गुरुवार, जुलाई 30, 2020

सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या और उससे उठे सवाल


सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या और उससे उठे सवाल  
Sushant Singh Rajput Suicide Case SIT can arrest Riya Chakraborty ...
वीरेन्द्र जैन
बालीवुड के एक लोकप्रिय फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत, जिन्होंने पिछले दिनों अनेक सफल फिल्में की थीं, ने अचानक आत्महत्या कर ली, और पीछे कोई सुसाइड नोट भी नहीं छोड़ा। इस घटना को लेकर लगातार अनेक तरह की कहानियां चर्चा में रहीं। ये चर्चाएं इस बात का संकेतक हैं कि हमारे समाज, राजनीति और व्यवस्था में क्या चल रहा है। हम कितने दोगले समाज को ढो रहे हैं।
कहने को हमारे यहाँ लोकतांत्रिक व्यवस्था है, किंतु सच तो यह है कि हमारे समाज ने अभी उस व्यवस्था को आत्मसात नहीं किया है। स्वतंत्रता संग्राम से उभरे नेताओं के आभा मन्डल के अस्त होने के बाद सत्ता का लाभ लेने के लिए सामंती समाज से जन्मे लोगों ने अपनी चतुराइयों से सारे संस्थानों पर अधिकार कर लिया और दिखावे के लिए कथित लोकतंत्र का मुखौटा भी लगा कर रखा। वैचारिक राजनीति ही लोकतंत्र की आत्मा होती है जिसे पनपने ही नहीं दिया और उसके छुटपुट अंकुरों को खरपतवार की तरह मिटा दिया गया। अब सत्ता पर अधिकार जमाने के लिए धार्मिक आस्थाओं का विदोहन करने वाली साम्प्रदायिकता, जातियों में बंटे समाज में जाति गौरव को उभारना, सामंती अवशेषों की शेष लोकप्रियता भुनाना, पूंजी की मदद से अभावग्रस्त व लालची लोगों से वोट हस्तगत कर लेना, पुलिस और दूषित न्यायव्यवस्था के सहारे बाहुबलियों की धमकियां, साधु वेषधारियों समेत कला और खेल के क्षेत्र में अर्जित लोकप्रिय सितारों का उपयोग किया जाता है। इसमें नीलाम होने वाला मीडिया अधिक बोली लगाने वाले के पक्ष में बिक जाता है। सारी राजनीति राजनीतिक रूप से निष्क्रिय नागरिकों को उत्प्रेरित कर मतदान के दिन वोट गिरवा लेने तक सीमित होकर रह गयी है। दलों के बीच की सारी प्रतियोगिता सत्ता और उसके लाभों के लिए नये नये हथकण्डे अपनाने में होने लगी हैं। मुख्यधारा के सभी प्रमुख दलों का कमोवेश यही स्वरूप है। समाज के अच्छे परिवर्तन और तेज विकास के लिए किसी भी दल की सरकार के कोई प्रयास नहीं होते। भूल चूक से या दिखावे के लिए हो भी जायें तो स्थास्थिति से लाभ उठाने वाली ताकतें उन्हें अपने कदम पीछे खींचने को मजबूर कर देती हैं।
युवा अभिनेता सुशांत कुमार की आत्महत्या एक लोकप्रिय स्टार की ध्यानाकर्षक खबर थी। वह बिहार का रहने वाला था और बिहार में इस साल चुनाव होने वाले हैं इसलिए लोकप्रिय व्यक्ति के साथ घटी अस्वाभाविक घटना और सुसाइड् नोट न छोड़ जाने के कारण पैदा रहस्य की अपने अपने हिसाब से मनमानी व्याख्या हुयी। उसका भरपूर राजनीतिक लाभ लेने के लिए उसे और विवादास्पद बनाया गया व सनसनी बेच कर धनोपार्जन करने वाले मीडिया ने जरूरी सवालों से कन्नी काटते हुए इसी पर सारी चर्चाएं केन्द्रित कीं।
सुशांत एक महात्वाकांक्षी और लगनशील युवा था जिसने अपनी इंजीनियरिंग की पढाई छोड़ कर फिल्मी कैरियर अपनाया। उसकी मेहनत और लगन से उसे सफलता भी मिली व उसने भरपूर धन भी कमाया। युवा अवस्था में कमाये गये धन से युवा अवस्था के सपने ही पूरे किये जाते हैं व सुशांत बिहार जैसे राज्य के एक बन्द समाज से खुली हवा में आया था। उसके द्वारा अर्जित धन, व लोकप्रियता ने उसे अनेक युवतियों का चहेता बनाया होगा जिसमें से दो की चर्चा हो रही है क्योंकि वह खुद भी क्रमशः इनके निकट आया। एक से दूरी होने, जिसे आज की भाषा में ब्रेकअप कहा जाता है, के बाद वह जिस दूसरी युवती के निकट आया तो दोनों के बीच प्रतिद्वन्दिता स्वाभाविक है।
एक और बात पर ध्यान दिया जाना भी जरूरी है कि अपनी सफलता और सम्पन्नता के बाद उसने  अपने परिवार के साथ दूरी सी बना कर रखी। अपने धन को उनके बीच नहीं बांटा। अपने जीवन जीने के तरीके में उनका कोई अनुशासन नहीं चाहा व अपना सुख दुख उनके साथ नहीं बांटा। वह अपने तरीके से मकान और मित्र बदलता रहा। वह ना तो किसी राजनीतिक दल का प्रचारक बना, ना उसने शिवसेना द्वारा बिहारियों के खिलाफ किये गये विषवमन के खिलाफ कोई बयान दिया। यहाँ तक कि प्रवासी कहे जाने वाले मजदूरों पर जो संकट आया उसमें भी उसका बिहारी प्रेम या मजदूरों के साथ सहानिभूति नहीं जगी। उसने सोनू सूद की तरह अतिरिक्त रूप से आगे आकर उनके लिए कुछ नहीं किया, या करना चाहा। उसकी मृत्यु के बाद उससे सहानिभूति रखने वाले जो लोग पैदा हुये वे पहले उसके साथ नहीं दिखे। अगर किसी माफिया गिरोह द्वारा भाई भतीजावाद करते हुए उसके साथ कोई पक्षपात किया जा रहा था तो ये लोग तब कहाँ थे। एक सुन्दर अभिनेत्री तो विवादों से ही अपना स्थान बनाने व बनाये रखने के लिए बहुत दिनों से इसी तरह के भागीरथी प्रयास कर रही है। कला जगत में फिल्मी क्षेत्र ज्यादा लागत का क्षेत्र है और मुनाफे के साथ अपनी लागत वसूलने के लिए निवेशक प्रतिभाओं को बिना भेदभाव के स्थान देते हैं। उनकी चयन समिति में अगर फिल्मी दुनिया के लोग होते हैं तो वे कभी कभी अपने रिश्तेदारों को प्राथमिकता दिला देते होंगे। पर टिका वही रह सकता है। हेमा मालिनी व धर्मेन्द्र की बेटियों को अवसर तो मिला पर वे अपना स्थान नहीं बना सकीं। कला के क्षेत्र में सफलता में प्रतिभा और सम्पर्क दोनों की भूमिका रहती है। राजनीति में तो यह बात फिल्मी दुनिया से कई गुना अधिक है, व व्यापार में तो विरासत ही चलती है। किंतु बिहार के चुनावों को देखते हुए साम्प्रदायिक राजनीति खेलने वालों ने सुशांत की दुखद मृत्यु को एक साम्प्रदायिक मोड़ देने की कोशिश की और उसकी आत्महत्या को कुछ मुस्लिम कलाकारों की उपेक्षा को जिम्मेवार ठहराने का प्रयास किया। करणी सेना जैसे लोगों से प्रदर्शन करवाया।  चिराग पासवान जैसे लोग देश की सबसे अच्छी महाराष्ट्र पुलिस की तुलना में बिहार पुलिस को उतारने की बात पर बल देने लगे व बिहार सरकार से चुनावी सौदेबाजी के उद्देश्य से बिहार सरकार की आलोचना करने लगे।
एक कलाकार के भावुक फैसले के बाद असली सवाल उसके द्वारा अर्जित धन के खर्च या निवेश का है।  यह धन जरूर किसी ना किसी के पास होगा और उसके विधिवत विवाह न करने के कारण परिवार के सदस्यों का कानूनी अधिकार बनता है, जिन्हें उसने जीते जी नहीं दिया था और अपने मित्रों या महिला मित्रों की मदद से खर्च या विनियोजित किया होगा। एक खबर यह भी चल रही थी कि वह उसे केरल में किसी खेती में निवेश करना चाहता था जिसको न करने के लिए उसकी महिला मित्र ने विपरीत सलाह देकर रुकवा दिया था।
समाज बदल रहा है तो सामाजिक सम्बन्धों पर भी उसका प्रभाव पड़ेगा। कुछ को वह अच्छा लगेगा व कुछ परम्परावादियॉं को नहीं लगेगा। विरासत का कानून परम्परावादी रिश्तों को ही मान्यता देता है। कथित दिल और आत्मा के रिश्तों को ना तो मापा जा सकता है और ना ही उनका कोई स्थान है। दुखद यह है कि इसके लिए दोनों तरफ से ही अनावश्यक कथाएं गढी जाती हैं, फैलायी जाती हैं। कुछ के लिए तो आपराधिक षड़यंत्र भी रचे जाते हैं। संजय गाँधी की मृत्यु के बाद इन्दिरा गाँधी और मनेका गाँधी के बीच सम्पत्ति के हक के लिए मुकदमेबाजी भी हुयी थी व मुकदमा जीतने के बाद इन्दिरा गाँधी ने वह सम्पत्ति वरुण गाँधी के नाम कर दी थी। रोचक यह है कि उस समय तक वरुण गाँधी वयस्क नहीं हुये थे इसलिए वह फिर से उनकी नेचरल गार्जियन मनेका गाँधी के हाथों में पहुंच गयी थी।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629
                      

सोमवार, जुलाई 20, 2020

पद्मभूषण सम्मान से सम्मनित चीनी विद्वान जी जियानलिन



हमारे पद्मभूषण सम्मान से सम्मनित चीनी विद्वान जी जियानलिनRenowned Chinese scholar Ji Xianlin dies in Beijing - China News ...
वीरेन्द्र जैन
                6 जून 2008 जब अमृतसर में खालिस्तानी आन्दोलन का समर्थन करने वाले लोग तत्कालीन  राज्य सरकार की शह पर सिमरन जीत सिंह मान के नेतृत्व में अमृतसर मन्दिर में अलग खालिस्तान की वकालत कर  रहे थे, और जब ताकतवर गुर्जरों के लाठीधारी समूह राजस्थान में कई जगह रेल की पटरियों पर धरना देते हुये अपने को कमजोर वर्ग में सम्मिलित करने की मांग पर रेल यातायात रोक कर बैठे हुये थे, तब भारत के तत्कालीन विदेशमंत्री प्रणव मुखर्जी चीन के फौजी अस्पताल में एक 97 वर्षीय चीनी विद्वान को भारत के प्रथम चार सम्मानों में से एक पद्मभूषण सम्मान से सम्मनित कर रहे थे। सम्मानित होने वाले व्यक्ति का नाम जी जियानलिन था, जो सारी दुनिया के लोगों के विचारों को अनुवाद के द्वारा फैलाने का यथार्थवादी तरीका अपनाये जाने के पक्षधर रहे। हमारे प्राचीन ग्रन्थ ऋगवेद में जो कहा गया है-
आ नो भद्रा क्रतवो यंतु विश्वतः(अच्छे विचार सारी दुनिया से आने दीजिये)। यह अनुवाद के द्वारा ही संभव है।
                भारत के गणतंत्र दिवस पर विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाली चुनिंदा हस्तियों को भारत के राष्ट्रपति की ओर से सम्मानों की घोषणा की जाती है। सन 2008 की 26 जनवरी को भारत के राष्ट्रपति ने जिन लोगों को पद्म सम्मानों की घोषणा की थी उनमें चीन के विद्वान जी जियानलिन का नाम भी सम्मिलित था जिन्हें पद्मभूषण सम्मान के लिए चुना गया था। वे उन विरले विदेशी व्यक्तियों में से एक थे जिन्हैं साहित्य व शिक्षा के क्षेत्र में इस सम्मान  के लिए चुना गया था। इस चयन ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के प्रति बरबस ध्यान आकर्षित किया था।
                जी जियानलिन की उम्र उस समय 97 वर्ष थी, र उस उम्र में भी वे सक्रिय थे। इस सम्मान के अगले वर्ष 11जुलाई 2009 को 98 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हुआ। वे इतना जीवन से भरे हुए थे कि कहते थे कि असली उम्र तो सौवर्षों के बाद ही प्रारंभ होती है। गत 6 अगस्त 2005 को जी के 94वें जन्मदिन पर चीन की कन्फयूसियस फाउन्डेशन ने बीजिंग में जी जियानलिन रिसर्च इंस्टीट्यूट की शुरूआत की थी। यह संस्था जी के शोध कार्यों पर काम करने के लिए बनायी गयी व जिसमें चीन के शीर्षस्थ विद्वान तंगयीज्जी, ले दियान, और ली मेंग्यस्की वरिष्ठ सलाहकार के रूप में सम्मिलित हैं।
जब सन 2006 में चीन की सरकार द्वारा उनके अनुवाद कार्यों के लिए  लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया था तो उस अवसर पर जी ने कहा था कि गत पांच हजार सालों से चीन की संस्कृति के सतत जीवंत और सुसम्पन्न बने रहने का कारण यह है कि हम अनुवाद से जुड़े रहे। दूसरी संस्कृतियों से अनुवाद ने हमारी देह में सदा नये रक्त का संचार किया है।
                जी का एक स्थल पर कथन है कि ‘‘ चीन की नदियां घटती बढती रहती हें पर वे कभी सूखती नहीं हैं क्योंकि उनमें सदा नया जल आता रहता है। इसी तरह हमारी संस्कृति की नदी में भी भारत और पश्चिम से सदा नया जल आता रहता है इन दोनों ही स्थलों ने हमें अनुवाद के माध्यम से धन्य किया है। यह अनुवाद ही है जिसने चीनी सभ्यता को सदा जवान बनाये रखा है। अनुवाद बेहद लाभदायक है।’’

                भारत के गणतंत्र दिवस पर जब जी को पद्मभूषण सम्मान की घोषणा हुयी थी तब भारत चीन संस्कृतिक संबंधों के विशेषज्ञ जू के कियो ने कहा था कि चीन के लोग भारत की परंपरा और संस्कृति के बारे में जो कुछ भी जानते हैं वह जी के माध्यम से ही जानते हैं। उन्होंने भारत के प्राचीन ग्रन्थों को मूल संस्कृत से अनुवाद करके उसे चीनी काव्य में रूपान्तरित किया है।
                अपने नैतिक मूल्यों, उज्जवल चरित्र और व्यक्तित्व के लिए जी को चीन में बहुत आदर प्राप्त है। चीनी प्रीमियर वेन जियाबों ने भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कहा था कि जी हमारे सर्वोत्तम सलाहकार हैं। परम राष्ट्रभक्त जी का कहना था कि जब में राख में बदल जाऊॅंगा तब भी चीन के प्रति मेरा प्रेम कम नहीं होगा। उन्होंने अपने छात्र जीवन में ही जापान द्वारा घुसपैठ करने पर च्यांग काई शेक के खिलाफ याचिका दायर की थी।
                खाकी पोशाक और कपड़ों के जूतेां में स्कूल बैग लटकाये हुये जी एक ख्यात विद्वान से अधिक एक किसान और मजदूर नजर आते थे। वे सुबह साढे चार बजे उठ जाते और  पांच बजे नाश्ता करने के बाद लिखना प्रारंभ कर देते थे। उनका कहना था कि लिखने के लिए ही सुबह मुझे उठाती है। वे बहुत ही तेजी से लिखते थे पर विचारों के साथ भाषा पर मजबूत पकड़ होने के कारण उनके लेखन में कहीं झोल नहीं आता था। कहा जाता है कि उन्होंने अपना बहुप्रसि़द्ध निबंध ‘‘फारएवर रिग्रैट’’ कुछ ही घंटों में लिख लिया था, जिसे सदियों तक याद रखा जायेगा।
                जी अपने विचारों की अभिव्यक्ति में निर्भयता के लिए भी जाने जाते रहे। उन्होंने चीन की सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान ही रामायण के चीनी अनुवाद का दुस्साहसपूर्ण काम किया था। 1986 में उन्होंने अपने दोस्तों की सलाहों के खिलाफ विवादास्पद हू शी के बारे में लिखा ‘‘ फ्यिू वर्डस् फार हूशी”। हू उस समय चीन में अनादर भाव से देखे जा रहे थे और उनके विचारों पर लिखने बोलने का कोई साहस नहीं कर रहा था। तब जी का कहना था कि रचनात्मक कार्यों को पहचाना जाना चाहिये और न केवल उनकी कमजोरियों को ही सामने आना चाहिये अपितु उनके आधुनिक साहित्य की अच्छाइयों को भी जाना जाना चाहिये। उनके लिखे हुये का ही परिणाम था जो चीन ने हूशी के काम को पुनः देखा और मान्यता दी।
जी का कहना था कि सांस्कृतिक आदानप्रदान ही मनुष्यता की बड़ी संचालक शक्ति है। वे कहते हैं कि एक दूसरे से सीख कर और उनकी कमियों को ठीक करके ही हम सतत प्रगति कर सकते हैं । उनका कहना था कि वैश्विक सद्भाव ही मानवता का लक्ष्य है। जी मानव संस्कृति को दो भागों में बांट कर चलते रहे, एक चीन-भारत अरब-इस्लामिक संस्कृति तथा दूसरी यूरोप-अमेरिकन पश्चिमी संस्कृति। वे पूरब और पश्चिम की संस्क्तियों के बीच में निरंतर समन्वय और आदानप्रदान के पक्षधर रहे।
जी को सम्मानित करके भारत सरकार ने विश्वबंधुत्व के एक प्रमुख यथार्थवादी घ्वजवाहक को सम्मानित करने का काम किया था। हजारों भाषाओं वाली दुनिया को अनुवाद से ही समझा जा सकता है।
वीरेन्द्र जैन
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फोन 9425674629  





शुक्रवार, जुलाई 03, 2020

म.प्र. में अस्थिर सरकारों का दौर


म.प्र. में अस्थिर सरकारों का दौर


Madhya Pradesh cabinet expansion: Jyotiraditya Scindia has become ...

वीरेन्द्र जैन 
गत दिनों म.प. में एक अंतराल के बाद भाजपा सरकार के पुनरागमन के सौ दिन पूरे होने के उपलक्ष्य में एक सभा आयोजित की गयी।यह सभा सौ दिन से प्रतीक्षित मंत्रिमण्डल विस्तार के दूसरे दिन ही आयोजित की गयी जिसमें ज्योतिरादित्य सिन्धिया ने प्रमुख वक्ता की तरह भाषण दिया।
उल्लेखनीय है कि पूरे देश की तरह मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस गुटों में विभक्त है और विधानसभा व लोकसभा चुनाव में कमलनाथ, ज्योतिरादित्य व दिग्विजय सिंह के गुटों ने एकजुट होने के दिखावे के साथ चुनावों में भाग लिया था। दिग्विजय सिंह ने अपनी राजनीतिक सूझ बूझ से प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए कमलनाथ के नाम पर सहमति दे दी, व स्वयं अपने अनुभवों व सम्बन्धों का लाभ नेपथ्य में रह कर देने लगे। विरोधियों ने आरोप तो यह भी लगाया कि वे परदे के पीछे रह कर सरकार चला रहे हैं। ज्योतिरादित्य ने समझौते में अपने क्षेत्र के अनेक लोगों को विधानसभा का टिकिट दिलवाया जिनमें से अनेक जीत भी गये और उचित संख्या में मंत्री भी बनाये गये। ऐसे सब लोग सिन्धिया परिवार के बफादार थे। कठिन समय में भी जिस सीट से सिन्धिया परिवार के लोग लगातार जीतते रहे थे उस सीट से गत लोकसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य अपने ही एक समर्थक से हार गये। इसे उन्होंने काँग्रेस के दूसरे गुटों का षड़यंत्र माना और एक आखिरी कोशिश के रूप में राज्यसभा के लिए प्रयास किया, पर काँग्रेस के सदस्यों की जितनी संख्या थी, उतने में केवल एक सदस्य ही जीत सकता था, जिस पर दिग्विजय सिंह की हर तरह से उचित दावेदारी थी।
अतः अपनी राजनीतिक हैसियत को बचाने के लिए ज्योतिरादित्य सिन्धिया ने आखिरी दाँव खेला। उन्होंने अपने समर्थक विधायकों से त्यागपत्र दिलवा दिया जिससे कमलनाथ की सीमांत समर्थन वाली सरकार अल्पमत में आ गयी। निर्दलीय व अन्य छोटे दलों के साथ सौदेबाजी करके भाजपा ने सरकार बना ली। सिन्धिया समेत सभी त्यागपत्र दिये विधायकों ने भाजपा की सदस्यता ले ली और ज्योतिरादित्य भाजपा के टिकिट पर राज्यसभा में पहुंच गये। अगली चुनौती त्यागपत्र दिये हुए व खाली सीटों पर होने वाले उपचुनावों की थी, जिसका गणित बैठाने के लिए मंत्रिमण्डल का विस्तार रोके रखा गया। जब उपचुनाव सिर पर ही आ गये तब विस्तार किया गया जिसमें वादे के अनुसार काँग्रेस से त्यागपत्र देकर आये सिन्धिया समर्थकों को उचित प्रतिनिधित्व दिया गया जिनमें से अधिकतर चम्बल क्षेत्र के थे। वैसे काँग्रेस के पक्ष में कोई स्पष्ट माहौल तो नहीं है किंतु सिन्धिया की बफादारी में इनका पाला बदल कर भाजपा में जाना ना तो क्षेत्र के कांग्रेस के परम्परागत वोटरों को हजम होगा और ना ही अपने ऊपर वरीयता दिये जाने के कारण भाजपा के परम्परागत वोटरों को हजम होगा। सरकार और मंत्री पद की चाशनी ही एक मात्र आकर्षण हो सकता है।
उपरोक्त सौ दिन वाले आयोजन के अवसर पर ज्योतिरादित्य सिन्धिया का भाषण उत्कृष्ट चापलूसी का निकृष्टतम उदाहरण था। स्मरणीय है कि श्री सिन्धिया काँग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान में प्रमुख नेता राहुल गाँधी के हम उम्र और निजी मित्रों में थे। लोकसभा की चुनिन्दा बहसों में श्री गाँधी ने उन्हें महत्वपूर्ण वक्तव्य देने का अवसर दिया था। वे काँग्रेस के प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे। उल्लेखनीय है कि जब एक दिन अचानक लोकसभा में राहुल गाँधी ने नरेन्द्र मोदी को गले लगा लिया था व उसके बाद ज्योतिरादित्य सिन्धिया की ओर देख कर ही आँख मार कर संकेत दिया था कि यह दोनों की योजना थी। उपरोक्त भाषण उनके अभी तक के भाषणों के ठीक विपरीत था और किसी सामंत के चारण गान जैसा था। सीधा प्रसारण बता रहा था कि वह भाषण भाजपा के कार्य परिषद के सदस्यों को भी बचकाना व अविश्वसनीय लग रहा था और पच नहीं पा रहा था।
गत पन्द्रह वर्षों तक भाजपा के पूर्ण बहुमत की सरकारें रही थीं भले ही शुरू में उन्हें दो मुख्यमंत्री बदलना पड़े हों किंतु स्थिरिता पर फर्क नहीं पड़ा। अब ऐसी स्थिति नहीं है। मध्य प्रदेश की राजनीति दो ध्रुवीय है और 2018 के विधानसभा चुनावों के बाद दोनों दलों को पूर्ण बहुमत नहीं था व निर्दलीय बसपा, सपा, आदि से समर्थन लेने के बाद ही सरकार बन सकती थी। यह समर्थन हथियाने में काँग्रेस ने बाजी मार ली और भाजपा पीछे रह गयी। इन पन्द्रह सालों में भाजपा ने अपनी एकता के खोल में कई टकराव देखे किंतु वे सतह पर प्रभाव नहीं दिखा सके। 2003 में उमा भारती को इसलिए मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था क्योंकि भाजपा को जीतने की उम्मीद नहीं थी व उसके पास दिग्विजय सिंह की टक्कर का कोई उम्मीदवार नहीं था। संयोग से काँग्रेस हार गयी और भाजपा ने अप्रत्याशित मुख्यमंत्री उमा भारती पर नियंत्रण लगा कर उन्हें संचालित करना चाहा जिसके खिलाफ कुछ समय बाद उन्होंने विद्रोह कर दिया। संयोग से एक प्रकरण में घोषित सजा के बाहने उन्हें बाहर करने का मौका मिल गया। उस समय भी अरुण जैटली के साथ शिवराज सिंह चौहान को शपथ लेने के लिए दिल्ली से भेजा गया था किंतु उमा भारती ने उन्हें पदभार ट्रांसफर करने से इंकार करते हुए अपनी पसन्द के सीधे सरल महात्वाकांक्षा न पालने वाले बाबूलाल गौर को पद दिया ताकि मौका आने के बाद वे पद खाली कर दें। जल्दी ही ऐसा मौका भी आ गया किंतु भाजपा ने यह कह कर रोक दिया कि इतनी जल्दी जल्दी मुख्यमंत्री नहीं बदले जाते। बाद में उनकी तिरंगा यात्रा, के बाद पार्टी छोड़ने और दूसरा दल बनाने का दौर चला। शिवराज नामित कर दिये गये थे। 2008 के चुनावों में उन्होंने अलग दल से चुनाव लड़ कर भाजपा को नुकसान पहुंचाया। पर अन्दर से चतुर शिवराज ने उन्हें न केवल पराजित कराया अपितु जब उन्होंने वापिस आना चाहा तो दो तीन साल तक उनकी वापिसी को रोके रहे। वापिस भी इसी शर्त पर होने दिया कि वे मध्य प्रदेश में प्रवेश नहीं करेंगी। उन्हें उत्तर प्रदेश से विधायक का चुनाव लड़वाया गया और उनकी इच्छा के अनुसार उन्हें उत्तर प्रदेश में भी मुख्यमंत्री पद प्रत्याशी घोषित किया गया क्योंकि पार्टी को सरकार बना लेने की उम्मीद नहीं थी। हुआ भी ऐसा ही, वे शपथ ग्रहण के बाद दुबारा उत्तर प्रदेश विधान सभा में नहीं गयीं। बाद में 2014 में लोकसभा चुनाव भी उन्हें उ.प्र. से लड़वाया गया। इस बीच में उनके पक्षधर नेताओं को राजनीतिक रूप से निर्मूल कर दिया गया जब तक कि वे शिवराज के आगे समर्पित नहीं हो गये। इस मंत्रिमण्डल विस्तार के बाद भी उमा भारती ने अपना असंतोष व्यक्त किया था कि उनके समर्थकों को उचित स्थान नहीं मिला।
शिवराज ने अपने कार्यकाल के दौरान अपने सारे विरोधियों को बहुत कुशलता से बाहर करवा दिया। कैलाश विजयवर्गीय को संगठन में पदोन्नति के बहाने, प्रभात झा और अरविन्द मेनन आदि को कार्यकाल पूरा होने के बहाने दूर कर दिया। अब तक वे सर्वे सर्वा बने रहे, किंतु अब उन्हें उन  सिन्धिया की चुनौती झेलना पड़ेगी जिनमें बाल हठ जैसा राजहठ है। सरकार उन की इच्छा पर ही टिकी है क्योंकि जो विधायक उनके कहने पर त्यागपत्र दे सकते हैं वे उन्हीं के आदेश का पालन करेंगे। भाजपा ने सरकार बनाने और मंत्रिमण्डल विस्तार में तो झुक कर समझौता कर लिया किंतु  एक सीमा से अधिक वह समझौता नहीं कर सकेगी। अगर इन विधायकों में एक सुनिश्चित संख्या हार जाती है तो भी सरकार बदलेगी। संसाधनों की बहुलता के कारण खरीद फरोख्त में कोई दल पीछे नहीं है। इसलिए अस्थिर सरकारों का दौर शुरू हो सकता है। जिस तरह की राजनीतिक जोड़ तोड़ चल रही है उसमें सोशल डिस्टेंस, मास्क आदि के प्रति कोई सावधान नहीं दिख रहा है।   
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, जून 29, 2020

एक सरल व्यंग्यकार – शंकर पुंताम्बेकर


एक सरल व्यंग्यकार – शंकर पुंताम्बेकर

हिंदी के प्रख्यात व्यंगकार डा.शंकर ...








वीरेन्द्र जैन
हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल, और रवीन्द्रनाथ त्यागी जैसे चार गुम्बजों के बाद जो दूसरा क्रम आता है उनमें शंकर पुंताम्बेकर का नाम प्रमुख लोगों में लिया जा सकता है।
थोड़ा दूर से शुरू करना पड़ेगा। मेरी दतिया में एक विभूति थे जिन्हें राम प्रसाद कटारे के नाम से जाना जाता था व बाद में वे दादाजी कहलाये। वे जाति से गहोई वैश्य थे और व्यवसाय से सर्राफ, किंतु स्वतंत्रता के बाद वे पुरानी रियासत रही दतिया में सर्वाधिक सक्रिय संस्कृति पुरुष के रूप में पहचाने गये। जब भी किसी सांस्कृतिक आयोजन की भूमिका बनती थी तो सबसे पहले उनका नाम लिखा जाता था। कवि सम्मेलन हो, रामलीला हो, गीता के प्रवचन हों, संगीत सभा हो, हाकी का मैच हो या कुश्ती वे सभी के आयोजन में कार्यकारिणी के प्रमुख पद पर बैठाये जाते थे और यथा सम्भव आर्थिक मदद भी करते थे। कलाकार उनके घर मेहमान होते थे और किसी भी क्षेत्र के प्रत्येक नामी व्यक्ति के नगर में आने पर उनका दर स्वागत के लिए खुला रहता था। मित्रता में उनके लिए उम्र का कोई बन्धन नहीं था। वे मेरे पिता के भी मित्र रहे थे, मेरे भी और मेरे बेटे के उम्र के लोगों के भी। मैंने और उनने रजनीश को साथ साथ पढा था, पर मैं तो केवल पाठक रहा पर उनने रजनीश के सहजता के सन्देश को जीवन में उतार लिया। मुक्त हास्य. कोई बनावट नहीं, कोई औपचारिकता नहीं। जब तक उनके हाथ में पैसा रहा तब तक उनने खुल कर खर्च किया। मैं मजाक में कहता था कि वे साहित्य प्रेमी नहीं साहित्यकारप्रेमी हैं। उनकी कोशिश तो पूरे परिवार को संस्कृति के क्षेत्र में लाने की थी किंतु चार में से एक पुत्र ओम कटारे फिल्म और नाटक के क्षेत्र में सफल हुये व एक पुत्री संगीत के क्षेत्र में। यह भूमिका मैंने इसलिए बाँधी है क्योंकि ऐसे ही मेरे एक मित्र भोपाल में थे और वे थे जब्बार ढाकवाला जो हर लोकप्रिय कला व समाज सेवा के क्षेत्र में चर्चित विभूतियों का स्वागत करने को आतुर रहते थे। वे मध्य प्रदेश में प्रशासनिक अधिकारी थे व बाद में आईएएस होकर विभिन्न पदक्रम में रहे किंतु वे व्यंग्यकार और कवि भी थे। उन्हें मित्र कहने वाले बहुत सारे लोग मिल जायेंगे किंतु वे दिल से मुझे मित्र मानते थे। परिणाम यह होता था कि विशिष्ट लोगों की मेजबानी में मुझे बराबरी से उनका साथ देना होता था, जो मुझे भी अप्रिय नहीं लगता था। नामी लोगों से मिल कर ‘बेनामी’ लोग भी खुश हो लेते हैं।
उनके पास पद था, स्टाफ था, संसाधन थे इसलिए उनका आमंत्रण लोग स्वीकार कर लेते थे। ऐसे ही एक अवसर पर मेरी पहली मुलाकात 1995 में शंकर पुण्ताम्बेकर जी से जब्बार के निवास पर हुयी, जो किसी आयोजन में भोपाल आने के बाद उनके घर आमंत्रित थे। याद पड़ता है कि उस समय ज्ञान चतुर्वेदी और अंजनी चौहान भी वहाँ  थे। अपनी कुरेदने की आदत में मैंने उनसे अन्य सवालों के बीच पूछ लिया था कि परसाई और शरद जोशी में से आप किसको अपने लेखन के निकट पाते हैं? उन्हें बुरा लगा था और बोले कि यह सवाल ठीक नहीं है, ज्ञानजी ने भी उनकी बात का समर्थन किया था और मैं मुस्करा कर रह गया था। तब तक मैंने उनकी रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में पढी तो थीं व उनके कद से परिचित था किंतु कोई रचना विशेष दिमाग में दर्ज नहीं हो पायी थी।
ऐसे ही सहज बातचीत के अन्दाज में मैंने उनसे कहा कि कभी दतिया में मेरे मकान के एक हिस्से में भी एक पुंताम्बेकर जी रहते थे जो टेलीफोन विभाग में थे। वे बोले कि वह मेरा भतीजा है और मैं पिछले दिनों उसके मकान के गृह प्रवेश में दतिया गया था तब मैंने तुम्हारे बारे में भी पूछा था [ धर्मयुग में मेरे नाम के साथ दतिया लगा होने के कारण बहुत सारे लोगों को दतिया के साथ मैं याद आता रहा हूं] इस तरह मेरी उनसे आत्मीयता स्थापित हो गयी। पत्रिकाओं में प्रकाशित परिचित लोगों की रचनाएं प्राथमिकता में पढ ली जाती हैं और इस तरह उनके ज्यादातर व्यंग्य मैंने पढ लिये।
हिन्दी में पहली पीढी के जितने भी प्रसिद्ध व्यंग्यकार हुये हैं वे या तो स्वतंत्र लेखक हुये हैं या अधिकारी। भाषा व साहित्य का अध्यापन उनका व्यवसाय नहीं रहा। किंतु ग्वालियर और विदिशा में रह कर पढे पुंताम्बकर जी अंत तक हिन्दी साहित्य के अध्यापन से जुड़े रहे। वे मध्य प्रदेश में ही जन्मे और कुछ वर्षों तक यहीं अध्यापन भी किया। बाद में वे जलगाँव चले गये थे, जहाँ एक कालेज में प्राध्यपक रहे। उनकी रचनाओं में उनका अध्यापक नजर आता है। मुझे याद आ रहा है कि एक बार कलकत्ता में आयोजित जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अधिवेशन में राजेन्द्र यादव ने कहा था कि कालेज के प्रोफेसर लोग या तो कविताएं लिखते हैं या आलोचना क्योंकि कहानी लिखने में जान लगती है।  
मेरी पहली व्यंग्य पुस्तक 1984 में छपी थी. फिर उसके बाद नौकरी छोड़ने तक मैं लेखन में उतना सक्रिय नहीं रह सका जितना कि पहले था। बीस साल बाद जब दूसरी किताब आयी तो उसी समय लखनऊ में अट्टहास का कार्यक्रम आ गया और राग दरबारी के यशस्वी लेखक श्रीलाल शुक्ल जी से पुस्तक का विमोचन कराने का लालच पैदा हो गया। वे उस कार्यक्रम के अंतर्गत होने वाली गोष्ठी के मुख्य अतिथि थे और उसी कार्यक्रम में विमोचन हो गया। इसी वर्ष का अट्टहास सम्मान पुंताम्बेकर जी को मिला था। अस्सी वर्ष की उम्र में वे बेटी को साथ लेकर आये थे जिनकी उम्र भी लगभग पचपन-साठ वर्ष के असपास रही होगी और गलतफहमी से बचने के लिए उन्हें बार बार बेटी का परिचय कराना पड़ रहा था। सादगी से रहने वालों के साथ ऐसा संकट भी पैदा हो सकता है, तब यह महसूस हुआ था। मैंने आपस में मित्रों से कहा था कि दिल्ली से आने वाले लोगों को तो अपनी साथी महिला का परिचय पत्नी के रूप में कराना पड़ता है ताकि कोई बेटी न समझ ले, पर यहाँ मामला उल्टा है।
जल्दी में प्रतियां कम आ पायी थीं, जो विमोचन के लिए मंच पर दी गयी प्रतियों में ही निबट गयीं, फिर भी मैंने एक प्रति पुंताम्बेकर जी के लिए सुरक्षित रखी और् गैस्ट हाउस में लौट कर भेंट की। उनसे आग्रह किया कि फुरसत निकाल कर पढॆ और अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें। जलगांव पहुंच कर उन्होंने पत्र लिखा कि अभी वे अपनी पुस्तक में व्यस्त हैं और इस काम से मुक्त होते ही जरूर लिखेंगे। मुझे लगा कि यह बहानेबाजी है और यह सोच मन मसोस कर बैठ गया कि मैं खुद भी तो कई पुस्तकों को पढने तक का समय नहीं निकाल पाता जिन्हें प्रेमी मित्रों ने बहुत आग्रह पूर्वक भेंट की हुयी होती है, फिर पुंताम्बेकर जी तो बड़े लेखक हैं।
लगभग एक वर्ष वाद उनका पत्र आया और अलग लिफाफे में लम्बी समीक्षा मिली। उन्होंने औपचारिकता नहीं निभायी थी अपितु एक एक रचना को गहराई से जांच कर लिखा था और मुझे व जवाहर चौधरी को अपने समकालीनों में महत्वपूर्ण बतलाया था। आम तौर पर मैं प्रशंसा से खुश नहीं होता हूं क्योंकि मेरे परिवेश में मुँह पर की गयी प्रशंसा को विश्वसनीय नहीं माना जाता रहा है, पर उन्होंने उसी समीक्षा में लगे हाथ जो कमजोरियां भी गिनायी थीं उससे भरोसा बनता था। उन्होंने लिखा था-
'हम्माम के बाहर' भी वीरेन्द्र जैन लिखित छोटीबड़ी रचनाओं का एक ऐसा व्यंग्य संग्रह है जिसे सुधी पाठक बारबार पढ़ना चाहेगा। हरीश नवल, रामविलास जांगिड़, अरविन्दर निपारी, जवाहर चौधरी जैसे कुछ लेखक इधर व्यंग्य में ऐसा कुछ लिख रहे हैं जिसे पढ़कर ऐसा लगता है कि व्यंग्य पक्की सड़क पर है। वीरेन्द्र जैन भी ऐसे ही लेखकों में सें हैं। इनका पहला व्यंग्य संग्रह था 'एक लुहार की' जो बीस वर्ष पूर्व छपा था। जैन इस बीच यदि धीमी गति से न लिखते, मैदान में कलम के साथ कमर कसे डंटे रहते तो इस लंबे अवकाश में उनके अवश्य ही चारपाँच संग्रह प्रकाशित हो जाते। इस दशा में वे औरों के संग्रहों के लिए फ्लैप मैटर लिखते, स्वयं अपने संग्रह के लिए इसकी खातिर मुहताज न होते। हाँ, जैन की कलम में ऐसी ही धार है जो ग्रंथ संरचना के अभाव में लोगों तक पहुंच नहीं पायी। कुछकुछ यही स्थिति जवाहर चौधरी के साथ है। दुख की बात है कि गुणात्मकता के आधार पर जैन और चौधरी को व्यंग्यजगत् ठीक से जानता ही नहीं।
मेरे धन्यवाद पत्र के उत्तर में उन्होंने मूल्यांकन के क्षेत्र में चल रही धांधलियों के बारे में बिना नाम लिये इंगित किया था। बाद में उनसे पत्र व्यवहार जारी रहा और वे तत्परता से पत्रोत्तर देते रहे। बहुत छोटे छोटे अक्षरों में भी उनकी लिखावट इतनी स्पष्ट होती थी कि कोई भी शब्द पढने के लिए निगाह पर जोर नहीं देना पड़ता था।
जैसे सरल वे रहन सहन में थे वैसे ही लेखन में भी। जैसे बिना जोर लगाये भी महत्वपूर्ण बात बोली जा सकती है वैसा ही उनका लेखन भी था। खेद की बात है कि खुद उन पर बहुत कम लिखा गया।  
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629
  

सोमवार, जून 22, 2020

संस्मरण के. पी. सक्सेना लेखक नहीं लिक्खाड़ थे


संस्मरण
के. पी. सक्सेना लेखक नहीं लिक्खाड़ थे

वीरेन्द्र जैन
के.पी.सक्सेना पत्रिकाओं के व्यंग्य लेखक के रूप में जाने जाते रहे या कहना चाहिए कि व्यंग्य लेखक के रूप में भी जाने जाते रहे, पर उन्होंने जब भी लिखने का जो लक्ष्य बनाया उसमें सफलता पायी। पत्रिकाओं में निरंतर सक्रिय लेखन की लगन मुझे उनके लेखन से ही मिली और इस तरह वे मेरे मार्गदर्शक रहे। उनके लेखन की मात्रा, विषय वैविध्य और निरंतरता को देख कर आश्चर्य और ईर्षा होती थी।
      मैं एक छोटे ‘ए’ क्लास बैंक हिन्दुस्तान कमर्सियल बैंक में नौकरी करता था और ऐसा करते हुये देश के कोने कोने में पन्द्रह साल के दौरान मेरे दस ट्रासफर हुये, क्योंकि इस बैंक में अधिकारियों के ट्रांसफर पूरे देश में कहीं भी हो सकते थे। इसी काल में मुझे एक बार हरदोई जिले के बेनीगंज में पदस्थ होना पड़ा जो लखनऊ के निकट था, अतः मेरी शनिवार की शाम और रविवार लखनऊ में ही गुजरता था। यशपाल और नागरजी के बाद की पीढी के लखनऊ में समकालीन लेखकों में के पी का नाम सर्वाधिक चमकीला नाम था। वे अमीनाबाद के पास गुईन रोड पर किराये से रहते थे। उन दिनों मुझे लेखकों के पते तक याद रहते थे। लखौरी ईंटों से बना वह बड़े दरवाजे वाला घर था। उनसे पहली मुलाकात करने से पहले मैंने उन्हें जो पत्र लिखा था उसे न मिलना उन्होंने बताया था, पर उसके बाद भी मेरे नाम और लेखन से परिचित होने की जानकारी देकर उन्होंने थोड़ा सुख दिया था जिससे उनके साथ जल्दी सहज हो सका था। बाद में उन्होंने ही मुझे सूर्य कुमार पान्डेय और अनूप श्रीवास्तव आदि से मिलवाया था जिनसे बाद में लम्बा सम्पर्क और मित्रता रही। अभी बाद के दिनों में वे रामनगर में रहने लगे थे जहाँ उनके पड़ोस में नागरजी के पुत्र का मकान था और कभी कभी नागरजी भी वहाँ आते रहते थे। एक बार जब मैं रामनगर में उनसे मिलने गये तो वे मुझे नागरजी से मिलवाने भी ले गये थे।
      वे उन दिनों लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पर स्टेशन मास्टर थे और देश के प्रमुख राज्य की राजधानी के प्रमुख स्टेशन पर कार्यरत रहते हुए भी विपुल लेखन करते थे। उन दिनों आरक्षण की आज जैसी सुविधा नहीं थी तथा मुझे दतिया जाते समय ट्रेन में स्थान दिलाने की व्यवस्था उन्होंने दर्ज़नों बार की। वे ऐसी बातें बताना भी नहीं भूलते थे कि उनके कार्यालय की जिस कुर्सी पर मैं बैठा हूं उसी पर परसों कमलापति त्रिपाठी बैठे थे। ऐसी बातें सुन कर गर्व होता था। उन्होंने मुझे यह भी बताया था कि इतना लेखन करने के बाद भी उन्होंने कभी लेखन के लिए नौकरी से छुट्टी नहीं ली। धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, नवनीत, माधुरी आदि उस समय की राष्ट्रव्यापी लोकप्रिय पारिवारिक पत्रिकाएं थीं जिनके होली. दिवाली, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, आदि अवसरों पर निकलने वाले विशेषांक के पी की रचनाओं के बिना पूरे नहीं होते थे। वे लखनऊ के दो प्रमुख दैनिक अखबारों में साप्ताहिक स्तम्भ लिखा करते थे, और देश भर की हिन्दी की प्रमुख पत्रिकाओं की माँग को पूरा करते थे। जब दूरदर्शन और इतने सारे प्राईवेट चैनल नहीं थे तब आकाशवाणी के हास्य व्यंग्य के रेडियो नाटक बहुत चाव से सुने जाते थे और के पी उनके प्रमुख लेखकों में से एक थे। बाद में उन्होंने टीवी के लिए भी लिखा। हास्य व्यंग्य के नाटकों के अलावा उन्होंने कुछ गम्भीर नाटक भी लिखे हैं जिनमें से एक पर कभी मेरे अनुजसम मित्र इंजीनियर राजेश श्रीवास्तव ने लघु फिल्म बनानी चाही थी। उनसे अनुमति लेने के लिए हम लोग उनके ग्वालियर प्रवास के दौरान प्रदीप चौबे के निवास पर गये थे पर उन्होंने यह कहते हुए अनुमति देने में असमर्थता व्यक्त की थी क्योंकि उस नाटक पर फिल्मांकन की अनुमति वे पहले ही ओमपुरी को दे चुके थे। उस नाटक के कई भाषाओं में हुए अनुवाद और उसके प्रभाव में घटित घटनाएं भी उन्होंने विस्तार से बतायी थीं जिससे उनके व्यक्तित्व के कुछ अनछुये पहलू ज्ञात हुये थे। शरद जोशी के साथ उन्होंने भी कवि सम्मेलनों में गद्य व्यंग्य पाठ प्रारम्भ किया था और अपने क्षेत्र में वर्षों सक्रिय रहे।
      बाद में वे फिल्म लेखन से जुड़े और लगान जैसी बहुचर्चित और बहुप्रशंसित फिल्म भी लिखी जो अनेक राष्ट्रीय पुरस्कार लेने के साथ आस्कर पुरस्कार तक के लिए नामित हुयी थी। पिछले दिनों में कादम्बिनी के पुराने अंक पलट रहा था तो एक अंक में मुझे केपी सक्सेना का नींबू के गुणों पर लिखा एक लेख मिला। उससे मुझे याद आया कि उन्होंने धर्मयुग में रेलवे गार्डों की चुनौतीपूर्ण कार्यपद्धति से लेकर ‘शरबत का मुहर बन्द गिलास- दशहरी आम’ तक पर मुख्य लेख लिखा था। वे वनस्पति शास्त्र में स्नातकोत्तर थे। उन्होंने बच्चों के लिए भी लिखा।
      लखनऊ के दौरान हुयी मुलाकातों के दौर में एक बार उन्होंने कहा था कि वे ऐसे किसी पत्र पत्रिका के लिए नहीं लिखते जो लेखक को पारिश्रमिक नहीं देती। उनका कहना था कि पत्रिका प्रकाशन के क्षेत्र में प्रकाशक को कागज़ वाला मुफ्त में कागज़ नहीं देता, कम्पोज़िंग सैटिंग वाला मुफ्त में काम नहीं करता, मुद्रक अपनी दर से भुगतान लेता है, डाकवाले अपना पूरा शुल्क वसूलते हैं और हाकर अपना कमीशन लेते हैं, तो फिर लेखक ही ऐसा क्यों रहे जो मुफ्त में अपनी रचना दे, और अपना अवमूल्यन कराये। उनके इन विचारों के प्रभाव में मैंने भी कई वर्षों तक ऐसी किसी पत्रिका के लिए नहीं लिख कर अपना नुकसान किया क्योंकि मैं साहित्यिक [लघु] पत्रिकाओं से कटा रहा।
      एक बार वे अमीनाबाद में एक पत्रिका की दुकान पर अचानक मिल गये और तपाक से बोले कि बहुत दिनों से तुम्हरी कोई रचना नहीं पढी, आजकल कहाँ व्यस्त हो! विडम्बना यह थी कि उस सप्ताह और माह की अनेक प्रमुख पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं प्रकाशित थीं जिन्हें मैंने वहीं दिखा भी दीं। फिर हँसते हुए बोले कि बुरा मत मानना मैं लिखने और नौकरी में इतना व्यस्त रहता हूं कि दूसरों की रचनाएं कम ही पढ पाता हूं, अब ये सारी रचनाएं पढूंगा। मैं एक बार 1995 के अट्टहास के कार्यक्रम में गया और उन्हें फोन करके पूछा कि क्या वे आ रहे हैं, तो बोले कि मैं तो अट्टहास के कार्यक्रम में तब आऊंगा जब मुझे पुरस्कार मिलेगा। उस वर्ष का पुरस्कार नरेन्द्र कोहली जी को दिया गया था। [याद आ गया तो बताता चलूं कि कोहली जी से मुलाकात में मैंने पहली बार कम्प्यूटर की महिमा जानी थी जब उन्होंने बताया था कि नौकरी से मुक्त होकर वे अपने कमरे में कम्प्यूटर पर ही लिखते हैं और वहीं से फैक्स पर भेज देते हैं। ऐसा करते हुए वे हफ्तों तक घर से बाहर नहीं निकलते। ऐसा ही कर सकने का एक सपना मेरे अन्दर घर कर गया था। ]
      उनकी हस्तलिपि बहुत सुन्दर थी। बिल्कुल टंकित से छोटे सुन्दर और साफ स्पष्ट अक्षरों से उनका लिखा अलग से पहचाना जा सकता था। अपनी व्यस्तताओं के बाद भी वे कभी कभी पत्रों के संक्षिप्त उत्तर देने का समय निकाल लेते थे। उनके व्यंग्यों में लखनऊ की तहज़ीब उफनती थी जिनमें मिर्ज़ा नामक एक पात्र तो लखनऊ की मिलीजुली संस्कृति और मुहब्बत से सराबोर नौक झोंक का प्रतीक बन गया था। कभी चकल्लस के कार्यक्रम में हेमा मालिनी की उपस्थिति को गौरव के साथ बताने वाले के पी को बाद में अनेक पुरस्कार मिले। पुरस्कारों सम्मानों ने उनके दायित्व को बढाया और पद्मश्री मिलने के बाद उन्होंने ‘लगान’ जैसी फिल्म लिखी, जिसने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की। अटल जी की सरकार में जिस वर्ष उन्हें पद्मश्री मिली थी उसके कुछ ही पहले उन्होंने भाजपा की सदस्यता ली थी। मैंने आदतन उन्हें बधाई देते हुए भी पत्र में अपना असंतोष व्यक्त किया था।   
      उनकी रचनाओं के संकलनों के पुस्तकाकार प्रकाशन तो बहुत हुये किंतु उन्होंने जो भी लिखा वह फुटकर ही लिखा। किताब के लिए लिखी गयी उनकी किताबें कम ही होंगीं। वे सरल, सहज, बोधगम्य और रोचक लिखते थे। उनकी रचनाएं एक बार में ही पढी जाने वाली संतुलित आकार की होती थीं। हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, शरद जोशी और रवीन्द्र नाथ त्यागी, के बाद व्यंग्य लेखन में जो नाम अपना स्थान बना रहे थे केपी का नाम भी प्रमुख नामों में एक है।
      श्री से. रा. यात्री की तरह ही वे अपने नाम के संक्षिप्तीकरण से ही इतने विख्यात थे कि बहुत ही कम लोगों को पता होगा कि के.पी का पूरा नाम कालिका प्रसाद सक्सेना था जो किसी किताब या पत्र पत्रिका में कभी नहीं लिखा गया। जब भी उनका समग्र लेखन रचनावली के रूप में प्रकाशित होगा तो वह आकार में अनेक रचनावलियों को पीछे छोड़ देगा।
वीरेन्द्र जैन
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रविवार, जून 21, 2020

गाँधी के देश में विशिष्ट होने का रोग


गाँधी के देश में विशिष्ट होने का रोग

वीरेन्द्र जैन
पिछले तीस सालों में देश के अन्दर सुविधाजीवी मध्यम वर्ग की संख्या में तेज वृद्धि हुयी है और उसी के अनुरूप उपभोक्ता सामग्री की मांग भी बढी। इसी दौरान दुनिया के बाज़ार पर चीन ने कब्जा जमाया और भारत के बाजार पर छा गया। उसने अपना सामान बेचने के लिए यूरोपीय देशों की तरह संस्कृति का निर्यात नहीं किया अपितु भारत समेत दुनिया भर के देशों की संस्कृतियों के अनुरूप माल का उत्पादन किया। उदाहरणार्थ भारत की महिलाओं के लिए उसने सिन्दूर का निर्माण किया और आज पूरे देश की हिन्दू महिलाएं चीन में निर्मित सिन्दूर का प्रयोग कर रही हैं। वाहनों की सामग्री से लेकर मोबाइल व इलेक्ट्रोनिक्स का पूरा बाजार चाइनीज सामान से पटा पड़ा है। देश में कोरोना के प्रारम्भ स्थल और चीन के साथ हिंसक सीमा संघर्ष एक ही समय में घटित हुये। परिस्थितियां ऐसी हुयीं कि उचित समय पर कदम न उठाने की केन्द्र सरकार की अपरिपक्वता साफ नजर आने लगीं। किंतु खरीदे हुए मीडिया व अन्धभक्तों की फौज ने सारे गुस्से की दिशा को भटका दिया। सरल जनता बिना जाने समझे चीनी सामान खरीदने को ही सारी समस्या समझ बैठी और उसके बहिष्कार को पेचीदा अर्थव्यवस्था तक का हल समझने लगी। उम्मीद की जा रही है कि कोरोना के लाकडाउन से बैठ गयी अर्थ व्यवस्था, कमर से टूट चुका निम्न और मध्यम वर्ग को चीनी सामान के बहिष्कार के बहाने सादगी और स्वदेशी का सन्देश पहुंच रहा है, जो सामाजिक परिवर्तन को दिशा देगा। गांधीजी के 150वें जन्मवर्ष में शायद इसी बहाने से उन्हें श्रद्धांजलि दी जा सके।  
      जाति, धर्म, लिंग, वर्ण, भाषा, रंग, आदि का कोई भेद किये बिना सभी को समान नागरिकता देने वाली हमारी आदर्श संवैधानिक व्यवस्था में व्यक्तिवादी राजनीति के उभार ने देश के लोकतंत्र को बहुत नुकसान पहुँचाया है। दुखद है कि देश के बहुत सारे क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीतिक दल व्यक्ति आधारित हैं व उन्होंने बहुत सारे छुटभैए राजनीतिक कार्यकर्ताओं में जल्दी विशिष्ट होने की बीमारी बो दी है। सिद्धांतविहीन राजनीतिक दलों के सदस्यों में ऐसे लोगों की संख्या समुचित है जो स्वयं को समाज में विशिष्ट बनाने के लिए ही दल की खास ‘वर्दी’ में दल के नेताओं के इर्दगिर्द मंडराते रहते हैं। न वे दल की घोषित नीतियों की जानकारी रखते हैं और न ही उसके घोषणापत्र की। सत्तारूढ दल के कार्यकर्ता सरकारी सुविधाएं हथियाने के लिए तो सरकारी अधिकारियों को प्रभावित करने के चक्कर में रहते हैं किंतु सरकार के विकास व निर्बल वर्ग के सशक्तिकरण कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के बारे में जानने समझने की कोई जरूरत नहीं समझते, जिससे जनता के हित में लायी गयी अच्छी अच्छी योजनाएं भी जनभागीदारी के अभाव में सफल नहीं हो पातीं।
वे किसी लाइन में लगना पसन्द नहीं करते, व अपने वाहनों पर नम्बर प्लेट की जगह अपने दल का नाम और दल में अपने पद का उल्लेख किये मिलते हैं, ताकि ट्रैफिक के नियमों का बिना पालन किये चल सकें। उन्हें सब कुछ अतिरिक्त और उस क्रम से पहले चाहिए होता है, जिसके वे पात्र हैं। सरकारी व अर्धसरकारी विभागों के गैस्ट हाउस, डाकबंगले, सरकिट हाउस, रैस्ट हाउस, फारेस्ट या पर्यटन विभाग के होटल आदि को वे अपनी ससुराल समझते हैं व मंत्रियों विधायकों के इशारों पर इनमें नियम विरुद्ध अतिथि बने रहते हैं। मुफ्तखोरी की यही आदत उन्हें सदैव ही उस दल में रहने को प्रेरित करती है, जो सत्ता में होता है, और सत्ता बदलते ही वे तुरंत दल ही नहीं अपितु अपना आका भी बदल लेते हैं।
      विशिष्टता के प्रदर्शन हेतु सुरक्षा गार्ड लेने के लिए लोग झूठे खतरे की कहानियां गढते हैं। स्मरणीय है कि अपना रुतबा बढाने के लिए बाबा भेष में रहने वाले आयुर्वैदिक दबाओं के व्यापारी ने दस वर्ष पूर्व अपने हेलीकाप्टर में एक नकली आतंकी को सुतली बम के साथ बैठा लिया था ताकि उन्हें ज़ेड सुरक्षा माँगने का आधार मिल सके। बाद में पुलिस की सख्त पूछताछ में वह व्यक्ति टूट गया था व उसने सबकुछ सच सच बता दिया था कि सच्ची कहानी क्या थी। ऐसी एक नहीं ढेरों किंवन्दतियां चर्चा में हैं। देश में पुलिस बल की बेहद कमी होने के बाद भी विशिष्ट होने के लिए बहुत सारे लोगों ने अनावश्यक रूप से गार्ड लिये हुये हैं। पिछले दिनों जब सुप्रीम कोर्ट ने अपात्रों को सुरक्षा गार्ड उपलब्ध कराने व पुलिस फोर्स की कमी के बहाने अपराधों पर अंकुश न लगाने पर फटकार लगायी थी तब यह बात सामने आयी थी कि लोगों के अहं को तुष्ट करने में आम आदमी के अधिकारों की कितनी उपेक्षा हो रही है।
      जिन सांसदों विधायकों को एक दिन के लिए भी सदन की सदस्यता लेने पर जीवन भर के लिए पैंशन और दीगर सुविधाएं उपलब्ध करायी जाती हैं, उन्हें उसके साथ साथ अपने उद्योग, व्यापार, मनोरंजन, और चिकित्सकीय या वकालत समेत अनेक आय अर्जित करने वाले काम करने की कोई मनाही नहीं है। यहाँ तक कि जो चुनावों के दौरान सदन में पहुँचने के लिए सारे वैध-अवैध तरीके अपनाते हैं वे ही चुने जाने के बाद अपने इन्हीं व्यवसायों में लिप्त रहते हुए सदन में कम से कम उपस्थित रहते हैं। पूर्व सांसद या विधायक होने की विशिष्टताके नाते वे ट्रैन की उच्च श्रेणी में एक व्यक्ति को साथ लेकर कितनी भी यात्राएं कर सकते हैं, व उनके लिए  आरक्षण का अतिरिक्त कोटा उपलब्ध रहता है। सरकारी डाकबंगलों, आदि में भी वे निःशुल्क या रियायती दरों पर प्राथामिकता पा सकते हैं। जिस संसद और विधानसभाओं में करोड़पति सदस्यों की संख्या बढती ही जा रही है उन सब को भूतपूर्व सदस्य होने के बाद भी पेंशन और विशेष सुविधाएं मिलना और उनमें निरंतर बढोत्तरी होते जाना चिंताजनक बात है। जब समाजिक रूप से पिछड़े वर्ग को नौकरियों में आरक्षण देने में क्रीमी लेयर का अवरोध लगाया जा सकता है तो करोड़पति सांसदों को आरक्षण और विशेष सुविधाएं देने के बारे में निजी आय की कोई सीमा क्यों तय नहीं की जा सकती। उल्लेखनीय है कि बहुत सारे अरबपति व्यापारी तो कुछ विशेष सुविधाओं और नियम विरुद्ध व्यापारिक लाभों के लिए ही दौलत के सहारे सदस्य बनकर सुपात्र उम्मीदवार को सदन में पहुँचने से वंचित कर देते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार देश के सभी बड़े उद्योगपतियों के प्रतिनिधि सदन में मौजूद हैं जो अपने चुने जाने के लिए चुनावों को विकृत करने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। इसी तरह विभिन्न गम्भीर अपराधों के आरोपी तो अपने अपने प्रकरणों को लम्बा खिंचवाने या गवाहों को बदलवाने या सबूतों को मिटाने के लिए ही सदन की सदस्यता लेना चाहते हैं। सदन के सदस्य बनने के बाद उसके कुछ वकील सदस्यों की आय में हुयी अकूत वृद्धि तो चौंकाने वाली है जो एक वेबसाइट ‘माईनेताडाटइंफो’ [myneta.info] पर देखी जा सकती है। स्मरणीय है कि गत वर्षों में लोकसभा प्रतिवर्ष औसतन 71 दिन बैठी जिसमें लोकसभा की कार्यवाही न चलने देने व वाक आउट वाले दिन भी सम्मलित हैं। इसके बाद भी वेतन और भत्ते उन्हें पूरे पूरे मिलते रहे हैं। अनेक राज्यों की विधान सभाओं में भी यह औसत 16 से 31 दिन का आता है। उल्लेखनीय है कि विधायिका के ये प्रतिनिधि कार्यपालिका के दैनिन्दिन कार्यों में निरंतर अनाधिकार हस्तक्षेप करने में लगे रहते हैं। पिछले दिनों ही मध्यप्रदेश के कुछ वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों को असमय स्थानांतरित करने का कारण यह बताया गया था कि वे जनप्रतिनिधियों को महत्व नहीं देते थे।          
      विशिष्टता केवल अधिकारों या सुविधाओं के मामले तक ही सीमित नहीं की जा सकती। जब हमने कुछ लोगों को विशिष्ट बना ही दिया है तो जिम्मेवारियों के बारे में भी उन्हें विशिष्ट बनाना चाहिए। एक विशिष्ट व्यक्ति यदि किसी अपराध में दोषी पाया जाता है तो उसे असाधारण दण्ड भी मिलना चाहिए। बहुत सारे मामलों में देखा गया है कि विशिष्ट व्यक्ति अपनी विशिष्टता व विशेष सम्पर्कों के प्रभाव में कानून के उपकरणों को प्रभावित करने में सफल हो जाता है और उसे कभी कभी बड़ी मुश्किल से ही बहुत लम्बे समय बाद सजा मिल पाती है। उनकी सजा इसलिए भी अधिक होना चाहिए क्योंकि जिस समय उन्हें जेल में होना चाहिए था वे विशेष सुविधाओं का लाभ ले रहे थे तथा जनता को गलत आदर्श देते हुए कार्यपालिका के कार्यों में अनुचित हस्तक्षेप कर रहे थे। जमानत देने के मामले में भी उनके विशेष प्रभाव के खतरे को अनुमानित कर के ही विचार किया जाना चाहिए। विशिष्ट व्यक्तियों के प्रकरणों के निबटारे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्टों की कोई उपलब्धियां नहीं दिखतीं। महिलाओं के उत्पीड़न सम्बन्धी मामलों में आरोपों को झेल रहे जनप्रतिनिधियों के प्रकरणों को सबसे आगे रखना चाहिए। उन्हें टिकिट देने की सिफारिश करने वालों और मंत्रिपद देने वालों से भी पूछा जाना चाहिए कि क्या उनकी पार्टी के पास सम्बन्धित आरोपी को टिकिट देने का कोई विकल्प नहीं था और अगर था तो उन्होंने परोक्ष में आरोपी की मदद क्यों करना चाही?  
      संजय गान्धी की मृत्यु भी ऐसा ही एक हादसा था जो विशिष्टता के दंभ में उड़ान भरने [एवीयेशन] के नियमों और तय ड्रैस के खिलाफ पाजामा कुर्ता और चप्पल पहिन कर हवाई जहाज उड़ाने की कोशिश कर रहे थे। दूसरी ओर उरुग्वे के एक राष्ट्रपति थे  जोसे मुजिका.[पूरा नाम जोसे एल्बर्टो पेपे मुजिका कोर्डैनो] इन्हें दुनिया का सबसे गरीब राष्ट्रपति की संज्ञा दी गई है।  यह जिस तरह का जीवन जीते थे, वैसा जीवन कोई फकीर ही जी सकता था. जोसे मुजिका उरुग्वे के राष्ट्रपति भवन के बजाय अपने दो कमरे के मकान में रहते थे. सुरक्षा के नाम पर बस दो पुलिसकर्मी की सेवा लेते थे. सामान्य लोगों की तरह कुएं से पानी भरते और अपने कपड़े खुद धोते थे. वो अपनी पत्नी के साथ मिलकर फूलों की खेती करते ताकि कुछ एक्स्ट्रा आमदनी हो सके. खेती के लिए ट्रैक्टर खुद चलाते और इसके खराब होने पर खुद ही मैकेनिक की भांति ठीक भी करते थे। कोई नौकर-चाकर अपनी सेवा के लिए नहीं रखते थे. अपनी बहुत पुरानी फॉक्सवैगन बीटल गाड़ी को खुद चलाकर ऑफिस जाते थे. बस ऑफिस जाते समय वह कोट-पैंट पहनते थे। एक देश के राष्ट्रपति को जो भी सुविधाएं मिलनी चाहिए, इन्हें वो सारी सुविधाएं दी गई थीं. पर इन्होंने इन सुविधाओं को लेने से इनकार कर दिया. वेतन के तौर पर इन्हें मिलता था हर महीने 13300 डॉलर जिसमें से 12000 डॉलर गरीबों को दान दे देते थे. बाकी बचे 1300 डॉलर में से 775 डॉलर छोटे कारोबारियों को देते थे. अगर आपको कहीं से भी ऐसा लगता है कि शायद उरुग्वे एक गरीब देश है, इसीलिए यहां का राष्ट्रपति भी गरीब था, तो यह आपका भ्रम है. उरुग्वे में प्रति माह प्रति व्यक्ति की औसत आय 50000 रुपये है।
देखना होगा कि गान्धी की मूर्तियां लगाने व सड़कों के नाम गान्धीमार्ग रखने के अलावा हमारे सूट पर सूट व गाड़ियों पर गाड़ियां बदलने वाले राजनेता स्वदेशी और सादगी के लिए क्या करते हैं।  
वीरेन्द्र जैन
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