शुक्रवार, सितंबर 18, 2020

सुशांत सिंह का दांव कहीं भाजपा को उल्टा तो नहीं पड़ेगा?

सुशांत सिंह का दांव कहीं भाजपा को उल्टा तो नहीं पड़ेगा?

वीरेन्द्र जैन


आज की राजनीति इतनी अमानवीय है कि अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षाओं के लिए किसी को भी बलिवेदी पर चढा सकती है। इस दौर का गिरोह झूठ को सच और सच को झूठ बनाने व उसे प्रचारित करने के लिए पूरा तंत्र सुसज्जित कर के पहले भक्तों को और फिर देश को भटका रहा है। मीडिया पर इतना नियंत्रण है कि समाचार भले ही लिख लिया जाये किंतु वह जनता की पहुंच के स्तर तक छप नहीं सकता, प्रसारित नहीं हो सकता।

गोवा में भाजपा ने गठबन्धन सरकार बनायी थी जिसके कुछ घटकों ने साफ साफ कह दिया था कि वे भाजपा का नहीं अच्छी छवि वाले मनोहर पारीकर को समर्थन दे रहे हैं, और इस सरकार को यह समर्थन पारीकर के मुख्यमंत्री बने रहने तक ही सीमित है। दुर्भाग्यवश पारीकर अस्वस्थ हुये व जांच में एडवांस स्टेज के कैंसर से पीड़ित पाये गये। उन्हें अंतिम दिनों में आराम की सख्त जरूरत थी वहीं दूसरी ओर मोदी-भाजपा को सरकार बचाने के लिए उस पद पर पारीकर की जरूरत थी। उनसे इसी हालत में काम लिया गया और बजट भी पेश कराया गया ताकि सरकार बची रहे। ऐसी ही अवस्था में उनका निधन हुआ। अरुण जैटली हों, सुषमा स्वराज हों, अनंत कुमार हों, अनिल माधव दवे आदि की जरूरत प्रशासनिक निर्विकल्पता नहीं, अपितु राजनीतिक अधिक रही। एक बहुत बड़ी संख्या में सदन की सदस्यता के प्रत्याशी केवल संख्या बल के लिए सामने लाये जाते हैं और उनकी छवि के सहारे बहुमत बना कर मनमानी का अधिकार प्राप्त कर लिया जाता है। दल बदल से लेकर विधायकों के सौदे तक में उनकी पितृ संस्था के पाखंडी आदर्शवाद को कोई आपत्ति नहीं होती। उदाहरण इतने अधिक और जगजाहिर हैं कि उनका अलग से उल्लेख करने की कोई जरूरत नहीं।

इसी क्रम में इन्होंने आगमी बिहार विधानसभा के चुनावों को देखते हुए बालीवुड कलाकार सुशांत सिंह की दुखद मृत्यु पर दांव खेला और इसके लिए अपने सारे संसाधन झौंक दिये। इनका प्रयास आईपीएस भट्ट की तरह कुछ लोगों को जेल में डालने और कुछ आई ए एस को मुख्यधारा से हटा कर, गुजरात में नरसंहार के बाद भी असत्य आधारित भावनात्मक प्रचार से चुनावी लाभ उठाने जैसी योजना का हिस्सा लगता है। अब सीबीआई की जाँच के बाद सामने आये संकेतों से पुष्ट हो चुका है कि सुशांत सिंह ने आत्महत्या ही की है। सीबीआई के संकेतों के बाद उसके पिता ने भी स्वीकार कर लिया था किंतु बाद में उसका बयान बदलवा दिया गया। जिस शिवसेना को काँग्रेस समझ कर इन्होंने राजनीतिक षड़यंत्र  शुरू करवाया, वैसा ही आक्रामक जबाब अगर शिव सेना ने दिया तो भाजपा को भागते राह नहीं मिलेगी। उसके पालतू मीडिया ने आगे बढ बढ कर दो महीने तक इतने अतिरेक में काम किया कि इस विषय पर स्टोरी करने की प्रतियोगिता शुरू हो गयी। इसमें सुशांत सिंह की जिन्दगी का वह निजी पक्ष भी सामने आ गया जिसके ढके रहने पर उसकी एक मनमोहक कलाकार की स्वच्छ छवि बची रह सकती थी। इसी क्रम में यह भी सामने आ गया कि वह अपने घर से दूर होने के प्रयास में ही इंजीनियरिंग की शिक्षा को छोड़ कर बालीवुड भाग आया था, और कि वह अपने पिता को पसन्द नहीं करता था। उसे अपनी बहिनों और उनके पतियों पर भी भरोसा नहीं था, इसलिए वह अपने आसपास रहने वाली लड़कियों में ही दिली सुकून  तलाशता था, उनसे ही अपने दिल की बातें साझा करता था। अपने घर से लेकर व्यवसाय तक में वह प्रोफेशनल प्रबन्धकों पर ही निर्भर था। इसी क्रम में उसे सफलताएं भी मिलती रहीं और कम उम्र में ही उसने अपनी कल्पना से अधिक पैसा व यश कमा लिया। इसके सहारे वह बालीवुड की वर्जना मुक्त जिन्दगी का पर्याप्त आनन्द भी उठाने लगा। यही वह समय था जब वह चरस और मारजुआना आदि के नकली आनन्द का शिकार हो गया। आचार्य रजनीश जब अपनी लोकप्रियता के शिखर पर थे उसी समय दुनिया में हिप्पीवाद फैला था और यौनानन्द की सीमा से अधिक आनन्द की तलाश करने वाला समाज  मेडीटेशन की कठिन राह पर आकर्षित हुआ था। इस साधना की कठिनाई का सरल हल उन्हें उस समय के इसी तरह के नशे एलएसडी में मिलने लगा था। तब रजनीश जी ने अपना एक प्रवचन इसी विषय  पर दिया था जो बाद में “एलएसडी, ए फाल्स वे आफ मेडीटेशन” के रूप में प्रिंट मीडिया में सामने आया था। इसमें वे मानते हैं कि इस तरह के नशे भी ध्यान में मिलने वाले आनन्द के जैसा भ्रम देते हैं और यह शार्टकट आदमी को भटका देता है।

बिहार के आगामी चुनावों की राजनीति ने इस राजनीतिक हथकण्डे में उसकी मृत्यु के काफी समय के बाद सुशांत के पिता और उसकी बहिनों को इस आत्महत्या को हत्या बताने के लिये उकसाया। कहानी बनाने के लिए उसमें रिया चक्रवर्ती उसके परिवार को मुख्य साजिशकर्ता ठहराया व राजनीतिक रंग देने के लिए दिशा सालियान की आत्महत्या के समय महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के बेटे की काल्पनिक  उपस्थिति व मुम्बई पुलिस द्वारा जाँच में लापरवाही बरतने के आरोप लगा कर गठबन्धन सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की। ऐसा इसलिए किया ताकि बिहार में रिपोर्ट दर्ज करायी जा सके और रिया चक्रवर्ती को बिहार पुलिस के दबाव में मनमाना बयान दिलवाया जा सके। और इसी बहाने पिंजरे के तोते के आरोपों वाली सीबीआई को शामिल किया जा सके। फिल्मी दुनिया जैसे व्यव्साय में टैक्सों से बचने के लिए दो नम्बर की समानांतर व्यवस्था चलती है जिसका एक जाल जैसा बन जाता है। एक का काला धन दूसरे के पास भी काले धन के रूप में ही पहुंचता है। जब भी इस क्षेत्र में विस्तार से जाँच होगी तो कहीं न कहीं कुछ न कुछ निकल ही आयेगा जबकि इस जाल से जुड़े सभी लोग उसके लिए जिम्मेवार नहीं होते। रोचक यह है कि फिल्मी दुनिया को नशे की दुनिया बताने वाले व इसका विरोध करने वाले काले धन के विषय को नहीं छेड़ रहे। ईडी की जांच रिपोर्ट के बारे में भाजपा के प्रवक्ता समेत सब गुपचुप हैं।   

भाजपा की यह कोशिश थी कि सुशांत को बिहार के सपूत के साथ मुम्बई की गैर भाजपा सरकार द्वारा हुयी ज्यादती की तरह चुनाव में प्रस्तुत किया जाये। उन्होंने फिल्म उद्योग में चल रहे नेपोटिज्म के आरोप के बहाने मुस्लिम कलाकारों और गैर मुस्लिम कलाकारों के बीच तनाव का खेल भी खेलना चाहा, ताकि इसके सहारे चुनावों में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का सहारा मिल जाये। किंतु उनकी सभी चालें बिफल हो गयीं। फिल्म उद्योग हमेशा से साम्प्रदायिकता मुक्त है। अपने निकट के किसी भी व्यक्ति को एक मौका अवश्य मिल जाता है किंतु वह अपनी प्रतिभा से ही आगे बढ पाता है। ना तो अमिताभ बच्चन अपने पुत्र को प्रमोट करने में सफल हो सके और ना ही हेमा मालिनी अपनी बेटियों को। सलीम खान के दूसरे बेटे भी सलमान नहीं बन सके ना ही नितिन मुकेश मुकेश की जगह ले सके। मौका सबको दिया गया। भाजपा के सरकारी लाभांवित कलाकार भी इस मुहिम को आगे नहीं बढा सके। केवल अयोग्यता से असफल हुए व्यक्ति ही अपनी कुंठाएं इस तरह से व्यक्त करते रहे हैं।

मीडिया खबरों के अनुसार तीन तीन केन्द्रीय एजेंसियां अपनी गहन जाँच के आधार पर जिस निष्कर्ष पर पहुंचती दिख रही हैं वह यह है कि सुशांत सिंह लम्बे समय से चरस का आदी था और अपने फार्म हाउस पर पार्टियां किया करता था। पिछले एक साल से वह फिल्मों में कैरियर के सपने देखने वाली रिया चक्रवर्ती के साथ लिव इन में रह रहा था जो उसके प्रेम में थी। इसी भावना में लाकडाउन के दौरान उसने सुशांत के लिए पाउडर मंगवाने में अपने भाई की मदद ली। यह कलाकार डिप्रैशन का भी शिकार था किंतु अपनी प्रोफेशनल जरूरतों के अनुसार इस बात को सार्वजनिक नहीं होने देना चाहता था। रिया उसका इलाज करा रही थी व उसके इलाज को प्रोफेशनल कारण से ही गोपनीय रखना चाहती थी। उसके पैसे का हिसाब उसकी मैनेजर देखती थी जिसका पता ईडी की रिपोर्ट के बाद लगेगा। इससे भी छवि में निखार नहीं आयेगा। कंगना का उत्पाती प्रवेश भी विषय को और मचायेगा, अपना प्रारम्भिक नुकसान वह करा ही चुकी है, फिल्म उद्योग भी सशंकित हो जायेगा। भाजपा को इससे भी मदद नहीं मिलने वाली क्योंकि बिहार सरकार से निराश वहां का मजदूर मुम्बई वापिस जाने की राह देख रहा है।

क्या यह दांव भाजपा को उल्टा ही पड़ेगा?  

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023


मंगलवार, सितंबर 15, 2020

षड़यंत्रकारी राजनीति के मुकाबले आक्रामक राजनीति

 

षड़यंत्रकारी राजनीति के मुकाबले आक्रामक राजनीति 


वीरेन्द्र जैन

इस समय पूरा देश कुछ मीडिया चैनलों द्वारा प्रस्तुत राजनैतिक दंगल देख रहा है। पिछले तीस सालों में ऐसे दृश्य देखने को नहीं मिले थे जैसे इन दिनों देखे जा रहे हैं।

आजादी मिलने पर स्वतंत्रता आन्दोलन की सबसे बड़ी अहिंसक फौज के रूप में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस देशवासियों के सामने थी और उसे सरकार बनाने का पूरा नैतिक अधिकार था। दूसरे सबसे बड़े दल के रूप में कम्युनिष्ट पार्टी थी जो रूस चीन से लेकर पूरी दुनिया में चर्चित हो रहे कम्युनिष्ट आन्दोलनों की प्रतिनिधि के रूप में स्वाभाविक विपक्ष थी। इसी दौरान देश ने बंटवारे, साम्प्रदायिक हिंसा और गाँधीजी की हत्या के रूप में बड़े बड़े हादसे देख लिये थे। गाँधीजी की हत्या के बाद अपने ऊपर लगे प्रतिबन्ध को हटवाने के लिए आर एस एस ने पटेल को लिखित वादा किया था कि वे सामाजिक संगठन के रूप में ही काम करेंगे और चुनावों में भाग नहीं लेंगे। बाद में सरदार पटेल के निधन के बाद संघ ने अपने चार स्वयंसेवक भेज कर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में भारतीय जनसंघ की स्थापना करायी थी। संघ से भेजे गये लोगों में अटल बिहारी बाजपेयी और लालकृष्ण अडवाणी प्रमुख थे। 1951 से 1971 तक  इस दल को 3% से लेकर 6% तक वोट मिलते रहे जबकि 1977 में इन्होंने अपनी पार्टी का विलय जनता पार्टी में कर दिया और सरकार बनने पर कहीं अधिक प्रतिशत में सत्ता में भागीदारी प्राप्त की। बाद में 1980 में इन्हीं के पूरे मन से विलय न करने व इनकी समानांतर रूप से संघ की सदस्यता बनाये रखने के आरोपों के कारण ही पहली बार बनी गैरकांग्रेसी जनता पार्टी सरकार टूटी और इन्हें जैसे गये थे वैसे ही वापिस होना पड़ा। बाद में इन्होंने ही दल का नाम बदल कर भारतीय जनता पार्टी रख लिया, जिसके कार्यक्रम और घोषणापत्र वही रहे जो जनसंघ के थे। उस समय से ही यह स्पष्ट हो गया था कि यह संगठन सत्ता पाने के लिए कुछ भी कर सकता है। ये लोग ही देश में दलबदल को प्रोत्साहित करने वालों और धन के सहारे वोट प्राप्त करने वालों की दुष्प्रवृत्ति के जन्मदाता के रूप में अंकित हुये हैं, जो बाद में दूसरे दलों में भी फैली। ये पार्टी व्यापारियों, उद्योगपतियों के पक्ष में खड़ी होने वाली पार्टी के रूप में जानी जाती थी इसलिए उसे धन की कमी कभी नहीं रही। बाद में तो राज छिन जाने से नाराज पूर्व राजा रानियों का भी समर्थन उसे मिलने लगा क्योंकि 1969 में कम्युनिष्टों के दबाव में इन्दिरा गाँधी ने पूर्व राजा रानियों के विशेष अधिकार व प्रिवी पर्स को खत्म कर दिया था।

साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिकता फैलाना दो अलग अलग बातें हैं। साम्प्रदायिकता तो अपने परम्परागत धर्म को सर्वश्रेष्ठ और दूसरे के धर्म को गलत मानने के भाव के कारण पैदा हो जाती है किंतु इसी भाव में जानबूझ कर गलत बातें डालकर या सूत्रों की गलत व्याख्या कर के, अपने निहित स्वार्थों के लिए साम्प्रदायिकता फैलायी जाती है और हिंसा के लिए संसाधन उपलब्ध कराये जाते हैं। संघ परिवार का यह विश्वास रहा है कि लोकतंत्र में चुनाव सिर गिनने से होते हैं और अगर चुनावों को धार्मिक आधार पर समाज को बांट कर कराये जायेंगे तो बहुसंख्यक धर्मावलम्बी ही चुनाव जीतेंगे। इसलिए देश की सत्ता पर अधिकार करने के लिए यह संस्था एक ओर तो राजतंत्र के इतिहास की गलत जानकारी व उसे अपने लक्ष्य के अनुसार व्याख्यायित करने का काम करती है, वहीं दूसरी ओर उन मुद्दों को तलाशती है जिनके आधार पर दो समाजों के बीच संघर्ष हो चुका हो या होने की सम्भावना हो। इसलिए समाजों के बीच समरसता और धर्मनिरपेक्षता की बात करने वालों को भी ये बराबर के दुश्मन मानते हैं। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जगायी गयी राष्ट्रभक्ति की भावना को भी ये एक काल्पनिक हिन्दूराष्ट्र से जोड़ कर इसका विदोहन करने का प्रयास करते हैं। वे ऊपर से शरीफ दिखते हैं और प्राकृतिक व निजी आपदाओं के समय अपने संगठन से साम्प्रदायिक आधार पर मदद करके अपना विस्तार करते हैं। देश के सबसे बड़े धार्मिक अल्पसंख्यक मुसलमान हैं जिनके खिलाफ होकर इनको अपना लक्ष्य आसानी से मिल जाता है क्योंकि वे सातसौ साल तक इस देश के शासक वर्ग में रहे हैं और उनके सत्ता संघर्ष को साम्प्रदायिक रूप देकर इन्हें आसानी से अपने संघर्ष की जगह मिल जाती है। मुसलमानों के कुछ नेताओं ने धर्म के आधार पर देश को विभाजित करा के इन्हें एक मजबूत आधार दे दिया है, जबकि पाकिस्तान से अधिक मुसलमान तो धर्म निरपेक्ष भारत में रह गये थे।

भारत में रह गये मुसलमान इनकी हरकतें देख कर रक्षात्मक रूप से साम्प्रदायिक होते गये और इसी आधार पर एकजुट हो उन्हें वोट करने लगे जो भाजपा को हरा रहा होता था। बिना राजनीतिक कर्म किये सत्तारूढ होती रही कांग्रेस के लिए ये एकजुट मुसलमान बड़ी पूंजी साबित हुये। दलितों के वोट बैंक से मिलकर कांग्रेस ने दशकों तक निर्बाध शासन किया जबकि संघ परिवार बिना शोर शराबे के अपना काम करता रहा व इतिहास एवं समाज को विकृत करता रहा।

किसी राजतंत्र की तरह अपना विशेष अधिकार समझने वाले काँग्रेसी सत्ताखोर होते गये। उन्होंने सत्ता के सहारे न केवल धन संचय किया अपितु चुनावी मुकाबलों में भाजपा के साथ धन के प्रयोग की प्रतियोगिता भी करने लगे। एक ओर सरकारें जनता से धन खींचती थीं तो दूसरी ओर ये सत्ताखोर सरकारी व्यवस्था में सेंधें लगा कर उस धन को चूसते रहते थे। क्रमशः वे विलासी होते गये, उन की सम्पत्ति बेतहाशा बढती रही और  रिश्तेदार लाभ के पदों को सुशोभित करते रहे। सुरक्षित वोटों के भरोसे कांग्रेसियों ने राजनीतिक विमर्श ही बन्द कर दिया। उनकी राजनीति अपने नेता के जयकारे तक सीमित हो गयी।

बाद में जब 1969 में श्रीमती गाँधी ने काँग्रेस में विभाजन का सामना किया और उन्हें बहुमत के लिए कम्युनिष्टों की जरूरत पढी तो दबाव में उन्होंने पूर्व राजाओं के प्रिवी पर्स और विशेष अधिकार बन्द कर दिये व 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इससे मिले व्यापक समर्थन के कारण उन्होंने कुछ लोकप्रिय नारे दिये और भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी की मदद से अपनी छवि निखारी। इससे दक्षिणपंथी विपक्ष एकदम से हमलावर हो गया। परिणामस्वरूप इमरजैंसी व संजय गाँधी के उभरने जैसे संकट सामने आये। संजय गाँधी ने इमरजैंसी में भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी को दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका तब उन्हें अपनी भूल समझ में आयी, जिसे उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार की और वाममोर्चे के हिस्से बने। काँग्रेस पहली बार केन्द्रीय सत्ता से बाहर हुयी पर 1980 में जनता ने जनता पार्टी के प्रयोग को ठुकरा दिया जिससे इन्दिरा गाँधी दोबारा सत्ता में आ गयीं। संजय गाँधी का एक दुर्घटना में निधन हुआ। दलितों ने अपनी अलग पार्टी बना ली और इमरजैंसी की ज्याद्तियों के कारण मुसलमान सशंकित हो गये थे, सीपीआई उससे अलग हो चुकी थी, ऐसे में अलगाववादी खालिस्तानी आन्दोलन हिंसक हो उठा। कांग्रेसजन, जो सत्ता में लूट को ही राजनीति मानने लगा था मुकाबला करने में असमर्थ साबित हुआ। कमजोर इन्दिरा गाँधी ने स्वर्ण मन्दिर में छुपे आतंकियों पर हमला करने का दुस्साहसिक फैसला लियी जिसके परिणाम स्वरूप मिले एक धोखे में उन्हें अपनी जान गंवाना पड़ी। उसके बाद सहानिभूति की लहर में काँग्रेस ने सीटें तो जीत लीं, किन्तु अपेक्षाकृत अनुभवहीन राजीव गाँधी को उनकी प्रकृति और रुचि के विरुद्ध प्रधानमंत्री पद सौंपना पड़ा। नेतृत्व की कमजोरी से नियंत्रण ढीला पड़ता रहा, क्षेत्रीय दल मजबूत होते गये। मौका देख कर उनके वित्तमंत्री व्हीपी सिंह ने टंगड़ी मार दी, बोफोर्स कांड का वबंडर खड़ा कर दिया गया। लिट्टे भारत के ही खिलाफ उठ कर खड़ा हो गया। शाहबानो के फैसले के खिलाफ एकजुट हुये मुसलमानों ने ब्लैकमेल कर फैसले को पलटने को मजबूर कर दिया। सरकार पलट गयी और कमजोर हो चुकी काँग्रेस का एक हिस्सा व्हीपी सिंह के साथ हो लिया क्योंकि उसे तो सत्ता चाहिए थी। मध्यावधि चुनाव हुये और इसी दौरान राजीव गाँधी की हत्या हो गयी। काँग्रेस नेतृत्व विहीन हो गयी शेष बचे काँग्रेसी दूसरे को नेता मानने के लिए तैयार नहीं थे।  सब को केक में से दूसरे से बड़ा हिस्सा चाहिए था।

यह वही समय था जब भाजपा ने मौका ताड़ लिया। वैसे तो उसके पास काँग्रेस की नीतियों से अलग कोई आकर्षक और बेहतर नीतियां थी ही नहीं सो उसने साम्प्रदायिकता का सहारा लियी और उसके लिए रामजन्म भूमि मन्दिर का भूमिगत मुद्दा उछाल दिया जगह जगह दंगे करा दिये, अडवाणी जी को एक डीसीएम टोयटा वाहन को रथ का रूप देकर घुमाना शुरू किया और योजनानुसार मुस्लिम बहुल इलाकों में उत्तेजक नारे लगवाते हुये खून खराबा करते गये। उसी समय से मीडिया की खरीद शुरू हो गयी और मनमुताबिक रिपोर्टें सामने आती रहीं। पूरा देश ही ध्रुवीकृत हो गया होता अगर व्हीपी सिंह समय से मंडल कमीशन का दांव नहीं खेल देते। केवल राम जन्मभूमि मुद्दे, व्यापारियों के धन, और संघ के संगठन के सहारे उन्होंने दो से दो सौ तक का सफर किया और अंततः अटलबिहारी की सरकार बनवा ही ली। असत्य, अर्धसत्य, तोड़ेमोड़े सत्य से सफेद झूठ तक व सिद्धांतहीन गठबन्धन से लेकर सांसदों, विधायकों की खरीद फरोख्त से लगातार सत्ता से जुड़े रहे। अपने खरीदे हुये मीडिया से वे अपने सारे खोटे सिक्के चलाते रहे। इस बीच काँग्रेस निरीह सी देखती रही उसने इनके किसी भी खतरनाक प्रयोग का विरोध नहीं किया अपितु छींका टूटने की प्रतीक्षा में टकटकी लगाये रही। जब छींका टूट गया तो जय जय बरना अघाये आलसी की तरह चुपचाप लेटे रहे अथवा आफर मिला तो दल बदल लिया। वह कैंसर के मरीज की तरह धीरे धीरे घुलती रही। बीच में जो मौके आये उसमें किसी काँग्रेसी के किसी प्रयास का कोई योगदान नहीं रहा। यूपीए की दो सरकारें बनने में भाजपा के प्रति जनता की नफरत का ही नकारात्मक योगदान रहा। किंतु भाजपा केन्द्र की मुख्यधारा की राजनीति में आ चुकी थी। यूपीए सरकारों के दौरान भी राजनीतिक एजेंडा उसी ने तय किया। 

इन दिनों महाराष्ट्र में घटित घटनाक्रम इतना ही है कि भाजपा ने जिस शिवसेना नामक शेर पर इतने लम्बे समय से सवारी की थी वही पलट कर सामने आ गया। अब ना तो इन्हें निगलते बन रहा था ना ही उगलते। सुशांत सिंह की मौत के मामले में इन्होंने एक षड़यंत्र के सहारे मुम्बई पुलिस और ठाकरे सरकार को कटघरे में खड़ा किया व सीबीआई और ईडी के साथ साथ एनसीबी को भी लगा दिया। पहले दो में मुँह की खायी तो तीसरी जाँच एजेंसी को मुख्य जाँच एजेंसी की तरह बीच में ले आया गया, जिसमे अपराध तो था किंतु देश भर में चलते रहने वाला अपराध था। उसके सहारे किसी विशेष राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। इस अपराध में इससे पहले कितने लोगों को सजा हुयी? जबकि छापों में जो माल बरामद होता है उसके आधार पर ना जाने कितने लाख लोग उसका सेवन करते होंगे। इसी काम में चर्चित होने को उतावली एक हीरोइन और एक टीवी एंकर को भी लगा दिया गया। वे सोच रहे थे कि लुंज पुंज जर्जर काँग्रेस की तरह शिवसेना पूंछ दबा कर बैठ जायेगी। किंतु उनकी सोच गलत निकली। उसने भले ही राजतंत्र के तानाशाहों की तरह व्यवहार किया किंतु देखना होगा कि दुश्मन कौन था व उसका इतिहास और चरित्र क्या रहा है। ये जैसे को तैसा का सन्देश किसी हीरोइन को नहीं अपितु एक षड़यंत्रकारी पार्टी को दिया गया है।

यह भूलने की बात नहीं है कि भाजपा परिवार के सारे प्रयोग लुंज पुंज काँग्रेस के काल में ही पलते रहे हैं जो ठीक तरह रक्षात्मक भी नहीं हुयी। यदि 1995 में तत्कालीन सरकार ने और कांग्रेस पार्टी ने गणेशजी की मूर्तियों को दूध पिलाने की ही ठीक से जाँच करा के कार्यवाही की होती तो अफवाहें फैलाने के षड़यंत्रों की इतना प्रसार न हो पाता। काँग्रेस ज़िन्दा तभी बच सकती है जब वह आक्रामक होकर काम करेगी। इसके लिए काँग्रेसियों को अपना चरित्र बदलना होगा। शिवसेना ने वही किया है।

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023      

गुरुवार, सितंबर 10, 2020

कंगना रनौत प्रकरण में नारीवादियों पर हमला

 

कंगना रनौत प्रकरण में नारीवादियों पर हमला

वीरेन्द्र जैन

First fully directed film of Kangana Ranaut will be Aparajita Ayodhya | Kangna  Ranaut ने कियाअगली फिल्म Aparajitha Ayodhya का ऐलान, खुद करेंगी डायरेक्शन!  | Hindi News, बॉलीवुड

जब शिवसेना के गठबन्धन वाली महाराष्ट्र सरकार ने कंगना रनौत का अवैध निर्माण तोड़ने की कार्यवाही शुरू की तब परोक्ष में कंगना का समर्थन करने वाली भाजपा की सोशल मीडिया सेना ने एक ओर तो उसकी एकाध अच्छी फिल्मी भूमिका को उसके व्यक्तित्व से जोड़ते हुए उसके अंश पोस्ट करना प्रारम्भ कर दिये तो दूसरी ओर नारी वादियों पर हमला करना शुरू कर दिया कि वे अब क्यों नहीं बोल रहे है। सवाल उठता है कि जब नारीवादी या मानव अधिकारवादी अपनी बात कहते हैं तब क्या ये लोग उनका समर्थन कर रहे होते हैं? ये और ऐसे आरोप केवल उनके पक्ष को कमजोर करने के लिए उछाले जाते हैं, जिसका साफ मतलब उनकी छवि को धूमिल करके उनके पक्ष को कमजोर करना होता है। उल्लेखनीय है कि जब एक जीनियस लोकप्रिय युवा कलाकार सफदर हाशमी की हत्या हुयी थी और पूरी दुनिया में उसकी भर्त्सना हो रही थी तब जनसत्ता के एक सम्बाददाता ने उनके साथ मारे गये एक मजदूर राम बहादुर का मामला इसलिए उछाला था ताकि सफदर की हत्या के खिलाफ उठ रहे वैचारिक आन्दोलन के समर्थकों को कमजोर किया जा सके। इसके विपरीत सच यह था कि सीटू ने मजदूर के परिवार को अपनी ओर से पचास हजार की सहायता उपलब्ध करायी थी। ये लोग जब आये दिन मजदूरों के दमन पर एक वाक्य भी नहीं बोलते वे कला जगत को असंवेदनशील सिद्ध करने के लिए मजदूर राम बहादुर पर कलम चला रहे थे।

नारीवाद कोई जातिवादी आरक्षण जैसा नहीं है कि उसके लाभ जातिमुक्त समाज के निर्माण के मूल लक्ष्य को ही पलीता लगा दें और जातिवाद को बनाये रखने में मदद करें। यह कमजोरों के पक्ष में उठी आवाज है। जरूरी नहीं कि हर नारी कमजोर हो और उसे नारीवादियों के समर्थन की जरूरत हो। उदाहरण के लिए झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को ही लें, उनके बारे में अंग्रेज इतिहासकारों ने ही सबसे पहले लिखा कि इतने पुरुषों के बीच वह अकेली मर्द की तरह लड़ रही थी। उनके साथ जुड़ा मर्दानी का विशेषण यहीं से लिया गया है। रजिया सुल्तान हों, मीरा बाई हों, या अहिल्या बाई से लेकर सामाजिक आन्दोलनों में सक्रिय अनेक महिलाएं नारीवादियों की समर्थन को मजबूर नहीं रहीं। नारीवाद का आन्दोलन तो सिमोन द बुउवा के उस कथन से संगठित हुआ है जिसे उन्होंने अपनी पुस्तक ‘द सेकिन्ड सेक्स’ में व्यक्त किया है। इसमें उन्होंने कहा है कि हम नारियां मानव जाति में एक भिन्न जेंडर तो हैं, किंतु दोयम दर्जे के जेन्डर  नहीं हैं, और उतने ही मनुष्य हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि परिवार नियोजन के साधनों के विकास के बाद नारी की गुलामी की एक बड़ी जंजीर कटी है। सुप्रीम कोर्ट के एक प्रतिष्ठित वकील और नारीवाद पर खुल कर लिखने वाले अरविन्द जैन अपनी एक पुस्तक में लिखते हैं कि श्रीमती इन्दिरा गाँधी का अपनी बहू मनेका गाँधी के साथ सम्पत्ति का मुकदमा चला, जो हाईकोर्ट तक गया और फैसला इन्दिरा गाँधी के पक्ष में हुआ। फैसले के बाद इन्दिराजी ने वही सम्पत्ति वरुण गाँधी के नाम कर दी। वरुण उस समय तक वयस्क नहीं हुये थे इसलिए नेचुरल गार्जियन के रूप में उनकी मां मनेका गाँधी के पास वह सम्पत्ति वापिस पहुंच गयी। जब ऐसा ही होना था तो श्रीमती इन्दिरा गाँधी अपने परिवार की प्रतिष्ठा को चौराहे पर क्यों ले गयीं? अरविन्द जी लिखते हैं कि इन्दिरा जी अपने पूरे व्यक्तित्व में और खास तौर पर उस समय किसी नारी की तरह नहीं अपितु किसी पुरुष की तरह व्यवहार कर रही थीं।

अगर ऐसे में कोई नारीवादी उनके पक्ष में नारी और अबला के नाम पर कुछ बोलता तो वह नारीवाद का गलत स्तेमाल कर रहा होता। इसी तरह तस्लीमा नसरीन की पक्षधरता उनके नारी होने के नाम पर नहीं की जा सकती। वे ज्यादा और जल्दी उत्तेजित व हिंसक व्यवहार करने वालों को जानबूझ कर छेड़ती हैं और सरकारों को कटघरों में खड़ा करते हुए अपनी सुरक्षा की चुनौती पेश करती हैं। सरकार और सारे प्रगतिशील किंकर्तव्यविमूड़ होकर रह जाते हैं और वे अपनी लोकप्रियता को व्यवसाय बना कर लाभ में रहती हैं। अगर तस्लीमा के एक्टविस्म को छोड़ दिया जाये तो साहित्यिक मानदण्डों पर उनकी रचनाएं वह स्तर नहीं रखतीं, जिस स्तर की ख्याति उन्हें मिली हुयी है। यह एक ऐसा हथकण्डा बन गया है जिसे लोकप्रियता का व्यापार करने वाले अनेक लोग अपना चुके हैं और अपना रहे हैं। कंगना रनौत उनसे अलग नहीं हैं। जहाँ विरोध नहीं होता है, वहाँ वे विरोध पैदा करती हैं और उसका लक्ष्य किसी महत्वपूर्ण चर्चित व्यक्ति को बनाती हैं ताकि ज्यादा चर्चा हो, ज्यादा ख्याति मिले।

नारीवादियों ने कंगना रनौत का विरोध भी नहीं किया या उनसे किसी गुंडे की तरह बदला लेने वाली शिवसेना का समर्थन भी नहीं किया, भले ही उनका कदम विधिसम्मत था। नारीवादी हों या मानवाधिकारवादी उनकी समझ साफ है और वे हर पीड़ित के पक्ष में खड़े होना चाहते हैं। किंतु नकली घाव बना कर हाथ पैरों पर पट्टी बाँध कर धर्मस्थलों में जाने वालों की दया से कमाई करने वालों के प्रति सजग भी हैं।

सोशल मीडिया के जो सैनिक आज कंगना के पक्ष में खड़े होकर शिवसैनिकों का विरोध कर रहे हैं, वे ही जब तक भाजपा से उनका गठबन्धन था तब तक उनका समर्थन करते थे। आज पूरे देश में न जाने कितने कानून ऐसे हैं जिनका पालन नहीं होता और वे अपने विरोधियों के खिलाफ स्तेमाल करने के लिए सुरक्षित रखे जाते हैं। उत्तर प्रदेश के दो बड़े दल सीबीआई के डर से केन्द्र सरकार का अघोषित समर्थन करते हुए अपने समर्थकों को ठग रहे हैं। यही हाल दक्षिण के कुछ प्रमुख दलों का है। अब तो सीबीआई आदि एजेंसियों के साथ साथ न्यायपालिका के एक हिस्से पर स्तेमाल होते जाने के आरोप लगे हैं, और वे गलत भी नहीं लगते। रिया चक्रवर्ती के मामले में कुछ कुछ ऐसा ही हो चुका है। दुखद यह है कि बिका हुआ मीडिया ही मुख्य धारा बना हुआ है और वह खुली सौदेबाजी के आधार पर झूठ को स्थापित कर रहा है।
     

 

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

मो. 9425674629         

शनिवार, अगस्त 29, 2020

मासिक पत्रिका कादम्बिनी को श्रद्धांजलि


संस्मरण
मासिक पत्रिका कादम्बिनी  को श्रद्धांजलि 

आपकी सबसे पसंदीदा पत्रिका कौन सी है या थी और क्यों ? - Quora
वीरेन्द्र जैन
हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन समूह अर्थात बिड़ला ग्रुप की दो और पत्रिकाएं बन्द होने का समाचार आया है। उनमें मासिक कादम्बिनी भी एक है। उनके लिए सब कुछ व्यवसाय है, वे केवल फायदा देखते हैं।  इस पत्रिका के बन्द होने की खबर ने मेरी स्मृतियों में हलचल मचा दी है। व्यक्तिगत रूप से तो यह वह राष्ट्रीय स्तर की पत्रिका थी जिसमें बीस वर्ष की उम्र में मेरी पहली रचना छपी थी, और इसके प्रकाशन के साथ ही नगर के साहित्यकारों के बीच मेरा कद बढ गया था। यह कद सच में बढा था या यह मेरी धारणा भी हो सकती है क्योंकि दतिया के बुन्देलखण्डी लोग किसी भी स्थानीय व्यक्ति को अपनी आँखों के सामने अपने सिर पर नहीं बैठने दे सकते, पर गिरने का मजा भरपूर लेते हैं। बहरहाल  इस हल्दी की गांठ के सहारे मैं खुद को पंसारी समझने लगा था। भविष्य में पत्रिकाओं में मेरे खूब सारा लिखने की नींव भी इसी से पड़ी थी। आज याद करता हूं तो हँसी आती है कि कैसे उस अंक को लम्बे समय तक सम्हाल के और सहेज कर रखा गया था। ये चाहता भी था कि मिलने वाले इसे देखें और यह भी कि इसकी रंगत खराब न हो। जैसे कि कोई माँ अपने शिशु को सम्हालती है।
मेरी जिन्दगी में कादम्बिनी का महत्व केवल मेरी पहली रचना के प्रकाशन से ही नहीं है अपितु साहित्य की गहराई भी इसी पत्रिका को पढ पढ कर जानी थी। जिन लोगों ने कादम्बिनी को 1973 के बाद पढा है उन्हें मेरी बात समझ में नहीं आयेगी किंतु जिन्होंने उससे पहले की कादम्बिनी को पढा होगा वे इसे समझ सकते हैं। मैं कादम्बिनी के इतिहास को दो भागों में बांट कर देखता हूं, एक रामानन्द दोषी के निधन से पहले दूसरा रामानन्द दोषी के बाद। इस मासिक के मुकाबले में दूसरी कोई पत्रिका याद नहीं आती जिसने आम मध्यम वर्ग में बिना साहित्यिक गरिमा से समझौता किये लोकप्रियता बनाये रखी हो। मुझे यह पत्रिका जिला पुस्तकालय / वाचनालय में पढने को मिलती थी। यह मेज पर रस्सी से बंधी रहती थी और निश्चित स्थान पर बैठ कर ही पढनी पड़ती थी। महीने के प्रारम्भिक दिनों में वाचनालय खुलने से पहले ही इसी के कारण पहुंचना होता था। यह बात बाद में समझ में आयी कि कादम्बिनी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेजी में प्रकाशित होने वाली रीडर्स डाइजेस्ट के जैसी थी। जापानी हाइकू जैसी रचनाओं का प्रकाशन सबसे पहले कादम्बिनी में ही प्रारम्भ हुआ था, जिनका नाम क्षणिकाएं रखा गया था। ये रचनाएं तीन चार पंक्तियों में गहरी सम्वेदनाओं का स्पर्श करा देती थीं। मेरी पहली रचना भी इसी स्तम्भ में प्रकाशित हुयी थी। उचित महत्व के साथ नवगीत भी कादम्बिनी में ही प्रकाशित होना शुरू हुये थे।  रामानन्द दोषी भी श्रेष्ठ गीतकार थे, और आज के जाने माने नवगीतकारों में से नईम, विनोद निगम, माहेश्वर तिवारी, कुंवर बेचैन आदि के गीतों का परिचय यहीं से मिला था। दोषी जी के सम्पादकीय जो बिन्दु बिन्दु विचार के नाम से आता था, में किसी ललित निबन्ध के तत्व रहते थे। दुनिया की श्रेष्ठ पुस्तकों का हिन्दी में संक्षिप्तीकरण ‘सार संक्षेप’ के नाम से कादम्बिनी में प्रकाशित होता था जिन्हें पढ कर कम समय, और कम श्रम में दुनिया के श्रेष्ठ साहित्य को पढे होने की शेखी बघारी जा सकती थी। जार्ज आरवेल का 1984 मैंने इसी सार संक्षेप के माध्यम से पढा था। जीवन की सहज घटनाओं के प्रति उठती घटनाओं के वैज्ञानिक कारण बताने का भी एक स्तम्भ होता था जो प्रश्नों के उत्तर के रूप में होता था। इससे चीजों को मान लेने की जगह जान लेने की जिज्ञासा जागती थी। मैंने पहली बार यह सवाल और उनके उत्तर पढे थे कि साबुन में झाग क्यों उठते हैं और वे कपड़े का मैल कैसे साफ करते हैं, अथवा गर्म कढाही के तेल में पानी के छींटे पड़ने से छनाका क्यों होता है। ये केवल प्रश्नोत्तर ही नहीं थे अपितु प्रश्नाकुलता भी बोते थे। पर्यटन, पुरातत्व, और विदेश की घटनाओं पर भी दो एक लेख होते थे। कथा, कहानी, गीत कविता के साथ व्यंग्य भी छपते थे और मैंने साहित्य में जगह बनाते शरद जोशी व के पी सक्सेना को पहली बार इसी में पढा था। लेखक का पता भी छपता था जिसके सहारे पाठक और लेखक के बीच सीधा सम्वाद बन सकता था। अनेक लेखकों से मेरे पत्र व्यवहार के सम्बन्ध इसी कारण से सम्भव हुये थे। सबसे बड़ी बात थी कि रचना छपने के बाद जो फुटनोट की जगह बचती थी उसको चुनिन्दा चुटकलों से भरा जाता था। उन दिनों रीडर्स डाइजेस्ट में दुनिया भर के पाठकों के भेजे मौलिक लतीफों का एक स्तम्भ हुआ करता था जिसमें श्रेष्ठ लतीफे पर भारत में पचास रुपये का पारिश्रमिक मिलता था जो उस समय पाठकों के लिए बड़ी राशि थी। कादम्बिनी की रचनाओं के फुटनोट्स में भी उसी स्तर के लतीफे छपते थे। मैंने बाद में धर्मयुग माधुरी, रंग, आदि पत्रिकाओं में जो वर्षों लतीफे लिखे उसकी प्रेरणा और फार्मूला मुझे कादम्बिनी के लतीफे पढ कर ही मिला था। अनेक लतीफों की आत्मा को ग्रहण करके उसे ताजा घटनाक्रम के साथ नया शरीर देता था और प्रशंसा खुद पाता था।
पहले कादम्बिनी में राशिफल भी छपता था किंतु एक बार बनारसीदास चतुर्वेदी ने अपने भविष्य फल को पढने के बाद दोषी जी को पत्र लिखा था कि मुझ विधुर के भविष्यफल में दाम्पत्य सुख की भविष्यवाणी की गयी है, इसे किस तरह लूं। इशारा समझ कर दोषीजी ने यह स्तम्भ बन्द कर दिया था।
पुस्तकालय अपनी पुरानी पत्रिकाएं एक समय के बाद रद्दी में बेच देता था। ऐसी ही एक बिक्री में किराना के एक दुकानदार ने उसकी सारी पत्रिकाएं खरीदी ली थीं जो उन्हें रद्दी से अधिक दरों पर बेच रहा था। मैं तब कालेज में पढ रहा था, संयोग से मैं किसी काम से उसकी दुकान पर पहुंच गया था और कादम्बिनियों के एक ढेर को उस समय जेब में जितने पैसे थे उतनी खरीद लीं।  दूसरे ढेर को लेने जब दूसरे दिन गया तो दुकानदार को लगा कि जाने इनमें क्या है जो ये इतने उत्साह से इसी ढेर को खरीद रहे हैं,  हो सकता है कि इनका ज्यादा दाम मिले, सो उसने देने से मना कर दिया। बहरहाल जो खरीदीं थीं उनको ही काफी लम्बे समय तक पढता गुनता रहा, और ज्ञान सम्पन्न होता रहा। वे मेरे पांच राज्यों में हुये पन्द्रह स्थानांतरणों में साथ गयीं और अब भी मेरे संग्रह का हिस्सा हैं। 
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि दोषी जी के असामायिक निधन के बाद यह जिम्मेदारी राजेन्द्र अवस्थी जी को मिली थी, जिन्होंने पत्रिका को ज्योतिष तंत्र मंत्र से लेकर सस्ती बाजारू पत्रिका बना कर रख दिया था, भले ही उसकी बिक्री बढ गयी हो। इससे मुझे इस पत्रिका से अरुचि हो गयी थी। उन्होंने अपने पहले ही सम्पादकीय में दोषी जी के खिलाफ विषवमन किया था और लिखा था कि उन्हें पोर्क्स्ंस की बीमारी हो गयी थी जो सुअर के मांस खाने से होती है। इमरजैंसी का समर्थन करने वाले लेखकों में उनका नाम प्रमुख रूप से समाचारों में आया था। इस सब के बाद मैंने कादम्बिनी की तरफ देखा भी नहीं। सम्भवतः 2005 के आसपास विष्णु नागर के आने के बाद केवल एक व्यंग्य लेख लिखा था, पर उसके बाद उन्होंने भी पत्रिका छोड़ दी थी।
एक बार दिल्ली प्रैस प्रकाशन के डायरेक्टर परेशनाथ ने जो भारतीय भाषा समाचार पत्र प्रकाशन संगठन के अध्यक्ष भी रहे हैं, ने अपने भोपाल प्रवास के दौरान लेखकों को मिलने के लिए बुलाया था। इस दौरान उन्होंने अपनी पत्रिका सरिता जो किसी समय धार्मिक पाखंडों के खिलाफ खुल कर तर्क करने के लिए मशहूर थी के बारे में बताया था कि कादम्बिनी और धर्मयुग सरिता का मुकाबला करने के लिए और कथित भारतीय संस्कृति के बचाव के लिए ही निकाली गयी थीं। कलकत्ता में बिड़ला के निवास पर उनकी हर बहू के कमरे में सरिता की प्रति देखी जाती थी। सो उन्होंने कादम्बिनी निकलवायी व साहू शंति प्रसाद ने धर्मयुग निकलवाया जो उसके नाम से ही स्पष्ट है।  
वैसे तो मुझे पता ही नहीं था कि कादम्बिनी अब भी निकल रही है, किंतु उसके बन्द होने की खबर ने यादों को कुरेद दिया और भूला हुआ सब कुछ याद आ गया। रामानन्द दोषी और उनका वह आखिरी नवगीत ‘ बस री पुरवैया, अब और नहीं बस ‘ मुझे रह रह कर याद आता है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629
  
     

बुधवार, अगस्त 26, 2020

आमिर खान पर संघी हमला तर्कहीनता की सीमा लांघ रहा है


आमिर खान पर संघी हमला तर्कहीनता की सीमा लांघ रहा है
Being tolerant? Twitterati slams Aamir Khan, wants to boycott ...


वीरेन्द्र जैन
यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का युग है और यह अधिकार होना भी चाहिए। किंतु अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब कल्पनाओं को सच बताने या झूठ बोलने की आज़ादी नहीं होता। इस आज़ादी में यह निहित है कि विचार को विचार की तरह सामने लाया जाये, न कि आँखों देखे समाचार की तरह। सूत्रों से प्राप्त बतायी गयी जानकारियों में, जब तक स्पष्ट खतरा न हो, सूत्रों के नाम सामने आने चाहिए और विचारों के साथ विमर्श की गुंजाइश व उसकी जिम्मेवारी लेने का साहस होना चाहिए। उक्त गुणों के बिना कही हुयी बातें अभिव्यक्ति की आज़ादी के जुमले का गलत स्तेमाल हैं। अभिव्यक्ति की ऐसी आज़ादी नहीं है, ना ही होना चाहिए।  
भाजपा का मुखपत्र अंग्रेजी में आर्गनाइजर के नाम से व हिन्दी में वह पांचज्न्य के नाम से छपता है। मुख पत्रमें कही गयी किसी भी बात को पार्टी की आधकारिक अभिव्यक्ति माना जाता है और अगर किसी त्रुटिवश कुछ प्रकाशित हो जाता है तो तुरंत दूसरे माध्यमों और अखबार के अगले अंक में भूल सुधार छपता है, छपना भी चाहिए। गत दिनों पांचजन्य [24 अगस्त 2020] में किन्हीं विशाल ठाकुर का एक लेख छापा गया जिसका शीर्षक है ‘ ड्रैगन का प्यारा खान’। यह लेख देश के शिखर के अभिनेता निर्माता आमिर खान की छवि को नुकसान पहुंचाने की दृष्टि से रचा गया है जिसमें कुतर्कों की भरमार है। इसकी खबरें देश और दुनिया के मीडिया में छपीं किंतु भाजपा के नेताओं ने 48 घंटे बीत जाने के बाद भी इसका खंडन नहीं किया। इतना ही नहीं विभिन्न टीवी चैनलों पर भाजपा के पक्ष में जोड़े गये उसके प्रवक्ता, संघ विचारक, स्वतंत्र विश्लेषक आदि के श्रीमुख से उक्त लेख के कथ्यों का अग्निधर्मा शब्दों से बचाव किया गया। यह स्पष्ट करता है कि इसके पीछे संघ व अमित शाह की डिजाइन पर काम करने वाली भाजपा नीति ही है।
आमिरखान को दुनिया भर में भारत के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, निर्माता, निर्देशकों में गिना जाता है जिन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों पर प्रभावी व प्रेरक फिल्में बनायी हैं, जो मनोरंजन से भरपूर होने के कारण जन जन तक पहुंचती भी हैं। उनकी इस पहुंच से वह सन्देश भी समाज तक पहुंचता है जो बहुत जरूरी है। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर ‘तारे जमीं पर’ और ‘थ्री ईडियट’ जैसी फिल्में बनायीं तो नारी सशक्तिकरण पर ‘दंगल’ और सीक्रेट सुपर स्टार’ जैसी फिल्म बना कर दुनिया में देश का नाम बढाया। अन्ध विश्वासों के खिलाफ ‘पीके’ जैसी फिल्म बना कर युवाओं को सावधान किया तो ‘लगान’ और ‘मंगल पांडे’ जैसी स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी फिल्में बनायीं। ‘रंग दे बसंती’ जैसी फिल्में बना कर एक ऐसा प्रयोग किया जो भगत सिंह के आन्दोलन की भावना को वर्तमान की राजनीतिक स्थितियों से जोड़ता है और भटक रही युवा पीढी में चेतना का संचार करता है। ‘पीपली लाइव’ बना कर मीडिया की भेड़ चाल की जम कर खिल्ली उड़ायी तो स्पाट पर शूटिंग कर के गाँवों में किसान की वास्तविक दुर्दशा भी दर्शायी। उनके अन्दर एक राजकपूर बैठा है जो सामाजिक सन्देश देते समय हमेशा यह ध्यान रखता है कि मनोरंजन के लिए आये दर्शक को मनोरंजन भी मिलना चाहिए। इसलिए वे सन्देश और मनोरंजन के बीच जो समन्वय बनाते हैं वह श्रद्धा पैदा करता है और वही उनकी फिल्मों को सफल बनाता है। आमिरखान की फिल्में केवल व्यावसायिक स्तर पर ही सफल नहीं होतीं अपितु पारखियों के निगाह में भी सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं। देश विदेश का ऐसा कौन सा पुरस्कार है जो उन्हें नहीं मिला हो या उनकी फिल्में उसके लिए नामित न हुयी हों।
‘रजनी’ के बाद प्रशासनिक सामाजिक समीक्षा और उनके हल हेतु प्रेरित करने के लिए किये गये प्रयासों पर बने सीरियलों में ‘सत्यमेव’ जयते का ऎतिहासिक महत्व रहा है। इस सीरियल में जिस करुणा और संवेदनशीलता के साथ घटनाओं को पिरोया गया है वे भीतर तक भेदती रही हैं। इस से ही समाज के वास्तविक नायकों को सम्मानित करने का सिलसिला प्रारम्भ हुआ, जिसे बाद में भी दुहराया गया। उस दौरान अनेक निजी संस्थानों द्वारा  समाज सेवा के कई प्रोजेक्टों की स्थापना भी हुयी और उनसे हजारों जरूरतमन्दों को सहायता मिली। 
कला की दुनिया के माध्यम से इतना बड़ा काम करने वालों से समाज की ज्वलंत समस्याओं के प्रति विचार निरपेक्ष रहने की उम्मीद नहीं की जा सकती। समाज को कलंकित करने वाली घटनाओं पर उनका ध्यान जाना और उस पर प्रतिक्रिया आना भी स्वाभाविक है। किंतु, फिल्मी दुनिया भले ही कला की दुनिया हो, पर वह एक बड़ी लागत का व्यवसाय भी है जिस पर बहुत सारे नियंत्रक कानून भी लागू होते हैं, जिनका सरकार दुरुपयोग कर के अपना राजनीतिक हित साध सकती है। यही कारण होता है कि फिल्मी दुनिया के सभी लोग मुखर होकर अपनी प्रतिक्रिया नहीं देते। मोदी सरकार के आने के बाद कुछ साम्प्रदायिक संगठन जिस तरह से हत्याओं पर उतर आये वह खतरनाक है। न केवल गौ हत्या का आरोप मढ कर मुसलमानों व दलितों की हत्याएं हुयीं अपितु देश के प्रमुख बुद्धिजीवियों की भी हत्याएं हुयीं जिनमें वैज्ञानिक गोबिन्द पंसारे, दाभोलकर,  कलबुर्गी, गौरी लंकेश, आदि की नृशंस हत्याएं हुयीं। खेद रहा कि सरकार ने अपराधियों को पकड़ने में कोई रुचि नहीं दिखायी, ना ही दुख प्रकट किया। आतंकवाद के खिलाफ अपनी जान न्योछावर कर देने वाले पुलिस अधिकारी करकरे को गद्दार बताया जाने लगा व नेहरू गांधी मौलाना आज़ाद आदि की चरित्र हत्याएं की जाने लगीं। तब देश के अनेक लेखकों ने इस असहिष्णुता पर सरकार द्वारा दिये अपने सम्मान पुरस्कार लौटा दिये। कुछ लोगों ने दबे स्वर में सरकार की इस सोच का विरोध किया जिनमें आमिर खान भी उनमें से एक थे। जो जिस तरीके से दब सकता था, सरकार ने उसे उस तरह से दबाने की कोशिश की। आमिर आदि की फिल्मों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गयी। उनकी सम्वेदनशीलता और लोकप्रियता से ज्यादा बड़ा खतरा था इसलिए वे निशाने पर रहे।
पांचजन्य के चार पेजों में प्रकाशित लेख में आमिर की आलोचना को कुछ मामूली कारणों में केन्द्रित किया गया है। उनमें से एक यह है कि उन्होंने अपनी आगामी फिल्म की शूटिंग तुर्की में करने का विचार किया है और वे इसके लिए तुर्की की प्रथम महिला एमिन एरदुगान से मिले। इसमें अपराध यह माना गया कि तुर्की कश्मीर के मामले में पाकिस्तान के पक्ष को सही मानता है, इसलिए दुश्मन देश है। इस लेख पर चर्चा होने से पहले शायद ही किसी को पता हो कि तुर्की को दुश्मन देश माना जाता है और वहाँ पर शूटिंग करने से देश की जनता की भावनाएं आहत होती हों। इस लेख के अनुसार यह काम आमिर खान की जेहादी मानसिकता दर्शाताहै। दूसरा गम्भीर आरोप यह है कि चीन में सलमान खान की फिल्म तो नहीं चली जो सिर्फ 40 करोड़ रुपये कमा पायी किंतु आमिरखान की दंगल ने 1400 करोड़ का कारोबार किया। इसके साथ ही वे चीनी मोबाइल फोन वीवो के विज्ञापन को आमिर खान का देशद्रोह बता रहे हैं। अभी बहुत दिन नहीं बीते जब भारत के प्रधानमंत्री चीन के प्रधानमंत्री को झूल झुला कर चाय पिला रहे थे, तामिलनाडु घुमा रहे थे और भी असंख्य समझौते कर रहे थे। अभी भी उससे व्यापारिक सम्बन्ध समाप्त नहीं किये गये हैं किंतु वीवो का विज्ञापन करने से आमिर खान को देश द्रोही बताया  जाता है और अन्धभक्तों के सहारे सोशल मीडिया पर उसकी फिल्मों के बहिष्कार की अपीलें की जाने लगती हैं।
ये सरकार और इसके संगठन जिस तरह से कुछ लोगों को साम्प्रदायिकता के आधार पर एकत्रित कर उन्हें अन्धभक्त बना रहे हैं व उसी गिरोह के सहारे अपना एजेंडा चलाते हैं, वैसी ही तार्किकता के सहारे वे पूरे देश को हांकना चाहते हैं। सरकार के विरोध को देश का विरोध बताया जाने लगता है। पांचजन्य के ऐसे लेखों से तो हो सकता है कि आमिर खान की फिल्म और अधिक चल जाये किंतु यह साफ हो जाता है कि ये आम जनता को नासमझ समझते हैं। शायद इसी बात का परीक्षण कभी थाली और कभी ताली या दिया जलवा कर बार बार करते रहते हैं।  
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629
           

मंगलवार, अगस्त 25, 2020

निबन्ध एक उत्तर भारतीय ड्रामे का समापन


निबन्ध
एक उत्तर भारतीय ड्रामे का समापन
How to deal with post-festival waste – The Earthbound Report
वीरेन्द्र जैन
      क्लाईमेक्स तक उठाया गया झाग तलछट में बाकी कुछ मैल और गन्दा पानी छोड़ कर बैठ चुका है नशा उतरने के बाद वाली स्थिति जैसे सूजे हुये चेहरों पर एक बासीपन सा छा गया है।
       दीवाली के त्योहार का समापन हो गया है।
            जिस कचरे को घरों के कोने कोने से बुहार कर सड़क पर फेंक दिया गया था और जिसे समेटने में नगर निगम, या नगर पालिकाओं में कार्यरत एक खास जाति के लोग त्योहर की तिथि के  दस दिनों पहले से निरंतर जुटे हुये थे वे अब उन्हीं मार्गों पर नया कचरा देख रहे हैं। एक ऐसा कचरा जिसमें धू मिट्टी तो कम है पर पटाखों की बारूद से चिन्दी चिन्दी हुये कागजों की भरमार है। इसमें मिठाई के भाव तौले हुये डिब्बों के गत्ते भी शामिल हैं। नये नये इलोक्ट्रोनिक आइटमों को सम्हालने के लिए प्रयुक्त हुये थर्मोकौल के सांचे हैं, बेचने वाली दुकान या सामग्री के ब्रांड नेम मुद्रित पालिथिन थैले हैं जो प्रतिबन्ध के बाद भी धड़ल्ले से कानून का धुआँ उड़ाते हुए उपयोग में रहे हैंतेल सोख कर जल चुके मिट्टी के कुछ दिये हैं, बच्चों वाले घरों में टूट फूट गयी कच्ची मिट्टी और कच्चे रंगों से पुती ग्वालिनें हैं। अपनी हैसियत को बढा-चढा कर दिखाने के लिए मेहमानों को पिलायी जा चुकी अच्छी पैकिंग में बन्द अंग्रेजी शराब की खाली बोतलें हैं। एक आवेशित उत्साह में पैदा किये गये कचरे की और भी नई नई किस्में हैं जिन्हें कचरे में से बीन कर कबाड़ वाले को बेचने वाले बच्चे अधिक जानते हैं हमने त्योहार के नाम पर पिछले दिनों जो कुछ  किया है उसके लिए तो जीसस का वह अंतिम वचन याद आता है जिसमें उन्होंने कहा था कि - हे प्रभो, इन्हें माफ कर देना, ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।
            पिछले एक महीने से चारों ओर जोर शोर से यह फैलाया जा रहा था कि खुशी का त्योहार रहा है। खुशी, खुशी, खुशी, खुशी खुशी हिटलर के प्रचार मंत्री गोयेबिल्स के झूठ को फैलाने की तरकीब का अनुशरण करके  फैलायी जा रही थी। केवल खुशी खुशी जैसे कि और कुछ हो ही नहीं। नये विदेशी बाजार के वाहक प्रिंट और दृश्य मीडिया ने एक आभासी खुशी की बाढ ला दी थी और उसमें सब डिग्री धारी मध्यम वर्गीय कुशिक्षित डूब गये थे। खुशी का यह दुष्प्रचार अपने दुखों को तलाशने और सहलाने का अवसर ही नहीं दे रहा था। परम्परा से जोड़ कर बाजार ने एक सामूहिक सम्मोहन का जाल डाल दिया था। बहुत सारे लोगों को तो पता ही नहीं है कि खुशी कैसी होती है, इसलिए उसे चीख चीख कर बताया जा रहा था तथा दुखी आदमी को भी उसमें खींचा जा रहा था। टीवी के सारे चैनल और एफ एम बैंड की महिला उदघोषिकाएं अपनी खनकती आवाज में बता रही थीं कि [अबे अन्धो] चारों ओर खुशी उल्लास का वातावरण छाया हुआ है। दूसरों, तीसरों की तरह तू भी उठ और जेब में डेबिट क्रेडिट कार्ड डाल अपने घर के लिए नये से नया मँहगे से मँहगा चमकीला पेंट लेकर आ। इस पेंट किये हुए घर को चीन से आयी हुयी सजावटी सामग्री से सजा। कभी दीपों के कारण इस त्योहार का नाम दीपावली पड़ा था, पर अब उसकी जगह बिजली की झालरों और दूसरे रंग बिरंगे विद्युत उपकरणों से सजा। प्लास्टिक के बन्दनवार, प्लास्टिक के गमलों में प्लास्टिक के फूल लगे प्लास्टिक के पौधे सजा। मँहगी साड़ियां, सूटों, और बच्चों के कपड़ों से पूरे परिवार को तैयार कर। सौन्दर्य प्रसाधनों से भरपाई [मेक-अप] करके अपनी त्वचा, केश आदि को मानक सौन्दर्य में ढाल ले। परम्परागत हाजोड़ने की मुद्रा से लेकर हाथ मिलाने और गले मिलने के साथ एक झूठी मुस्कान ओढ ले। उपहार दे, उपहार पा। उपहार के बारे में जो तुम्हें नहीं पता है उसे चैनल वाले बताने में लगे हुए हैं। नये से नये माडल की कारें, बाइकें, स्कूटर, छरहरे होते जाते टीवी, कम्प्यूटर, लैपटाप, आईपैड, टूजी थ्रीजी, फोर जी, सोने चाँदी के गहने, बगैरह बगैरह। ये किश्तों में भुगतान की सुविधा के साथ साथ बैंक ऋण से भी उपलब्ध हैं। तू हो या हो पर तुझे ये सामान खरीदकर खुश दिखना है, ताकि तुम्हारा प्रतियोगी पड़ोसी यह नहीं कह सके कि वो तुम से ज्यादा खुश है।
            जिनको ये सब कुछ करने में जेब परेशान करती हो उन्हें भी करना है। इस अवसर पर तुम्हारा दायित्व है कि खुश दिखो।
            खुशी कभी स्वाभाविक होती थी, और तिजोरी या बक्से में आयी रकम , मौसम, फसल, या स्वास्थ के आधार पर व्यक्त होती थी, उसे। अब एक सभ्यता अर्थात झूठ का हिस्सा बना दिया गया है। कभी लोग खुशी में गा उठते थे या नाचने लगते थे, पर अब महौल बदल गया है। अब गाने के लिए गाने वाली मशीनें हैं जो हमारे दैनिन्दन उपयोग की वस्तुओं तक में फिट हो गयी हैं। हमारे भजनों से लेकर मण्डलियों तक को इन मशीनों ने स्थगित कर दिया है। मन्दिरों में मशीनें लगा दी गयी हैं जो गाती रहती हैं जिससे पता ही नहीं चलता कि हमारे अन्दर भक्तिभाव है या नहीं। इनके चक्कर में हम गाना भूल गये हैं। बहुत सारी नकली हँसी खुशी में हम असली खुश होना ही भूल गये हैं। पूजा पाठ का तय समय और महूर्त होना एक बात थी पर खुश होने का समय तय कर देना बिल्कुल ही दूसरा मामला है।
            जिस तरह नाटक के खत्म होते ही सब अपनी अपनी पोषाकें उतार कर रख देते हैं, ठीक उसी तरह खुशी के मुखौटे उतार कर रख दिये गये हैं। भ्रष्ट नेता, रिश्वतखोर अधिकारी, कमीशनबाज ठेकेदार, और टैक्सचोर व्यापारियों की योजना में इस खुशी का बजट होता है। पर जो लोग इस नकल में कूद पड़ते हैं, उनके झल्लाने चिड़चिड़ाने  का भी समय है। लाखों लोग जबरदस्ती ट्रैनों, बसों, में ठुसे यहाँ से वहाँ होते हैं। ऊपर से पैसे देकर भी गिड़गिड़ा कर जगह पाते हैं और समय से वापिस पँहुचने के लिए इसी प्रक्रिया को दुहराते हैं।
            यह नकलीपन उत्तरोत्तर वृद्धि पर है और एक भी हाथ अस्वीकृति में नहीं उठ रहा। कोई नहीं कह रहा कि हे चैनलो, हमें मत सिखाओ कि हमें अपनी परम्परा को कैसे निभाना है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629