रविवार, सितंबर 24, 2017

फिल्म समीक्षा ; न्यूटन वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले समाज की स्थापना में चुनौतियां

फिल्म समीक्षा ; न्यूटन
वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले समाज की स्थापना में चुनौतियां
वीरेन्द्र जैन
फिल्म मीडिया ऐसा बहु आयामी कला माध्यम है जो कथा/ घटना, दृश्य, अभिनय, गीत, संगीत, तकनीक आदि के माध्यम से जो प्रभाव पैदा करती है वह जरूरी नहीं कि किसी सम्वाद के शब्दों में सुनायी देता हो। न्यूटन भी ऐसी ही एक नायक प्रधान फिल्म है जिसमें सामाजिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, आदि बहुत सारे विषयों को एक घटना कथा के माध्यम से समेटा गया है, जो देखने में साधारण लगती है।
राजकुमार राव इस फिल्म के नायक हैं जो न्यूटन नाम के युवा पात्र के रूप में सामने आये हैं। देश में आज़ादी के बाद जो विकास हुआ उसमें बहुत सारे परिवार निम्न आर्थिक वर्ग से उठकर मध्यम वर्ग में सम्मलित हुए हैं। इन परिवारों में पीढियों के अंतराल के कारण या तो घुटन पैदा हुयी है या टकराव पैदा हुआ है। कथा नायक का नाम उसके परिवार द्वारा नूतन [कुमार] रखा गया था पर उसी दौर में नूतन के नाम से कुछ महिलाएं इतनी लोकप्रिय हुयीं कि पुरुषों को यह नाम रखने में शर्म आने लगी। यही कारण रहा कि कथानायक ने स्वयं ही नू को न्यू और तन को टन करके अपना नाम न्यूटन कर लिया। इस तरह उसने नामकरण के पिता के परम्परागत अधिकार के विरुद्ध पहला विद्रोह किया। बाद में माँ बाप की इच्छा के विरुद्ध, एक कम शिक्षित, अल्पवयस्क, लड़की से शादी करने से इंकार करके दूसरा विद्रोह किया।
नियमों और आदर्शों के लिए किये गये छोटे छोटे विद्रोह ही जब परम्परा की गुलामी को तोड़े जाते हैं तभी देश और समाज की जड़ता को तोड़ने वाले विद्रोहों की हिम्मत आती है।
चुनाव का प्रशिक्षण देने वाला प्रशिक्षक जब उसके बार बार सवाल पूछने से खीझ कर उसका नाम पूछता है और न्यूटन बताने पर वह उसे समझाता है कि न्यूटन ने केवल गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत ही नहीं खोजा अपितु यह भी खोजा कि प्रकृति के जो नियम होते हैं वे सभी के लिए समान होते हैं चाहे वह किसी भी आर्थिक वर्ग का व्यक्ति हो। वैज्ञानिकता समानता का सन्देश भी देती है।
फिल्म की कथा में कथा-नायक जो कलैक्टर कार्यालय में बाबू है, को चुनावी ड्यूटी में रिजर्व में रखा जाता है किंतु जब प्रिसाइडिंग आफीसर के रूप में नक्सल प्रभावित दण्डकारण्य़ में जाने से नियमों का ज्ञान रखने वाला एक बाबू तरह तरह के बहाने बना कर मना कर देता है तो कथानायक को वहाँ भेजा जाता है। उसके साथ में जो दूसरे सहयोगी जाते हैं वे ढुलमुल चरित्र के लोग हैं जो बयार के साथ बह कर निजी हित और निजी सुरक्षा की चिंता करने वाले लोग हैं, भले ही देश और नियमों के साथ कोई भी समझौता किया जा रहा हो। कथा-नायक इनसे भिन्न है।
यह फिल्म बताती है कि हमारे लोकतंत्र की सच्चाई क्या है और हम सारे दुनिया के सामने सबसे बड़े लोकतंत्र का जो ढिंढोरा पीटते हैं उसके मतदाता की चेतना और समझ कितनी है। बड़े बड़े कार्पोरेट घरानों द्वारा खनिजों और वन उत्पाद के मुक्त दोहन के लिए नक्सलवाद का जो हौआ खड़ा कर दिया गया है, उससे सुरक्षा के नाम पर पूरे क्षेत्र में अर्धसैनिक बल तैनात हैं जो आदिवासियों का शोषण तो करते ही हैं उन्हें दबा कर भी रखते हैं। नक्सलियों के आतंक के नाम पर चुनाव का ढोंग किया जाता है व भयभीत चुनाव अधिकारियों को वहाँ जाने से रोक कर सुरक्षित नकली पोलिंग करा ली जाती है। कथा नायक से भी यही अपेक्षा की जाती है किंतु स्वभाव से विद्रोही और निर्भय कथा नायक हर हाल में नियमानुसार काम करने के लिए दृढ संकल्प है इसलिए उसकी सुरक्षा अधिकारियों से टकराहट होती है। इसमें उसके सारे सहयोगी निजी सुरक्षा और हित को दृष्टिगत रखते हुए व्यवस्था का साथ देते हैं जिस कारण वह अकेला पड़ जाता है। उससे केवल एक स्थानीय आदिवासी लड़की टीचर सहमत नजर आती है जो बूथ लेवल आफीसर के रूप में ड्यूटी पर है। विदेशी पत्रकार को दिखाने के लिए आदिवासियों को जबरदस्ती पकड़ कर बुलवाया जाता है, जिन्हें न तो वोट डालना आता है न ही वे चुनाव का मतलब ही समझते हैं व पूछते रहते हैं कि इससे फायदा क्या है। उस क्षेत्र में स्कूल और घर जला दिये गये हैं, युवा दिखायी नहीं देते केवल वृद्ध व महिलाएं दिखती हैं। बीएलओ लड़की बताती है कि गाँव वालों को पुलिस की बात मानने पर नक्सली परेशान करते हैं और नक्सली की बात मानने पर पुलिस परेशान करती है। नियम से काम करने वाला सनकी नजर आता है, जिससे धारा के साथ बहने वाले सभी असंतुष्ट रहते हैं, उसके हाथ केवल समय की पाबन्दी का प्रशंसा पत्र रहता है जबकि व्यवस्था का साथ देने वालों का परिवार माल में मंहगी शापिंग करता नजर आता है।
राज कुमार राव, अमरीशपुरी, ओमपुरी, नसीरुद्दीन शाह, शबाना आज़मी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, जैसे आम आदमी के चेहरे वाले बेहतरीन कलाकार हैं और इस फिल्म में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा को कायम रखा है। उनके साथ पंकज त्रिपाठी, और अंजलि पाटिल भी भूमिकाओं के अनुरूप अपने अभिनय से प्रभावित करते हैं। लेखक निर्देशक अमित वी मसूरकर ने फिल्म को जिस लगन से बनाया है उसी का परिणाम है कि फिल्म को 67वें बर्लिन फिल्म फेस्टिवल और ट्रिबेका फिल्म फेस्टिवल के लिए चुना गया है। इसे 90वें अकेडमी अवार्ड के लिए श्रेष्ठ विदेशी भाषा के वर्ग में चुना गया है। फिल्म को आस्कर अवार्ड के लिए 2018 के लिए नमित किया गया है। केन्द्र सरकार ने भी पहली बार किसी फिल्म को एक करोड़ रुपये का अनुदान देने का फैसला किया है। फिल्म में छत्तीसगढ के जंगलों का सौन्दर्य प्रभावित करता है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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मंगलवार, सितंबर 19, 2017

[जिन्दगी से-] धर्म के खेल धर्म से खेल

[जिन्दगी से-]
धर्म के खेल धर्म से खेल
वीरेन्द्र जैन












पिछले दिनों म्याँमार में रोहंगिया मुसलमानों के साथ बौद्धों की मारकाट के जो भयावह दृश्य मीडिया में देखने को मिले उससे फिर यह प्रश्न कौंधा कि धर्म मनुष्य के लिए है या मनुष्य धर्म के लिए? इससे पहले आईएसआईएस ने तो दूसरे धर्म के साथ अपने ही धर्म की दूसरी शाखा वाले लोगों के साथ यही व्यवहार किया था। हमारे देश में भी कुछ लोग इस तरह की कट्टरता के प्रशंसक हैं और वे अपने धर्म के लोगों को ऐसे बनने के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं।
इन घटनाओं से कुछ स्मृतियां कौंध गयीं।
छतरपुर जिले में एक कवि और सोशल एक्टविस्ट थे श्री रामजी लाल चतुर्वेदी। वे एक सरकारी स्कूल में अध्यापक भी थे, कविताएं लिखते थे, अच्छे पाठक थे, व प्रगतिशील लेखक संघ के प्रत्येक राष्ट्रीय, प्रादेशिक, या स्थानीय आयोजन में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहते थे। हिन्दी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं का उन्हें ज्ञान था किंतु अपने क्षेत्र में वे ठेठ बुन्देली बोलते थे और उस बुन्देली भाषा व मुहावरे में राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर सटीक व मारक टिप्पणी करने के लिए जाने जाते थे। वे मुँहफट थे और बिना किसी लाग लपेट के किसी से भी निःसंकोच रूप से अपनी बात कह सकते थे, यही कारण था कि उनसे बात करने में राजनेता, अधिकारी, व साहित्यकार सभी घबराते थे। वे मान अपमान की परवाह नहीं करते थे व पहनावे के प्रति लापरवाह थे। अम्बेडकर को पूरा पढा था व छतरपुर जैसे सामंती क्षेत्र में दलितों के बीच उनका निःस्वार्थ, उल्लेखनीय काम था। अनेकों दलितों को उन्होंने बाबा साहब अम्बेडकर के पुजारी बनने के बजाय उनके विचारों को जानने व समझने के लिए प्रेरित किया था। चतुर्वेदी जी कर्मठ थे और जितना विचार से जुड़े थे उतना ही कर्म से भी जुड़े थे। छतरपुर में अभी भी ठाकुरशाही का आतंक व्याप्त है, जिससे टकराने के लिए उनकी अनेक युक्तियां और घटनाएं चर्चित हैं जिनमें से एक है धर्म परिवर्तन की धमकी। जिस गाँव के दलित ठाकुरों के आतंक से पीड़ित होकर गाँव छोड़ने की तैयारी कर रहे होते थे, उन्हें एकत्रित कर वे बयान दिलवाते थे कि इतनी संख्या में दलित फलाँ तारीख को धर्म परिवर्तन करने जा रहे हैं। इससे न केवल प्रशासन सक्रिय हो जाता था अपितु धर्म के ठेकेदार तक चौंक जाते थे और उन्हें समझाने के लिए खुद चल कर आने लगते थे। इससे उनकी समस्याएं सुनी जाती थीं। वे मानते थे कि धार्मिक समुदाय डरे हुये हैं, और इन गरीबों दलितों को धर्म से शोषण के सिवाय और क्या मिलता है। इसके लिए वे बाबा साहब के धर्म परिवर्तन का उदाहरण रखते थे। वैसे वे कहते थे कि सामने वाला जिससे ज्यादा डरता है, उसी का भय पैदा करना चाहिए इसलिए वे दलितों से कभी मुसलमान, कभी ईसाई तो कभी बौद्ध बनने की घोषणाएं कराते रहते थे। वे सिखाते थे कि धर्म को तो कपड़ों की तरह बदलते रहना चाहिए। एक बार एक आयोजन के दौरान किसी ब्राम्हणवादी कवि ने उनके नाम में चतुर्वेदी होने के नाते निकट आने की कोशिश की तो उससे वे बोले कि गोत्र तो हमारा चतुर्वेदी है पर हमें जाति से निकाल दिया गया था क्योंकि परिवार में कुछ ऊँच नीच हो गयी थी। उनके ऐसे ही सैकड़ों किस्से हैं, जो रोचक भी हैं, और प्रेरक भी।
ग्वालियर के एक कवि थे किशन तलवानी। वैसे तो वे सिन्धी व्यापारी थे किंतु उन्हें श्री मुकुट बिहारी सरोज के मित्र के रूप में लोग अधिक जानते थे। कहा जाता है कि अगर दोनों लोग शाम को ग्वालियर में हों तो उनका मिलना जरूरी था। यह बात अलग है कि दोनों लोग आपस में खूब लड़ते थे और यह लड़ाई अगली सुबह खत्म हो जाती थी। किशन तलवानी की एक प्रसिद्ध कविता है-
मैंने कहा मार्क्स सही,
उसने कहा गाँधी सही,
मैंने फिर कहा मार्क्स सही
उसने फिर कहा गाँधी सही, गाँधी सही,
मैंने फिर कहा मार्क्स सही, मार्क्स सही, मार्क्स सही,
उसने मारा मुझे चाँटा
मैंने कहा गाँधी पिट गये,
अब ये बात कल पर रही
दरअसल विचार के बीच हिंसा का आना ही उसे शुरू करने वाले की पराजय है। म्याँमार में बौद्धों ने बौद्ध भेषभूषा में बच्चों, महिलाओं के साथ जो निर्मम हिंसा की उससे बौद्ध धर्म को ही पराजय मिली है। अगर रोहंगिया मुसलमानों ने कुछ किया था तो उसको रोकने व यथोचित दण्ड देने का काम वहाँ के शासन, प्रशासन का था, न कि अहिंसा का नारा देने वाले बौद्ध धर्म के गुरुओं का। जिस धर्म को हिंसा का सहारा लेना पड़े तो मान लेना चाहिए कि उसका विचार कमजोर है व वहाँ का शासन कमजोर है, या गलत हाथों में है। म्याँमार में बुद्ध हार गये।
मेरे एक मुस्लिम मित्र थे जो वैसे तो शाह खर्च थे किंतु पैसे से तंग रहते थे। शाम की पार्टी में जितना भी पास में होता उसे खुले दिल से खर्च करते थे। मैं अपनी हिसाबी बुद्धि से उन्हें मितव्यता का पाठ पढाता तो वे कहते थे कि मेरी पूंजी तुम नहीं जानते, जब ज्यादा संकट आयेगा तो अपने धर्म का सौदा कर लूंगा। चूंकि देश में मेरा नाम है इसलिए मेरा धर्म भी ठीक ठाक दामों में बिकेगा क्योंकि खरीदने वाले को ज्यादा फायदा होगा। मुझसे कहते थे कि अगर तुम्हारे धर्म में कोई ठीक ठाक सा व्यापारी हो तो उससे बात करके देखना। वे मानते थे कि सारे धर्म संकट में हैं, इसलिए धर्म से निकालने की घटनाएं नहीं हो रही हैं, पर उसमें शामिल करने की घटनाएं जरूर बढ रही हैं। बाज़ार के इस युग में व्यापार का राज यह है कि जिसके पास जो कुछ है उसे अच्छे दामों में बेचने की कोशिश करना चाहिए। समझदार लोग यही कर भी रहे है। 2011 की जनगणना में इंगलेंड में नास्तिक लिखाने वालों की संख्या आश्चर्यजनक रूप से बढ चुकी है जिससे ईसाई परेशान हैं। प्रतिदिन वहाँ के समाचार पत्रों में चर्चों के भवन बेचने के विज्ञापन छपते हैं।  
डरा हुआ धर्म ही हिंसक हो जाता है क्योंकि धर्म का धन्धा व उसमें प्रतियोगिता बहुत बढ चुकी है। आशाराम, रामपाल, रामरहीम, हों या रजनीश या साँईबाबा के भक्त सब पुराने धर्म से विचलित होकर भी इतनी विशाल संख्या में अनुयायी बना ले रहे हैं यह संकेतक है। धर्म के क्षेत्र में जो भीड़ दिखायी देती है वह या तो पर्यटन प्रेमी युवाओं की भीड़ है, या सेवा से रिटायर्ड पुरुषों व घर से रिटायर्ड महिलाओं की भीड़ है। यही कारण है कि धर्म के क्षेत्र में चिकित्सा, या मनोरंजन का स्थान बढता जा रहा है।
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, सितंबर 14, 2017

हिन्दी दिवस पर - मरती बन्दरिया से खेल दिखाते मदारी

हिन्दी दिवस पर
मरती बन्दरिया से खेल दिखाते मदारी

                                    वीरेन्द्र जैन
              एक होता है हिन्दी दिवस जो भारत वर्ष के हिन्दीभाषी प्रांतों में 14 सितम्बर को मनाया जाता है। इस दिन विद्वान के भेष में दिखने वाले लोग सरकारी गैरसरकारी कार्यालयों में हिन्दी की अवनति पर आँसू बहा कर इस आयोजन के लिए तय बज़ट का व्यय कराने में सहयोगी होते हैं।
                 इस हिन्दी दिवस के साथ हम अगले पचासों हिन्दी दिवसों तक हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं के सामाजिक व प्रशासनिक उपयोग में कमी होते जाने का रोना रोयेंगे जो धीरे धीरे एक अवसरगत परम्परा का स्वरूप लेता जायेगा। ऐसा करने वालों में धन्धेवाज़ पत्रकार और हिन्दी भाषा के नाम पर कमाई करने वाले लेखक प्रमुख होंगे जो राजस्थान के रुदालों की तरह अपने अपने रूमाल आँखों से लगाने से पहले फोटोग्राफरों और मीडिया कर्मियों को अपने प्रायोजित कार्यक्रम की सूचना दे देंगे।
       जैसा कि अपने अपने की भावुकता को भुनाने के लिए भाजपा [पूर्व जनसंघ] के जनक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान का नारा उछाल कर देश विभाजन का सूत्रपात किया था, वैसे ही भावुकता के आधार पर हिन्दी के लिए नकली आंसू बहाने वाले भी करने जा रहे हैं। ये दोनों तरह के रोने वाले भाषा के जन्म, प्रचलन, और भविष्य के बारे में वैज्ञानिक दृष्टि से नहीं सोचते। भाषा को संवाद की ज़रूरत पैदा करती है तथा जब तक वह सहज संवाद को बनाने व बनाये रखने में सक्षम रहती है तब तक वह जीवित रहती है और जब हमारे संवाद के पात्र और विषय बदलने लगते हैं तो उसका स्थान कोई नई भाषा लेने लगती है जो सम्बन्धितों के साथ होने वाले संवाद को अधिक सुविधाजनक बना सके। संस्कृत का स्थान हिन्दी और बोलियों का स्थान खड़ी बोली लेती गयी। हम सब जब अपने मूल निवास की ओर जाते हैं तो अपने पुराने मिलने जुलने वालों से वहीं की बोली में बतिया कर खुश होते हैं पर नगर में वापिस आने पर फिर से खड़ी बोली बोलने लगते हैं।
       जब से नई आर्थिक नीतियों के अंतर्गत हम वैश्वीकरण की ओर बढने लगे  हैं तभी से हिन्दी का स्थान अंग्रेज़ी लेने लगी है, जो स्वाभाविक है। हमें जब जिससे संवाद की निरंतरता बनाये रखनी होगी तो उसको सहज रूप से समझ में आ जाने वाली भाषा का प्रयोग करना होगा। विश्व बैंक व अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण प्राप्त करने के लिए अंग्रेज़ी की ही ज़रूरत पड़ेगी जबकि देश के राष्ट्रीयकृत बंकों से ऋण लेने वालों को हिन्दी में फार्म उपलब्ध कराये जाते हैं।
       स्मरणीय है कि 1970 से बाद के दो दशकों में सरकारी कार्यालयों में हिन्दी का तेज़ी के साथ विकास हुआ। यह वह दौर था जब श्रीमती इन्दिरा गान्धी को कांग्रेस के अंदर अमेरिका परस्त गुट से मुक़ाबला करना पड़ा व आत्मरक्षार्थ उन्हें कांग्रेस से बाहर निकालना पड़ा। इस विभाजन से आये अभाव को पूरा करने के लिए उन्हें बामपंथियों से समर्थन माँगना पड़ा, जिन्होंने बैंकों, बीमा कम्पनियों, समेत अनेक जनोपयोगी संस्थानों का राष्ट्रीयकरण चाहा और सार्वजनिक क्षेत्र के विकास को प्राथमिकता पर रखने की सलाह दी। बैंक आदि जब आम आदमी के हितार्थ गाँव गाँव पहुँचे व अनेक तरह की गरीबी उन्मूलन वाली योजनाओं के सहयोगी बने तो उन्हें आम आदमी की भाषा में काम करने के लिए विवश होना पड़ा। यही वह समय था जब बहुत बड़ी संख्या में हिन्दी अधिकारी और अनुवादक नियुक्त हुये। प्रत्येक कार्यालय में हिन्दी के टाइपराइटर आये और परिपत्र हिन्दी में ज़ारी होने लगे। आम आदमी की योजना से जुड़े विज्ञापन हिन्दी में ज़ारी करने पड़े। सरकारी कार्यालयों में नौकरी पाने के इच्छुक लोगों ने हिन्दी सीखना चाही। कुल मिला कर कहने का अर्थ यह कि जब सरकार ने जनता से संवाद करना चाहा तब उसे उसकी भाषा को अपनाना पड़ा। आगे भी जब सरकार जनोन्मुखी होना चाहेगी तो वह हिन्दी और दूसरी लोक भाषाओं का प्रयोग करेगी।
       नई आर्थिक नीतियां आने के बाद सरकार सारी दुनिया से बातें करने लगी है जिसके लिए अंग्रेज़ी ज़रूरी है। इन्हीं नीतियों का ज्वलंत प्रमाण यह है कि आर्थिक विकास की दर प्रगति पर है और किसान हज़ारों की संख्या में आत्महत्याएं कर रहे हैं व भूख से मौतें हो रही हैं। समाज से कुछ लोगों को माडल बना कर उन्हें देश और विदेश में नौकरियां दी जा रही हैं व इन नमूनों को जोर शोर से प्रचार दिया जा रहा है। इसका परिणाम यह निकल रहा है कि लाखों मध्यम वर्गीय परिवार अपने बच्चों को मँहगे मँहगे अंग्रेज़ी स्कूलों में भेज रहे हैं और ऐसे स्कूल कुकरमुत्तों की तरह गली गली में खुल रहे हैं। अब फिर से सब कुछ वैसे ही अंग्रेज़ी में होने लगा है जैसे बीच में लोग हिन्दी के प्रति उन्मुख हुये थे। राजनीति अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है और अर्थव्यवस्था समाज की भाषा और संस्कृति को।
                        यह नया भाषायी रुझान देश में एक और विभाजन पैदा कर रहा है जो निम्नवर्ग और मध्यमवर्ग के बीच है। कुछ दिनों बाद एक की भाषा अंग्रेज़ी होगी और दूसरे की हिन्दी। दूसरे देशों में हिन्दी भाषी होने का अर्थ निम्नवर्गीय होना होगा। हिन्दी दिवस के दिन प्रलाप करने वालों ने कभी समस्या के मूल में जाने की ज़रूरत नहीं समझी। उन्हें तो प्रलाप के पैसे लेने हैं ताकि अंग्रेज़ी स्कूल जाने वाले अपने बच्चे की भारी फीस चुका सकें
वीरेन्द्र जैन        
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बुधवार, अगस्त 23, 2017

तीन तलाक, कौन हलाक?

तीन तलाक, कौन हलाक?
वीरेन्द्र जैन

सुप्रीम कोर्ट से वह फैसला आ गया जिसके आने पर मुस्लिम समाज से ज्यादा हिन्दू समाज का एक वर्ग ऐसे प्रफुल्लित है जैसे वे बड़े मानवतावादी हों और मुस्लिम महिलाओं के हितों की चिंता करने वाले समाजसेवी हों, या इससे उनका बड़ा भला हो गया हो। इनमें से कुछ भी ऐसा नहीं घटा है, किंतु यह खुशी दूसरे कारणों से है।  साम्प्रदायिक सोच की जड़ें गहरे जमी होती हैं और तरह तरह से प्रकट होती रहती हैं। तीन तलाक का यह फैसला स्वागत योग्य है किंतु इस पर खुशी मनाने वाले एक वर्ग की खुशी का अतिरेक कुछ भिन्न संकेत देता है।
1984 के सिख विरोधी दंगों के बाद दिल्ली में साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए जन नाट्य मंच ने जगह जगह सैकड़ों नाटक किये जो काफी प्रभावी थे। राजधानी के मीडिया के माध्यम से दुनिया भर में इस काम की प्रशंसा हुयी व रक्षात्मक रूप में आ चुकी काँग्रेस सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय ने जन नाट्य मंच को पुरस्कृत करने का फैसला किया। उनके प्रस्ताव पर सफदर हाशमी ने लिखा कि जन नाट्य मंच के लड़कों ने जो काम किया है वह प्रशंसनीय है व पुरस्कार के योग्य है किंतु जो हाथ उन्हें पुरस्कृत करने की बात कर रहे हैं वे इस लायक नहीं हैं कि उनके हाथों से पुरस्कार लिया जा सके। उल्लेखनीय है कि उस समय सूचना प्रसारण मंत्री हरकिशन लाल भगत थे जिन पर भी सिखों के खिलाफ हिंसा को उकसाने का गम्भीर आरोप था।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही है किंतु भाजपा की प्रसन्नता का कारण गलत सोच पर आधारित है। वे इसे मुस्लिम समाज के अन्दर फूट के रूप में देख कर खुश हो रहे हैं। वे उनकी पराजय के रूप में देख कर अपनी साम्प्रदायिक भावना को तुष्ट कर रहे हैं। ये मौका उन्हें मौलानाओं की जड़ता ने दिया है जिन्होंने एक गलत परम्परा को मजहबी कानून की तरह थोप दिया और सुलझे दिमाग से सोचने की जगह उस पर अड़ गये। अगर वे समय रहते दूसरे 22 इस्लाम को मानने वाले देशों की तरह समाज के एक वर्ग की आवाज सुनते तो उन्हें ये दिन नहीं देखने पड़ते। जब कोई अमित्र किसी बुराई को भी दूर करने की बात करता है तो उसके चरित्र को देखते हुए वह अपनी बुराई को भी अपने आत्म सम्मान से जोड़ने लगता है।
ऐसी ही खुशी मुस्लिम साम्प्रदायिकों को मण्डल कमीशन घोषित होने के बाद हिन्दुओं के बीच होने वाले सिर फुटव्वल में मिला था पर वे अपनी खुशी प्रकट करने की स्थिति में नहीं थे इसलिए मन ही मन खुश थे। जब समाज समय की ओर न देख कर जड़ता में जकड़ा रहता है तब ऐसी ही स्थितियां आती हैं। जब अम्बेडकर ने पाँच लाख दलितों के साथ नागपुर में बौद्ध धर्म ग्रहण किया था तब भी कुछ ही वर्ष पहले विभाजन व साम्प्रदायिक दंगे झेल चुका मुस्लिम समाज का साम्प्रदायिक हिस्सा संतुष्ट हुआ होगा। कहा जाता है कि अगर किसी को कांटा भी चुभ जाता है तो उसके दुश्मन को खुशी होती है। असली दोष अंग्रेजों की बोई उस वैमनस्यता का है जिसे अब वोटों के ध्रुवीकरण के लिए और बढाया जा रहा है। एक देश में रहते हुए ये दुश्मनी चलेगी, तो विकास की सारी ऊर्जा नष्ट हो जायेगी और तब विकास की जगह विनाश लेता जायेगा। हर त्योहार अब आशंकाएं लाता है और इतनी पुलिस व्यवस्था होती है कि त्योहार किसी अपराध की तरह लगने लगता है।    
       मुझे तलाशने के बाद भी वे आंकड़े नहीं मिले कि मुस्लिम समाज में चल रही इस कुप्रथा से कितने प्रतिशत या कितनी महिलाएं पीड़ित हुयी हैं, उनमें से कितनों को राहत मिलेगी। अगर अपने हित की यह मांग वे अभी तक खुद नहीं उठा सकीं हैं तो वे अपनी अन्य पीड़ाएं दूर करने के लिए के लिए मांग उठाने की हिम्मत कैसे जगाएंगीं? दिये हुए अधिकार और सुविधाएं पीड़ितों के अलावा दूसरों के ही काम अधिक आती रही हैं, बिना मांग और बिना संघर्ष से मिली सुविधाओं ने बिचौलियों की ही पौ बारह की है। दहेज कानून या दलित महिला उत्पीड़न के कानूनों से शोषकों के इशारे पर ब्लेकमेलिंग ही अधिक हुयी है।
गैर मुस्लिम समाज की महिलाओं की रूढियां और गलत परम्पराएं भी कम नहीं हैं किंतु उनके प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाला दल उनके प्रति कोई चिंता प्रकट नहीं करता। भाजपा सहित लगभग सभी राजनीतिक दलों ने समाज सुधार का ऐसा कोई कार्यक्रम हाथ में नहीं लिया है जिसमें महिलाओं की रूढियों को दूर करने की बात हो, इसके उलट वे इसे परम्परा कह कर बढावा देते रहते हैं। प्रदेशों के मुख्यमंत्री तक करवा चौथ जैसे आयोजनों में भाग लेते और उसका प्रचार सा करके बाज़ार का भला करते प्रकट होते हैं। कभी भाजपा की राजमाता विजया राजे सिन्धिया ने जयपुर में सतीप्रथा का बचाव करने वाली रैली का नेतृत्व किया था। अभी भी जली कट्टू, गोटेमार और दही हांडी जैसी खतरनाक प्रथाओं को रोकने में व्यवस्था नाकाम है। अंग्रेजों के शासन काल में जितनी कुप्रथाओं पर रोक लगी उस अनुपात में आज़ादी के बाद नहीं लगी। अब तो यह हाल हो गया है कि वैज्ञानिक चेतना से जागरूक करने वाले नरेन्द्र दाभोलकर जैसे समाजसेवी को सरे आम गोली मार दी जाती है और देश का सबसे बड़ा दल उस कृत्य की आलोचना करने की जगह उसके हत्यारों व उन्हें पैदा करने वाली संस्थाओं का प्रत्यक्ष या परोक्ष बचाव करता नजर आता है।
ऐसे फैसलों की श्रंखलाएं बन सकें और यह साम्प्रदायिक हथियार न बने तो और अधिक स्वागतयोग्य बन जायेगा।     
वीरेन्द्र जैन
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रविवार, जुलाई 30, 2017

पिछली सदी के छठे सातवें दशक की राजनीति का दुहराव

पिछली सदी के छठे सातवें दशक की राजनीति का दुहराव
वीरेन्द्र जैन
भारतीय जनता पार्टी अतीतजीवी पार्टी मानी जाती रही है जो इतिहास के मुगलकाल को बिल्कुल ही निकाल या बदल देना चाहती है और यही कारण रहा कि उसे स्वतंत्र मीडिया और जनता में रामलीला पार्टी से अधिक महत्व नहीं मिला था। दलित विमर्श के दौरान एक बार राजेन्द्र यादव ने कहा था कि जो लोग अतीत में सुविधा में [कम्फर्टेबिल] थे जैसे कि ब्राम्हण, तो वे अतीत की ओर ही जायेंगे, उसी काल को सर्वश्रेष्ठ मानेंगे व उसी के कथित गौरव को लाने की बात करेंगे, किंतु जो लोग असुविधा में थे जैसे कि दलित, तो वे लोग नये युग की बात करेंगे और अतीत की कढुवाहट से बाहर निकलने की कोशिश करेंगे। इससे ही भाजपा को पहचाना जा सकता है कि वह क्या चाहती है।
एक सेमिनार में भाजपा समर्थक एक प्रतिष्ठित पत्रकार ने दलबदल कानून को गलत बताया और उसे समाप्त करने की वकालत की। जिस दल के पास दौलत और दौलत वाले लोग होंगे वह दलबदल कानून का ही विरोधी नहीं होगा अपितु विचार के प्रति समर्पित राजनीति को भी पसन्द नहीं करेगा। उल्लेखनीय है कि जवाहरलाल नेहरू, और लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद काँग्रेस का जो आकर्षण घटने लगा और काँग्रेस का एकाधिकार टूटने लगा तब ही दलबदल युग का प्रारम्भ हुआ। पैसे वालों, और पूर्व राज परिवार के लोगों ने अपने खजाने खोल दिये व काँग्रेस के टिकिट पर जीत कर आये पद वंचित नेताओं को खरीदा जाने लगा। काँग्रेस ने भी स्वतंत्रता संग्राम के अपने इतिहास, भयभीत अल्पसंख्यक, और अहसानमन्द दलितों के भरोसे चुनाव जीतने के दम्भ में कभी राजनीतिक लोकतांत्रिक चेतना जगाने की जरूरत नहीं समझी थी। जनप्रतिनिधियों ने मूल्यहीन सत्ता का भरपूर दुरुपयोग करना शुरू कर दिया था और ऐसे ही लालच में पद वंचित काँग्रेसी एन केन प्रकारेण पद पाने की जुगाड़ में जुट गया था। इसी दौरान दल बदल कर पद और धन पाने का अवसर आया तो उन्होंने उसे निःसंकोच स्वीकार किया। काँग्रेस से भाजपा में आवागमन ऐसे हुआ जैसे लड़कियां मायके से ससुराल जाती हैं।
दलबदल के सहारे गैरकाँग्रेसी सरकारें बनवाने और ऐसी सब सरकारों में प्रमुख पद हथियाने में तब की जनसंघ और अब की भाजपा इसलिए सफल हो सकी क्योंकि उसके पास आरएसएस के रूप में एक संगठित, समर्पित और अनुशासित अन्ध समर्थकों का समूह था। वे प्रत्येक सिद्धांतहीन संविद सरकार में सम्मलित होते रहे। सब कुछ जानते हुए भी दलबदल के लिए होने वाले अनैतिक कामों के प्रति कभी संघ ने आपत्ति नहीं की। केन्द्र की सत्ता में भागीदारी के लिए उन्होंने अपने दल को जनता पार्टी में विलीन करना भी स्वीकार कर लिया व इस मामले में जयप्रकाश नारायण की भावना को भी पलीता लगाया। समाज को भ्रमित करते हुए वे अन्दर से संघ हितैषी ही बने रहे। यही कारण था कि दुहरी सदस्यता के आरोप पर ही देश की पहली गैरकाँग्रेसी केन्द्र सरकार का पतन हुआ था। दलबदल के कारण अनेक राज्य सरकारें खोने के बाद काँग्रेस को भी बात समझ में आयी और फिर उसने भी इसी तरीके को अपना कर वापिस सत्ता हथियाना शुरू कर दिया। दलबदल के डर से सरकारें सदैव खतरा महसूस करती रहती थीं।
1984 में श्रीमती इन्दिरा गाँधी की हत्या से निर्मित वातावरण में जब चुनाव हुये तो राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली काँग्रेस को दो तिहाई बहुमत प्राप्त हुआ। 1980 में संजय गाँधी की दुर्घटना में हुयी मृत्यु तक राजीव गाँधी राजनीति के प्रति उदासीन थे और बाद में उन्हें उनके अनचाहे राजनीति में लाया गया था। जब उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया गया तब यह आशंका पैदा हुयी कि सत्ताओं को संचालित करने वाले कुछ लोग दलबदल करा के उनकी सरकार को गिरा न दें, इसलिए उनके सलाहकारों ने तुरंत दलबदल विरोधी कानून लागू करवाया। इससे उनकी सरकार काफी दिन चल गयी भले ही वह अपना कार्यकाल पूरा न कर सकी हो। यह सच है कि वांछित स्तर तक विचार और सिद्धांत की राजनीति का विस्तार न हो सका पर इस कानून से दलबदल की घातक बीमारी पर अंकुश तो लगा था।
लगभग दो दशक बाद यह बीमारी फिर से एक नये रूप में उभर कर सामने आयी है। उल्लेखनीय है कि राजीव गाँधी के निधन के बाद सोनिया गाँधी भी राजनीति में आने के प्रति अनिच्छुक थीं और उन्होंने एक दशक तक खुद को दूर भी रखा पर जब स्वार्थी गुटों में विभाजित काँग्रेस किसी एक के नेतृत्व पर सहमत नहीं हो सकी तो खुद को अनाथ महसूस करते काँग्रेसी और परदे के पीछे देश चलाने वाला कार्पोरेट जगत उन्हें मना कर ले आये। उनका योगदान केवल इतना रहा कि काँग्रेस तुरंत दो फाड़ होने से बच गयी। बाद में राजनीति के गलत आकलन के कारण शरद पवार और ममता बनर्जी अपना अपना गुट लेकर काँग्रेस से अलग हो गये थे। जल्दी ही काँग्रेस ने यूपीए बना कर अटल बिहारी वाजपेयी की बाइस दलों की खिचड़ी सरकार से सत्ता वापिस ले ली। आहत भाजपा ने विदेशी मूल का मुद्दा उठा कर उन्हें प्रधान मंत्री नहीं बनने दिया, जिस कारण नौकरशाही की मानसिकता वाले मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनना पड़ा।
सत्ता वंचित भाजपाई किसी तरह सत्ता में वापिसी चाहते थे जिसके लिए उन्होंने प्रारम्भिक नानुकुर करने के बाद नरेन्द्र मोदी को अपना नेता स्वीकार कर लिया जो दुनिया भर में अपनी पहचान बना चुके थे भले ही वह पहचान नकारात्मक ही क्यों न हो। सत्ता के लिए उत्सुक भाजपाइयों को उनमें उम्मीद दिखी क्योंकि वे आर्थिक ईमानदारी, औद्योगिक विकास के साथ साथ दृड़ प्रशासक के रूप में भी जाने जाते थे। हिन्दू साम्प्रदायिकता से प्रभावित एक वर्ग उन्हें पसन्द करता था उनकी प्रबन्धन टीम ने काँग्रेसी राज्य के भ्रष्टाचार और अक्षमता को ऐसा धुँआधार प्रचार किया कि मोदी सकारात्मक दिखने लगे। प्रीपोल आदि से आतंकित काँग्रेसी व दूसरे दलों के सांसद भी घबराहट में आ गये और अपनी पार्टी छोड़ कर भाजपा से टिकिट पाने का जुगाड़ बैठाने लगे। कुछ विख्यात कलाकारों को जोड़ा गया और चुनाव प्रमुख की तरह लाये गये अमितशाह ने ऐसे लोगों का हर कीमत पर स्वागत किया। यह दलबदल का नया रूप था। इसी फार्मूले को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भी दुहराया गया। अमित शाह की सफलता से चमत्कृत भाजपा में उनकी अध्यक्ष पद पर नियुक्ति का विरोध नहीं कर सका।
अब राष्ट्रपति के चुनाव से लेकर राज्यसभा चुनावों तक यही खेल दुहराया जा रहा है और हाल यह है कि काँग्रेस को अपने विधायकों को बचा कर दूसरे राज्यों के होटलों में रुकाना पड़ रहा है। सत्तर साल के लोकतंत्र में  स्थिति ऐसी दयनीय है और इस व्यापार में क्रेता विक्रेता दोनों ही बराबर के जिम्मेवार हैं। अगर लोकतंत्र से लोगों का विश्वास कम होता गया तो देश को इराक अफगानिस्तान बनते देर नहीं लगेगी। अपने निजी स्वार्थों के लिए लोकतंत्र को कमजोर करने की लगातार कोशिशें खतरनाक हैं।
 वीरेन्द्र जैन
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अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629


        

शुक्रवार, जुलाई 28, 2017

फिल्म समीक्षा – लिपिस्टिक अन्डर माई बुरका

फिल्म समीक्षा – लिपिस्टिक अन्डर माई बुरका
स्त्री यौनिकता के वर्जित प्रश्न को उठाने की कोशिश

वीरेन्द्र जैन
प्रकाश झा इस बात के लिए जाने जाते हैं कि वे सतही सम्वेदनाओं वाले किशोर मानस के किस्सों वाले आम व्यावसायिक सिनेमा से अलग सामाजिक विषय उठाते हैं और उन पर बाक्स आफिस हिट फिल्में बनाते हैं। लिपिस्टिक अन्डर माई बुरका भी उन्हीं के प्रोडक्शन की फिल्म है जिसे उनकी सहायक रही अलंकृता श्रीवास्तव ने निर्देशित किया है। उनके प्रिय नगर भोपाल में फिल्मायी गई इस फिल्म में रत्ना पाठक और कोंकणा सेन को छोड़ कर अधिकांश सहायक कलाकार भोपाल के हैं।
यह संक्रमण काल है जिसमें बदलते आर्थिक ढांचों के कारण युवाओं की सोच और सपने तो बदल रहे हैं किंतु यह बदलाव अधूरा है क्योंकि समाज का आधा धड़ सामंती मिट्टी में गड़ा हुआ है और आधा पूंजीवादी मूल्यों की हवा में लहरा रहा है। सामंती समाज के युवाओं में बदलाव का साहस न होने के कारण उनके सपने कुंठाओं में ढल रहे हैं। यही कारण है कि उनमें से बहुत सारे युवा सामाजिक दबाव में अपना जीवन चोरों की तरह जी रहे हैं और अपराध बोध से पीले पड़ते जा रहे हैं। एक बड़े नगर में भी पुरानी परम्परा का दबाव इतना है कि अपना जीवन साथी स्वयं चुनने की कोशिश करने वाली लड़की को भी चरित्रहीन समझा जाता है। निर्भया कांड जैसे चर्चित यौन अपराधों के पीछे भी यही दृष्टि रही होगी और देर रात को अपने मित्र के साथ फिल्म देख कर लौट रही लड़की को नशे में धुत बस चालकों ने चालू लड़की समझ लिया होगा। दो भिन्न लिंग के युवाओं की मित्रता हमारा सामंती समाज समझ नहीं पाता है। दूसरी ओर बाज़ारवाद का फैलाव है, जो, अपने उत्पाद बेचने के लिए विज्ञापनों के द्वारा युवा भावनाओं को भड़काता रहता है व विज्ञापन फिल्मों के द्वारा किशोरों को उकसाता रहता है। खास आय वर्ग के लिए उत्पादित सौन्दर्य प्रसाधन इस तरह विज्ञापित किये जाते हैं कि मध्यमवर्गीय युवा वर्ग इन्हें जरूरी आवश्यकताएं समझने लगता है।
इस फिल्म में, इसी प्रभाव में आकर कम आय के टेलरिंग करने वाले परिवार की एक किशोरी बड़े माल और सुपर बाज़ार से मँहगी लिपिस्टिक से लेकर सौन्दर्य प्रसाधन की अन्य चीजें चुराने लगती है। युवाओं की पार्टियों में जाने के लिए वह चोरी से बुरका पहिन कर घर से निकलती है और बाहर जाकर अपने परिधान बदल आधुनिक बनने की कोशिश करती है, वह दुस्साहस करके परिवार में वर्जित लिपिस्टिक लगाती है, जींस पहिन लेती है व वर्जनाओं का विरोध करने वाले प्रदर्शनों में भाग लेती है। संक्रमण काल के इसी समाज में नवधनाड्यों व वैध-अवैध धन संग्रह करने वाले परिवारों के युवाओं की ऐसी दुनिया भी है जो पुरानी वर्जनाओं से मुक्त हो चुके हैं और मनमाना जीवन जी रहे हैं। राजनीतिक व्यवस्था से अनभिज्ञ समाज का अर्थशास्त्र न समझने वाले हजारों युवाओं के वे ही आदर्श बन रहे हैं। यही नासमझी निम्न मध्यमवर्ग के युवाओं को कुण्ठाग्रस्त बना रही है या अपराधी। चैन स्नेचिंग से लेकर बाइकें चुराने वाले छात्र और युवा जब पकड़े जाते हैं तो उनके अपराधों के पीछे यही कुण्ठाएं सामने आती हैं।
मनोवैज्ञानिक रिपोर्टों में कहा गया है कि महिलाओं में पुरुषों की तुलना में कई गुना यौनिकता होती है और यही कारण है कि उन्हें विभिन्न समाजों ने उन्हें कम स्वतंत्रता दी है व अधिक से अधिक बन्दिशें रखी हैं। गर्भधारण वाली देह होने के कारण महिलाओं की यौनिकता उन्हें मजबूर बना सकती है व परजीवी बनने को विवश करती है। शिशु पालन की जिम्मेवारी भी महिला पर आ पड़ती है इसलिए उसकी नैतिकिता ऐसी तय की गयी है कि उसे अपनी यौनिकता पर नियंत्रण रखना पड़ता रहा है। इसका उल्लंघन करने वालों को कठोर सामाजिक व शारीरिक दण्ड दिये जाते रहे हैं। अधिकांश मारपीट से लेकर जिन्दा जला देने की घटनाओं के पीछे महिलाओं की कथित स्वतंत्रता की कोशिश ही रहती आयी है, जिसे अनुशासनहीनता माना जाता है। परिवार नियोजन के साधनों के विकास ने महिलाओं को अनचाहे गर्भ धारण की  कमजोरी से सुरक्षा दी है, जिससे मुक्त होते ही वे भी अपनी देह पर अपना हक चाहती हुयी, स्वाभाविक यौनिकता को जीने के सपने देखने लगती है। फिल्म में ऐसी ही गरीब परिवार की दूसरी लड़की अपने प्रोफेशनल फोटोग्राफर मित्र के साथ निरंतर शारीरिक सम्बन्ध बनाते हुए भी अंततः आजीवन सुरक्षा देने वाले पुरुष की तलाश में रहती है जिसे पति कहा जाता है, व जिसके लिए शादी करना होती है।
तीसरी युवती एक मुस्लिम परिवार की विवाहित महिला है जिसका पति रोजी रोटी के लिए दुबई में काम करता है और चार छह महीने में जब भी आता है तो उसे गर्भवती कर जाता है जिसके कारण वह तीन बच्चों की माँ है व तीन बार गर्भपात करवा करके शारीरिक रूप से कमजोर भी हो चुकी है। बाज़ारवाद द्वारा सिखाये लाइफ स्टाइल को जीने के लिए वह पार्ट टाइम काम करती है और अपनी उपलब्धियों से पति को प्रभावित करने की कोशिश करती है किंतु उसका पति बिना सावधानी के केवल मशीनी सेक्स करने तक उसमें रुचि रखता है। अपनी संतुष्टि के लिए वह दूसरी महिलाओं से मित्रता रखता है। फिल्म के इस हिस्से में क्रोध में बदला लेने के लिए सेक्स करने का चित्रण यह स्पष्ट करता है कि साम्प्रदायिक दंगों के दौरान दूसरे धर्म की महिलाओं के साथ बलात्कार क्यों होते हैं। सुप्रसिद्ध लेखक राजेन्द्र यादव ने एक बार अपने सम्पादकीय में सवाल किया था कि सारी धर्म ध्वजाएं अंततः महिलाओं की योनि में ही क्यों गाड़ी जाती हैं।
चौथी महिला एक प्रौढ महिला है जिसका पति भोपाल गैस कांड का शिकार हो गया था, एक पुरानी हवेली छोड़ गया था। वह इसी हवेली में कई किरायेदार रख कर जरूरत भर गुजर कर रही है, ऊपर वर्णित किरदार भी उसी के किरायेदार हैं। उससे सहानिभूति रखने वाले और जरूरत पर मदद करने वाले लोग उससे परम्परागत नैतिक आचरण की उम्मीद करते हैं, जिसका वह घुट घुट कर निर्वहन भी करती है किंतु अपनी दैहिक भावनाओं को सहलाने के लिए अश्लील कहानियों की किताबें पढ कर मानस सुख लेती रहती है। इन्हीं कहानियों के प्रभाव में वह एक आकर्षक युवा से टेलीफोनिक संवाद का सुख लेने लगती है। उसकी उम्र और सौन्दर्य से अनभिज्ञ वह युवक पहले गलतफहमी में पड़ जाता है, किंतु जब भ्रम टूटता है तो वह उसका अपमान भी करता है। यही अपमान उसे अपने निकट के लोगों से भी मिलता है, जो गाहे बगाहे उसके मदद्गार भी होते हैं।
फिल्म कथात्मक नहीं है किंतु समाज के दोहरे चरित्र के एक हिस्से के अन्दर की सच्चाई को खोलने का  काम करती है। व्यंग्य के शिखर पुरुष हरिशंकर परसाई का पूरा रचना संसार इसी हिप्पोक्रेसी को उजागर करने का काम करता है जिसमें राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक सभी क्षेत्रों को छुआ गया है। यौनिकता के मामले में भी हमारा समाज बहुत पाखंडी है जिससे बहुत से विसंगतियां जन्म लेती हैं। बदलते समाज के अनुसार हमें नैतिकताएं बदलनी चाहिए किंतु उनमें अपना हित बना चुके समाज के लोग उन्हें जड़ बना कर रखे हुये हैं। फिल्म में जीवन के वे क्षण जिन्हें आम तौर पर गोपनीय माना जाता है उन्हें परदे पर सेंसर बोर्ड की अनुमति तक दिखाया गया है जो हमारी परम्परागत सोच को झटका देता है। कुछ लोग इसे अनावश्यक भी मान सकते हैं, और यह भी कह सकते हैं कि इन दृश्यों के बिना भी बात कही जा सकती थी, किंतु यह बात भी हमारी जड़ता की ही याद दिलाती है। टिकिट खिड़की पर समुचित भीड़ जुटाने में भी ऐसे टोटके काम आते हैं, क्योंकि न्यूनतम कमाई करना तो हर फिल्मकार का लक्ष्य होता ही है। चूंकि फिल्म में भावप्रवणता की कोई गुंजाइश नहीं थी इसलिए अनजाने से कलाकारों ने भी अपनी भूमिका का सही निर्वहन किया है जिसमें खामी खूबी ढूंढने की जगह नहीं है। भोपाल फिल्म निर्माण की नई जगह बनती जा रही है जिसमें बहुत सारे स्थल शूटिंग के उपयुक्त हैं। प्रकाश झा उनका कुशलता से उपयोग कर रहे हैं। अछूते विषय लेकर दर्शकों की रुचि को उनकी बुद्धि व भावनाओं के साथ जोड़ कर फिल्में बनना शुभ है, इसे प्रोत्साहन मिलना ही चाहिए।   
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
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मंगलवार, जुलाई 18, 2017

जेल के खेल से न्याय का मखौल

जेल के खेल से न्याय का मखौल  
वीरेन्द्र जैन

पिछले दिनों एक अखबार के एक पेज पर लोकायुक्त कार्यवाही की मध्यप्रदेश की चार खबरें एक साथ थीं
1-     इन्दौर के एक जीएम को दो लाख रिश्वत लेते हुए पकड़ा।
2-     एसडीओ को पचास हजार की रिश्वत लेते पकड़ा
3-     वैज्ञानिक को बीस हजार की रिश्वत लेते पकड़ा
4-     एक बाबू के यहाँ पचपन लाख की सम्पत्ति मिली
पहली तीन खबरें क्रमशः इन्दौर, धार, और इन्दौर के कैट की हैं जबकि चौथी खबर श्योपुर की है। प्रदेश में पिछले तीन वर्षों में 296 प्रकरणों में कार्यवाही हुयी। इस प्रदेश में शायद ही कोई सप्ताह ऐसा जाता हो जब किसी अफसर, इंस्पेक्टर, क्लर्क, चपरासी, ठेकेदार, व्यापारी, नेताओं के दलाल आदि के यहाँ आयकर या लोकायुक्त का छापा न पड़ता हो या और उस छापे में अकूत धन सम्पत्ति आदि न बरामद होती हो। बरामद की गयी ये अनुपातहीन सम्पत्ति रिश्वत, कमीशन, आदि के द्वारा अर्जित की जाती है जो या तो अदालत दर अदालत लम्बे चले मुकदमों के बाद वापिस उसी व्यक्ति के पास पहुँच जाती है, या मामूली जुर्माने आदि लगा कर मामले को रफा दफा कर दिया जाता है। विचाराधीन कैदी तो कभी कभी जेलों की शोभा बढा ही देते हैं किंतु अभी तक समुचित दण्डित भ्रष्टाचारियों को कैद रखने के लिए ये तरस ही रही हैं। यह अनुपातहीन सम्पत्ति कैसे कैसे और किस किस तरह के गलत काम कर कर के अर्जित की गयी होती है उसकी कोई ठीक ठाक पूछ परख नहीं की जाती ताकि भविष्य में उसके रोकने के लिए व्यवस्थाओं में सुधार किया जा सके। दण्ड देने के पीछे एक दृष्टिकोण यह भी होता है कि दूसरा कोई व्यक्ति वैसी ही गलती करने से डरे, किंतु रोचक यह है कि पकड़े गये व्यक्ति के बाद आने वाला उसका उत्तराधिकारी भी वैसे ही कामों में संलग्न हो जाता है और यदा कदा कुछ समय बाद उनमें से कुछ ऐसे ही पकड़े भी जाते हैं, जिसे वे खेल भावना की तरह लेते हुए कानून के छिद्रों से बच निकलने के लिए राजनेताओं से सम्बन्ध बनाने और कोई बड़ा वकील करने लगते हैं। इस बात पर कभी विचार नहीं किया गया कि क्यों लोकायुक्त आदि की कार्यवाही के बाद भी विभाग में भय नहीं व्याप्तता। स्मरणीय है कि देश के एक मुख्य सतर्कता आयुक्त ने सेवा निवृत्ति के अगले दिन ही कहा था कि देश का हर तीसरा आदमी [सरकारी कर्मचारी] भ्रष्ट है। उन्होंने यह भी कहा था कि इन भ्रष्टों में से कुल तीन प्रतिशत ही जाँच के दायरे में आ पाते हैं और उनमें से भी कुल चार प्रतिशत पर कानूनी कार्यवाही होती है।
       पिछले दिनों जिन आईएएस आफीसर्स, डिप्टी कलेक्टर्स्, इंजीनियर्स, रजिस्ट्रार, आरटीओ, निरीक्षक, आडीटर्स, स्टोरकीपर्स, एकाउंटेंट, पटवारी, चपरासी, आदि के यहाँ से छापों में जो करोड़ों की रकमें और सम्पत्तियाँ मिली हैं उनके बारे में तो एक अनुमान सा रहता है कि ये सम्पत्तियां कैसे भुगतान की फाइलें रोकने, काम में अड़ंगा लगाने, गलत फैसले लेने, झूठे बिल बनाने, प्राथमिकताएं बदलने, अपात्रों का प्रमोशन या स्थानांतरण करने आदि के द्वारा बनायी जाती हैं। अगर कोई सरकार चाहे तो पूरा हिसाब करके सारे लेने और देने वालों को एक घेरे में ला सकती है पर ये काम सरकार के कामों की प्राथमिकताओं में नहीं आता जिसका कारण भी मंत्रियों आदि राजनेताओं की अनुपात हीन सम्पत्ति वृद्धि को देख कर अनुमानित किया जा सकता है।
       2012 में इन्दौर की सेन्ट्रल जेल अधीक्षक के यहाँ छापे में जितनी बड़ी मात्रा में सम्पत्तियां मिली थीं वे चौंकाने वाली थीं। इस छापे में पकड़ में आयी सम्पत्ति की कुल कीमत लगभग पन्द्रह करोड़ बतायी गयी थी। इनमें भोपाल की पाश कालोनी में तीन आलीशान मकान, एक गर्ल्स हास्टल, चार दुकानें पाँच प्लाट, 14 एकड़ कृषि भूमि व इन्दौर के विकास प्राधिकरण की योजनाओं में दो प्लाट सम्मलित थे। छापे के दौरान ही सम्बन्धित अधीक्षक के लड़के ने दो लाख रुपयों की पोटली बना कर खिड़की से सड़क पर फेंक दिये थे जिसे दो पुलिस कानिस्टबलों द्वारा देख लिये जाने से वे बरामद हो गये थे। अगले दिन जब उनका लाकर खोला गया तो उसमें ग्यारह लाख रुपये बरामद हुये। सवाल उठता है कि जिस जेल अधीक्षक का कुल अर्जित वेतन 39 लाख के आस पास ही बैठता हो उसके पास 15 करोड़ कीमत की सम्पत्तियां सरकार और कानून को किस तरह से चूना लगा कर एकत्रित हो गयीं! कर्नाटक के जेल अधीक्षक द्वारा तामिलनाडु की नेत्री शशिकला को फाइव स्टार सुविधाएं प्रदान करने व बदले में दो करोड़ रुपये प्राप्त करने का आरोप लगाया गया है। अगर इसे एक नमूने की तरह देखा जाये तो समझा जा सकता है कि जेल अधिकारियों के पास धन कैसे कैसे एकत्रित होता है।
       जेल जाने के अनुभवों से सम्पन्न विभिन्न व्यक्तियों से प्राप्त जानकारी से ज्ञात हुआ है कि अदालतों द्वारा बमुश्किल दी गयी सजा के अनुपालन में ढील देकर ही ये सम्पत्तियां अर्जित की जाती हैं। मुकदमों को लम्बे समय तक टालने के बाद जो भी व्यक्ति जेल पहुँचता है वह अगर पैसे वाला या प्रभावशील हुआ तो जेल में जाते ही बीमार बन जाता है जिससे उसे सिक यूनिट में भेज दिया जाता है जहाँ उसे लेटने के लिए पलंग, कूलर, तथा डाक्टरों द्वारा बताया गया खाना मिलने लगता है, जो जेल में मिलने वाले पशुओं के समतुल्य भोजन की तुलना में बहुत शानदार होता है। इस सुविधा की कीमत चुकायी जाती है जो किसी भी पाँच सितारा होटल के कमरे व भोजन की कीमत से कई कई गुना होती है। पद और पैसे वाले व्यक्ति को जेल के कैदियों से अपनी सुरक्षा भी करना पड़ती है क्योंकि जेल अधिकारियों की मिली भगत से ऐसी परिस्तिथियां बना दी जाती हैं जिस कारण वे ऐसी सुरक्षा लेने के लिए विवश हो जाते हैं। बताया गया है कि जब पुराने खूंखार कैदी गालियां बकते हैं या उन पर हमला कर देते हैं तो जेलर की भाषा में इसे कैदियों की आपसी लड़ाई माना जाता है। अपने खूंखार तरीके से आतंक पैदा करने वाले कुछ कैदी हर जेल में जेलर द्वारा पाले जाते हैं जिनके साथ समझौता करा के जेलर उचित सुविधा शुल्क लेकर अमीर कैदी को, सुरुचिपूर्ण भोजन घर या होटल से मँगवाने की सुविधा देता है और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करता है। पैसा मिलने पर आदतन अपराधी कैदियों को मोबाइल भी उपलब्ध करा दिया जाता है जिससे वे जेल में बैठे हुए ही जेल से बाहर के दौलतवानों को डराते धमकाते रहते हैं और धर्मस्थल बनवाने आदि के नाम पर पैसे वसूल करते रहते हैं। जाहिर है कि इस वसूली के लिए अपराधी का एजेंट जेलर साहब के लिए भी उचित व्यवस्था करता है। कुछ जिलों में तो अपराधियों को रहजनी करने के लिए रात में छोड़ा भी जाता है ताकि वे कमाई करके ला सकें और पुलिस उन्हें गिरफ्तार भी नहीं कर सके। गाँव के कई लाइसेंसधारी तो अपनी बन्दूक भी इस काम के लिए किराये पर चलवाते हैं। जब जेलर अपराधी के जेल के अन्दर होने की पुष्टि कर रहा हो तब उसके खिलाफ रिपोर्ट कैसे हो सकती है। सर्वसुविधा सम्पन्न जेल उनकी सुरक्षागाह बनी रहती है।
       कैदियों के भोजन से खूब कमाई की जाती है क्योंकि उन्हें जेल के नियामानुसार भोजन नहीं दिया जाता। बहुत सारे न्यायाधीश तो जेल में गये बिना ही सब ठीक होने की निरीक्षण रिपोर्ट दे देते हैं। यह निरीक्षण रिपोर्ट कैदियों द्वारा बतायी गयी दशा से मेल नहीं खाती।  कैदियों द्वारा किये गये काम का पूरा भुगतान उनके जेल से छूटने पर दिया गया बताया जाता है पर जो आम तौर पर कैदी से दस्तखत लेने के बाद जेल अधिकारियों के पास ही रह जाता है। प्रभावशाली कैदियों को सुविधा शुल्क चुका कर बिना अदालती अनुमति के छुट्टियां तक मिलती रहती हैं। जो जितना खूंखार अपराधी होता है उसकी छुट्टी उतनी ही मँहगी होती है। देश विरोधी आतंकी घटनाओं के सम्बन्ध में कैद लोगों की उनके लोगों से मुलाकात करा देने की कीमत भी बहुत होती है।      
       एक जेलर का भ्रष्टाचार इसलिए अधिक गम्भीर है क्योंकि इससे समाज में जेल जाने के प्रति भय कम हो जाता है। जब पैसे से जेल में सारी असुविधाओं को निर्मूल किया जा सकता है तो व्यक्ति नैतिक होने की जगह सारा ध्यान किसी भी वैध अवैध तरीके से धन कमाने में लगा देता है। आंकड़े गवाह हैं कि सवर्ण जातियों और आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों को कम से कम सजाएं मिल सकी हैं तथा जिन्हें कभी भूले भटके मिलती भी हैं उन्हें उनके घर जैसी सुविधाएं मिलती रही हैं। कभी किसी ने मजाक में जेल को ससुराल कहा था किंतु उपरोक्त घटना बताती है कि पैसा होने पर यह सचमुच ससुराल जैसी बन सकती है। बताया गया है कि कतिपय कारागारों में तो सतत जुआ चलता रहता है और सट्टे के नम्बर भी लगते रहते हैं।
       ऐसा लगता है कि भोपाल जेल से भागने वाले कैदियों के एनकाउंटर को हम भूल ही गये हैं जबकि कैदियों के इतनी सरलता से भागने की कमजोरियां कम खतरनाक नहीं थीं। हम लोग आमतौर पर देर से मिलने वाले न्याय का रोना रोते रहते हैं किंतु जिन्हें न्याय सजा भी दे देता है, उन्हें भी क्या हमारे जेलर सजा देने का पालन करते हैं?  
वीरेन्द्र जैन
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