शनिवार, जनवरी 20, 2018

क्या तोगड़िया सफल हो गये हैं ?

क्या तोगड़िया सफल हो गये हैं ?


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वीरेन्द्र जैन 
भाजपा अपने पूर्व रूप भारतीय जनसंघ के समय से सच को जानते समझते हुए, राजनीतिक स्वार्थवश गढी हुयी कहानियों, बनाये गये इतिहासों, और मिथकों का सहारा लेती रही है। ऐसा करते समय उन्हें अनेक प्रचारकों का सहारा लेना होता है, जिसमें यह खतरा हमेशा बना रहता है कि ऐसे सहयोगी असंतुष्ट होने की दशा में सारी कूटनीति का खुलासा कर के ताश के महल को धाराशायी कर सकते हैं। यही कारण रहा है कि भाजपा ने हमेशा मीडिया को नियंत्रित करने की नीति प्राथमिकता पर रखी है, जिसमें वह अब तक सफल रही है। मोदी शाह काल में तो सच को सामने न आने देने के मामले में अति ही कर दी गई है।
उल्लेखनीय है कि भाजपा के पहले अध्यक्ष मौल्लि चन्द्र शर्मा ने संघ के हस्तक्षेप से नाराज होकर ही त्यागपत्र दिया था, व बलराज मधोक जैसे पार्टी अध्यक्ष ने पदमुक्त होने के बाद बहुत सारे रहस्य खोले थे किंतु वे आमजन तक नहीं पहुँच सके। उल्लेखनीय यह भी है कि पिछले वर्षों में जब उमा भारती ने पार्टी छोड़ कर नई पार्टी बनाई थी तब तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा था कि भाजपा में कभी खड़ा विभाजन नहीं हुआ, अर्थात यह दो फाड़ नहीं हुयी, जिन छोटे मोटे लोगों ने पार्टी से दूरी बनाई है वे हाशिए पर ही रहे। उनकी यह बात सही साबित हुई जब शिवराज सिंह के मुखर विरोध के बाद भी उमा भारती की पार्टी का भाजपा में विलय हो गया, बस शर्त केवल यह रही कि वे अपने मूल क्षेत्र मध्य प्रदेश में सक्रियता नहीं दिखायेंगीं, जहाँ उन्होंने कभी पार्टी को सत्ता दिलवायी थी व अलग पार्टी बना कर विधानसभा चुनाव लड़ने पर 12 लाख वोट प्राप्त किये थे। सखलेचा, कल्याण सिंह, मदनलाल खुराना, येदुरप्पा, केशू भाई पटेल, जसवंत सिंह, योगी आदित्यनाथ, आदि अनेक लोगों का विरोध अल्पावधि तक ही रहा और वे लौट कर घर वापिस आ गये। एक समय था जब 2004 का आम चुनाव हारने की जिम्मेवारी मोदी पर डालते हुए आज की सबसे बड़ी समर्थक स्मृति ईरानी ने उन्हें गुजरात के मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए अनशन भी किया था। प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित होने तक नरेन्द्र मोदी का चारों ओर से विरोध हुआ किंतु उसके बाद तो उनकी ऐसी अन्धभक्ति पैदा की गयी कि उन्हें देवता का दर्जा दिया जाने लगा, सम्बित पात्रा जैसे प्रवक्ताओं ने तो टीवी चैनलों पर उन्हें पिता तुल्य बतलाया। मोदी ने अपने अन्ध समर्थन की दम पर अमित शाह को न केवल निर्विरोध अध्यक्ष के पद पर प्रतिष्ठित कर दिया गया, अपितु राज्यसभा में भी बैठा दिया गया। अडवाणी, जोशी, शांता कुमार, गोबिन्दाचार्य की बोलती बन्द कर देने के बाद शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आज़ाद, भोला सिंह, आदि की आवाज तूती की आवाज बन कर रह गयी। पुणे के सांसद नाना पटोले ने तो स्तीफा ही दे दिया। किंतु पूर्ण सत्ता का पहली बार रसास्वादन कर रहे भाजपा के भक्त समर्थकों पर कोई असर नहीं हुआ भले ही नोट बन्दी, जीएसटी आदि अनेक असफल योजनाएं व्यापक आलोचना का शिकार हुयी हों और  दिल्ली, पंजाब और बिहार के चुनावों में करारी हार के साथ गोवा व मणिपुर में दल बदल का सहारा लेना पड़ा हो।
ऐसी स्थिति में संघ के ही समान महत्व के एक सहयोगी संगठन के प्रमुख तोगड़िया द्वारा मोदी की ओर इशारा करते हुए सीधे एनकाउंटर का आरोप लगाना बहुत बड़ी घटना है। शाह मोदी के प्रबन्धन से चुनाव जीत कर सत्ता सुख पा रहे समर्थकों की सम्वेदनाएं मौथरी हो चुकी हैं। वे यह भूल चुके हैं कि संसद में दो सदस्यों की संख्या तक पहुँच चुकी भाजपा को दो सौ तक पहुँचाने में राम जन्मभूमि के सुप्त विषय पर आन्दोलन खड़ा करने में योजनाकार गोबिन्दाचार्य व अडवाणी की हिंसा उकसाने वाले नारों की रथयात्रा व उमा भारती समेत विश्व हिन्दू परिषद के तोगड़िया, ऋतम्भरा जैसे लोगों के उत्तेजक भाषणों, त्रिशूल दीक्षा, विवादास्पद स्थलों पर सरस्वती पूजा, आदि की बड़ी भूमिका रही थी। इनके सहारे कभी जो ध्रुवीकरण किया गया उसी के असर को गुजरात के नरसंहार व मोदी शाह की चुनावी योजनाओं में भुनाया गया है।
जब भी संघ परिवार में मतभेद उभरता है तब संघ प्रमुख अपने विशेष अधिकार का प्रयोग करके शांत करते रहे हैं। संजय जोशी भले ही संघ के प्रिय लोगों में रहे हैं किंतु मोदी से नाराजी के चलते उन्हें कोने में बैठाने  में भी संघ के हस्तक्षेप की भूमिका रही है। उल्लेखनीय है कि तोगड़िया द्वारा बताये गये घटनाक्रम से एक दो दिन पहले उनकी भैयाजी जोशी और ऋतम्भरा के साथ बैठक हुयी थी। इससे पूर्व भुवनेश्वर में 29 दिसम्बर को विहिप के कार्यकारी बोर्ड की बैठक में तोगड़िया को कार्यकारी अध्यक्ष न बनने देने की कोशिश हुयी थी और गुजरात चुनाव में उन पर भाजपा विरोधी काम करने के आरोप भी सामने आये थे, किंतु न तो कार्यकारी अध्यक्ष तोगड़िया को हटाया जा सका और न ही अध्यक्ष राघव रेड्डी को हटाया जा सका। मोदी शाह जैसे लोगों को असहमति बिल्कुल भी स्वीकार नहीं होती इसलिए बहुत समय से लम्बित प्रकरणों को सामने लाया गया।
विहिप का ध्रुवीकरण ही भाजपा का मूल आधार रहा है। अगर किसी नाराजी में उसकी पुरानी योजनाओं का विश्वसनीय खुलासा हो जाता तो उसके विरोधियों की कही बातों को बल मिलता व उसकी ज्यादा किरकिरी होती । यह स्थिति संघ परिवार में किसी के हित में नहीं होती,  इसलिए हमेशा की तरह बात दबा दी गयी। तोगड़िया ने भी किसी ब्लैकमेलर की तरह अपने पूरे पत्ते नहीं खोले, और उचित समय का नाम लेकर धमकी दे दी। यह सौदेबाजी का अन्दाज़ था, इससे लगता है कि यह मामला अब ठंडे बस्ते में चला गया। अगर प्रकरण पहले ही वापिस लिये जाने का फैसला हो गया था तो उसे तीन साल तक कोर्ट को क्यों नहीं बताया गया व अभी सामने आने में तीन दिन क्यों लग गये! तोगड़िया ने सही समय पर नस दबा दी और बाजी पलट गयी। उमा भारती भी हमेशा इसका फायदा उठाती रही हैं।
इस घटनाक्रम से मोदी कमजोर पड़े हैं और सत्ता प्राप्ति की योजनाओं में किये गये अवैध, अनैतिक कामों में भागीदारी करने वालों का दबाव बढ सकता है। भाजपा की सफलता में महाभारत की तरह की कूटनीतियों की बड़ी भूमिका रही है, किंतु कूटनीति दुधारी तलवार होती है वह कभी कभी खुद को भी नुकसान पहुँचा देती है। सच तो यह है कि “ दादी के मरने का दुख नहीं है, दुख तो यह है कि मौत ने घर देख लिया है”।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

          

शुक्रवार, जनवरी 05, 2018

गोपालदास नीरज – हिन्दी के पहले लोकप्रिय गीतकवि

गोपालदास नीरज – हिन्दी के पहले लोकप्रिय गीतकवि
वीरेन्द्र जैन

कोई उन्हें गीत सम्राट कहता है, तो कोई गीतों का राजकुँवर, और यह सब कुछ कहने से पहले यह जान लेना चाहिए कि नीरज जी तब एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश में गीतकार के रूप में पहचाने गये जब हमने राजतंत्र को तकनीकी रूप से विदा कर दिया था। इसलिए उन्हें श्रेष्ठता की दृष्टि से शिखर का कलाकार दिखाने के लिए राजकुँवर और सम्राट उस हद तक ही ठीक हैं जैसे माँएं अपने बच्चों को प्यार में राजा बेटा कहती हैं। ऐसी उपमाएं समाज में शेष रह गई सामंती मानसिकता की सूचक हैं। पर क्या करें कि लोगों की श्रद्धा प्रेम इससे कम पर व्यक्त ही नहीं हो पाता, इसलिए ये उपमाएं भी सटीक हैं।
नीरज जी के गीतों पर मैं सैकड़ों पृष्ठ लिख सकता हूं किंतु इस लेख में केवल उनके व्यक्तित्व के बारे में कुछ मामूली बात करना चाहता हूं। मेरे जीवन में दिल और दिमाग दोनों का हिस्सा है और दिल वाले हिस्से को समृद्ध करने का काम नीरज जी के गीतों रजनीश के भाषणों, व अमृताप्रीतम के उपन्यासों ने किया तो उसके मुकाबले दिमाग वाले हिस्से को प्रेमचन्द, हरिशंकर परसाई, मुकुट बिहारी सरोज, प्रो. सव्यसाची, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, और विभिन्न अन्य लेखकों के लेखन व सामाजिक कार्यों ने समृद्ध किया। उक्त बात लिखने का आशय यह है कि ज्ञान को सम्वेदना के साथ जोड़ने में मेरे ऊपर नीरज जी का प्रभाव इतना अधिक है कि मैंने अपनी पहली संतान का नाम ही नीरज रख दिया। एक समय था जब मुझे नीरज जी के सभी लोकप्रिय गीत कंठस्थ थे।
मेरे गृह नगर दतिया में प्रतिवर्ष एक कवि सम्मेलन का आयोजन होता था व कवि सम्मेलन का अर्थ होता था नीरज जी का आना। कवि सम्मेलन की तिथि नीरज जी की उपलब्धता के आधार पर ही तय होती थी व श्रोताओं के रूप में उमड़ने वाले ‘मेले’ में शामिल होने वाले लोग अपने निजी कार्यक्रम भी उसके अनुसार तय करते थे। कवि सम्मेलन सूर्य की पहली किरण के साथ ही समाप्त होते थे व आमंत्रित कवि जनता की फर्माइश पूरी करने से कभी पीछे नहीं हटते थे। वे खजाना लुटाने की तरह जी भर कर सुनाते थे, जिनमें नीरज जी भी होते थे। उन दिनों गीतों की किताबें मुश्किल से मिलती थीं इसलिए अनेक श्रोता अपने साथ पैन व कापी लेकर आते थे और गीत को दर्ज करते रहते थे। मैंने सबसे पहले नीरज के गीत अपने एक दोस्त की रिश्ते की बुआ की कापी से पढे थे जो उन्होंने छोटे छोटे मोती से सुन्दर अक्षरों में लिखे हुए थे। कापी भी फुल साइज के कोरे पन्नों को मोड़ व अन्दर सुई धागे से सिल कर बनायी गयी थी। बाद में यह बात पुष्ट भी हुई कि हम लोगों से पहले की पीढी ने भी अपने प्रेमपत्र लिखने में नीरज के गीतों का सहारा लिया था। मुकुट बिहारी सरोज ने बतलाया था कि हिन्दी भाषी क्षेत्र के प्रत्येक नगर में नीरज के गीतों के प्रति दीवानगी रखने वाली महिलाएं थीं। एक रेल यात्रा में उनके लिए हर स्टेशन पर खाने का टिफिन लिये कोई गीत मुग्धा खड़ी थी। नीरज जी ने खुद भी लिखा है कि
उसकी हर बात पर हो जाती हैं पागल कलियां
जाने क्या बात है नीरज के गुनगुनाने में
हाँ, नीरज जी का गुनगुनाना दिल के तारों को झंकृत कर देने वाला होता रहा है। उनका स्वर अन्दर से निकली झंकार की तरह होता था, ऐसा लगता था कि जैसे बोलने के लिए मुँह के अन्य सहयोगी अंगों का उपयोग किये बिना वे केवल गले गले से गाते हों। क्या पता इसी कारण उन्होंने अपने बेटे का नाम गुंजन रखा हो। मेरे एक मित्र जो बाद में विधायक भी बने नीरज जी के अन्दाज में उनकी रचना पढते थे और उस समय उनका आनन्द उनके चेहरे से झलकता था जब वे पढते थे – आदमी को आदमी बनाने के लिए, जिन्दगी में प्यार की कहानी चाहिए, और इस कहानी को सुनाने के लिए, स्याही नहीं, आंसू वाला पानी चाहिए। उनके एक मित्र जो आजकल मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री हैं, भी नीरज की कविताएं डूब कर पढते थे और मनोरंजन के लिए कहते थे कि यह रचना मेरी खुद की चुराई हुयी है।
नीरज जी सम्भवतः वे पहले हिन्दी कवि हैं जिनके बारे में उनके श्रोता जानते थे कि हिन्दी कवि सम्मेलन के मंच पर मदिरापान करके आते हैं। और उनके प्रति उनके श्रोताओं की दीवानगी को इस आधार पर भी नापा जाये तो गलत नहीं होगा कि किसी भी वैष्णवी श्रोता तक ने इस आधार पर उनकी आलोचना नहीं की। नीरज जी की लोकप्रियता को इस आधार पर भी नापा जा सकता है कि बहुत से मंचाकांक्षी छुटभैया कवियों ने इस सम्भावना के वशीभूत मदिरा पान करने की कोशिश की कि शायद इससे वे नीरज जी जैसी कविता लिख लेंगे, और प्रस्तुत भी कर देंगे। इस मूर्खता में वे बुरी तरह असफल हुये, और नीरज तो नहीं बन पाये पर शराबी जरूर बन गये। वे यह भूल गये कि सैकड़ों गीतों के गीतकार नीरज ने कभी डायरी लेकर नहीं पढा व नब्बे साल के नीरज को बीमारी में भी अपने सभी गीत याद रहे क्योंकि वे उनकी ज़िन्दगी का हिस्सा हैं। न कवि सम्मेलन के मंच पर और न ही किसी बैठक में किसी ने उन्हें बहकते देखा।
हर मुग्ध श्रोता/पाठक की तरह मैंने उनके निकट जाने का कोई अवसर नहीं छोड़ा यहाँ तक कि अपनी आदत के विपरीत उनके मंच पर रचना पाठ करने की जुगाड़ भी जमाई, मुहावरे में कहूं तो दर्जनों बार उनकी चिलम भी भरी, पर मैं यह नहीं कह सकता हूं कि वे मुझे पहचानते होंगे। मैं ऐसी अपेक्षा भी नहीं रखता क्योंकि उन्होंने चालीस साल तक लगातार सैकड़ों सम्मेलनों में लंगोटा घुमाया है और मेरे जैसे अनेक लोग तो हर जगह उनके इर्दगिर्द रहते ही हैं, वे किस किस को याद करें जब तक कि बारम्बार का साथ न हो, या कोई न भूलने वाली रचना या घटना न हो। पर यह भी सच है कि कभी भूले भटके उनके साथ का अवसर पाने वाले हर व्यक्ति की स्मृति में वह गौरवपूर्ण क्षण दर्ज होगा, जब उसे उनका साथ मिला होगा।
जो भी सच्चा कवि है उसमें स्वभिमान भी जरूर होगा और वह खुद के बारे में गलत बयानी नहीं करेगा। कभी गालिब ने लिखा था कि-
 ‘हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि गालिब का है अन्दाजे बयां और’
या फिराक गोरखपुरी ने कहा था कि-
आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हम असरों
जब ये खयाल आयेगा उनको, तुमने फिराक को देखा था
पर हिन्दी में इतनी क्षमता और साहस वाला दूसरा कोई नीरज जैसा कवि नहीं मिलेगा जो कह सकता हो कि-
आज भले कुछ भी कह लो तुम, पर कल विश्व कहेगा सारा
नीरज से पहले गीतों में सब कुछ था पर प्यार नहीं था
या
इतने बदनाम हुये, हम तेरे जमाने में  / लगेंगी आपको सदियां हमें भुलाने में
एक बार अट्टहास के कार्यक्रम में मैं लखनऊ के गैस्ट हाउस में रुका था तभी मालूम हुआ कि नीरज जी भी किसी कवि सम्मेलन में जाने के पड़ाव में वहीं ठहरे हुए थे। उनसे मिलने मैं, प्रदीप चौबे, और सूर्य कुमार पांडॆ, भी उनके कमरे में जा पहुँचे। कहीं से फिल्मी गीतों की बात निकल पड़ी। सच तो यह है है कि नीरज जी ने फिल्मी दुनिया में जाकर जो श्रेष्ठ गीत लिखे हैं उनसे फिल्मी दुनिया में हिन्दी साहित्य का सम्मान बढा है, किंतु उनसे ईर्षा रखने वाले कई लोग इसी आधार पर उनको कमतर करने की कोशिश करते रहे हैं। नीरज जी ने कहा कि अच्छा यह बताओ कि ‘ स्टेशन पर गाड़ी जब छूट जाती है तो एक-दो-तीन हो जाती है” इस एक दो तीन हो जाने के मुहावरे का इससे पहले प्रयोग किस हिन्दी गीत वाले ने किया? फिल्मी गीत भी नये प्रयोग कर रहे हैं व हिन्दी को समृद्ध कर रहे हैं। इसी दौरन उन्होंने अपने गीत का एक मुखड़ा सुना कर पूछा, अच्छा बताओ यह कौन सा छन्द है? मुखड़ा था-
सोना है, चाँदी है, हीरा है, मोती है, गोरी तिरा कंगना
किसी के पास भी उत्तर नहीं था तो नीरज जी खुद ही बोले यह रसखान का वह छन्द है जिसमें कहा गया है –
मानस हों तो वही रसखान बसों बिच गोकुल गाँव के ग्वालन
हिन्दी साहित्य और दर्शन शास्त्र में प्रथम श्रेणी में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने वाले नीरज ने जो सूफियाना गीत लिखे हैं उन्हें सुधी श्रोताओं के बीच सुनाते हुए जब वे व्याख्या देते थे तब हम जैसे लोगों को उनका महत्व समझ में आता था। विस्तार में नहीं जाना चाहता हूं क्योंकि विषय की सीमाओं की घोषणा पहले ही कर चुका हूं, पर एक घटना याद आ रही है। नागरी प्रचारणी सभा के एक अन्वेषक उदय शंकर दुबे अपने कार्य के सिलसिले में कई वर्षों तक दतिया में रहे व दतिया के साहित्य जगत में सम्मानीय स्थान रखते थे। वे विचारों से समाजवादी थे। उन्होंने बातचीत में कह दिया कि नीरज की कविताएं तो स्त्रैण कविताएं हैं। मैं साहित्य का संस्थागत विद्यार्थी नहीं रहा किंतु उस दिन नीरज जी के प्रति प्रेम में मैंने भक्ति काल के कवियों की जो श्रंगार रस की कविताओं के उदाहरण देते हुए पूछा कि क्या इन्हें भी आपने पहले कभी स्त्रैण कवि कहा है? मैंने धारा प्रवाह रूप से नीरज जी का गीत – बद्तमीजी कर रहे हैं, आज फिर भौंरे चमन में, साथियो आँधी उठाने का ज़माना आ गया है।‘ सुना दिया तब दुबे जी मेरी याददाश्त पर भी हक्के बक्के रह गये। बोले अभी नीरज को सुना भर है, उन्हें और पढूंगा। नीरज के मृत्यु गीत के कई किस्से हैं जो कई बार बयां हुये हैं।
अनेक संस्मरण हैं जो लेख की सीमा रेखा के बाहर चले जायेंगे। उन्हें फिर कभी लिखूंगा। पिछले दिनों नीरज जी अस्वस्थ होकर अस्पताल में भर्ती हो गये थे। अपने चाहने वालों की शुभेक्षा से वे जल्दी स्वस्थ होंगे और शतायु होंगे यह भरोसा है।  
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, दिसंबर 26, 2017

नरेन्द्र मोदी को अटल जी की याद आना

नरेन्द्र मोदी को अटल जी की याद आना

वीरेन्द्र जैन
नरेन्द्र मोदी ने गत 20 दिसम्बर को संसदीय बोर्ड की बैठक में कैमरे की उपस्थिति में दो-तीन बार अपनी आँखें गीली होने जैसी प्रतीति दी। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि अगर आज अटलजी स्वस्थ होते तो वे मेरी जगह बैठे होते और कितने खुश होते। जब 1999 के लोकसभा चुनाव में मैंने गुजरात से बीस सीटें जीत कर दी थीं तो अटल जी ने मुझ से खुश होकर कहा था कि यह तुमने क्या कर दिया।
अपनी सोच और कठोर कार्यप्रणाली वाली छवि के विपरीत जब मोदी भरे गले और नम आँखों से बात करते हैं तो विरोधियों को वे नकली लगते हैं। राहुल गाँधी ने तो पिछले दिनों स्मरण भी दिलाया था कि वे अमिताभ बच्चन से भी अच्छे अभिनेता हैं, और किसी दिन सभा में आँसू बहा कर दिखा सकते हैं। उन्होंने तब भी आंसू दिखाये थे जब पहली बार संसद भवन में आये थे और अडवाणीजी ने भाजपा के पूर्ण बहुमत लाने की कृपा करने के लिए उन्हें बधाई दी थी। उन्होंने अमेरिका में जुकरवर्ग को साक्षात्कार देते हुए अपनी मां के श्रम को याद करते हुए भी आंसू बहाये थे, और नोटबन्दी पर हो रहे व्यापक विरोध को शांत करने के लिए भी आंसू बहाये थे।  
गुजरात का चुनाव मोदी के लिए बड़ा धक्का इसलिए है क्योंकि उनके प्रधानमंत्री बनने तक लोगों को यह भरोसा नहीं था कि गुजरात माडल को सामने रखे बिना साम्प्रदायिकता की दाग झेल रही भाजपा स्वतंत्र रूप से सत्ता में आ सकती है। उसी गुजरात में जीत कमजोर पड़ने से नींव कमजोर होने जैसा आभास हो रहा है। सच यह भी है कि 2014 में उनकी सरकार बनने में एंटी इंकम्बेंसी के साथ दलबदल कर आये नेता, क्रीतदास मीडिया, सेवानिवृत्त अधिकारी, कार्पोरेट प्रदत्त अटूट धन का प्रवाह, जातिवाद व साम्प्रयदायिकता, सैलीब्रिटीज आदि रहे थे फिर भी उन्होंने दो जगह से चुनाव लड़ा था और प्रधानमंत्री पद के चयन तक मुख्यमंत्री पद से स्तीफा नहीं दिया था।
प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने भाजपा के नाम को छोड़ कर पार्टी में वह सब कुछ बदलने की मुहिम छेड़ दी थी जो पुराने लोगों को महत्व देती थी। वैसे तो अटल बिहारी वाजपेयी जी उम्रगत अस्वस्थता के कारण सक्रिय राजनीति में वापिस नहीं आ सकते थे, पर फिर भी मोदी ने अटल बिहारी के समय के और उनके साथ के सारे लोगों को मुख्यधारा से हाशिए पर धकेल दिया। उनके जो दो एक रिश्तेदार सक्रिय राजनीति में थे उन्हें बाहर कर दिया या निष्क्रिय कर दिया। मोदी ने अटल बिहारी के शासन के दौर को कभी अच्छा नहीं बतलाया व सत्तर साल तक चली पिछली सरकारों की आलोचना करते हुए उन्होंने अटल जी के समय की एनडीए को भी कुशासन बतलाने में सम्मलित किया। उल्लेखनीय है कि 2002 में गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रैस की बोगी नम्बर 6 में हुयी आगजनी के बाद गुजरात में जो नरसंहार हुआ था उसके विरोध में अटल जी ने मीडिया के सामने राजधर्म के पालन की सलाह दी थी। आज के समय आंसू बहाते हुए प्रदर्शित होने वाले मोदी अटलजी की सलाह के समय हँस रहे थे जिसका वीडियो उपलब्ध है। भुला दिये गये भाजपा के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह ने अपनी किताब में लिखा है कि गुजरात में हुए नरसंहार से जन्मी आलोचनाओं से दुखी होकर जब अटल जी स्तीफा देने जा रहे थे तब उन्हीं ने उन्हें रोका था।
गुजरात विधानसभा चुनाव में हुयी दुर्दशा से पूर्व मोदी ने कभी अटल जी के नाम को आदर से याद नहीं किया और अब जब याद किया तब भी अपने योगदान की प्रशंसा के साथ याद किया। मेरे नैटपरिचित एक ब्लागर जिन्हें बाद में ट्रालर के रूप में ही पहचाना गया ने अपने तब के ब्लाक में लिखा था कि बहुत सारे ब्लागर्स का लम्बा प्रशिक्षण शिविर गुजरात में आयोजित किया गया था जिसमें समय समय पर मोदी स्वयं आते रहे थे। यह वही समय था जब मोदी को प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी बनाने की प्रक्रिया चल रही थी। इस शिविर से लौट कर आने के बाद उन्होंने उन्होंने अपनी पोस्टों में जो प्रमुख परिवर्तन किया था वह था अटल बिहारी शासन काल की भी आलोचना करना। उनके इस बदले रुख से तब मैं अचम्भित हुआ था। कन्धार में आतंकवादियों को छोड़ कर आने से लेकर मुशर्र्फ से वार्ता तक उन्होंने  निन्दा करना शुरू कर दिया था। किसी विरोधी की तरह उनके कमजोर हिन्दुत्व और गलत धर्मनिरपेक्षता की आलोचना भी वे करने लगे थे। पार्टी के पोस्टरों में अटल बिहारी वाजपेयी और अडवाणी जी के फोटुओं का स्तेमाल कठोरता से रोक दिया गया था।
जब मोदी जी प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी चुन लिये गये थे तब राजनाथ सिंह नाम मात्र के अध्यक्ष रह गये थे और प्रत्याशी चयन से लेकर चुनाव प्रबन्धन का सारा काम नरेन्द्र मोदी और अमित शाह देखने लगे थे। अडवाणी जी तक का टिकिट उन्होंने अंतिम समय तक लटकाये रखा था। लोकसभा चुनाव में जीत के बाद जब मंत्रिमण्डल गठन का सवाल आया तब उन्होंने अटल मंत्रिमण्डल के प्रमुख सदस्यों को दूर ही रखा। अडवाणी जी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार, यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी, शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना, आदि तो दूर ही रखे गये सुषमा स्वराज को भी उनकी रुचि से भिन्न और वरिष्ठता से अलग विभाग दिया। रक्षा विभाग को भले ही अरुण जैटली को वित्त मंत्रालय जैसे भारी भरकम मंत्रालय के साथ नत्थी किये रहे पर किसी वरिष्ठ को उसके आसपास फटकने भी नहीं दिया। उमा भारती को ऐसा विभाग दे दिया जिसमें उनके कर सकने लायक कुछ भी नहीं था। जो मंत्री बनाये गये वे सब उपकृत लोग थे जो बाबुओं की तरह उनके वाक्य को अंतिम मान कर चलते थे।
अगले लोकसभा चुनावों से पहले जब कुछ विधानसभाओं के चुनाव सामने हैं, और नोटबन्दी, जीएसटी, से लेकर निष्प्रभावी आर्थिक नीतियों के कारण न काला धन वापिस आने और न रोजगार का सृजन होने के कारण असंतोष चरम की ओर बढ रहा है तब अटल जी की याद आ रही है। कट्टर हिन्दुत्ववादियों के प्रति जनता के बढते गुस्से को थामने के लिए अपेक्षाकृत उदार अटल बिहारी की फोटो में उम्मीदें देख रहे हैं। अटलजी इस अवसरवाद का उत्तर दे पाने की स्थिति में भी नहीं हैं।
वीरेन्द्र जैन
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बुधवार, दिसंबर 06, 2017

लोकतंत्र में निर्दलीय, सन्दर्भ उ.प्र. नगर निकाय चुनाव

लोकतंत्र में निर्दलीय, सन्दर्भ उ.प्र. नगर निकाय चुनाव
वीरेन्द्र जैन

उत्तर प्रदेश में हाल ही में सम्पन्न नगर निकाय चुनावों में भले ही भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों की तरह अपना वर्चस्व बना होने का गलत प्रचार कर रही हो, व उसका समर्थक मीडिया उनकी प्रतिध्वनि रच रहा हो, किंतु सच यह है कि राजनीतिक दृष्टि से जनता ने प्रदेश के किसी भी दल में अपना विश्वास व्यक्त नहीं किया है। यह स्थिति एक अच्छा संकेत नहीं है। अब इन सदस्यों की बोलियां लगायी जायेंगीं। जब पार्टी आधार पर चुनाव होते हैं तो दलबदल के बारे में भी वही नियम लागू होने चाहिए जो लोकसभा और विधानसभा के सदस्यों के लिए बनाये गये हैं।
चुनावी प्रबन्धन में सिद्धहस्त भाजपा गुजरात में चुनाव जीतने की स्थिति में नहीं है ऐसा उसकी आम सभाओं में अपेक्षाकृत कम उपस्थिति, पूरी ताकत झौंक देने के बाद भी रैलियों में कम भीड़, और नेताओं की बातचीत के लीक होने की खबरों से पता चलता है। इसके बाबजूद भी लोगों को आशंका है कि भाजपा साम दाम दण्ड भेद का स्तेमाल करके स्थिति अपने पक्ष में कर लेगी। उत्तर प्रदेश के नगर निकाय चुनावों की वास्तविकता को भिन्न तरीके से प्रस्तुत करना भी ऐसी ही तरकीबों में से एक है। विपक्षियों का तो यह भी आरोप है कि गुजरात में चुनावों को विलम्बित कराने के पीछे भी ऐसा ही प्रयास है। चुनाव परिणामों को अपने पक्ष में बतलाना भी एक कूटनीति का हिस्सा है।  
उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम का सच यह है कि सम्पूर्ण नगर निकाय चुनावों अध्यक्ष के कुल 652 पद थे जिसमें से 225 पर निर्दलीय जीते हैं और 184 पर भाजपा ने जीत दर्ज की है। समाजवादी पार्टी ने 128 सीटें जीती हैं तो बहुजन समाज पार्टी ने 76 पर जीत दर्ज की है। काँग्रेस ने 26 , आम आदमी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, और राष्ट्रीय लोक दल ने दो-दो सीटें जीती हैं। ओवैसी की एआईएमआईएम ने भी नगर पंचायत की एक सीट जीत कर उत्तर भारत में प्रवेश कर लिया है। भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी को एक, आल इंडिया फारवर्ड ब्लाक को एक, तदर्थ पंजीकृत पार्टी को एक, तथा अमान्यता प्राप्त दल को दो सीटें मिली हैं।
उल्लेखनीय है कि कुल मतदान लगभग चार करोड़ वोटों का हुआ। जिन नगर निगम के चुनावों में भाजपा 16 में से 14 सीटें जीत कर पूरे उत्तर प्रदेश में झंडा फहराने का प्रचार कर रही है उनमें कुल 35 लाख वोट पड़े हैं। नगर पालिका परिषदों के लिए हुए चुनावों में लगभग एक करोड़ वोट पड़े हैं, वहीं नगर पंचायतों के लिए दो करोड़ पैंसठ लाख के लगभग वोट पड़े हैं।  
कुल मिला कर भाजपा को एक करोड़ तेईस लाख वोट मिले हैं जो कुल मतदान का लगभग तीस प्रतिशत हैं। वहीं निर्दलियों को लगभग 41 प्रतिशत वोट मिले हैं।  कुछ अपवादों को छोड़, बीजेपी बस्‍ती, गोंडा, चित्रकूट, इलाहाबाद, मिर्जापुर, बाराबंकी, आज़मगढ़, जौनपुर, कौसाम्‍बी, फतेहपुर, फर्रुखाबाद, फिरोज़ाबाद इत्‍यादि में लगभग सभी सीटें हार गई है। 
सभी निकायों के पार्षदों के चुनावों में भी लगभग साठ प्रतिशत पार्षद निर्दलीय हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि भाजपा के ध्रुवीकरण का प्रभाव यह भी हुआ है कि पहली बार ओवैसी की एआईएमआईएम के 29 पार्षद जीते हैं जिनमें से ग्यारह तो फिरोजाबाद से जीते हैं जहां से उनकी मेयर पद की उम्मीदवार ने विजेता को कड़ी टक्कर दी और दूसरे नम्बर पर रही। इसके अलावा उनके उम्मीदवार सम्भल, अमरोहा, मेरठ, बागपत, डासना [गाज़ियाबाद] कानपुर, सीतापुर, बिजनौर और इलाहाबाद से भी जीते हैं। चिंताजनक यह है कि जिस कट्टरवाद को समाप्त समझा जा रहा था, वह फिर अपना स्थान बनाता जा रहा है जिसका परोक्ष लाभ भाजपा के कट्टरवादी तत्वों की मजबूती में प्रकट होगा। ऐसा लगता है कि उनकी चुनावी असफलता के बाद खुद को धर्मनिरपेक्ष बताने वाली पार्टियों से मुसलमानों का भरोसा कम हो रहा है।
निर्दलीय उम्मीदवार की विजय का मतलब होता है कि सम्बन्धित व्यक्ति मान्यता प्राप्त पंजीकृत दल से जनता में अधिक लोकप्रिय और विश्वसनीय है। ऐसे लोग भी प्रायः मान्यता प्राप्त पार्टियों से टिकिट मांगते हैं किंतु टिकिट न मिलने पर वे निर्दलीय के रूप में खड़े हो जाते हैं। जीतने के बाद पार्टियां अपनी जरूरत के अनुसार उनसे सौदा करती हैं। यह स्थिति भ्रष्टाचार की भाव भूमि तैयार कर देती है। पूरे देश में फैली गन्दगी और अतिक्रमण इसी के परिणाम हैं। नगर निकायों, सहकारिता के विभागों, और विकास प्राधिकरणों के भ्रष्टाचार से नित प्रति आम आदमी का सामना होता है इसीलिए वह भ्रष्टाचार समाप्ति की घोषणाओं पर भरोसा नहीं करता। असम के बाद मणिपुर और गोआ राज्यों में जिस तरह से सरकारें बनायी गयी थीं उसने उनके वादों पर से लोगों के विश्वास को कम किया है। गुजरात चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश में भी व्यापक स्तर पर खरीद फरोख्त होगी।
जरूरत है कि या तो नगर निकायों में दलीय आधार पर चुनाव न हों, और अगर हों तो दलबदल कानून भी उन पर लागू हो। एवीएम मशीन पर शंकाएं की जा रही हैं किंतु उसके लिए स्वीकार्य सबूत और विधि के साथ सामने आना होगा, अन्यथा पराजय के बाद ऐसी शंकाएं व्यक्त करना सन्देहास्पद लगता है।  
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629


बुधवार, नवंबर 22, 2017

फिल्म समीक्षा मुज़फ्फरनगर – बर्निंग लव स्टोरी , न कथा, न घटना, न समस्या, सिर्फ चूं चूं का मुरब्बा

फिल्म समीक्षा
मुज़फ्फरनगर – बर्निंग लव स्टोरी , न कथा, न घटना, न समस्या, सिर्फ चूं चूं का मुरब्बा




















2013 में घटित मुज़फ्फरनगर की घटनाएं अभी इतनी पुरानी नहीं हुयी हैं कि पढने लिखने वाले लोग उसकी सच्चाई भूल गये हों। अब बालीवुड की जो फिल्में केवल व्यवसाय की दृष्टि से बन रही हैं वे बहुत खराब बन रही हैं और तकनीक के तमाशे से मजमा जमा कर कुछ बाहुबली भले ही व्यवसाय कर लें किंतु उन्हें आमिर खान की तरह कला के सहारे व्यावसायिक सफलता प्राप्त करने की श्रेणी में बहुत नीचे के पायदान पर जगह मिलेगी।
हरीश कुमार निर्देशित यह फिल्म अनेक तरह की आशंकाओं, आकांक्षाओं, और अनिश्चितताओं से घिर कर चूं चूं का मुरब्बा बन कर रह गयी है। ऐसा लगता है कि यह फिल्म मुज़फ्फरनगर की कढवी सच्चाइयों को दबाने के लिए बनायी गयी है, क्योंकि इसी घटना के पीछे छुपे षड़यंत्रों को प्रकट करती कुछ डाकूमेंट्रीस और वीडियो फिल्में बनायी जा चुकी हैं जिन्हें घटना के जिम्मेवार लोगों द्वारा सार्वजनिक प्रदर्शन से रुकवा दिया गया है, किंतु फिर भी वे बुद्धिजीवियों के बीच देखी दिखायी जा चुकी हैं। निर्माता ने सत्तारूढ दल के सांसद और अब मंत्री से इस फिल्म निर्माण के लिए आशीर्वाद लिया है इसलिए उनका धन्यवाद भी किया है जो कभी मुम्बई के पुलिस कमिश्नर रहे हैं।
मुजफ्फरनगर में घटित जिस घटना से वहाँ संहार और प्रतिसंहार की घटनाएं घटीं उसको थोड़ा सा बदल कर कहानी का प्रारम्भ किया गया है। पहले एक समुदाय द्वारा और फिर दूसरे समुदाय द्वारा इकतरफा हिंसा की घटनाएं घटी थीं। लोकसभा के आगामी चुनावों को देखते हुए राजनीतिक दलों ने इस आग में घी ही नहीं डाला अपितु आग को फैलाने के लिए हवा भी चलवायी। फिल्म में राजनीतिक दलों के एक पक्ष को दोषी बताया गया है जबकि दूसरे पक्ष के लोग जो बड़े दोषी थे व जिन्होंने नकली वीडियो बना कर उसे अपलोड कर भावनाएं भड़ाकायीं थीं उनकी चर्चा ही नहीं की है। इतना ही नहीं उन आरोपियों को चुनाव प्रचार के दौरान एक दल के बड़े बड़े नेताओं द्वारा सम्मानित भी किया गया था, उन्हें टिकिट भी दिया गया था और बाद में मंत्री भी बनाया गया। इस दुखद घटना में लगभग आधे लाख अल्पसंख्यक लोग सुविधाविहीन कैम्पों में महीनों भूखे प्यासे व स्वास्थ सुविधाओं से वंचित होकर लम्बे समय तक रहे उनकी कोई झलक तक फिल्म में नहीं दिखायी गयी है।  
 किसी दुर्घटना के साम्प्रदायिक दंगे में बदलने के पीछे बहुत सारी कारगुजारियां होती हैं जो वर्षों से चल रही होती हैं। कुछ संगठन इसके लिए निरंतर काम करके समाज में नफरतों के झूठे सच्चे इतिहास के सहारे समाज को साम्प्रदायिक दृष्टि से सम्वेदनशील बनाते रहते हैं, और अब ऐसे संगठन दोनों तरफ काम कर रहे हैं। ध्रुवीकरण का चुनावी लाभ हमेशा बहुसंख्यकों को मिलता है इसलिए ज्यादातर वे आक्रामक और अल्पसंख्यक रक्षात्मक होते हैं। जब अल्पसंख्यक को उत्तेजित कर दिया जाता है तो कई बार भय की अवस्था में वह भी पहले हमलावर हो जाता है।
इस घटना से उठायी गयी कथा पर लगभग तीस साल पहले वाली बम्बैया फिल्मों के ढाँचे में पिरो दिया गया है जिसमें हीरो का हीरोइन से उलझ कर प्रथम दृष्ट्या प्रेम हो जाता है। हीरो और हीरोइन अलग धर्मों के परिवार से हैं। शहर में शूटिंग की प्रैक्टिस के लिए दिल्ली शहर में रह कर आया हीरो दस बीस लोगों को अकेले ही ठिकाने लगा देता है और उनकी लाठी डंडे बन्दूकें काम नहीं आते। नायक या खलनायक के साथ घटी हिंसा के अलावा अन्य किसी के साथ घटी हिंसात्मक घटनाएं पुलिस और कानून का मामला नहीं बनतीं। कहानी में अनावश्यक रूप से गीत और नृत्य ठूंसे गये हैं जिनकी अस्वाभाविकता से फिल्म के विषय की गम्भीरता नष्ट होती है। हीरोइन कुछ ही दिनों में आईपीएस होकर सीधे एसपी के रूप में अपने होम टाउन में पदस्थ हो जाती है व ऐसी टाइट वर्दी पहिनती है जिससे वह एसपी से ज्यादा हीरोइन दिखायी दे। हीरो देव शर्मा सीधे सीधे अमिताभ की पुरानी एंग्री यंगमैन की छवि से प्रभावित है व वैसा ही नकल करने की असफल कोशिश कर रहा है, वहीं हीरोइन ऐश्वर्या देवान उसी दौर की किसी नायिका की तरह व्यवहार करते हुए ओवरएक्टिंग करती हैं। कुछ संवाद जरूर अच्छे लिखे गये हैं किंतु गलत डायलोग डिलीवरी और कमजोर पटकथा के कारण वे थेगड़े से लगते हैं। खलनायक के रूप में अभिनेता अनिल जार्ज अवश्य प्रभावित करते हैं।
सेंसर बोर्ड से पास इस फिल्म को भी प्रचार के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पाँच जिलों में प्रदर्शन के लिए प्रतिबन्धित किये जाने की खबरें समाचार पत्रों में प्रकाशित की गयी हैं जिसे अधिकारियों का मौखिक आदेश भी बताया जा रहा है। आजकल प्रचार के लिए ऐसे हथकंडे फिल्म व्यवसाय का आवश्यक हिस्सा बन गये हैं। नायक नायिका का पारिश्रमिक फिल्म निर्माण के बज़ट का सबसे बड़ा हिस्सा होते हैं किंतु इस फिल्म में वे नये हैं, इसलिए यह कम लागत की फिल्म है क्योंकि शूटिंग के लिए भी बड़े सेटों की जरूरत नहीं पड़ी है और सब कुछ पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसी गाँव, हवेली या ड्राइंग रूम में हो गयी है। कम लागत के कारण इसे व्यावसायिक रूप से असफल नहीं कहा जायेगा किंतु फिल्म के रूप में ना तो यह कलात्मक, न घटनाप्रधान, न मनोरंजक, न ही यथार्थवादी, न कुशल अभिनय निर्देशन सम्पन्न फिल्म कही जा सकती है। अगर भविष्य में नायक नायिका सफल होंगे तो यह फिल्म उन्हें पहले पहल प्रस्तुत करने के लिए उल्लेखित होगी।  
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

        

मंगलवार, नवंबर 07, 2017

गैंग रेप, समस्याओं की जड़ों तक जाने की जरूरत

गैंग रेप, समस्याओं की जड़ों तक जाने की जरूरत
वीरेन्द्र जैन
भोपाल की राजधानी के मध्य में सबसे प्रमुख स्थान के निकट एक 19 वर्षीय छात्रा के साथ गेंग रेप हुआ। उल्लेखनीय यह भी है कि छात्रा जिस पद के लिए कोचिंग कर रही थी उसमें सफल होने पर वह राज्य प्रशासनिक सेवा और भविष्य में आईएएस तक भी पहुँच सकती थी। उल्लेखनीय यह भी है कि पीड़िता के माँ बाप दोनों ही पुलिस की नौकरी में हैं और फिर भी उन्हें रिपोर्ट तक लिखाने में लम्बा समय लग गया व उन्हें उस आधार पर झुलाया जाता रहा जिसके बारे में अनेक बार स्पष्ट किया जा चुका है कि थाने के क्षेत्र के चक्कर में न पड़ कर रिपोर्ट को तुरंत लिखा जाना चाहिए।
अब यह घटना कोई अनोखी घटना नहीं है क्योंकि यह आये दिन की बात हो गयी है। यह ठीक है कि मध्य प्रदेश इस तरह के अपराधों के मामले में बहुत आगे है किंतु दूसरे राज्य भी बहुत पीछे नहीं है, और यह बात किसी प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं होना चाहिए। हर घटना के बाद कुछ राजनीतिक आलोचनाएं और प्रदर्शन हो जाते हैं तथा कुछ समय के लिए कुछ प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों का निलम्बन हो जाता है जिन्हें जनता की याद्दाश्त की सीमा समाप्त होने के बाद रद्द कर दिया जाता है। यही सब कुछ इस मामले में भी हो रहा है। खेद है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए न तो समस्या की जड़ों तक पहुँचने का कोई प्रयास होता है और न ही किसी स्थायी समाधान की ओर ही बढा जा रहा है।
वोटों की राजनीति ने जो तुष्टीकरण की कूटनीति अपनायी है उसमें आम जनता के हिस्से में कोरे वादे आये हैं जबकि हर तरह के कानून भंजकों को सरकारी संरक्षण और मदद मिलने लगी है। देशभक्ति का ढंढोरा पीटने वाली पार्टी चन्दे के लिए व भीड़ जुटाने के लिए देशद्रोहियों को अच्छे अच्छे पद दे देती है और वे सरकार के मंत्रियों के साथ मंचों पर गलबहियां डाल कर फोटो खिंचवाते हैं जिससे पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी दबाव में आ जाते हैं। अभी तक किसी भी राजनीतिक दल ने अपने उन नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की है जिनकी लापरवाहियों के कारण अपराधी पार्टी में आते हैं और संरक्षण पाते रहे हैं। दो एक वामपंथी पार्टियों को छोड़ कर किसी भी प्रमुख पार्टी में प्रवेश के लिए कोई छलनी नहीं है और जो ज्यादा से ज्यादा संसाधन उपलब्ध करा सकता है वह स्वयं या अपने किसी व्यक्ति के माध्यम से पार्टी, सरकार, और देश के संसाधनों पर अधिकार करने में लग जाता है। इस तरह एक दुष्चक्र का निर्माण होता है जिससे राष्ट्रीय संसाधन व्यक्तियों और पार्टियों के संसाधनों में बदलते जाते हैं। क्या कारण है कि किसी भी पार्टी में आदर्श आचार संहिता के आधार पर सदस्यों की समीक्षा नहीं होती और इस आधार पर पार्टी से निकाले जाने की घटनाएं नहीं सुनी जातीं। पार्टी से तब निकाला जाता है जब कोई सदस्य दूसरी पार्टी में जा चुका होता है। पार्टी का टिकिट देने में जब किसी सदस्य की पार्टी में वरिष्ठता पर ध्यान नहीं दिया जाता व दो दिन पहले दल बदल कर आये हुए व्यक्ति को टिकिट दे दिया जाता है तो उस दल की आदर्श आचार संहिता पर निगाह डालने का तो सवाल ही नहीं उठता। एक पुलिस अधिकारी ने बताया था कि लगभग प्रत्येक अपराध में आरोपी को पकड़ने पर राजनेताओं के सिफारिशी फोन जरूर आते हैं जिनमें से कुछ तो ऐसे होते हैं जिन पर विचार करना ही पड़ता है। जिस दिन उपरोक्त घटना घटी उसी दिन के अखबार में खबर है कि बड़े अधिकारियों के आदेश पर जब भोपाल के ढाबों पर शराब पीने वालों पर दबिश दी गयी तो पकड़ में आये 27 लोगों के पक्ष में लगातार फोन आते गये कि एक एक करके अंततः सब को छोड़ देनी पड़ा। भोपाल में ही हेल्मेट चैकिंग के दौरान रोके गये एक व्यक्ति ने सम्बन्धित इंस्पेक्टर की बात मुख्यमंत्री के पिता से करायी व इंस्पेक्टर ने हाथ जोड़ कर उसे छोड़ दिया। यह खबर भी अखबारों में छप गयी थी। वैसे तो सार्वजनिक जीवन में आये प्रत्येक व्यक्ति को व अधिकारी को संविधान की शपथ लेनी चाहिए किंतु सरकार में बैठा प्रत्येक व्यक्ति जो संविधान की शपथ ले चुका है, अगर किसी कानून तोड़ने वाले के लिए सिफारिश करता है तो वह तो सीधा सीधा अपराध में भागीदारी करके शपथ का उल्लंघन कर रहा होता है।
न्याय का दायित्व होना चाहिए कि या तो वह अपराधी को सजा दे या अपराधी को सजा न दिला पाने वाली व्यवस्था के कारिन्दों को सजा दे क्योंकि आमजन व्यवस्था कायम रखने के लिए भरपूर भुगतान कर रहा है। खेद की बात है कि बहुत सारे मामले न केवल लम्बे समय तक अनिर्णीत पड़े रहते हैं अपितु बिना किसी को सजा दिये हुए समाप्त भी कर दिये जाते हैं। यह दशा कानून का भय समाप्त करती है और अपराधियों को निर्भय होकर मनमानी करने की प्रेरणा देती है। जो लोग पहले से ही सामंती सोच के कारण स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझते हैं वे दूसरों को कमतर इंसान मान कर व्यवहार करते हैं। सत्ता की ताकत या संरक्षण उन्हें और अधिक निर्मम बना देता है। बलात्कार और हिंसा इसी का परिणाम है।
यौन अपराधों के अधिकतर मामले बदनामी के डर से सामने नहीं आने पाते क्योंकि समाज पीड़िता को न केवल कमजोर व जिम्मेवार मानकर व्यवहार करती है अपितु हेय दृष्टि से देखती है। इसके लिए बड़े सामाजिक आन्दोलन की जरूरत है जिसमें पूरा समाज एक साथ उठ खड़े हो कर अपने साथ हुए अपराध की स्वीकरोक्ति करते हुए पीड़ितों के साथ हो व आपस में हमदर्दी प्रकट करे। गाँधीजी के बाद ऐसे प्रयोग बन्द हो चुके हैं।  अपराधियों के खिलाफ खड़े होने के लिए अकेले व्यक्ति की कमजोरी को स्वीकारना जरूरी होता है और पीड़ितों की एकता बनाने का आवाहन होना चाहिए। पीड़िता को दोषी मानना अपने आप में अपराध घोषित होना चाहिए।
अपराधों की रिपोर्ट दर्ज न करके अपना रिकार्ड ठीक करना भी समाज के खिलाफ पुलिस का अपराध है जिसे करने के लिए देश के बड़े बड़े पुलिस अधिकारी अपने थानेदारों को प्रेरित करते हैं। किसी क्षेत्र में अपराधों की संख्या का अधिक होना पुलिस अधिकारियों की जिम्मेवारी नहीं होना चाहिए अपितु अपराधियों को पकड़ना और सजा दिलाने के आधार पर उनका कार्य मूल्यांकन होना चाहिए, जिसके अभाव में रिपोर्ट न लिख व सच को छुपा कर बड़ा अपराध किया जा रहा है।
कानून के शासन का अभाव जंगली न्याय की ओर अग्रसर करता है जिसकी ओर बढते जाने के संकेत उक्त घटनाओं में हो रही वृद्धि से मिलने लगे हैं।  देखना होगा कि निर्भया कांड की तरह घटनाएं व्यवस्था को किस बदलाव की प्रेरणा दे पाती हैं।          
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023 [मो. 09425674629]