रविवार, जुलाई 30, 2017

पिछली सदी के छठे सातवें दशक की राजनीति का दुहराव

पिछली सदी के छठे सातवें दशक की राजनीति का दुहराव
वीरेन्द्र जैन
भारतीय जनता पार्टी अतीतजीवी पार्टी मानी जाती रही है जो इतिहास के मुगलकाल को बिल्कुल ही निकाल या बदल देना चाहती है और यही कारण रहा कि उसे स्वतंत्र मीडिया और जनता में रामलीला पार्टी से अधिक महत्व नहीं मिला था। दलित विमर्श के दौरान एक बार राजेन्द्र यादव ने कहा था कि जो लोग अतीत में सुविधा में [कम्फर्टेबिल] थे जैसे कि ब्राम्हण, तो वे अतीत की ओर ही जायेंगे, उसी काल को सर्वश्रेष्ठ मानेंगे व उसी के कथित गौरव को लाने की बात करेंगे, किंतु जो लोग असुविधा में थे जैसे कि दलित, तो वे लोग नये युग की बात करेंगे और अतीत की कढुवाहट से बाहर निकलने की कोशिश करेंगे। इससे ही भाजपा को पहचाना जा सकता है कि वह क्या चाहती है।
एक सेमिनार में भाजपा समर्थक एक प्रतिष्ठित पत्रकार ने दलबदल कानून को गलत बताया और उसे समाप्त करने की वकालत की। जिस दल के पास दौलत और दौलत वाले लोग होंगे वह दलबदल कानून का ही विरोधी नहीं होगा अपितु विचार के प्रति समर्पित राजनीति को भी पसन्द नहीं करेगा। उल्लेखनीय है कि जवाहरलाल नेहरू, और लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद काँग्रेस का जो आकर्षण घटने लगा और काँग्रेस का एकाधिकार टूटने लगा तब ही दलबदल युग का प्रारम्भ हुआ। पैसे वालों, और पूर्व राज परिवार के लोगों ने अपने खजाने खोल दिये व काँग्रेस के टिकिट पर जीत कर आये पद वंचित नेताओं को खरीदा जाने लगा। काँग्रेस ने भी स्वतंत्रता संग्राम के अपने इतिहास, भयभीत अल्पसंख्यक, और अहसानमन्द दलितों के भरोसे चुनाव जीतने के दम्भ में कभी राजनीतिक लोकतांत्रिक चेतना जगाने की जरूरत नहीं समझी थी। जनप्रतिनिधियों ने मूल्यहीन सत्ता का भरपूर दुरुपयोग करना शुरू कर दिया था और ऐसे ही लालच में पद वंचित काँग्रेसी एन केन प्रकारेण पद पाने की जुगाड़ में जुट गया था। इसी दौरान दल बदल कर पद और धन पाने का अवसर आया तो उन्होंने उसे निःसंकोच स्वीकार किया। काँग्रेस से भाजपा में आवागमन ऐसे हुआ जैसे लड़कियां मायके से ससुराल जाती हैं।
दलबदल के सहारे गैरकाँग्रेसी सरकारें बनवाने और ऐसी सब सरकारों में प्रमुख पद हथियाने में तब की जनसंघ और अब की भाजपा इसलिए सफल हो सकी क्योंकि उसके पास आरएसएस के रूप में एक संगठित, समर्पित और अनुशासित अन्ध समर्थकों का समूह था। वे प्रत्येक सिद्धांतहीन संविद सरकार में सम्मलित होते रहे। सब कुछ जानते हुए भी दलबदल के लिए होने वाले अनैतिक कामों के प्रति कभी संघ ने आपत्ति नहीं की। केन्द्र की सत्ता में भागीदारी के लिए उन्होंने अपने दल को जनता पार्टी में विलीन करना भी स्वीकार कर लिया व इस मामले में जयप्रकाश नारायण की भावना को भी पलीता लगाया। समाज को भ्रमित करते हुए वे अन्दर से संघ हितैषी ही बने रहे। यही कारण था कि दुहरी सदस्यता के आरोप पर ही देश की पहली गैरकाँग्रेसी केन्द्र सरकार का पतन हुआ था। दलबदल के कारण अनेक राज्य सरकारें खोने के बाद काँग्रेस को भी बात समझ में आयी और फिर उसने भी इसी तरीके को अपना कर वापिस सत्ता हथियाना शुरू कर दिया। दलबदल के डर से सरकारें सदैव खतरा महसूस करती रहती थीं।
1984 में श्रीमती इन्दिरा गाँधी की हत्या से निर्मित वातावरण में जब चुनाव हुये तो राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली काँग्रेस को दो तिहाई बहुमत प्राप्त हुआ। 1980 में संजय गाँधी की दुर्घटना में हुयी मृत्यु तक राजीव गाँधी राजनीति के प्रति उदासीन थे और बाद में उन्हें उनके अनचाहे राजनीति में लाया गया था। जब उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया गया तब यह आशंका पैदा हुयी कि सत्ताओं को संचालित करने वाले कुछ लोग दलबदल करा के उनकी सरकार को गिरा न दें, इसलिए उनके सलाहकारों ने तुरंत दलबदल विरोधी कानून लागू करवाया। इससे उनकी सरकार काफी दिन चल गयी भले ही वह अपना कार्यकाल पूरा न कर सकी हो। यह सच है कि वांछित स्तर तक विचार और सिद्धांत की राजनीति का विस्तार न हो सका पर इस कानून से दलबदल की घातक बीमारी पर अंकुश तो लगा था।
लगभग दो दशक बाद यह बीमारी फिर से एक नये रूप में उभर कर सामने आयी है। उल्लेखनीय है कि राजीव गाँधी के निधन के बाद सोनिया गाँधी भी राजनीति में आने के प्रति अनिच्छुक थीं और उन्होंने एक दशक तक खुद को दूर भी रखा पर जब स्वार्थी गुटों में विभाजित काँग्रेस किसी एक के नेतृत्व पर सहमत नहीं हो सकी तो खुद को अनाथ महसूस करते काँग्रेसी और परदे के पीछे देश चलाने वाला कार्पोरेट जगत उन्हें मना कर ले आये। उनका योगदान केवल इतना रहा कि काँग्रेस तुरंत दो फाड़ होने से बच गयी। बाद में राजनीति के गलत आकलन के कारण शरद पवार और ममता बनर्जी अपना अपना गुट लेकर काँग्रेस से अलग हो गये थे। जल्दी ही काँग्रेस ने यूपीए बना कर अटल बिहारी वाजपेयी की बाइस दलों की खिचड़ी सरकार से सत्ता वापिस ले ली। आहत भाजपा ने विदेशी मूल का मुद्दा उठा कर उन्हें प्रधान मंत्री नहीं बनने दिया, जिस कारण नौकरशाही की मानसिकता वाले मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनना पड़ा।
सत्ता वंचित भाजपाई किसी तरह सत्ता में वापिसी चाहते थे जिसके लिए उन्होंने प्रारम्भिक नानुकुर करने के बाद नरेन्द्र मोदी को अपना नेता स्वीकार कर लिया जो दुनिया भर में अपनी पहचान बना चुके थे भले ही वह पहचान नकारात्मक ही क्यों न हो। सत्ता के लिए उत्सुक भाजपाइयों को उनमें उम्मीद दिखी क्योंकि वे आर्थिक ईमानदारी, औद्योगिक विकास के साथ साथ दृड़ प्रशासक के रूप में भी जाने जाते थे। हिन्दू साम्प्रदायिकता से प्रभावित एक वर्ग उन्हें पसन्द करता था उनकी प्रबन्धन टीम ने काँग्रेसी राज्य के भ्रष्टाचार और अक्षमता को ऐसा धुँआधार प्रचार किया कि मोदी सकारात्मक दिखने लगे। प्रीपोल आदि से आतंकित काँग्रेसी व दूसरे दलों के सांसद भी घबराहट में आ गये और अपनी पार्टी छोड़ कर भाजपा से टिकिट पाने का जुगाड़ बैठाने लगे। कुछ विख्यात कलाकारों को जोड़ा गया और चुनाव प्रमुख की तरह लाये गये अमितशाह ने ऐसे लोगों का हर कीमत पर स्वागत किया। यह दलबदल का नया रूप था। इसी फार्मूले को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भी दुहराया गया। अमित शाह की सफलता से चमत्कृत भाजपा में उनकी अध्यक्ष पद पर नियुक्ति का विरोध नहीं कर सका।
अब राष्ट्रपति के चुनाव से लेकर राज्यसभा चुनावों तक यही खेल दुहराया जा रहा है और हाल यह है कि काँग्रेस को अपने विधायकों को बचा कर दूसरे राज्यों के होटलों में रुकाना पड़ रहा है। सत्तर साल के लोकतंत्र में  स्थिति ऐसी दयनीय है और इस व्यापार में क्रेता विक्रेता दोनों ही बराबर के जिम्मेवार हैं। अगर लोकतंत्र से लोगों का विश्वास कम होता गया तो देश को इराक अफगानिस्तान बनते देर नहीं लगेगी। अपने निजी स्वार्थों के लिए लोकतंत्र को कमजोर करने की लगातार कोशिशें खतरनाक हैं।
 वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629


        

शुक्रवार, जुलाई 28, 2017

फिल्म समीक्षा – लिपिस्टिक अन्डर माई बुरका

फिल्म समीक्षा – लिपिस्टिक अन्डर माई बुरका
स्त्री यौनिकता के वर्जित प्रश्न को उठाने की कोशिश

वीरेन्द्र जैन
प्रकाश झा इस बात के लिए जाने जाते हैं कि वे सतही सम्वेदनाओं वाले किशोर मानस के किस्सों वाले आम व्यावसायिक सिनेमा से अलग सामाजिक विषय उठाते हैं और उन पर बाक्स आफिस हिट फिल्में बनाते हैं। लिपिस्टिक अन्डर माई बुरका भी उन्हीं के प्रोडक्शन की फिल्म है जिसे उनकी सहायक रही अलंकृता श्रीवास्तव ने निर्देशित किया है। उनके प्रिय नगर भोपाल में फिल्मायी गई इस फिल्म में रत्ना पाठक और कोंकणा सेन को छोड़ कर अधिकांश सहायक कलाकार भोपाल के हैं।
यह संक्रमण काल है जिसमें बदलते आर्थिक ढांचों के कारण युवाओं की सोच और सपने तो बदल रहे हैं किंतु यह बदलाव अधूरा है क्योंकि समाज का आधा धड़ सामंती मिट्टी में गड़ा हुआ है और आधा पूंजीवादी मूल्यों की हवा में लहरा रहा है। सामंती समाज के युवाओं में बदलाव का साहस न होने के कारण उनके सपने कुंठाओं में ढल रहे हैं। यही कारण है कि उनमें से बहुत सारे युवा सामाजिक दबाव में अपना जीवन चोरों की तरह जी रहे हैं और अपराध बोध से पीले पड़ते जा रहे हैं। एक बड़े नगर में भी पुरानी परम्परा का दबाव इतना है कि अपना जीवन साथी स्वयं चुनने की कोशिश करने वाली लड़की को भी चरित्रहीन समझा जाता है। निर्भया कांड जैसे चर्चित यौन अपराधों के पीछे भी यही दृष्टि रही होगी और देर रात को अपने मित्र के साथ फिल्म देख कर लौट रही लड़की को नशे में धुत बस चालकों ने चालू लड़की समझ लिया होगा। दो भिन्न लिंग के युवाओं की मित्रता हमारा सामंती समाज समझ नहीं पाता है। दूसरी ओर बाज़ारवाद का फैलाव है, जो, अपने उत्पाद बेचने के लिए विज्ञापनों के द्वारा युवा भावनाओं को भड़काता रहता है व विज्ञापन फिल्मों के द्वारा किशोरों को उकसाता रहता है। खास आय वर्ग के लिए उत्पादित सौन्दर्य प्रसाधन इस तरह विज्ञापित किये जाते हैं कि मध्यमवर्गीय युवा वर्ग इन्हें जरूरी आवश्यकताएं समझने लगता है।
इस फिल्म में, इसी प्रभाव में आकर कम आय के टेलरिंग करने वाले परिवार की एक किशोरी बड़े माल और सुपर बाज़ार से मँहगी लिपिस्टिक से लेकर सौन्दर्य प्रसाधन की अन्य चीजें चुराने लगती है। युवाओं की पार्टियों में जाने के लिए वह चोरी से बुरका पहिन कर घर से निकलती है और बाहर जाकर अपने परिधान बदल आधुनिक बनने की कोशिश करती है, वह दुस्साहस करके परिवार में वर्जित लिपिस्टिक लगाती है, जींस पहिन लेती है व वर्जनाओं का विरोध करने वाले प्रदर्शनों में भाग लेती है। संक्रमण काल के इसी समाज में नवधनाड्यों व वैध-अवैध धन संग्रह करने वाले परिवारों के युवाओं की ऐसी दुनिया भी है जो पुरानी वर्जनाओं से मुक्त हो चुके हैं और मनमाना जीवन जी रहे हैं। राजनीतिक व्यवस्था से अनभिज्ञ समाज का अर्थशास्त्र न समझने वाले हजारों युवाओं के वे ही आदर्श बन रहे हैं। यही नासमझी निम्न मध्यमवर्ग के युवाओं को कुण्ठाग्रस्त बना रही है या अपराधी। चैन स्नेचिंग से लेकर बाइकें चुराने वाले छात्र और युवा जब पकड़े जाते हैं तो उनके अपराधों के पीछे यही कुण्ठाएं सामने आती हैं।
मनोवैज्ञानिक रिपोर्टों में कहा गया है कि महिलाओं में पुरुषों की तुलना में कई गुना यौनिकता होती है और यही कारण है कि उन्हें विभिन्न समाजों ने उन्हें कम स्वतंत्रता दी है व अधिक से अधिक बन्दिशें रखी हैं। गर्भधारण वाली देह होने के कारण महिलाओं की यौनिकता उन्हें मजबूर बना सकती है व परजीवी बनने को विवश करती है। शिशु पालन की जिम्मेवारी भी महिला पर आ पड़ती है इसलिए उसकी नैतिकिता ऐसी तय की गयी है कि उसे अपनी यौनिकता पर नियंत्रण रखना पड़ता रहा है। इसका उल्लंघन करने वालों को कठोर सामाजिक व शारीरिक दण्ड दिये जाते रहे हैं। अधिकांश मारपीट से लेकर जिन्दा जला देने की घटनाओं के पीछे महिलाओं की कथित स्वतंत्रता की कोशिश ही रहती आयी है, जिसे अनुशासनहीनता माना जाता है। परिवार नियोजन के साधनों के विकास ने महिलाओं को अनचाहे गर्भ धारण की  कमजोरी से सुरक्षा दी है, जिससे मुक्त होते ही वे भी अपनी देह पर अपना हक चाहती हुयी, स्वाभाविक यौनिकता को जीने के सपने देखने लगती है। फिल्म में ऐसी ही गरीब परिवार की दूसरी लड़की अपने प्रोफेशनल फोटोग्राफर मित्र के साथ निरंतर शारीरिक सम्बन्ध बनाते हुए भी अंततः आजीवन सुरक्षा देने वाले पुरुष की तलाश में रहती है जिसे पति कहा जाता है, व जिसके लिए शादी करना होती है।
तीसरी युवती एक मुस्लिम परिवार की विवाहित महिला है जिसका पति रोजी रोटी के लिए दुबई में काम करता है और चार छह महीने में जब भी आता है तो उसे गर्भवती कर जाता है जिसके कारण वह तीन बच्चों की माँ है व तीन बार गर्भपात करवा करके शारीरिक रूप से कमजोर भी हो चुकी है। बाज़ारवाद द्वारा सिखाये लाइफ स्टाइल को जीने के लिए वह पार्ट टाइम काम करती है और अपनी उपलब्धियों से पति को प्रभावित करने की कोशिश करती है किंतु उसका पति बिना सावधानी के केवल मशीनी सेक्स करने तक उसमें रुचि रखता है। अपनी संतुष्टि के लिए वह दूसरी महिलाओं से मित्रता रखता है। फिल्म के इस हिस्से में क्रोध में बदला लेने के लिए सेक्स करने का चित्रण यह स्पष्ट करता है कि साम्प्रदायिक दंगों के दौरान दूसरे धर्म की महिलाओं के साथ बलात्कार क्यों होते हैं। सुप्रसिद्ध लेखक राजेन्द्र यादव ने एक बार अपने सम्पादकीय में सवाल किया था कि सारी धर्म ध्वजाएं अंततः महिलाओं की योनि में ही क्यों गाड़ी जाती हैं।
चौथी महिला एक प्रौढ महिला है जिसका पति भोपाल गैस कांड का शिकार हो गया था, एक पुरानी हवेली छोड़ गया था। वह इसी हवेली में कई किरायेदार रख कर जरूरत भर गुजर कर रही है, ऊपर वर्णित किरदार भी उसी के किरायेदार हैं। उससे सहानिभूति रखने वाले और जरूरत पर मदद करने वाले लोग उससे परम्परागत नैतिक आचरण की उम्मीद करते हैं, जिसका वह घुट घुट कर निर्वहन भी करती है किंतु अपनी दैहिक भावनाओं को सहलाने के लिए अश्लील कहानियों की किताबें पढ कर मानस सुख लेती रहती है। इन्हीं कहानियों के प्रभाव में वह एक आकर्षक युवा से टेलीफोनिक संवाद का सुख लेने लगती है। उसकी उम्र और सौन्दर्य से अनभिज्ञ वह युवक पहले गलतफहमी में पड़ जाता है, किंतु जब भ्रम टूटता है तो वह उसका अपमान भी करता है। यही अपमान उसे अपने निकट के लोगों से भी मिलता है, जो गाहे बगाहे उसके मदद्गार भी होते हैं।
फिल्म कथात्मक नहीं है किंतु समाज के दोहरे चरित्र के एक हिस्से के अन्दर की सच्चाई को खोलने का  काम करती है। व्यंग्य के शिखर पुरुष हरिशंकर परसाई का पूरा रचना संसार इसी हिप्पोक्रेसी को उजागर करने का काम करता है जिसमें राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक सभी क्षेत्रों को छुआ गया है। यौनिकता के मामले में भी हमारा समाज बहुत पाखंडी है जिससे बहुत से विसंगतियां जन्म लेती हैं। बदलते समाज के अनुसार हमें नैतिकताएं बदलनी चाहिए किंतु उनमें अपना हित बना चुके समाज के लोग उन्हें जड़ बना कर रखे हुये हैं। फिल्म में जीवन के वे क्षण जिन्हें आम तौर पर गोपनीय माना जाता है उन्हें परदे पर सेंसर बोर्ड की अनुमति तक दिखाया गया है जो हमारी परम्परागत सोच को झटका देता है। कुछ लोग इसे अनावश्यक भी मान सकते हैं, और यह भी कह सकते हैं कि इन दृश्यों के बिना भी बात कही जा सकती थी, किंतु यह बात भी हमारी जड़ता की ही याद दिलाती है। टिकिट खिड़की पर समुचित भीड़ जुटाने में भी ऐसे टोटके काम आते हैं, क्योंकि न्यूनतम कमाई करना तो हर फिल्मकार का लक्ष्य होता ही है। चूंकि फिल्म में भावप्रवणता की कोई गुंजाइश नहीं थी इसलिए अनजाने से कलाकारों ने भी अपनी भूमिका का सही निर्वहन किया है जिसमें खामी खूबी ढूंढने की जगह नहीं है। भोपाल फिल्म निर्माण की नई जगह बनती जा रही है जिसमें बहुत सारे स्थल शूटिंग के उपयुक्त हैं। प्रकाश झा उनका कुशलता से उपयोग कर रहे हैं। अछूते विषय लेकर दर्शकों की रुचि को उनकी बुद्धि व भावनाओं के साथ जोड़ कर फिल्में बनना शुभ है, इसे प्रोत्साहन मिलना ही चाहिए।   
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, जुलाई 18, 2017

जेल के खेल से न्याय का मखौल

जेल के खेल से न्याय का मखौल  
वीरेन्द्र जैन

पिछले दिनों एक अखबार के एक पेज पर लोकायुक्त कार्यवाही की मध्यप्रदेश की चार खबरें एक साथ थीं
1-     इन्दौर के एक जीएम को दो लाख रिश्वत लेते हुए पकड़ा।
2-     एसडीओ को पचास हजार की रिश्वत लेते पकड़ा
3-     वैज्ञानिक को बीस हजार की रिश्वत लेते पकड़ा
4-     एक बाबू के यहाँ पचपन लाख की सम्पत्ति मिली
पहली तीन खबरें क्रमशः इन्दौर, धार, और इन्दौर के कैट की हैं जबकि चौथी खबर श्योपुर की है। प्रदेश में पिछले तीन वर्षों में 296 प्रकरणों में कार्यवाही हुयी। इस प्रदेश में शायद ही कोई सप्ताह ऐसा जाता हो जब किसी अफसर, इंस्पेक्टर, क्लर्क, चपरासी, ठेकेदार, व्यापारी, नेताओं के दलाल आदि के यहाँ आयकर या लोकायुक्त का छापा न पड़ता हो या और उस छापे में अकूत धन सम्पत्ति आदि न बरामद होती हो। बरामद की गयी ये अनुपातहीन सम्पत्ति रिश्वत, कमीशन, आदि के द्वारा अर्जित की जाती है जो या तो अदालत दर अदालत लम्बे चले मुकदमों के बाद वापिस उसी व्यक्ति के पास पहुँच जाती है, या मामूली जुर्माने आदि लगा कर मामले को रफा दफा कर दिया जाता है। विचाराधीन कैदी तो कभी कभी जेलों की शोभा बढा ही देते हैं किंतु अभी तक समुचित दण्डित भ्रष्टाचारियों को कैद रखने के लिए ये तरस ही रही हैं। यह अनुपातहीन सम्पत्ति कैसे कैसे और किस किस तरह के गलत काम कर कर के अर्जित की गयी होती है उसकी कोई ठीक ठाक पूछ परख नहीं की जाती ताकि भविष्य में उसके रोकने के लिए व्यवस्थाओं में सुधार किया जा सके। दण्ड देने के पीछे एक दृष्टिकोण यह भी होता है कि दूसरा कोई व्यक्ति वैसी ही गलती करने से डरे, किंतु रोचक यह है कि पकड़े गये व्यक्ति के बाद आने वाला उसका उत्तराधिकारी भी वैसे ही कामों में संलग्न हो जाता है और यदा कदा कुछ समय बाद उनमें से कुछ ऐसे ही पकड़े भी जाते हैं, जिसे वे खेल भावना की तरह लेते हुए कानून के छिद्रों से बच निकलने के लिए राजनेताओं से सम्बन्ध बनाने और कोई बड़ा वकील करने लगते हैं। इस बात पर कभी विचार नहीं किया गया कि क्यों लोकायुक्त आदि की कार्यवाही के बाद भी विभाग में भय नहीं व्याप्तता। स्मरणीय है कि देश के एक मुख्य सतर्कता आयुक्त ने सेवा निवृत्ति के अगले दिन ही कहा था कि देश का हर तीसरा आदमी [सरकारी कर्मचारी] भ्रष्ट है। उन्होंने यह भी कहा था कि इन भ्रष्टों में से कुल तीन प्रतिशत ही जाँच के दायरे में आ पाते हैं और उनमें से भी कुल चार प्रतिशत पर कानूनी कार्यवाही होती है।
       पिछले दिनों जिन आईएएस आफीसर्स, डिप्टी कलेक्टर्स्, इंजीनियर्स, रजिस्ट्रार, आरटीओ, निरीक्षक, आडीटर्स, स्टोरकीपर्स, एकाउंटेंट, पटवारी, चपरासी, आदि के यहाँ से छापों में जो करोड़ों की रकमें और सम्पत्तियाँ मिली हैं उनके बारे में तो एक अनुमान सा रहता है कि ये सम्पत्तियां कैसे भुगतान की फाइलें रोकने, काम में अड़ंगा लगाने, गलत फैसले लेने, झूठे बिल बनाने, प्राथमिकताएं बदलने, अपात्रों का प्रमोशन या स्थानांतरण करने आदि के द्वारा बनायी जाती हैं। अगर कोई सरकार चाहे तो पूरा हिसाब करके सारे लेने और देने वालों को एक घेरे में ला सकती है पर ये काम सरकार के कामों की प्राथमिकताओं में नहीं आता जिसका कारण भी मंत्रियों आदि राजनेताओं की अनुपात हीन सम्पत्ति वृद्धि को देख कर अनुमानित किया जा सकता है।
       2012 में इन्दौर की सेन्ट्रल जेल अधीक्षक के यहाँ छापे में जितनी बड़ी मात्रा में सम्पत्तियां मिली थीं वे चौंकाने वाली थीं। इस छापे में पकड़ में आयी सम्पत्ति की कुल कीमत लगभग पन्द्रह करोड़ बतायी गयी थी। इनमें भोपाल की पाश कालोनी में तीन आलीशान मकान, एक गर्ल्स हास्टल, चार दुकानें पाँच प्लाट, 14 एकड़ कृषि भूमि व इन्दौर के विकास प्राधिकरण की योजनाओं में दो प्लाट सम्मलित थे। छापे के दौरान ही सम्बन्धित अधीक्षक के लड़के ने दो लाख रुपयों की पोटली बना कर खिड़की से सड़क पर फेंक दिये थे जिसे दो पुलिस कानिस्टबलों द्वारा देख लिये जाने से वे बरामद हो गये थे। अगले दिन जब उनका लाकर खोला गया तो उसमें ग्यारह लाख रुपये बरामद हुये। सवाल उठता है कि जिस जेल अधीक्षक का कुल अर्जित वेतन 39 लाख के आस पास ही बैठता हो उसके पास 15 करोड़ कीमत की सम्पत्तियां सरकार और कानून को किस तरह से चूना लगा कर एकत्रित हो गयीं! कर्नाटक के जेल अधीक्षक द्वारा तामिलनाडु की नेत्री शशिकला को फाइव स्टार सुविधाएं प्रदान करने व बदले में दो करोड़ रुपये प्राप्त करने का आरोप लगाया गया है। अगर इसे एक नमूने की तरह देखा जाये तो समझा जा सकता है कि जेल अधिकारियों के पास धन कैसे कैसे एकत्रित होता है।
       जेल जाने के अनुभवों से सम्पन्न विभिन्न व्यक्तियों से प्राप्त जानकारी से ज्ञात हुआ है कि अदालतों द्वारा बमुश्किल दी गयी सजा के अनुपालन में ढील देकर ही ये सम्पत्तियां अर्जित की जाती हैं। मुकदमों को लम्बे समय तक टालने के बाद जो भी व्यक्ति जेल पहुँचता है वह अगर पैसे वाला या प्रभावशील हुआ तो जेल में जाते ही बीमार बन जाता है जिससे उसे सिक यूनिट में भेज दिया जाता है जहाँ उसे लेटने के लिए पलंग, कूलर, तथा डाक्टरों द्वारा बताया गया खाना मिलने लगता है, जो जेल में मिलने वाले पशुओं के समतुल्य भोजन की तुलना में बहुत शानदार होता है। इस सुविधा की कीमत चुकायी जाती है जो किसी भी पाँच सितारा होटल के कमरे व भोजन की कीमत से कई कई गुना होती है। पद और पैसे वाले व्यक्ति को जेल के कैदियों से अपनी सुरक्षा भी करना पड़ती है क्योंकि जेल अधिकारियों की मिली भगत से ऐसी परिस्तिथियां बना दी जाती हैं जिस कारण वे ऐसी सुरक्षा लेने के लिए विवश हो जाते हैं। बताया गया है कि जब पुराने खूंखार कैदी गालियां बकते हैं या उन पर हमला कर देते हैं तो जेलर की भाषा में इसे कैदियों की आपसी लड़ाई माना जाता है। अपने खूंखार तरीके से आतंक पैदा करने वाले कुछ कैदी हर जेल में जेलर द्वारा पाले जाते हैं जिनके साथ समझौता करा के जेलर उचित सुविधा शुल्क लेकर अमीर कैदी को, सुरुचिपूर्ण भोजन घर या होटल से मँगवाने की सुविधा देता है और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करता है। पैसा मिलने पर आदतन अपराधी कैदियों को मोबाइल भी उपलब्ध करा दिया जाता है जिससे वे जेल में बैठे हुए ही जेल से बाहर के दौलतवानों को डराते धमकाते रहते हैं और धर्मस्थल बनवाने आदि के नाम पर पैसे वसूल करते रहते हैं। जाहिर है कि इस वसूली के लिए अपराधी का एजेंट जेलर साहब के लिए भी उचित व्यवस्था करता है। कुछ जिलों में तो अपराधियों को रहजनी करने के लिए रात में छोड़ा भी जाता है ताकि वे कमाई करके ला सकें और पुलिस उन्हें गिरफ्तार भी नहीं कर सके। गाँव के कई लाइसेंसधारी तो अपनी बन्दूक भी इस काम के लिए किराये पर चलवाते हैं। जब जेलर अपराधी के जेल के अन्दर होने की पुष्टि कर रहा हो तब उसके खिलाफ रिपोर्ट कैसे हो सकती है। सर्वसुविधा सम्पन्न जेल उनकी सुरक्षागाह बनी रहती है।
       कैदियों के भोजन से खूब कमाई की जाती है क्योंकि उन्हें जेल के नियामानुसार भोजन नहीं दिया जाता। बहुत सारे न्यायाधीश तो जेल में गये बिना ही सब ठीक होने की निरीक्षण रिपोर्ट दे देते हैं। यह निरीक्षण रिपोर्ट कैदियों द्वारा बतायी गयी दशा से मेल नहीं खाती।  कैदियों द्वारा किये गये काम का पूरा भुगतान उनके जेल से छूटने पर दिया गया बताया जाता है पर जो आम तौर पर कैदी से दस्तखत लेने के बाद जेल अधिकारियों के पास ही रह जाता है। प्रभावशाली कैदियों को सुविधा शुल्क चुका कर बिना अदालती अनुमति के छुट्टियां तक मिलती रहती हैं। जो जितना खूंखार अपराधी होता है उसकी छुट्टी उतनी ही मँहगी होती है। देश विरोधी आतंकी घटनाओं के सम्बन्ध में कैद लोगों की उनके लोगों से मुलाकात करा देने की कीमत भी बहुत होती है।      
       एक जेलर का भ्रष्टाचार इसलिए अधिक गम्भीर है क्योंकि इससे समाज में जेल जाने के प्रति भय कम हो जाता है। जब पैसे से जेल में सारी असुविधाओं को निर्मूल किया जा सकता है तो व्यक्ति नैतिक होने की जगह सारा ध्यान किसी भी वैध अवैध तरीके से धन कमाने में लगा देता है। आंकड़े गवाह हैं कि सवर्ण जातियों और आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों को कम से कम सजाएं मिल सकी हैं तथा जिन्हें कभी भूले भटके मिलती भी हैं उन्हें उनके घर जैसी सुविधाएं मिलती रही हैं। कभी किसी ने मजाक में जेल को ससुराल कहा था किंतु उपरोक्त घटना बताती है कि पैसा होने पर यह सचमुच ससुराल जैसी बन सकती है। बताया गया है कि कतिपय कारागारों में तो सतत जुआ चलता रहता है और सट्टे के नम्बर भी लगते रहते हैं।
       ऐसा लगता है कि भोपाल जेल से भागने वाले कैदियों के एनकाउंटर को हम भूल ही गये हैं जबकि कैदियों के इतनी सरलता से भागने की कमजोरियां कम खतरनाक नहीं थीं। हम लोग आमतौर पर देर से मिलने वाले न्याय का रोना रोते रहते हैं किंतु जिन्हें न्याय सजा भी दे देता है, उन्हें भी क्या हमारे जेलर सजा देने का पालन करते हैं?  
वीरेन्द्र जैन
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लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करता लालू नितीश विवाद

लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करता लालू नितीश विवाद
वीरेन्द्र जैन

एक आम नागरिक को समझने में मुश्किल हो सकती है कि लालू नितीश विवाद से बिहार सरकार पर उठा संकट क्या वही है जो मीडिया में दिख रहा है या इसकी जड़ें कहीं और हैं?  
बिहार में आज जो राजनीति है वह 1974 के जयप्रकाश नारायण द्वारा चलाये सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन की उपज है। लालू के नेतृत्व वाला राजद, नितीश के नेतृत्व वाला जेडीयू और सुशील मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा ही प्रमुख दल हैं और तीनों के नेता कभी छात्र, युवा नेताओं के रूप में एक साथ हुआ करते थे। तीनों में कुछ कुछ समाजवादियों जैसी अच्छी बुरी आदतें विद्यमान हैं। बाद में भाजपा के प्रभाव वाले सुशील मोदी ने अपना मार्ग बदला तो नितीश और लालू मण्डल के प्रभाव में चेतन हुयीं पिछड़ी जातियों के प्रभाव वाले जनता दल में उभरे। इसके कुछ समय बाद देशी छवि, देशी बोली, और रोचक टिप्पणियां करने वाले लालू ने अपने क्रियाकलापों से मीडिया में ज्यादा जगह पायी और नितीश से बढत बना ली। महात्वाकांक्षी नितीश ने जार्ज फर्नांडीज के संरक्षण में अपना रास्ता अलग कर लिया। देखा गया है कि इस तरह की तमाम पार्टियां चुनाव जीतने के लिए कुछ भी करें किंतु मूलतयः वे काँग्रेस ही होती हैं और सत्ता में आने के बाद वे वही कुछ करती हैं जिसके लिए कभी काँग्रेस को कोसा करती थीं। लालू प्रसाद मुख्यमंत्री बने तो चारा घोटाला सामने आया। मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा तो अपनी राजनीतिक अनपढ पत्नी को मुख्यमंत्री बनवा कर परिवारबाद का भोंड़ा प्रदर्शन किया एवं दुर्दांत अपराधियों तक को पार्टी और सरकार में सम्मलित कर अपराध की दुनिया को वैधता दिलायी। वहीं दूसरी ओर रक्त की लकीर छोड़ कर आने वाले रथयात्री अडवाणी को गिरफ्तार करके धरमनिरपेक्षता के पक्ष में हिंसा का मुकाबला करने में आगे रहे व मुँहजोरी करने वालों से उन्हीं की भाषा और तौर तरीकों में मुकाबला भी करते रहे। हिन्दू गोलबन्दी में सबसे जुझारू पिछड़े वर्ग के बड़े हिस्से को सम्मिलित होने से रोक कर देशव्यापी सामाजिक पर अंकुश रखा।  
नितीश कुमार ने अटलबिहारी की सरकार में सम्मलित होकर अपनी छवि पर सवाल खड़े होने दिये। दूसरी ओर राज्य में भाजपा के साथ सरकार बनायी और तब तक चलायी जब तक कि नरेन्द्र मोदी के साथ हाथ मिला कर खड़े होने वाला पोस्टर भाजपा ने जारी नहीं कर दिया। ऐसा पोस्टर चुनाव में नुकसान पहुँचा सकता था, वैसे नरेन्द्र मोदी से उन्हें बहुत ज्यादा शिकायत नहीं रही। अपने मुख्यमंत्री काल में उन्होंने अपने ऊपर आर्थिक भ्रष्टाचार का कोई कलंक नहीं लगने दिया, और छवि साफ बनाये रखी। जब विधानसभा चुनावों के दौरान उन्हें लालूप्रसाद से समझौता करना पड़ा तो उनकी छवि के बिगड़ने का सवाल ही पूछा गया था, किंतु लोकसभा चुनाव में हारने के बाद उनकी मजबूरी थी। भाजपा ने तो जीतन राम माँझी तक को समर्थन देकर नितीश के सारे अहसान भुला दिये थे।  अरविन्द केजरीवाल भी उनके समर्थन में सरकारी कार्यक्रम का बहाना बना कर आये और लालू प्रसाद को दूर रखा।
आक्रामक भाजपा के प्रबन्धन से बचने के लिए जेडीयू, राजद को काँग्रेस को साथ लेकर मोर्चा बनाना पड़ा और चुनाव जीत कर साथ में सरकार बनाना पड़ी। संयोग से परिणाम ऐसे आये कि राजद की संख्या को सम्मलित किये बिना जेडीयू की सरकार नहीं बन सकती थी या उन्हें उस भाजपा से सहयोग करना पड़ता जिस पर अनेक आरोप लगा कर वे छोड़ चुके थे। सीटों की संख्या अधिक होने के बाद भी राजद के लालू प्रसाद मुख्यमंत्री बनने से वंचित थे इसलिए अपने एक बेटे को उपमुख्यमंत्री और दूसरे को स्वास्थमंत्री बना कर ही वे नितीश मंत्रिमण्डल पर अपना वर्चस्व बनाये रख सकते थे। केन्द्र की भाजपा सरकार ने इसी स्थिति का लाभ लेते हुए ऐसी परिस्तिथि पैदा कर दी कि उपमुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देने पर लालू के बेटे को हिरासत में लेकर पूछताछ भी हो सकती है। भले ही लालूजी ने औपचारिक कागजी कार्यवाही करके रखी हो किंतु प्रथम दृष्ट्या ही ऐसा लगता है कि कहीं कुछ गड़बड़ है। वे इसे राजनीतिक बदले की कार्यवाही बता रहे हैं, पर ऐसा होते हुए भी वह निराधार नहीं है। अब अगर नितीश तेजस्वी को पद पर बनाये रखते हैं तो ईमानदारी की छवि की इकलौती पूंजी से हाथ धो बैठते हैं और लालूजी की सहमति के बिना हटा देने पर सरकार से हाथ धो बैठॆंगे। लालू इस विडम्बना का लाभ लेने की मानसिकता में हैं।  दूसरा उपाय फिर से भाजपा की शरण में जाना है और इस समय ऐसा करके वे वह गुलामी स्वीकारेंगे जिससे भाजपा के पुराने पुराने लोग तक घबराये हुये हैं। यदि वे ऐसा करेंगे तो धरमनिरपेक्षता की बचीखुची छवि से हाथ धो बैठेंगे। राष्ट्रपति चुनाव में धरमनिरपेक्ष दलों के गठबन्धन का विरोध करके वे वैसे ही अपने साथियों की निगाह में खटक चुके हैं। एक संभावना यह बनती है कि राजद के अस्सी में से साठ विधायक विद्रोह करके नितीश के साथ आ जायें या पूरी भाजपा दलबदल करके नितीश का समर्थन करे जो सम्भव नहीं है।
जिस आरोप में लालू को घेरा गया है वह राजनीतिक जगत में अनूठा नहीं है। भाजपा शासित प्रदेशों में बहुत बड़ी संख्या में ऐसे मंत्री भरे पड़े हैं पर जानबूझकर उनको संरक्षण दिया जा रहा है, भले ही यह किसी पर लगे आरोपों से बचत का उचित आधार नहीं है। लालू प्रसाद के विधायक भी उसी प्रणाली से जीत कर आये हैं जिससे नरेन्द्र मोदी आये हैं या प्रदेशबदर का दंश झेल चुके अमित शाह या येदुरप्पा या और सैकड़ों आते हैं। वसुन्धरा राजे और सुषमास्वराज पर ललित मोदी की मदद करने के भी इसी स्तर के आरोप हैं। भाजपा ने चुनाव में जो धन खर्च किया और जहाँ से व जैसे प्राप्त कर के किया वह बहुत छुपा नहीं है। पर ये सब संवैधानिक तरीके से चुन कर आते हैं और संख्या बल के आगे नैतिक मूल्यों की कोई गिनती नहीं होती। बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, व महाराष्ट्र में खूंखार अपराधी निरंतर चुनाव जीतते जाते हैं और उन्हें चुनाव से वंचित करने से सम्बन्धित सवाल सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूछे जाने पर निर्वाचन आयोग कोई जबाब नहीं दे पाता।
जब ऐसे संकट आते हैं तो चुनाव प्रणाली में सुधार की जरूरतें तेजी से महसूस होती हैं किंतु विधायिका का जो हिस्सा इन्हीं कमजोरियों से लाभान्वित होकर सत्ता का सुख ले रहा होता है वह कोई परिवर्तन नहीं चाहता। क्या हम चुनावी दलों की कार्यप्रणालियों को और अधिक नियमबद्ध नहीं कर सकते, जिससे लोकतंत्र की भावना सुरक्षित रहे।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629
           

   

रविवार, जुलाई 09, 2017

फिल्म समीक्षा –माम मैम से माम बनने की यात्रा

फिल्म समीक्षा –माम
मैम से माम बनने की यात्रा  
वीरेन्द्र जैन

फिल्मों के प्रचार के लिए हिन्दी अखबारों और पत्रिकाओं का बहुत सा हिस्सा फिल्मी दुनिया की गपशप से भरा हुआ होता है जिसमें तन मन से युवा पाठकों को सतही सम्वेदनाओं में लपेट कर तरह तरह की झूठी सच्ची सूचनाओं के सहारे जोड़ा जाता है। माम फिल्म को किसी समय की चर्चित अभिनेत्री श्रीदेवी की सौवीं फिल्म और पन्द्रह साल बाद वापिसी आदि से जोड़ कर प्रचारित किया गया था। वस्तुतः यह फिल्म एक ममतामयी सौतेली माँ के विश्वास अर्जन की मूल कथा है जिसमें वह लम्बे समय तक पूरा प्रयास करके भी अपनी अपनी सौतेली बेटी का प्यार नहीं जीत पा रही थी। इसी ग्रंथि ने उसे अपनी इस बेटी के साथ दुष्कर्म कर उसे जीवन भर की मानसिक यातना देने वालों से बदला लेने को प्रेरित किया। जब वह काँपते हाथों से अपराधी पर गोली चलाने न चलाने के द्वन्द में थी उसी समय स्कूल टीचर के रूप में काम करने वाली माँ को हमेशा मैम के नाम से पुकारने वाली बेटी का उसको माम कह कर सम्बोधित करना उसे माँ के गौरव से भर देता है।
इस फिल्म को खूबसूरती के लिए भी याद किया जा सकता है। खूबसूरत शहर में खूबसूरत स्कूल है, खूबसूरत सड़कें हैं, खूबसूरत अस्पताल हैं, क्लब हैं, इमारतें हैं, पेंटिंग प्रदर्शनियां हैं, इसमें एक खूबसूरत घर है जिसमें खूबसूरत सम्पन्न परिवार है। परिवार में सभी एक दूसरे को प्यार करते हैं, भले ही सौतेली बेटी अपनी दिवंगत माँ की याद में दूसरी माँ को यथोचित स्थान नहीं दे पाती और दूसरी माँ अपनी खुद की बेटी के बराबर प्यार प्रकट करने के लिए उस पर माँ के जरूरी अनुशासन को शिथिल करती है। कथानक इसी द्वन्द से पैदा होता है। पिता अपने काम से अमेरिका गया होता है और उसी समय वेलंटाइन डे की लेट नाइट पार्टी में गयी हुयी बेटी के साथ धनाड्यों के बिगड़ैल बेटे उसका अपहरण करके बलात्कार कर नाले में फेंक देते हैं। बहुत घायल होकर भी वह किसी तरह मौत के मुँह में जाने से बच जाती है, पर एक निर्दोष के साथ अन्याय न होने देने के लिए हजार दोषियों को छोड़ देने वाली न्याय व्यवस्था उसे न्याय नहीं दे पाती, जिससे किसी भी तरह बदला लेने की भावना पैदा होती है।
 इस फिल्म के दूसरे आयाम में सामाजिक चुनौतियों के विषय सामने आते हैं जिसमें पैसे वालों के किशोर बच्चे रोक के बाद भी स्कूल में मोबाइल ले जाते हैं और उसमें वह सब कुछ देखते दिखाते हैं जो उन्हें नहीं देखना चाहिए। बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार अपराधी भी न्यायिक कमजोरियों के कारण छूट कर स्वतंत्र घूम कर उपहास सा करते हैं तो एक शांतिप्रिय नागरिक भी कानून की जगह गैर कानूनी तरीकों को अपनाने को विवश हो जाता है। इस फिल्म में शायद पहली बार थर्ड ज़ेंडर की शिक्षा और उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने के सवाल को उठाया गया है, जिसमें वे शिक्षित होकर अपना व्यवसाय खुद खोलते हैं, भले ही फिल्म में उनका उपयोग गुरु दक्षिणा के रूप में बदले की कार्यवाही में सहयोगी की तरह किया गया है।
इस फिल्म में कानून से निराश होकर बदला लेने के लिए नये तरीके सोचे गये हैं जिनमें सूचना एकत्रित करने वाले प्राइवेट जासूस की भूमिका भी रची गयी है, जिसका प्रचलन अभी समाज में शादी व्याह के सम्बन्ध में लड़के लड़कियों से सम्बन्धित जानकारी जुटाने तक ही सीमित है। इस प्रतिभा का उपयोग अपराधियों के बारे में जानकारी जुटाने के लिए भी हो सकता है। जेल में पैसे वाले परिवारों के कैदियों, और किशोरों के साथ दूसरे बन्दियों द्वारा होने वाले दुर्व्यवहार की भी थोड़ी झलक भी है। एक ओर जहाँ बलात्कार के दोषियों को कानूनी कमजोरियों के कारण सजा नहीं मिल पाती वहीं दूसरी ओर इनसे बदला लेने के लिए नायिका गलत सबूत देकर उसे उस बात के लिए सजा दिलवा देती है जो अपराध उसने किया ही नहीं था। इसी न्याय व्यवस्था से असंतुष्ट पुलिस अधिकारी दुर्दांत अपराधी पर गोली चलाने के लिए खुद ही नायिका को सहयोग करता है।
न्यायिक कमजोरी के अलावा सबकुछ सुन्दर बनाने के लिए कहानी के अंत को बम्बइया बना दिया गया जिसमें ठीक समय पर आकर पुलिस नायक नायिका को बचा लेती है और अपराधी मारा जाता है। अपराधी हिमालय की खूबसूरत वादियों में कुछ ही घंटों में पहुँच जाता है, और ईमानदार पुलिस भी ठीक समय पर पहुँच जाती है। चौकीदार के घर को छोड़ कर फिल्म में स्वच्छता इतनी अधिक है जैसे कि देश में स्वच्छता अभियान सफल हो गया हो। ऐसी प्रस्तुति फिल्म को एक मनोरंजक व्यावसायिक फिल्म में बदल देती है।
फिल्म में सबका अभिनय सधा हुआ है, एक प्रौढ मां के रूप में श्रीदेवी, जासूस के रूप में नवाजुद्दीन सिद्दीकी, पुलिस अधिकारी के रूप में अक्षय खन्ना व पिता की भूमिका में अदनान सिद्दीकीकी मुख्य भूमिकाएं हैं जिसे निभाने में वे पूरी तरह सफल हुये हैं। पहली फिल्म का सफल निर्देशन करके चित्रकार रवि उदयावर खरे ने बहुत उम्मीदें जगायी हैं। लगातार बाँधे रखने वाली आम व्यावसायिक फिल्मों से तो यह बहुत अच्छी फिल्म है किंतु सार्थक सिनेमा से दूर है।  
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, जून 26, 2017

राष्ट्रपति का चुनाव और सामाजिक दशा के संकेत

राष्ट्रपति का चुनाव और सामाजिक दशा के संकेत
वीरेन्द्र जैन

              राष्ट्रपति पद के चुनाव परिणाम से देश की राजनीति पर सीधे सीधे कोई प्रभाव भले ही नहीं पड़े किंतु इससे देश और समाज की दशा को समझने में मदद जरूर मिलेगी क्योंकि इस चुनाव में व्हिप जारी नहीं हो सकता। स्मरणीय है कि 1969 में यह राष्ट्रपति का चुनाव ही था जिसके सहारे श्रीमती गाँधी ने अपनी सरकार पर अपने ही वरिष्ठ साथियों की कुदृष्टि के संकेत समझे थे और साहसपूर्ण फैसले लेकर अपनी पार्टी के उम्मीदवार को हरवाने के लिए आत्मा की आवाज पर वोट देने का आवाहन किया था। उसी चुनाव में पहली बार वामपंथियों के प्रस्ताव पर उम्मीदवार बने व्ही व्ही गिरि सत्तारूढ काँग्रेस के प्रत्याशी नीलम संजीव रेड्डी को हरा कर विजयी हुये थे। इसी दौर में सरकार के अल्पमत में आने के खतरे को देख कर श्रीमती गाँधी ने वामपंथी पार्टियों से समर्थन मांगा था और उसके बदले में बड़े बैंकों व बीमा कम्पनियों के राष्ट्रीयकरण और राजाओं के प्रिवीपर्स व विशेषाधिकार को समाप्त करने की घोषणा की थी। यही वह समय था जब श्रीमती गाँधी को अपनी पार्टी की छवि बदलने के लिए समाजवाद और गरीबी हटाओ का नारा उछालना पड़ा था। इसी के बाद हुये लोकसभा चुनावों में उन्होंने काँग्रेस की गिर चुकी साख को फिर से प्राप्त कर अभूतपूर्व समर्थन पाया था। पाकिस्तान के विभाजन में भारत की भूमिका निभाने में सोवियत संघ का समर्थन व अमेरिका द्वारा सातवें बेड़े का भेजा जाना भी एक बड़ी घटना थी। इसी के बाद श्रीमती गाँधी के खिलाफ देश भर में दक्षिणपंथी शक्तियां सक्रिय हो गयीं थीं जिन्हें श्रीमती गाँधी ने अमेरिका के इशारे पर प्रेरित फासिस्ट ताकतें बताया था और उनके आन्दोलन को दबाने के लिए इमरजैंसी का सहारा लिया था। यह चुनाव भी जिन परिस्तिथियों में हो रहा है उसमें शक्तियों की पहचान, उनके नये गठबन्धनों का निर्माण और पुराने के विघटन देखने को मिल सकते हैं, जिससे शक्ति संतुलनों में उथल पुथल हो सकती है। यह चुनाव भी देश की राजनीति में परिवर्तन ला सकता है।
उल्लेखनीय है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी की उम्मीदवारी पर समुचित विवाद रहा था और गहरा असंतोष पैदा हुआ था। अडवाणी इस पद के लिए भाजपा में सबसे वरिष्ठ, अनुभवी, सम्मानित व सुपात्र व्यक्ति थे इसके विपरीत नरेन्द्र मोदी की छवि ऐसी थी कि दुनिया के प्रमुख देशों ने उन्हें वीजा देने तक से मना कर दिया था। अनेक विधायकों पर मुसलमानों के नरसंहार से लेकर हत्याओं तक के गम्भीर आरोप थे जिन्हें जानते समझते हुए भी उन्होंने टिकिट ही नहीं दिया था अपितु मंत्रिमण्डल में भी रखा था। दूसरी ओर औद्योगिक राज्य गुजरात के आर्थिक विकास से जुड़ा कार्पोरेट घरानों का समर्थन और उन पर आर्थिक भ्रष्टाचार का कोई आरोप न होना उनके पक्ष में जाता था। हिन्दू साम्प्रदायिकता से प्रभावित एक वर्ग उन्हें नायक की तरह देखता था। नरेन्द्र मोदी ने चुनाव में जीत का कुशल प्रबन्धन करके वह जीत दिलवा दी जिसके लिए भाजपा और उसकी मातृ संस्था आरएसएस बरसों से तरस रही थी। इस जीत के साथ साथ उन्होंने पार्टी की कमान भी सम्हाल ली और अनेक आरोपों से घिरे रहे अपने दाहिने हाथ अमित शाह को पार्टी अध्यक्ष बनवा दिया। जीत के साथ ही उन्होंने भाजपा में पार्टी नाम के अलावा बहुत कुछ बदल दिया। वरिष्ठ नेताओं को मार्ग दर्शक मण्डल के नाम पर मुख्य धारा से किनारे कर दिया। पार्टी के नाम की जगह केवल मोदी मोदी होने लगा। अटल बिहारी वाजपेयी के कथित फील गुड को कभी याद नहीं किया गया और उसे भी काँग्रेस के सत्तर साला शून्य उपलब्धियों के काल में मिला कर प्रचारित किया। अटल अडवाणी के चित्रों को पोस्टर पर छापने की परम्परा समाप्त कर दी गयी। मीडिया को अपने प्रिय कार्पोरेट घरानों से खरीदवा दिया, बाहर वालों को सरकारी विज्ञापन प्रबन्धन से अनुकूल बनाया या साम दाम दण्ड भेद से उन्हें बाजार से बाहर करवा दिया। सोशल मीडिया पर ट्रालर बैठा दिये। विपक्षियों के स्कैम या उन्हें हास्यास्पद बना कर उनकी चरित्र हत्या की जाने लगी। 
 प्रबन्धन से अर्जित जीत में अनेक सदस्य दूसरे दलों से दल बदल करा के लाये गये थे, तो पुराने सदस्यों में से भी अनेक सत्ता का मतलब वैसा ही निजी आर्थिक हित मान कर चलते थे जैसा कि पिछली सरकारों में होता रहा था। समस्त प्रयासों से गढी गयी अपनी छवि को बचाना था इसलिए मोदी ने उस कीमत पर उनकी इच्छा पूरी नहीं होने दी। सांसद निधि को एक आदर्श गाँव तक सीमित करके उससे होने वाली कमाई पर नियंत्रण लगा दिया। सबको सम्पत्ति की जानकारी देने को कहा गया तथा मंत्रिमण्डल गठन में महात्वाकांक्षी लोगों को दूर रखा गया। जैटली जैसे अपवाद को छोड़ कर मंत्रिमण्डल के शेष सदस्य पीएम कार्यालय से नियंत्रित अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत फाइलों पर दस्तखत करने का कार्य करने को विवश हुये। विभाग के फैसले लेना उनका काम नहीं रह गया। नोटबन्दी का गलत फैसला, विदेश नीतियों की असफलता, साम्प्रदायिक तत्वों पर नियंत्रण न कर पाना, कश्मीर जैसी समस्याओं को ठीक से संचालित नहीं करना, तथा ढेर सारी चुनावी घोषणाओं की पूर्ति न होने से सांसदों को जनता से सामना करना कठिन लगने लगा। रोजगार के अवसर नहीं जुटाये जा सके, किसानों को घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं दिया गया। राज्यों में भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं लगा जिससे केन्द्र की सावधानी निरर्थक हो गयी। इन सब को टालने के लिए भावुक मुद्दों को छोड़ा जाने लगा। सांसद अपनी सरकार से खुश नहीं हैं। उन्हें विश्वास में नहीं लिया जाता, इसलिए ऐसा लगता है कि केवल वेतन लेने और सदन में समर्थन करने से ज्यादा उनकी कोई जिम्मेवारी नहीं है। उन्हें लगता है कि उनकी कोई विशिष्टता नहीं है।
राष्ट्रपति के उम्मीदवार के चयन में अनावश्यक गोपनीयता ही नहीं बरती गयी, अपितु किसी से सलाह ही नहीं ली गयी। नामांकन प्रस्ताव के खाली फार्मों पर दस्तखत करा के मंगा लिये गये। यही हाल नोटबन्दी से लेकर दूसरे अनेक फैसलों में भी किया गया जो असफल रहे। गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम, वालंटरी डिस्क्लोजर स्कीम, विदेश में जमा धन की वापिसी आदि योजनाएं पूरी तैयारी के बिना लागू किये जाने से असफल हो गयीं। राष्ट्रपति के चयन में दलित उम्मीदवार के चयन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पिछले दिनों रोहित वेमुला की आत्महत्या, गुजरात के ऊना में दलितों की पिटाई का वीडियो, सहारनपुर की भीम सेना, आदि के कारण दलित उम्मीदवार उतारा गया है। आरक्षण के कारण दलित समुदाय के लोग सांसद और मंत्री भले ही हों किंतु उनकी नेतृत्व में भागीदारी नहीं है। इसी असंतोष प्रबन्धन के लिए ऐसा दलित उम्मीदवार उतारा गया जो औपचारिकता की पूर्ति तो करता है किंतु उस वर्ग का नेतृत्व नहीं करता, न ही पक्षधरता करके उनके मुद्दों को सम्बोधित करता रहा है।
1975 की इमरजैंसी के बारे में कहा गया था कि लोगों से झुकने के लिए कहा गया तो वे लेट गये। इस अघोषित इमरजैंसी में इसका पुनर्परीक्षण हो सकता है, चुप्पियों के अर्थ निकल सकते हैं। अडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार, येदुरप्पा, यशवंत सिन्हा आदि पद के लिए दुखी भले ही न हों किंतु अपने अपमान के लिए अवश्य ही दुखी हैं। आर के सिंह, भगीरथ प्रसाद, सत्यपाल सिंह, आदि दर्जन भर लोग सोचते ही होंगे कि क्या वे इसके लिए अपनी प्रशासनिक सेवाओं को छोड़ कर आये थे। राम जेठमलानी, शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आज़ाद, भोला सिंह, आदि तो मुखर होने के बाद चुप्पी ओढे बैठे हैं पर क्या ये चुप्पी साधरण चुप्पी कही जा सकती है। समर्थन घोषित करने वाले दलों में क्या गुटबाजियां नहीं हैं? नवीन पटनायक के खिलाफ कितने षड़यंत्र हो चुके हैं, जेडीयू के अन्य वरिष्ठ नेताओं को नितिश का फैसला हजम नहीं हो रहा। शिवसेना ने नामांकन प्रक्रिया में भाग नहीं लिया। दल की गुटबाजियों में एक दूसरे से बदला लेने के मौके भी तलाशे जा सकते हैं।
ऊपर जमी पर्त के नीचे कितना लावा खदबदा रहा है यह इस चुनाव में सामने आ सकता है क्योंकि इससे सत्ता पर सीधे आँच आये बिना भी संकेत दिये जा सकते हैं। 1977 में बहती अंतर्धारा की पहचान किसने कर पायी थी।
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, जून 12, 2017

मध्य प्रदेश में एक अराजनीतिक हुड़दंग

मध्य प्रदेश में एक अराजनीतिक हुड़दंग
वीरेन्द्र जैन

मध्य प्रदेश में जून माह की प्रारम्भ से ही एक अलग तरह का हिंसक उत्पात देखने को मिल रहा है, जिसमें अब तक सात किसानों की दुखद मौत हो चुकी है सैकड़ों नागरिक घायल हैं व करोड़ों की सम्पत्ति नष्ट हो चुकी है। पुलिस और प्रशासन के साथ आम लोग भी अपमानित हुये हैं। इस उत्पात को राजनीतिक दल और प्रैस किसान आन्दोलन का नाम देकर एक आकार देने की कोशिश कर रहे हैं, किंतु सच तो यह है कि यह हमारी राजनीतिक प्रणाली की कमियों और राजनीतिक दलों के नाम पर काम कर रहे गिरोहों के गैरजिम्मेवाराना व्यवहार का प्रतिफल है। उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश उस गोबरपट्टी या बीमारू राज्यों में से एक है जहाँ राजनीतिक चेतना न्यूनतम है और सामंती मूल्यों के आधार पर सरकारें बनती बिगड़ती रहती हैं। यहाँ गरीबी और पिछड़ापन इतना अधिक है कि अज्ञानतावश इनके उन्मूलन के लिए प्रारम्भ की गई सशक्तीकरण योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ जाती हैं।
राजनीतिक दलों की संगठन प्रणालियों को निकट से देखने पर पता चलता है कि किसानों का संगठन बनाना सबसे कठिन काम होता है। मजदूर किसी भी फैक्ट्री आदि में एक साथ एकत्रित होते हैं और उनके वेतन आदि की समस्याएं भी एक जैसी होती हैं इसलिए उनका संगठन बनना सरल होता है। यही हाल छात्रों के संगठन का भी होता है, किंतु किसानों को किसान के रूप में एक साथ एकत्रित होने के अवसर कम ही आते हैं। उनके बीच संचार के साधन पहले ही कम थे और अब भी मोबाइल इंटरनेट जैसे साधन भी शिक्षा की कमी के कारण किसानों तक उस अनुपात में नहीं पहुँच सके हैं जिस अनुपात में अन्य वर्गों तक पहुँच गये हैं। वे अखबार कम पढ पाते हैं, बिजली की अनुपस्थिति के कारण टीवी भी नहीं देखते, जहाँ टीवी होता भी है, और बिजली आती है, वहाँ भी टीवी के मनोरंजन कार्यक्रमों को अधिक प्राथमिकता मिलती है। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्र में जातिवादी संगठन अपेक्षाकृत अधिक आसानी से बन जाते हैं। जहाँ किसान संगठन बने भी हैं वे भी जातिवाद से प्रारम्भ हुये हैं। चरण सिंह, और महेन्द्र सिंह टिकैत ने किसान संगठनों के नाम पर जाटों को एकत्रित कर लिया था। इसी तरह मध्य प्रदेश में पटेल या पाटीदारों सहित दूसरी जातियों के संगठनों को चुनावी सुविधा के लिए किसान संगठनो का नाम दे दिया गया था। कभी कभी जब गन्ना उत्पादकों को गन्ना का रेट नहीं मिलता तो गन्ना उत्पादक किसानों के नाम पर आन्दोलन रत हो जाते और इसी तरह प्याज, आलू, टमाटर, संतरा, सोयाबीन या दूसरी जिंस विशेष फसलों के उत्पादक तात्कालिक रूप से एकत्रित होते रहे हैं। कभी कभी सूखा या अतिवृष्टि के कारण भी लोग मांग अनुसार एकत्रित हो जाते हैं। पिछले वर्षों में देश भर में लाखों किसानों की आत्महत्या के बाबजूद भी कोई राष्ट्र या प्रदेश व्यापी आन्दोलन खड़ा नहीं हुआ और समाज ने सरकारों में बैठे नेताओं के उन बयानों को स्वीकार सा कर लिया कि उनकी आत्महत्या के कारण व्यक्तिगत थे। देश के कृषिमंत्री ने तो यहाँ तक कहने में संकोच नहीं किया था कि किसान प्रेम प्रसंगों के कारण आत्महत्या कर रहे हैं।
गत लोकसभा चुनावों के दौरान और हाल के विधानसभा चुनावों के दौरान बिना दूरगामी सोच के विभिन्न तरह के वादे किसानों से किये गये थे जो पूरे नहीं किये गये किंतु हाल ही में उत्तर प्रदेश के चुनावों में कर्जमाफी का जो वादा किया गया था उसे नई व्याख्याओं के साथ काट छाँट कर घोषित कर दिया गया और पूरा करने के लिए संसाधन जुटाने की योजनाएं बनायी जा रही हैं। भाजपा पर हमेशा दबाव बना कर रखने वाली शिवसेना ने चुनावी वादों और यथार्थ के द्वन्द को पकड़ा और सवाल खड़ा किया कि यदि उत्तर प्रदेश के किसानों की कर्जमाफी की जा सकती है, तो सबसे अधिक आत्महत्याओं के लिए विवश महाराष्ट्र के किसान तो कर्जमाफी के अधिक सुपात्र हैं। भाजपा के रक्षात्मक होने से परोक्ष में सन्देश यह गया कि सरकार पर दबाव बनाने से ही अधिकार या सुविधाएं पायी जा सकती हैं। उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश से पहले महाराष्ट्र के कुछ जिलों में आन्दोलन प्रारम्भ हुआ जिसका प्रभाव बढते ही बाहुबली शिवसेना उसमें कूद पड़ी। दूसरी ओर भाजपा परिवार की ओर से गाय के नाम पर किसी की भी हत्या कर देने वालों का परोक्ष बचाव तथा पशु बिक्री कानून जैसे अव्यवहारिक अनावश्यक नियमों के बनाने से भी असहमत शिवसेना को और आक्रामक होने का अवसर मिला।
मध्यप्रदेश में आन्दोलन प्रारम्भ होने से पहले मालवा क्षेत्र में कुछ बड़े बड़े अफीम तस्कर पकड़े गये थे। स्मरणीय है कि तस्करी, हवाला, सट्टा आदि ऐसे अपराध हैं जो सरकारी नेताओं के सहयोग से ही सम्भव हो पाते हैं और इन अपराधों को जब भी पकड़ा जाता है तब सत्ता के अन्दर चल रहे आपसी द्वन्द का पता चलता है। उल्लेखनीय है कि किसान आन्दोलन के नाम की सारी हिंसा मालवा क्षेत्र में ही प्रारम्भ  हुयी है जहाँ अपेक्षाकृत अधिक सम्पन्न किसान हैं और जिनके अहं की लड़ाई उनकी रोजी की लड़ाई से अधिक तेज हो जाती है। पिछले दिनों गुजरात में पाटीदारों के आन्दोलन में हुयी हिंसा के पीछे भी आरक्षण से अधिक अहं था। दूसरी ओर मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड में किसानों की गरीबी और समस्याएं अधिक हैं किंतु वे व्यवस्था के खिलाफ कभी आक्रामक होने का साहस नहीं जुटा पाते।
म.प्र. भाजपा में आपसी गुटबाजी चरम पर है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी चुनावी सफलताओं के प्रभाव में पार्टी पर दबाव बना कर अनेक ऐसे नेताओं को प्रदेश से बाहर करा दिया जो उनके लिए खतरा पैदा कर सकते थे। उल्लेखनीय है कि सुश्री उमा भारती, नरेन्द्र सिंह तोमर, अनूप मिश्रा, प्रभात झा, कैलाश विजयवर्गीय, अरविन्द मेनन, कमल पटेल, बाबूलाल गौर आदि शिवराज की आँख की किरकिरी थे जिन्हें दूर कर दिया गया। इनके हितों को नुकसान पहुँचा है और ये सब किसी न किसी तरह शिवराज से बदला लेना चाहते हैं। इसके विपरीत पार्टी अध्यक्ष नन्द किशोर चौहान उनके अमित शाह हैं। इस गुटबाजी को भी इस हिंसा की पृष्ठभूमि में देखा जा सकता है।
काँग्रेस का नामपट उठाये नेता प्रदेश में कोई आन्दोलन खड़ा नहीं कर सकते। पार्टी में कार्यकर्ता के नाम पर नेताओं के व्यक्तिगत जयजयकारी भर हैं, काँग्रेस के लिए काम करने वाला कोई नहीं है। वे हिंसक तो क्या अहिंसक आन्दोलन या धरना प्रदर्शन भी नहीं कर सकते। काँग्रेस या किसी भी दूसरे दल पर हिंसा का आरोप लगाना सच्चाई से आँखें मूंद लेना है, क्योंकि वे चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकते।
सच्चाई यह है कि सरकार सब कुछ जानती है किंतु कह नहीं सकती। कोई नेता सामने नहीं है जिससे समझौता किया जा सके, कोई मांगपत्र सामने नहीं है जिस को पूरा किया जा सके। पुलिस दमन का परिणाम हिंसा को और बढावा देना है, इसलिए समस्या को स्वतः ठंडी होने की नीति अपनायी जा रही है, इसमें जो नुकसान हो सकता है, वह होगा। सिद्धांतहीन, नेतृत्वहीन इस घटनाक्रम से कुछ भी नहीं बदलेगा।  
वीरेन्द्र जैन
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