गुरुवार, फ़रवरी 14, 2019

मुलायम सिंह को अब आराम की जरूरत है?


 मुलायम सिंह को अब आराम की जरूरत है?

वीरेन्द्र जैन
सोलहवीं लोकसभा के अंतिम दिन समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव का यह कहना कि इस सदन के सभी लोग फिर से जीत कर आयें और हमारी पार्टी तो सरकार नहीं बना सकती इसलिए मोदी जी आप फिर से प्रधानमंत्री बनें, ने देश के राजनीतिक माहौल में हलचल मचा दी है। यह कथन इसलिए भी असंगत लगा क्योंकि इस समय पूरे देश के प्रमुख राजनीतिक दल मोदी को हटाने के लिए महागठबन्धन बनाने की ओर अग्रसर हैं और अनेक धुर विरोधी दल भी अपने मतभेद भुला कर एकजुट हो रहे हैं, तब मोदी को फिर से प्रधानमंत्री की औपचारिक कामना करने को भी गलत माना जाना स्वाभाविक है। इसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि उनकी पार्टी की जीत न होने पर वे गैर भाजपा के किसी अन्य व्यक्ति के प्रधानमंत्री बनने की जगह मोदी को बेहतर मानते हैं। उनकी पार्टी में जो भी हैसियत शेष हो किंतु उपकृत जाति भाइयों में कुछ तो अपील बाकी है।
सोशल मीडिया पर अनेक लोगों के गुस्से के जबाब में मुलायम समर्थकों ने कहा है कि वे डिमेंशिया से पीड़ित हैं और भूल जाते हैं। उदाहरण के रूप में पिछले दिनों शिवपाल यादव के कार्यक्रम में अखिलेश की तारीफ, या शिवपाल यादव के उस बयान को सामने लाया जा रहा है जिसमें उन्होंने मुलायम सिंह को कैद में बताया था। उनके कुछ पक्षधर इसे उनकी राजनीतिक पहलवानी का चरखा दांव बता रहे हैं। दूसरी ओर उनके आलोचक इसे सीबीआई के दबाव का परिणाम बताते हुए उनके उस बयान की याद दिला रहे हैं जिसमें उन्होंने अपनी पार्टी वालों को अमर सिंह के सहयोग के महत्व को बतलाते हुए कहा था कि जिसके बिना सात साल की कैद हो सकती थी। प्रकरण अभी भी सीबीआई के झरोखे से अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
मुलायम सिंह को लोहियावादी कहा जाता रहा है किंतु सत्ता के लिए चुनावी राजनीति में जोड़ तोड़ करते हुए ना तो उन्हें लोहियावाद की दार्शनिक व्याख्या करते हुए सुना गया ना ही उनके राजनीतिक व प्रशासनिक फैसलों में लोहियावाद को अलग से रेखांकित किया जा सकता है। उनका लोहियावाद केवल लाल टोपी तक दिखता है। वे युवा काल में जुझारू और निर्भीक रहे हैं और इसी कारण से उनके आसपास के युवा उन्हें नेता मानने लगे थे। उन्होंने कुश्ती में जसवंतनगर के नत्थूसिंह का दिल जीत लिया था और पुरस्कार में उनकी विधानसभा सीट पायी थी। तब से उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उत्तर प्रदेश में कभी समाजवादी आन्दोलन ही मुख्य विपक्ष की तरह उभरा था व सत्ता विरोधी अनेक युवा उसके साथ चलने लगे थे। वे भी विचार के साथ नहीं अपितु संगठन के साथ थे और अपने देशज व्यवहार से वे सदैव निजी नेतृत्व वाला संगठन बनाने में सफल रहे। चौधरी चरण सिंह के साथ से पिछड़े वर्ग को राजनीति की मुख्यधारा में लाने और हिन्दू साम्प्रदायिकता से सतर्क मुस्लिम समाज को मिला कर चुनाव में उनकी जीत का आधार तैयार होता रहा है। मण्डल कमीशन से जागृत व संगठित पिछड़ा वर्ग तथा अयोध्या में रामजन्मभूमि विवाद के सहारे ध्रुवीकरण की कोशिश करने वालों के सामने कोई कमजोरी न दिखा कर उन्होंने मुस्लिम समाज को अपनी ओर आकर्षित कर लिया था। अपने मुख्यमंत्री काल में उन्होंने अपनी जाति के लोगों को किसान मजदूर से ठेकेदार और खानमालिक बना दिया था व सवर्ण समाज की ओर होने वाले धन व शक्ति के प्रवाह को मोड़ दिया था। पंचायत के पदों से लेकर नगरपालिका, जनपद पंचायत, एमएलसी, या पुलिस, होमगार्ड, सशस्त्र बलों में अपनी जाति या पिछड़ा वर्ग के लोगों की भर्ती कर के उन्होंने स्थायी समर्थक बना लिये थे। प्रशासन में प्रमुख पदों पर निजी पसन्द के अधिकारियों की नियुक्ति कर उन्होंने मनमानी का माहौल बना लिया था व लोकतांत्रिक व्यवस्था में जन समर्थन के सहारे केन्द्र में भी अपना स्थान बना लिया था। अमर सिंह के साथ ने उनके राजनीतिक कौशल की कमी की पूर्ति कर दी थी और उनको प्राप्त समर्थन की ताकत को राजनीति के बाज़ार में अच्छे सौदे के साथ ले जाने लगे थे।
अमर सिंह के निर्देशन में वे राजनीति में विचार, मानवीयता, बफादारी से दूर होते गये और निरंतर अवसरवादी फैसले लेते गये। वीपी सिंह का साथ नहीं देना, सोनिया गाँधी को विदेशी मूल के नाम पर अचानक समर्थन देने से पलट जाना और अटल बिहारी का मार्ग प्रसस्त कर देना। राष्ट्रपति के चुनाव में भाजपा काँग्रेस के उम्मीदवार को समर्थन देना व वामपंथियों के उम्मीदवार का प्रतीकात्मक समर्थन भी न देना, 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की परोक्ष मदद से सरकार बना लेना, लखनऊ में अटल बिहारी वाजपेयी के चुनाव में उनके प्रतिनिधि द्वारा साड़ी वितरण के समय मची भगदड़ में कई औरतों के मारे जाने पर पीड़ितों की जगह अटल जी के यहाँ पहुँचना, यूपीए सरकार से वामपंथियों द्वारा न्यूक्लियर डील पर समर्थन वापिस लेने पर पहले उनके साथ आम सभाएं करना और अचानक मतदान के समय पक्ष परिवर्तन कर लेना, उत्तराखण्ड आन्दोलनकारियों पर रात्रि में सोते समय गोलियां चलना व महिलाओं के साथ बलात्कार होना, आदि ऐसी सैकड़ों घटनाएं हैं जो कोई समाजवादी नेता नहीं कर सकता। 2012 के चुनावों में बिना मुख्यमंत्री घोषित किये हुए चुनाव लड़ना और अचानक अखिलेश को मुख्यमंत्री घोषित कर देना। अमर सिंह को वापिस पार्टी में लेकर राज्यसभा में भेज देना। सत्ता को अपने परिवार तक के घेरे में बनाये रखना आदि ऐसे अनेक काम हैं जो उनकी टोपी के रंग से मेल नहीं खाते। वे केन्द्र में सत्तारूढ दल के आगे झुकने को विवश हैं, इसलिए पता नहीं मौका देख कर अपने जाति समर्थन को किस जनविरोधी के चरणों में डाल दें।
अगर मुलायम सिंह अस्वस्थ हैं तो उन्हें स्वास्थलाभ हेतु आराम और अमर सिंह शिवपाल आदि से दूर रहने की जरूरत है। यही देश के हित में भी है। यह समाजवादी पार्टी के लोगों को भी चेतने का समय है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

        

सोमवार, फ़रवरी 04, 2019

श्रद्धांजलि शरद भट्ट सक्रिय, संतोषी, और हँसमुख व्यक्तित्व के धनी थे


श्रद्धांजलि
शरद भट्ट सक्रिय, संतोषी, और हँसमुख व्यक्तित्व के धनी थे
वीरेन्द्र जैन
3 फरबरी 2019 को चार बजे राजीव व्यास का फोन आया कि शरद भट्ट भाई साहब के न रहने की खबर किसी अज्ञात स्त्रोत से आयी है क्या आपको पता चला! अंतिम संस्कार का समय भी चार बजे सुभाष नगर विश्राम घाट पर ही है, और मैं दूर हूं। सुभाष नगर मेरे निवास से आधा किलोमीटर दूर पर ही है इसलिए मैं पुष्टि करने की जगह सही समय पर सीधे वहीं पहुंच गया। कई पुराने परिचित मिल गये और जैसा कि होता है अनेक तरह की स्मृतियां कौंधती रहीं। डा. विजय अग्रवाल, डा. आर डी गुप्ता, बुधौलिया जी, रमेश शर्मा, आदि लोग भी थे।
दतिया जैसे छोटे कस्बे में जहाँ सारे सक्रिय लोग एक दूसरे को जानते पहचानते रहे हैं, हम लोग जब कालेज में पढते थे तब नगर की आबादी कुल 25000 के आसपास थी। शरद से पहला घनिष्ठ परिचय 1970 के आसपास हुआ जब मैं एम.ए. [अर्थशास्त्र] फाइनल में था और शरद ने किसी विषय में एम.ए, में प्रवेश लिया था। सक्रियता के क्षेत्र सीमित थे और हर क्षेत्र में हाथ पांव मारने वाले मेरे जैसे लोग कालेज में अपनी उपस्थिति दिखाना चाहते थे। राजनीतिक दलों के लोग तो थे किंतु विचारधारा के लोग नहीं दिखते थे। मैं ब्लिट्ज का नियमित पाठक था और उससे भी वाम झुकाव बना था, या कहें कि उससे सूचनाएं और तर्क प्राप्त होते रहते थे जिनका प्रयोग कर मैं अपनी अलग पहचान बना लेता था। साहित्य, पत्रकारिता, खेल, संगीत से लेकर चुनावी गतिविधियों तक हर जगह बिना बुलाये हुए भी प्रवेश कर जाना हम लोग अपना अधिकार समझते थे व किले चौक पर हर शाम सौ पचास लोग अकारण भी एकत्रित रहते थे और कारण भी तलाश लेते थे।
शरद भट्ट राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में था और मेरी पहचान वामपंथी की तरह बनती जा रही थी इसलिए वह शायद मेरी टोह लेने के लिए निकट आया या भेजा गया था। हम लोगों का एक ग्रुप साथ साथ घूमता फिरता था जिनमें मैं तो अपने थोड़े से अध्ययन की जुगाली करता रहता था किंतु शरद कुछ बोलता नहीं था। वह संघ द्वारा किये जाने वाले बौद्धिक आयोजनों के कार्ड हम लोगों को देता था और कई बार तो किन्हीं बन्द दरवाजों में प्रवेश करने के लिए हम लोग भी उसके कार्ड ले लेते थे और उन्हें स्वचयनित घरों में बांट आते थे।
1971 का ऎतिहासिक आम चुनाव जो स्वघोषित समाजवादी इन्दिरा गाँधी और सीपीआई ने संयुक्त दक्षिण पंथ के खिलाफ लड़ा था, जिसमें हमारे क्षेत्र से जनसंघ की ओर से श्रीमती विजया राजे सिन्धिया उम्मीदवार थीं। मैं तब तक सीपीआई और सीपीएम के भेद को नहीं जानता था और स्वाभाविक रूप से देश के करोड़ों लोगों की तरह श्रीमती गाँधी के प्रचार से प्रभावित होकर उनका पक्षधर था। वैसे भी वहाँ वामपंथी पार्टी की उपस्थिति ही नहीं थी। मैंने ही पहली बार कम्युनिष्ट पार्टी के गठन के लिए शाकिर अली खाँ को पत्र लिखा था जो सेंसर हो गया था और पुलिस के स्पेशल ब्रांच के सदस्य मेरी निगरानी करने लगे थे। उसी चुनाव के दौरान काँग्रेस उम्मीदवार नरसिंहराव दीक्षित के पक्ष में चल रही आमसभा में मैंने भी बोलने की इच्छा प्रकट की और इस इच्छा का स्वागत हुआ। संयोग से उन्हीं दिनों मैंने अहमदाबाद के दंगों की रिपोर्ट पढी थी जिसमें किन्हीं हाजरा बेगम, जो विधवा थीं के चार बच्चों को उन्हीं के सामने काट डाला गया था व उनके सबसे छोटे बच्चे को भी उनके गिड़गिड़ाने व एक विधवा का आखिरी सहारा बताने के बाद भी न बख्शे जाने का जिक्र था। मैंने उस घटना की चर्चा बहुत ही मार्मिक ढंग से की जिसका बहुत प्रभाव पड़ा। कुछ श्रोताओं ने तो कहा था कि मेरे रोंगटे खड़े हो गये थे। उसके बाद मैं संघ के निशाने पर आ गया था। या कहें कि निगरानी में आ गया था। जनसंघ के बड़े बड़े नेताओं की आमसभाओं में जिन्हें सुनने किले चौक पर सभी कामन श्रोता जाते थे, तब मेरी निगरानी के लिए संघ के लोग मेरे समीप ही खड़े हो जाते थे और मेरे जगह बदलने पर वे भी जगह बदल कर वहीं आ जाते थे।
शरद उस चुनाव में श्रीमती सिन्धिया का कार्यालय सम्हाल रहे थे। वे उक्त भाषण की चर्चा के बाद मेरे पास भेजे गये थे और उन्होंने पूछा था कि मुझे क्या चाहिए? यह सीधा सीधा आर्थिक लालच था क्योंकि श्रीमती सिन्धिया बहुत पैसा खर्च कर रही थीं और जैसा कि बाद में पता चला था कि उनका काँग्रेस के उम्मीदवार और समर्थकों से सौदा भी हो गया था। मेरे जैसे युवा के लिए वह ज़िन्दगी का पहला ऐसा प्रस्ताव था, और उसे ठुकरा कर गौरवान्वित होने का भी पहला अवसर था। मैं जीवन भर इस गौरव के साथ जिया और वह घटना कभी नहीं भूला। हो सकता है कि उस घटना के बाद शरद के दिल में मेरे प्रति सम्मान बढा हो या नहीं बढा हो पर मेरी दृढता जरूर बढी थी। बाद में भी मैंने उसकी आत्मीयता में कभी कोई कमी नहीं देखी। इमरजैंसी में वे उन चन्द लोगों में थे जो 19 महीने मीसा बन्दी के रूप में जेल में रहे।
वह पीताम्बरा पीठ के भी सक्रिय प्रबन्धकों में थे और वहाँ आने वाले सैकड़ों विशिष्ट लोगों से उसका परिचय था किंतु कभी भी किसी अतिरिक्त लाभ लेने की कोई खबर नहीं सुनने को मिली जबकि अन्य अनेक लोग इस रोग के रोगी पाये गये। मैं एक स्थानीय अखबार में लिखता था और धार्मिक क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ भी लिखता रहा और आशंका रही कि शायद कभी शरद कोई शिकायत करे किंतु उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया।
तीन बेटियों, और असामयिक निधन के बाद अपने भाई के बेटे के पिता शरद जिम्मेवार पिता भी थे व उनके आग्रह पर ही पिछले साल से भोपाल आकर रहने लगे थे। मुझे बाद में पता लगा। इसी दौरान एक कामन मित्र के असामायिक निधन पर जब मैंने उन्हें सूचना दी तो उन्होंने अंतिम संस्कार में आने में किंचित देर नहीं की। उसी दौरान उन्होंने भोपाल स्थित दतिया के सारे मित्रों की एक बैठक व दावत करने का प्रस्ताव किया था जो अधूरा ही रह गया।
उनके सहयोग करने को तत्पर रहने और सदैव हँसमुख रहने की अनेक स्मृतियां हैं। “करोगे याद तो हर बात याद आयेगी। “
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
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गुरुवार, जनवरी 03, 2019

नीरज जी के जन्मदिन पर याद करते हुए किसी की आँख खुल गयी किसी को नींद आ गयी


नीरज जी के जन्मदिन पर याद करते हुए
किसी की आँख खुल गयी किसी को नींद आ गयी

वीरेन्द्र जैन
इस नये साल में हिन्दी के लाड़ले गीतकार गोपाल दास नीरज जी हमारे बीच नहीं हैं। जो लोग जीवन से जुड़े रहते हैं उनके लिए मृत्यु की चर्चा कुछ अधिक सम्वेदनशील विषय होती है। नीरज जी ने अपने सम्पूर्ण गीत लेखन में मृत्यु का बहुत गहराई से चित्रण किया है। हिन्दी में पहला मृत्युगीत उन्होंने ही लिखा था। श्री मुकुट बिहारी सरोज, जिनका नीरज जी के साथ कवि सम्मेलनों में बहुत लम्बा वक्त गुजरा, एक संस्मरण सुनाते थे। यही कोई 1955- 60 का समय रहा होगा जब यह गीत लिखा गया था। बांदा में कवि सम्मेलन था और तब हर कस्बे में कवि सम्मेलन सुनने नगर के सब विशिष्ट व्यक्ति आया करते थे। वहाँ एक जज थे जो बहुत सख्त मिजाज माने जाते थे। वे न केवल अपने कर्तव्य निर्वहन में ही कठोर थे अपितु कविताओं पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं देते थे। विचार बना कि नीरज जी मृत्यु पर लिखा अपना ताजा गीत सुनाएं ताकि उनकी प्रतिक्रिया को आजमाया जा सके। जब नीरज जी का क्रम आया तो उन्होंने मृत्युगीत सुनाया जिसको सुनते ही वे जज महोदय सीधे उठ कर अपनी कार उठा चले गये। आशंकाग्रस्त कुछ लोगों ने उनका पीछा किया तो पाया कि वे एक पुलिया पर बैठ कर फूट फूट कर रो रहे हैं।
इस गीत की कुछ पंक्तियां देखिए-  
दृग सूरज की गर्मी से रक्तिम हो आए,
जीवन समस्त लाशों को ढ़ोते बीत गया,
पर मृत्यु तेरे आलिंगन के आकर्षण में,
छोटा सा तिनका भी पर्वत से जीत गया,
सागर असत्य का दूर दूर तक फैला है,
अपनों पर अपने बढ़कर तीर चलाते हैं,
पर काल सामने से है जब करता प्रहार,
हम जाने क्यों छिपते हैं क्यों घबराते हैं,
गोधुली का होना भी तो एक कहानी है,
जो शनैः शनैः ही ओर निशा के बढ़ती है,
दीपक की परिणति भी है केवल अंधकार,
कजरारे पथ पर जो धीरे से चढ़ती है,
मधुबन की क्यारी में हैं अगणित सुमन मगर,
जो पुष्प ओस की बूँदों पर इतराता है,
उसमें भी है केवल दो दिन का पराग,
तीजे नज़रों को नीचे कर झर जाता है,
बादल नभ में आ घुमड़ घुमड़ एकत्रित हैं,
प्यासी घरती पर अमृत रस बरसाने को,
कहते हैं सबसे गरज गरज कर सुनो कभी,
हम तो आए हैं जग में केवल जाने को,
पत्थर से चट्टानों से खड़ी मीनारों से,
तुम सुनते होगे अकबर के किस्से अनेक,
जब हुआ सामना मौत के दरिया से उसका,
वह वीर शहंशाह भी था घुटने गया टेक,
वह गांधी ही था जिसकी आभा थी प्रसिद्ध,
गाँवों गाँवों नगरों नगरों के घर घर में,
वह राम नाम का धागा थामे चला गया,
उस पार गगन के देखो केवल पल भर में,
मैं आज यहाँ हूँ इस खातिर कल जाना है,
अपनी प्रेयसी की मदमाती उन बाँहों में,
जो तबसे मेरी याद में आकुल बैठी है,
जब आया पहली बार था मैं इन राहों में,
मेरे जाने से तुम सबको कुछ दुख होगा,
चर्चा कर नयन भिगो लेंगे कुछ सपने भी,
दो चार दिवस गूँजेगी मेरी शहनाई,
गीतों को मेरे सुन लेंगे कुछ अपने भी,
फिर नई सुबह की तरुणाई छा जाएगी,
कूकेगी कोयल फिर अम्बुआ की डाली पर,
फिर खुशियों की बारातें निकलेंगी घर से,
हाँ बैठ दुल्हन के जोड़े की उस लाली पर,
सब आएँ हैं इस खातिर कल जाना है,
उस पार गगन के ऊँचे अनुपम महलों में,
मिट्टी की काया से क्षण भर का रिश्ता है,
सब पत्तों से बिखरे हैं नहलों दहलों में,
हम काश समर्पित कर पाएँ अपना कण कण,
रिश्तों की हर इक रस्म निभानी है हमको,
जीलो जीवन को पूरी तरह आज ही तुम,
बस यह छोटी सी बात बतानी है हमको।
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अब आँसू की आवाज न मैं सुन सकता हूं
अब देख न सकता मैं गोरी तस्वीरों को
अब चूम न सकता मैं अधरों की मुस्कानें
अब बाँध न सकता बाँहों की जंजीरों को
मेरे अधरों में घुला हलाहल है काला
नयनों में नंगी मौत खड़ी मुसकाती है
'है राम नाम ही सत्य, असत्य और सब कुछ '
बस एक यही ध्वनि कानों में टकराती है
[गीत बहुत लम्बा है]
  
    नीरज जी के ज्यादातर गीतों में कफन, शमशान, अर्थी, लाश, के शब्द विम्ब भी मृत्यु के साथ मिलते हैं,
कफन बढा तो किसलिए नजर ये डबडबा गयी
श्रंगार क्यों सहम गया बहार क्यों लजा गयी
न जन्म कुछ न मृत्यु कुछ, बस सिर्फ इतनी बात है
किसी की आँख खुल गयी, किसी को नींद आ गयी
या

जब चले जाएंगे लौट के सावन की तरह ,
याद आएंगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह |
दाग मुझमें है कि तुझमें यह पता तब होगा ,
मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह |
हर किसी शख्स की किस्मत का यही है किस्सा ,
आए राजा की तरह ,जाए वो निर्धन की तरह |
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और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
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नीरजतो कल यहाँ न होगा
उसका गीत-विधान रहेगा
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खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चांदनी 
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालों! चाल बदलकर जाने वालों!
चन्द खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।
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सोने का ये रंग छूट जाना है
हर किसी का संग छूट जाना है
और जो रखा हुआ तिजोरी में
वो भी तेरे संग नहीं जाना है
आखिरी सफर के इंतजाम के लिए
जेब इक कफन में भी लगाना चाहिए
****************************************
ऐसी क्या बात है चलता हूं अभी चलता हूं
गीत इक और जरा झूम के गा लूं तो चलूं
***************************************
जब न नीरज ही रहेगा क्या यहाँ रह जायेगा
इत्यादि । उनके लाखों लाख चाहने वाले थे और वे सबको डराते हुए 94 साल तक देश के कोने कोने में गीत गुंजाते हुए जिये। नीरज जी को जितना याद करते हैं, वे याद आते रहते हैं। सदियों तक याद आते रहेंगे। वे खुद ही कह गये हैं-
इतने बदनाम हुये हम तो इस जामाने में
तुमको लग जायेंगीं सदियां हमें भुलाने में
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629




रविवार, दिसंबर 30, 2018

श्रद्धांजलि ; शिवमोहन लाल श्रीवास्तव वह बाजी जीत कर चला गया


श्रद्धांजलि ; शिवमोहन लाल श्रीवास्तव



वह बाजी जीत कर चला गयाImage may contain: Shiv Mohan Lal Shrivastav, eyeglasses
वीरेन्द्र जैन
जिस बात के अनेक सिरे होते हैं तो समझ नहीं आता कि बात कहाँ से शुरू करूं। आज मेरे सामने भी यही मुश्किल है। मैं कम्प्यूटर और इंटरनैट से 2008 में जुड़ा, और लगातार इस बात का अफसोस रहा कि क्यों कम से कम पाँच साल पीछे रह गया। बहरहाल जब जुड़ा तो मेरे हाथ में कारूं का खजाना लग गया था। यही ऐसा उपकरण था जो मुझे चाहिए था। मेरा कीमती समय इतना इंटरनैट को अर्पित हो गया कि पुस्तकें और पत्रिकाएं पढने की आदत छूट गयी। इसी दौरान नैट पर एक ‘डैथ मीटर’ की साइट मिली। इसमें कुछ कालम भरने पर मृत्यु के वर्ष की घोषणा की जाती थी। इन कालमों में जन्मतिथि, लम्बाई, बजन, बाडी मास इंडेक्स, सिगरेट, शराब, तम्बाखू की आदतें, अब तक हो चुकी व साथ चलने वाली बीमारियां, आपरेशन, जाँच रिपोर्टों के निष्कर्ष, पैतृक रोग, मां बाप की मृत्यु के समय उम्र, आदि पचास से अधिक कालम थे और इस आधार पर मृत्यु के वर्ष की घोषणा की जाती थी। उत्सुकतावश मैंने भी उक्त कालम भरे और निष्कर्ष निकाला। मेरी मृत्यु का वर्ष 2018 निकला। मैं इससे संतुष्ट था क्योंकि अपेक्षाकृत अच्छी आदतों वाले मेरे पिता भी 65 वर्ष ही जिये थे।
शिवमोहन के जीवन और याद करने वाली घटनाओं पर अगर जाऊंगा तो यह टिप्पणी कभी खत्म ही नहीं हो पायेगी पर संक्षिप्त में बता दूं कि शिव के पिता और मेरे पिता न केवल परिचित लोगों में थे अपितु 25000 की आबादी वाले नगर दतिया में एक दौर के सुपरिचित बौद्धिक लोगों में गिने जाते थे। छोटे नगर में वैसे तो सब एक दूसरे को जानते ही हैं, पर मेरा शिवमोहन से निकट का परिचय तब हुआ जबकि मैं बीएससी करने के बाद शौकिया एमए कर रहा था और मेडिकल में प्रवेश से बहुत किनारे से चूकने के बाद पढाई के प्रति बिल्कुल भी गम्भीर नहीं था। हम लोगों का ना तो कोई भविष्य था और ना ही उसके प्रति कोई चिंता ही थी। मुझे पत्रकारिता व साहित्य आकर्षित करता था और एक दबी इच्छा थी कि पत्रिकाओं में लिख कर पहचान बनाऊं और उसके सहारे कवि सम्मेलनों के मंच से जीवन यापन लायक धन कमाऊं। कस्बाई राजनीति समेत नाम रौशन करने वाली हर गतिविधि में शामिल होने की कोशिश करता था, पत्र पत्रिकाएं पढता था और उनके सहारे मंच पर छोटा मोटा भाषण भी दे लेता था। धर्मनिरपेक्षता और नास्तिकता घर से मिली थी इसलिए जनसंघ को पसन्द नहीं करता था। वाम की ओर झुकाव वाली राजनीति पसन्द थी क्योंकि मैं हिन्दी ब्लिट्ज़ का नियमित पाठक था। चौराहे के होटल हम जैसे युवाओं के स्थायी अड्डे थे जहाँ पर राजनीतिक चर्चा के अलावा रेडियो पर क्रिकेट की कमेंट्री व बिनाका गीतमाला भी सुनी जाती थी। कभी किसी विषय पर कोई बयान दिया तो अखबार वाले ने मेरे नाम के साथ ‘छात्रनेता ने कहा’, लिख कर छापा तो अच्छा लगा। इसी काल में मेरी कुछ छोटी छोटी कविताएं भी राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में छप चुकी थीं और कवि गोष्ठियों में बुलाया जाने लगा था। शिवमोहन बड़े बड़े सुन्दर व स्पष्ट अक्षरों में लिखते थे और उनका गद्य हर तरह की पत्र पत्रिकाओं में खूब छपता था। मुझे उनसे ईर्षा होती थी। याद नहीं कि किस तरह हम दोनों का ही अहंकार टूटा और हम लोग साथ साथ बैठने लगे।
नगर में एक दो स्थानीय अखबार थे जो साप्ताहिक थे और नियमित भी नहीं थे किंतु दो तीन क्षेत्रीय अखबार आते थे। इनके हाकर ही इनके सम्वाददाता हुआ करते थे जो या तो जनसम्पर्क के प्रैसनोटों को ही सीधे भेज देते थे या किसी दूसरे से खबरें लिखवाते थे। कुछ ऐसा हुआ कि हम लोग उनकी खबरें लिखने लगे। इस काम का मेहनताना इस तरह वसूलते थे कि एकाध खबर अपने नाम की भी डाल कर खुश हो जाते थे। युवा थे इसलिए   मजे के लिए कुछ लड़कियों के शार्ट नाम भी उनमें जोड़ देते थे। खबर बनाने में मरने वाले सेलीब्रिटीज बहुत काम आते थे। इनकी कपोल कल्पित शोकसभा आयोजित होती थी जिसकी खबरों में अध्यक्षता कभी मैं करता था तो कभी शिवमोहन, कभी अवधेश पुरोहित तो कभी अशोक खेमरिया। इस तरह हम लोगों के नाम अखबार में छपा करते थे। नगर के सब महत्वपूर्ण लोग हम लोगों के नाम से परिचित हो चुके थे। इतना ही नहीं हम लोग अपने नाम के आगे कुछ विशेषण भी लगाते रहते थे।
वक्त बीता मैं बैंक की नौकरी पर निकल आया और शिवमोहन स्कूल टीचर होते हुए स्कालरशिप पर रूस चले गये। वहाँ से लौट कर फिर सेंट्रल गवर्नमेंट में राजभाषा अधिकारी होते हुए भिलाई, रावतभाटा [राजस्थान], शिवपुरी, इन्दौर, कलप्पकम [तामिलनाडु] हैदराबाद में डिप्टी डायरेक्टर आफीसियल लेंगवेज के पद से स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ली। उसके लिखे हुए पत्रों और प्राप्त पत्रों की संख्या लाखों में होगी और उसी तरह हर स्तर के विशिष्ट व सामान्य व्यक्तियों से उनके परिचय का दायरा देश विदेश में फैला हुआ है। लेखक, पत्रकार, सम्पादक, संयोजक, मंच संचालक, विदेशी भाषा के ज्ञाता, सामाजिक कार्यकर्ता, ज्योतिषी, से लेकर सनकी, झगड़ालू, मुँहफट आदि अनेकानेक विशेषण उनके साथ लगते रहे हैं। एक अध्यापिका से प्रेमविवाह किया जो पंजाबी हैं, बड़ी संतान बेटी जो आस्ट्रेलिया पढने गयी तो वहीं की होकर रह गयी, बेटे ने कोई नौकरी नहीं करना चाही तो फ्रीलाँस है। उन्होंने भी यायावरों की तरह मनमर्जी का जीवन जिया तो कभी दतिया, कभी इन्दौर, कभी भोपाल, कभी विशाखापत्तनम, कभी हैदराबाद पड़े रहे। ज्योतिष और तंत्र में भरोसा न होने पर भी उसकी प्रैक्टिस करते रहे और बड़े बड़े लोग उनके क्लाइंट रहे। [बाद में हम लोग उन नासमझों पर हँसते भी रहे] उनके सोते सोते दुनिया छोड़ देने तक पूरा जीवन घटना प्रधान रहा।
अब भूमिका की बात। जब मैंने उनसे कहा कि मेरा डैथ मीटर बोल रहा है कि मैं 2018 में नहीं रहूंगा तो मेरा श्रद्धांजलि लेख तुम्हें लिखना होगा। वे कहते कि मैं उम्र में तुम से बड़ा हूं इसलिए मेरा श्रद्धांजलि लेख तुम्हें ही लिखना होगा। 2018 शुरू होते ही जब फोन पर या चैटिंग से बात होती थी तब वे याद दिलते थे कि अठारह चल रहा है। मैं कहता था कि अभी बीता तो नहीं है, और फिर यह तो एक बिना जाँचा परखा कैलकुलेशन है कोई तुम्हारा ज्योतिष तो नहीं है कि इसमें विद्या की बेइज्जती हो जायेगी।  
शिवमोहन मेरे जीवन का एक हिस्सा थे। सच तो यह है कि वे साहित्यकार नहीं थे अपितु साहित्यिक पत्रकार थे। वे उत्प्रेरक थे। उन्होंने कविता कहानी व्यंग्य आदि में हाथ जरूर आजमाया होगा किंतु उसे मान्यता नहीं मिली। किंतु उन्होंने विभिन्न विषयों पर खूब लेख लिखे, खूब छपे और साहित्य की मुख्यधारा में बने रहे। उनका जीवन लगातार उन संघर्षों में बीता जिन्हें वे खुद आमंत्रित करते थे। गालिब के शब्दों में –
मेरी हिम्मत देखिए, मेरी तबीयत देखिए
जब सुलझ जाती है गुत्थी, फिर से उलझाता हूं मैं
यही उनकी भी प्रकृति थी।
विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए वादा करता हूं कि समय मिलने पर उनके जीवन के बारे में भी जरूर लिखूंगा। 
वीरेन्द्र जैन
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