मंगलवार, अगस्त 09, 2016

गुजरात में मंत्रिमण्डल परिवर्तन और भाजपा में लोकतंत्र

गुजरात में मंत्रिमण्डल परिवर्तन और भाजपा में लोकतंत्र
वीरेन्द्र जैन

दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनावों में मिली हार तथा उत्तराखण्ड व अरुणाचल प्रदेश में दलबदल के सहारे सत्ता बदलने को न्यायालय द्वारा अनुचित ठहराये जाने के बाद गुजरात ने मोदी को बेचैन कर दिया है और उन्हें वहाँ मुख्यमंत्री या कहें मंत्रिमण्डल बदलने का अप्रिय निर्णय लेना पड़ा है। वे भले ही इसे आनन्दी बेन के 75 की उम्र के रिटायरमेंट से जोड़ कर प्रदर्शित कर रहे हों, पर उनकी इस बात पर विश्वास न करते हुए सब लोग समझ रहे हैं कि यह पिछले दिनों हार्दिक पटेल के नेतृत्व में हुए पटेलों के हिंसक आन्दोलन और ऊना के दलितों पर निर्भीकता पूर्वक किये गये दमन और अपमान से उपजे प्रतिरोध व राजनीति के उपचार का प्रयास है। यदि केवल आनन्दीबेन के 75 पार का सवाल होता तो पुराने मंत्रिमण्डल के शेष सारे चेहरे यथावत रखे गये होते, पर यहाँ तो लगभग सभी को बदल दिया गया है।  
दुनिया के कम्युनिष्ट आन्दोलन में सोवियत रूस की जो भूमिका थी लगभग वैसा ही गुजरात भाजपा के लिए एक माडल राज्य है। मोदी के सहारे भारतीय जनता पार्टी ने जो झांकी सजाई थी वह गुजरात के माडल के आधार पर ही सजी थी और उसके पतन से बिखर सकती है। यही कारण है कि उस पर विपक्ष के साथ साथ सबकी पैनी निगाहें लगी हुयी हैं। गुजरात बहुत पहले से औद्योगिक रूप से विकसित राज्य रहा है जिसे भाजपा की मोदी सरकार ने न केवल बचाये रखा था, अपितु उसमें होने वाली वृद्धि की दर को भी कम नहीं होने दिया। प्रशासनिक साफ सुथरापन और मुख्यमंत्री की ईमानदार छवि ने भी भाजपा शासित दूसरे भ्रष्ट राज्यों की तुलना में गुजरात राज्य की छवि को सुधारा था। इसी छवि के अतिरंजित प्रचार ने मोदी के नेतृत्व को मान्यता दी। गोधरा में साबरमती एक्सप्रैस में हुए हादसे के बाद जिस त्वरित गति से मुसलमानों के खिलाफ हिंसा हुयी उसकी निन्दा भले ही पूरी दुनिया में हुयी हो किंतु साम्प्रदायिकता के दुष्प्रचार से प्रभावित गुजरात के व्यापारी मानसिकता के लोगों को मोदी सरकार एक दृड़ सरकार नजर आई थी जो कठोर और अप्रिय फैसले लेने का खतरा मोल ले सकती थी।
भले ही भारतीय जनता पार्टी देश के मध्य और पश्चिमी राज्यों की प्रमुख पार्टी है अपितु उसका संगठन इन राज्यों में सक्रिय अन्य दलों से बहुत अच्छा रहा है। इस पार्टी में समान कद के बहुत सारे महात्वाकांक्षी नेता हैं पर गुजरात राज्य के माडल और संघ को प्रिय लगने वाले कठोर फैसले ले कर मोदी ने संघ नेतृत्व के सामने अपना कद बहुत बढा लिया था.। अब वे भाजपा के बादशाह है, जिन्होंने सभी वरिष्ठों को किनारे कर दिया है व लोकसभा के कुशल चुनाव प्रबन्धन से समकालीनों को नेतृत्व स्वीकारने को मजबूर कर दिया है। वे आपस में भले ही प्रतिद्वन्दिता करते रहें किंतु सत्ता और संगठन दोनों में अब मोदी का प्रतिद्वन्दी कोई नहीं है।
गुजरात के ऊना में सामंती मानसिकता के साथ दलितों की अकारण पिटाई और उस घटना का  वीडियो बना कर उसे चुनौती पूर्ण ढंग से वायरल करने को रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद से उत्तेजित दलितों और विपक्षियों ने गम्भीरता से लिया व गुजरात के दलित आन्दोलनरत हुये। पाटीदारो के हिंसक आन्दोलन के बाद यह मोदी के राज्य में उनके लिए दूसरी बड़ी चुनौती थी। उल्लेखनीय है कि इस विषय पर भाजपा नेतृत्व में दलित सांसदों समेत किसी की कोई प्रतिक्रिया देने की हिम्मत नहीं हुयी। स्वयं मोदी ने एक सप्ताह तक स्थिति का गहन परीक्षण करने के बाद आनन्दीबेन से त्यागपत्र दिला दिया। यह घटनाक्रम वर्तमान भाजपा में लोकतंत्र की असली तस्वीर प्रस्तुत करता है।
गुजरात के नये मुख्यमंत्री का चयन, जिसे मनोनयन कहना अधिक उचित होगा, भी ध्यान देने योग्य है। आनन्दीबेन के त्यागपत्र के ट्वीट होने के दो दिन तक पूरे विधायक दल में कहीं कोई सुगबुगाहट दिखाई नहीं दी, जब तक की पार्टी ने नितिन पटेल को मुख्यमंत्री बनाने के संकेत नहीं दिये। इसके आधार पर उन्होंने भावी मुख्यमंत्री की तरह मीडिया से संवाद भी शुरू कर दिया। मोदी के राज्य में उनके स्थान को भरने वाले व्यक्ति की यह आज़ादी उन्हें पसन्द नहीं आयी और चौबीस घंटे के अन्दर फैसला बदल दिया गया व विजय रूपानी को राजसिंहासन देने की राजाज्ञा को सुना दिया गया। आम तौर पर मुख्यमंत्री के रूप में अपनी पसन्द को हाईकमान व्यक्त करता जिस पर विधायक दल मुहर लगाता है और फिर मुख्यमंत्री अपने मंत्रिमण्डल का गठन करता है जिसमें उपमुख्यमंत्री भी सम्मलित होता है। उल्लेखनीय है कि उपमुख्यमंत्री जैसा कोई पद संविधान में नहीं है और न ही उसके अधिकार कहीं वर्णित हैं, यह शुद्ध रूप से तुष्टीकरण का पद है। पर उपमुख्यमंत्री का फैसला भी नरेन्द्र मोदी के अभिन्न अमितशाह ने पहले ही कर दिया और नितिन पटेल को पहले से ही मंच पर जगह दे दी गयी। वैसे तो स्वयं विजय रूपानी को भी शपथ लेने के बाद ही राज्यपाल के बगल वाली कुर्सी पर बैठने का अधिकार बनता है किंतु वे भी पहले से बैठे हुए थे। मोदी के राजतंत्र में सारे नियमों और परम्पराओं को बदला जा रहा है।
रूपानी के मनोनयन के बाद वे आनन्दीबेन और नितिन पटेल के साथ दोनों उंगलियों से अंग्रेजी अक्षर ‘वी’ का प्रदर्शन करते नजर आये। ये चिन्ह किसी प्रतियोगिता में मिली जीत पर प्रदर्शित किया जाता है। उक्त आचरण उन खबरों को पुष्ट करता है कि आनन्दीबेन चाहती थीं कि नितिन पटेल को ही उनका उत्तराधिकार मिले किंतु मोदी से फोन पर बात करने के बाद विजय रूपानी का नाम तय हुआ, अर्थात मोदी के वीटो से वे मुख्यमंत्री बने व मीडिया को दिखाने के लिए एक साथ ‘वी’ बनाते नजर आये। 
यह सारा सत्ता परिवर्तन किसी रियासत के सत्ताधीश का अपनी गद्दी को सौंपने जैसा था। कथित गौसेवकों के दुराचरण पर, जिनके कारण यह सारा घटनाक्रम हुआ, बाद में मोदी ने माय गोव एप्प के जारी करते समय प्रतिक्रिया दी। उनकी गोलमोल प्रतिक्रिया के अनुसार गौसेवकों के असंवैधानिक आचरण तो ठीक हैं बशर्ते वे असली गौसेवक हों। अब राज्य सरकारें तय करें कि कौन असली है और कौन नकली है, जबकि सच्चाई यह है कि यह कानून व्यवस्था का मामला है। दूसरी ओर हैदराबाद के एक भाजपा विधायक ने खुले आम दलितों की पिटाई का समर्थन किया है तथा अखलाख की हत्या के मामले में भाजपा नेता हत्यारों के पक्ष में बयान देते रहे हैं। अडवाणी जी ने जिस इमरजैंसी की बात की थी वह भाजपा में निर्विरोध तानाशाही की स्वीकरोक्ति से साफ नजर आने लगी है।   
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

          

शुक्रवार, जुलाई 22, 2016

क्या उत्तर प्रदेश में जनता जीतने वाली है

क्या उत्तर प्रदेश में जनता जीतने वाली है
वीरेन्द्र जैन



मंचों पर कविता पढने वालों में एक प्रवृत्ति घर कर जाती है कि वे अपनी प्रस्तुति को सफल बनाने के लिए पहले अपनी आजमायी हुयी कविता को ही सुनाते हैं तथा उसके ‘चल’ जाने के बाद नये प्रयोग को प्रस्तुत करते हैं। मैं भी कभी मंचों पर जाया करता था और उस दौर में वह एक कविता जरूर सुनाता था जिसे कई मंचों पर सफलता मिल चुकी थी। कविता की पंक्तियां थीं-
ये भी जीते, वे भी जीते
वोट डालते सालों बीते
हर चुनाव में जीते नेता जनता हारी है
जनता जीते, उस चुनाव की मांग हमारी है
इस कविता पर अनजाने में जयप्रकाश आन्दोलन के दौरान लोकप्रिय हुयी दिनकर जी की कविता  ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ का प्रभाव भी रहा होगा क्योंकि यह उसी दौरान लिखी गई थी। उत्तर प्रदेश विधानसभा के आगामी चुनावों की एक वर्ष पूर्व ही शुरू हो गयी गहमा-गहमी से इस प्रसंग की याद हो आई क्योंकि मुझे लगता है कि चुनावी शतरंज खेल रहे सभी चार प्रमुख दल अपनी पराजय टालने के लिए जी जान से जुट गये हैं व कोई भी जीत के प्रति आश्वस्त नहीं है।
इस समय वहाँ समाजवादी पार्टी की सरकार है, जो बहुजन समाज पार्टी को हरा कर इसलिए सत्ता में आ गयी थी क्योंकि उन्होंने नये प्रबन्धनों के द्वारा बहुजन समाज पार्टी से अधिक मत जुगाड़ लिये थे जबकि एनएचआरएम घोटाले में व्यापम की तरह अनेक सन्दिग्ध मौतों की बदनामी के बाबजूद बहुजन समाज पार्टी को पिछले चुनाव में मिले मतों की संख्या में कमी नहीं आयी थी। इस जीत की रणनीति तैयार करने के लिए मुलायम सिंह ने अपने अभिन्न मित्र अमर सिंह को पार्टी से बाहर बैठा दिया था और उनके कारण कभी बाहर चले गये आजम खान को भावप्रवण अभिनय के साथ गले लगा लिया था। ऐसा माना गया कि उनके आने से मुसलमानों के छिटके वोटों पर प्रभाव पड़ा था जिनके समाजवादी पार्टी के परम्परागत वोटों के साथ जुड़ जाने पर यह जीत मिल गई थी। पूरे चुनाव के दौरान उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया था कि जीतने के बाद उनकी पार्टी से मुख्यमंत्री कौन बनेगा पर जीतते ही उन्होंने अपने बड़े बेटे अखिलेश को मुख्यमंत्री घोषित कर दिया था जिसे थोड़ी मान मनौवल के बाद उनके भाई शिवपाल और असंतुष्ट आजम खान को स्वीकार करना पड़ा था। कहा जाता है कि पिछले साल तक उत्तर प्रदेश में चार-पाँच लोग मुख्यमंत्री की अनौपचारिक भूमिका निभाते रहे थे। अखिलेश के शपथ ग्रहण समारोह में ही उनके  दबंग समर्थकों ने जिस अनुशासनहीनता का परिचय दिया था, वह भविष्य का संकेतक था और बाद में भी लगातार जारी रहा। समाजवादी दबंगों के आतंक की प्रतिक्रिया का प्रभाव 2014 के लोकसभा चुनावों में उ.प्र. से भाजपा की जीत में भी दिखा था। कुल मिला कर सच यह है कि समाजवादी पार्टी की सत्ता संस्कृति और सत्ता विरोधी रुझान के कारण जो वातावरण बना है उससे पैदा हुयी सम्भावित हार टालने के लिए वे निरंतर प्रयास कर रहे हैं। इसी प्रयास में निकाले गये जोड़तोड़ कुशल अमर सिंह और कुर्मियों के नेता बेनीप्रसाद वर्मा को दल में वापिस ले लेना भी सम्मलित है। इससे पहले वे बहुजन समाज पार्टी के शासन काल के दागी मंत्री बाबूलाल कुशवाहा के परिवार को पार्टी में सम्मालित कर चुके थे व बाद में एक फूहड़ सी कोशिश तो उन्होंने मुख्तार अंसारी को दल में लेने की की थी किंतु दल में ही विचार भिन्नता के कारण वे उसमें सफल नहीं हो सके। मथुरा काण्ड ने बहुत सारे लोगों की आँखें खोल दी हैं। यादव सिंह के यहाँ छापेमारी में जो दस्तावेज मिले हैं, उनके आधार पर मुलायम कुनबा कभी भी संकट में आ सकता है जिससे केन्द्र में सत्तारूढ भाजपा ही राहत दे सकती है। अमर सिंह को दल में वापिस ले लेने के बाद आज़म खाँ फिलहाल चुप्पी ओढे हुए हैं जो कभी भी टूट सकती है। हालत यह है कि वे भाजपा के साथ खुले में गठबन्धन नहीं कर सकते पर अपमानित आज़म खाँ की औचक प्रतिक्रिया के बाद अमित शाह व अमर सिंह के बीच किसी गुप्त समझौते की रणनीति भी बन सकती है।
भाजपा ने लोकसभा चुनावों के दौरान समय से ध्रुवीकरण करके व कुर्मी वोटों वाले अपना दल के साथ समझौता करके जो जीत हासिल की उसके अनुसार वे 213 विधान सभा क्षेत्र में आगे थे। इसी आधार पर वे उत्तर प्रदेश में जीत की उम्मीद करने लगे थे, पर कई उपचुनावों में मिली पराजय के बाद उन्हें अपनी जमीन खिसकती नजर आ रही है। केन्द्र में काँग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए शासन के नकारात्मक प्रभाव से लाभान्वित नरेन्द्र मोदी की चमक फीकी पड़ चुकी है। घर वापिसी से लेकर कैराना तक के उनके हथकण्डे उजागर हो चुके हैं, हरियाणा में जाटों के उपद्रव के दौरान भाजपा शासन की जो कमजोरी प्रकट हुयी उसने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों को भयभीत कर दिया है। कुर्मी जाति के मतों पर प्रभाव रखने वाला अपना दल दो हिस्सों में विभाजित हो चुका है और उसके संगठन ने एनडीए से नाता तोड़ लिया है। बेनीप्रसाद वर्मा के समाजवादी पार्टी में जाने के बाद तो प्रभाव पड़ेगा ही दूसरी ओर नितीश कुमार के सक्रिय होने से भी इस जति के मतों का रुझान बदल सकता है। उनकी नीति बहुजन समाज पार्टी की बढत को रोकना है और उसके बिकाऊ नेतृत्व से सौदा करके उसे कमजोर होते दिखाना है जिससे खुद को विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर सकें। हाल ही में बहुजन समाज पार्टी से जो नेता टूटे हैं वे भाजपा उन्मुख नजर आते हैं। उनका हर कदम और हर बयान केवल अवसरवादी राजनीति का संकेत देता है। अवसरवादियों को संतुष्ट करने की क्षमता इन दिनो भाजपा के पास ही है। बड़ा स्टाकिस्ट दिखने के लिए बिकने का इरादा करने वाले पुराने माल को सबसे अच्छे दामों में खरीदने की उनकी दुकान खुली हुयी है। उत्तर प्रदेश में वरिष्ठ लोगों को सेवा निवृत्त की श्रेणी में डाल दिया गया है और युवाओं को मौका दिया जा रहा है। किन्तु प्रदेश उपाध्यक्ष ने अपने अति उत्साह में जो नुकसान कर दिया है उसने दलितों को मायावती के पक्ष में संघर्ष के लिए संगठित कर दिया है व भाजपा बैकफुट पर पहुँच गयी है। इस टकराव को दादरी की घटना के बाद पूरे प्रदेश का आतंकित मुस्लिम मतदाता बहुत गहराई से देख रहा है। साध्वी भेषधारी प्राची और आदित्यनाथ से लेकर साक्षी महाराज, निरंजन ज्योति उमा भारती तक नवशिक्षित समाज के लिए आकर्षण के केन्द्र नहीं हैं। मुख्यमंत्री बनने के सपने देखने वाले योगी आदित्यनाथ तो किसी अनुशासन में बँधने वाले लोगों में नहीं हैं क्योंकि पूर्वांचल में भाजपा उनके कारण है वे भाजपा के कारण नहीं हैं। हर चुनाव के अवसर पर वे भाजपा को धमकी देते हैं और हर बार भाजपा नेतृत्व को झुकना पड़ता है।
काँग्रेस जैसी पुरानी पार्टी, समाजवादी पार्टी और भाजपा के सत्ताविरोधी रुझानों पर उम्मीद लगा कर नये प्रयोगों से उम्मीद बाँधने में लगी है। वह प्रशांत किशोर जैसे आंकड़ा प्रबन्धकों को जोड़ कर हास्यास्पद प्रयोग कर रही है। राहुल गाँधी की छवि को खराब करने के लिए भाजपा ने अपने सोशल मीडिया वाले हजारों लोगों को लगा रखा है जिसका मुकाबला करने की जगह प्रियंका गाँधी को लाने की खबरें हैं जिनका प्रचार अभियान भीड़ तो बढा सकता है पर वोटों का रुझान नहीं बदल सकता है। काँग्रेस ने ब्राम्हणों को एक संगठित जाति के वोट बैंक के रूप में प्रस्तुत करने का सपना देखा है जिसके सहारे अगर वह जीतने का भ्रम पैदा करने में सफल हो पाती है तो उसे मुस्लिम वोट मिल सकते हैं किंतु यह दूर की कौड़ी है क्योंकि काँग्रेस वर्तमान में अधिक से अधिक किसी सम्मानजनक गठबन्धन तक पहुँचने का सपना ही देख सकती है। यदि बसपा इतनी कमजोर हो जाती है कि वह काँग्रेस से प्रत्यक्ष या परोक्ष समझौता कर ले तो दोनों को फायदा हो सकता है बशर्ते वे टिकिट देने के सबसे कम विवाद वाले किसी फार्मूले पर पहुँच सकें।
बहुजन समाज पार्टी के पास पिछले विधानसभा चुनावों तक अपना ऐसा वोट बैंक रहा है जो आँख कान बन्द करके मायावती के नाम पर वोट देता रहा है। उनके दल को आरक्षण का लाभ पाये हुए कर्मचारी और अधिकारियों का एक वर्ग भी आर्थिक व प्रशासनिक सहायता देता रहा है किंतु टिकिटों के बिक्रय के समाचारों और उसके द्वारा दलित विरोधी लोगों को सत्ता के द्वार तक पहुँचाने की घटनाओं ने मायावती की छवि को नुकसान पहुँचाया है। जातियों के विलीनीकरण के आन्दोलन को छोड़ कर उन्होंने जो दुकान खोल ली थी उसका नुकसान सामने आ गया है। अब बहुजन समाज पार्टी के पास बहुजन नहीं अपितु मायावती की अपनी जाति के लोग ही बचे रह गये हैं क्योंकि दूसरी जाति के लोगों ने दल में लोकतंत्र न होने के नाम पर अपनी अपनी जाति के अलग अलग दल बना लिये हैं व जाति गौरव का नारा देकर अपनी जातियों के वोटों की अलग दुकानें खोल ली हैं। अपने समर्थन की दम पर बहुजन समाज पार्टी ने कभी समाजवादी तो कभी भाजपा के साथ सरकार बनायी और हर बार इस निष्कर्ष पर पहुँची कि सारे दल उनके समर्थन का लाभ लेने के लिए ही तालमेल करते हैं व बाद में उनकी जातीय अस्मिता उभर आती है। अब वे गठबन्धन में भरोसा नहीं करते जिसका परिणाम यह हुआ कि लोकसभा चुनावों में उनका कोई उम्मीदवार नहीं जीत सका भले ही उन्हें चार प्रतिशत मत मिले हों। मुख्तार अंसारी और ओवैसी मुस्लिम मतों को भटकाने के लिए अपने अलग उम्मीदवार उतार सकते हैं जो किसी को भी जिताने हराने का काम कर सकते हैं। ये समय और परिस्तिथियां ही बतायेंगीं कि वे किस पर कैसा प्रभाव डालते हैं।
घटनाएं और षड़यंत्र अभी और घटने की सम्भावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। टीवी लगातार राजनीतिक प्रशिक्षण दे रहा है इसलिए चुनाव परिणाम ही बतायेंगे कि कौन मतदाता कितना जातियों से ऊपर उठ  चुका है और कितने लोगों को साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के षड़यंत्र समझ में आने लगे हैं, पर इतना तय है कि पुराने जातीय समीकरणों में परिवर्तन अवश्य ही परिलक्षित होगा। जब दलों की जीत की भविष्यवाणी करना मुश्किल हो जाये तो समझ लेना चाहिए की जनता की जीत का समय पास आ रहा है।
  वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629



      

शुक्रवार, जुलाई 15, 2016

कश्मीर के बाहर कश्मीर समस्या

कश्मीर के बाहर कश्मीर समस्या
वीरेन्द्र जैन

कश्मीर अगर समस्या बन गया है तो उसके दो हिस्से हैं। पहला हिस्सा विभाजित हिन्दुस्तान में कश्मीर राज्य के विलय से सम्बन्धित है तो दूसरा हिस्सा भाजपा या संघ परिवार द्वारा अपने राजनीतिक हित के लिए उसको साम्प्रदायिक कोण से देखने की ही नहीं अपितु उसे और अधिक साम्प्रदायिक रूप से प्रस्तुत करने की भी है।
कश्मीर के इतिहास में कभी साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुये। उल्लेखनीय यह भी है कि देश विभाजन के दौर में जब गाँधीजी कश्मीर गये थे तब उनका स्वागत फूलमालाओं से किया गया था दूसरी ओर जब ज़िन्ना वहाँ गये थे तब उन्हें काले झंडे दिखाये गये थे। नब्बे के दशक में पाकिस्तान से घुसपैठ करके आये आतंकियों ने जब अपनी आतंकी कार्यवाहियों के साथ साथ कश्मीरी पंडितों पर भी हमले किये तो वे सुरक्षा की दृष्टि से वहाँ से भाग कर राज्य के दूसरे इलाके जम्मू में बस गये। यह लगभग वैसा ही था जैसे कि चम्बल और बुन्देलखण्ड क्षेत्र में डकैतों के डर से साहुकार लोग गाँव छोड़ कर नगरों में बस गये या जातिवादी उत्पीड़न से बहुत सारे मजदूर दिल्ली में भवन निर्माण मजदूर हो गये, जहाँ भले ही उन्हें मजदूरी की राशि और महानगर के व्यय के अनुपात में कोई विशेष आर्थिक लाभ नहीं हुआ हो किंतु उन्हें जाति आधारित अपमान नहीं सहना पड़ता। बुन्देलखण्ड के छतरपुर, टीकमगढ, पन्ना, महोबा, बाँदा, आदि जिलों में सामंती उत्पीड़न की कहानियां बाहर तक नहीं आ पातीं। तत्कालीन सरकार द्वारा कूटनीतिक कारणों से कश्मीरी पंडितों को न केवल समुचित आर्थिक सहायता, राशन, व निवास स्थल ही दिया गया  अपितु उनकी समस्याओं व उन पर हुयी ज्यादतियों का भरपूर प्रचार भी किया गया। बाद में तो हालात यह हुयी कि उनमें से बहुत सारे लोग असुरक्षा के बहाने कश्मीर वापिस नहीं लौटना चाहते रहे पर अपनी पीड़ा का बयान पीड़ा से कई गुना अधिक करते रहे।
यह सच है कि विस्थापन पीड़ादायक होता है और जीवन पर बहुत दुष्प्रभाव डालता है, किंतु इतिहास में इस पीड़ा को झेलने वाले कश्मीरी पंडित अकेले नहीं हैं। देश के विभाजन के दौर में सिन्धियों, पंजाबियों, बंगालियों आदि की पीड़ाओं की असंख्य मार्मिक कथाएं हैं। आजादी के बाद विकास के नाम पर जो बाँध बनाये गये उनसे उजड़ने वालों की दर्दनाक कहानियां नर्मदा बचाओ आन्दोलन सहित इस क्षेत्र में काम करने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं के मुँह से सुनने पर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उजड़ने का मुआवजा बाँटने वाले अफसरों के घरों से सैकड़ों करोड़ रुपये आये दिन पकड़े जा रहे हैं जो अपराधी गिरोह की हांड़ी के दो चार चावलों में से होते हैं। ये घटनाएं बताती हैं कि सरकारी कोष से मुआवजे के नाम पर निकाला गया अपर्याप्त पैसा भी पीड़ितों तक नहीं पहुँच पाता।  
भाजपा की विभाजनकारी राजनीति के प्रचार अभियान में कश्मीरी पंडितों का मामला हिन्दू मुस्लिम का मामला बना कर पेश किया जाता है। इस के साथ में वे यह झूठ भी लपेट देते हैं कि देश का विभाजन हिन्दू मुस्लिम देशों के रूप में हुआ था और हिन्दुओं के देश में ही हिन्दुओं को पलायन करना पड़ना रहा है व शरणार्थी की तरह रहना पड़ रहा है। नासमझ सरल लोग इस दुष्प्रचार में आ जाते हैं जब कि सच यह है कि देश के विभाजन के समय भले ही पाकिस्तान की पहचान एक मुस्लिम देश के रूप में बनी हो किंतु हिन्दुस्तान ने सर्वसम्मति से खुद को एक धर्मनिरपेक्ष देश घोषित किया था जिसमें नागरिकों के बीच लिंग, धर्म, जाति, रंग और भाषा के आधार पर कोई भेद न होने की घोषणा की गयी थी व बहुत बड़ी संख्या में मुसलमानों ने इसी देश में रहना मंजूर किया था। अम्बेडकर के नेतृत्व में पाँच लाख से अधिक दलितों द्वारा हिन्दू धर्म छोड़ कर बौद्ध धर्म अपनाने पर कोई हलचल नहीं हुयी थी।
यह इतिहास तो सर्वज्ञात है कि किस तरह महाराजा हरि सिंह के समानांतर कश्मीर में शेरे’कश्मीर शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में व्यवस्था चल रही थी व वे ज़मींदारी प्रथा उन्मूलन से लेकर अनेक मांगें  मनवा चुके थे। जनता के प्रतिरोध से डर कर महाराजा हरि सिंह केवल जम्मू के महल तक सीमित होकर रह गये थे पर फिर भी वे अंत अंत तक यही चाहते रहे कि उनके राज्य का विलय न हिन्दुस्तान में हो और न ही पाकिस्तान में हो। जब किराये के अफगानी सैनिकों के सहारे पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला करा दिया जिसका मुकाबला शेख अब्दुल्ला के सैनिकों ने किया व भारत सरकार को साथ साथ मुकाबले के लिए कहा तब दबाव में महाराजा हरि सिंह ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किये। इस तरह हम आधा कश्मीर बचा पाये। शेख अब्दुल्ला के साथ किये गये समझौते के भंग होने, कठपुतली सरकारों के बनते बिगड़ते रहने से कश्मीर में एक अलगाववादी आन्दोलन हमेशा बना रहा जो पाकिस्तान के समर्थन और घुसपैठियों के आतंकी कारनामों के कारण कम ज्यादा होता रहा। तत्कालीन परिस्तिथियों में भाजपा ने पीडीपी के नेतृत्व में बेमेल गठबन्धन की सरकार बनायी। इसी दौर में आतंकी गतिविधियों व घुसपैठियों के प्रवेश में बढोत्तरी हुयी।
अपने राजनीतिक लाभ के लिए भाजपा एक ओर तो नेहरू की छवि को ध्वस्त करने के लिए सारी समस्याओं का ठीकरा नेहरू के सिर फोड़ती रहती है व उनकी भक्त मंडली सोशल मीडिया पर अपशब्दों का प्रयोग करती रहती है। दूसरी ओर वह कश्मीर को हिन्दू बनाम मुसलमान की तरह प्रस्तुत करके यह प्रचारित करती रहती है कि कश्मीर के सारे मुस्लिम नागरिक  आतंकवाद के समर्थक हैं और वे पाकिस्तान से धन प्राप्त करके सेनाओं पर पत्थर फिंकवाते हैं। सच तो यह है कि नेहरू जो खुद कश्मीरी पंडित थे, के संकल्प के कारण ही कश्मीर भारत का हिस्सा बना रह सका। जिस कश्मीर में अब तक अलगाववादी आन्दोलन में 94000 से अधिक लोग मारे जा चुके हों वहाँ कूटनीतिक प्रयास ही करने पड़ेंगे। भाजपा को समझना चाहिए कि अब वह सत्ता में है और उसे खुद को विपक्षी दल समझने की आदत को भूल जाना चाहिए। जरूरी है कि वह विपक्षी के रूप में दिये गये असंगत बयानों से दूरी बना ले। कश्मीर का भूभाग ही नहीं अपितु उस क्षेत्र में रहने वाले भी हमारा अभिन्न अंग हैं, उन्हें दुश्मनों की तरह नहीं मारा जा सकता।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

          

सोमवार, जुलाई 04, 2016

राज्यसभा के प्रतिनिधित्व का एक नमूना

राज्यसभा के प्रतिनिधित्व का एक नमूना

वीरेन्द्र जैन
एसोशियेशन आफ डेमोक्रेटिक रिफोर्म [एडीआर] एक ऐसी संस्था है जिसने देश में अनेक चुनाव सुधार करवाये हैं और अभी भी इस दिशा में लगातार सक्रिय है। सिद्धांत और व्यवहार का जो दोहरापन हमारे लोकतंत्र में चल रहा था उसे सामने लाकर इस संस्था ने देश की जनता और उसके कर्णधारों को सोचने के लिए दिशा दी है। इस संस्था के प्रयासों के कारण ही अब हर उम्मीदवार को अपनी शिक्षा सम्पत्ति और दायित्वों तथा उस पर चल रहे प्रकरणों के सम्बन्ध में शपथपत्र देना होता है। यह संस्था उन समस्त शपथपत्रों को समेकित करके रिपोर्ट तैयार करती है और सूचना माध्यमों द्वारा जनता के सामने रखती है।
जन विश्वास है कि चुनावी नेताओं द्वारा दिये गये शपथपत्र शतप्रतिशत भले ही तकनीकी रूप से सही हों किंतु वे चुनावों में जिस तरह से धन बहाते हैं उससे वे असत्य ही लगते हैं। एडीआर ने शपथपत्रों के आधार पर हाल ही में चुने गये 57 राज्यसभा सदस्यों के चरित्रों की जाँच पड़ताल की है। इसके निष्कर्ष संवेदनशील सामाजिक सोच वाले व्यक्तियों के लिए विचारोत्तेजक हो सकते हैं।   
·         चुने गये सभी 57 सदस्यों में से 55 [96%] करोड़पति हैं जिनसे समाज के अंतिम व्यक्ति की सेवा करने की उम्मीद की जाती है। इन सदस्यों की औसत सम्पत्ति 35.84 करोड़ रुपये है।
·         कुल 19 सांसदों पर एक करोड़ से अधिक की देनदारी भी है।
·         उम्र की दृष्टि से दोनों ओर के रिकार्ड बिहार की आरजेडी ने तोड़े हैं जिसमें एक ओर तो 92 वर्ष के रामजेठमलानी चुने गये हैं तो दूसरी ओर 41 वर्ष की मीसा भारती भी चुनी गयी हैं। बीच की उम्र के 25 [44%] 41 से 60 वर्ष के बीच के हैं तो 31 [54%] 61 से 80 वर्ष की उम्र के हैं।
·         33% महिलाओं का जोर शोर से समर्थन करने वाले दलों ने कुल 4 [7%] महिलाओं को उच्च सदन में भेजा ।  
·         इन सदस्यों में से सभी के पास शिक्षा के प्रमाणपत्र हैं जिनमें से 2 [4%] पीएचडी 33 [58%] स्नातकोत्तर, 18 [32%] स्नातक और 3 [5%] मैट्रिकुलेट हैं।
·         इन [सु]शिक्षित करोड़पति राजनेताओं में से 13 [23%] के खिलाफ आपराधिक प्रकरण चल रहे हैं ऐसा उन्होंने अपने शपथपत्र में बताया है।
·         सबसे अधिक सम्पत्ति घोषित करने वालों में पहला नाम शरद पवार की पार्टी एन सी पी के प्रफुल्ल पटेल हैं जिनकी सम्पत्ति 252 करोड़ है तो दूसरे नम्बर पर काँग्रेस के कपिल सिब्बल हैं जिनकी सम्पत्ति 212 करोड़ है। तीसरे नम्बर पर भी भाजपा नहीं है अपितु बीएसपी के सतीश चन्द्र मिश्रा हैं जिनकी घोषित सम्पत्ति 193 करोड़ है।
·         सबसे कम सम्पत्ति वालों में भाजपा ने पहले दो स्थान अर्जित किये हैं जिनमें 66 लाख की सम्पत्ति घोषित करने वाले अनिल माधव दवे हैं तो 86 लाख की सम्पत्ति घोषित करने वाले रामकुमार हैं। तीसरे नम्बर पर् एक करोड़ आठ लाख घोषित करने वाले काँग्रेस के प्रदीप टम्टा हैं।
·         इनमें से कुछ दोबारा चुने गये हैं और पिछले चुनाव के दौरान घोषित सम्पत्ति की तुलना में इन्होंने चौंकाने वाली प्रगति दर्ज की है। एक बार फिर भाजपा के श्री अनिल माधव दवे का उल्लेख आया है जिन्होंने 2010 के चुनाव में कुल दो लाख पचहत्तर हजार की कुल सम्पत्ति से 2111% का विकास करके 66 लाख तक पहुँचे हैं। दूसरे नम्बर पर शिवसेना के श्री संजय राजाराम रावत हैं जिन्होंने 2010 में घोषित एक करोड़ 51 लाख से 14 करोड़ 22 लाख अर्थात 841% की आर्थिक प्रगति घोषित की है। तीसरे नम्बर पर प्रगति के प्रतिशत में बीएसपी के श्री सतीश चन्द्र मिश्रा हैं जिन्होंने 2010 में घोषित 24 करोड़ 18 लाख से 193 करोड़ तक पहुँच कर 698% विकास करने की घोषणा की है।
·         राजनीति से समाज सेवा करते हुए वर्ष 2014-15 की आयकर विवरणी में सबसे अधिक आय घोषित करने वाले काँग्रेस के कपिल सिब्बल हैं जिन्होंने 39 करोड़ से अधिक की आय घोषित की है तो दूसरे नम्बर पर भी काँग्रेस के श्री विवेक तन्खा हैं जिन्होंने 15 करोड़ 19 लाख से अधिक की आय घोषित की है। तीसरे नम्बर पर एनसीपी के प्रफुल्ल पटेल हैं जिन्होंने भी 15 करोड़ से अधिक की पारिवारिक आय दर्शायी है।
आंकड़े बहुत सारे हैं पर सब का निष्कर्ष यही है कि राज्यसभा में पहुँचने वाले ज्यादातर पैसे वाले या उनके प्रतिनिधि ही होते हैं, जिनमें से भी ज्यादातर वकील होते हैं। विकास का पाठ पढाने वाले कालेजों को राज्यसभा के अनेक सांसदों को आमंत्रित कर आर्थिक विकास पर व्याख्यान आयोजित करवाना चाहिए।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629


शनिवार, जून 18, 2016

फिल्म समीक्षा उड़ता पंजाब – सेंसर बोर्ड विवाद से पूर्ण हुयी फिल्म

फिल्म समीक्षा
उड़ता पंजाब – सेंसर बोर्ड विवाद से पूर्ण हुयी फिल्म
वीरेन्द्र जैन

विवाद से प्रचार का ऐसा नाता जुड़ गया है कि फिल्मों से जुड़े अनेक विवाद सन्देहास्पद और नकली लगते हुए उसके व्यापार का एक हिस्सा लगते हैं। किंतु अनुराग कश्यप की फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ का विवाद पूर्व नियोजित नहीं था। फिल्मी दुनिया के साथ साथ बाहर के लोगों को भी लगा, और सही लगा कि अपनी पद स्थापना से ही कमतरी का आरोप झेल रहे सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष ने अपने राजनीतिक आकाओं के हित में एक बड़ी समस्या पर बनी फिल्म की रिलीज में अड़ंगा लगाने की कोशिश की है। इसी विवाद के बीच सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रह्लाद निहलानी ने इस बहस में खुद को नरेन्द्र मोदी का चमचा होने का आरोप स्वीकारते हुए इस आशंका को बल दिया कि फिल्म में दिखायी गई सच्चाई से भाजपा-अकाली दल की आगामी चुनावी सम्भावनाएं प्रभावित हो सकती हैं। फिल्म के काटे गये हिस्सों को दिखाने की अनुमति देकर न्यायालय ने विवाद को समाप्त कर दिया। पीड़ित के पक्ष में न्याय के साथ खड़े होने वाले बहुत सारे लोगों ने अपना समर्थन व्यक्त करने के लिए फिल्म को पहले दिन ही देखने का फैसला किया जिनमें से मैं भी एक हूं।
 सच तो यह है कि फिल्म में ऐसा कुछ भी नया उद्घाटित नही किया गया है जिसका विभिन्न मीडिया माध्यमों द्वारा पहले से खुलासा नहीं किया जा चुका हो। फिल्म की जिम्मेवारी थी कि उन जानकारियों को एक कथा के माध्यम से प्रस्तुत कर के संवेदनाओं से जोड़े। खेद है कि इस फिल्म में सूचनाएं तो हैं किंतु उन सूचनाओं को देने के लिए रची गयी कथा बालीवुड की चालू फिल्मों की तरह है। जरूरत यह थी कि इस विषय पर कलात्मक फिल्म बनायी जाती। कथा में इतने फूहड़ संयोग हैं जिनसे विषय को बल मिलने की जगह वह कमजोर होता है। यह तो ठीक रहा कि न्यायालय ने इसे बिना किसी कट के जारी करने का आदेश दे दिया बरना फिल्म कथा की सारी कमजोरियों का दोष भी सेंसर बोर्ड की कटौतियों के सिर जाता।
पंजाब में कृषि क्रांति के बाद आई सम्पन्नता से जन्मा अतिरिक्त धन नशे की भेंट चढ गया। शराब पर लगने वाले टैक्स साल दर साल बढते गये जिससे नशे के आदी हो चुके कमजोर आर्थिक वर्ग ने अपेक्षाकृत सस्ते नशों का उपयोग प्रारम्भ किया और इस चक्कर में हेरोइन जैसे किस्म किस्म के नशे वाले रासायनिक पदार्थ समाज में आने लगे। ये सब पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे देशों से स्मगल हो कर आते हैं जिसके बदले में उन्हें अवैध हथियारों की सप्लाई आदि की व्यवस्थाएं भी की जाती हैं जिसके लिए देश हित को नुकसान पहुँचाने वाला एक बड़ा तंत्र स्थापित हो चुका है। इस तंत्र में सत्तारूढ दल के मंत्री, नेता, पुलिस आदि सुरक्षा एजेंसियां भी भागीदार बन चुकी हैं। इस नशे की तासीर ऐसी होती है कि जल्दी ही इसका सेवन करने वाला इसका आदी बन जाता है व इस एडिक्शन की गुलामी में वह कुछ भी करने को तैयार हो जाता है। इस तरह से जुझारू कौम की एक पूरी पीढी के तेवरों को ढीला कर उन्हें गुलाम बना लिया गया है। कहा जाता है कि पंजाब में खालिस्तानी आन्दोलन के दुष्प्रचार से भटके नौजवानों को एक दूसरे भटकाव में धकेलने के लिए तत्कालीन सरकार के जिम्मेवार लोगों ने इसे प्रारम्भ में ही रोकने की गम्भीर कोशिशें नहीं कीं। बाद में लाभान्वित पुलिस आदि सुरक्षा बलों के लोगों की दाढों में खून  लग चुका था जिन्होंने अगली सरकारों को भी उसी रंग में रंग दिया। कुछ दिनों बाद तो वे पिछलों से बहुत आगे निकल गये।
फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ में तीन अध्याय हैं। एक में पुलिस की मिली भगत से राजनीतिक संरक्षण पाये हुए एक माफिया से एक सोशल एक्टविस्ट लेडी डाक्टर के टकराने की कहानी है। यह लेडी डाक्टर [करीना कपूर] नशे के उन्मूलन के लिए चिकित्सकीय सेवायें दे रही है, पर वह इस रैकिट का खुलासा कर उसका खात्मा भी चाहती है। नशे के कारोबार से ऊपरी कमाई करने वाले पुलिस के एक असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर का छोटा भाई नशे का एडिक्ट हो जाता है तब उसे इसकी गम्भीरता का पता चलता है और वह उस लेडी डाक्टर का सहयोगी हो जाता है। दूसरा अध्याय एक राक स्टार [शाहिद कपूर] के नशे की गिरफ्त में आने का है जो गिरफ्तार होने के बाद नशा छोड़ने के साथ अपनी कलात्मकता भी खो देता है और कभी युवाओं की आँखों का सितारा रहा होने के बाद उनके आक्रोश का शिकार होता है। तीसरे अध्ययाय में बिहार में कभी हाकी खिलाड़ी रही एक लड़की [आलिया भट्ट] को मजदूरी करने के लिए पंजाब में आना पड़ता है जिसके हाथ नशे के पाउडर की एक थैली लग जाती है और उसे बेचने के चक्कर में वह नशे के माफिया की गिरफ्त में आ जाती है जो उसको न केवल कैद रखते हैं अपितु उसे नशे का इंजैक्शन दे दे कर उसका दैहिक शोषण भी करते हैं। बाद में इन तीनों अध्यायों को बालीवुड अन्दाज में बेतरतीब ढंग से जोड़ दिया गया है व रक्त रंजित अंत दिखा कर फिल्म निबटा दी गई है। अनुभवी कलाकारों ने अपनी भूमिका का यथोचित निर्वाह किया है क्योंकि कथा में ज्यादा कुछ करने की गुंजाइश ही नहीं थी।
पुलिस, राजनेता, के कारनामे सहित नशे की भयावहता के एक अंश को संकेत के रूप में दिखाने का काम तो फिल्म ने किया है पर उसकी व्यापकता और गम्भीरता को उससे पहले उठे सेंसर बोर्ड के विवाद ने कर दिया जिसे फिल्म का ही एक हिस्सा माना जा सकता है। इस विवाद के बिना यह बहुत साधारण फिल्मों में ही गिनी जाती।   
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

    

शुक्रवार, मई 20, 2016

पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम ; उर्फ अन्धों का हाथी

पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम ; उर्फ अन्धों का हाथी
वीरेन्द्र जैन
बहुत सावधानी और सुरक्षा के लिए दो महीनों तक खींचे गये पाँच राज्यों की विधानसभाओं के चुना परिणाम तय तिथि पर घोषित हो गये। यद्यपि चुनाव सर्वेक्षण सामने दिखाई दे रहे माहौल से लगाये जा रहे अनुमान से अधिक कुछ नहीं होते हैं, सो लगभग वैसे ही परिणाम सामने आये जैसी सम्भावना सूंघी जा रही थी। ये चुनाव इस विशाल और विविधिताओं से भरे देश के उत्तर पूर्व से लेकर धुर दक्षिण तक के राज्यों में हो रहे थे और परिणाम भी वैसे ही आये। इन परिणामों से देश के मिजाज का कोई अनुमान निकालना नामुमकिन है।
चुनावों में छह मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल और अनेक राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त दल चुनाव लड़ रहे थे, जिनमें से असम में भाजपा, पादुचेरि [पाण्डुचेरी] में काँग्रेस, केरल में सीपीएम-सीपीआई के नेतृत्व वाला वाममोर्चा सरकार गठित करने जा रहा है तो दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में तृणमूल काँग्रेस और तामिलनाडु में एआईडीएमके की सरकार बनने जा रही है जो राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त व्यक्ति केन्द्रित दल हैं। इन सभी दलों की विचार धाराओं और संगठनों में कोई साम्य नहीं है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि जनता ने इसके पक्ष में, या उस विचार या कार्य के विरोध में अपना मत व्यक्त किया है।
भाजपा इसलिए खुशी का मुखौटा लगा रही है क्योंकि उसे पहली बार उत्तरपूर्व के किसी राज्य में सरकार बनाने का मौका मिला है और देश के पश्चिमी राज्यों की पार्टी होने की उसकी पहचान में बदलाव आया है। अब वह तकनीकी आधार से बाहर जाकर भी खुद को राष्ट्रीय पार्टी कह सकती है, भले ही उसके आलोचक कह रहे हों कि यह उसकी विचारधारा की जीत नहीं अपितु यह अवसर काँग्रेस के कुछ महात्वाकांक्षी विधायकों के दल बदलने से उसे मिल पाया है। आंकड़े वाले लोग कह रहे हैं कि उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनावों में ही 36.5% मत मिल चुके थे पर इन विधानसभा चुनावों में 29.8% रह गये। इसी प्रतिशत के आधार पर भाजपा पश्चिम बंगाल और केरल में सीटों की संख्या में पिछड़ने के बाद भी अपने दल का विकास दिखा रही है। जीत के इस अहंकार में कोई नहीं देख रहा कि असम में दूसरे साम्प्रदायिक और अलगाववादी दलों ने भी अपना समर्थन और सीटों दोनों में वृद्धि की है। एआईयूडीएफ ने 12.4% प्रतिशत मत लेकर 12 सीटें जीती हैं, तो बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट ने भी 3.8% प्रतिशत मत लेकर 12 सीटें जीती हैं। भाजपा ने केरल में एक सीट से प्रवेश कर के बंगाल में दो सीटें जीती हैं। गुजरात के एक् उपचुनाव में भी भाजपा ने ही जीत हासिल कर ली, भले ही काँग्रेस ने बराबर की टक्कर दी।
वाम मोर्चा बंगाल में 26 सीटों तक सिमिट कर रह गया जबकि उसके चुनावी सहयोगी काँग्रेस को 45 सीटें मिल गयीं। दूसरी ओर वह इस बात से खुश है कि उसने सबसे शिक्षित, सबसे प्रगतिशील राज्य केरल में दुबारा से सत्ता प्राप्त कर ली है। वहीं तमिलनाडु में 10% से भी अधिक मत पाकर भी पिछली विधान सभा में जीती अपनी 20 सीटें नहीं बचा सकी। उसकी ऐसी क्षति उसकी राष्ट्रीय मान्यता पर भी खतरा ला सकती है। वामपंथी दल भारतीय राजनीति के सबसे अधिक संवैधानिक नियमों का पालन करने वाले, अनुशासित और ईमानदार दल हैं जो अपने अध्य्यन और वैज्ञानिक चिंतन व व्यवहार से लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखे हुए हैं। उनकी कमजोर उपस्थिति भी महत्वपूर्ण होती है।
तामिलनाडु में व्यक्ति केन्द्रित दो दलों ने अपना वर्चस्व बना रखा है। इस इक्कीसवीं शताब्दी के लोकतंत्र में भी ऐसी अन्धभक्ति अचम्भित करती है जिसमे जयललिता के जेल जाने पर वैकल्पिक मुख्यमंत्री साष्टांग दण्डवत करता नजर आता हो और उनके जेल से बाहर आने के बाद रामकथा के भरत की तरह अपना राज पाठ जस का तस सौंप देने में रत्ती भर संकोच न करता हो। उल्लेखनीय है कि भाजपा में जब जब किसी मुख्यमंत्री को बदलने की कोशिश हाई कमान ने की वह विद्रोही हो गया व दूसरा दल बना लिया। कल्याण सिंह, उमा भारती, येदुरप्पा, मदनलाल खुराना, जैसे अनेक उदाहरण हैं। वसुन्धरा राजे ने हाई कमान की लाख कोशिशों के बाद भी पद नहीं छोड़ा था। पुराणों में वर्णित भगवानों की भूमिका करने वाले फिल्मी अभिनेता की पहचान ही दक्षिण की राजनीति का प्रवेश द्वार माना जाता है। भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल जाने के बाद भी सस्ता चावल व उपहार देने वाली पूर्व अभिनेत्री जयललिता का जादू बरकरार है भले ही वैसे ही आरोपों वाले उनके प्रतिद्वन्दी ने बराबर की टक्कर दे कर् ठीक ठाक सीटें प्राप्त कर लीं।
काँग्रेस भले ही सब ओर से पराजित नजर आ रही हो किंतु आंकड़ों के चश्मे से देखने पर वह भी आत्मसंतोष का घूंट पी सकती है। भले ही 30 सीटों वाले एक छोटे से राज्य में सरकार बनाने का अवसर मिला हो किंतु जो कभी सबसे बड़ी पार्टी रही हो उसे शून्य से मुक्ति तो मिल ही गयी है। भले ही काँग्रेस ने असम की सत्ता खो दी हो किंतु उसने अकेले चुनाव लड़ कर 31.1% मत प्राप्त किये जबकि उसकी प्रतिद्वन्दी भाजपा को कुल 29.8% मत ही मिले हैं जिसने असम गण संग्राम परिषद से समझौता करके चुनाव लड़ा था। काँग्रेस गर्व के साथ कह रही है कि उसने साम्प्रदायिक माने जाने वाले एआईयूडीएफ के आग्रह के बाद भी समझौता नहीं किया। आज के आंकड़े बता रहे हैं कि ऐसा करके वह चुनाव जीत सकती थी। बंगाल में उसने लेफ्ट फ्रंट से अधिक सीटें जीत कर विरोधी दल का हक प्राप्त कर लिया। केरल में उसके कुल 5% वोट ही कम हुये हैं, ये बात अलग है कि वहाँ एक सीट के अंतर से ही उसने पिछली सत्ता पायी थी।
सास भी कभी बहू थी की तरह तृणमूल काँग्रेस भी कभी काँग्रेस ही थी और उसी से निकली ममता बनर्जी ने काँग्रेसियों के आचरणों से अलग अपने अथक संघर्ष और कम्युनिष्टों जैसी सादगी के स्वरूप से ऐसी लोकप्रियता प्राप्त कर ली कि गुरु गुड़ ही रह गया और चेला शक्कर हो गया। वामपंथ के शासन काल में काँग्रेस की जगह तृणमूल काँग्रेस ने विपक्ष का पद हथिया लिया और एंटी इंकम्बेंसी का लाभ भी उसे ही मिला। भक्ति अन्धी ही होती है इसलिए शारदा घोटाले में उसके नेताओं के जेल जाने, और स्टिंग आपरेशन में पकड़े जाने के बाद भी उनके समर्थन में कमी नहीं आयी। माल्दा जैसी हिंसक घटनाएं भी उनका समर्थन कम नहीं कर सकीं, भले ही भाजपा ने फिल्मी कलाकारों, सुभाष बोस की फाइलों का तूमार बाँध कर उनके पड़पोते को उनके खिलाफ खड़ा कर दिया हो। संघर्षशील बौद्धिक बंगाल में ममता बनर्जी ने अपना जो स्थान बनाये रखा है वह अचम्भित करता है, पर सच है।  
चुनाव परिणामों में किसी के हाथ में हाथी का कान आया है और किसी के हाथ में उसका पांव आया है। वे उसी आधार पर अपने निष्कर्ष निकाल रहे हैं जबकि सच तो यह है कि ये चुनाव परिणाम आगे की ओर नहीं ले जाते।   
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

         

मंगलवार, मई 17, 2016

सिंहस्थ के विचार महाकुम्भ में मोदी

सिंहस्थ के विचार महाकुम्भ में मोदी
वीरेन्द्र जैन

किसी अवसर पर परम्परागत रूप से जुटने वाले जनसमुदाय को अगर सामाजिक परिवर्तन का साधन बनाया जा सके तो उससे लोगों को जुटाने की आधी समस्या तो वैसे ही हल हो जाती है। इसलिए सिंहस्थ में विचार महाकुम्भ के विचार को एक अच्छा कदम माना जा सकता था बशर्ते इसका वैसा ही स्तेमाल हुआ होता। जब उज्जैन में आयोजित होने वाले कुम्भ मेले में विचार कुम्भ की योजना के संकेत मिले थे तो उसके प्रति प्रशंसा के भाव उभरे थे। किंतु इसे एक राजनीतिक प्रचार का अवसर बना देने से इसका पावन उद्देश्य खो गया व जनता से टैक्स के रूप में वसूले गये धन के अपव्यय का एक और साधन बना दिया गया जैसा कि दिशाहीन सांस्कृतिक आयोजनों के नाम के नाम पर चीन्ह चीन्ह के रेवड़ियां बांटने का काम दशकों से चल रहा है।
उल्लेखनीय है कि तीन दिवसीय विचार महाकुम्भ के पहले दिन सबसे अधिक सर्कुलेशन का दावा करने वाले सूचना [समाचार] पत्र ने लिखा “तीस करोड़ व्यय वाले वातानुकूलित पंडाल में सरकारी अधिकारी - कर्मचारियों की फौज के साथ संघ के बहुसंख्यक कार्यकर्ताओं की उपस्थिति से प्रारंभ में ही यह अनुभूति होती है कि आप संघ के कार्यक्रम में हैं”। पहले सत्र में मोहन भागवत की अध्यक्षता में तो कुर्सियां भरी भी थीं किंतु बाद के सत्र में जब राम माधव वाले सत्र में किसी ने रुचि नहीं ली तो कुर्सियां खाली रहीं। छत्तीसगढ की एक भाजपा महिला नेत्री ने कहा कि इस कार्यक्रम के लिए वह दो बसें भर कर लायी है। देश और प्रदेश के स्वतंत्र विचारकों को आमंत्रण भेजने की बजाय भाजपा और संघ के कार्यकर्ताओं को ही बुलाया गया था। केवल वन्दना शिवा का नाम अपवाद था।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाषण उनके पिछली चुनावी सभाओं में दिये गये भाषणों से पक चुके लोगों को ताज़ा हवा की तरह लगा होगा। उन्होंने भारतीय समाज की जागरूकता और परिवर्तनशीलता को कुम्भ से जोड़ते हुए कहा कि “पहले कुम्भ के दौरान संत और समाजवेत्ता समाज की चिंता करते थे और भविष्य के लिए नई विधाओं का अन्वेषण करते थे। अगले बारह साल के लिए समाज की दिशा और कार्य योजना तय होती थी। पर धीरे धीरे इस परम्परा के प्राण खो गये”। अगर वे चाहते तो अपने वक्तव्य में नेहरू की पंचवर्षीय योजना को भी ला सकते थे जिसके सहारे ही आज़ादी के बाद इस देश ने विकास के मूल आधार स्थापित किये थे। खेद की बात तो यह है कि उन्होंने खुद ही योजना आयोग को समाप्त कर दिया है और उसकी जगह नीति आयोग बना दिया है। 
कभी तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने परमाणु परीक्षण के बाद शास्त्री जी के नारे ‘जय जवान, जय किसान’ में ‘जय विज्ञान’ जोड़ा था किंतु बाद में वह केवल जुमला बन कर रह गया था। मोदी जी ने मुम्बई में मुकेश अम्बानी के एक अस्पताल का उद्घाटन करते हुए गणेश मूर्तियों की कथा के माध्यम से शल्य चिकित्सा के पुराने ज्ञान का जो उल्लेख किया था उससे उनकी वैज्ञानिक समझ पर प्रश्न चिन्ह लगे थे। उससे जुड़ी आलोचनाओं के बाद उन्होंने वैसे तर्क बाद में नहीं दिये भले ही इतिहास के ज्ञान सम्बन्धी कुछ भूलें अवश्य चर्चा में आयीं। इस विचार कुम्भ में उन्होंने कहा कि भारतीय मूल्यों और ज्ञान को वैज्ञानिक आधार पर दुनिया के सामने रखना होगा। विचार को कर्म से जोड़ने के सफल उदाहरण के रूप में उन्होंने शास्त्री जी द्वारा प्रति सोमवार को उपवास का आवाहन और हाल ही में गैस सब्सिडी छोड़ने को बताया। उन्होंने कहा कि हमारे सामने चुनौती है कि समय की कसौटी पर खरे उतरें। श्री मोदी ने सिहस्थ मेले को विमान से देखा। न तो उन्होंने नदी में स्नान किया और न ही महाकाल मन्दिर में दर्शानार्थ गये।  
इस विचार महाकुम्भ में  विचार को कर्म से जोड़ने के कुछ प्रयास हो सकते थे जो नहीं हुये। जैसे एक बार आनन्द्पुर साहब में प्रत्येक आगुंतक को प्रसाद के रूप में एक एक पौधा दिया गया था और इस पौधे को रोपने के लिए कहा गया था। प्रसाद के पौधे को सबने अपना कर्तव्य समझ कर रोपा और इस प्रयास से लाखों पौधे रोपे गये। अच्छा होता यदि ऐसा ही कोई प्रयास इस कुम्भ में भी किया गया होता। जिस तरह से स्वतंत्रता संग्राम के समय तिलक ने गणेश पंडालों के माध्यम से स्वतंत्रता के प्रति जागरूकता बढायी थी वैसा ही कोई प्रयास इस दौरान हो सकता था। अगर लाखों लोग नियत तिथि पर बिना आमन्त्रण के कुम्भ में पहुँच सकते हैं तो उनकी इस ऊर्जा का देश के हित में सार्थक स्तेमाल भी हो सकता है, बशर्ते इसे एक संगठन या दल के हित में कार्यक्रम बनाने की जगह राष्ट्रीय हित के कार्यक्रम में बदला जाये। इस बार के कुम्भ में बहुत बड़ी राशि व्यय की गयी है जबकि देश और प्रदेश अनेक प्राकृतिक संकटों से जूझ रहा है। इसलिए जरूरी है कि ऐसा लगे कि उक्त राशि किसी समुदाय विशेष की भावनाओं के तुष्टिकरण के लिए नहीं अपितु ‘सब जन हिताय’ व्यय हुयी है। दूसरी ओर विभिन्न धार्मिक संस्थानों में अटूट धन राशि एकत्रित होती जा रही है जिसका अगर योजनाबद्ध ढंग से उचित स्तेमाल नहीं होगा तो वह हिंसक टकराव का कारण बन सकती है। इस अवसर पर यदि इसकी कोई योजना बन सकती तो अच्छा था। उम्मीद की जाना चाहिए कि अगले कुम्भ सरकारी धन की जगह आस्थावानों और धार्मिक संस्थानों में जमा दौलत से संचालित होंगे। 
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629