मंगलवार, मार्च 21, 2017

क्या योगी उमा भारती वाली परिणति से बच सकेंगे

क्या योगी उमा भारती वाली परिणति से बच सकेंगे

वीरेन्द्र जैन
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 जब भाजपा ने बिना मुख्यमंत्री का चेहरा आगे किये लड़ा तो स्वाभाविक ही था कि जीत के बाद चुनाव अभियान के मुख्य प्रचारक प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को यह अधिकार प्राप्त हो कि वे जिसे भी चाहें मुख्य मंत्री घोषित कर दें व जीत के लिए उपकृत विधायक उनके हर प्रस्ताव पर समर्थन की मुहर लगा दें। उल्लेखनीय है कि 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उमा भारती को मुख्यमंत्री पद की दावेदार बनाकर 398 सीटों से प्रत्याशी उतारे थे जिनमें से कुल 47 जीत सके थे व 229 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। उन्हें कुल 15% वोट प्राप्त हुये थे। इसके विपरीत 2017 के आम चुनाव में उनके 312 उम्मीदवार जीते और उन्हें 39% से अधिक मत मिले। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और विविधतापूर्ण राज्य में भाजपा काँग्रेस जैसी पार्टियों द्वारा मुख्यमंत्री घोषित कर चुनाव लड़ने के अपने खतरे होते हैं। भाजपा ने सावधानी बरती जिसका उसे यह लाभ हुआ कि चुनाव के पहले ही टकराव शुरू नहीं हुआ।
मुख्यमंत्री नियुक्त करने का विशेषाधिकार होते हुए भी मोदी-शाह ने जरूरत से अधिक समय लिया किंतु मंत्रिमण्डल की घोषणा के बाद लगा कि इस कठिन पहेली को सुलझाने में इतना समय लगना स्वाभाविक था। स्वयं चुनाव में न उतर कर भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपना दखल बनाये रखने के लिए ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने जनसंघ का गठन किया था जिसको 1977 में जनता पार्टी में झूठमूठ का विलय दिखाया गया था। पर जब उसमें उन्हें अलग से पहचान लिया गया जो देश की पहली गैर काँग्रेस सरकार के टूटने का कारण बना, तब उन्होंने जैसे के तैसे बाहर निकलना ही उचित समझा। वे जनता पार्टी को मिले व्यापक जन समर्थन का लाभ लेना चाह्ते थे इसलिए उन्होंने जनसंघ का नाम भारतीय जनता पार्टी रख लिया। संघ ने इस राजनीतिक शाखा को संघ की घोषित नैतिकता से मुक्त रखा व सरकार बनाने के लिए किसी भी दल से गठबन्धन करना, दलबदल के सहारे सरकारें बनवाना, बिगाड़ना, और काँग्रेस शासन पद्धति में आयी समस्त कमजोरियों को अपनाने से कभी नहीं रोका। उनकी समझ रही कि सरकार में रहने से सरकार की सुरक्षा एजेंसियां उनके काम में हस्तक्षेप नहीं करतीं अपितु बहुत हद तक मदद भी करती हैं। चुनाव के लिए धन एकत्रित करने में उन्होंने किसी नैतिक सीमा को नहीं माना और न ही संघ ने उन्हें वर्जित किया। चुनावों में शराब और पैसा बांटने में वे अपने जैसे किसी भी दूसरे दल से अलग नहीं रहे।
इन चुनावों में भाजपा गठबन्धन के विधायकों की संख्या लगभग 80% है और वे विभिन्न क्षेत्रों, जातियों, का प्रतिनिधित्व करते हैं। उल्लेखनीय है कि मण्डल कमीशन लागू करने के खिलाफ उठे आन्दोलन के कारण सत्ताच्युत होने वाले वी पी सिंह ने हावर्ड यूनीवर्सिटी में भाषण देते हुए कहा था कि भले ही मैंने अपनी टांग तुड़वा ली हो किंतु गोल तो मैंने कर दिया है। इसका सन्दर्भ लेते हुए सुप्रसिद्ध लेखक सम्पादक राजेन्द्र यादव ने लिखा था कि अब उत्तर प्रदेश में कोई सवर्ण मुख्यमंत्री नहीं बन सकता। यह बात सच भी थी क्योंकि भाजपा को भी कलराज मिश्र, लालजी टंडन, राजनाथ सिंह, आदि के होते हुए भी अपने दूसरे क्रम के नेता कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा था। सन्दर्भित चुनावों में भी ठाकुर योगी को मुख्यमंत्री बनाने का वादा निभाने में यही बाधा रही होगी। स्मरणीय है कि चुनावों में जातिवादी समीकरण बैठाने में बहुत मेहनत की गई। प्रदेश में बड़ी संख्या में ब्राम्हण वोटर हैं जिन्हें साधने के लिए ही काँग्रेस ने प्रशांत किशोर की सलाह पर श्रीमती शीला दीक्षित को उनके अनचाहे आगे किया था। यही कारण रहा कि एक ओर तो ब्राम्हण अपना प्रतिनिधित्व चाहते थे तो पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य को पिछड़े अपना मुख्यमंत्री देखना चाहते थे। योगी का अपने क्षेत्र में 141 में से 131 सीटें जितवाने का दावा था। उनका अपना साम्राज्य है जो भाजपा संगठनों के समानांतर है और अपने जनसंगठनों को उन्होंने भाजपा के जनसंगठनों में मिलाने की अनुमति नहीं दी। उन्होंने अपने कुछ समर्थकों को भी समानांतर रूप से चुनाव में उतार दिया था व कहा जाता है कि अगर उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का वादा नहीं किया गया होता तो वहाँ से वे भाजपा उम्मीदवारों को हरवा सकते थे। इन परिस्तिथियों में मुख्यमंत्री ही नहीं पूरे मंत्रिमंडल का गठन ही मोदी-शाह ने किया और योगी को केवल प्रतीकात्मक रूप में उसी तरह मुख्यमंत्री बना दिया गया है जिस तरह उमा भारती को अनचाहे मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाना पड़ा था। 
उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के चुनावी कौशल के समक्ष भाजपा अपने किसी भी विधायक को उतारने का मन नहीं बना पा रही थी इसलिए उसने साध्वी वेषभूषा में रहने वाली राजनेता उमा भारती को आगे रख कर दांव लगाया, जो परिस्तिथिवश सफल रहा। भाजपा ने उन्हें प्रतीकात्मक मुख्यमंत्री बने रहने और परदे के पीछे से शासन चलाने की नीति बनायी जो बहुत दिन नहीं चली। यही कारण रहा कि पहला मौका लगते ही उन्होंने दूध में पड़ी मक्खी की तरह उन्हें निकाल कर फेंक दिया। बाद का इतिहास यही बताता है कि उन्होंने नाराज होकर अलग पार्टी बनायी, चुनाव लड़ा व भाजपा को बड़ा नुकसान पहुँचाया। योगी के साथ भी लगभग ऐसी ही स्थितियां हैं। यदि उनका भी स्वाभिमान जाग गया तो वैसा ही संकट फिर पैदा होगा। 
देखना होगा कि योगी की नमनीयता कितनी है व मोदी-शाह उन्हें पद देने के बाद कितने अधिकार देते हैं।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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गुरुवार, मार्च 16, 2017

उ. प्र, में भाजपा की जीत देखने का दूसरा कोण अनुपस्थित क्यों

. प्र, में भाजपा की जीत देखने का दूसरा कोण अनुपस्थित क्यों
वीरेन्द्र जैन

संस्कृत में एक श्लोक है-
विद्यायाम विवादाय, धनं मदाय, शक्तिम परेशां परपीडनाय
खलस्य साधूनाम विपरीत बुद्धि, ज्ञानाय, दानाय च रक्षणाय
अर्थात दुष्ट लोगों के पास विद्या विवाद के लिए, धन घमण्ड के लिए और ताकत दूसरों को पीड़ा पहुँचाने के लिए होती है, जबकि सज्जन पुरुषों के पास विद्या ज्ञान के लिए, धन दान के लिए, और ताकत दूसरों की रक्षा के लिए होती है। वृत्ति बदलने से उपयोग बदल जाते हैं।
यह सूचना का युग है और सूचना के आदान प्रदान की नवीनतम सुविधा मनुष्यता को बड़ी ताकत देती है। यह कम श्रम और व्यय में कई गुना और शीघ्र से शीघ्र जानकारी दे सकती है जो क्षणों में दूर दूर तक प्रसारित की जा सकती है। किंतु इसके साथ ही इसके स्तेमाल करने वाले की प्रवृत्ति इसके सदुपयोग या दुरुपयोग को तय कर सकती है। चिंता की बात है कि हमारे देश में लोकतंत्र के नाम पर सत्ता हथियाने को उतावले समूह इसका निरंतर दुरुपयोग कर रहे हैं। वे असत्य, अर्धसत्य, और भ्रमों का प्रसारण अपनी पहचान छुपा कर कर रहे हैं। झूठ बोलने की आज़ादी को अभिव्यक्ति की आज़ादी की ओट में पाला जा रहा है। सच तो यह है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी देश के नागरिकों के लिए है न कि अनजान अज्ञात, अशरीरी लोगों के लिए है। इसके दुरुपयोग का जो दुष्परिणाम होता है उसके लिए दण्ड देने का कोई स्पष्ट कानून नहीं है और जो छोटा मोटा कानून है भी वह किसी अदृश्य व्यक्ति पर कैसे फैसला दे  सकता है! राजनीति के क्षेत्र में इसके दुरुपयोग ने लोकतंत्र पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया है, क्योंकि आदर्श लोकतंत्र में सुशिक्षित, सूचना सम्पन्न, विचारवान जागरूक नागरिकों द्वारा बहुमत के आधार पर  सरकारें चुनने का सपना देखा गया है। ऐसा आदर्श समाज अभी बनना शेष है। जब देश के नागरिकों को जानबूझ कर गलत सूचना देकर उनसे प्रतिक्रिया पूछी जायेगी तो वैसी ही होगी।  
गलत सूचना फैला कर उसकी प्रतिक्रिया को अपने हित में मोड़ लेने का इतिहास भाजपा के पूर्व नाम जनसंघ के ज़माने से ही शुरू हो जाता है, जो अब रहस्य नहीं रह गया है। जल विद्युत योजनाओं को पानी में से बिजली निकाल कर उसे फसल हेतु अनुपयोगी बना देने की अफवाह हो, या दो बैलों की जोड़ी पर क्रास की मुहर का मतलब गौवंश को कत्ल हेतु भेजने का दुष्प्रचार हो, कम्युनिष्टों को गद्दार बताने की बात हो या ऐसी ही सैकड़ों अफवाहें हों, उनकी सारी चुनावी सफलताएं एक असत्य को स्थापित कर उसके आधार पर अपने विरोधी को परास्त करना होता है। उत्तर प्रदेश के ताजा विधानसभा चुनाव भी उससे अछूते नहीं रहे। मोदी व शाह के नेतृत्व में लड़े गये लोकसभा चुनाव से ही सूचना माध्यमों को खरीदने, उन्हें भ्रष्ट करने या अन्य दबावों से नियंत्रित करने का काम व्यापक पैमाने पर शुरू कर दिया गया था। हजारों की संख्या में ट्रालर्स भर्ती किये गये थे जो सोशल मीडिया पर लगातार सक्रिय रहे। मोदी के फालोवर और प्रशंसकों की संख्या की कलई बीबीसी ने  खोल दी थी किंतु नियंत्रित मीडिया द्वारा इसे नकारात्मक खबर वाले स्थान पर नहीं दिखाया गया था। इनकी अनंत कथाओं को छोड़ते हुए अगर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 पर ही केन्द्रित किया जाये तो सूचना माध्यमों ने पाँच राज्यों में हुए चुनावों को केवल उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों तक ही सीमित करके सच को छुपाने की कोशिश की। जबकि सच यह है कि दो राज्यों में भाजपा बहुमत में आयी है व एक में पूर्ण बहुमत के साथ दो विधान सभाओं में सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर काँग्रेस तीन में आगे रही।
उत्तर प्रदेश में ही नहीं उत्तराखण्ड में भी भाजपा ने सबसे अधिक दलबदल को प्रोत्साहन दिया  उन्होंने इस तरह आने वाले लोगों को आनन फानन में टिकिट देकर भी उपकृत किया। अपने व्यक्तिगत जातिवादी प्रभाव को मिला कर इनमें से ज्यादातर जीत भी गये। मोदी के पौरुष को बखानने वाले मीडिया ने दलबदलुओं को टिकिट देने की कभी आलोचना नहीं की। क्या केन्द्र में सत्तारूढ देश की प्रमुख पार्टी के लिए यह नैतिक है कि वो इस पैमाने पर दल बदल को प्रोत्साहित करे। किंतु मीडिया में इस पर कहीं भी आलोचनात्मक रुख देखने को नहीं मिला। बाद में अल्पमत में आकर भी गोआ और मणिपुर में जिस तरह समर्थन प्राप्त किया गया उसने तो सारे नैतिक मानदण्डों और स्वाभिमान को ताक पर रख दिया। जिस व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दिला कर उसके अनचाहे देश के रक्षा मंत्री का भार दिया गया था उस फैसले को कुछ दलों ने समर्थन के सौदे में बदलवा दिया। इन दलों ने चुनावों के दौरान भाजपा और पर्रीकर की कटु आलोचना भी की थी। राष्ट्रवाद का दम भरती पार्टी एक छोटे से राज्य में सरकार बनाने की जोड़तोड़ में देश की रक्षा की जिम्मेवारी के साथ समझौता कर लेती है।   
किसी दल की नीतियों के प्रभाव की समीक्षा उसके द्वारा जीती गई सीटों के आधार पर नहीं अपितु उसको मिले मतों की संख्या के आधार पर ही मापी जा सकती है। गत लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को 3,43,18854 मत मिले थे जो कुल डाले गये मतों के 42.63% थे जबकि ताजा विधानसभा चुनाव में कुल मत प्रतिशत बढ जाने के बाद भी उसे 3,12,38214 मत मिले अर्थात 31 लाख मत कम मिले। लोकसभा चुनावों में उन्हें 334 विधानसभा क्षेत्रों में बढत हासिल हुयी थी किंतु उक्त चुनाव में वे केवल 312 सीटें ही जीत सके। इसके विपरीत बहुजन समाज पार्टी को लोकसभा चुनावों के दौरान मिले 1,59,14194 [19.77%] के समक्ष 1,74,81654 मत मिले अर्थात 15 लाख मत अधिक मिले।
चुनावों के दौरान जितनी मात्रा में नगदी और शराब आदि पकड़ी गई है, जो कुल उपयोग का बहुत मामूली प्रतिशत होता है, यह बताता है कि नोटबन्दी के फ्लाप ड्रामे के बाबजूद भी चुनावों के तौर तरीकों में कोई फर्क नहीं आया है। यह तो स्पष्ट ही है कि चुनावों में या तो कार्पोरेट चन्दा लगता है जो वस्तुतः सत्तारूढ या सम्भावित बड़े दलों के लिए सुविधा शुल्क ही होता है या वह अवैध ढंग से कमाया हुआ पैसा ही होता है। स्वाभाविक ही है कि सत्ता से जुड़े दल ही इसे खर्च करते हैं।
ईवीएम मशीनों के दुरुपयोग की शिकायतें तब तक बेमानी हैं जब तक कि उनमें छेड़छाड़ का कोई नमूना प्रदर्शित नहीं किया जाता। किंतु यह तो तय है कि पिछले दिनों जिस पैमाने पर मोदी सरकार के फैसले अप्रिय और जनविरोधी थे उससे किसी भी मीडिया या चुनावी विश्लेषक को ऐसे चुनाव परिणाम की उम्मीद नहीं थी। यही कारण रहा कि ईवीएम मशीनों के आरोपों को विचार योग्य माना जा रहा है। एग्जिट पोल की बड़ी भद्द पिटी किंतु उस सन्दर्भ में कहीं चर्चा नहीं हो रही है कि इस तरह की हवा हवाई बातें कब तक चलनी चाहिए। क्या ये पोल किसी भी तरह के चकित करने वाले फैसलों के लिए वातावरण बनाने का काम करते हैं।  
इन चुनावों में न तो कहीं मुद्दे उभर कर आये और न ही जन समस्याओं व नीतियों पर गम्भीर चर्चा रही। यद्यपि भाजपा ने प्रदेश की बीस प्रतिशत आबादी के किसी प्रतिनिधि को टिकिट न देकर परोक्ष में साम्प्रदायिक विभाजन प्रकट कर दिया था पर अल्पसंख्यकों का गैरभाजपा दलों की ओर झुकना भी एक विभाजन पैदा कर रहा है, जो खतरनाक है। कुल मिला कर ये विधानसभा चुनाव सत्ता के उस सामंत कालीन युद्ध से अधिक कुछ नहीं रहे जिसमें सब कुछ ज़ायज होता है।
वीरेन्द्र जैन
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शनिवार, मार्च 04, 2017

नारियल और पाइनएप्पल के बहाने इतिहास के झरोखे से

नारियल और पाइनएप्पल के बहाने इतिहास के झरोखे से  
वीरेन्द्र जैन

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूर्व घोषित कम सभाएं करने के अपने इरादे को बदलते हुए उत्तर प्रदेश में भी बिहार विधानसभा चुनावों की तरह जरूरत से ज्यादा आम सभाएं कीं। ये चुनाव भी भाजपा ने मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित किये बिना ही लड़े हैं जिसका मतलब होता है कि या तो उन्हें जीत की कोई उम्मीद नहीं थी या पद के लिए आपस में बड़ी तकरार थी। इससे पूर्व किसी प्रधानमंत्री ने विधान सभा चुनावों के लिए इतना समय नहीं दिया क्योंकि एक आमसभा में ही दिया गया उनका भाषण पूरे देश में प्रचारित हो जाता है। जैसा कि देश और दुनिया के सूचना माध्यमों ने महसूस किया व व्यक्त भी किया है कि अपने भाषणों में मोदी ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण पद की गरिमा के अनुरूप भाषण नहीं दिये व भाषा में बहुत नीचे उतर गये। उनके चुनावी विरोधियों ने भी उसी अन्दाज में उनके उत्तर भी दिये।
भाजपा अब भी बहुत कमजोर हो चुकी काँग्रेस के साथ ऐसे व्यवहार करती है जैसे वह सत्तारूढ दल हो और भाजपा विपक्ष में हो। इसका कारण यह है कि उन्हें सत्ता दिलाने में उनकी अपनी भूमिका से ज्यादा काँग्रेस की कमजोरियों ने काम किया है। काँग्रेस का भूत अब भी उन्हें सताता है और लगता है कि उनके मन में यह आशंका बनी हुयी है कि जाने कब काँग्रेस अपने अर्जे पुर्जे जोड़ कर फिर से खड़ी हो जाये। काँग्रेस की एकता का इकलौता सूत्र काँग्रेसियों को सत्ता सुख की आदत हो जाना है, जिसे पाने के लिए वे आपस में लड़ते झगड़ते हुए भी थक हार कर एक हो जाते हैं या तत्कालीन सत्तारूढ दल में सम्मलित हो जाते हैं। इस एकता में गाँधी नेहरू परिवार इकलौता सूत्र है जिसके सहारे उनकी माला बिखरने से बार बार बच जाती है।
स्मरणीय है कि इमरजैंसी के बाद जब जनता पार्टी ने श्रीमती गाँधी को घेरना शुरू किया था और शाह आयोग की जाँच के दौरान उन्हें गिरफ्तार भी किया था तब समाचार आया था कि श्रीमती सोनिया गाँधी ने अपने पायलट पति राजीव गाँधी को देश छोड़ने की सलाह दी थी ताकि उनका परिवार झंझटों से बचा रह सके। श्रीमती इन्दिरा गाँधी की विरासत सम्हालने के लिए संजय गाँधी जरूरत से ज्यादा सक्रिय थे और उनके पुनः सत्तारूढ होने में इस सक्रियता की भी प्रमुख भूमिका रही थी। 1980 में संजय गाँधी की असमय मृत्यु के बाद ही राजनीति से उदासीन राजीव गाँधी को श्रीमती गाँधी के विश्वासपात्र की जगह भरने के लिए राजनीति में अनचाहे आना पड़ा था। उन दिनों सुप्रसिद्ध व्यंग्य कवि प्रदीप चौबे ने एक कविता में कहा था-
संजय गाँधी जबरदस्त नेता थे
और
राजीव गाँधी जबरदस्ती नेता हैं
खालिस्तान आन्दोलन के उग्र होने और उसके धर्मस्थलों के दुरुपयोग के विरोध में जब श्रीमती गाँधी ने स्वर्ण मन्दिर में छुपे उग्रवादियों के खिलाफ कार्यवाही की तो उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं थीं। इन धमकियों की गम्भीरता को समझते हुए और काँग्रेस संगठन की दशा देखते हुए उन्होंने राजीव गाँधी पर जिम्मेवारियां बढा दी थीं। अंततः सुरक्षा बलों के भितरघात से श्रीमती गाँधी की हत्या हुयी और पद की जिम्मेवारियां उठाने में कमजोर व उदासीन राजीव गाँधी को आगे आना पड़ा और पद सम्हालना पड़ा। उनकी कमजोरियों के कारण ही त्यागमूर्ति की तरह प्रकट हुये विश्वनाथ प्रताप सिंह ने विद्रोह कर दिया और विपक्षी दलों के सहयोग से चुनाव में उतर गये। संयोग से चुनाव में उनके जनता दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। वे सीपीएम व भाजपा के सहयोग से ही सत्तारूढ हो सकते थे। सीपीएम की नीति है कि वह किसी ऐसी सरकार में सम्मलित नहीं होती जिसकी नीतियां उसकी नीतियों से भिन्न हों, भले ही वह न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर बाहर से समर्थन दे दे। यही कारण रहा कि उन्होंने कहा कि हम तो सरकार में शामिल नहीं होंगे और समर्थन भी तब ही देंगे जब भाजपा को सरकार में सम्मलित न किया जाये। वी पी सिंह को ऐसा ही करना पड़ा व सत्ता में आने की योजनाएं बना चुके भाजपा नेतृत्व को बड़ी ठेस लगी, क्योंकि वीपी सिंह की विजय के लिए उन्होंने बहुत मेहनत की थी। यही कारण रहा कि ग्यारह महीने के अन्दर भाजपा ने काँग्रेस के साथ मिल कर मण्डल कमीशन के खिलाफ छात्र आन्दोलन खड़ा कर दिया व छात्रों के आत्मदाह की अनेक बनावटी कहानियां प्रचारित करके पिछड़ों में लोकप्रिय हो चुके वीपी सिंह की छवि को कलंकित करा दिया।
वीपी सिंह के हटने के बाद चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री बने व उनसे समर्थन वापिस लेकर काँग्रेस ने मध्याविधि चुनाव करा दिये व इन्हीं चुनावों के दौरान राजीव गाँधी की हत्या हो गई। काँग्रेस की एकता को बनाये रखने के लिए काँग्रेसियों ने सोनिया गाँधी को आगे लाना चाहा किंतु उन्होंने साफ इंकार कर दिया। उस समय राहुल और प्रियंका बहुत छोटे थे। मजबूरन अस्वस्थ नरसिंह राव को काँग्रेस का नेता चुना गया जबकि सही उत्तराधिकारी राजीव गाँधी के प्रमुख सलाहकार रहे प्रतिभाशाली अर्जुन सिंह थे पर उनके पास काँग्रेसजनों का पूर्ण समर्थन नहीं था। कमलापति त्रिपाठी और नारायन दत्त त्रिपाठी के समर्थक उस समय उनके विरोधी थे। प्रधानमंत्री बनते समय नरसिंह राव किसी सदन के सदस्य नहीं थे और सदन के नेता अर्जुन सिंह ही थे। गाँधी नेहरू परिवार की चुम्बक के बिना काँग्रेस बिखरने लगी और कई साल खिचड़ी सरकारों का नेतृत्व देवगौड़ा, इन्द्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी आदि ने किया। थक हार कर काँग्रेस को नेहरू गाँधी परिवार के नाम का सहारा लेकर काँग्रेस को बचाने के लिए सोनिया गाँधी के पास जाना पड़ा। उल्लेखनीय है उस समय तक भी वे राजनीति से यथावत उदासीन थीं और देश के प्रधानमंत्री जैसे अति जिम्मेवारी और महत्व के पद को सम्हालने के लिए न तो योग्य थीं और न तैयार थीं। अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार में सत्ता सुख भोग चुके भाजपायी इस शून्य को भरने के लिए उतावले थे। इसी बीच सोनिया गाँधी को बदनाम करने के लिए संघ परिवार ने ईसाइयों पर धर्म परिवर्तन का आरोप लगाते हुए चर्चों पर हमले शुरू कर दिये। ईसाई मिशनरियां वही काम कर रही थीं जो वे गत तीन सौ सालों से भारत में करती आ रही थीं। इस अभियान में ईसाई परिवार से आयी सोनिया के काँग्रेस अध्यक्ष बनने को छोड़ कर नया कुछ भी नहीं था। उचित अवसर महसूस करके अटल बिहारी सरकार ने समय से कुछ महीने पहले ही चुनाव करा लिये। दुर्भाग्यवश उनका पांसा गलत पड़ा और एनडीए चुनाव हार गया। उधर काँग्रेस समेत उनके विरोधी दल चुनाव जीत गये व उन्होंने यूपीए का गठन कर लिया। पहले विरोध करने वाले वामपंथियों ने अंततः काँग्रेस के नेतृत्व को उनका आंतरिक मामला मानते हुए सोनिया गाँधी के नाम पर एतराज को वापिस ले लिया। काँग्रेस के पुनुरोद्धार से आशंकित भाजपा ने सोनिया गाँधी के विदेशी मूल का मुद्दा उछाल कर सुषमा स्वराज को सिर घुटाने, चने खाकर रहने, जमीन पर सोने जैसे भावुक तमाशे के लिए तैयार कर लिया तो उनकी तर्ज पर ऐसा करने के लिए उमा भारती भी आगे आ गयीं। देशी विदेशी भावना के नाम पर वे राम जन्मभूमि मन्दिर जैसा कुछ षड़यंत्र रच पाते उससे पहले ही सोनिया गाँधी ने स्थिति की नजाकत को समझते हुए अपनी पगड़ी मनमोहन सिंह को पहना दी। उसके बाद दस साल मनमोहन सिंह कुर्सी सम्हाले रहे जब तक कि राहुल गाँधी एक उम्र तक नहीं पहुंच गये।
राहुल की सम्भावनाओं को देखते हुए उसके खिलाफ भी चरित्र हत्या का सिलसिला बहुत पहले से चलने लगा। कहा जाता है कि मुख्यधारा की प्रैस से लेकर सोशल मीडिया पर भाजपा के कई हजार ट्रोलर वेतनभोगी निरंतर काम करते हैं, जो विरोधियों का मजाक बनाने और गलत अफवाहें फैलाने में सक्रिय रहते हैं। इन्होंने ही पिछले कई वर्षों से राहुल गाँधी को अपरिपक्व, मासूम, खानदानी, आदि आदि के रूप में अयोग्य सिद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। 2014 के आम चुनाव में राहुल गाँधी काँग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं थे पर भाजपा से जुड़ा मीडिया उन्हें ऐसा प्रस्तुत कर रहा था व उनकी हास्यास्पद छवि की तुलना मोदी से करके मोदी का कद उभार रहा था। पिछले दिनों नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि गूगल सर्च करने पर सबसे ज्यादा चुटकले राहुल गाँधी पर मिलते हैं जबकि सच तो यह है कि उससे आगे सर्च करें तो पता चलेगा कि उन चुटकलों का उद्गम भाजपा के आईटी सैल से ही हुआ है।
‘नारियल का जूस’ भी उसी अभियान का हिस्सा था जिसमें गलत सूचना के कारण मोदी गच्चा खा गये। एक राजनीयिक के रूप में मोदी राहुल से अधिक चतुर अनुभवी और वाक्पटु हैं किंतु उनकी दलीय विचारधारा, संगठन के घोषित अघोषित षड़यंत्रकारी साम्प्रदायिक विभाजनकारी कार्यक्रम और कार्यप्रणाली देश की मेधा को अच्छी नहीं लगती। अगर गूगल पर ईमानदार बुद्धिजीवियों के विचारों को सर्च किया जायेगा तो बहुमत उनके विरुद्ध ही मिलेगा।
चुनाव परिणाम केवल वोटों की संख्या का पता देते हैं।
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, फ़रवरी 27, 2017

फिल्म समीक्षा जौल्ली एलएलबी-2

फिल्म समीक्षा जौल्ली एलएलबी-2
मकीम कौन हुआ है मकाम किसका था
वीरेन्द्र जैन

किसी भी फिल्म का सिक्विल बनने का एक मतलब यह भी होता है कि उससे पहले बनी फिल्म सफल रही थी और उसी सफलता की पूंछ से बँध कर नई फिल्म की वैतरिणी पार की जा सकती है। जौल्ली एलएलबी-2 भी ऐसी ही कोशिश की गई, जो रचनात्मक स्तर पर बड़ी लकीर नहीं खींच सकी। दोनों फिल्मों में एक ही चीज साझा है और वह है हमारी न्याय व्यवस्था का यथार्थवादी चित्रण। दोनों ही फिल्मों में न्यायाधीश की भूमिका सौरभ शुक्ला ने निभायी है। न्यायालयों के बारे में जो आदर्शवादी भ्रम व्यावसायिक फिल्मों ने रच दिया था उसे इन जैसी कुछ फिल्मों ने तोड़ दिया है।
अधिकारों और जिम्मेवारियों के विपरीत कम वेतन और सुविधाओं वाले न्यायाधीश बड़े बड़े पैसे और सुविधाओं वाले वाक्पटु वकीलों के आतंक में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं। इस फिल्म में तो न्यायाधीश [सौरभ शुक्ला], वकील प्रमोद माथुर [अन्नू कपूर] से कहते भी हैं कि अपनी बेटी की शाही शादी करने के लिए उन्हें उनके जैसा बनना होगा। उल्लेखनीय है कि हमारे देश की समकालीन राजनीति में भी जो वकील संसदीय राजनीति में आये हैं उन्हें निर्वाचन के समय अपनी आय का शपथपत्र देना पड़ता है। दो चुनावों के बीच उनके द्वारा दिये गये शपथपत्रों में जो उनकी आयवृद्धि प्रदर्शित होती है वह चौंकाने वाली होती है। यह आय केवल उनकी प्रतिभा के कारण ही नहीं होती अपितु इसमें उनकी राजनीतिक हैसियत की भूमिका भी होती है। इस फिल्म में यह सच भी जनता के सामने आया है कि न्याय में बार एसोशिएशन का दुरुपयोग भी सम्भव है। अपने मुकदमे के लिए न केवल गवाहों को ही धमकाया जाता है अपितु कुछ स्थानों पर तो वकीलों पर भी हमले करवाये जाते हैं।
न्याय व्यवस्था के साथ फिल्म की कहानी वकालत के कार्य में जूनियर वकीलों की दशा या कहें दुर्दशा भी बताती है जिसमें मुख्य पात्र जगदीश्वर मिश्रा [अक्षय कुमार] को वकालत की डिग्री होने के बावजूद मुंशीपुत्र होने के कारण मुंशी से अधिक नहीं समझा जाता और बड़े वकील रिज़वी साब आम तौर पर उससे बस्ता ढोने व उनकी अपनी दावतों में खानसामा का काम ही सौंपते हैं। न्याय व्यवस्था के साथ ही इस फिल्म का कथानक पूरी व्यवस्था की कमजोरियों को भी कई कोनों से छूता है। अपने प्रमोशन और धन के लिए पुलिस अधिकारी असली आतंकवादी को छोड़ देता है व उसके हमनाम को आरोपी बना देता है व राज खुलने से बचने के लिए उसे नकली एनकाउंटर में मार देता है। इस नकली एनकाउंटर को विश्वसनीय बनाने के लिए वह अपने ही एक कानिस्टबिल की जांघ में भी गोली मार देता है जो डायबिटीज का मरीज होने व ज्यादा खून बह जाने के कारण मर जाता है। [ ऐसा ही दृश्य फिल्म वेडनसडे में भी रचा गया था, जो नकली एनकाउंटरों में पुलिस वालों के घायल होने का राज खोलता है। नकली एनकाउंटर पर ‘अब तक 56’ जैसी फिल्में भी बनी हैं। परोक्ष में इनका सम्बन्ध भी न्याय व्यवस्था की कमजोरियों से है जिनके कारण पुलिस को दण्ड दिलाने में अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है और कुछ लोग नकली सबूत जुटाते जुटाते सौदागर बन जाते हैं ] पुलिस अधिकारी सूर्यवीर सिंह [कुमुद मिश्रा] सस्पेन्ड होने के बाद अपने वरिष्ठ अधिकारी को भी धमकाता है कि उसने भी पैसठ नकली एनकाउंटर करके ही प्रमोशन पाया है तथा अगर वह फँसता है तो उसकी भी पोल खोल सकता है। सीबीआई अधिकारी भी वरिष्ठ अधिकारी के आश्वासन पर जाँच में समय दे देते हैं और उन्हें भी इसकी कोई चिंता नहीं होती कि इस बीच में आरोपी सबूतों के साथ छेड़छाड़ भी कर सकते हैं।
छठे दशक की फिल्मों तक देश में जो वातावरण बना था उसमें समाज सुधार के लिए भी कुछ होता था। जनता को मूर्ख बना कर धन ऎंठने वाले पंडित पुरोहित हास्य के पात्र होते थे और गाँव के साहुकारों का पतन दिखाया जाता था। राजकपूर की फिल्म में ऐसे गीत होते थे जिसमें कहा जाता था कि – देखे पंडित ज्ञानी ध्यानी दया धरम के वन्दे, राम नाम ले हजम कर गये गौशाला के चन्दे, अजी में झूठ बोल्यां, अजी में कुफ्र तौल्यां कुई ना, हो कुई ना, हो कुई ना........। बाद में चीन के साथ हुए सीमा विवाद के साथ ही फिल्मों में हालीवुड घुस आया व राजकपूर, गुरुदत्त, बलराज साहनी की जगह शम्मी कपूर, धर्मेन्द्र, मनोज कुमार, जाय मुखर्जी जितेन्द्र की फिल्में सतही संवेदना और क्षणिक उत्तेजना के सहारे से बाज़ार पर छा गयीं। श्याम बेनेगल आदि की फिल्मों के चर्चित और पुरस्कृत होने के बाद बाजारू फिल्मों को आइना दिखाया गया पर बेशर्म बाज़ार अपना काम करता रहा। अब जरूर ऐसा समय आ गया है कि हर फिल्म में सामंती अवशेषों पर चुटकियां ली जाती हैं, भले ही मुक्का न मारा जाता हो।
जगदीश्वर मिश्रा भी माथे पर तिलक लगाता है पर रिजवी साहब के यहाँ कबाब भी बनाता है तथा शराब पिला कर अपनी रूठी पत्नी को मनाता है। इसके साथ साथ अपने छोटे बच्चे को भी जनेऊ पहनाता है और पेशाब कराते समय उसके कान पर लपेट भी देता है। न्यायाधीश महोदय अपनी मेज पर तुलसी का पौधा रखते हैं और उसमें पानी डालते रहते हैं। उन्हें पता है कि अदालत से बाहर वकील उन्हें टैडी बियर कह कर बुलाते हैं।
न्याय व्यवस्था की कमजोरियों को इसी नाम की पहली फिल्म में दिखाया जा चुका है, और उसमें कुछ भी नया नहीं जोड़ा जा सका है जबकि इससे अधिक तो शाहिद नामक फिल्म अधिक स्पष्ट थी। सच तो यह है कि यह कलात्मक फिल्म के कथानक पर बनी व्यावसायिक फिल्म है। अक्षय कुमार केवल टार्जन जैसी फिल्मों के नायक हैं, उन्हें छलांगें लगाना आता है पर अभिनय नहीं आता। हुमा कुरेशी की भूमिका केवल सौन्दर्य प्रदर्शन के लिए जोड़ी गई लगती है। चींटी की तरह रेंगते न्याय की यात्रा को व्यावसायिक फिल्मों की तरह फास्ट फूड बना दिया है जो इसको यथार्थवादी फिल्म होने से रोकता है। एक लम्पट, लालची और महात्वाकांक्षी वकील का इतनी जल्दी एक्टविस्ट के रूप में बदल जाना भी अस्वाभाविक लगता है। फिल्म के स्वरूप के अनुसार गाने अनावश्यक हैं और मेल नहीं खाते।
व्यावसायिक फिल्मों के बीच यह अपेक्षाकृत एक बेहतर फिल्म है व इसके कथानक में और अच्छी फिल्म हो सकने की सम्भावनाएं थीं। अच्छा रहा कि फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल रही है जिससे सुधार की सम्भावनाएं बची रह गयी हैं। 
वीरेन्द्र जैन
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अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

          

मंगलवार, फ़रवरी 21, 2017

पुस्तक समीक्षा भारतीय संस्कृति और बुंदेलखण्ड

पुस्तक समीक्षा
भारतीय संस्कृति और बुंदेलखण्ड
वीरेन्द्र जैन

कुछ लोग होते हैं जो अपने ज्ञान रूपी कुन्दन के गहने बनवा लेते हैं, और उनका दिखावा करते हैं, किंतु इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो उस कुन्दन की भस्म बना कर समाज के स्वास्थ को सुधारने के लिए वितरित कर देते हैं। बुन्देलखण्ड के एक छोर दतिया में बसने वाले श्री राधारमण वैद्य ऐसे ही अध्येता, विद्वान, शिक्षक रहे हैं जिन्होंने अपने ज्ञान को एक पूरी पीढी के लिए अर्पित कर दिया व अपने लिए कभी कुछ नहीं चाहा। उन्होंने प्रगतिशीलता को किसी आयतित विचार के रूप में नहीं देखा अपितु उसे अपनी संस्कृति में ही पहचाना और अपने आस पास के लोगों को उसकी पहचान करायी। उनकी शिक्षा ने साहित्य और कला जगत में एक पूरी पीढी को प्रेरणा दी है जिनमें डा. सीता किशोर खरे, डा. कामिनी, श्री राज नारायण बोहरे, स्व. कामता प्रसाद सड़ैया समेत सैकड़ों लोग हिन्दी व बुन्देलखण्डी में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके हैं।
श्रेय लेने में सदैव पीछे रहने वाले वैद्यजी ने सम्पादकों आदि के आग्रह पर समय समय पर जो लेख लिखे हैं उनका एक संकलन गत दिनों शुभदा प्रकाशन दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया है। इस पुस्तक में, मानस की पृष्ठभूमि, हनुमान बाहुक पर एक दृष्टि, केशव का युग और शाक्त मत, समय और समाज सापेक्ष रीतिकाल, स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य में एतिहासिकता के ब्याज से,  बाणकालीन पाराशरी भिक्षु, जैसे प्राचीन साहित्य पर विद्वतापूर्ण लेख संकलित हैं, और दूसरी ओर हजारी प्रसाद द्विवेदी के आलोकपर्व, सुधाकर शुक्ल और देवेदूतम, उर्दू साहित्य की परम्परा पर एक दृष्टि, हिन्दी की गोद में तामिलपुत्री बरगुण्डी, आज का कथा साहित्य : कहानी और आलोचना के नोट्स, जैसे लेख भी सम्मलित हैं।
इसी पुस्तक में भारतीय संस्कृति और भक्ति, समसामायिकता का चित्रण, बुन्देलखण्ड की प्राचीन मूर्ति व वास्तुकला, एतिहासिक एवं भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में सनकादि सम्प्रदाय, ग्राम अभियान और पुरातत्व, व दतिया के अध्यात्म, साहित्य और दर्शनीयता के वातायन, इतिहास का भूला –विसरा पृष्ठ भर्रोली शीर्षक से लिखे गये खोजपूर्ण लेख भी सम्मलित हैं।
डा. कृष्ण बिहारी लाल पाण्डेय ने पुस्तक के फ्लेप पर बहुत सही लिखा है कि श्री वैद्यजी के पूरे लेखन के सभी रूपों में संवेदना का एक ही प्रभाव मिलता है और विचार को एक सजग संचेतना मिलती है। उनका सही विचार और सार्थक दृष्टि गद्य को निरर्थक वाचालता के दोष से बचा लेती है। उनके पास विचार की विशाल सम्पदा के साथ अनुभवों का विशाल अंतरिक्ष है। वे केवल कथ्य और विवेचन में ही नहीं अपितु भाषा में भी बेहद रचनात्मक हैं। पुस्तक की भूमिका में प्रसिद्ध कथा लेखक राज नारायण बोहरे लिखते हैं कि यह पुस्तक भारतीय संस्कृति और बुन्देलखण्ड अंचल के गहन अध्य्यन पर किये गये सुदीर्घ गम्भीर अनुशीलन का परिणाम है।
मेरा सौभाग्य रहा कि मैं भी उनका छात्र रहा हूं।  
वीरेन्द्र जैन
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संलग्न- पुस्तक का आवरण पृष्ठ      

शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2017

फिर राम मन्दिर राग

फिर राम मन्दिर राग
वीरेन्द्र जैन

अब तक यह बात बहुत साधारणजन को भी समझ में आ चुकी है कि अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण से वोटों की राजनीति का क्या और कैसा सम्बन्ध है, फिर भी भाजपा ने चौदहवीं बार अपने घोषणापत्र में राम मन्दिर का मुद्दा उछाल कर बची खुची भावनाओं को भुनाने का प्रयास किया है।
भाजपा सांसद और केन्द्र सरकार में मंत्री गिरिराज सिंह ने एक बार फिर से वह जुमला उछाला है कि राम मन्दिर अगर अयोध्या में नहीं बनेगा तो क्या पाकिस्तान में बनेगा। यह सूत न कपास, जुलाहों में लठम लठा जैसा है। अयोध्या में राम के अनगिनित मन्दिर होंगे और नये मन्दिर के निर्माण पर भी कोई प्रतिबन्ध नहीं है। वहाँ मस्ज़िदें भी हैं व जैन और बौद्ध मन्दिर भी हैं। जो विवाद था वह ‘राम जन्मभूमि मन्दिर’ से सम्बन्धित था /है, न कि राम मन्दिर निर्माण से सम्बन्धित है जैसा गिरिराज सिंह और अन्य नेता चुनावों के समय उठाने लगते हैं। उनके बयानों से अति साधारण धर्मभीरु व्यक्ति को सचमुच लग सकता है कि हिन्दू बहुल देश के एक पौराणिक तीर्थ में उसके आराध्य का मन्दिर न बनने देना तो बड़ा अत्याचार है। धर्म की राजनीति से लाभ उठाने वालों ने बहुत सफाई से जानबूझ कर रामजन्मभूमि मन्दिर के न्यायालय में लम्बित मामले को अयोध्या में किसी राम मन्दिर का निर्माण न होने देने में बदल दिया है, और उसकी जिम्मेवारी अपने विपक्षियों पर डालते रहते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि वे जनता के बीच में अपने पक्ष को ले जाने में खुद को कमजोर मानते हैं इसलिए असत्य/अर्धसत्य का सहारा लेते हैं।
रामजन्मभूमि मन्दिर अभियान के शिखर पुरुष लालकृष्ण अडवाणी थे, जो बहुत चतुर राजनेता हैं। वे शब्दों का ऐसा सतर्क प्रयोग करते हैं कि उन पर कभी अनर्गल बोलने का आरोप सिद्ध नहीं हुआ। इस अभियान के दौरान जब विभिन्न विद्वानों ने ठीक उसी स्थान पर राम के जन्म होने से सम्बन्धित प्रमाण मांगने शुरू किये तो उन्होंने कहा था कि मैं नहीं कहता कि राम का जन्म उसी स्थान पर हुआ था किंतु मेरा कहना है कि लोगों का ऐसा विश्वास है कि राम का जन्म उसी स्थान पर हुआ था इसलिए उनकी भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। इससे पूर्व मुम्बई के एक वास्तुशास्त्री ने कहा था कि वह ऐसा नक्शा बना सकता है कि बाबरी मस्ज़िद उसी स्थल पर रहेगी और उसके ऊपर राम जन्मभूमि मन्दिर बन जायेगा, या बिना मस्ज़िद गिराये उसके नीचे भी भव्य मन्दिर का निर्माण हो सकता है। इसके उत्तर में मन्दिर अभियान से जुड़े लोगों का कहना था कि उन्हें ठीक उसी स्थान पर राम जन्मभूमि मन्दिर चाहिए जहाँ अभी बाबरी मस्ज़िद का ढांचा खड़ा हुआ है। स्पष्ट था कि उनका मतलब वोटों की राजनीति के लिए ध्रुवीकरण करना रहा था।
उल्लेखनीय है कि 1984-85 के लोकसभा चुनावों में कुल दो सदस्यों की संख्या तक सिमिट गई भाजपा को देश की राजनीति में स्थान बनाने के लिए कोई सहारा चाहिए था जो यह अभियान बना। वे अचानक ही दो से 180 और फिर दो सौ की संख्या तक पहुँच गये। इस अभियान के अलावा उनकी राजनीति ने ऐसा कुछ भी ठोस नहीं किया था जिससे वे लोकसभा में अपनी संख्या इस हद तक बढा पाते। भाजपा के इतिहास में यही वह मोड़ था जब उन्होंने विचारों और संघर्षों की जगह हथकण्डों, और षड़यंत्रों को अपनी राजनीति का जरूरी हिस्सा बना लिया। स्मरणीय है सर्वाधिक दलबदलुओं को टिकिट देने के सौदों के साथ सम्मलित करने का रिकार्ड इसी पार्टी के पास है और उसका यह खेल अभी भी जारी है। इस पार्टी से जुड़े बुद्धिजीवी और पत्रकार लगातार दलबदल कानून की कमियों के बहाने इसको समाप्त करने के लिए तर्क देते रहते हैं।   
कौन नहीं जानता कि भाजपा संघ परिवार का ही एक संगठन है व उसके चौंसठ विभिन्न संगठनों की परस्पर निर्भरता है, किंतु समय समय पर वे कहने लगते हैं कि राम मन्दिर अभियान उनका एजेंडा नहीं विश्व हिन्दू परिषद का एजेंडा है और वे तो उनकी मांग का समर्थन करते हैं। बाबरी मस्ज़िद ध्वंस की जाँच के लिए बैठा लिब्राहन आयोग तो जैसे बैठने के लिए ही बना था। न तो भाजपा चाह्ती थी कि वह कोई रिपोर्ट दे और न ही तत्कालीन सरकारों में यह क्षमता थी कि रिपोर्ट आ जाने पर वह दोषियों को दण्डित करा सके, इसलिए उसके बैठे रहने पर ही सहमति रही। आरोपियों में से एक उमा भारती ने अपने बयान में एक बार कहा कि वे भूल गयी हैं कि 6 दिसम्बर 1992 को क्या हुआ था। दूसरी बार के बयान में उन्होंने कहा कि मस्ज़िद तो भगवान ने तोड़ी। गत 25 सालों से ऐसे ही मखौल के वातावरण में जाँच चली व उस दौर के किसी व्यक्ति के जीवन काल में कोई फैसला सम्भव नहीं दीखता।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के घोषणा पत्र में भाजपा ने कहा है कि वह कानून के अन्दर जल्दी मन्दिर निर्माण के लिए प्रयास करेगी तो इसके उलट इसी अभियान से जुड़े उनके बड़े नेता विनय कटियार कह रहे हैं कि जैसे बाबरी मस्ज़िद तोड़ी वैसे ही मन्दिर भी बना देंगे। यह परोक्ष में बाबरी मस्ज़िद तोड़ने का इकबालिया बयान भी है।
सत्ता प्राप्ति के इस अभियान में कितना आर्थिक सामाजिक भावनात्मक नुकसान हुआ उसका हिसाब लगाना मुश्किल है, दूसरी ओर यह भी इतना ही सच है कि यह कोई भावनात्मक उफान नहीं था अपितु सोचे समझे तरीके से इतिहास को तोड़ने मरोरड़ने और अपने राजनीतिक हित में स्तेमाल करने का गन्दा खेल है। यह सहज ढंग से फूटा साम्प्रदायिक विस्फोट नहीं था अपितु उसे योजनाबद्ध ढंग से झूठ और दुष्प्रचार के सहारे विकसित किया गया था।
वे जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं। हमको जानना चाहिए कि वे देश के लिए ठीक नहीं कर रहे हैं।
 वीरेन्द्र जैन
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बुधवार, जनवरी 18, 2017

शीर्ष राजनेताओं के दल से इतर विचार


शीर्ष राजनेताओं के दल से इतर विचार

वीरेन्द्र जैन


यह इकलौता मामला नहीं है, और न ही किसी एक दल के नेता से जुड़ा है। इसे हाल ही में हरियाणा सरकार के मंत्री और संघ से प्रारम्भ करने वाले भाजपा के नेता श्री अनिल विज के बयान से समझा जाये। प्रत्येक सफल व्यक्ति की लोकप्रियता के साधनों को आत्मसात करने वाले नरेन्द्र मोदी का गाँधी जी की तरह चरखा कातने वाला चित्र जब खादी ग्रामोद्योग की पत्रिका और कलेन्डर पर प्रकाशित हुआ तो स्वाभाविक रूप से विरोध में भारी शोर हुआ। उसी समय श्री अनिल विज ने बयान दिया कि महात्मा गाँधी का नाम खादी से जोड़ने पर खादी का महत्व बढा नहीं है और उसकी बिक्री घट गई थी। गाँधी का चित्र हटा कर मोदी का चित्र लगाना एक अच्छा कदम है। मोदी गान्धीजी की तुलना में बेहतर ब्रान्ड हैं, इससे खादी की बिक्री 14% बढ गई है। जब से महात्मा गाँधी का फोटो रुपयों पर आया तब से रुपये की कीमत गिरती गई इसलिए कुछ दिनों बाद वे नोटों पर से भी गायब होने वाले हैं।

श्री विज के इस अनावश्यक बयान को भाजपा संगठन ने उनका निजी विचार बता कर अपनी जिम्मेवारियों से पल्ला झाड़ लिया। बाद में विज ने भी बिना कोई खेद प्रकट किये इसे वापिस लेने की घोषणा भी कर दी किंतु क्या यह सब कुछ इतना सरल है? सवाल यह है कि किसी संगठन के महत्वपूर्ण नेता का सार्वजनिक जीवन से सम्बन्धित संगठन से अलग निजी विचार सामने आने पर उसके दल की क्या भूमिका होना चाहिए। क्या वह व्यक्ति दल से भिन्न विचार रख कर भी संगठन में यथावत अपने पद पर बना रह सकता है?

आइए इन्हीं अनिल विज के जीवन को देख कर कुछ और समझने की कोशिश करें। 63 वर्षीय अनिल विज का राजनीतिक जीवन संघ परिवार के जन संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से प्रारम्भ हुआ जिसमें वे 1970 में ही जनरल सेक्रेटरी चुन लिये गये। 1974 में स्टेट बैंक आफ इंडिया में नौकरी करने वाले विज को 1990 में नौकरी छुड़वा कर अम्बाला कैंट सीट से चुनाव लड़वाया गया जिसमें वे जीत गये। यह सीट श्रीमती सुषमा स्वराज के राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद खाली हुयी थी। भाजपा की निगाह में श्री विज का महत्व इसी से समझा जा सकता है। अपने विचार के लिए आजीवन अविवाहित रहने का फैसला करने वाले विज हरियाणा में संघ के कद्दावर, ईमानदार और समर्पित नेता माने जाते रहे हैं। रणनीतिक रूप से दो बार उन्हें निर्दलीय रूप से भी संघ ने चुनाव लड़वाया व जिताया गया और दो बार भाजपा के उम्मीदवार के रूप में भी वे जीते, पर संघ से उनके रिश्ते अटूट रहे। 2014 के विधानसभा चुनावों के बाद पहली बार भाजपा हरियाणा में स्वतंत्र रूप से सरकार बनाने की स्थिति में आयी और विज के मुख्यमंत्री बनने की सम्भावनाएं व्यापक रूप से चर्चा में रहीं। उनकी जगह खट्टर के मुख्य मंत्री बनने पर राजनीतिक क्षेत्रों में आश्चर्य व्यक्त किया गया था। उन्हें केबिनेट मंत्री बनाया गया व तीन प्रमुख विभाग दिये गये जिनेमें स्वास्थ, निर्वाचन व खेलकूद विभाग शामिल थे। वे साक्षी महाराज की तरह विवादास्पद बयान देकर चर्चा में बने रहते हैं। पिछले वर्ष ही उन्होंने कहा था कि जो लोग बिना बीफ खाये नहीं रह सकते उन्हें हरियाणा आने की जरूरत नहीं है। वे महिला आईपीएस अधिकारी के साथ टकराव वाले मामले में भी चर्चा में रहे, डेरा सच्चा सौदा को बड़ी रकम देने व रियो ओलम्पिक में भी चर्चा में रहे हैं।

विज का उक्त विवादास्पद बयान गाँधीजी की विचारधारा और व्यक्तित्व के प्रति संघ के रुख से भिन्न नहीं है। किंतु भाजपा अपने चुनावी लाभों के लिए समय समय पर गाँधीजी के प्रति जिस नकली श्रद्धा का दिखावा करती है उससे भिन्न अवश्य है। विज को स्वतंत्रता है कि वे देश के किसी भी राजनेता के प्रति अपने स्वतंत्र विचार रखें और यदि उनके विचार उनकी पार्टी के विचारों या रणनीतियों से भिन्न है तो वे पार्टी छोड़ दें या पार्टी उन्हें महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेवारियों से हटा दे। निजी विचार रखने वालों को भिन्न विचारों की पार्टी के पद पर बैठ कर फैसले लेते रहने का अधिकार नहीं हो सकता। भले ही ऐसी घटनाएं भाजपा में बहुतायत से होती रहती हैं किंतु दूसरे बड़े दल भी इससे मुक्त नहीं है। देखा गया है कि भाजपा सबसे अधिक दोहरे चरित्र की पार्टी है।

कोई व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में जितने बड़े पद पर रहता है, उसका विचार उस समूह के विचार अनुशासन से बँधता जाता है जिस समूह का वह प्रतिनिधि होता है। किसी भी वकील को अपने वादी द्वारा बतायी गयी कहानी में से ही अपने तर्क तलाशने होते हैं। जब से प्रधानमंत्री पद पर सुशोभित व्यक्ति अपने वादों को चुनावी जुमला कहलवाने लगता है तो वह उस महान पद की गरिमा गिरा रहा होता है। नरेन्द्र मोदी को छोड़ कर कोई प्रधानमंत्री ऐसा नहीं हुआ है जिसने भाषा में अमिधा की जगह व्यंजना का प्रयोग किया हो। अटल बिहारी वाजपेयी ने भी प्रधानमंत्री बनने के बाद भाषण शैली बदल दी थी। श्री विज खुद त्यागपत्र देकर आदर्श कायम कर सकते हैं, या भाजपा उन्हें कुछ समय के लिए पद मुक्त कर के संकेत दे सकती है। खेद है कि ऐसा कुछ भी नहीं होने जा रहा और भारतीय लोकतंत्र में सक्रिय दलों के प्रति लोगों की घृणा बढती जा रही है जो लोकतंत्र के लिए घातक है।

वीरेन्द्र जैन

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