शुक्रवार, अगस्त 27, 2021

श्रद्धांजलि / संस्मरण वाहिद काज़मी

 

श्रद्धांजलि / संस्मरण वाहिद काज़मी

एक मस्त मलंग यायावर का चला जाना

वीरेन्द्र जैन


वाहिद काज़मी मेरे ऐसे दोस्त थे जिनसे मैं कभी नहीं मिला, किंतु ऐसे इकलौते दोस्त भी थे जिनसे मैंने अपनी आदत के विपरीत अपने जीवन की निजी बातें भी पत्र में लिखी थीं। आज जब उनके निधन का समाचार मिला तो विचार करने के लिए विवश हुआ कि पता नहीं ऐसा क्या था जो मैं उनके साथ अपना अंतर मन साझा कर सका।

पिछले पचास साल से जब से मैंने पहले पढना और फिर लिखना सीखा तब से देश भर की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में विभिन्न विषयों व विधाओं पर उनका लिखा हुआ पढने को मिला। सबसे ज्यादा मुझे उनके नाम ने आकर्षित किया था- स्वामी वाहिद काजमी। ये वही दिन थे जब रजनीश जी जो तब आचार्य रजनीश हुआ करते थे, ने अपने प्रवचनों और वक्तव्यों से पूरे हिन्दी क्षेत्र के पढने लिखने सोचने विचारने वालों के बीच तहलका मचा दिया था और लाखों लोगों की तरह मैं भी उनके भाषा माधुर्य और तार्किकता के प्रभाव में था। उन दिनों मैं अमृता प्रीतम, और रजनीश की किताबें तलाश तलाश कर पढ रहा था। एक अंग्रेजी के पत्रकार ने उन पर जो लेख लिखा था उसका शीर्षक था – प्लेजर आफ रीडिंग रजनीश। आप उन्हें मानें या न मानें किंतु रजनीश को पढने में किसी कथा या व्यंग्य साहित्य को पढने का मजा तो आता ही था। वाहिद काजमी के आगे स्वामी लग जाने से यह संकेत तो मिल ही र्हा था कि एक अपेक्षाकृत कट्टर समुदाय का व्यक्ति भी रजनीश के विचारों से प्रभावित हुआ है व अपनी धर्मिक कट्टरता को छोड़ कर अपना चुनाव खुद करने का साहस दिखा रहा है। किसी भी क्षेत्र की क्रांतिकारिता  मुझे लुभाती थी क्योंकि इससे अपनी सोच और विचार को बल मिलता था।

हम अपने नगर के सभी लोगों को नहीं जानते किंतु फिर भी अगर सुदूर कोई मिल जाता है तो आत्मीयता उमड़ आती है। वाहिद काजमी ने संतों विशेष कर सूफी संतों के बारे में बहुत खोज खोज कर लिखा है और इसी क्रम में उन्होंने 50-55 साल पहले दतिया के एक सूफी संत ऐन सांई पर भी एक लेख कादम्बिनी में लिखा था और कादम्बिनी के पुराने अंक देखते हुए उस पर दोबारा नजर पड़ गयी थी। लगा कि जब उसे पहली बार पढा होगा तभी वाहिद काजमी का नाम कहीं दिमाग में आत्मीय लोगों में दर्ज हो गया होगा। तब तक मुझे यह पता नहीं था कि वे ग्वालियर के मूल निवासी हैं और हमारी दतिया के पड़ोसी हैं।

जब मुझे पत्रिकाओं में छपने का शौक जागा तो हर नई पत्रिका मुझे चुनौती की तरह लगती थी कि इसमें छपना है,  इस शिखर पर चढना है। इसलिए हर स्तर की पत्रिकाओं के सम्पर्क में आता गया और अनेकों में एक बार छप कर छोड़ दिया। मैंने देखा कि लगभग उन सारी पत्रिकाओं में कहीं न कहीं वाहिद काज़मी मौजूद मिलते थे। हंस, वर्तमान साहित्य से लेकर दक्षिण समाचार तक की बहसों में हम लोग शामिल मिलते थे और लगभग एक ही तरफ होते थे। स्मरणीय है कि दक्षिण समाचार श्री मुनीन्द्रजी द्वारा सम्पादित साप्ताहिक टेबुलाइज्ड पत्र था जिसमें साहित्य को विशेष स्थान मिलता था। मुनीन्द्र जी हिन्दी की उन पुरानी साहित्यिक पत्रिकाओं में से एक कल्पना के सम्पादक मंडल के प्रमुख रहे थे जिसमें उनके साथ भवानी प्रसाद मिश्र, प्रयाग शुक्ल, ओम प्रकाश ‘निर्मल’ आदि अनेक लोगों ने काम किया था जो बाद में साहित्य के आकाश में सूरज की तरह चमके। हरिशंकर परसाई का व्यंग्य वहीं से स्तम्भ की तरह छपा जिसका नाम ‘और अंत में’ था। मुक्तिबोध की सुप्रसिद्ध कविता “ अंधेरे में “ वहीं पहली बार छपी थी और तब उसका शीर्षक दिया गया था “ सम्भावनाओं के दीप अंधेरे में”। जब मेरा ट्रांसफर हैदराबाद कर दिया गया था जिसे परसाई जी के शब्दों कहें कि फेंक दिया गया था तो मैंने इस चुनौती और भय मिश्रित दुस्साहस की सूचना अपने तमाम परिचितों को दी थी। परिणाम यह हुआ था कि जिससे भी सम्भव हुआ उसने हैदराबाद के अपने परिचितों को पत्र लिखा। शायद सबसे अधिक पत्र मुनीन्द्र जी को ही मिले होंगे और सम्भव है कि उसमें मेरी साहित्यिक औकात के बारे में कुछ अतिरंजित बातें भी लिखी हों। बहरहाल मुझे मुनीन्द्र जी का विशेष स्नेह मिला और लिखने के लिए दक्षिण समाचार जैसा खुला प्लेटफार्म मिला। मैंने उस खुलेपन का भरपूर उपयोग किया। दक्षिण समाचार कल्पना से जुड़े रहे देश भर के सभी प्रमुख साहित्यकारों के पास पहुंचता रहा व उसके सहारे मैं भी पहुंचता रहा। मेरे गद्य व्यंग्य लेखन ने वहीं से गति पकड़ी। मैं हैदराबाद से स्थानांतरित भी हो गया किंतु दक्षिण समाचार में प्रकाशित होना जारी रहा। इस पत्र में स्वामी वाहिद काजमी भी समय समय पर लिखते रहते थे जिसमें मेरा और उनका पता भी छपता रहता था। इसी के सहारे उनसे तब छुटपुट पत्रव्यवहार शुरू हुआ जब मैं 1990 में लीड बैंक आफिस में दतिया वापिस लौट आया था। शायद इसी दौरान मुझे ज्ञात हुआ कि वे ग्वालियर के ही रहने वाले हैं और अपने स्वतंत्र लेखन के शौक में अकेले जिन्दगी गुजार रहे हैं। मैंने भी ऐसी जिन्दगी गुजारनी चाही थी किंतु अपनी जिम्मेवारियों से मुँह न मोड़ सकने के कारण वैसा नहीं कर सका। जब कोई ऐसा करता दिखता था तो मेरे मन में उसके प्रति बड़ी श्रद्धा उमड़ती रही। वाहिद काजमी के प्रति श्रद्धा व स्नेह में शायद इस कारक की भी भूमिका रही हो।

जब मैं भोपाल आकर रहने लगा तब कई वर्षों बाद उनका पत्र आया कि आपके नाम के मेरे एक मित्र दतिया में भी हैं। उत्तर में मैंने लिखा कि मैं वही हूं और नौकरी छोड़ कर अब भोपाल ही रहने लगा हूं व ज्यादातर समय यहाँ अकेले ही रहता हूं क्योंकि अभी बच्चे दतिया में ही हैं। इसी क्रम में निजी बातों और निजी अनुभवों का सिलसिला चल निकला। बात यहाँ तक पहुंच गयी कि उन्होंने अम्बाला छोड़ कर भोपाल में बसने का प्रस्ताव कर दिया व रहने का ठिकाना मिलने तक मेरे यहाँ ही रहने का प्रस्ताव कर डाला। मैं असमंजस में पड़ गया क्योंकि मैं उनके समान स्वतंत्र नहीं था व मेरा परिवार आता जाता रहता था जिसे किसी भी तरह के बाहरी व्यक्ति का घर में रहना बिल्कुल भी पसन्द नहीं आ सकता था, चाहे वह कोई रिश्तेदार ही क्यों न हो।     

उन्हें सुनने में समस्या थी इसलिए वे टेलीफोन का प्रयोग नहीं करते थे इसलिए उनसे जितनी भी बात हुयी वह पत्रों के माध्यम से ही हुयी। उनकी स्मृति जरूर बहुत अच्छी थी। एक बार उन्होंने दस साल पहले धर्मवीर भारती पर लिखा एक लेख मांग लिया जो मुझे भी याद नहीं था। फिर उन्होंने बताया कि वह फलां सन में दक्षिण समाचार में प्रकाशित हुआ था। संयोग से वह मिल गया और मैंने उन्हें भेज दिया किंतु मैं उनकी स्मृति पर चमत्कृत था। इसी तरह उन्होंने किसी पत्रिका के महिला विशेषांक के लिए मुझसे लेख मांगने के लिए प्रतिष्ठित लघु पत्रिका सम्बोधन के सम्पादक को लिख दिय। सम्पादक का पत्र आया तो मैं असमंजस में था पर उन्होंने ही याद दिलाया कि हंस में छिड़ी एक बहस में जो मेरे विचार थे उसे ही विस्तार देकर लिख दूं। वह अच्छा खासा लेख बन गया जो अन्यथा मैंने नहीं लिखा  होता।

जब शीबा असलम फहमी ने अपनी पत्रिका ‘हैड लाइंस प्लस’ निकाली तो राजेन्द्र यादव के इशारे पर मैंने उसमें नियमित लिखना शुरू कर दिया और देखा कि वहाँ भी वाहिद काजमी अपनी मौलिक खोजों के साथ मौजूद हैं। उनके एक शीर्षक का नाम तो अभी भी याद है जिसमें उन्होंने बताया था कि औरंगजेब का एक नाम नौरंगीलाल था और वह होली भी खेलता था।

उन्होंने सैकड़ों साल पहले के संतों की खोज तो की किंतु उनके निजी जीवन के बारे में ऐसे ही फुटकर फुटकर् सुनने को मिला। वे ग्वालियर में आंतरी से थे। शिक्षा में बीएससी पूरी नहीं कर सके। घर छोड़ कर चले आये व विभिन्न शहरों में रहते हुए अंततः 1989 में अम्बाला के पुल चमेली पर स्थित होटल में स्थायी निवास बना लिया। अपना खाना खुद बनाते थे और आजीविका के लिए स्वतंत्र लेखन पर निर्भर थे। उन्होंने शायराओं की विलुप्त पांडुलिपियों पर बहुत काम किया व विस्मृत हो गये संत साहित्य को सामने लाये। उनकी सहायता से सैकड़ों छात्रों ने पीएचडी की व उन्होंने बिना किसी लोभ लाभ के उनकी मदद की। वे चित्रांकन में भी महारत रखते थे भले ही अंतिम वर्षों में उनके हाथ कांपने के कारण यह विधा छोड़नी पड़ी। मेरे पास उनके जो दर्जनों पत्र हैं वे बहुत ही छोटे छोटे किंतु स्पष्ट सुन्दर अक्षरों में लिखे गये हैं। मैं उन्हें संक्षिप्त पत्र लिखता थ किंतु वे विस्तार से उत्तर देते थे।

4 दिसम्बर 1945 को जन्मे वाहिद काजमी ने ‘रूपा की चिट्ठी’ पत्रिका में कई वर्ष काम किया। कहानी लेखन महाविद्यालय के महाराज कृष्ण जैन के सहयोगी रहे, हिन्दी के जाने माने साहित्यकार ‘रावी’ के बहुत आत्मीय रहे। पता नहीं यह गिनती कितनी सही है क्योंकि संख्या ज्यादा भी हो सकती है, पर उनके मित्र बताते हैं कि उनके एक हजार से ज्यादा लेख, समीक्षाएं, व्यंग्य, संस्मरण, और कहानियां प्रकाशित हैं। उन्होंने दो सौ से अधिक उर्दू उपन्यासों के अनुवाद किये हैं। उनकी एक कहानी लानतव उनकी जीवनी आज भी केरल विश्वविद्यालय में स्नातक के छात्रों की अंग्रेजी पुस्तक रीडिंग एंड रियलिटीका हिस्सा है। क्रमशः उनकी सुनने की क्षमता कम होती गयी थी किंतु उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर संगीत पर ढाई सौ से अधिक लेख लिखे जिनमें से बहुत सारे काका हाथरसी की संगीत कार्यालय से प्रकाशित पत्रिका संगीत में प्रकाशित हुये। संगीत अमृत महोत्सव में उन्हें संगीत मर्मज्ञ की उपाधि से विभूषित किया गया था। हरियाणा सरकार के 10 बड़े खंडों में विभक्त साहित्य हरियाणा इनसाइक्लोपीडियामें भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसके लिए न केवल उन्होंने लिखा, बल्कि वह एक खंड की परामर्श समिति के सदस्य भी रहे। उनकी सिने संगीतपुस्तक भी विशेष वर्ग में लोकप्रिय रही। इसमें सिने संगीत पर उनके गूढ़ शोध लेख शामिल हैं।

सभी धर्मों को मानने का दावा करने वाले वाहिद कजमी मानते थे कि मैं इतने धर्मस्थलों तक कैसे जा सकता था इसलिए मेरी कर्मभूमि ही मेरा धर्मस्थल रहा है। एक मुस्लिम परिवार में पैदा होकर भी वे नवाज पढने कभी मस्जिद नहीं गये। वे मेडिकल कालेज को अपनी देह दान कर गये थे किंतु कोरोना पाजटिव होकर ठीक हुये लोगों की देह मेडिक़ल कालेज स्वीकार नहीं करते इसलिए उनके मित्रों ने परम्परागत रूप से उनका अंतिम संस्कार कर दिया था।

उनके निधन की सूचना मुझे उनकी मृत्यु के चार महीने बाद अचानक अम्बाला के विकेश निझावन से बातचीत होने पर लगी। कोरोना काल में सूचनाओं का भी लाक डाउन रहा क्योंकि जब मैंने उनसे परिचित साहित्यकार राम मेश्राम और अनवारे इस्लाम से पूछा तो उन्हें भी इस खबर का पता नहीं था।

 

भविष्य में जब कोई उन पर शोध करेगा तब पता चलेगा कि हमने कोरोना काल में ना जाने  कितने लोगों को ऐसे ही खो जाने दिया था।

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

 

  

 

सोमवार, अगस्त 16, 2021

स्मरण नामवर सिंह - हमने फिराक को देखा है

 

स्मरण नामवर सिंह - हमने फिराक को देखा है

वीरेन्द्र जैन


फिराक गोरखपुरी ने कहा था

आने वाली नस्लें तुम पर फक्र रश्क करेंगी हमअस्रों

जब उनको ये मालूम होगा तुमने फिराक को देखा है  

हम लोग जिन्होंने नामवर सिंह को देखा है, वे भी ऐसे ही फक्र के हकदार होंगे। नामवर सिंह ने पूरे देश के कम से कम छह चक्कर लगाये थे व अमेरिका को छोड़ कर पूरी दुनिया में घूम चुके थे। ऐसा करते हुए वे देश और दुनिया के इतने सारे लोगों से मिले होंगे कि सब को याद रखना सम्भव नहीं, किंतु जिन लोगों से वे मिले होंगे उनके जीवन में वह क्षण इतिहास बन गया होगा और उन्हें याद होगा। आज जब नामवर सिंह दुनिया में 93 वर्ष बिता कर विदा हो चुके हैं तो अपनी ज़िन्दगी के उन ऎतिहासिक क्षणों की याद आना स्वाभाविक है जब हमने  “ फिराक को देखा था”।

हिन्दी साहित्य का पाठक और फिर छोटा मोटा लेखक हो जाने के बाद हजारों लेखकों के दिमाग में यह सपना रहा है कि काश उनकी किसी किताब पर नामवर सिंह की निगाह पड़ जाये और अगर कुछ लिख दें तो वह धन्य हो जाये। मेरे लिए तो यह सपना देखना भी दुर्लभ था। जब कहीं नामवर सिंह का लेख पढने को मिल जाता तो किसी धार्मिक पाठ की तरह जरूर पढता था। साहित्य की राजनीति की चर्चाओं में जब उन्हें अपनी राजनीति सोच के नेतृत्व में पाया तो एक आत्मीयता सी महसूस हुयी, दूसरी ओर अपनी सोच को भी ताकत सी मिलती दिखी। नामवर जी के दुश्मन मुझे अपने दुश्मन दिखने लगे। हाथरस में बागला कालेज के प्रोफेसर डा. रामकृपाल पांडे कभी जोधपुर विश्वविद्यालय में उनके वाइस चांसलर रहते नियुक्त हुये थे और राजनीतिक कारणों से हटाये गये थे। मैं 1976 में जब हाथरस में पदस्थ हुआ तो पांडे जी मेरे मित्र बने, व उनके बारे में बहुत सारी बातें बताया करते थे। मैनेजर पांडे जी भी उनके ही साथ थे और उनके साथ भी वही व्यवहार हुआ था।  

उनका पहला भाषण 1982 में जबलपुर में सुनने को मिला था। मैं पहली बार बैंक मैनेजर पोस्ट हुआ था व चार्ज लेने की प्रक्रिया में था, दूसरी ओर जिसे चार्ज देना था वह टाल रहा था। मुझे भी कोई जल्दी नहीं थी व इस प्रकार वेतन लेकर भी लगभग खाली बैठा था। अचानक ज्ञानरंजन जी का फोन आया कि नामवर जी का भाषण है और फलां फलां हाल में पाँच बजे पहुंचो। मैं लगभग कथा वार्ता सुनने वाले भक्त की तरह श्रद्धा भाव से पहुँच गया था। ज्ञान जी से पत्र व्यवहार तो पहले भी रहा था किंतु साथ ताजा था इसलिए मैं उम्मीद कर रहा था कि ज्ञानरंजन जी के सहारे नामवर जी से परिचय के साथ उन्हें प्रणाम का अवसर मिल जाये। किंतु पूरे भाषण के बाद भी ज्ञानरंजन जी नहीं दिखे। पूछने पर पता चला कि वे तो अपने घर पर होंगे। यह बात बाद में पता चली थी कि ज्ञान जी आम तौर पर नेपथ्य में रह कर ही काम करते हैं और मंच से बचते हैं। नामवर जी को सामने से सुनने का वह पहला अवसर था। बाद में 1986 में जब प्रगतिशील लेखक संघ का स्वर्ण जयंती समारोह का ऎतिहासिक आयोजन लखनऊ में हो रहा था तब मैं बैंक में इंस्पेक्टर था और उन दिनों लखनऊ की ही ब्रांच का आडिट कर रहा था, सो छुट्टी लेकर पूरा कार्यक्रम देखा था। तब कैफी आज़मी, शौकत आज़मी, नागार्जुन आदि अनेक साहित्य के सितारों के साथ लाइन में लग कर लंच लेने का गौरव महसूस किया था। तब तक मैं इस निष्कर्ष पर पहुँच चुका था कि किसी विशिष्ट व्यक्ति से तब तक मत मिलो जब तक कि ऐसा कोई कारण न हो कि वह तुम्हें याद रख सके। 1994 में जब मैं भोपाल पदस्थ हुआ तब नामवर जी समेत हिन्दी उर्दू साहित्य के सभी सितारों को बार बार सुनने का मौका मिलता रहा। मैंने आफिस से छुट्टी लेकर भी उन्हें सुनने का शौक पूरा किया है। राजेन्द्र यादव ने तो एक बार कहा था कि आप लोग तो नामवर जी को यहीं भोपाल में बसा लो ताकि उन्हें बार बार आने जाने की तकलीफ न उठाना पड़े। विभिन्न विश्व विद्यालयों, यूजीसी के कार्यक्रमों, साक्षात्कारों आदि के लिए उनका भोपाल ही नहीं देश भर में आना जाना लगा रहता था। हिन्दी साहित्य की उच्च शिक्षा के क्षेत्र में स्थान बनाने के लिए उनकी कृपादृष्टि जरूरी मानी जाती थी। कुछ लोग तो उन्हें हिन्दी साहित्य का डान भी कहने लगे थे।

शिवपुरी में कथाकार पुन्नी सिंह जी ने प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वाधान में ‘दलित कलम’ के नाम से एक आयोजन किया था जिसमें नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, मैनेजर पांडे, कमला प्रसाद. भगवत रावत के साथ साथ दलित साहित्य से जुड़े अनेक मराठी लेखक आमंत्रित थे। दतिया से डा. के. बी. एल. पान्डेय, राजनारायन बोहरे, कामता प्रसाद सड़ैया के साथ मैं भी पहुंचा था। इस अवसर पर उपस्थिति का लाभ लेने के लिए अनेक लोगों ने अपनी अपनी पुस्तकों का विमोचन करा लेना चाहा था। कुछ ही महीने पहले व्यंग्य कविताओं की मेरी एक पुस्तक छपी थी ‘देखन में छोटे लगें’ । मेरे एक मित्र ने उन्हीं दिनों नई प्रैस डाली थी और जिद करके मेरी किताब छापने के लिए चाही। मजबूरन मैंने पूर्व में धर्मयुग कादम्बिनी आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित व्यंग्य कविताएं, क्षणिकाएं आदि को समेट कर उन्हें दे दी थीं जिन्हें पुस्तक का रूप देने का उन्होंने पहला प्रयोग कर डाला था। उन दिनों मैं  जो अच्छा पढ रहा था उसे देखते हुए यह प्रयास बचकाना सा था किंतु राज नारायन बोहरे जी जो खुद भी प्रैस मालिक के मित्र थे ने कुछ पुस्तिकाएं साथ रख ली थीं। इस आयोजन के एक भाग में पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम भी रखा गया था और मुझे आश्चर्य में डालते हुए मेरी किताब भी उनमें शामिल थी। इसका विमोचन किन्हीं मराठी लेखक ने किया था जिनका नाम मैं अक्सर भूल जाता हूं। शाम को राजनारायन बोले कि नामवर जी बगैरह को किताब भेंट करने चलते हैं। मुझे ऐसा लगता था कि वह किताब मेरे [अपने अनुमानित] कद को घटायेगी इसलिए मैंने साफ मना कर दिया और कहा कि ऐसी किताब उन्हें देने का कोई मतलब नहीं, और देना हो तो तुम खुद ही दे देना। और वैसा ही हुआ।

एक बार जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तब एक सेमिनार में लगभग सभी वक्ताओं ने सरकार पर पाठ्यक्रमों के भगवाकरण का आरोप लगाया पर जब नामवर जी के बोलने का नम्बर आया तो वे बोले कि पाठ्यक्रम वे कुछ भी बदल लें पर उसे पढायेगा तो अध्यापक ही। यह उनके उस आत्मविश्वास की झलक देता था कि देश की उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जिस परीक्षण से गुजर कर नियुक्तियां हुयी हैं, वे प्रोफेसर पाठ्यक्रमों में बदलाव के बाद भी न्याय करेंगे। भोपाल आकर वे कहते थे कि कमला प्रसाद और भगवत रावत मेरी दो आँखें हैं। दोनों लोग ही सरकार की अकादिमियों में बड़े बड़े पदों पर रहे थे और समय समय पर उनसे मार्गदर्शन लेते रहते थे। पाठक मंच योजना से लेकर अन्य जो भी अच्छी योजनाएं मध्य प्रदेश में लागू हुयीं उन्होंने हिन्दी साहित्य को जनता के बीच बचाये रखने में बहुत मदद की। पुस्तकों के चयन और महत्वपूर्ण साहित्य के रचनाकारों को सम्मानित किये जाने में भोपाल ने जो बढत ली, उसमें नामवर जी के मार्गदर्शन और कमलाप्रसाद जी की कर्मठता का बड़ा योगदान रहा।   

मैं सदैव साहित्य के हाशिए के लोगों में रहा क्योंकि न तो विश्वविद्यालीन लोगों जैसा अकेडिमक था और ना ही किसी चर्चित कृति का रचनाकार था, पर पाठक ठीक ठाक रहा। कमलेश्वर और राजेन्द्र यादव जैसे लोगों का प्रशंसक व पाठक रहा। इसी तरह के अध्ययन के सहारे एक दो बार नामवर जी के विचार को काटने का दुस्साहस भी किया और उनकी नाराजी भी झेली। मैं ना तो किसी पद पर था और ना ही किसी पुरस्कार की दौड़ में था इसलिए निर्भय था। एक कार्यक्रम में दूधनाथ सिंह की कहानी  शायद ‘नमो अन्धकार:’ पर उन्होंने कुछ कहा जिससे मैं सहमत नहीं था। मैंने कोई सवाल पूछ लिया जो उन्हें नागवार गुजरा। उन्होंने किंचित आवेश में कहा कि दूधनाथ सिंह मेरे रिश्तेदार हैं किंतु आलोचना में रिश्तेदारी नहीं चलती।

ऐसे ही इलाहाबाद के सत्यप्रकाश जी द्वारा आयोजित किसी बड़े होटल में एक वर्कशाप था और मैं भी भागीदार था। इस कार्यक्रम में नामवरजी और दूधनाथ सिंह जी दोनों आमंत्रित थे। उन्हीं दिनों मेरी नई किताब आयी थी। जिन लोगों की भी पिछले दिनों चार छह लोगों की किताबें आयी थीं वे सभी दोनों लोगों को किताबें भेंट कर धन्य हो रहे थे किंतु मैं जानता था कि नामवर जी को तो उन किताबों के पन्ने पलटने का भी मौका नहीं मिलेगा किंतु दूधनाथ सिंह जी अवश्य एक बार मेरे व्यंग्य पाठ के कार्यक्रम में मेरे व्यंग्य की प्रशंसा कर चुके थे। नामवर जी कनखियों से देख रहे थे कि चलन के विपरीत मैंने उन्हें किताब न देकर केवल दूधनाथ सिंह जी को किताब दी थी। बाद में आपसी बातचीत में उन्होंने दूधनाथ सिंह जी पर व्यंग्य भी किया था कि अब तो तुम्हें किताबें भी मुझ से ज्यादा मिलने लगी हैं।

म.प्र. में सरकार बदल गयी थी और देश भर में सबसे अधिक सक्रिय प्रदेश की सांस्कृतिक नीति लगभग लकवाग्रस्त हो गयी थी। पूर्व मंत्री व अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह ने एक प्रतिरोध सभा आयोजित की थी जिसमें नामवर सिंह जी भी आमंत्रित थे। सारे लेखक एक स्वर से सरकार को कोस रहे थे और विरोध का आवाहन कर रहे थे। संचालक रामप्रकाश जो मुझे बोलने के लिए कहना भूल गये थे को अचानक याद आया तो कार्यक्रम के अध्यक्ष नामवर सिंह जी से ठीक पहले मुझ से बोलने के लिए कहा। मैंने धारा के विपरीत जाकर कहा कि हम लोग कितने पंगु हो गये हैं कि सांस्कृतिक नीति पर भी अपना विरोध दर्ज नहीं करा पाते और इस विरोध के लिए भी राजनेताओं [अजय सिंह] की पहल का मुँह देखते हैं। स्मरणीय है कि श्री कमला प्रसाद जी साहित्य के क्षेत्र में जो भी उल्लेखनीय कर सके हैं, उसमें अर्जुन सिंह और अजय सिंह जी का विशेष सहयोग रहा था। अजय सिंह जी मंत्री रहते हुये कमलाप्रसाद जी के सभी सुझाव मानते रहे। मेरे बोलने से वातावरण में कुछ तनाव सा पैदा हो गया था, जिसे महसूस करके नामवर सिंह जी ने अपने प्रभावी वक्तव्य से दूर किया।

नईम जी की पहली पुण्यतिथि देवास में मनायी गयी थी जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में नामवरजी को आमंत्रित किया गया था। आयोजकों में मेरे मित्र श्री राम मेश्राम विशेष प्रेरक की भूमिका में उपस्थित थे और उनके साथ मैं भी अपने प्रिय कवि को श्रद्धा सुमन अर्पित करने गया था। तब उनके साथ दोपहर का भोजन करने और कुछ बातचीत का भी मौका मिला था किंतु ना ही उनकी आँखों में कोई पहचान उभरी थी और ना ही मैं ने अपने परिचय का कोई प्रयास किया।

स्मृतियां बहुत छोटी छोटी हैं और सार्वजनिक रूप से इनका कोई महत्व भी नहीं है, किंतु मुझे याद हैं क्योंकि नामवर जी का कद बहुत बड़ा रहा है, इसलिए क्षमा याचना के साथ वही पंक्ति दुहराते हुए दर्ज कर रहा हूं कि मैंने फिराक को देखा है।

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

 

       

 

सोमवार, जून 28, 2021

धर्मवीर भारती – संस्मरण धर्मवीर भारती- साहित्य के कुम्भकार थे

 

धर्मवीर भारती – संस्मरण

धर्मवीर भारती- साहित्य के कुम्भकार थे

वीरेन्द्र जैन

[ आज एक व्हाट’स एप्प ग्रुप ‘व्यंग्यकार’ में शरदजोशी का एक भाषण सुना जो उन्होंने धर्मवीर भारती के सम्मान में आयोजित एक समारोह में दिया था। इससे मुझे लगभग 25 वर्ष पहले लिखा अपना एक लेख याद आ गया जो ‘हैदराबाद समाचार’ [नया नाम दक्षिण् समाचार] में 15 अक्टूबर 1997 में प्रकाशित हुआ था। मैं तो इसे भूल ही गया था किंतु बेहद प्रतिभाशाली लेखक स्वामी वाहिद काज़मी [ अम्बाला] ने 2004 में याद दिला कर इसे मांग लिया था जिससे मुझे यह आत्म संतोष मिला था कि लिखा हुआ कहीं न कहीं दर्ज होता है। पता नहीं वाहिद काज़मी अब कहाँ हैं, लगभग एक दशक से उनसे सम्पर्क नहीं हुआ। वे फोन का स्तेमाल नहीं करते थे और पत्रों का उत्तर भी नहीं दे रहे। किसी को पता हो तो सूचना देने की कृपा करें। ]

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जब भारतीजी धर्मयुग के सम्पादक थे, उस दौरान मुझसे कई बार किशोरों ने पूछा था कि क्या इस पत्रिका का नाम इसीलिए ‘धर्मयुग’ है, क्योंकि इसके सम्पादक धर्मवीर भरती हैं। हर बार मेरा उत्तर नकार में होता था, पर हर बार ऐसा लगता था कि मेरे नकार में ज्यादा दम नहीं है। भले ही तथ्य के रूप में मेरी बात सही हो, पर ‘धर्मयुग’ ने भारतीजी के कार्यकाल से भारतीजी के कार्यकाल तक ही अपने को शिखर पर बनाये रखा और उनके जाने के बाद उसका क्रमशः उतार प्रारम्भ हुआ, जो उसे बन्द होने तक ले गया।

सन 1972 के होली अंक के लिए नये रचनाकारों से रचनाएं आमंत्रित की गयीं थीं और कुल प्रप्त लगभग 3100 रचनाओं में से धर्मयुग ने चौदह-पन्द्रह रचनाओं का चुनाव किया था। इन रचनाकारों में सूर्यबाला, प्रभु जोशी, सुरेश नीरव, आदि के साथ मेरा भी नाम सम्मलित था। [ तब मेरा नाम पूरा था अर्थात वीरेन्द्र कुमार जैन ] मेरी व्यंग्य रचना के चुनाव के बाद ही धर्मयुग ने इति नहीं कर दी, अपितु पत्र भेज भेज कर रचनाएं आमंत्रित कीं, ये पत्र मुझ जैसे नये रचनाकार के लिए किसी पुरस्कार से कम महत्व के नहीं थे। इसलिए मैंने भी अपना सम्पूर्ण श्रम और प्रतिभा का स्तेमाल करते हुए धर्मयुग की अपेक्षाओं को पूरा करने का प्रयास किया व मेरी रचनाएं उसी गर्मजोशी के साथ प्रकाशित भी हुईं। संयोग से मेरे हमनाम वरिष्ठ साहित्यकार श्री वीरेन्द्र कुमार जैन को ऐसा लगा कि हास्य-व्यंग्य हल्के स्तर की रचनाएं हैं और समकालीन साहित्यकारों को यह गलतफहमी हो सकती है कि वे हास्य-व्यंग भी लिखने लगे हैं। वे वरिष्ठ और आदरणीय थे और भारतीजी से पहले उनका नाम भी धर्मयुग सम्पादक के रूप में प्रस्तावित था। उनके इस प्रस्ताव का भारतीजी को भी बुरा लगा कि मेरे नाम की रचनाओं का प्रकाशन बंद कर दिया जाए। उन्होंने विनम्रता पूर्वक कहा कि मैं इस नाम का प्रकाशन बन्द कर दूंगा पर आप मुझे विश्वास दिला दीजिए कि उसके बाद कोई व्यक्ति वीरेन्द्र कुमार जैन नाम नहीं रखेगा, और रखेगा तो लिखेगा नहीं। और फिर मैं धर्मयुग में ही तो रोक सकूंगा पर आप कौन कौन सी पत्रिकाओं को रोक सकेंगे।

वे निरुत्तर होकर चले गये पर उन्होंने अपने प्रयासों में कमी नहीं आने दी। उन दिनों वे महावीर स्वामी पर अपना उपन्यास ‘अनुत्तर योगी’  लिख रहे थे और धर्मयुग आदि के मालिकों में से एक श्री श्रेयांस प्रसाद जैन को अपना लिखा हुआ सुनाने जाते थे क्योंकि श्रेयांस प्रसाद जी ने उन दिनों आँखों का आपरेशन कराया हुआ था और वे कुछ पढ नहीं पाते थे। इस स्थिति का लाभ लेते हुए जब उन्होंने दबाव बनाया तो भारतीजी को कहना पड़ा कि मैं इसे रोकूंगा तो नहीं पर इसके नाम में कुछ परिवर्तन का प्रयास करूंगा। भारती जी के सुझाव अनुसार मेरे नाम के साथ मेरे नगर का नाम भी धर्मयुग में लिखा जाने लगा। यह प्रयोग धर्मयुग के लिए सर्वथा नया था। इससे मेरी भी पूरे देश में एक अलग पहचान बन गयी थी।

‘धर्मयुग’ भले ही साहित्य-प्रधान पत्रिका रही हो पर वह मध्यमवर्गीय हिन्दी भाषी परिवारों की इकलौती साप्ताहिक पत्रिका का दर्जा पा सकी जिसकी पाँच लाख प्रतियां तक प्रकाशित हुईं।  उसमें समकालीन राजनैतिक, सामाजिक घटनाओं से लेकर महिलाओं, बच्चों, फिल्मों आदि सभी के बारे में इतनी संतुलित और विश्वसनीय सामग्री प्रकाशित होती थी कि आज अनेक लोगों के पास उनके कई वर्षों के अंक संकलित हैं।

हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास में चमकने वाले अनेकानेक सम्पादक धर्मयुग से ही निकले हैं। इनमें सुरेन्द्र प्रताप सिंह, राजकिशोर, योगेन्द्र कुमार लल्ला, हरिवंश, सुदीप. शीला झुनझुनवाला, कन्हैयालाल नन्दन, आदि अनगिनित नाम हैं और रचनाकारों का तो कोई अंत ही नहीं है।

भारतीजी का अनुशासन बहुत कठोर था। वे किसी से भी ‘धर्मयुग’ कार्यालय में नियत समय के अलावा नहीं मिलते थे और अपने स्टाफ से भे याही अपेक्षा रखते थे। रचनाओं का अंतिम चुनाव वे स्वयं  करते थे और प्रतिभा को पूरा महत्व देते थे। साहित्य की राजनीति वे इतने खूबसूरत तरीके से करते थे कि उनके ऊपर सीधे सीधे कोई उंगली नहीं उठ सकती थी। यहाँ तक कि वे सम्पादकीय भी नहीं लिखते थे।

साहित्य के लिए पूरा जीवन समर्पित कर देने वाले व प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने के लिए वे सदैव याद किये जायेंगे।

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[शरद जोशी का भाषण सुनते समय उक्त लेख में अप्रकाशित रह गई एक घटना याद आयी। 1975 में मैं कुछ दिनों के लिए मुम्बई में था और एक दिन धर्मयुग कार्यालय में गया तो सरल जी आदि से मिल कर जब आने लगा तो पाठक जी जो कार्यालय का प्रबन्धन देखते थे, ने कहा कि भारती जी से मिल कर जाना, उन्होंने पिछले दिनों तुम्हें पत्र लिखवाया था शायद मिला नहीं होगा। भारती जी एक बजे से पहले किसी से नहीं मिलते थे और मिलने वालों में एक महिला भी प्रतीक्षा रत थीं जो मुझ से पहले से बैठी थीं। भारती जी ने पहले मुझे बुलवा लिया तो वे बाहर स्टाफ से असंतोष के साथ पूछने लगीं कि ये कौन थे और इन्हें क्यों बुलवा लिया। जब लगभग 15 मिनिट बाद में बाहर आया तब उनका नम्बर आया। बाहर मुझे बताया गया कि वे उभरती हुयी फिल्मी कलाकार सविता बजाज थीं जो सहयोगी भूमिकाओं के साथ साथ धर्मयुग में फिल्मों पर लिखती भी थीं। उस दिन भारती जी ने नाम परिवर्तन के बारे में तो विस्तार से बताया ही था, साथ में याद किया कि उनके एक मित्र श्री बाबूलाल गोस्वामी दतिया में वे कैसे हैं? मैंने जब गोस्वामी जी को पत्र लिख कर बताया तो उनका भारती जी से सम्वाद स्थापित हुआ व उन्होंने एक खोजपूर्ण ऐतिहासिक लेख उनसे लिखवाकर धर्मयुग में प्रकाशित किया था। ]

रविवार, जून 27, 2021

कबीर जयंती पर कुछ औघड़ विचार

 

कबीर जयंती पर कुछ औघड़ विचार

वीरेन्द्र जैन




महीनों हो गये, कुछ भी नहीं लिखा। कविता जैसा जो कभी कुछ लिखता था उसे छोड़े तो वर्षों हो गये। लगता है कि अब बहुत लोग लिख रहे हैं, और अच्छा लिख रहे हैं। वे अखबारों में प्रकाशित भी हो रहे हैं, उनकी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं, समीक्षाएं भी आ रही हैं. गोष्ठियां विमोचन आदि के प्रमोशन कार्यक्रम भी चल रहे हैं। कई पुस्तकों को तो बिना जुगाड़ जमाये पुरस्कार भी घोषित हो रहे हैं. मिल भी रहे हैं। जब इतने सब के बाद भी समाज में कोई हलचल नहीं हो रही तो लगने लगा कि क्यों दूसरों के प्रतियोगी बनें! जिन्हें इस माध्यम से कुछ उम्मीदें हैं, उनके लिए जगह छोड़ दें। इसी बीच कोरोना आ गया मेल मुलाकातें बन्द हो गयीं। ‘मौखिक प्रकाशन’ तक बन्द हो गया और सारा जोर सोशल मीडिया पर आ गया। मैं भी फेसबुक पर अपनी भड़ास निकालने लगा। इसमें भी कुछ लोग विधा तलाशने लगे तो कुछ विषय वस्तु पर नाक भों सिकोड़ने लगे। लोग इतने परम्पारावादी हैं कि अभिव्यक्ति के किसी भिन्न स्वरूप को सहन ही नहीं करना चाह्ते। उन्हें वही मात्रिक छन्द या रामकथा जैसी कहानियों के आसपास ही सब कुछ होते दिखना चाहिए। गिंसवर्गों को पेंट की जिप खोलना पड़ती है। हलचलें उससे भी नहीं होतीं।

कबीर, नानक, दयानन्द सरस्वती. विवेकानन्द, गायत्री परिवार समेत महाराष्ट्र के सुधारवादी संत सहित गांधी और कम्युनिष्ट भी सामाजिक जड़ता नहीं तोड़ सके। शायर को कहना पड़ा कि ‘ गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं,’  या ‘पुकारने की हदों तक तो हम पुकार आये ‘ । प्रतीक्षा बनी रही कि माटी का वह दिन कब आयेगा जब वह कुम्हार को रूंदेगी! इस आशावाद से ऊब होने लगी। इसके उलट वैज्ञानिक उपलब्धियों का दुरुपयोग यथास्थितिवाद को मजबूत करने वाली शक्तियां करने लगीं। तर्क के स्तेमाल सत्य के अन्वेषण के लिए नहीं अपितु अभियुक्त के वकील की तरह होने लगे। राही मासूम रजा की वह नज़्म बार बार याद आती है – लगता है बेकार गये हम।   

यह अकेली मेरी तकलीफ नहीं है अपितु जिसने भी सामाजिक परिवर्तन के सपने देखे थे वे सभी बेचैन हैं। कबीर अपने समय की सबसे बेचैन आत्मा रहे होंगे। इसीलिए वे हाथ में लाठी लेकर बाज़ार में निकल पड़े होंगे और पाखंडी अनुयायियों से कहने को विवश हुए होंगे कि जिसमें अपना घर जला देने का साहस हो वही मेरे साथ आये। वे रूढवादियों से तू तड़ाक की भाषा में बात करने लगते हैं और कहते हैं कि –

तू बामन बमनी का जाया, आन द्वार से क्यों न आया

तू तुर्की तुर्किन का जाया,  भीतर खतना क्यों ना कराया

मूढ मुढाये हरि मिले तो सब कोई ले मुढाय, बार बार के मूढते, भेड़ ना बैकुंठ जाय

कर का मनका छांड़ के, मन का मनका फेर

मन ना रंगायो, रंगायो जोगी कपड़ा

दुनिया ऐसी बावरी पाथर पूजन जाय, घर की चाकी क्यों ना पूजै जिसका पीसा खाय

कांकर पाथर जोड़ के मस्ज़िद लयी बनाय, ता पर मुल्ला बांग दे, क्या बैरा भया खुदाय

तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखन की देखी

वे स्वर्ग भेजने वाली काशी में नहीं मगहर में मरना चाहते हैं, जहाँ के बारे में मान्यता है कि वहाँ मरने वाले नर्क में जाते हैं और तथाकथित ईश्वर को चुनौती देते हुए कहते हैं कि

‘जो कबिरा काशी मरे, तू को कौन निहोर’

वे एक साथ हिन्दू मुसलमान दोनों को चुनौती देते हुए कहते हैं-

साधो. देखो जग बौराना

हिन्दू कहे मोय राम पियारा, तुरक कहे रहिमाना

आपस में दुई लड़े मरत हैं मरम ना कोई जाना

साधो देखो जग बौराना

कबीर अपने समय की व्यवस्था को जो खुली चुनौती देते हुए अपने बिना लिखे शब्दों को जन जन की जुबान तक पहुंचा देते हैं जो लिखने छपने की स्थिति आने तक सैकड़ों साल लोगों को याद रहते हैं और पीढियों तक सम्प्रेषित होती रहते हैं। कविता की ताकत उसके मुहावरे में बदल जाने से ही पता चलती है।

यही कारण रहा कि अपने समय की सत्ता की व्यवस्था को चुनौती देने में उनके समतुल्य हरिशंकर परसाई ने विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में जो स्तम्भ लिखे उनके शीर्षक कबीर और गालिब की पंक्तियों को ही बनाये।  

कबीर की कविता जन मानस में गहरी खुबी हुई है, पर जरूरत है उसे आचरण में उतारने की। आज खुद को कबीरपंथी कहनेवाले भी कबीर की दुकानें खोल के बैठे हैं, कोई सत्य के पक्ष में लुकाठी लेकर बीच बाजार में खड़ा नहीं होता।

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

 

  

सोमवार, जून 07, 2021

श्रद्धांजलि व संस्मरण नरेन्द्र कोहली,

 

श्रद्धांजलि व संस्मरण

नरेन्द्र कोहली, और कम्प्यूटर की प्रेरणा 

वीरेन्द्र जैन

आजकल मैं इतना कम्प्यूटर निर्भर हो गया हूं कि पिछले दिनों हाथ से एक आवेदन लिखना पड़ा तो मैं अपनी खराब हस्तलिपि पर व्यथित हुआ, कि इतनी खराब लिपि तो मेरी तब भी नहीं थी जब मैंने लिखना सीखा था। यूनीकोड में लिखते रहने के कारण साधरण अंग्रेजी शब्दों की स्पेलिंग में भी भूल हो जाती है। मित्र और रिश्तेदार मुझे कम्प्यूटर एडिक्ट मानने लगे हैं जिस बीमारी को कोरोना लाक डाउन और कुछ अखबारों के बन्द हो जाने ने और बढा दिया है।

आज श्री नरेन्द्र कोहली के निधन का समाचार सुन कर याद आया कि इसका संक्रमण मुझे उन्हीं से मिला था।

1995 में लखनऊ में अट्टहास का कार्यक्रम था और उस कार्यक्रम में मैं आमंत्रित था। उस वर्ष का अट्टहास सम्मान श्री नरेन्द्र कोहली जी को मिलना था जिनसे प्रत्यक्ष मुलाकात पहली बार हुयी। लखनऊ के नरही स्थित सरकारी गैस्ट हाउस में सबको ठहराया गया था और मुलायम सिंह सरकार के द्वारा  सबको स्टेट गैस्ट का दर्जा मिला हुआ था, वे ही मुख्य अतिथि के रूप में आये थे। इस आयोजन में प्रेम जनमेजय, हरीश नवल, प्रदीप चौबे, आदि अनेक पूर्व परिचित मित्र थे, जिनमें से हरीश और प्रेम तो उनके छात्र रहे होने के कारण बकायदा उन्हें गुरू का दर्जा देते आये हैं। मैंने भी सोचा कि नये परिचय से ज्यादा और नई जानकारियां हासिल करना चाहिए इसलिए दूसरे मित्रों के घूमने चले जाने के बाद भी मैंने कोहली जी के साथ बैठना उचित समझा।

मैं अपनी पूरी नौकरी के दौरान इस बात का अवसर तलाशता रहा कि किसी तरह मुझे इससे मुक्ति मिले और अगर न्यूनतम जीने की सुविधाएं सुनिश्चित हो जायें तो मुक्त लेखन कर सकूं। इस प्रयास में तीन बार बैं की नौकरी छोड़ने के उप्क्रम किये किंतु वापिस बुला लिया गया। आज सोचता हूं कि जाने किस कारण से ये भूल सफल होने से बच गयी बरना आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब होती। कोहली जी ने उस मुलाकात के दौरान बताया था कि उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय की नौकरी छोड़ दी है और इन दिनों पूर्णकालिक लेखन कर रहे हैं। इसके साथ उन्होंने यह भी बताया था कि पत्नी अभी सेवा में हैं, और बच्चे शायद विदेश में हैं। इसके साथ ही सदा की तरह उन्होंने यह भी जोड़ा था कि वे हिन्दी के सर्वाधिक रायल्टी पाने वाले लेखक हैं। मैं जिस आदर्श को जीने के सपने देखता रहा था वह नमूने के तौर पर सामने बैठा था। यद्यपि बाद में मुझे उनके सुरक्षित जीवन और अपने बीच अंतर समझ में आया था किंतु उस समय तो मैं अभिभूत था। उन्होंने कहा था कि मैं लम्बे समय तक [शायद महीनों] अपने कमरे से बाहर नहीं निकलता और अपने कम्प्यूटर पर जो भी लिखता हूं उसे वहीं से पत्र पत्रिका या प्रकाशक तक भेज देता हूं। उन दिनों ई मेल का प्रयोग नहीं चला था सो उनके कथनानुसार वे फैक्स का उपयोग करते थे।

मैंने उसी दिन सोच लिया था कि मैं भी जब खुद को नौकरी से मुक्त कर सकूंगा तो पहला काम कम्प्यूटर खरीदने का ही करूंगा। उन दिनों कम्प्यूटर बहुत मंहगे थे और मैंने बिना पेंशन के विकल्प के नौकरी छोड़ दी थी इसलिए अपना सपना पूरा करने में छह साल और लग गये। बाद में जब मैंने कम्प्यूटर हासिल किया तो वो अब तक साथ साथ है भले ही मैं रायल्टी में कुछ भी नहीं कमा सका और मुफ्त सेवा करता रहा,  किंतु विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लगभग दो हजार से अधिक लेख और अन्य रचनाएं लिखीं, वेब पत्रिकाओं में लिखने वाले उन दिनों कम लोग थे इसलिए देश विदेश की वेब पत्रिकाओं में अपना नया पुराना लेखन भेजता रहता था और वह कुछ ही मिनिटों में सामने दिख जाता था जिसे देख कर खुशी मिलती थी। फिर अपने ब्लाग बनाये तथा फेसबुक आने पर उससे जुड़ा जिससे सम्पादन मुक्त अभिव्यक्ति का अवसर मिलने के कारण मुक्ति का अहसास मिला। उन दिनों सोशल मीडिया पर बहुत कम लेखक थे इसलिए रात रात भर लम्बी लम्बी बहसें भी चलीं।

बहरहाल सच यह है कि खुशी देने वाली मेरी कम्प्यूटर की आदत के बीज नरेन्द्र कोहली जी ने ही बोये थे, भले ही उनके लेखन पर कई बार मैंने कठोर टिप्पणियां भी की थीं।

उनकी प्रेरणा पर आभार व्यक्त करते हुये उनकी स्मृति को विनम्रतम श्रद्धांजलि।       

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

मो. 9425674629

 

संस्मरण / श्रद्धांजलि विजेन्द्र

 

संस्मरण / श्रद्धांजलि

विजेन्द्र जी के साथ खट्टे मीठे अनुभव रहे


वीरेन्द्र जैन

मैं पहले हिन्दुस्तान कमर्सियल बैंक में नौकरी करता था जो एक छोटा बैंक था और उसमें अधिकारियों के स्थानांतरण पूरे देश में कहीं भी हो सकते थे। साफ साफ कह्ने के कारण मेरे पांच राज्यों में पन्द्रह स्थानांतरण हुये पर कभी कोई विभागीय दण्ड नहीं मिला। इन्हीं स्थानांतर्णों में से ही एक भरतपुर [राजस्थान] भी था। और वह वर्ष थे 1977 से 1979 के बीच।

उन दिनों मैं वामपंथियों का इकलौता दैनिक अखबार ‘जनयुग’ मंगाता था जिसकी कुछ ही प्रतियां आती थीं। याद नहीं किसके साथ वे अचानक मेरे निवास पर पधारे और घर में जनयुग को देख कर बहुत खुश हुये। उस दौरान मैं अकेला ही रहता था और कम्युनिष्टों की तरह बेतरतीब सा रहन सहन था। मकान मालिक की कृपा से निवास जरूर नया और आधुनिक सा था जिस में मेरा फोल्डिंग फर्नीचर और चारपाई उस बेतरतीबी को और बढा देते थे। फिर उनसे मुलाकातों का दौर जारी रहा।

उसी दौरान आगरा में प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन में कमलेश्वर को बुलाने के नाम पर फूट पड़ चुकी थी और नये संगठन की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी जो बाद में 1982 में जनवादी लेखक संघ के रूप में प्रकट हुयी। भरतपुर में भी अलग संगठन का समर्थन करने वाले अनेक साथी थे जिनमें मेरे निकट कामरेड रामबाबू शुक्ल, अशोक सक्सेना, आदि थे। रामबाबू जी जिन्हें हम लोग मास्साब कहते थे, ने ही वहीं मुझे अनौपचारिक मार्क्सवाद का पाठ पढाया था और सव्यसाची जी से मिलवाया था। इन लोगों की विजेन्द्र जी से तीखी तकरार चलती थी। इनके बीच में मैं सिकुड़ने की कोशिश करता था। इसी दौरान कुछ घटनाएं भी हुयीं। विजेन्द्र जी की कविता धर्मयुग में छपने वाली थी जिसकी सूचना उसके पिछले अंक में ही आ जाती थी। जाने क्या संयोग हुआ कि उक्त अंक का बंडल ही भरतपुर नहीं पहुंच सका और वह अंक रास्ते या स्टेशन से ही गायब हो गया। किसी कवि का दर्द आप समझ सकते हैं। जिस कालेज में विजेन्द्र जी थी उसी में प्रसिद्ध कहानी लेखक पानू खोलिया भी रहते थे जो प्रगतिशीलों के विरोधी थे, शैलेश मटियानी के मित्र थे। अशोक सक्सेना उनके निर्देशन में शोध कर रहे थे, जो पूरा नहीं हो सका। पानू खोलिया जी ने कम लिखा लेकिन वे स्तरीय कथाकार थे। इसी दौरान विजेन्द्र जी किसी कार्यक्रम में भोपाल आये थे और लौट कर बहुत मुदित मन से बताया था कि मैं तुम्हारे मध्य प्रदेश गया था और भोपाल में एक बेहद प्रतिभाशाली युवा से मिल कर आया हूं। वह बहुत अच्छी कविताएं लिखता है। वह युवा राजेश जोशी थे। मैंने तब तक उनका नाम नहीं सुना था और ना ही कविताओं से परिचय हुआ था।

धर्मयुग में मेरी व्यंग्य कविताएं तो छपती रहती थीं किंतु उन्हीं दिनों मेरा पहला व्यंग्य लेख छपा और उसका कुछ हिस्सा ऐसा लगता था जैसे विजेन्द्र जी पर केन्द्रित हो। जब 1984 में मेरी पहली किताब छपने को जाने लगी तो सलाह के लिए उसे मित्र प्रमोद पांडेय [कमला प्रसाद जी के भाई] छतरपुर, को दिखाया तो उन्होंने बाकी के व्यंग्यों की तारीफ करते हुए, उसे कमजोर बताया तो मैंने उसे हटा दिया।

1978 के अंत में मेरा भरतपुर छूट गया और उसके साहित्यिक रिश्ते भी छूट गये। कभी कभी जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय सम्मेलनों में साथी मिलते तो पुरानी यादों पर चर्चा कर लेते। 2001 मैं स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति लेने के बाद मैंने एक पत्रिका प्रदर्शनी लगायी तो उसके लिये जब सूची खोजी तो उसमें ‘कृति’ सम्पादक विजेन्द्र का नाम आया। मैंने तुरंत अपनी याद दिलाते हुए कृति के कुछ पुराने अंक भेजने के लिए लिखा। उत्तर में उन्होंने बमुश्किल याद करते हुए लिखा कि पहले पत्रिका का मूल्य भेजें जो शायद कुल 20/- रुपये रहा होगा। यह अपरिचय व दूरी मुझे नहीं भायी और मैंने उत्तर नहीं दिया। दो एक वर्ष पहले वे फेसबुक पर जुड़े और मार्क्सवादी सौन्दर्य शास्त्र पर कुछ सारगर्भित टिप्पणियां भेजीं, जिन्हें मैंने शेयर किया। फिर वे आनी बन्द हो गयीं।

आज किन्हीं रेवती रमन ने उनके निधन का समाचार देने की उतावली में मेरे निधन की सूचना जारी कर दी किंतु फोटो उन्हीं का लगाया हुआ था इसलिए औपचारिक रूप से मरने से बच गया।

उनकी स्मृतियों को प्रणाम करते हुए, विनम्र श्रद्धांजलि।

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

     

संस्मरण / श्रद्धांजलि प्रभु जोशी

 

संस्मरण / श्रद्धांजलि



प्रभु जोशी लेखक, चिंतक, कथाकार, चित्रकार ही नहीं व्यंग्यकार भी थे।

वीरेन्द्र जैन

अंजनी चौहान, ज्ञान चतुर्वेदी और प्रभु जोशी की मित्रता जग जाहिर है, और बहुत कुछ बातें ज्ञान चतुर्वेदी द्वारा अंजनी चौहान पर लिखे संस्मरणों में आ चुकी हैं। ये लोग तीन जिस्म और एक जान की तरह थे। अंजनी तो निशिदिन व्यंग्य में ही जीते रहे भले  ही एक अर्से बाद उन्होंने कागज पर व्यंग्य लेख लिखना और छपवाना छोड़ दिया हो किंतु उनकी बातचीत में वह हमेशा ही बना रहता है।

प्रभु जोशी ने अपने लेखों में अंग्रेजी शब्दों के स्तेमाल के बिना समकालीन विषयो, राजनीति, अर्थनीति आदि पर जो लेख लिखे, वे हिन्दी के शिखरतम पत्रकारों के लिए चुनौती बन कर सामने आये कि हिन्दी शब्दावली में भी अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर लिखने की शब्द सामर्थ्य मौजूद है।

इस विषय पर फिर कभी बाद में यहाँ में याद कर रहा था कि प्रभु की आपस की बातचीत में भी व्यंग्य का वही तेवर मौजूद रहता था जो अंजनी और ज्ञान में है। नमूने के लिए मैं 23 जुलाई 1975 मुझे लिखा वह पहला पत्र प्रस्तुत कर रहा हूं जिससे उनकी व्यंग्यमयी दृष्टि और अभिव्यक्ति का पता चलता है। उल्लेखनीय है तब मैं उ.प्र. के हरदोई जिले के बेनीगंज में पदस्थ था।
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                                               5, महाकवि कालिदास मार्ग

                                                       देवास45501

प्रिय भाई,

आपका पत्र मिला। आपसे अपरिचित नहीं हूं। कविताएं व लतीफे पढे हैं।खूब पसन्द आये हैं। बम्बई गया था। पता चला था। वीरेन्द्र कुमार जैन भारती जी से शिकायत कर रहे थे। आप इस नाम को रोको या बदलवाओ। उसी दिन पता चला कि यह वीरेन्द्र कुमार जैन बूढा नहीं, जवान आदमी है।
खत पाकर खुशी ही हुई है। तिस पर म.प्र. के आदमी हो। यह जांनकर और इजाफा हो गया।

मैं देवास जिले के ही एक दूरस्थ गाँव का गंवई हूं। बचपन से इधर ही पढाई हूं। और सम्प्रति धार में सरकार ने हैड मास्टर बना दिया है। जहाँ कुल जमा आठ दिन नौकरी की। बाकी लम्बी छुट्टी लेकर लेखन करता हूं। शिक्षा के नाम पर B.Sc. की डिग्री है।

माँ बाप तीन भाई एक बहन का कुनबा है। जो यहीं किराये के मकान में पल रहा है। एक भाई बड़े, दो छोटे हैं। पिता रिटायर्ड मास्टर हैं।

इस कुनबे में बढोत्तरी में भाभी उनके दो बच्चे और छोटे की बीबी भी शामिल है। स्मरण रहे मैं कुँवारा हूं और कुंवारा बने रहना चाहता हूं। वैसे हुस्न गड़बड़ नहीं है अपना। बाकी फिर कभी। विस्तृत ब्योरा गंगा के पण्डों के पोथों में मिलेगा।

और कुछ?

अपने विषय में लिखना।

आपका

प्रभु जोशी

23 जुलाई 75

वीरेन्द्र कुमार जैन [जवान]

हिन्दुस्तान कमर्सियल बैंक

बेनीगंज

जिला हरदोई - उ.प्र.]

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 वैसे तो हम लोग पहले पत्रों में और पत्र व्यवहार प्रथा का अंत होने के बाद आयोजनों में ही लम्बे अंतराल के बाद मिलते रहे, किंतु जब भी मिलते वे उसी ऊष्मा के साथ मिलते थे। कोरोना काल में मेरे ही नहीं सबके सम्बल टूटते जा रहे हैं। प्रभु जी के निधन के बाद निःसहायता और गहरी हो गई है।

श्रद्धांजलि के अलावा देने के लिए कुछ भी नहीं बाकी बचा। 

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

मो. 9425674629