सोमवार, जून 26, 2017

राष्ट्रपति का चुनाव और सामाजिक दशा के संकेत

राष्ट्रपति का चुनाव और सामाजिक दशा के संकेत
वीरेन्द्र जैन

              राष्ट्रपति पद के चुनाव परिणाम से देश की राजनीति पर सीधे सीधे कोई प्रभाव भले ही नहीं पड़े किंतु इससे देश और समाज की दशा को समझने में मदद जरूर मिलेगी क्योंकि इस चुनाव में व्हिप जारी नहीं हो सकता। स्मरणीय है कि 1969 में यह राष्ट्रपति का चुनाव ही था जिसके सहारे श्रीमती गाँधी ने अपनी सरकार पर अपने ही वरिष्ठ साथियों की कुदृष्टि के संकेत समझे थे और साहसपूर्ण फैसले लेकर अपनी पार्टी के उम्मीदवार को हरवाने के लिए आत्मा की आवाज पर वोट देने का आवाहन किया था। उसी चुनाव में पहली बार वामपंथियों के प्रस्ताव पर उम्मीदवार बने व्ही व्ही गिरि सत्तारूढ काँग्रेस के प्रत्याशी नीलम संजीव रेड्डी को हरा कर विजयी हुये थे। इसी दौर में सरकार के अल्पमत में आने के खतरे को देख कर श्रीमती गाँधी ने वामपंथी पार्टियों से समर्थन मांगा था और उसके बदले में बड़े बैंकों व बीमा कम्पनियों के राष्ट्रीयकरण और राजाओं के प्रिवीपर्स व विशेषाधिकार को समाप्त करने की घोषणा की थी। यही वह समय था जब श्रीमती गाँधी को अपनी पार्टी की छवि बदलने के लिए समाजवाद और गरीबी हटाओ का नारा उछालना पड़ा था। इसी के बाद हुये लोकसभा चुनावों में उन्होंने काँग्रेस की गिर चुकी साख को फिर से प्राप्त कर अभूतपूर्व समर्थन पाया था। पाकिस्तान के विभाजन में भारत की भूमिका निभाने में सोवियत संघ का समर्थन व अमेरिका द्वारा सातवें बेड़े का भेजा जाना भी एक बड़ी घटना थी। इसी के बाद श्रीमती गाँधी के खिलाफ देश भर में दक्षिणपंथी शक्तियां सक्रिय हो गयीं थीं जिन्हें श्रीमती गाँधी ने अमेरिका के इशारे पर प्रेरित फासिस्ट ताकतें बताया था और उनके आन्दोलन को दबाने के लिए इमरजैंसी का सहारा लिया था। यह चुनाव भी जिन परिस्तिथियों में हो रहा है उसमें शक्तियों की पहचान, उनके नये गठबन्धनों का निर्माण और पुराने के विघटन देखने को मिल सकते हैं, जिससे शक्ति संतुलनों में उथल पुथल हो सकती है। यह चुनाव भी देश की राजनीति में परिवर्तन ला सकता है।
उल्लेखनीय है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी की उम्मीदवारी पर समुचित विवाद रहा था और गहरा असंतोष पैदा हुआ था। अडवाणी इस पद के लिए भाजपा में सबसे वरिष्ठ, अनुभवी, सम्मानित व सुपात्र व्यक्ति थे इसके विपरीत नरेन्द्र मोदी की छवि ऐसी थी कि दुनिया के प्रमुख देशों ने उन्हें वीजा देने तक से मना कर दिया था। अनेक विधायकों पर मुसलमानों के नरसंहार से लेकर हत्याओं तक के गम्भीर आरोप थे जिन्हें जानते समझते हुए भी उन्होंने टिकिट ही नहीं दिया था अपितु मंत्रिमण्डल में भी रखा था। दूसरी ओर औद्योगिक राज्य गुजरात के आर्थिक विकास से जुड़ा कार्पोरेट घरानों का समर्थन और उन पर आर्थिक भ्रष्टाचार का कोई आरोप न होना उनके पक्ष में जाता था। हिन्दू साम्प्रदायिकता से प्रभावित एक वर्ग उन्हें नायक की तरह देखता था। नरेन्द्र मोदी ने चुनाव में जीत का कुशल प्रबन्धन करके वह जीत दिलवा दी जिसके लिए भाजपा और उसकी मातृ संस्था आरएसएस बरसों से तरस रही थी। इस जीत के साथ साथ उन्होंने पार्टी की कमान भी सम्हाल ली और अनेक आरोपों से घिरे रहे अपने दाहिने हाथ अमित शाह को पार्टी अध्यक्ष बनवा दिया। जीत के साथ ही उन्होंने भाजपा में पार्टी नाम के अलावा बहुत कुछ बदल दिया। वरिष्ठ नेताओं को मार्ग दर्शक मण्डल के नाम पर मुख्य धारा से किनारे कर दिया। पार्टी के नाम की जगह केवल मोदी मोदी होने लगा। अटल बिहारी वाजपेयी के कथित फील गुड को कभी याद नहीं किया गया और उसे भी काँग्रेस के सत्तर साला शून्य उपलब्धियों के काल में मिला कर प्रचारित किया। अटल अडवाणी के चित्रों को पोस्टर पर छापने की परम्परा समाप्त कर दी गयी। मीडिया को अपने प्रिय कार्पोरेट घरानों से खरीदवा दिया, बाहर वालों को सरकारी विज्ञापन प्रबन्धन से अनुकूल बनाया या साम दाम दण्ड भेद से उन्हें बाजार से बाहर करवा दिया। सोशल मीडिया पर ट्रालर बैठा दिये। विपक्षियों के स्कैम या उन्हें हास्यास्पद बना कर उनकी चरित्र हत्या की जाने लगी। 
 प्रबन्धन से अर्जित जीत में अनेक सदस्य दूसरे दलों से दल बदल करा के लाये गये थे, तो पुराने सदस्यों में से भी अनेक सत्ता का मतलब वैसा ही निजी आर्थिक हित मान कर चलते थे जैसा कि पिछली सरकारों में होता रहा था। समस्त प्रयासों से गढी गयी अपनी छवि को बचाना था इसलिए मोदी ने उस कीमत पर उनकी इच्छा पूरी नहीं होने दी। सांसद निधि को एक आदर्श गाँव तक सीमित करके उससे होने वाली कमाई पर नियंत्रण लगा दिया। सबको सम्पत्ति की जानकारी देने को कहा गया तथा मंत्रिमण्डल गठन में महात्वाकांक्षी लोगों को दूर रखा गया। जैटली जैसे अपवाद को छोड़ कर मंत्रिमण्डल के शेष सदस्य पीएम कार्यालय से नियंत्रित अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत फाइलों पर दस्तखत करने का कार्य करने को विवश हुये। विभाग के फैसले लेना उनका काम नहीं रह गया। नोटबन्दी का गलत फैसला, विदेश नीतियों की असफलता, साम्प्रदायिक तत्वों पर नियंत्रण न कर पाना, कश्मीर जैसी समस्याओं को ठीक से संचालित नहीं करना, तथा ढेर सारी चुनावी घोषणाओं की पूर्ति न होने से सांसदों को जनता से सामना करना कठिन लगने लगा। रोजगार के अवसर नहीं जुटाये जा सके, किसानों को घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं दिया गया। राज्यों में भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं लगा जिससे केन्द्र की सावधानी निरर्थक हो गयी। इन सब को टालने के लिए भावुक मुद्दों को छोड़ा जाने लगा। सांसद अपनी सरकार से खुश नहीं हैं। उन्हें विश्वास में नहीं लिया जाता, इसलिए ऐसा लगता है कि केवल वेतन लेने और सदन में समर्थन करने से ज्यादा उनकी कोई जिम्मेवारी नहीं है। उन्हें लगता है कि उनकी कोई विशिष्टता नहीं है।
राष्ट्रपति के उम्मीदवार के चयन में अनावश्यक गोपनीयता ही नहीं बरती गयी, अपितु किसी से सलाह ही नहीं ली गयी। नामांकन प्रस्ताव के खाली फार्मों पर दस्तखत करा के मंगा लिये गये। यही हाल नोटबन्दी से लेकर दूसरे अनेक फैसलों में भी किया गया जो असफल रहे। गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम, वालंटरी डिस्क्लोजर स्कीम, विदेश में जमा धन की वापिसी आदि योजनाएं पूरी तैयारी के बिना लागू किये जाने से असफल हो गयीं। राष्ट्रपति के चयन में दलित उम्मीदवार के चयन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पिछले दिनों रोहित वेमुला की आत्महत्या, गुजरात के ऊना में दलितों की पिटाई का वीडियो, सहारनपुर की भीम सेना, आदि के कारण दलित उम्मीदवार उतारा गया है। आरक्षण के कारण दलित समुदाय के लोग सांसद और मंत्री भले ही हों किंतु उनकी नेतृत्व में भागीदारी नहीं है। इसी असंतोष प्रबन्धन के लिए ऐसा दलित उम्मीदवार उतारा गया जो औपचारिकता की पूर्ति तो करता है किंतु उस वर्ग का नेतृत्व नहीं करता, न ही पक्षधरता करके उनके मुद्दों को सम्बोधित करता रहा है।
1975 की इमरजैंसी के बारे में कहा गया था कि लोगों से झुकने के लिए कहा गया तो वे लेट गये। इस अघोषित इमरजैंसी में इसका पुनर्परीक्षण हो सकता है, चुप्पियों के अर्थ निकल सकते हैं। अडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार, येदुरप्पा, यशवंत सिन्हा आदि पद के लिए दुखी भले ही न हों किंतु अपने अपमान के लिए अवश्य ही दुखी हैं। आर के सिंह, भगीरथ प्रसाद, सत्यपाल सिंह, आदि दर्जन भर लोग सोचते ही होंगे कि क्या वे इसके लिए अपनी प्रशासनिक सेवाओं को छोड़ कर आये थे। राम जेठमलानी, शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आज़ाद, भोला सिंह, आदि तो मुखर होने के बाद चुप्पी ओढे बैठे हैं पर क्या ये चुप्पी साधरण चुप्पी कही जा सकती है। समर्थन घोषित करने वाले दलों में क्या गुटबाजियां नहीं हैं? नवीन पटनायक के खिलाफ कितने षड़यंत्र हो चुके हैं, जेडीयू के अन्य वरिष्ठ नेताओं को नितिश का फैसला हजम नहीं हो रहा। शिवसेना ने नामांकन प्रक्रिया में भाग नहीं लिया। दल की गुटबाजियों में एक दूसरे से बदला लेने के मौके भी तलाशे जा सकते हैं।
ऊपर जमी पर्त के नीचे कितना लावा खदबदा रहा है यह इस चुनाव में सामने आ सकता है क्योंकि इससे सत्ता पर सीधे आँच आये बिना भी संकेत दिये जा सकते हैं। 1977 में बहती अंतर्धारा की पहचान किसने कर पायी थी।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
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सोमवार, जून 12, 2017

मध्य प्रदेश में एक अराजनीतिक हुड़दंग

मध्य प्रदेश में एक अराजनीतिक हुड़दंग
वीरेन्द्र जैन

मध्य प्रदेश में जून माह की प्रारम्भ से ही एक अलग तरह का हिंसक उत्पात देखने को मिल रहा है, जिसमें अब तक सात किसानों की दुखद मौत हो चुकी है सैकड़ों नागरिक घायल हैं व करोड़ों की सम्पत्ति नष्ट हो चुकी है। पुलिस और प्रशासन के साथ आम लोग भी अपमानित हुये हैं। इस उत्पात को राजनीतिक दल और प्रैस किसान आन्दोलन का नाम देकर एक आकार देने की कोशिश कर रहे हैं, किंतु सच तो यह है कि यह हमारी राजनीतिक प्रणाली की कमियों और राजनीतिक दलों के नाम पर काम कर रहे गिरोहों के गैरजिम्मेवाराना व्यवहार का प्रतिफल है। उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश उस गोबरपट्टी या बीमारू राज्यों में से एक है जहाँ राजनीतिक चेतना न्यूनतम है और सामंती मूल्यों के आधार पर सरकारें बनती बिगड़ती रहती हैं। यहाँ गरीबी और पिछड़ापन इतना अधिक है कि अज्ञानतावश इनके उन्मूलन के लिए प्रारम्भ की गई सशक्तीकरण योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ जाती हैं।
राजनीतिक दलों की संगठन प्रणालियों को निकट से देखने पर पता चलता है कि किसानों का संगठन बनाना सबसे कठिन काम होता है। मजदूर किसी भी फैक्ट्री आदि में एक साथ एकत्रित होते हैं और उनके वेतन आदि की समस्याएं भी एक जैसी होती हैं इसलिए उनका संगठन बनना सरल होता है। यही हाल छात्रों के संगठन का भी होता है, किंतु किसानों को किसान के रूप में एक साथ एकत्रित होने के अवसर कम ही आते हैं। उनके बीच संचार के साधन पहले ही कम थे और अब भी मोबाइल इंटरनेट जैसे साधन भी शिक्षा की कमी के कारण किसानों तक उस अनुपात में नहीं पहुँच सके हैं जिस अनुपात में अन्य वर्गों तक पहुँच गये हैं। वे अखबार कम पढ पाते हैं, बिजली की अनुपस्थिति के कारण टीवी भी नहीं देखते, जहाँ टीवी होता भी है, और बिजली आती है, वहाँ भी टीवी के मनोरंजन कार्यक्रमों को अधिक प्राथमिकता मिलती है। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्र में जातिवादी संगठन अपेक्षाकृत अधिक आसानी से बन जाते हैं। जहाँ किसान संगठन बने भी हैं वे भी जातिवाद से प्रारम्भ हुये हैं। चरण सिंह, और महेन्द्र सिंह टिकैत ने किसान संगठनों के नाम पर जाटों को एकत्रित कर लिया था। इसी तरह मध्य प्रदेश में पटेल या पाटीदारों सहित दूसरी जातियों के संगठनों को चुनावी सुविधा के लिए किसान संगठनो का नाम दे दिया गया था। कभी कभी जब गन्ना उत्पादकों को गन्ना का रेट नहीं मिलता तो गन्ना उत्पादक किसानों के नाम पर आन्दोलन रत हो जाते और इसी तरह प्याज, आलू, टमाटर, संतरा, सोयाबीन या दूसरी जिंस विशेष फसलों के उत्पादक तात्कालिक रूप से एकत्रित होते रहे हैं। कभी कभी सूखा या अतिवृष्टि के कारण भी लोग मांग अनुसार एकत्रित हो जाते हैं। पिछले वर्षों में देश भर में लाखों किसानों की आत्महत्या के बाबजूद भी कोई राष्ट्र या प्रदेश व्यापी आन्दोलन खड़ा नहीं हुआ और समाज ने सरकारों में बैठे नेताओं के उन बयानों को स्वीकार सा कर लिया कि उनकी आत्महत्या के कारण व्यक्तिगत थे। देश के कृषिमंत्री ने तो यहाँ तक कहने में संकोच नहीं किया था कि किसान प्रेम प्रसंगों के कारण आत्महत्या कर रहे हैं।
गत लोकसभा चुनावों के दौरान और हाल के विधानसभा चुनावों के दौरान बिना दूरगामी सोच के विभिन्न तरह के वादे किसानों से किये गये थे जो पूरे नहीं किये गये किंतु हाल ही में उत्तर प्रदेश के चुनावों में कर्जमाफी का जो वादा किया गया था उसे नई व्याख्याओं के साथ काट छाँट कर घोषित कर दिया गया और पूरा करने के लिए संसाधन जुटाने की योजनाएं बनायी जा रही हैं। भाजपा पर हमेशा दबाव बना कर रखने वाली शिवसेना ने चुनावी वादों और यथार्थ के द्वन्द को पकड़ा और सवाल खड़ा किया कि यदि उत्तर प्रदेश के किसानों की कर्जमाफी की जा सकती है, तो सबसे अधिक आत्महत्याओं के लिए विवश महाराष्ट्र के किसान तो कर्जमाफी के अधिक सुपात्र हैं। भाजपा के रक्षात्मक होने से परोक्ष में सन्देश यह गया कि सरकार पर दबाव बनाने से ही अधिकार या सुविधाएं पायी जा सकती हैं। उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश से पहले महाराष्ट्र के कुछ जिलों में आन्दोलन प्रारम्भ हुआ जिसका प्रभाव बढते ही बाहुबली शिवसेना उसमें कूद पड़ी। दूसरी ओर भाजपा परिवार की ओर से गाय के नाम पर किसी की भी हत्या कर देने वालों का परोक्ष बचाव तथा पशु बिक्री कानून जैसे अव्यवहारिक अनावश्यक नियमों के बनाने से भी असहमत शिवसेना को और आक्रामक होने का अवसर मिला।
मध्यप्रदेश में आन्दोलन प्रारम्भ होने से पहले मालवा क्षेत्र में कुछ बड़े बड़े अफीम तस्कर पकड़े गये थे। स्मरणीय है कि तस्करी, हवाला, सट्टा आदि ऐसे अपराध हैं जो सरकारी नेताओं के सहयोग से ही सम्भव हो पाते हैं और इन अपराधों को जब भी पकड़ा जाता है तब सत्ता के अन्दर चल रहे आपसी द्वन्द का पता चलता है। उल्लेखनीय है कि किसान आन्दोलन के नाम की सारी हिंसा मालवा क्षेत्र में ही प्रारम्भ  हुयी है जहाँ अपेक्षाकृत अधिक सम्पन्न किसान हैं और जिनके अहं की लड़ाई उनकी रोजी की लड़ाई से अधिक तेज हो जाती है। पिछले दिनों गुजरात में पाटीदारों के आन्दोलन में हुयी हिंसा के पीछे भी आरक्षण से अधिक अहं था। दूसरी ओर मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड में किसानों की गरीबी और समस्याएं अधिक हैं किंतु वे व्यवस्था के खिलाफ कभी आक्रामक होने का साहस नहीं जुटा पाते।
म.प्र. भाजपा में आपसी गुटबाजी चरम पर है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी चुनावी सफलताओं के प्रभाव में पार्टी पर दबाव बना कर अनेक ऐसे नेताओं को प्रदेश से बाहर करा दिया जो उनके लिए खतरा पैदा कर सकते थे। उल्लेखनीय है कि सुश्री उमा भारती, नरेन्द्र सिंह तोमर, अनूप मिश्रा, प्रभात झा, कैलाश विजयवर्गीय, अरविन्द मेनन, कमल पटेल, बाबूलाल गौर आदि शिवराज की आँख की किरकिरी थे जिन्हें दूर कर दिया गया। इनके हितों को नुकसान पहुँचा है और ये सब किसी न किसी तरह शिवराज से बदला लेना चाहते हैं। इसके विपरीत पार्टी अध्यक्ष नन्द किशोर चौहान उनके अमित शाह हैं। इस गुटबाजी को भी इस हिंसा की पृष्ठभूमि में देखा जा सकता है।
काँग्रेस का नामपट उठाये नेता प्रदेश में कोई आन्दोलन खड़ा नहीं कर सकते। पार्टी में कार्यकर्ता के नाम पर नेताओं के व्यक्तिगत जयजयकारी भर हैं, काँग्रेस के लिए काम करने वाला कोई नहीं है। वे हिंसक तो क्या अहिंसक आन्दोलन या धरना प्रदर्शन भी नहीं कर सकते। काँग्रेस या किसी भी दूसरे दल पर हिंसा का आरोप लगाना सच्चाई से आँखें मूंद लेना है, क्योंकि वे चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकते।
सच्चाई यह है कि सरकार सब कुछ जानती है किंतु कह नहीं सकती। कोई नेता सामने नहीं है जिससे समझौता किया जा सके, कोई मांगपत्र सामने नहीं है जिस को पूरा किया जा सके। पुलिस दमन का परिणाम हिंसा को और बढावा देना है, इसलिए समस्या को स्वतः ठंडी होने की नीति अपनायी जा रही है, इसमें जो नुकसान हो सकता है, वह होगा। सिद्धांतहीन, नेतृत्वहीन इस घटनाक्रम से कुछ भी नहीं बदलेगा।  
वीरेन्द्र जैन
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मो. 09425674629


गुरुवार, जून 01, 2017

राष्ट्रपति चुनाव, भाजपा की राजनीतिक जीत और नैतिक हार सम्भव है

राष्ट्रपति चुनाव, भाजपा की राजनीतिक जीत और नैतिक हार सम्भव है
वीरेन्द्र जैन

विभिन्न राजनीतिक क्षेत्रों में राष्ट्रपति चुनाव की चर्चाएं गर्म हैं जबकि उसके आंकड़े स्पष्ट हैं। सत्तारूढ एनडीए के पास 48.64% वोट हैं तो यूपीए के पास 35.47% वोट हैं। शेष वोट उन दलों या निर्दलियों के हैं जो किसी भी गठबन्धन में सम्मलित नहीं हैं। अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए एनडीए को कुल 2% वोट जुटाने हैं, जिन्हें वह अपने सत्ता की दम पर जुटा सकती है। व्हिप जारी होने पर मान्यता प्राप्त किसी दल का न तो कोई सदस्य अनुपस्थित रह सकेगा और न ही क्रास वोटिंग कर सकेगा। दूसरी ओर लोकसभा चुनावों में डाले गये कुल मतों का 31% प्राप्त कर सरकार बना लेने वाली पार्टी ने अपने विशाल बहुमत के दम्भ में पिछले दिनों जो कुछ किया उससे उसकी विकास वाली छवि कलंकित होकर पुरानी साम्प्रदायिक छवि प्रकट हुयी है। यद्यपि यह छवि भी वोटों के बँटवारे से चुनाव जीतने में कोई वाधा नहीं बनती किंतु धर्मनिरपेक्ष विकासवादी लोगों, अंतर्राष्ट्रीय जगत, और स्वतंत्र प्रैस में निन्दा और घृणा का पात्र तो बनाती है। यही कारण है कि एनडीए गठबन्धन से बाहर का कोई दल उनका खुला समर्थन करके अपने ऊपर बिके होने का कलंक नहीं लेना चाहेगा। किसी ने अभी तक ऐसी घोषणा भी नहीं की है।
यदि एनडीए से बाहर के सभी दल मतभेद भुला, एकजुट होकर मतदान करते हैं तो एनडीए का उम्मीदवार हार भी सकता है, किंतु इस एकजुटता में बहुत अड़चनें भी हैं।  यूपीए को समर्थन देने वाले  सभी दल भी एक जुट नहीं हैं और उनके आपस में मतभेद हैं। बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी में व्यक्तिगत दुश्मनी है। डीएमके और एआईडीएमके भी शत्रुता भाव रखते हैं। तृणमूल काँग्रेस और वामपंथी दलों में तीव्र विरोध है। आम आदमी पार्टी भी भाजपा और काँग्रेस से बराबर की दूरी बना कर चलना चाहती है। यही हाल छोटे छोटे राज्य स्तर के अनेक दलों का है। भाजपा से मतभेदों के स्तर भी अलग अलग हैं। जेडीयू, नैशनल काँफ्रेंस, तृणमूल काँग्रेस, बीजू जनता पार्टी, एजीपी, एआईडीएमके, आदि वामपंथियों की तरह धुर विरोधी नहीं हैं, ये कभी एनडीए के साथ सरकार में रह चुके हैं। सोनिया गाँधी द्वारा बुलायी गयी बैठक में नीतिश कुमार सम्मलित नहीं हुये भले ही उन्होंने पार्टी की ओर से शरद यादव को भेजा था। लालू प्रसाद के यहाँ पड़े छापों के बाद से उनके नीतिश से सम्बन्ध खराब बताये जाते हैं। नीतिश कभी अटल बिहारी मंत्रिमण्डल के सदस्य रहे हैं और बिहार में पाँच साल तक भाजपा के साथ सरकार चलाते रहे हैं। बीजू जनता दल ने भी बैठक में भाग नहीं लिया। इसलिए भाजपा के खरीद फरोख्त के पुराने इतिहास को देखते हुए लगता है कि वह थोड़ी सी कमी सहजता से पूरी कर लेगी। मायावती, मुलायम परिवार, ममता बनर्जी., पटनायक आदि के नेताओं पर आय से अधिक सम्पत्ति आदि के प्रकरण दर्ज हैं। मुलायम सिंह का इतिहास ही धोखा देने का रहा है और वह हाथ से निकल चुकी अपनी पार्टी को अमर सिंह की सलाह पर भावनात्मक रूप से ब्लेकमेल कर सकते हैं। सावधानीवश  उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने वाले सांसद योगी, और केशव मौर्य से अभी तक लोकसभा से त्यागपत्र नहीं दिलवाया गया है।  
यद्यपि अंत अंत तक शिवसेना अपना विरोध समाप्त कर देगी किंतु अभी वह भाजपा को अपने तेवर दिखा रही है। वह केण्डीडेट आदि के नाम पर जितना दबाव डाल सकती है डालने की कोशिश करेगी। देखा गया है कि इस चुनाव में क्षेत्रीयता की भी एक भूमिका रहती है। जब ज्ञानी जैल सिंह को उम्मीदवार बनाया गया था तब काँग्रेस के धुर विरोधी अकाली दल ने समर्थन दिया था और जब प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को काँग्रेस का उम्मीदवार बनाया गया था तब शिव सेना ने भाजपा के उम्मीदवार का विरोध करते हुए उनका समर्थन किया था। यदि वंचित रहे जम्मू कश्मीर को प्रतिनिधित्व देने का वर्तमान में कोई कूटनीतिक महत्व हो तो कभी विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष रहे डा. कर्ण सिंह साझा उम्मीदवार हो सकते हैं, किंतु वे पूर्व महाराजा होते हुए भी अब कश्मीर का प्रतिनिधित्व नहीं करते।   
वैसे तो यूपीए की सरकार में कुछ समय तक गैर काँग्रेसी राष्ट्रपति रहा है और अब एनडीए के शासन काल में काँग्रेस के राष्ट्रपति होते हुए भी कोई टकराहट देखने में नहीं आयी फिर भी सत्तारूढ पार्टी के उम्मीदवार की पराजय से छवि को ठेस लगती है, इसलिए भाजपा हर हाल में अपना उम्मीदवार जिताना चाहेगी। देखना होगा कि गैर एनडीए दलों में कमजोर कड़ी कौन साबित होता है! देखा गया है कि मजबूत सरकार सरल राष्ट्रपति ही पसन्द करती है जैसे कि ज्ञानी जैल सिंह या प्रतिभादेवी सिंह पाटिल। भाजपा इसी कड़ी में अन्ना हजारेका नाम भी आगे कर सकती है। किसी पुराने भाजपाई को यह अवसर मिले इसकी सम्भावनाएं कम ही हैं क्योंकि विपक्ष के एक होने का खतरा भी तो टालना होगा।   
वीरेन्द्र जैन
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रविवार, मई 28, 2017

फिल्म समीक्षा वर्ग भेद की पहचान कराती फिल्म ‘हिन्दी मीडियम’


फिल्म समीक्षा
वर्ग भेद की पहचान कराती फिल्म हिन्दी मीडियम

वीरेन्द्र जैन
जो लोग फिल्मों की कथा वस्तु और कथा कथन में ताज़गी को पसन्द करते हैं, उनके लिए हिन्दी मीडियम एक बेहतरीन फिल्म है। हमारे जैसे अर्ध-सामंतवादी, अर्ध-पूंजीवादी समाज में अंतर्विरोधों के स्वरूप भी भिन्न भिन्न प्रकार के हैं, जिसमें से एक की कथा इस फिल्म में कही गयी है।
अंग्रेजों के उपनिवेशवाद से हमने बिना सीधे टकराव के जिस शांति और अहिंसा के सहारे आज़ादी प्राप्त की है उसकी कुछ अच्छाइयां, और कुछ बुराइयां हमसे जुड़ी हुयी हैं। यह सच है कि अंग्रेजी शासन के दौर ही में हम कूप मण्डूपता से बाहर निकलने की ओर बढे और हमने दुनिया को अपना परिचय देते हुये उससे अधिक सीखा भी है। आर्यसमाज जैसे संगठन का उदय, सती प्रथा जैसी अनेक बुराइयों को निर्मूल करने वाले राजा राम मोहन राय, जातिवाद के खिलाफ लड़ाई छेड़ने वाले ज्योतिबा फुले, और अम्बेडकर आदि उन्हीं के शासनकाल में सामने आये। हमारे समाज के बदलाव में विदेश से शिक्षा ग्रहण करके स्वतंत्रता आन्दोलन में उतरे गाँधी और नेहरू जैसे महान विचारकों की सक्रियता के साथ सोवियत संघ की क्रांति की बड़ी भूमिका रही। किंतु आज़ादी के बाद भी जिन राजाओं नबाबों को गुलाम बना कर अंग्रेज राज्य किया करते थे, उनकी भक्ति से समाज का एक हिस्सा मुक्त नहीं हो पाया और उनमें से बहुत सारे अभी भी सांसदों, विधायकों के रूप में हमारे ऊपर शासन कर रहे हैं। अंग्रेजी का सम्मान भी उसके अंतर्राष्ट्रीय भाषा होने से अधिक हमारे प्रभुवर्ग की भाषा होने की स्मृति के रूप में बना हुआ है, जिनका हम अभी भी सम्मान कर रहे हैं। आज़ादी के बाद में पैदा हुआ प्रभुवर्ग भी अपनी महत्ता विदेशी वस्त्रों के साथ साथ उनकी भाषा से बनाये हुये है। हमारी चेतना में यह छाया हुआ है कि अगर हमको सामाजिक स्तर में ऊपर उठना है तो अंग्रेजी जैसी भाषा के सहारे ज्ञान प्राप्त होना चाहिए। ऐसी इच्छा रखने वाले लोग अगर खुद अंग्रेजी स्कूलों में नहीं पढ पाये हैं तो भी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के नामी स्कूलों में पढाना चाहते हैं।
जब पूर्ति से अधिक मांग होती है तो वस्तु या सेवा की कीमतें बढती हैं और कई मामलों में ये कीमतें क्रेता के नैतिक मूल्यों से गिरने के रूप में भी चुकायी जाती हैं। यही नैतिक पतन कभी कभी आत्मा को कचोटता है। हिन्दी मीडियम की कहानी इसी कचोट की कहानी है, जिसे साकेत चौधरी के निर्देशन व इरफान, कमर सबा, और दीपक डोब्रियाल आदि के अभिनय ने मर्मस्पर्शी ढंग से व्यक्त की है।
पिछले दशक में ही गैर सरकारी संगठनों ने शिक्षा के अधिकार के लिए जो प्रयास किये थे, वे फलीभूत होने की दिशा में बढे थे[भोपाल के स्व. विनोद रैना भी उस आन्दोलन के प्रमुख योजनाकारों में एक थे व भारत ज्ञान विज्ञान समिति के माध्यम से योजना को मूर्त रूप देते हुए पाये जाते थे] इस योजना का एक भाग यह भी था कि स्कूल को निवास के निकट होना चाहिए व स्कूल के आस पास रहने वाले गरीब समुदाय के बच्चों को भी 25% तक की सीमा में प्रवेश देना हर स्कूल के लिए जरूरी होगा जिनकी फीस का अतिरिक्त हिस्सा सरकार वहन करेगी। किंतु जैसा कि ऐसी योजनाओं में होता है वही इसमें भी हुआ कि अमीर वर्ग के लोग गरीबों के रूप में कोटा हड़पने लगे। इसी फिल्म का ही एक डायलाग है जिसमें फिल्म का सहनायक कहता है कि हम गरीबों को मिली जमीनों पर अमीरों ने कब्जा कर लिया, हमारा सस्ता राशन ले लिया और अब शिक्षा का अधिकार भी तिकड़म से हथियाने लगे। देश भर में तेज हो रहे दलित अधिकार आन्दोलन भी इसी अहसास से प्रज्वलित हो रहे हैं।
कहानी एक अच्छी कमाई वाले नव धनाड्य परिवार की पढी लिखी बहू की उस महात्वाकांक्षा की है जिसे भ्रम है कि अगर उसकी इकलौती लड़की अच्छे अंग्रेजी स्कूल में नहीं पढी तो वह हीन भावना की शिकार होकर ड्रग लेने लगेगी। उसका पति उसे खुश रखने और उसकी हर इच्छा पूरी करने के लिए चाँदनी चौक की घनी बस्ती को छोड़ कर वसंत बिहार की पाश कालौनी में रहने लगता है किंतु उसके अंग्रेजी अज्ञान और व्यावसायिक पृष्ठभूमि के कारण जब उसकी लड़की का प्रवेश नहीं हो पाता किंतु गरीबों के कोटे में उसके नौकर की बेटी का हो जाता है तो एक दलाल के कहने पर कुछ दिनों के लिए वह गरीब बस्ती में रहने चला जाता है। अमीरी और नकली गरीबी के इस द्वन्द से उपजी विसंगतियां हास्य भी पैदा करती हैं, और उस बस्ती की दशा पर करुणा भी जगाती हैं। गरीबी में भी त्याग, आपसी सहयोग, भाईचारा, आदि उसकी आंखों पर अमीरी से उपजी असंवेदनशीलता की चर्बी को उतार देती है। संयोग से उसकी लड़की का प्रवेश तो गरीबों के कोटे से हो जाता है किंतु उसे सहयोग करने वाले के बेटे का नहीं हो पाता जो उस सीट का असली हकदार था। इसी विडम्बना से जन्मी आगे की कहानी जल्दी समेटने के चक्कर में थोड़ी बम्बइया हो जाती है, पर मर्मस्पर्शी बनी रहती है।
रोचक बनाने के लिए हास्य के दृश्य और संवाद स्वाभाविक हैं व ठूंसे हुए नहीं लगते। विवेकहीन फैशन, और व्यापार कौशल के दृश्य मनोरंजक हैं। इस फिल्म में व्यवस्था ही खलनायक है और व्यवस्था पर सवाल उठाने वाली सभी फिल्में परोक्ष में राजनीतिक फिल्में ही होती हैं, जो कुछ सोचने और बदलने के लिए प्रेरित करती हैं। यह आमिरखान की अच्छी फिल्मों की परम्परा में इरफान की एक नई कड़ी है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

         

शुक्रवार, मई 26, 2017

आज़ादी के बाद के आन्दोलन, और भ्रष्टाचार

आज़ादी के बाद के आन्दोलन, और भ्रष्टाचार
वीरेन्द्र जैन

हमने पिछले कुछ वर्षों में जन आन्दोलनों से उभरे समूहों को पार्टी में बदलते, दिवा स्वप्न देख कर चुनावों में भाग लेते और फिर असफल होते देखा है। इनकी संख्या बहुत है किंतु तात्कालिक रूप से बहुजन समाज पार्टी और आम आदमी पार्टी इसकी ताजा शिकार दिखायी दे रही हैं।
आज़ादी के बाद पंचवर्षीय योजनायें बनायी गयीं और क्षमतानुसार विकास से जुड़े असंख्य कार्य हुये। देश की आज़ादी से पहले स्वास्थ सेवाओं का यह हाल था कि हैजा, प्लेग. चेचक आदि महामारियों में हजारों लोग एक साथ मारे जाते थे, और इन्हें दैवीय प्रकोप माना जाता था। उल्लेखनीय है कि उस दौरान मिशनरी अस्पतालों ने अपने सेवा कार्यों से लाखों जिन्दगियां बचायी हैं, क्योंकि ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित अस्पताल न तो सवर्ण व दलितों में कोई भेद मानते थे और न ही हिन्दू मुसलमान में भेद मान कर चलते थे। धर्म का आदेश मान कर इस दिशा में जो काम ईसाई मिशनरियों ने किया है वह हिन्दू मुसलमान किसी धर्म समाज ने नहीं किया क्योंकि नियति या कर्मफल मानने के करण उनके यहाँ पीड़ित मानवता की सेवा का कोई विचार ही नहीं था। आज़ादी के आन्दोलन के दौरान गाँधीजी ने, जो दक्षिण अफ्रीका से रेडक्रास में काम करने का अनुभव लेकर आये थे, दलितों और कुष्ट रोगियों के लिए अपने आन्दोलन के साथियों को लगाया, दूसरी ओर अपनी साम्प्रदायिक प्रतियोगिया से प्रेरित होकर आर्य समाज आदि ने शिक्षा के क्षेत्र में कुछ अलग काम किया। आज़ादी के बाद स्वप्नदर्शी कहे जाने वाले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देश की क्षमता के अनुरूप तेजी से विकास योजनाएं बनायीं, और देश के मूलभूत ढाँचे को स्थापित करने का काम किया। इसी परम्परा को बाद में शास्त्री जी, जिन्हें कम समय मिला और बाद में इन्दिरा गाँधी ने आगे बढाया। बिना मांग के किये गये इसी विकास के साथ साथ भ्रष्टाचार का भी विकास होता गया जो सुविधा शुल्क से बढ कर कमीशनखोरी, हिस्सेदारी और अंत में बिना काम किये हुए ही भुगतान तक पहुँच गया। भ्रष्टाचार के इसी विकास ने आम जन को व्यथित किया और आज़ादी के बाद कई बड़े राष्ट्रव्यापी आन्दोलन भ्रष्टाचार के सवाल पर ही खड़े हुए व जनता की उम्मीदों का समर्थन पाकर सत्ता में भी बदलाव हुआ।
1974 में चिमन भाई पटेल की गुजरात सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ छात्रों का आन्दोलन प्रारम्भ हुआ जिसे देख कर खुद को रिटायर्ड मान चुके जय प्रकाश नारायण फिर से मैदान में कूद पड़े और सम्पूर्ण क्रांति के नारे के साथ जो आन्दोलन प्रारम्भ हुआ उसकी परिणिति पहले इमरजैंसी और बाद में जनता पार्टी के गठन व उसकी सरकार बनने तक जा पहुँची। अपनी सारी ऊर्जा सरकार बनाने में लगा देने के कारण जनता पार्टी भ्रष्टाचार उन्मूलन का लक्ष्य ही भूल गयी। 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार के नाम पर ही काँग्रेस छोड़ी व कम्युनिष्टों और भाजपा दोनों से बाहरी समर्थन ले कर सरकार बनायी। काँग्रेस और भाजपा के बीच झूलती सरकारों के बीच विरोध का नहीं अपितु प्रतियोगिता का रिश्ता रहा है और उनके बीच आलोचना का प्रमुख मुद्दा भ्रष्टाचार ही रहा है। अटल बिहारी सरकार से लेकर मनमोहन सिंह के कार्यकाल की दोनों सरकारों ने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये हैं, पर दोनों ने ही नई आर्थिक नीतियों का समर्थन किया है। उल्लेखनीय है कि वित्त मंत्री के रूप में जब मनमोहन सिंह नई आर्थिक नीति लेकर आये थे तब भाजपा ने कहा था कि इन्होंने हमारी नीति का अपहरण कर लिया है।
2010 के बाद अरविंद केजरीवाल ‘इंडिया अगेंस्ट करप्पशन’ आन्दोलन लेकर आये और महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन करके कुछ मंत्रियों को हटवाने वाले अन्ना हजारे को आगे कर दिया था। अन्ना हजारे भावनात्मक अधिक और बौद्धिक कम थे, इसलिए भाजपा के चंगुल में फँस गये, जिन्होंने आन्दोलन के दौरान अनेक तरह की व्यवस्थाएं की थीं। बाद में इसी आन्दोलन से निकल कर किरन बेदी व जनरल वी के सिंह, भाजपा में शामिल हो गये, अरविन्द केजरीवाल ने अलग पार्टी बना ली और दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गये। इसी दौरान रामदेव ने भारतीय स्वाभिमान पार्टी भी बना ली थी और इंडिया अगैंस्ट करप्पशन को भी हड़प लेना चाहा पर उनकी सन्दिग्ध गतिविधियों के कारण उन्हें आन्दोलन में प्रवेश नहीं दिया गया। परिणाम स्वरूप उन्होंने अलग से आन्दोलन किया जिसमें वे असफल रहे और अलग पार्टी का विचार छोड़ भाजपा के शरणागत हो गये।   
काँग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार के विरोध के आधार पर ही भाजपा ने 2014 का आम चुनाव लड़ा और कामन वैल्थ, टूजी, थ्रीजी की रिपोर्टों के साथ जमीनों के सौदे आदि के साथ पुराने नेताओं को छोड़ कर मोदी को प्रत्याशी बनाया गया जो 2002 के गुजरात नरसंहार के साथ ऐसी राज्य सरकार चलाने के लिए भी जाने जाते रहे थे, जिस पर आर्थिक भ्रष्टाचार का कोई बड़ा आरोप नहीं था। साम्प्रदायिक हिंसा के गम्भीर आरोपों के बाद भी उन्हें प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी इसी छवि के कारण से बनाया गया था।
कम्युनिष्ट पार्टियां भ्रष्टाचार को पूंजीवाद की अनिवार्य बुराई मान कर चलती हैं व उनका मानना है कि यह रोग पूंजीवाद के साथ ही जायेगा इसलिए जड़ पर प्रहार करना ही इसका हल है। विभिन्न सरकारें बदलने पर भी भ्रष्टाचार का बने रहना उनकी बात के पक्ष में जाता है। यही कारण है कि भले ही वे खुद ईमानदार रहे हों किंतु उन्होंने स्थापित सत्ता का विरोध करने के लिए भ्रष्टाचार को इकलौता मुद्दा नहीं बनाया। यह अलग बात है कि उनके वर्ग शत्रु द्वारा भ्रष्टाचार से अर्जित संसाधनों के कारण वे अपनी आवाज को जनता तक पहुंचाने व संघर्ष में पिछड़ते रहे हों। 
हाल ही में जब अरविन्द केजरीवाल ने अपनी पार्टी की औकात से अधिक सपने देखे और सीधे सीधे मोदी सरकार को चुनौती दी तो उसने उनकी सरकार को गिराने के लिए हर सम्भव उपाय शुरू कर दिये। उपराज्यपाल, पुलिस कमिश्नर, का दुरुपयोग, विधायकों की त्रुटियों से लेकर उनकी पारिवारिक कमजोरियों तक से भी जब बात नहीं बनी तो उनकी ईमानदार छवि के मूल आधार पर ही हमला करा दिया। मीडिया को पहले ही अपने अधिकार में कर चुके थे।
हम कह सकते हैं कि आज़ादी के बाद देश की केन्द्र व राज्य सरकारों को बदलने के जो आन्दोलन हुये हैं वे भ्रष्टाचार के आसपास ही घूमते रहे हैं। मजदूरों, किसानों, दलितों, पिछड़ों, महिलाओं, आदि द्वारा सत्ता बदलवाने वाला राष्ट्रव्यापी कोई बड़ा आन्दोलन नहीं हुआ। मोदी के नियंत्रण व नेतृत्व वाली भाजपा की राज्य सरकारों में व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार है किंतु केन्द्र सरकार की छवि पर कोई सीधा दाग नहीं लगा। यही छवि मोदी को अगले दो साल तक बनाये रहेगी, भले ही उतार चढाव बने रहेंगे।     
वीरेन्द्र जैन
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अभिव्यक्ति की भ्रूणहत्या के तीन साल

अभिव्यक्ति की भ्रूणहत्या के तीन साल
वीरेन्द्र जैन

बुन्देली में एक कहावत है, ‘कई लाबर बड़ो कै दोंदा? कई दोंदा, काय के वो बात खों दोंद देत’। इसका अर्थ यह है कि अगर पूछा जाये कि झूठ बोलने वाला ज्यादा शातिर है या बात को निरर्थक ठेलने वाला तो उत्तर होगा कि बात को ठेलने वाला, क्योंकि वह बात के नुकीले सवाल की नोक को ही तोड़ देता है। मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ऐसे ही दोंदने वालों से भरी हुयी है, और प्रमुख मीडिया को उसने पालतू बना लिया है।   
गत 14 अप्रैल 16 को जब पूरा देश बाबा साहब अम्बेडकर की 125वीं जयंती मना रहा था और सतारूढ दल से लेकर विपक्ष तक सभी उनके योगदान के प्रति आभार व्यक्त कर रहे थे तब ऐसे समाचार भी आ रहे थे कि पूरा देश असहिष्णुता के हमले झेल रहा है। जिस समय नरेन्द्र मोदी मजबूत सुरक्षा में महू में फूलों के गुलदस्ते स्वीकार कर रहे थे तब देश के तीन सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक जे एन यू छात्र संघ के चुने हुए अध्यक्ष कन्हैया के नागपुर पहुँचने पर पत्थर फेंके जा रहे थे व उसकी सभा में जूता फेंका जा रहा था। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों जब दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल पर जूता फेंका गया था और उनके मंत्रिमण्डल के एक सदस्य ने षड़यंत्र में भाजपा की भूमिका का बयान दिया था, उसी तरह नागपुर में जूता फेंकने वाले युवक का सम्बन्ध बजरंग दल और एबीव्हीपी से बताया गया। उसी दिन अपने एक भाषण में कन्हैया ने कहा था कि जिन भाईयों को जूता फेंकना ही आता है, उनसे निवेदन है कि वे दोनों जूते फेंकने की कृपा करें, जिससे उनका कुछ उपयोग तो हो सके। दूसरी बात उसने कही थी कि जूता फेंकने वाले को एक जोड़ चप्पलें भी साथ में लाना चाहिए क्योंकि बाहर गरमी बहुत है।
उसी 14 अप्रैल को महाराष्ट्र में तृप्ति देसाई पर हमला कर के इतना मारा गया था कि उन्हें आईसीयू में भरती कराना पड़ा था क्योंकि वे कोर्ट के आदेश के अनुसार पंजाबी ड्रैस पहिन कर नवरात्रि की पूजा करने महालक्ष्मी मन्दिर में प्रवेश कर रही थीं। क्या पंजाब देश से बाहर है, और पवित्र ड्रैस का मतलब केवल साड़ी है? क्या पंजाबी  महिलाएं अपनी परम्परागत पोषाक में अपवित्र होती हैं जिनके प्रवेश से मन्दिर अपवित्र हो जाता है? क्या ये सवाल उठाने का इकलौता तरीका मारपीट ही है?
उसी 14 अप्रैल को हैदराबाद विश्वविद्यालय के जीनियस छात्र दिवंगत रोहित वेमुला की माँ और उसके भाई ने अपने प्रति हो रहे अन्याय का हल अपने धर्म परिवर्तन में खोजा। वे अम्बेडकर और उनके पाँच लाख समर्थकों की तरह हिन्दू धर्म छोड़ कर बौद्ध हो गये।
उसी 14 अप्रैल को अमरेली गुजरात से भाजपा के सांसद नारन कछाड़िया को तीन साल की सजा सुनायी गयी क्योंकि उनकी असहिष्णु करतूत अदालत में साबित हो गयी। उन्होंने एक आन ड्यूटी डाक्टर को पीटा था। एक सांसद को कानून पर भरोसा नहीं था पर डाक्टरों को था।  
संघ परिवार के लोगों ने पिछले दिनों एक झूठ सफलतापूर्वक फैलाया कि देश के बुद्धिजीवियों ने देश को असहिष्णु कहा। अपने विविधिता वाले धर्मनिरपेक्ष देश को चाहने वाले देश पर ऐसे आरोप को बिल्कुल स्वीकार नहीं कर सकते इसलिए कम पढने लिखने वाले भले भारतीयों ने संघ परिवार के इस झूठ को स्वीकार कर लिया और वे बुद्धिजीवियों के खिलाफ संघ परिवार के पक्ष में खड़े नजर आने लगे।
सच यह था कि किसी ने भी यह नहीं कहा था कि हमारा देश असहिष्णु है, अपितु इसके विपरीत सबने दूसरे अनेक देशों से अलग अपने देश में सहिष्णुता की परम्परा की प्रशंसा करते हुए कहा था कि भाजपा शासन आने के बाद हमारे इस इतने अच्छे देश में भी असहिष्णुता जन्म ले रही है। विचार का जबाब गोलियों से दिया जाने लगा है। गोबिन्द पानसरे, कलबुर्गी, नरेन्द्र दाभोलकर, आदि जो देश के अनेक ख्यातनाम लेखक और बुद्धिजीवी थे की हत्याएं उनसे वैचारिक मतभेद के कारण ही हुयी थीं। कहने की जरूरत नहीं कि भाजपा पक्ष के लोगों ने इन हत्याओं की निन्दा करने व दोषियों को पकड़ने की मांग उस तल्खी के साथ नहीं की थी जिस तल्खी के साथ ऐसे मामलों में तब उनसे अपेक्षा रहती है, जब वे आरोपी नहीं होते। ऐसा इसलिए था क्योंकि आरोप उनके साथ खड़े रहने वाले लोगों व संगठनों पर लग रहे थे। जावेद अख्तर, आमिर खान, जावेद ज़ाफरी, शाहरुख खान, सहित ढेर सारे बुद्धिजीवियों ने तालिबानों की आलोचना करते हुए सवाल किया था कि हम क्यों तालिबान बनते जा रहे हैं? इसके विपरीत संघ परिवार के प्रचारकों ने इन कथनों को देश की सहिष्णुता की आलोचना प्रचारित करवा दी।
लोकसभा चुनावों से पूर्व मुज़फ्फरनगर के दंगे, व दंगा कराने के लिए झूठा वीडियो जारी करने वाले की पक्षधरता के साथ उसे पार्टी का टिकिट देना, दादरी में सोचे समझे ढंग से माइक से प्रचार करके अखलाख के फ्रिज में रखे मांस को बिना किसी जाँच के गाय का मांस बता कर उसकी सामूहिक हत्या करवा देना व आरोपियों के बचाव में पूरी पार्टी का जुट जाना क्या असहिष्णुता फैलाना नहीं है? लव जेहाद, घर वापिसी, धर्म परिवर्तन, गीता को कोर्स में लगाने, आरक्षण में संशोधन, बंगलादेशी घुसपैठिये, भारतमाता, बीफ, पाकिस्तान भेजने, आदि असंगत बातों को भड़का कर और योजनाबद्ध ढंग से क्रमशः उन्हें विभिन्न व्यक्तियों और संस्थानों से उठवाना और नेतृत्व द्वारा उनकी निन्दा भी न करना क्या असहिष्णुता फैलाने में मदद करना नहीं था? इन प्रयासों के बारे में किसी दल या संगठन की प्रतिक्रिया ही उसकी भागीदारी के संकेत दे देती है। राजनीतिक दलों के चरित्रों की पहचान केवल ढीली ढाली न्यायिक प्रक्रिया से बच निकलने से ही तय नहीं होती अपितु जनमानस में बन रही अवधारणाओं का भी महत्व होता है।
जब पाकिस्तान की हरकतों पर सत्तारूढ दल की प्रतिक्रिया उसके पिछले बयानों के अनुरूप नहीं रही तब उनकी राजनीतिक आलोचना होना स्वाभविक थी, जो विपक्षी दलों द्वारा हुयी भी। किंतु इसी बीच जब उत्तरपूर्व में आतंकी हमलावरों को म्यांमार की सीमा में घुस कर मारने का सवाल विवादास्पद रहा और सर्जीकल स्ट्राइक को पाकिस्तान ने नकार दिया तब एक दल ने सरकार के कतह्न की सच्चाई के प्रमाण भी चाहे। इस बात को सरकार के दोंदने वाले प्रवक्ताओं और मीडिया ने ऐसे प्रचारित किया जैसे वे सर्जीकल स्ट्राइक का विरोध करके दुश्मनों की मदद कर रहे हों। नोटबन्दी से जनता को होने वाली परेशानियों और सैकड़ों दुखद मौतों की आलोचना हुयी तो ऐसा कहा गया कि विरोधी दल काले धन के पक्ष में हैं और उसके खिलाफ किये गये प्रयासों का विरोध कर रहे हैं।
पाकिस्तान की मशहूर शायरा परवीन शाकिर का शे’र है-
मैं सच कहूंगी और फिर भी हार जाऊँगी / वो झूठ बोलेगा और लाजबाब कर देगा  
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, मई 09, 2017

राष्ट्रीय राजनीति में वाक्पटुता

राष्ट्रीय राजनीति में वाक्पटुता
वीरेन्द्र जैन

चुनावी राजनीति में जनता से संवाद करना होता है जिसके लिए सार्वजनिक सभायें, टीवी पर बहसों आदि का बड़ा महत्व होता है और इस सब के लिए नेतृत्व में संवाद कुशल व्यक्तियों का होना जरूरी होता है। इस समय नरेन्द्र मोदी भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष हैं। इसके साथ यह भी तय है कि अगर वे अपनी भाषण कला में इतने प्रवीण नहीं होते तो वे लोकप्रियता के इस शिखर को नहीं छू पाते। मंचों पर सफल एक कवि मित्र का कथन था कि मंच पर कथ्य से भी अधिक महत्वपूर्ण होती है उसकी प्रस्तुति, क्योंकि मंच सीधे संवाद का माध्यम है। इसमें देह भाषा, और मंच पर माइक से बोलने वाले वक्ता, कवि  या कलाकार का आत्मविश्वास बहुत काम करता है। उल्लेखनीय है कि 2014 के आम चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी ही भाजपा के प्रमुख प्रचारक थे और उन्होंने नकली लाल किले जैसे मंचों तक से सैकड़ों आमसभाओं को सम्बोधित करते हुए अपने भाषणों में अनेक भौगोलिक और ऎतिहासिक तथ्यात्मक भूलें की थीं, किंतु उनकी ओजपूर्ण धाराप्रवाह भाषण की कला के आगे वे सब भूलें दब कर रह गयी थीं। वे अन्य नेताओं की तुलना में आज भी सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं, जबकि उनकी चुनावी घोषणाओं में से कोई भी धरातल पर नहीं उतरी।
मोदी सरकार के कार्यकाल में जिसे हम उपलब्धि की तरह देख पाते हैं, वे सारे काम पिछली सरकार के कार्यकाल में प्रारम्भ हुयी योजनाओं के परिणाम थे किंतु उस सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भाषण कला में प्रवीण नहीं थे, इसलिए न तो उस सरकार की उपलब्धियां ही प्रचारित हो सकीं और न ही वे अपनी सरकार पर लगे आरोपों का ही बचाव कर सके। कहते हैं कि पूजा के साथ साथ शंख झालर की ध्वनि भी जरूरी होती है ताकि लोगों को पूजा होने का पता भी चल सके। अडवाणी जी की तुलना में अटल बिहारी वाजपेयी के लोकप्रिय होने का एक प्रमुख कारण अटलजी की लोकप्रिय मनोरंजक भाषण शैली ही थी जबकि अडवाणी जी उनके ही साथ साथ विकसित हुये थे और अपेक्षाकृत अधिक चतुर और मौलिक थे।
समाजवादी पहलवान मुलायम सिंह अपने क्षेत्र के मान्य नेता थे किंतु वे तब तक बड़े राष्ट्रीय नेता नहीं बन सके जब तक कि उन्हें अमर सिंह का साथ नहीं मिल गया। मुलायम सिंह न तो अच्छा भाषण दे सकते हैं और न ही साक्षात्कार देते समय हाजिर जबाबी में कुशल हैं। अमर सिंह ने उनकी यह कमी पूरी कर दी थी क्योंकि अमर सिंह में यह गुण भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। आज भी अमर सिंह के बिना मुलायम खुद को अधूरा सा महसूस करते हैं। लालू प्रसाद का आत्मविश्वास और उन्हें अच्छा बयानवाज नेता बनाये हुये है जो उन्हें चर्चा में बनाये रखता है। अंग्रेजी और अभिजात्य हिन्दी बोल पाने में हिचक होने के कारण अनेक नेता अपनी बात को उचित समय और स्थान पर नहीं रख पाते, जबकि लालू प्रसाद ने कभी भाषा की चिंता नहीं की अपितु कथ्य पर जोर दिया है। उन्होंने जिस देशीपन को गर्व के साथ अपनाया उसी अन्दाज में साहस की कमी के कारण बहुत सारे नेता अपनी बात कहने में संकोच कर जाते हैं, और अनसुने रह जाते हैं। लोहिया जी की हिन्दी का मतलब ही उस भाषा से था जिसमें आप अपनी बात निःसंकोच कह सकते हैं। लालूप्रसाद तो मुहावरा और प्रतीक भी देशी ही प्रयोग करते हैं। इस मामले में राजनारायण को उनका गुरू कहा जा सकता है।
लम्बे समय तक सत्ता में रही काँग्रेस में ऐसा स्वभाव विकसित हुआ कि उनके विपक्ष में आने के बाद  लोकप्रिय भाषण कला, हाजिर जबाबी, और बयानवाजी के लिए वकीलों को जिम्मेवारी सौंपनी पड़ी। बहुत समय बाद रणजीत सिंह सुरजेवाला जैसे प्रवक्ता उन्हें उपलब्ध हुये हैं, क्योंकि दिग्विजय सिंह आदि तो केवल बयान देकर या ट्वीट करके ही प्रकट होते हैं जिसमें यह पता नहीं चलता कि कितना काम उनका अपना है और कितना स्टाफ का है। शशि थरूर आदि तो सेमिनारों में पेपर पढने वाले नेताओं जैसे हैं।
भाजपा ने इलौक्ट्रोनिक माध्यम को सबसे पहले पकड़ा, और अभी भी सबसे आगे है। टीवी बहसों के माध्यम से अपनी बात जनता तक पहुँचाने के भविष्य को देखते हुए प्रवक्ताओं का एक बड़ा समूह तैयार किया है, जो अपने काम में तो कुशल हैं किंतु उनका काम कठिन बहुत है। भाजपा में असत्य, अर्धसत्य, और वकालत की बड़ी भूमिका है क्योंकि उन्हें मिथक, अपने गढे इतिहास, और कूटनीतिक योजनाओं में से सतर्क उत्तर तैयार करने होते हैं, इसलिए उन्हें प्रश्नों को टालने, तुलनात्मक बनाने, उनकी दिशा बदलने आदि में कुशल होना होता है। प्रधानमंत्री के कथन की दिशा को सरसंघ चालक बदल देते हैं, उत्तर भारत के जिन जीवन मूल्यों पर वे राजनीति करते हैं वह दक्षिण और उत्तरपूर्व में बदल जाती है। यही हाल भाषा का भी है। इसके बाद भी सम्बित पात्रा, जैसे वाक्पटु विषय भटकाउ प्रवक्ताओं की मदद के लिए संघ विचारक के नाम पर एक और सहयोगी उपलब्ध रहते हैं।
वामपंथी दलों में भी अब राष्ट्रीय स्तर के अच्छे वक्ताओं की कमी महसूस की जाने लगी है क्योंकि उनके ज्यादातर बड़े नेता गैर हिन्दीभाषी क्षेत्र के हैं और उनके विषय अंतर्राष्ट्रीय जैसे होते हैं, जिनकी हिन्दी शब्दावली भी विदेशी जैसी होती है। बहुत सारी भाषाओं के जानकार एक सीताराम येचुरी को छोड़ कर कोई बड़ा नेता नजर नहीं आता जो राष्ट्रीय स्तर पर सम्बोधन सक्षम हो।
आम आदमी पार्टी सार्वजनिक जीवन में स्वच्छता के सवाल पर मिले जन समर्थन से भ्रमित होकर बड़ा बैर मोल ले बैठी है, बदले में भाजपा ने उन्हें समूल नष्ट करने के लिए सारे मोर्चे खोल दिये हैं, और लगातार हमलावर है। इस पार्टी में भी कुमार विश्वास को छोड़ कर कोई भी धारा प्रवाह वक्ता नहीं है, भले ही आशुतोष व राघव जैसे कुछ प्रवक्ता अपने पक्ष को टीवी बहसों में कुशलतापूर्वक प्रस्तुत करते हैं।
       जैसे जैसे राजनीतिक चेतना सम्पन्न लोगों की संख्या बढेगी वैसे वैसे अधिक सम्वाद कुशल वक्ताओं, प्रवक्ताओं की जरूरत पड़ेगी। यही गुण नेतृत्व के लिए द्वार खोलेगा।  
वीरेन्द्र जैन
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