मंगलवार, नवंबर 03, 2020

श्री विनोद निगम का मेरा प्रिय गीत ' खुली चांदनी का गीत' - [संस्मरण]

 श्री विनोद निगम का मेरा प्रिय गीत ' खुली चांदनी का गीत' - [संस्मरण]

शरद पूर्णिमा और होली की रात चाँद अपनी पूरी प्रखरता से चमकता है।
चन्द्रमा को Luna कहा जाता है और इस दिन सबसे अधिक लोगदीवाने होते हैं इसीलिए इन दीवानों/ पागलों को Lunatic कहा जाता है। इन रातों को सबसे अधिक लोग आत्महत्या भी करते हैं।
बात 1968-69 की रही होगी, तब मेरी उम्र 18-19 वर्ष की थी। उन दिनों कादम्बिनी में प्रकाशित एक गीत पढा जिस पर में मुग्ध हो गया। गीतकार का नाम छपा था विनोद निगम। वह गीत मेरे प्रिय गीतों में शामिल रहा। उस गीत के गीतकार का कद मेरी निगाह में बहुत ऊंचा रहा और उसी के अनुसार उनकी उम्र का अनुमान भी बना। लगभग 40 साल उनके कभी दर्शन नहीं हुये। जब मैं भोपाल रहने लगा तब जन सम्पर्क के अधिकारी रघुराज सिंह ने उन पर केन्द्रित एक कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें उन्होंने बोलचाल की शैली में लिखे गये अनेक गीत व कविताएं सुनायीं। जो अच्छी लगीं। तब तक मैं अपने प्रिय गीत के रचनाकार का नाम भूल चुका था। फिर किसी को उल्लेखित करने के लिए मैंने गीत को तलाशा तो नाम देखने पर याद आया कि ये तो वही विनोद निगम जी हैं जो उम्र में मुझ से कुछ ही वर्ष बढे हैं। दो चार बार उनसे मुलाकात हो चुकी है किंतु वे मुझे गीत प्रेमी व्यक्ति और रचनाकार के रूप में नहीं पहचानते, पर मैं उनका प्रशंसक हूं। क्यों हूं इसके लिए आप उक्त गीत पढ कर देखें =
खुली चाँदनी का गीत
और अधिक इस खुली चांदनी में मत बैठो
जाने कब, संयम के कच्चे धागे
अलग अलग हो जाएँ
वैसे ही यह उम्र
बहुत ज्यादा सहने के योग्य नहीं है
जो अधरों पर लिखा हुआ है
वह कहने के योग्य नहीं है
फिर यह बहकी हवा सिर्फ
बैठे रहने के योग्य नहीं है
और अधिक इस खुली चाँदनी में मत बैठो
जाने कब यह आकर्षण
सारी मर्यादाएँ धो जाए
इस खामोशी में
वैसे ही अस्थिर और निरंकुश है मन
फिर इतना सामीप्य किसी का
झुकी डाल सा सहज समर्पण
भरी नदी के खुले किनारों सा
नम नयनों का आमन्त्रण
और अधिक मनचली चाँदनी में मत बैठो
जाने कब यह आकर्षण
सारी मर्यादाएँ धो जाए
मौसम का यह रंग
स्वयं पर भी कौई विश्वास नहीं है
फिर ये भीगी हुई बहारों के दिन हैं
सन्यास नहीं है
जो स्वाभाविक है
उसको कुछ दूर नहीं है पास नहीं है
और अधिक विषघुली चाँदनी में मत बैठो
जाने कब, चंदन-क्षण,
जीवन भर के लिये तपन बो जाएँ
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