देखने को मिल जायेंगे जो अपनी ऎंठ, उपहास की प्रवृत्ति, और निरंतर आलोचना के स्वभाव के साथ मौजूद हैं। इसके बाद दूसरा महत्वपूर्ण उपन्यास वीरेन्द्र जैन [दिल्ली वाले] का ‘डूब’ है जिसमें ललितपुर के आसपास का उजड़ता, साहूकारी शोषण से लुटता, पिटता बुन्देलखण्ड का ग्रामीण है जो कथित विकास का शिकार है। मैत्रेयी पुष्पा का ‘इदन्नमम’  स्मृतियों और कटु यथार्थ के सहारे झांसी से कानपुर के बीच बसे गाँवों के सामाजिक सम्बन्ध व आज़ादी के बाद बदलने में अपना बहुत कुछ खोते जा रहे गाँवों की मार्मिक कथा है। एक और महत्वपूर्ण कृति ज्ञान चतुर्वेदी की ‘बारामासी’ है जिसमें न केवल श्रीलाल शुक्ल वाला व्यंग्य मौजूद है अपितु परम्परा और आधुनिकता के बीच पिसते बुन्देली कस्बों और गाँवों के समाज का चित्रण है जो करुणा भी पैदा करता है। वैसे तो पढी जाने वाली मंचीय कविता में अनेक लोगों ने बुन्देली में लेखन किया है जो किसी भूले बचपन की नादानियों को याद करने की तरह हास्य की ओर मुड़ती चली गयी, किंतु किसी समय चतुरेश जी ने बुन्देली हास्य के सहारे सार्थक रचनाएं दीं थीं। बाद के कवियों में मुझे सीता किशोर खरे का नाम सबसे ऊपर नजर आता है जिन्होंने चम्बल सेंवढा जनपद में डकैत, पुलिस, दबंगई की राजनीति का गठजोड़ असहाय जनता का शोषण करता रहता है। टकसाली बुन्देली गीत रचनाओं का एक और अच्छा नाम मुझे याद आता है, वह जयकुमार जैन का है जो टीकमगढ के निवासी थे व म.प्र. के नापतौल विभाग में अधिकारी थे। कई वर्ष पहले वे किसी गम्भीर बीमारी का शिकार हो गये थे, उन पर कम काम हुआ है। झांसी के लक्ष्मी नारायण ‘वत्स’ ने बुन्देलखण्ड के आदिवासियों के जीवन पर कुछ अच्छे गीत लिखे हैं। छतरपुर के सोशल एक्टविस्ट रामजीलाल चतुर्वेदी ने भी कुछ यादगार रचनाएं दी हैं। बुन्देली में लिखने वाले सैकड़ों समकालीन रचनाकारों में से उपरोक्त वे लोग हैं जिन्होंने अपने समय को चित्रित किया व रचना के नाम पर पुराण कथाएं या इतिहास नहीं लिखा।
महेश कटारे सुगम की पहचान इससे ही है कि उन्होंने इस दौर की सबसे लोकप्रिय विधा गज़ल के माध्यम से टकसाली बुन्देली में ऐसी रचनाएं दी हैं जो अपने समय को अभिव्यक्त करती हैं, और सम्प्रेषणीय हैं। कह सकते हैं कि उन्होंने दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी की परम्परा को बुन्देली में आगे बढाया है। स्थानीय राजनीतिक कुचालों, पुलिस , प्रशासन, भ्रष्टाचार व सामंती समाज के अवशेषों ने किसान मजदूर को निचोड़ कर रख दिया है जिसकी शिकायत को बुन्देली मुहावरे में अभिव्यक्ति मिली है। सुगम की गज़लों में शोषित पीड़ितों की पुकार नकली नहीं लगती। ऐसा लगता है कि पीड़ितों को अपने छुपाये हथियार मिल गये हों।
जो कविता आम आदमी से दूर हो गई थी वह सुगम जैसे कवियों की रचनाओं से वापिस मिल सकती है। बोधि प्रकाशन जयपुर से कटारे जी की बुन्देली गज़लों का नया संग्रह “ अब जीवे कौ एकई चारौ” हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह में 92 गज़लें संग्रहीत हैं। इन्हें पढ कर बुन्देली जीवन साकार हो जाता है। उनके कुछ शे’र प्रस्तुत हैं-
डार कान में तेल चिमाने बैठे हैं , पैरा दई नकेल चिमाने बैठे है
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जित्ते चाहे टटा लगा लो , फिंक हैं मनो, मखाने भैया
[ बुन्देलखण्ड में शवयात्रा में शव पर मखाने लुटाये जाते हैं}
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रिश्ते, पके करोंदा जैसे, नेंनू कैसे लोंदा जैसे
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काय लेत उरझेंटा ओजू, बन रये काय जरेंटा ओजू 
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 होते गर भगवान अगर तौ, कभऊं कोऊ खों कितऊं दिखाते

वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, अप्रैल 18, 2017

फिल्म समीक्षा- बेगमजान

फिल्म समीक्षा- बेगमजान
यह बेगम जान बेजान है
वीरेन्द्र जैन

यह वह कहानी है, जो कही नहीं जा सकी। यह वह फिल्म है जो बनायी नहीं जा सकी। एक बुन्देली कहावत को संशोधित कर फिल्म ‘वो सात दिन’ में एक गीत था- अनाड़ी का खेलना, खेल का सत्यानाश। लगता है इस फिल्म के साथ भी कुछ कुछ ऐसा ही हुआ है। जिन दर्शकों ने विभाजन पर सीरियल ‘तमस’ ‘बुनियाद’ या हबीब तनवीर के निर्देशन वाला असगर वज़ाहत का नाटक – जिन लाहौर नहिं देख्या- देखा है, वे इस फिल्म को थोड़ा भी पसन्द नहीं कर सकते।
फिल्म निर्माण एक उद्योग है और ज्यादा लागत के कारण इसे व्यावसायिक स्तर पर सफल बनाने के लिए बहुत सारे निर्माता निर्देशक उसमें सतही सम्वेदनाओं वाले इतने मसाले डालने की कोशिश करते हैं कि फिल्म से सामाजिक सोद्देश्यता और कलात्मकता से सारे रिश्ते टूट जाते हैं। यह विधा पवित्र दाम्पत्य सम्बन्धों की जगह सेक्स वर्कर और ग्राहक के रिश्ते में बदल कर रह जाती है। राजकपूर और आमिर खान जैसे फिल्मकार कम ही होते हैं जो सामाजिक चेतना की फिल्में भी इतनी रोचक और कलात्मक गहराइयों के साथ बनाते हैं कि वे व्यावसायिक स्तर पर भी सफल होती हैं, समालोचकों की प्रशंसा भी पाती हैं, व राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त करती हैं।
बेगम जान, एक नायिका प्रधान फिल्म है, जिसे विभाजन की पृष्ठभूमि से जन्मी घटना के नाम पर बनाया गया है। किंतु फिल्मकार अपनी फिल्म कला के माध्यम से विभाजन के विभीषका को प्रकट करने में असमर्थ है इसलिए बहुत कुछ नरेटर से कहलवा कर बतलाता है, जिसके लिए अमिताभ बच्चन जैसे लोकप्रिय अभिनेता की आवाज का प्रयोग भी किया गया है। विद्या बालन ने कुछ फिल्मों में अच्छी भूमिकाएं निभायी हैं, किंतु इस फिल्म की नायिका के रूप में उनका चयन उपयुक्त नहीं था। पूरी फिल्म में वे ओवरएक्टिंग करती नजर आती हैं। शेष कलाकारों के लिए अपने अभिनय से चरित्र को प्रकट करने की कोई चुनौती ही नहीं थी।
फिल्म की ऎतिहासिकता इसलिए सन्दिग्ध हो जाती है कि विभाजन रेखा खींचने में गाँव और खेत तो बँट गये थे किंतु किसी मकान के बीच से बँट जाने की स्थिति आने पर उसे कठोरता पूर्वक दो हिस्सों में बाँटने की मूर्खतापूर्ण नौबत नहीं आयी थी। पूर्व पाकिस्तान में कुछ वीरान गाँव के बीच में से रास्ता निकालने की दो एक घटनाएं हुयीं थीं जिन पर बंगला में फिल्म भी बनी है। फिल्म में ऐसा भी कुछ नहीं है जो उसके समय को प्रकट करता हो। बेगमजान और उनके कोठे की लड़कियां देह प्रकट करने के लिए आज के समय के चौड़े गले के ब्लाउज पहिने नजर आती हैं, जैसे उस दौर में नहीं पहिने जाते थे। देह व्यापार करने वाली महिलाओं की देह और चेहरे पर एक विशेष तरह की मांसलता आ जाती है, जिससे उनका प्रोफेसन प्रकट होता है, जो इस फिल्म के मेकअप मैन नहीं ला सके। याद दिलाने की जरूरत नहीं कि गज़नी और दंगल के लिए आमिरखान ने अपने शरीर पर कितनी मेहनत की थी। पीके में भी कान खड़े करने के लिए उसके पीछे जो उपकरण लगाने पड़ते थे उससे उनके कान में घाव तक हो जाते थे। कलात्मक अभिव्यक्ति भी तपस्या की तरह होती है। अच्छे कलाकार अपनी भूमिका में इतने डूब जाते हैं कि उससे बाहर आने के लिए लम्बा समय छुट्टियों के रूप में बिताते हैं, तब बाहर आ पाते हैं। नसीरुद्दीन शाह, आशीष विद्यार्थी, और रजित कपूर को अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के अलावा करने के लिए इस फिल्म में कुछ नहीं था।
फिल्म में अध्यापक, सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका, उसका बेगमजान से इकतरफा प्रेम और उस बेमेल प्रेम के नकारे जाने पर तुरंत ही किस सीमा तक बदला लेने पर उतारू हो जाना, कहानी में ठूंसा हुआ सा लगता है। केवल हुक्का पीने के कारण विद्या बालन का कोठे की बेगम होना भी स्वाभाविक नहीं लगता। यही भूमिका मंडी फिल्म में शबाना आज़मी द्वारा कितनी परिपक्वता से निभायी गयी थी। फिल्म की लगभग हर भूमिका को कह कर बताना पड़ता है, वह प्रकट नहीं होती। विभाजन के दौर में अधिकतर राजा घोड़ा छोड़ कर कारों में चलने लगे थे। फिल्म के अंत में की गयी बन्दूकबाजी, आगजनी, लड़ाई का एकपक्षीय स्वरूप सब कुछ चालू बम्बइया फिल्मों जैसा लगता है। अगर यही सब कुछ प्रस्तुत करना था तो अच्छा होता कि वैसी ही फिल्म बना डालते। व्यावसायिक दृष्टि से ही कुछ बोल्ड सीन, कुछ बोल्ड डायलाग, और कुछ गालियां चिपकायी गयी हैं, किंतु किसी पात्र का इकलौता चुनिन्दा डायलाग भी उसकी भूमिका के साथ न्याय नहीं करता।
अंत तक आप तय नहीं कर सकते कि फिल्म निर्माता व निर्देशक सृजित मुखर्जी अपना व्यवसाय करने के अलावा क्या कहना चाहते हैं।
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, अप्रैल 11, 2017

मुल्जिम और मुंसिफ का भेद मिटाती बयानबाजी

मुल्जिम और मुंसिफ का भेद मिटाती बयानबाजी  

वीरेन्द्र जैन
जब से मोदी सरकार द्वारा अपनी लोकप्रियता की कमी को दूसरे संवेदनशील मुद्दों से दबाये जाने की कोशिशें हुयीं हैं तब से राम जन्मभूमि वाले मामले को दुबारा से उभार दिया गया है। शायद यह संयोग ही हो कि सीबीआई द्वारा बाबरी मस्ज़िद ध्वंस के आरोपियों के खिलाफ अपील पर माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुनः सुनवाई का आदेश दिया है। इसी दौरान उत्तर प्रदेश में राम जन्मभूमि अभियान से जुड़े योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बन जाने से इसका विवाद नया रूप ले चुका है। सुब्रम्यम स्वामी की जल्दी सुनवाई की अपील पर तो सुप्रीम कोर्ट ने पूछ ही लिया है कि- आप कौन? यह बात अलग है कि अदालत के बाहर मामले को सुलटा लेने की सलाह पर इस बड़ी अदालत की मीडिया में बहुत आलोचना हुयी है।
बाबरी मस्जिद ध्वंस के मामले की पुनर्सुनवाई पर जहाँ प्रमुख अभियुक्तों में से लालकृष्ण अडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे पार्टी के मार्गदर्शक लोग चुप हैं वहीं उमा भारती बेचैन हैं और उस बेचैनी में बेतरतीब बयानबाजी कर रही हैं। उन्होंने कहा है कि राम मन्दिर के लिए मैं फाँसी पर चढने के लिए तैयार हूं। यह बयान भले ही भक्त किस्म के भावुक लोगों में कुछ साम्प्रदायिक उत्तेजना पैदा करे किंतु तथ्यात्मक रूप से बहुत असंगत है। किसी भी आरोप पर सजा तय करने का अधिकार आरोपी को नहीं होता है अपितु आरोप साबित हो जाने पर कानून के अनुसार उसकी सजा अदालत ही तय करती है, और उसे स्वीकार करने, न करने जैसा कोई विकल्प नहीं होता। राम मन्दिर का निर्माण कोई अपराध नहीं है और उसके लिए फाँसी तो क्या किसी भी तरह की सजा का कोई कानून नहीं है। देश और अयोध्या में हजारों राम या जानकी मन्दिर हैं। राम मन्दिर निर्माण का कोई मुकदमा भी किसी अदालत में नहीं चल रहा है। जो मुकदमा चल रहा है वह भूमि के स्वामित्व का मुकदमा है। उल्लेखनीय है कि जिस स्थान पर 6 दिसम्बर 92 को तोड़ी गयी मस्जिद स्थित थी उस पर ही एक वर्ग का कभी राम जन्मभूमि मन्दिर होने का विश्वास रहा है। उनका मानना है कि उक्त मन्दिर को तोड़ कर ही बाबर ने मस्जिद बनायी थी। कई सौ साल के इस विवाद में आजादी के बाद 1949 में एक रामभक्त कलैक्टर नायर ने रात्रि में मूर्ति रखवा दी। उल्लेखनीय है कि यह कलैक्टर बाद में भारतीय जनसंघ से चुनाव लड़ कर सांसद बने थे तथा उनके निधन के बाद उनकी पत्नी सांसद बनीं। तब से ही उस सम्पत्ति पर अधिपत्य का मुकदमा चलता रहा है। उस स्थल का ताला खोलने का आदेश भी उस न्यायाधीश ने दिया था जिसकी रामभक्ति की चर्चा यह थी कि अयोध्या भूमि में प्रवेश करते ही वे कार ही में अपने जूते उतार लेते थे और अयोध्या नगर में नंगे पैर चलते थे, क्योंकि वे राम की नगरी में जूते पहिन कर चलने को पाप समझते थे। इस सब के बीच में भाजपा ने रथयात्राएं निकाल कर उस इमारत को ध्वंस के लिए धर्मभीरुओं को भावुक किया और भीड़ एकत्रित कर उसे तोड़ दिया। इस उकसावे में भाजपा के सभी नेताओं की भूमिका रही जिसमें प्रमुख भूमिका अडवाणी, उमाभारती, मुरली मनोहर जोशी, गोविन्दाचार्य, [दिवंगत] विजया राजे सिन्धिया आदि की मानी गयी। उत्तेजक नारों वाली इस यात्रा के परिणाम स्वरूप देश भर में दंगे हुये, जिससे उपजे ध्रुवीकरण का लाभ भाजपा को मिला और वे संसद में दो से दो सौ तक पहुँच गये। इस ध्रुवीकरण का सीधा लाभ काँग्रेस और समाजवादी पार्टी ने भी उठाया और बिना किसी राजनीतिक कार्य के उन्हें आतंकित और क्रुद्ध मुसलमानों के वोट थोक में मिलने लगे व जनता की समस्याएं चुनावी एजेंडों से बाहर होती गयीं। मस्जिद ध्वंस की जाँच के नाम पर लिब्राहन आयोग बैठाया गया जिसने उठने की जरूरत ही नहीं समझी और जिसे लगभग तीस बार समय विस्तार दिया गया।
लिब्राहन आयोग ने जब जाँच के दौरान सम्मन भेजे तो लम्बे समय तक उन्हें टाला गया, और जब उपस्थिति दी तो उमा भारती के उत्तरों का नमूना ही पूरी कहानी अपने आप कह देता है। जब आयोग ने पूछा कि 6 दिसम्बर के दिन क्या हुआ था तो बचपन में ही राम चरित मानस कंठस्थ कर लेने की प्रतिभा वाली उमा भारती का उत्तर था कि उन्हें कुछ याद नहीं है कि क्या हुआ था। दूसरी बार जब आयोग ने उनसे पूछा कि मस्जिद किसने तोड़ी तो उनका उत्तर था कि भगवान ने तोड़ी। जब आयोग की समझ में आ गया कि कोई नहीं चाहता कि वह अपनी रिपोर्ट दे तो उसने भी इस संवेदनशील मुद्दे को कोर्ट की तरह समय देकर समाधान वाला रास्ता अपनाना जरूरी समझा।
अब उमा भारती बाबरी मस्जिद के नाम से खड़े विवादास्पद ढाँचे को तोड़े जाने की सुनवाई को राम मन्दिर निर्माण से बदल कर बता रही हैं व कृत्य के लिए संभावित सजा को फाँसी की सजा बता कर भावुक भक्तों पर भावनात्मक दबाव बना रही हैं। वे भाजपा की राजनीति में सबसे अलग और दुस्साहसी महिला हैं, जो भाजपा की संरक्षक विजया राजे सिन्धिया द्वारा आग्रह कर पार्टी में लायी गयीं थीं। उन्हें औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने का अवसर नहीं मिला किंतु उन्होंने अपने प्रयास से कई भाषाएं और राजनीति सीखी। कभी भाजपा के थिंकटैंक माने जाने वाले गोबिन्दाचार्य को गुरु बना कर उन्होंने राजनीतिक ज्ञान प्राप्त किया। स्वभाव से मुखर और ज़िद्दी होने के कारण उन्हें चापलूसी करना सख्त नापसन्द है। यही कारण है कि भाजपा में न तो कोई कद्दावर उनका मित्र है और न ही वे किसी कद्दावर की मित्र है। सुषमा स्वराज से उनकी प्रतिद्वन्दिता को सब जानते हैं। अरुण जैटली के कारण ही उन्होंने अटल- अडवाणी को प्रैस के सामने ही खरी खोटी सुनायी थीं, और बाद में नई पार्टी बनायी थी। वैंक्य्या नायडू को उन्हीं के कारण राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देना पड़ा था। सुन्दरलाल पटवा से उनकी दुश्मनी जग जाहिर रही है, यही कारण रहा कि पटवा जी के पट-शिष्य शिवराज सिंह से उनकी कभी नहीं पटी। बाबूलाल गौर को उन्होंने ही यह सोच कर मुख्यमंत्री बनवाया था कि समय आने पर कुर्सी छोड़ देंगे पर जब उन्होंने उनके कहने पर त्यागपत्र नहीं दिया तो वे उनके विरुद्ध हो गयीं व बार बार वादा तोड़ने वाली पार्टी से निराश हो गयीं।  कैलाश जोशी का टिकिट कटवा कर उन्होंने भोपाल से लोकसभा सीट का टिकिट प्राप्त किया था। कभी नरेन्द्र मोदी को विकास पुरुष की जगह विनाश पुरुष बतलाया था। संघ के सुरेश सोनी जैसे कुछ वरिष्ठ पदाधिकारी भी उनसे खुश नहीं रहते क्योंकि दूसरे नेताओं की तरह उन्होंने खुश रखने की राजनीति नहीं की। दिग्विजय सिंह के मानहानि वाले प्रकरण में उन्हें छोड़ कर शेष नेता समझौता कर गये हैं, किंतु उन्होंने अपने स्वाभिमान को बचा कर रखा।
शायद उन्हें फिर खतरा लग रहा होगा कि भाजपा नेतृत्व उन्हें अकेला छोड़ कर कहीं अपनी अपनी मुक्ति का रास्ता न तलाश ले। हो सकता है कि ऐसी दशा में वे फिर वैसा ही बयान देकर सबको कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करें जैसा कि उन्होंने दिग्विजय सिंह मानहानि वाले मामले में दूसरे नेताओं के समझौते के बाद दिये बयान में किया था। भले ही लक्ष्मीकांत शर्मा वरिष्ठों को बचाने के अपने बयान से आगे नहीं गये हों, किंतु साध्वी वेष में रहने वाली उमा भारती शायद चुप न रहें। आखिर शिवराज सिंह चौहान के तेज विरोध के बाद भी भाजपा को उन्हें वापिस लेना पड़ा था, और मोदी को  कैबिनेट मंत्री भी बनाना पड़ा।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629