सोमवार, मई 21, 2018

लोकतंत्र की औपचारिकता में चुनाव के तमाशे


लोकतंत्र की औपचारिकता में चुनाव के तमाशे
कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018 के लिए इमेज परिणाम
वीरेन्द्र जैन 
युद्ध में नेतृत्व के जीवित होने और लड़ते जाने का भ्रम बनाये रखा जाता था। राजनीति में भी किसी भी दल के प्रमुख का साहसी और लगातार सक्रिय होना जरूरी होता है। चुनाव भी एक तरह से युद्ध ही होते हैं जिनमें भी नेतृत्व का सक्रिय दिखना जरूरी होता है। जब सत्ता और संगठन एक ही व्यक्ति तक केन्द्रित होता है तो पदासीन व्यक्ति को ही चुनाव के समय अपने पद की जिम्मेवारियां भूल कर चुनाव में उतरना पड़ता है।
कर्नाटक चुनाव के सम्बन्ध में मीडिया में सामने नजर आने वाला बहुत कुछ कहा जा चुका है, किंतु इस घटनाक्रम की वैचारिकी पर कम ही बातें हुयी हैं। इस पूरे चुनाव में जो तीन प्रमुख पक्ष थे वे तीनों ही पक्ष आगे बढने की जगह प्रतिगामी नजर आये हैं। काँग्रेस अध्यक्षों की जिम्मेवारी थी कि वे अपने सदस्यों, समर्थकों को धर्म स्थलों से दूर रखते किंतु उसके जगह गुजरात विधानसभा चुनावों से लेकर कर्नाटक तक राहुल गाँधी मन्दिर मन्दिर जाकर धोती ओढते व माथा पोतते और उसे प्रचारित करते नजर आये। तय है कि यह राहुल की आस्था का मामला बिल्कुल नहीं था अपितु भाजपा का राहुल परिवार और काँग्रेस को हिन्दू विरोधी प्रचारित करने की काट के लिए था। अर्थात वे भाजपा की कार्यप्रणाली से प्रभावित होकर प्रचार कर रहे थे। वे यह भूल जाते हैं कि जब हिन्दू धार्मिकता के आधार पर मतदाता फैसला करेगा तो उसमें राम जन्मभूमि मन्दिर को आधार बनाने वाली व ढेर सारे साधु साध्वियों को टिकिट तक देने वाली भाजपा हमेशा लाभ में रहेगी। यही हाल पाँच साल के शासन के अंत में लिंगायत को अलग धर्म के रूप में मान्यता देने के मामले में भी हुयी। जनता को मूर्ख समझने और बनाने की कोशिशें अपमानजनक होती हैं। भले ही वे उसके कितने ही हित के काम हों किंतु जब वे ठीक चुनाव के मौके पर किये जाते हैं तो उसे ठगने जैसे लगते हैं। किसी बहाने से वोट झटक लेने के उपक्रम का जमाना बीत चुका है, अब घर घर टीवी के 300 चैनल आ रहे हैं और इंटरनैट पर लाइव घटनाक्रम प्रसारित होता है जिसे कोई भी साधारण व्यक्ति भी कर सकता है। जगह जगह लगे सीसीटीवी कैमरे प्रत्येक गतिविधि की रिकार्डिंग रखते हैं। क्या ऐसी दशा में सत्तर अस्सी के दशक की सूटकेस प्रणाली अपनायी जा सकती थी जबकि डिजिटल ट्रांसफर के जमाने में किसी के खाते में किसी के खाते से रकमों का आदान प्रदान हो सकता है।
चुनाव के बाद येदुरप्पा द्वारा सरकार बनाने का प्रयास एक बड़ी बचकानी हरकत थी। चूंकि भाजपा परिवार में सरकार बनाने का कोई भी प्रयास बिना मोदी-शाह से पूछे और बिना आरएसएस की सलाह के नहीं हो सकता, इसलिए यह विश्वास स्वाभाविक है कि इस मामले में उनकी सहमति थी। संघ परिवार का जो एजेंडा है, उसे पहले हिडिन एजेंडा कहा जाता था किंतु अब वह छुपाया भी नहीं जाता। इस एजेंडे हेतु सत्ता पर अधिकार करने के लिए कुछ भी करने की छूट है। भाजपा ने दलबदल कानून आने से पहले और उसके बाद भी सबसे अधिक बार दलबदल करवा कर सरकार बनायी किंतु आरएसएस ने कभी इस प्रवृत्ति की निन्दा नहीं की। ऐसे दल बदल धन या / और पद के लेन देन पर ही होते हैं और इनमें अवैध धन का ही स्तेमाल होता रहा है। स्पष्ट है कि इसके लिए अवैध ढंग से पैसा कमाने वालों को छूट देना भी सम्मलित होता होगा, तो फिर शुचिता की बात करना दोहरापन ही है। एक दल से चुनाव लड़ने व जीतने के ठीक बाद किसी विधायक से दूसरे दल को समर्थन देने का ख्याल ही भ्रष्टाचार की छवि बनाता है। जिसने भी इस दलबदल की सम्भावना के बारे में सोचा भी होगा उनमें से ऐसा कौन होगा जिसने इसे स्वाभाविक ह्रदय परिवर्तन की तरह से लिया होगा। इसके उलट जब येदुरप्पा ने समर्थन न जुटा पाने की घोषणा करते हुए त्यागपत्र दिया तब उनकी और उनके वरिष्ठ नेताओं की छवि कुछ सुधरी होगी कि कोई लेन देन नहीं हुआ या कहें कि नहीं हो पाया।
उचित संख्या का प्रमाण न देने पर भी येदुरप्पा को शपथ दिलाना, काँग्रेस द्वारा जेडी[एस] के कुमारस्वामी को समर्थन देने का पत्र देने के बाद भी उन्हें अवसर न देना, बहुमत साबित करने के लिए अनावश्यक रूप से 15 दिन का लम्बा समय देना, प्रोटेम स्पीकर के चयन में परम्परा को तोड़ना, राज्यपाल की खुली पक्षधरता के प्रमाण थे जिससे प्रकट होता था कि संघ परिवार किसी भी तरह से सत्ता हथियाना चाहता है। किसी भी संघ के पदाधिकारी ने संघ से निकले अपने राज्यपाल के आचरण पर अपने विचार नहीं रखे।
एक चुनाव क्षेत्र की वीवीपीएटी मशीन खराब होने के अलावा चुनाव प्रणाली पर कोई सवाल नहीं उठे, हिंसा नहीं हुयी किंतु भाजपा ने जिन उम्मीदवारों का चयन किया वह इस बात का प्रमाण था कि वह अपने विकास के एजेंडे या सातारूढ सिद्धारमैया की कार्यप्रणाली की आलोचना के आधार पर चुनाव नहीं लड़ पा रही थी। यह पराजित मानसिकता के संकेत थे। देश के प्रधानमंत्री को किसी मुख्यमंत्री के ज्ञात भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्यवाही करना चाहिए न कि चुनाव सभाओं में बताना चाहिए। अगर मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार की जानकारी होते हुए भी प्रधानमंत्री कार्यवाही नहीं कर रहा तो यह उसकी भी अक्षमता का प्रमाण है। वैसे भी उन्होंने चुनाव के दौरान ही उनके मंत्रियों के यहाँ आयकर के छापे डलवाये व चिदम्बरम के खिलाफ बयान दिया। उल्लेखनीय यह भी है कि लोकसभा चुनावों के दौरान भ्रष्टाचार के जिन आरोपों को मुख्य मुद्दा बनाया था उन आरोपियों में से किसी के खिलाफ अब तक कार्यवाही नहीं हुयी।
सवाल यह भी है कि जनमत को मतों की संख्या से, उसके प्रतिशत से, मापा जाना चाहिए या जीती गयी सीटों के हिसाब से! काँग्रेस की सीटें घटी हैं किंतु वोट बढे हैं, जेडीएस की सीटें भी घटी हैं, वोट भी घटे हैं, वहीं भाजपा की सीटें भी बढी हैं और वोट भी बढे हैं किंतु कुल वोट काँग्रेस से कम हैं। भाजपा की 44 सीटों पर जमानत भी जब्त हुयी है। वोकालिंगा और लिंगायत के वोट जातिगत आधार पर लिये और दिये गये व सबने जार्तिवाद का लाभ लेने की कोशिश की। तीनों ही दलों के विजयी विधायकों में कुल 97% करोड़पति हैं जो बताता है कि विधायक चुने जाने के लिए धन का क्या महत्व है। कुल 143 करोड़ से अधिक रुपया तो अवैध ढंग से ले जाते हुए पकड़ा गया जिससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि शायद ही कोई विधायक ऐसा रहा होगा जिसने खर्च की तय सीमा के अन्दर चुनाव लड़ कर जीता हो, किंतु सभी प्रत्याशी और दल अपने व्यय की घोषणा में झूठ बोलेंगे।
चुनाव प्रचार के दौरान अपेक्षाकृत शालीनता बनाये रखने वाले राहुल गाँधी ने येदुरप्पा के विश्वासमत हारने के बाद  प्रैस कांफ्रेंस में अमित शाह को मर्डर एक्यूज्ड [ हत्या का आरोपी] और मोदी को भ्रष्टाचारी बता दिया, जबकि राज्यपाल के खिलाफ कुछ भी नहीं कहते हुए एक सवाल के उत्तर में कहा कि इनके जाने के बाद दूसरा भी ऐसा ही आयेगा।
समाज की दशा में विकास तो बाद की बात है पहले जिस आधार पर सरकारें बनती हैं उस चुनाव प्रणाली में सुधार के बारे में सोचें नहीं तो जिनके द्वारा जो चुने जाते हैं उन्हीं के लिए काम करते हैं। इस दिशा में विकास बहुत धीमा है।
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, मई 14, 2018

यादों के झरोखे से – बालकवि वैरागी वे आम आदमी के लिए, आम आदमी के कवि, और आम आदमी रहे


यादों के झरोखे से – बालकवि वैरागी
वे आम आदमी के लिए, आम आदमी के कवि, और आम आदमी रहेबाल कवि बैरागी के लिए इमेज परिणाम
वीरेन्द्र जैन
बाल कवि वैरागी हिन्दी के उन शिखर कवियों में से एक थे जिन्होंने मंच के माध्यम से हिन्दी कविता को जन जन के बीच बचाये रखा। वैसे तो हिन्दी कवि सम्मेलन पहले भी हुआ करते थे जिनमें हिन्दी भाषा को कठिन बनाने वाले कवि कविता के बहाने अपनी प्रतिभा का आतंक जमाने की कोशिश करते थे। यों तो काँग्रेस और कम्युनिष्ट पार्टियों के सम्मेलनों में राजनीतिक विचार को छन्द में बदलने और काव्य में ढालने के प्रयास पहले भी होते रहे हैं किंतु वे अपने अपने क्षेत्रों तक ही सीमित थे। आदरणीय हरिवंशराय बच्चन और नीरज जी जैसे कवि हिन्दी में उर्दू की काव्य परम्परा को लेकर आये थे और लोकप्रिय हुये थे। एक सीमित क्षेत्र में बलवीर सिंह ‘रंग’, गोपाल सिंह नेपाली, मुकुट बिहारी सरोज भी लिख रहे थे किंतु मंच और उन पर जगह कम होने के कारण उनकी लोकप्रियता उनकी प्रतिभा के अनुरूप नहीं हो सकी थी।
यह 1962 का भारत चीन सीमा विवाद था जिसे हम लोग चीन के हमले के रूप में जानते हैं, जब जनता में राष्ट्रीय चेतना जगाने के लिए देश भर में सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर कवि सम्मेलन आयोजित हुये और इन कवि सम्मेलनों में कवि के रूप में ख्यात साहित्यकार बुलाये जाने लगे। इनमें से जो लोग कार्यक्रम का उद्देश्य पूरा कर रहे थे उनमें बालकवि बैरागी का नाम प्रमुख था। उनका कहना था कि वे उस जाति से सम्बन्ध रखते हैं जो मालवा क्षेत्र में गा गा कर घर घर मांग कर अपना जीवन यापन करती रही है। यही कारण है कि उन्होंने अपनी आत्मकथा का नाम रखा “ मंगते से मिनिस्टर तक”। यह परम्परा पुराने समय के चन्दबरदाई से जुड़ती है जो अपनी बुलन्द आवाज और वीर रस की कविताओं से सैनिकों में जोश भरने का दायित्व निभाते थे। वैरागी जी को बुलन्द आवाज और नि:संकोच अभिव्यक्ति विरासत में मिली थी व शिक्षा ने उन्हें आधुनिक कविता की समझ और विषय दिये थे जिसे मंचीय सफलताओं ने परवान चढाया। जब वे टेर लगा कर गाते थे –
जब कि नगाड़ा बज ही चुका है सीमा पर शैतान का
नक्शे पर से नाम मिटा दो पापी पाकिस्तान का
या
आओ रे अंगारो, आओ रे अंगारो, माना आग लगाओ रे अंगारो मावस के अँधियारों में
लेकिन आग लगा मत देना, पूनम के उजियारों में ......... आओ रे अंगारो .... आओ रे अंगारो
तो ऐसा लगता था कि दिशाएं गूंजने लगी हैं, और हर तरफ से प्रतिध्वनि सुनायी दे रही है। जब भी मंच से बुलन्द कविता पढी जाती है तो श्रोताओं के बीच कोई सुगबुगाहट नहीं पैदा हो पाती, इसलिए सुनी जाती है। वैरागीजी भी जब कविता पढते थे तो उस समय समारोह में केवल वे ही होते थे। यही कारण रहा कि वे देश के कविता मंचों की सबसे जोरदार आवाज बन गये व इन मंचों के माध्यम से अपनी बात कहने वालों के लिए मानक बनाते चले गये। उन दिनों कविता पढने से पहले सबसे बड़ी भूमिका प्रस्तुत करने वालों में भी वैरागी जी जाने जाते थे। इस अभ्यास ने उन्हें राजनीति के मंच पर बेहिचक लोकप्रिय वक्ता बनाया और इस लोकप्रियता ने उन्हें लीडर बना दिया। वे काँग्रेस के सदस्य रहे किंतु सभी विचारधाराओं के कविता मंचों पर आमंत्रित किये जाते रहे क्योंकि उन्होंने राजनीतिक कटुताओं को विचार भिन्नता के रूप में बदलने का काम किया।
यह वही समय था जब प्रकाशित होने वाली कविता और मंचों पर पढी जाने वाली कविताओं में विभाजन रेखा बन गयी थी, किंतु कुछ लोग ऐसे बचे रह गये थे जिन्होंने दोनों पक्षों के बीच सामंजस्य बिठा रखा था।
मैंने पहली पहली बार बालकवि बैरागी, काका हाथरसी और सोम ठाकुर को एक साथ सुना था। तीनों का अलग अलग महत्व था पर लोकप्रियता में तीनों समान थे। बैरागीजी ने कविता और राजनीति में सक्रियता बनाये रखने के अलावा पत्र पत्रिकाओं में भी अपने लेखों, संस्मरणों, को लिखने का सिलसिला बनाये रखा था। उनकी एक बात उन्हें दूसरों से अलग करती थी और वह थी पत्र व्यवहार की आदत। बनारसी दास चतुर्वेदी, हरिवंश राय बच्चन के अलावा काका हाथरसी और बैरागी जी उन लेखकों में रहे हैं जिन्होंने पत्र लेखन के जमाने में हर पत्र का उत्तर देने का काम किया है। यही कारण रहा कि उन्हें देश भर के वे लोग भी अपना मित्र समझते रहे जिन्हें वे ठीक तरह से जानते भी नहीं थे। वे जहाँ भी जाते थे उनसे मिलने आने वालों की संख्या बहुत होती थी।
मुझे भी पत्र लिखने का शौक था और एक समय तक विशिष्ट लोगों के पत्र पाकर खुद को विशिष्ट समझने की बीमारी का शिकार भी रहा। इसी क्रम में उनसे पत्रों का आदान प्रदान प्रारम्भ हुआ और जब मैं धर्मयुग आदि जैसी कुछ प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगा तो वे अपने पत्र उत्तरों में कभी कभी उनका भी उल्लेख करने लगे तो और भी अच्छा लगने लगा। मंत्री और सांसद रहते हुए भी उन्होंने पत्रोत्तरों में कभी कोताही नहीं की।
पहली लम्बी मुलाकात 1982 में नागपुर में हुयी जब वे, शरद जोशी, अशोक चक्रधर, सुरेश उपाध्याय, आदि कई परिचितों सहित आमंत्रित थे। उस समय मेरे बैंक के सम्पन्न कलाप्रेमी व्यापारी ग्राहक ने न केवल अपनी गाड़ी ही उपलब्ध करायी थी अपितु इन चर्चित लोगों का आतिथ्य करके भी उन्हें अच्छा लगा था। इसमें मेरा महत्व भी बढ गया था। वह अंतुले काण्ड का समय था और उसी दौरान वैरागी जी बेदाग मंत्री पद त्याग कर चुके थे, व इसका महत्व बता रहे थे कि उन्होंने कितने लाख बोरियां सीमेंट बिना कमीशन लिये वितरित कराया है।
 इस सम्मेलन में मुझ से एक दुस्साहस हो गय था। उन दिनों मैं परसाईजी से बेहद प्रभावित था और जब वैरागी जी ने कहा कि परसाईजी को छोड़ कर शरद जोशी ऐसे व्यंग्य लेखक हैं जिनका सारे हिन्दी व्यंग्य लेखक अनुशरण करते हैं तो मैंने खड़े होकर प्रतिवाद कर दिया था। जबकि इससे पहले लगभग एक घण्टे तक मैं शरद जोशी से आत्मीय बात करता रहा था। बाद में मुझे लगा कि अब शायद वैरागी जी मुझे पत्रोत्तर न दें किंतु ऐसा नहीं हुआ। मेरे नववर्ष अभिनन्दन कार्ड के उत्तर में जो वे प्रिंटिड उत्तर बेजते थे उसमें अपने हाथ से कुछ न कुछ जरूर लिख कर उसमें मानवीय स्पर्श दे देते थे। मैं नव वर्ष और ट्रांसफर होने पर सभी परिचितों व मित्रों को पत्र भेजता था, [मेरा ट्रांसफर भी एक दो साल में हो ही जाया करता था] इससे सभी लोगों को दतिया की पूंछ वाले इस व्यक्ति की याद ताज़ा हो जाती थी।
1986 मेरे लिए कठिन वर्ष साबित हुआ था। मुझे मैनेजर के पद से बदल कर आडीटर [इंस्पेक्टर] बना दिया गया था जिस कारण परिवार को मूल निवास पर छोड़ कर नगरी नगरी द्वारे द्वारे फिरना पड़ रहा था, कोई स्थायी पता नहीं था, और लिखना पड़ना स्थगित हो गया था। इसी वर्ष मेरे बैंक में मोराटोरियम लग गया था और बाद में इसका विलय पंजाब नैशनल बैंक में हो गया था। इसका परिणाम यह हुआ कि मेरी पोस्टिंग अमरोहा में हो गयी। परिवार कहीं, पोस्टिंग कहीं, बच्चों की पढाई का ठिकाना नहीं, मैंने ट्रांसफर के लिए आवेदन किया किंतु दो साल से पहले वह हो नहीं सकता था। मैंने प्रमोशन के सारे अवसर ठुकरा दिये थे। कुछ अन्य संकटों के कारण मेरा दतिया ट्रांसफर जरूरी हो गया था। सारी छुट्टियां ले डाली थीं। जोश में अपने समस्त परिचितों को खंगालना शुरू किया, हरीश नवल, प्रेमजन्मेजय के माध्यम से कन्हैया लाल नन्दन, कमलेश्वर, काका हाथरसी, जयपुर के एक पत्रकार मित्र के माध्यम से अनेक सांसदों को आवेदन भिजवाया, अशोक चक्रधर, से कहा तो बोले कि हम लोगों के लिए तो सरकारी प्रवेश द्वार बैरागी जी ही हैं। लगे हाथ उन्हें भी आवेदन भिजवा दिया किंतु अनुत्तरित रहा, अशोक तब तक वीआईपी तो हो गये थे किंतु वीवीआईपी नहीं हुये थे बोले वैरागी जी के यहाँ सीधे चले जाओ। ऐसा ही किया तो बोले अरे यार तुम्हारा आवेदन था तुम नये नये पते बदलते रहते हो और मेरे पास पत्र बहुत आते हैं इसलिए धोखा हो गया। फिर तो उन्होंने वित्त मंत्री नारायनदत्त तिवारी, जनार्दन पुजारी, और न जाने कहाँ कहाँ पत्र भिजवा दिये और उनसे प्राप्त उत्तर मुझे भिजवाते रहे। परिणाम यह हुआ कि दो साल पूरे होते ही मेरा ट्रांसफर न केवल दतिया हो गया अपितु मेरी मन चाही जगह लीड बैंक आफिस में पोस्टिंग मिल गयी। यह मेरे जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण फैसला साबित हुआ। परिवार का बड़ा नुकसान होते होते बच गया।
जब वे दिल्ली में रकाबगंज गुरुद्वारे के पास रहते थे तब गर्मी की एक दोपहर उनके यहाँ पहुँच गया। वे खालिस्तानी आतंकवाद के दिन थे। मैं यह सोच कर कि दोपहर की नींद ले रहे होंगे इसलिए बाहर दालान में ही कुर्सी पर बैठ गया ताकि हलचल दिखने पर घंटी बजाऊंगा। पर उन्होंने कहीं से देख लिया और दरवाजा खोल कर अन्दर ले गये। खुद लाकर पानी पिलाया और कहा कि बाहर क्यों बैठ गये थे, तुम्हारा ही घर है।
एक दिन बोले यार तुम तो मीना कुमारी की ससुराल में फँस गये हो। मुझे बाद में समझ में आया कि अमरोहा में होने के कारण यह कमाल अमरोही से सम्बन्धित टिप्पणी है।
स्वस्थ और स्वच्छ मनोरंजन व हाजिर जबाबी उनकी विशेषता थी। एक सज्जन जिनका सरनेम रावत था, की पत्नी कुछ अधिक स्वस्थ थीं, उनके लिए कहते थे कि रावत के घर में ऎरावत है।
काका हाथरसी व मुकुट बिहारी सरोज के साथ तो उनके अनेक दिलचस्प संस्मरण हैं। जब वे मंत्री थे और मैंने सरोज जी के ट्रांसफर के  सम्बन्ध में पत्र लिखा तो उन्होंने उत्तर दिया कि खबर रखा करो तुम्हें पता ही नहीं है कि सरोज जी तो कब के ग्वालियर पहुँच गये हैं।
करोगे याद तो हर बात याद आयेगी। अभी इतना ही।
वीरेन्द्र जैन
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पुस्तक समीक्षा भारत शर्मा द्वारा सम्पादित पुस्तक - कदमों के निशाँ


पुस्तक समीक्षा
भारत शर्मा द्वारा सम्पादित पुस्तक - कदमों के निशाँ
वीरेंन्द्र जैन
बात 1976 की है जब देश में इमरजैंसी का आतंक छाया हुआ था, तब मेरी पोस्टिंग हाथरस में थी। उसी साल मुझे मार्क्सवादी आलोचक डा, राम कृपाल पांडे के साथ आगरा में डा. राम विलास शर्मा जैसे इतिहास पुरुष से मिलने का सौभाग्य मिला था। उस मुलाकात के दौरान डा. शर्मा ने बताया था कि जब हम लोगों ने मार्क्सवाद पढा तब वह साहित्य प्रतिबन्धित था और छुप कर पुस्तकें मंगाना व छुप कर ही पढना होती थीं, आज तो दुनिया भर में सबसे अधिक पुस्तकें मार्क्सवाद पर ही उपलब्ध हैं और यह तुम लोगों को अवसर है कि स्वतंत्र रूप से पढ सकते हो। तब से मैं किसी भी व्यक्ति की जीवन गाथा को पढते समय उस काल के इतिहास को अवश्य याद रखता हूं जिस काल में उस व्यक्ति ने अपना गौरवपूर्ण जीवन जिया। विशेष रूप से क्रांतिकरियों का इतिहास पढते समय देखना होता है कि उनका सहयोग करने वाले कितने साहसी लोग थे जिन्होंने सारे खतरे उठा कर उनके कार्यों में मदद की। इसी पुस्तक में क्रांतिकारी बेताल सिंह का एक साक्षात्कार सम्मिलित है जो 4 मार्च 1984 के अमर उजाला में प्रकाशित हुआ था। बेताल सिंह वह व्यक्ति थे जिनके द्वारा कामरेड गुरुदयाल सिंह ने आगरा कलैक्टर हार्डी की कुर्सी के नीचे बम रखवाया था, वे कहते हैं “ वे दिन और ही थे, अंग्रेजी हुकूमत. अत्याचार, हाहाकार, और इंकलाब जिन्दाबाद। अंग्रेजों के खिलाफ, अंग्रेजी सरकार के खिलाफ एक शब्द बोलना भी तमाम मुसीबतों को निमंत्रण देना था। काम चाहे कितना भी गुप्त रूप से करें., अंग्रेज सरकार के गुर्गे. अमन सभाई गांव गांव में फैले हुए थे जो क्रंतिकारियों के बारे में सरकार को सूचना पहुँचा कर इनाम पाने को लालायित रहते थे। क्रांतिकारियों को सरकार और उनके गुर्गों की दुधारी तलवार से बच कर काम करना होता था।“
भारत शर्मा द्वारा सम्पादित पुस्तक “कदमों के निशाँ” जो कामरेड गुरुदयाल सिंह के जीवन से जुड़ी उपलब्ध स्मृतियों पर आधारित है, को भी उस काल के परिवेश में किये गये कार्यों के अनुरूप परखने से पता चलेगा। कामरेड गुरुदयाल सिंह अपने संघर्षों दमनों और जेल यात्राओं के बीच कुल 50 वर्ष जिये। आज गर वे होते तो 96 वर्ष के होते। हम कल्पना कर सकते हैं कि आज जितनी अशिक्षा, धर्मान्धता, और स्वार्थ की अन्धी दौड़ है तो उस दौर में समाज में परिवर्तन की धारा बहाना कितना कठिन रहा होगा। आज की वैज्ञानिक शिक्षा और वैज्ञानिक उपलब्धियों पर निर्भरता के बाद भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण इतना कम है और कम्युनिष्ट पार्टियां भी वर्गीय दृष्टिकोण में जातिवाद जैसे सामंती मूल्यों से टकराने की जगह उनका ही सहारा लेने को विवश हो रही हैं तब कल्पना की जा सकती है कि जातिवाद से लाभांवित वर्ग से टकराना कितना संघर्षपूर्ण रहा होगा। इस पुस्तक में कामरेड सिंह के द्वारा सीमित साधनों में जन शिक्षण, संघर्ष, व संघठन निर्माण का जो चित्रण है उससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
कामरेड गुरुदयाल सिंह का जन्म 1921 में हुआ था और 14 साल की उम्र में ही वे फतेहाबाद काँग्रेस कमेटी के अध्यक्ष निर्वाचित हो गये थे। 19 वर्ष की उम्र में किये सत्याग्रह में उन्हें पहली बार जेल यात्रा का स्वाद चखना पड़ गया। पर इसके दो वर्ष बाद ही वे बम केस, प्रसिद्ध आगरा षड़यंत्र केस, और ब्रिटिश राज्य के विरुद्ध की गयी राजनीतिक गतिविधियों के अंतर्गत जेल यात्रा करना पड़ी। जेल में किये गये अध्ययन और क्रांतिकारियों से निरंतर किये गये विमर्शों के बाद वे बाहर निकल कर 1946 में कम्युनिष्ट पार्टी में शामिल हो गये।
1948 में उन्होंने जो झाड़ी आन्दोलन किया वह अपने आप में नजीर है। यह तेलंगाना, तेभागा, और नक्सलबाड़ी आन्दोलन की तरह जमीन के वितरण का आन्दोलन था किंतु जिसमें किसी तरह की हिंसा के कोई प्रमाण नहीं मिलते हैं। शम्साबाद थाने के अंतर्गत चन्दौरा नामक गांव में लाला छक्की लाल ने बहुत बड़ी झाड़ी अर्थात घना जंगल लगा रखा था। कई एकड़ में फैली इस झाड़ी में जो जंगली जानवर रहते थे उनके आतंक से किसान और जनता बहुत परेशान थी। कामरेड गुरुदयाल सिंह जो उस समय बड़े जमींदारों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे, संगठन की दृष्टि से भी इस आन्दोलन को समर्थन देने का फैसला किया। लाला छक्कीलाल काँग्रेस समर्थक नेता थे, उन्होंने झाड़ी काटने के खिलाफ एक सभा बुलवायी जिसमें प्रदेश काँग्रेस के अध्यक्ष और तत्कालीन वित्त मंत्री कृष्णदत्त पालीवाल भी सम्मलित हुये थे। कामरेड गुरदयाल सिंह ने वह सभा नहीं होने दी व किसानों ने ढेले मार मार कर आये हुए नेताओं को भागने को मजबूर कर दिया। कुछ ही दिनों में झाड़ी को काट कर साफ कर दिया गया व कामरेड सिंह क्षेत्र के एक बड़े किसान नेता की तरह चर्चित हो गये।     
1952 में उन्होंने फतेहाबाद फिरोजाबाद क्षेत्र से कम्युनिष्ट पार्टी के निर्देश पर विधानसभा का चुनाव भी लड़ा।
1959 में विभिन्न आन्दोलनों और जेल यात्राओं के दौरान उनका जो स्वास्थ बिगड़ा तो उन्हें स्थान परिवर्तन की सलाह दी गयी, जहाँ से वे भिलाई में अपनी जीवन साथी उर्मिला सिंह के भाई के यहाँ रहने के लिए निकले किंतु बीच में इटारसी ही उतर गये और एक धर्मशाला में ठहरे। वहाँ उन्होंने अपना राजनीतिक परिचय किसी को नहीं दिया अपितु अपने को कलाकार की तरह ही प्रस्तुत किया। उल्लेखनीय है कि वे एक अच्छे पेंटर भी थे और किसी भी दृश्य या व्यक्ति का चित्र देखते ही देखते बना देते थे। इस तरह की चित्रकला को बेच कर उन्होंने कुछ दिन काम चलाया कि कुछ युवा उनसे जुड़ गये और उन्होंने गल्ला मंडी में चल रहे शोषण के बारे में बताया। संयोग से पार्टी समर्थक एक ठेकेदार वहाँ कार्यरत थे जिनके पास सुप्रसिद्ध कामरेड सरजू पांडे [ आधा गाँव उपन्यास में भी जिनकी चर्चा है] जो सांसद रहे वहाँ आये थे, इटारसी के उन लड़कों के कहने पर उनसे भेंट हो गयी तो वे बोले अरे कामरेड आप तो बड़े छुपे रुस्तम हो हमॆं पता ही नहीं था कि कलाकार भी हो। तब उनका परिचय उजागर हो गया, और उन्हें गल्ला मण्डी का आन्दोलन नेतृत्व करना पड़ा। इटारसी आन्दोलन की चर्चा पूरे प्रदेश में व्याप्त हुयी और उन्हें बड़े असमंजस के बीच म.प्र. में किसान सभा का दायित्व सम्हालना पड़ा।
1962-64 के बीच उन्हें फिर डीआईआर के अंतर्गत जेल यात्रा करना पड़ी। 1964 में जब कम्युनिष्ट पार्टी का विभाजन हुआ तब उन्हें मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी का प्रदेश महासचिव व किसान सभा केन्द्रीय परिषद का सदस्य चुना गया। । 1971 में उन्होंने लाल मशाल साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया व 1972 को भोपाल में ही उन्होंने अंतिम साँस ली। 
इस पुस्तक में एक कामरेड के जीवन के बहाने हर सच्चे कामरेड के जीवन की गाथा झलकती है जो एक आन्दोलनकारी होने के साथ साथ कवि, लेखक, कलाकार, भी होता है व हर स्थिति हर हालत में कामरेड रहता है। उसके मतभेद भी विमर्श का हिस्सा होते हैं चाहे वे गाँधीवादियों के साथ हों या माओवादियों के साथ हों। पुस्तक में कामरेड सिंह की कविताएं और उनके लेख भी संकलित हैं किंतु उनके बनाये चित्र भी सम्मलित हो पाते तो और भी अच्छा होता।
भारत शर्मा ने स्वयं को इस पुस्तक का सम्पादक बतलाया है किंतु असल में उन्होंने इसे शोधग्रंथ की तरह मेहनत से तैयार किया है। निश्चित रूप से सामग्री जुटाने में उन्होंने समुचित श्रम किया होगा जिसके लिए वे धन्यवाद के पात्र हैं।
वीरेन्द्र जैन
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रविवार, मार्च 25, 2018

सूर्य भानु गुप्त : जिन्हें कमलेश्वर नहीं धर्मवीर भारती मिले


सूर्य भानु गुप्त : जिन्हें कमलेश्वर नहीं धर्मवीर भारती मिले
वीरेन्द्र जैन
एक दिन की यात्रा के बाद रात बारह बजे लौटा। थकान तो थी किंतु दिन भर अखबार नहीं पढ पाया था और अखबार पलटे बिना शायद नींद नहीं आती। एक अखबार के स्थानीय संस्करण में खबर थी कि सुप्रसिद्ध गीतकार और शायर सूर्य भानु गुप्त को जावेद अख्तर सम्मान 25 मार्च को दिया जायेगा। खबर पढते ही नींद दूर खिसक गयी। स्मृतियों ने कुरेदना शुरू कर दिया।
अपने एक सहपाठी मित्र शिव मोहन लाल श्रीवास्तव के सम्पर्क में आने के बाद मुझे भी पत्र व्यवहार का रोग लग चुका था भले ही उनकी तुलना में यह दो चार प्रतिशत ही था। उन दिनों युवाओं का पत्रिकाओं में प्रकाशन भी बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी, पुस्तकाकार रूप में आना तो और बड़ी बात थी क्योंकि आज की तरह पैसे खर्च करके सब कुछ नहीं मिल जाता था। मैंने जल्दी ही धर्मयुग और कादम्बिनी, आदि में, जो उस समय की प्रमुख पत्रिकाएं थीं, में  प्रकाशन का गौरव पा लिया था और उसे बड़ी उपलब्धि समझने के भ्रम में था।
उन दिनों जो लोग धर्मयुग में प्रमुखता से छपते थे उनमें से एक नाम सूर्य भानु गुप्त का भी था। उनकी गज़लें और गीत मुझे बहुत पसन्द आते थे। मैं अपने छुटपुट प्रकाशन का हवाला देकर लोकप्रिय लेखकों से वैसे ही पत्र व्यवहार शुरू कर देता जिसके लिए चूहे के हल्दी की गांठ पाकर पंसारी बनने का मुहावरा बना होगा।
इमरजैंसी लग चुकी थी व ‘मुनादी’ छापने के उत्साह को भूल कर भारती जी धर्मयुग का एक छप चुका अंक वापिस ले चुके थे। कई स्वीकृत रचनाएं लौटायी जा चुकी थीं, जो इस बात का संकेत थीं कि अब धर्मयुग में क्या क्या नहीं छप सकता। थोड़ा समय गुजरने के बाद धर्मयुग में सूर्यभानु गुप्त की एक गज़ल छपी जिसका शीर्षक था ‘खामोशी’। यह इमरजैंसी की खामोशी का बयान करते हुए भी प्रकट में गैरराजनीतिक कविता/ गज़ल थी। मैंने धर्मयुग के रंग और व्यंग्य स्तम्भ में इस रचना पर एक पैरोडीनुमा रचना लिखी जो वैसे तो बहुत साधारण थी किंतु उसके साथ में एक टिप्पणी थी कि सूर्यभानु गुप्त की उक्त रचना पर यह एक प्रतिक्रिया है पर स्पष्ट कर दूं कि इन पंक्तियों का लेखक प्रतिक्रियावादी नहीं है। उन दिनों अनेक लोगों को प्रतिक्रियावादी बता कर जेल में डाल दिया गया था इसलिए यह एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी थी। भारतीजी ने टिप्पणी के साथ रचना छाप दी। स्मृति के अनुसार कुछ पंक्तिया इस प्रकार थीं-
गुप्तजी की गज़ल है खामोशी
खूब ऊंची अकल है खामोशी
एक दर्जन भर शेर मारे हैं
खूब प्यारा कतल है खामोशी
मेरे समुदाय में सभी के लिए
ढेर सा कौतुहल है खामोशी
और इसी तरह के साधारण सी तुकबन्दियों की कुछ पंक्तियां और थीं। बाद में मुझे लगा कि एक अच्छी खासी  रचना पर धर्मयुग में पैरोडी लिखना ठीक नहीं हुआ। मैंने लगभग क्षमाप्रार्थी भाव में गुप्तजी को पत्र लिखा। किसी उत्साह में उस पत्र में कई बार ‘सु’ शब्द का अतिरेक हो गया। लगभग उसी भाव में उनका उत्तर भी मिला जो दिया जा रहा है।
सूर्य भानु गुप्त
प्रिय भाई
पत्र मिला आपका, धन्यवाद।
आपका [सु] नाम मेरे लिए [सु] परिचित है क्योंकि आप इतना अधिक [सु] प्रकाशित होते रहते हैं - [सु] पत्रिकाओं में कि कोई भी , माफ कीजिएगा [सु] [के लिए] पाठक आपके [सु] नाम से [सु] अपरिचित नहीं रह सकता.
मैं पत्रों के उत्तर बहुत नहीं दे पाता, यह सही है, मगर एक बार अवश्य देता हूं, अब ये आप पर [सु] निर्भर है कि मेरे न चाह्ते हुए भी आप मुझसे [सु] पत्र लिखवा लें . [सु] वास्तविकता यह है कि बम्बई में [सु] समय क्या [कु] समय भी मुश्किल से मिलता है. एक इंजीनियरिंग कम्पनी में वरिष्ठ सांख्यकी सहायक हूं, अर्थात विशुद्ध क्लर्की समझिए. सुबह 7 बजे पर निकला शाम 7 बजे घर पहुँच पाता हूं. दफ्तर घर से 25 मील है , लिहाजा अब घंटे दो घंटे जो [सु] समय बचता है उसमें बहुत से काम होते हैं- थोड़ा आराम, पढना, लिखना, घर, दोस्त, और सामाजिक दायित्व, लिहाजा पत्र व्यवहार ज्यादा चल नहीं पाता . आप किसी [सु] गलतफहमी के शिकार न हो जाएं इसलिए [सु] स्पष्टीकरण कर दिया. मैं साफगोई का कायल हूं, इससे उम्र भर को आराम मिलता है.
किताबें या किताब अभी तक नहीं निकल पाई कोई. अविवाहित हूं, मगर घर की कुछ ऐसी जिम्मेवारियां सर पर हैं कि विवाहित से भी गयी गुजरी दशा है। संक्षेप में इतना ही . सानन्द होंगे सस्नेह आपका
सूर्यभानु गुप्त
24 अप्रैल 76 दो बजे 

इसके बाद 1977 मैं बम्बई [ तब मुम्बई का यही नाम था] प्रवास के दौरान उनके निवास पर भी गया जो दादर में था और सोजपाल काया बिल्डिंग का नाम मुझे लगभग रटा हुआ था। मुझे लगता था कि देश व्यापी ख्याति के इस कवि के फ्लैट का नम्बर बिल्डिंग का कोई भी बता देगा पर कोई नहीं जानता था। वे शायद अपनी बड़ी बहिन के साथ उनके ही फ्लेट में रहते थे। एक जगह दो लोग बैठे हुए थे तो सोचा आखिरी बार उनसे पूछ लिया जाये। दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा और कहा कि अरे वह तो नहीं , ऊषा का भाई, फिर अनुमान से एक फ्लेट नम्बर बताया तब मैं उनके निवास पर पहुंचा। उस दिन मुझे अपनी लघुता का अहसास हुआ कि जब इतने बड़े कवि को उसके पड़ोसी नहीं जानते तो मुझे कौन जानेगा। गुब्बारे की गैस निकली और मैं जमीन पर आ गया।
सूर्यभानु गुप्त के पुराने परिचय में लिखा है जो कई वर्षों से अद्यतन नहीं हुआ कि
जन्म : 22 सितम्बर, 1940, नाथूखेड़ा (बिंदकी), जिला : फ़तेहपुर ( उ.प्र.)। बचपन से ही मुंबई में । 12 वर्ष की उम्र से कविता लेखन की शुरुआत।

प्रकाशन  : पिछले 50 वर्षो के बीच विभिन्न काव्य-विधाओं में 600 से अधिक रचनाओं के अतिरिक्त 200 बालोपयोगी कविताएँ प्रमुख प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। समवेत काव्य-संग्रहों में संकलित एवं गुजराती, पंजाबी, अंग्रेजी में अनूदित ।

फ़िल्म गीत-लेखन : ‘गोधूलि’ (निर्देशक गिरीश कर्नाड ) एवं आक्रोशतथा संशोधन’ (निर्देशक गोविन्द निहलानी ) जैसी प्रयोगधर्मा फ़िल्मों के अतिरिक्त कुछ नाटकों तथा आधा दर्जन दूरदर्शन- धारवाहिकों में गीत शामिल।

प्रथम काव्य-संकलन : एक हाथ की ताली (1997), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली – 110 002

पुरस्कार : 1. भारतीय बाल-कल्याण संस्थान, कानपुर । 2. परिवार पुरस्कार (1995), मुम्बई ।

पेशा : 1961 से 1993 तक विभिन्न नौकरियाँ । सम्प्रति स्वतंत्र लेखन । 

हिन्दी गज़ल के क्षेत्र में गुप्तजी ने दुष्यंत कुमार से पहले लिखना और छपना शुरू कर दिया था किंतु ऐसा लगता है कि उन्हें कोई कमलेश्वर नहीं मिले जिनके बारे में दुष्य़ंतजी ने लिखा है कि
मैं हाथों में अंगार लिए सोच रहा था
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताये
और यह तासीर उनके परम मित्र कमलेश्वर जी ने बतायी व सारिका में छाप कर उनकी कालजयी रचनाओं को देशव्यापी बना दिया। वहीं भारतीजी अपनी गुण ग्राहकता के अनुसार रचना की गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं करते थे। वे अपनी पसन्द के रचनाकारों की श्रेष्ठ रचनाओं को भी एक तयशुदा संख्या से अधिक का अवसर नहीं देते थे। उन्होंने किसी से कहा था कि काका हाथरसी वाली भूल अब धर्मयुग दुहराना नहीं चाहता।
सूर्यभानु गुप्त की गज़ल ‘खामोशी’
इश्क़ की इब्तिदा है ख़ामोशी
आहटों का पता है ख़ामोशी

चाँदनी है, घटा है ख़ामोशी
भीगने का मज़ा है ख़ामोशी

काम आती नहीं कोई छतरी
बारिशों की हवा है ख़ामोशी

इस के क़ाइल हैं आज भी पत्थर
सौ नशे का नशा है ख़ामोशी

कंघियाँ टूटती हैं लफ़्ज़ों की
जोगियों की जटा है ख़ामोशी

इश्क़ की कुण्डली में छुरियाँ हैं
हर छुरी पर लिखा है ख़ामोशी

एक आवाज़ बन गयी चेहरा
कान का आईना है ख़ामोशी

नैन भूले पलक झपकना भी
सोच का केमेरा है ख़ामोशी

भीगती रात की हथेली पर
जैसे रंगे-हिना है ख़ामोशी

पेड़ जिस दिन से बे-लिबास हुये
बर्फ़ का क़हक़हा है ख़ामोशी

घर की एक-एक ईंट रोती है
बेटियों की विदा है ख़ामोशी

रूह तो दी बदन नहीं बख़्शा
किस ख़ता की सज़ा है ख़ामोशी

घर में दुख झेलती हर इक माँ की
आतमा की दुआ है ख़ामोशी

गुफ़्तेगु के सिरे हैं हम दौनों
बीच का फ़ासला है ख़ामोशी

दे गई हर ज़ुबान इस्तीफ़ा
इस क़दर लब-कुशा है ख़ामोशी

बस्तियों की हरिक अदालत में
इक रुका फ़ैसला है ख़ामोशी

रात-दिन भीड़-भाड़, हंगामे
इस सदी की दवा है ख़ामोशी

लफ़्ज़ मत फेंक ग़म के दरिया में
सब से ऊँची दुआ है ख़ामोशी

देवता सब नशे के आदी हैं
और उन का नशा है ख़ामोशी

ख़ुद से लड़ने का हौसला हो अगर
जंग का तज़्रिबा है ख़ामोशी

दोसतो! ख़ुद तलक पहुँचने का
मुख़्तसर रासता है ख़ामोशी

हम तो क़ातिल हैं अपने ख़ुद साहिब
तीन सौ दो दफ़ा है ख़ामोशी

हर मुसाफ़िर का बस ख़ुदा-हाफ़िज़
डाकुओं का ज़िला है ख़ामोशी

ढूँढ ली जिस ने अपनी कस्तूरी
उस हिरण की दिशा है ख़ामोशी

लोग तस्वीर बन गये मर कर
ज़िन्दगी का सिला है ख़ामोशी

कितनी ही बार हम गये-आये
हर जनम की कथा है ख़ामोशी

कैफ़ियत है बयान के बाहर
क्या बताएँ कि क्या है ख़ामोशी

थक के लौट आईं सारी भाषाएँ
लापतों का पता है ख़ामोशी
  वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629