शनिवार, अगस्त 17, 2019

कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना - यह राजनीति है या कूटनीति


कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना - यह राजनीति है या कूटनीति
वीरेन्द्र जैन

रामकथा का कथानक ऐसा कथानक है जिस पर लगभग तीन सौ रचनाएं लिखी गयी हैं जो सभी अनूठी हैं। यही कारण है कि राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त जिन्होंने खड़ी बोली में इस कथानक पर महाकाव्य रचा, कहते हैं –
राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है
कोई कवि बन जाय, सरल सम्भाव्य है
इस कथानक पर रची गयी सभी रचनाओं में एक बात साझा है कि रावण ने जब सीता का अपहरण किया था, तब वह साधु का भेष धर कर आया था। हमारे देश में पिछले दिनों घटित राजनीतिक घटनाओं में यह प्रवृत्ति निरंतर देखी जा रही है।
इसकी शुरुआत तो श्रीमती इन्दिरा गाँधी के सत्ता संघर्ष के दौर से हो गयी थी जिन्होंने अपनी ही पार्टी के एक गुट को परास्त करने के लिए खुद को समाजवाद की अग्रदूत बताना शुरू कर दिया था व कम्युनिष्टों से समर्थन पाने के लिए राष्ट्रपति पद पर उनके उम्मीदवार का समर्थन कर दिया था, बैंक व बीमा कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था तथा पूर्व राजा महाराजाओं के प्रिवीपर्स व विशेष अधिकारों को समाप्त कर दिया था। अपनी छवि बनाने के लिए उन्होंने एक कम्युनिष्ट पार्टी [सीपीआई] के साथ भी गठबन्धन कर लिया था। समाजवादी होने की छवि का भ्रम काफी समय तक बना रहा था, जब तक कि इमरजैंसी में संजय गाँधी ने काँग्रेस के असली चरित्र को प्रकट नहीं कर दिया था। बाद में सीपीआई को समझ आयी थी और 1978 के पंजाब अधिवेशन में उन्होंने अपनी भूल स्वीकारी थी और कुछ वरिष्ठ नेताओं को पार्टी से निकाला था जिनमें वरिष्ठ कम्युनिष्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे भी थे।
तत्कालीन जनसंघ जो बाद में भारतीय जनता पार्टी के रूप में उभरी वह देश के उत्तर-पश्चिमी भाग में कांग्रेस की सबसे बड़ी प्रतिद्वन्दी रही। संविद शासन के प्रयोगों में वह इकलौती संगठित पार्टी के रूप में उभरी क्योंकि उसके पीछे आरएसएस का मजबूत संगठन था। यही कारण रहा कि उसने कम्युनिष्ट पार्टी को छोड़ कर शेष सारे राजनीतिक दलों में सेंध लगा ली। समाजवादियों के दसियों दल धीरे धीरे उसमें समाते गये या निर्मूल होते गये।
भाजपा [ तब जनसंघ ] ने सबसे पहला भ्रम जनता पार्टी के गठन के समय जनता में पैदा किया और अपनी पार्टी को जनता पार्टी में विलीन कर दिया पर वे उसके सीमित कार्यकाल में भी गुपचुप रूप से अलग गुट बने रहे। जब उनके इस अलगाव की पहचान हो गयी तब उन्हें जनता पार्टी छोड़ना पड़ी और इसी कारण से पहली गैर कांग्रेसी सरकार का पतन हुआ। इसके कुछ समय बाद ही उन्होंने भारतीय जनसंघ से भारतीय लेकर और जनता पार्टी जोड़ कर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। श्रीमती इन्दिरा गाँधी के समाजवाद का प्रभाव वे देख चुके थे इसलिए उन्होंने अपने घोषणा पत्र में अपने समाजवाद विरोधी चेहरे पर गांधीवादी समाजवाद का मुखौटा लगा लिया। यह मुखौटा फिट नहीं बैठा इसलिए इसे जल्दी ही उतारना पड़ा।
पंजाब में खालिस्तानी आन्दोलन के दौर में वे निशाने पर थे किंतु सत्तारूढ न होने के कारण सारे हमले कांग्रेस की ओर मुड़ गये। इस अलगाववादी आन्दोलन से भाजपा के लोग कभी सीधे नहीं टकाराये इसलिए नुकसान केवल कांग्रेस और कम्युनिष्टों को ही झेलना पड़ा। स्वर्ण मन्दिर पर आपरेशन ब्ल्यू स्टार का कहर श्रीमती इन्दिरा गाँधी को झेलना पड़ा जिसमें उनकी हत्या हो गयी। दिल्ली में सिख विरोधी नरसंहार हुआ किंतु भाजपा के लोग निष्क्रिय बने रहे। जब वे बुरी तरह चुनाव हार गये और लोकसभा में उनके कुल दो सदस्य चुने गये तो उन्होंने नई नीति के रूप में राम मन्दिर का मुद्दा तलाशा जो असल में कथित राम जन्मभूमि मन्दिर की जमीन के मालिकाना हक का मामला था जिसे अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण का नाम दे दिया। इससे लाखों लोगों की भावनाएं भड़कीं। निशाने पर ध्रुवीकरण था जिससे हिन्दू बहुसंख्यक समाज में उन्हें समर्थन मिलता गया।
उन्होंने अपने सहयोगी संगठन विश्व हिन्दू परिषद को आगे करके उन्हीं मन्दिरों का मुद्दा उठाया जो विवादास्पद थे और अतीत में कभी भी मुसलमानों के साथ विवाद रहा था। प्रत्यक्ष में हिन्दू धर्मस्थलों की रक्षा थी किंतु परोक्ष में ध्रुवीकरण का लक्ष्य प्राप्त करना था।
मोदी शाह सरकार आने के बाद इस परम्परा को और अधिक करीने से लागू किया गया। ध्रुवीकरण के लिए उन्होंने ऐसे मुद्दे चुने जो प्रत्यक्ष में तो एक आदर्श उपस्थित करते दिखते थे किंतु उसके पीछे मुस्लिम समाज की विसंगतियां उभारना और उसमें अंतर्निहित भेद को बढाना था। तीन तलाक का मुद्दा भी ऐसा ही मुद्दा था। यह मुस्लिम समाज में ऐसी बुरी प्रथा है जो पीड़ित महिला को अधर में निराश्रित छोड़ देती है। किंतु किसी घटना के बाद पूरे मुस्लिम समाज से बदला लेने के लिए निरपराध लोगों को औरतों बच्चों और उनकी सम्पत्तियों को जला देने वालों के पक्षधरों से यह उम्मीद बेमानी थी कि वे उनके भले के लिए यह कदम उठा रहे हैं। इससे प्रगतिशीलता का दावा करने वाले अन्य विपक्षी दलों को विभूचन में छोड़ दिया। उस हिन्दू समाज में जिसके प्रतिनिधि होने का ये दावा करते हैं, में ढेर सारी गलत परम्पराएं हैं, किंतु देवदासियों से लेकर महिलाओं के मन्दिर प्रवेश तक पर ये सुप्रीम कोर्ट का आदेश तक मानने को तैयार नहीं।
धारा 370 को हटाने की तैयारी इसके लागू करते समय ही थी, और इसी कारण इसमें अस्थायी शब्द जोड़ा गया था। इसके बहुत से प्रावधान जैसे राज्यपाल की जगह राष्ट्रपति होना या मुख्यमंत्री की जगह प्रधानमंत्री होने को पहले से ही हटाया जा चुका था। कश्मीर में भारत के विलय के समर्थक सभी राष्ट्रीय दल थे और सब चाहते थे कि उचित समय पर इसे हटा दिया जाना चाहिए। किंतु इसे जिस तरह से प्रस्तुत किया गया उससे ऐसी छवि बनी कि शेष विपक्षी दल इसे हटाना नहीं चाहते और वे पाकिस्तान के पक्ष के समर्थन में हैं। दूसरी ओर वे यह भी प्रचारित करते हैं कि विपक्षी दल ऐसा वोट बैंक के लालच में कर रहे हैं अर्थात देश के सारे मुसलमान देश्द्रोही हैं व पाकिस्तान समर्थक हैं जो इसी आधार पर गैरभाजपा दलों को समर्थन देते हैं। सीमित सूचनाओं वाले लोग इस पर भरोसा भी कर लेते हैं।
गाँधी नेहरू परिवार का स्वतंत्रता संग्राम में गौरवशाली इतिहास रहा है जिसके प्रति पूरा देश उपकृत महसूस करता रहा है। उनके बाद की पीढी ने उनके इस इतिहास को हद से अधिक भुनाया और कांग्रेस में दूसरा नेत्रत्व ही विकसित नहीं हो सका। ऐसे लोग भी नेतृत्व में आ गये जो इस ऎतिहासिक पार्टी का नेतृत्व करने में उतने सक्षम नहीं थे जितने की आवाश्यकता थी। एक रणनीति के रूप में भाजपा परिवार ने इतिहास को विकृत करते हुए नेहरू जी की छवि को झूठे किस्सों से बिगाड़ने का सोचा समझा खेल खेला। इनका पूरा जोर उन मतदाताओं को फुसलाना होता है जिनकी जानकारियों के स्त्रोत सीमित हैं। इन सीमित स्त्रोतों को भी खरीद कर उनकी सोच को एक अवैज्ञानिक धारा में कैद कर दिया गया है।
भाषा से लेकर प्रतीकों तक ऐसा खेल रचा जा रहा है जिसमें सच को विलोपित किया जा रहा है और झूठ को स्थापित किया जा रहा है। यह सबकुछ चुनावी बहुमत हस्तगत करने के गुणाभाग के अनुसार सोच समझ कर किया जा रहा है। जब उनका ध्यान सच की ओर आकर्षित किया जाता है तो उनका उत्तर होता है कि इसी को तो राजनीति कहते हैं। यह एक गलत उत्तर है, यह राजनीति नहीं कूटनीति है।
वीरेन्द्र जैन
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मो. 09425674629

    

मंगलवार, अगस्त 13, 2019

धारा 144 लगाकर धारा 370 का समापन

धारा 144 लगाकर धारा 370 का समापन
वीरेन्द्र जैन

चक्रवर्ती सम्राटों की पुराण गाथाओं और अश्वमेध यज्ञ करने की कथाओं में श्रद्धा रखने वाला सामंती समाज स्वभावतः भूमि और भवनों को हस्तगत कर प्रसन्न होता है। जब मामला देश के स्तर का होता है तो दूसरे राज्यों को अपने राज्य में मिला कर उसे खुशी मिलती है। पुराने समय में राज्य, युद्ध या युद्ध का भय दिखा कर जीते जाते थे, अब तरीका बदल गया है। सिक्कम और गोवा के भारत में विलय पर देश में सर्वत्र प्रसन्नता देखी गयी थी। गोवा का विलय नेहरूजी के समय हुआ था और सिक्कम का विलय श्रीमती इन्दिरा गाँधी के प्रधानमंत्री रहते हुए हुआ था और जब जनता पार्टी के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उक्त विलय पर प्रतिकूल टिप्पणी की थी तो उन्हें अपने ही मंत्रिमण्डल के सदस्यों की आलोचना का शिकार होना पड़ा था। बाद में जैसा कि होता है, उन्होंने अपनी निजी बात के गलत अर्थ लगाने का बयान देकर स्थिति साफ की थी। दुनिया का आकार तो उतना का उतना ही रहता है किंतु उसमें राजनीतिक भूगोल बदलता रहता है जिससे इतिहास बनता है। पता नहीं कि हम पुरने समय में किन सीमाओं से बने देश को भारत, हिन्दुस्तान, इंडिया या भरतखण्डे जम्बूदीपे आदि मानते आ रहे हैं और अपने देश को प्राचीन देश कह कह कर उसकी एक एक इंच भूमि पर सौ सौ शीश चढा देने की गाथाएं बनाते, सुनाते रहते हैं, पर इतिहास बताता है कि देश की सीमाएं बदलती रही हैं। शायद यही कारण रहा है कि पुराने समय में सैनिकों द्वारा देश नहीं अपितु राजा की बफादारी का संकल्प लिया जाता था।
हमारे आज के नक्शे में दर्शाये गये भूभाग पर हजारों सालों से हूण, शक, मंगोल, मुगल, अंग्रेजों आदि के हमले होते रहे हैं और समय समय पर राज्यों के भूगोल बदलते रहे हैं। राजनीतिक नक्शे जड़ नहीं होते क्योंकि उन्हें चेतन लोगों द्वारा बनाया जाता है और उन्हीं के द्वारा बदला भी जाता है। 1947 में ब्रिटिश इंडिया को यह भूभाग छोड़ कर जाना पड़ा। अंग्रेजों को इस क्षेत्र से खदेड़ने में इसके हिन्दू, मुस्लिम, सिख ईसाई, पारसी, जैन बौद्ध आदि विभिन्न धर्मों की मानने वाले अनेक निवासियों ने एक साथ अंग्रेजों से टक्कर ली और महात्मा गांधी के नेतृत्व के कारण कम से कम हिंसा, प्रतिहिंसा से उन्हें जाने को विवश कर दिया। अहिंसक सत्ता परिवर्तन की यह अनूठी घटना थी। किंतु एक साथ अहिंसक संघर्ष करने वाले लोग सत्ता के सवाल पर धार्मिक आधार पर विभाजित हो गये, हिंसा पर उतर आये और 14-15 अगस्त 1947 को हिन्दुस्तान व पाकिस्तान दो बड़े हिस्सों में हम बंट गये। दोनों देशों के निर्माण में अंग्रेजों द्वारा शासित राज्यों को चयन की स्वतंत्रता थी कि वे चाहें तो भारत या पाकिस्तान में मिल स्कते हैं, और चाहें तो स्वतंत्र भी रह सकते हैं। केरल के दो राज्य अंग्रेजों के अधीन नहीं थे पर उन्होंने भारत में विलय मंजूर किया। हैदराबाद और जूनागढ राज्य प्रमुखों के न चाहने पर भी हिन्दुस्तान में मिलाये गये क्योंकि वहाँ के शासक मुस्लिम थे व जनता का बड़ा हिस्सा हिन्दू था। इसी तरह जम्मू कश्मीर राज्य भी उस दौरान अंग्रेजों के अधीन नहीं था पर उसने स्वतंत्र रहना चाहा। 1845 में नियंत्रण में दुरूहता को देखते हुए अंग्रेजों ने कश्मीर घाटी को जम्मू के डोगरा राजा गुलाब सिंह को 75 लाख नानकशाही रुपयों में बेच दिया था। यह क्षेत्र मुस्लिम बहुल था और जम्मू से आवागमन के रास्ते आज जितने सरल नहीं थे। कश्मीर घाटी और लेह लद्दाख में इसीलिए समानांतर नेतृत्व उभरता रहा। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में शेख अब्दुल्ला जनता के नेता के रूप में उभरे और मुस्लिम कांफ्रेंस के नाम से उन्होंने अपना संगठन बनाया तो वह सबसे बड़ा और प्रभावकारी संगठन था, जिसमें हथियार बन्द लड़ाके भी शामिल थे। बाद में उन्होंने अपने संगठन का नाम नैशनल कांफ्रेंस कर लिया और भारत की आज़ादी के लिए चल रहे राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं से सम्पर्क साधा।
उन दिनों कांग्रेस की नीति थी कि वह राजाओं के खिलाफ चल रहे आन्दोलनों को सीधे सहयोग नहीं करती थी पर अपने नेताओं को निजी तौर पर मदद करने के लिए कहती थी। शेख अब्दुल्लाह, जनता की मांगों के लिए राजा से टकराते रहते थे। नेहरू और शेख अब्दुलाह की मित्रता इसी सन्दर्भ में परवान चढी। जब शेख अब्दुलाह, जो कश्मीर के हिन्दू और मुसलमानों दोनों का नेता था ने 11 जून 1939 को एक अधिवेशन में मुस्लिम कांफ्रेंस का नाम नैशनल कांफ्रेंस रखा तो उनका एक धड़ा चौधरी गुलाम अब्बास के नेतृत्व में टूट गया जो इस नाम परिवर्तन के खिलाफ था। इससे थोड़ा कमजोर होकर शेख अब्दुल्लाह नेहरू और कांग्रेस के और करीब आ गये।  परोक्ष में कांग्रेस का समर्थन पाकर शेख अब्दुल्लाह की नैशनल कांफ्रेंस ही वहाँ का प्रमुख संगठन रहा जिसने अपने संघर्षों से जनता को अनेक अधिकार दिलवाये जिनमें ज़मींदारी प्रथा की समाप्ति भी था।
1947 में तत्कालीन राजा हरी सिंह के ढुलमुल रवैये को देखते हुए, कभी मुस्लिम कांफ्रेंस का हिस्सा रहे गुलाम अब्बास के धड़े ने पाकिस्तान से मिल कर कबाइलियों की फौज से हमला करा दिया जिसका सामना शेख अब्दुल्लाह ने अपने लड़ाकों की मदद से करते हुये भारत सरकार से अविलम्ब हस्तक्षेप करने का आग्रह किया। भारत सरकार बिना विलय के दूसरे के राज्य में अपनी फौज नहीं भेज सकती थी इसलिए उसने राजा हरी सिंह पर विलय के लिए दबाव डाला जो परिस्तिथियों को देखते हुए उन्हें स्वीकार करना पड़ा। इस पर हस्ताक्षर होते ही भारत सरकार ने अपनी फौज घाटी में भेजी, जो नैशनल कांफ्रेंस के लड़ाकों के साथ मिल कर लड़ी। नैशनल कांफ्रेंस के अनेक लड़ाके शहीद हुये, किंतु तब तक आधा कश्मीर नियंत्रण से बाहर जा चुका था जो आज आज़ाद कश्मीर या पाकिस्तान आक्यूपाइड कश्मीर के नाम से जाना जाता है। पाकिस्तान इसी को आधार बना कर अपने यहां प्रशिक्षित घुसपैठिये भेजता है, जो आतंकी गतिविधि करते हैं, अलगाववाद भड़काते हैं।
शेख अब्दुल्लाह कश्मीर घाटी में अपनी हैसियत को देखते हुये स्वयं भी स्वतंत्र कश्मीर का शासक बनना चाहता था इसलिए उसने युद्ध विराम के बाद विलय की शर्तें रखीं जिनको माने बिना घाटी की जनता का विश्वास नहीं जीता जा सकता था, इसलिए सबको वे शर्तें माननी पड़ीं। धारा 370 के प्रावधान उन्हीं शर्तों के कारण लाये गये थे, जो क्रमशः कमजोर किये जाते रहे। श्रीमती इन्दिरा गाँधी के समय इमरजैंसी में बहुत से प्रावधान हटा दिये गये थे।
मुस्लिम कांफ्रेंस के टूटे हुए धड़े का नेता ही पीओके में गया था और उसका दखल अब भी कश्मीर में था। घाटी की भौगोलिक स्थिति एवं उसमें अंतर्राष्ट्रीय रुचि को देखते हुए वहाँ सेना को बनाये रखना पड़ा व चुनाव इस तरह से कराना पड़े ताकि भारत सरकार के समर्थन वाली राज्य सरकार ही गठित हो। उल्लेखनीय है कि जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय चुनाव हुये थे तब उन्होंने कहा था कि हमारी पार्टी चुनाव हार गयी तो क्या हुआ किंतु इस बार कश्मीर में लोकतंत्र जीता है। कहा जाता है कि उस समय पहली बार वहाँ साफ सुथरे चुनाव हुये थे।
सच है कि जम्मू कश्मीर में लम्बे समय तक शासन शेख अब्दुल्लाह परिवार या उनके रिश्तेदारों आदि को जागीर की तरह सौंपा जाता रहा और सेना की सुरक्षा में वे उसी तरह शासन भी करते रहे। इन परिवारों पर सरकारी धन के दुरुपयोग कर निजी सम्पत्ति बनाने के आरोप गलत नहीं हैं। जिस धन से विकास द्वारा वहाँ के लोगों का विश्वास जीत कर उन्हें विलय का महत्व समझाये जाने में लगाना था, उसे कश्मीर के शासकों ने निजी हित में लगा कर दोहरा नुकसान किया। कश्मीर के साथ प्रयोग दर प्रयोग किये जाते रहे। जगमोहन जैसे राज्यपालों ने दमन के सहारे कश्मीर को बदलने की कोशिश में वहाँ अलगाववाद आतंकवाद के साथ साम्प्रदायिकता के बीज भी बो दिये जो वहाँ कभी नहीं रही। इसी का परिणाम था कि एक लाख हिन्दू पंडितों को कश्मीर छोड़ कर जम्मू में बसना पड़ा। यह अलगाव अभी भी समस्या बना हुआ है। भयग्रस्त पंडित लाख आश्वासनों के बाद भी लौटने का जोखिम नहीं उठाना चाहते पर मिलने वाली राहत को बनाये रखने व बढाने के लिए अपने असंतोष को राजनीतिक हवा देने का काम निरंतर करते रहते हैं। अलगाववादी भी समय समय पर साम्प्रदायिक आधार पर आतंक के लिए नमूने की हिंसा करके भयभीत करते रहते हैं। साम्प्रदायिकता पर आधारित राजनीति भी इसमें अपने हाथ तापती रहती है।
दुर्घटना में गम्भीर रूप से घायल व्यक्ति का इलाज वही डाक्टर कर सकता है जो या तो अनुभवी हो या जो मरीज के जीने मरने से निरपेक्ष हो कर अपने प्रयोग करना चाहता हो। ऐसे ही कश्मीर को बहुत से डाक्टर छूने से ही डरते रहे और इस दशा से लाभांवित लोग यथास्थिति बनाये रखने के लिए उपचार न कर के केवल जिन्दा रखे रहे। इस दिशा में श्रीमती गाँधी ने इमरजैंसी के दौरान कुछ सुधार किये थे या उसके बाद अब नरेन्द्र मोदी सरकार ने जोखिम लेने का साहस दिखाया है। वहाँ संचार के साधन बन्द हैं और कर्फ्यू जैसे हालत हैं।
पक्ष विपक्ष दोनों ही चाहते रहे कि धारा 370 की समाप्ति हो किंतु खतरे को दूसरे पर टालने की कोशिश करते रहे। भाजपा ने जब यह नारा दिया था, तब उसे सत्ता और फिर परिपूर्ण सत्ता में आने का भरोसा ही नहीं था। अपने ऐसे ही वादों के कारण उन्हें सत्ता में आने पर बहुत असमंजस का सामना करना पड़ा है। वे इस या उस बहाने से उससे बचते रहे, किंतु जब सारे बहाने सामाप्त हो गये तो ओखली में सिर देना ही पड़ा।
धारा 370 हटना चाहिए थी किंतु धारा 144 लगा कर नहीं।  
वीरेन्द्र जैन
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रविवार, अगस्त 04, 2019

पुनरावलोकन फिल्म मेकिंग आफ महात्मा मोहनदास करमचन्द गांधी के महान बनने की कहानी


पुनरावलोकन फिल्म मेकिंग आफ महात्मा

मोहनदास करमचन्द गांधी के महान बनने की कहानी
वीरेन्द्र जैन
2 अक्टूबर 1869 को जन्मे गांधीजी का यह 150वां जन्मवर्ष है। हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में पद ग्रहण करते ही अपने पहले पहले उद्बोधनों में ही इस अवसर का उल्लेख किया था। यद्यपि 2019 के आम चुनावों के दौरान कुछ उम्मीदवारों ने गाँधीजी का उल्लेख उनकी महानता के अनुरूप न करके उनके हत्यारे का महिमा मंडन करने की कोशिश की जिसे उनके दल समेत पूरे देश ने एक स्वर से विरोध किया।
मध्यप्रदेश सरकार के संस्कृति संचालनालय ने इस अवसर पर गांधी जी के जीवन पर बनी कुछ फिल्मों के प्रदर्शन का आयोजन किया जिनमें उनके 125वें जन्मवर्ष के दौरान बनायी गयी श्याम बेनेगल की फिल्म मेकिंग आफ महात्मा भी थी। विषय की दृष्टि से यह एक बहुत महत्वपूर्ण फिल्म थी क्योंकि गांधीजी के अफ्रीका से भारत लौटने के बाद उनके स्वतंत्रता आन्दोलन के बारे में तो बहुत लिखा पढा गया है किंतु उनकी इस भूमिका में आने के लिए कौन सी परिस्तिथियां जिम्मेवार थीं और वे किस किस तरह से संघर्ष करते हुए इस स्थिति तक पहुँचे उसकी कथा कम ही लोगों को ज्ञात है। यह फिल्म उस कमी को पूरी करती है। आम तौर पर हमें जब महान लोगों के बारे में बताया जाता है तो अवतारवाद पर भरोसा करने वाला हमारा समाज उन महापुरुषों को जन्मना महान [बोर्न ग्रेट] मान कर चलता है। सच यह है कि किसी भी व्यक्ति के निर्माण में उसका परिवेश, परिस्तिथियां और उनके साथ उसकी मुठभेड़ जिम्मेवार होती है। इसे वह समय भी निर्धारित करता है जिस समय में वे घटनाएं सामने आती हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने मेकिंग आफ महात्मा बना कर बोर्न ग्रेट की धारणा को तोड़ने की कोशिश की है। गांधी जी के निर्माण की कथा महात्मा बुद्ध की उस कथा से मिलती जुलती है जिसमें सुख सुविधाओं में पले राजपुत्र सिद्धार्थ ने किसी वृद्ध, बीमार, और मृतक को देख कर इनके हल खोजने की कोशिश की थी, और उस कोशिश में महात्मा बुद्ध बन गये थे।
गांधीजी के ऐसे बहुत अच्छे वकील होने के प्रमाण नहीं मिलते हैं जो अपनी तर्क क्षमता से अपने मुवक्किल के पक्ष में काले को सफेद सिद्ध कर देता है अपितु लन्दन से बैरिस्टिर की डिग्री लेकर लौटने के बाद भी भारत में उनकी प्रैक्टिस अच्छी नहीं चल रही थी। किसी की सिफारिश पर उन्हें दक्षिण अफ्रीका में परिवार के अन्दर ही लेनदेन के एक मुकदमे को लड़ने के लिए बुलवाया गया था। उस मामले में भी उन्होंने एक अच्छे वकील होने की जगह एक सद्भावी पंच की भूमिका निभाते हुए दोनों के बीच समझौता कराने का प्रयास किया। यह आम वकीलों के व्यवहार से अलग था क्योंकि अधिक फीस हस्तगत करने के लिए वकील मुकदमे को चलाते रहना चाहते हैं। समझौते का उनका प्रयास सफल रहा था व इसी सद्भाव से प्रभावित होकर उनके मुस्लिम मुवक्किल के प्रतिद्वन्दी ने भारत आदि देशों से श्रमिक के रूप में आये लोगों के साथ अंग्रेज शासकों के व्यवहार के बारे में बताया। खुद भी भेदभाव का शिकार हो चुके गांधी जी को इससे स्थितियों को और समझने में मदद मिली, जिसके लिए उन्होंने एशिया के लोगों को संगठित किया और अपने ज्ञान व सद्भावी व्यक्ति की छवि के विश्वास पर विरोध का नेतृत्व किया। इस काम में उनके सम्पन्न मुवक्किलों ने भी मदद की।
उनकी समझ थी कि व्यक्ति दोषी नहीं होता है अपितु परिस्तिथियां दोषी होती है व मनुष्य परिस्तिथियों का दास होता है। यह समझ उन्हें कुरान बाइबिल गीता और टालस्टाय की पुस्तक पढ कर प्राप्त हुयी थी। कहा जा सकता है कि उनके निर्माण में पुस्तकों के साथ साथ उस धर्म निरपेक्ष भावना की भूमिका थी जिसके अनुसार वे किसी भी धर्म और उसके ग्रंथों से नफरत नहीं करते थे। यही कारण रहा कि उन्होंने मानवता का पाठ उन्हीं धर्मग्रंथों से सीखा जिन्हें बिना पढे या गलत ढंग से पढ कर लोग दंगे करते हैं और हजारों लोगों की हत्याएं कर देते हैं। जब भी कोई कुछ नया देखता है तो उससे सम्बन्धित अपने परम्परागत प्रतीकों से तुलना करके अपने विचार बनाता है। गांधीजी की सोच और विचारों को अफ्रीका के संघर्ष ने काफी बदला। वहीं पर उन्होंने कमजोरों के संघर्ष के दौरान अहिंसा की भूमिका को समझा और उसका प्रयोग किया। अफ्रीका में ही उन्होंने आन्दोलनों के दौरान सत्याग्रह का प्रयोग किया।   
गांधीजी ने शासकों का विरोध करते हुए भी युद्ध के समय उनका साथ दिया व रैडक्रास में काम करके घायलों की सेवा की। उन्हें इस बात से ठेस पहुंची कि ईसाइयत का पाठ पढी नर्सें भी काले लोगों की मरहमपट्टी नहीं करतीं। उन्होंने खुद यह काम किया और लोगों को प्रभावित किया। उनसे प्रभावित होकर किसी ने उन्हें अपनी ज़मीन दान कर दी तो उसमें उन्होंने फार्म बनाकर खेती प्रारम्भ कर दी और उसका नाम टालस्टाय फार्म रखा। जब उन्होंने मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्व किया तो मजदूरों को फार्म पर काम दिया ताकि वे भूखे न मरें और उनका संघर्ष जिन्दा रहे। यही समय था जब गांधीजी को सादगी और स्वावलम्बन का महत्व समझ में आया। उनका सूट बूट और टाई छूट गयी। भारत लौटने पर उन्होंने इसी तर्ज पर आश्रम बनाये थे। वे जो कहते थे उसे खुद करके दिखाते थे इसी क्रम में उन्होंने अपनी पत्नी को भी आन्दोलन में भाग लेने व जेल जाने के लिए सहमत कर लिया तब उन महिलाओं को उतारा जिन के पति आन्दोलन के कारण जेल में थे। समय पर दाई के न आने पर उन्होंने अपनी पत्नी की डिलेवरी भी खुद करायी।    
गांधीजी ओजस्वी वक्ता नहीं थे किंतु बहुत सरलता से अपनी बात रखते थे जिससे उनकी बातों में सच्चाई झलकती थी। विचार सम्प्रेषित करने की कला में माहिर थे और अपने आचरण से वे सन्देश देते थे, इसके साथ साथ उन्होंने वहां इंडियन ओपीनियन नामक अखबार निकाला जिससे उनके विचारों का प्रसार हुआ। उनके विचारों से प्रभावित लोगों ने उन्हें सहयोग दिया। यही काम उन्होंने भारत लौट कर भी किया और भारत में यंग इंडियन व हरिजन नामक अखबार निकाले। उनके विचारों से प्रभावित होकर बड़े अखबार के सम्पादकों ने उनके आन्दोलन पर लेख लिखे और उनकी आवाज ब्रिटिश हुकूमत तक पहुँची, जिससे उन्हें संवाद सम्प्रेषण में प्रैस का महत्व समझ में आया। उनके आश्रमों में लगातार विदेशी अखबारों के सम्वाददाता मेहमान बनते रहे।
गांधीजी कुल इक्कीस साल साउथ अफ्रीका में रहे और जो मोहनदास करमचन्द बैरिस्टर होकर गये थे वे महात्मा गांधी बन कर भारत लौटे। इक्कीस साल की इस कहानी को सवा दो घंटे की फिल्म में बांध कर श्याम बेनेगल जैसे फिल्मकार ही दिखा सकते थे, जो 25 वर्ष पूर्व उन्होंने सफलता पूर्वक कर के दिखाया था। किसी बायोपिक में सम्बन्धित व्यक्ति के रंग रूप लम्बाई देहयष्टि के अनुरूप कलाकार चाहिए होते हैं जिसे फिल्मी दुनिया के ही रजत कपूर और पल्लवी जोशी जैसे सुपरिचित कलाकारों ने सफलतापूर्वक निर्वहन करके दिखा दिया था। यही कारण रहा कि इस फिल्म के लिए 1996 में बैस्ट फीचर फिल्म का अवार्ड मिला और रजत कपूर को बैस्ट एक्टर का अवार्ड मिला था।
व्यक्तित्व निर्माण की ऐसी सजीव कथाओं को बार बार देखा दिखाया जाना चाहिए।  
वीरेन्द्र जैन
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रविवार, जुलाई 28, 2019

सैंया भये कुतवाल, 49-62 , माबलिंचिंग


सैंया भये कुतवाल, 49-62 , माबलिंचिंग
वीरेन्द्र जैन

जब बेहूदगियों का नंगा नाच हो रहा हो तो किसी लेख का ऐसा ही शीर्षक सूझता है।
जब पूरा देश ऐसे वीडियो देख कर दहशत में जा रहा हो जिसमें किसी अकेले आदमी को पकड़ कर एक समूह इतनी निर्ममता से पीटता दिखता है कि उसकी जान चली जाये, जिसे दर्जनों भयभीत लोग तटस्थ भाव से देखते रहने को मजबूर हों, या चोरी छुपे वीडियो बना रहे हों तो देश की सम्वेदनशील मेधा उसे चुपचाप नहीं देख सकती। एक समय तक वह आपराधिक घटना मानकर कानून की रखवाली करने वाली सरकार की कार्यवाही की प्रतीक्षा कर सकती है किंतु जब एक ही तरह की घटनाएं देश भर में होने लगें और निष्क्रिय सरकार अपराधियों के बचाव में दिखने लगे तो बुद्धिजीवी चुप कैसे बैठ सकता है। यही कारण था कि देश के जाने माने लेखकों, इतिहासकारों, वैज्ञानिकों, और पत्रकारों की नृशंस हत्या के विरोध में विभिन्न क्षेत्रों में देश के शिखर सम्मान प्राप्त लोगों ने अपने सम्मान वापिस कर दिये थे। उल्लेखनीय है कि ऐसा करके उन्होंने रवीन्द्र नाथ टैगोर जैसे लोगों का अनुशरण किया था जिन्होंने जलियांवाला हत्याकांड के विरोध में अंग्रेजों द्वारा दी गयी उपाधि वापिस कर दी थी। उनके साथ देश भर के अनेक लोगों ने ‘सर’ की उपाधि वापिस की थी किंतु अंग्रेजों ने कभी उन्हें अवार्ड वापिसी गैंग कह कर नहीं पुकारा था। एक बार फिर देश के प्रमुख कला जगत के लोगों ने सरकार का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की है।
उक्त घटनाएं न केवल खराब कानून व्यवस्था का उदाहरण थीं अपितु एक खास विचारधारा के लोगों को हमलों का निशाना बनाया गया था। इन हमलों का आरोप भी उन लोगों पर लगा था जो अलग अलग नामों से सत्तारूढ दल की विचारधारा के समान सोच की संस्थाओं से थे। यही कारण रहा कि कानून व्यवस्था की इस टूटन पर सत्ताधारी दल के लोग चुप्पी साधे रहे। अगर वे इसे किसी असम्बद्ध का आपराधिक कर्म मानते तो उन लोगों के साथ खड़े होते जो इसका विरोध कर रहे थे या जाँच कार्यवाही में युद्धस्तर की कार्यवाही करते अथवा ऐसा बयान ही देते। उसकी जगह उन्होंने अपने पालतू मीडिया या सत्ता से लाभ लोभ के आकांक्षी कमतर लोगों को अधिक संख्या में बुद्धिजीवियों के विरोध में उतार दिया। इन लोगों के कथनों और बयानों में घटनाओं के सम्बन्ध में कहने को कुछ नहीं था किंतु घटनाओं के विरोध में आवाज उठाने वालों को देने के लिए गालियों का भंडार था। खेद की बात है कि इन्हीं की भाषा लेकर देश के प्रधानमंत्री पद पर बैठ व्यक्ति ने भी उन्हें अवार्ड वापिसी गैंग या टुकड़े टुकड़े गैंग अर्बन नक्सल व पेशेवर निराशावादी कह कर अपनी वैचारिक दरिद्रता का परिचय दिया। ऐसे में 49 बुद्धिजीवियों के अनुरोध पत्र के उत्तर में सरकार 62 सिर गिनाने लगती है भले ही 49 में से किसी एक के मुकाबले पूरे 62 कहीं नहीं ठहरते हों।  
हमारी न्याय व्यवस्था और जाँच व्यवस्था के दोषों के कारण बहुत सारे आरोपियों को सजा नहीं मिल पाती या इतनी देर से मिलती है कि वह ‘विलम्बित न्याय अर्थात अन्याय’ के कथन के अंतर्गत आ जाती है। किंतु जनता की आंखों देखी घटनाओं में बाइज्जत बरी हुआ आरोपी भी बरी नहीं होता है। न जाने कितने न्यायिक फैसलों में कोर्ट को लिखना पड़ा है कि आरोपी को इसलिए बरी करना पड़ रहा है क्योंकि प्रासीक्यूशन ने उचित तरीके से केस प्रस्तुत नहीं किया, सबूत पेश नहीं किये या गवाह पलट गये।
घटित घटनाओं पर सम्वेदनशील बुद्धिजीवियों की ईमानदार भावुक अपील पर भाड़े के लोग प्रतिकथन करते हैं कि ये लोग फलां घटना पर नहीं बोले थे पर यह नहीं बताते हैं कि कथित घटना पर वे स्वयं क्यों इसी तरह से नहीं बोले। और यदि बोले हों तो क्या इन बुद्धिजीवियों ने उनकी तरह से उनका विरोध किया! बुद्धिजीवी जिन घटनाओं पर बोले, उन पर क्या ये भाड़े के बुद्धिजीवी और चैनलों के एंकर बोले? ये केवल बोलने की प्रतिक्रिया में ही क्यों बोलते हैं? दायित्व तो यह है कि जिसको जहाँ गलत दिख रहा हो वह उसके खिलाफ बोले और एक दूसरे का सहयोग करे किंतु सरकार की गलतियों का बचाव करने वाले ये लोग घटनाओं को इंगित करने वालों का ही कुत्सित विरोध करके गलत घटनाओं के दोषियों के पक्ष में खड़े नजर आते हैं। किसी भी व्यक्ति को कानून के विरुद्ध हिंसा में सहयोग करना भी अपराध है। पीड़ित व्यक्ति यदि दलित, महिला, या अल्पसंख्यक जैसे कमजोर वर्ग का है तो हमारा संविधान भी उन्हें विशेष अभिरक्षण देने की बात करता है। इन वर्गों के प्रति विशेष सहानिभूति होना किसी सुशिक्षित सम्वेदनशील व्यक्ति का प्राथमिक कर्तव्य होता है। संविधान में आरक्षण व्यवस्था का भी यही आधार है।
निरंतर दुष्प्रचार से इन्होंने समाज के एक वर्ग के मन में यह बैठा दिया है कि मुसलमान विदेशी है, हिंसक है, आतंकियों का मददगार है, पाकिस्तान का पक्षधर है, आबादी में वृद्धि करके देश के संसाधनों का दोहन कर रहा है और एक दिन बहुसंख्यक हो जायेगा। इस दुष्प्रचार का तत्कालीन सत्तालोभियों ने कभी प्रभावी विरोध नहीं किया। यही कारण है कि एक वर्ग उन्हें दुश्मन मानता है और उनके किसी भी नुकसान पर अपनी विजय देखता है। मुसलमानों के अपने राजनीतिक दल भी वोट बैंक के लालच में ऐसी हरकतें करते हैं जिससे इस वर्ग की सोच को बल मिलता है। अखलाख की सरे आम हत्या हो या मुज़फ्फरनगर के दंगे हों उनमें गहराई तक बो दिये गये इस दुष्प्रचार ने मदद की। राजस्थान में शम्भू रैगर द्वारा वीडियो बना कर एक बंगाली मजदूर की गयी हत्या के बाद उसकी पत्नी के खाते में लाखों रुपये भेजने वाले कौन थे? उसके पक्ष में न्यायालय के शिखर पर भगवा झंडा फहराने वाले पचासों नौजवानों को किसने तैयार किया था? उस घटना के विरोध में इन भाड़े के लोगों में से कितने लोग बोले थे? माब लिंचिंग करते समय पीड़ित से जयश्री राम बुलवाना किस बात का प्रतीक है?
सच तो यह है कि दुष्प्रचार से प्रभावित यह वर्ग मोदीशाह वाली भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार आ जाने से ‘सैंया भये कुतवाल’ वाली मानसिकता में आ गया है और गुजरात से लेकर मुजफ्फरनगर तक विभिन्न आरोपियों के बरी होते जाने से प्रोत्साहित हो रहा है। आरोपियों के बचाव में जो लोग आते हैं वे एक ही नाल नाभि से जुड़े लोग हैं। राज्यों में सारी नैतिकताओं को तिलांजलि देकर सरकारें बनायी जा रहे हैं, ताकि दमनकारी ताकतों पर नियंत्रण बना रहे और अभियोजन अपने हाथ में रहे। आरटीआई जैसे कानूनों को बदलकर जनता के हाथों से बचीखुची ताकत छीनी जा रही है। एनएसए जैसी संस्थाओं की ताकत बढाई जा रही है सीबीआई को और पालतू तोतों से भरा जा रहा है।  शायद ऐसी ही स्थिति में इमरजैंसी के दौरान दुष्यंत कुमार ने लिखा था-
कैसे मंजर सामने आने लगे हैं
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं  
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629


   

शनिवार, जुलाई 13, 2019

क्या यह दो संविधानों का टकराव है

क्या यह दो संविधानों का टकराव है
वीरेन्द्र जैन

गत दिनों उत्तर प्रदेश के एक ब्राम्हण विधायक की बेटी ने एक दलित युवक से विवाह कर लिया और अपने पिता के डर से नव दम्पत्ति नगर से भाग गया। इतना ही नहीं विधायक और उसके बाहुबलियों के डर से युवक के परिवार को भी नगर से भागना पड़ा। विधायक भाजपा के हैं और उसी पार्टी की प्रदेश और देश में सरकार है। इसी घटना के कुछ दिन पूर्व गुजरात में ऐसी ही शादी हुयी थी तब घर आये हुये दामाद को उसके ससुर और सालों ने मार डाला था जबकि लड़की गर्भवती थी। इसी दौरान उत्तर प्रदेश के औरैया में प्रेम विवाह करने वाले लड़के लड़की को मार कर पेड़ पर लटका दिया गया। ऐसे ही भय से ग्रस्त होकर पत्रकारिता की पढाई कर चुकी उत्तर प्रदेश के विधायक की शहर छोड़ कर भागी हुयी बेटी ने जब अपने प्रवास स्थल के बाहर पिता के परिचित कुछ लोगों को सन्दिग्ध अवस्था में घूमते पाया तो उसने न केवल अपना फोटो वायरल किया अपितु स्वेच्छा से अपनी शादी की घोषणा करते हुए अपने पिता से अपनी जान को खतरा बताया व पुलिस कप्तान से मदद मांगी। इस कहानी को न्यूज चैनलों ने उठा लिया और कुछ ही समय में इसे नैशनल न्यूज में बदल दिया। उल्लेखनीय है कि देश में इसी तरह के अंतर्जातीय विवाहों से नाराज परिवारियों द्वारा प्रतिवर्ष सैकड़ों सम्भावनाशील युवाओं की हत्याएं हो रही हैं जिन्हें प्रैस के लोग आनर किलिंग कह कर हत्याओं की निर्ममता को कम करने की कोशिश करते हैं। इतनी बड़ी संख्या में हो रही इन देशव्यापी हत्याओं पर हर मंच पर विस्तार से बात होना चाहिए।  
उत्तरप्रदेश के विधायक की इस बेटी ने साहस करके जान पर खेल अपने पिता और उनके सहयोगियों को चुनौती दी है। औपचारिक रूप से तो विधायक अपनी बेटी के बालिग होने के आधार पर उसका वैधानिक अधिकार बता रहे हैं, किंतु उस शादी को स्वीकारने के सवाल पर ‘नो कमेंट’ कह कर बात को टाल जाते हैं। यह उनकी बेटी द्वारा अपने सवैधानिक अधिकार के स्तेमाल पर सहमत न होने के संकेत हैं क्योंकि ज्यादा पूछने पर वे अपनी पत्नी सहित आत्महत्या की धमकी दे कर सामने वाले को चुप करा देते हैं। बेटी की बातें बताती हैं कि वे प्रतिशोध से भरे हुये होंगे।
यह संक्रमण काल है। इसमें दो संविधानों का टकराव चल रहा है। हम एक ओर तो चन्द्रमा पर यान उतारने की तैयारी करते हुये ट्रिलियन डालर में बजट प्रस्तुत कर रहे आधुनिक युग में प्रवेश करते जा रहे हैं किंतु दूसरी ओर हम अभी भी पुराने सामंती युग को जी रहे हैं। हमारे संविधान निर्माताओं ने दस साल में हजारों साल पुराने जातिवादी समाज के समाप्त हो जाने का खतरा देखा था किंतु सत्तर साल में भी हम समुचित आगे नहीं बढ सके हैं। उल्लेखनीय है कि संविधान सभा के गठन के समय आरएसएस के नेताओं ने कहा था कि जब हमारे पास मनुस्मृति है तो नया संविधान बनाने की क्या जरूरत है। संविधान निर्माता डा. अम्बेडकर भी इस बात को महसूस करते थे कि मनुस्मृति से मुक्ति पाये बिना नया संविधान अपना उचित स्थान नहीं बना सकेगा। शायद यही कारण रहा होगा कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति के दहन का आयोजन किया था और लाखों लोगों को अपना पुराना धर्म त्याग कर दूसरे धर्म को अपनाने के लिए प्रेरित किया था। उनका जोर नये धर्म को अपनाने के प्रति कम और पुराने धर्म को त्यागने के प्रति अधिक था जिससे नये समाज के नागरिक बदलाव को स्वीकार करने की आदत डाल सकें। इसका संकेत इस बात से मिलता है कि उन्होंने कहा था कि मैं हिन्दू धर्म में पैदा जरूर हुआ हूं किंतु हिन्दू धर्म में मरूंगा नहीं।
संविधान के अनुसार युवाओं को अंतर्जातीय, अंतर्धार्मिक विवाह करने का अधिकार है और विवाह की उम्र होने पर वे इस अधिकार का प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं। मनोरंजन और शिक्षण के लिए सबसे सशक्त दृश्य माध्यम में जिन फिल्मों, नाटकों और सीरियलों को करोड़ों लोग देखते हैं उनमें भी युवाओं को अपनी मर्जी से जीवन साथी चुनने की कहानियों को अंकित किया जाता है। ऐसी कहानियां पूरे परिवार के साथ देखी जाती हैं और जीवन साथी के मिल जाने पर पूरा परिवार एक साथ बैठ कर ताली बजाता है, खुशी व्यक्त करता है। ऐसी फिल्मों की लोकप्रियता और व्यावसायिक सफलता बताती है कि ये भावना कितनी गहराई तक घर कर चुकी है। इसके विपरीत जब संवैधानिक अधिकार प्राप्त घर का कोई नागरिक अंतर्जातीय, अंतर्धार्मिक विवाह का सवाल उठाता है तो पूरा परिवार मनुस्मृति से संचालित होने लगता है और जाति ही नहीं अपितु गोत्र, उपगोत्र तक के सवाल उठाये जाने लगते हैं। मनुस्मृति और भारतीय संविधान दोनों साथ साथ नहीं चल सकते। भारतीय संविधान के अनुसार जाति, धर्म, रंग, लिंग, भाषा, और क्षेत्र के बिना सभी समान नागरिक हैं और तयशुदा उम्र के बाद उन्हें विवाह का अधिकार है जबकि कभी संघ  द्वारा भारतीय संविधान के विकल्प के रूप में प्रस्तावित मनु स्मृति में ऐसा नहीं है। तय करना होगा कि देश में कौन सा संविधान चलेगा? तय करना होगा कि भारत के संविधान की शपथ लेने वाली सत्तारूढ भाजपा के अब मनुस्मृति के बारे में क्या विचार हैं? विवाह के बारे में परिवार, जाति समाज, व धार्मिक गुरुओं का संविधान विरोधी दखल रोकना होगा और युवाओं को संवैधानिक अधिकार से वंचित करने वालों पर देशद्रोह जैसा आरोप लगाना होगा, क्योंकि देश भारत के संविधान से ही चलेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल के प्रारम्भ में संविधान के आगे सिर झुका कर प्रतीकात्मक रूप से एक संकेत दिया था जिसके सच करने का समय है।
 युवाओं को अपनी मर्जी से विवाह के अधिकार के बारे में किसी घटना के घटित होने के अलावा भी बातचीत होना चाहिए, कालेजों आदि शिक्षण संस्थाओं व कार्यस्थलों पर इस विषय पर जानकारी देने के कार्यक्रम आयोजित होने चाहिए व राजनीतिक दलों को वोटों की राजनीति से ऊपर उठ कर इसका प्रचार करना चाहिए। इससे जातिवादी राजनीति से ऊपर उठने में भी मदद मिलेगी, साम्प्रदायिकता घटेगी। उल्लेखनीय है कि अभी लोकसभा चुनावों के बाद श्री नरेन्द्र मोदी इस बात को रेखांकित कर चुके हैं कि इस बार लोगों ने जातिवाद से ऊपर उठ कर मतदान किया, तथा सबका विश्वास जीतने की इच्छा व्यक्त करते हुए साम्प्रदायिकता से मुक्ति की कामना की है। किसी भी धर्म की कोई भी पुस्तक अगर जनता के संवैधानिक अधिकारों से टकराती हैं तो संविधान की बात ही मानी जाना चाहिए। एक देश में एक संविधान के नारे को इस तरह से भी देखा जाना चाहिए।
उत्पादन के साधन बदलने और नई आर्थिक नीति लागू होने के साथ साथ उक्त घटनाओं में बढोत्तरी हो सकती है। अगर हमने आज सचेत होकर जरूरी तैयारी कर ली तो भविष्य में पछताना नहीं पड़ेगा।
 वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
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मो. 09425674629

       

सोमवार, जुलाई 08, 2019

सबका विश्वास, किसका विश्वास


सबका विश्वास, किसका विश्वास
वीरेन्द्र जैन

नरेन्द्र मोदी ने सबका साथ, सबका विकास में एक और टुकड़ा जोड़ा है ‘सबका विश्वास’। यह टुकड़ा उन्होंने अपने दूसरे कार्यकाल में जोड़ा है जिसका अर्थ है कि वे स्वीकार करते हैं कि स्पष्ट बहुमत वाली सीटें जीत कर भी दोनों बार ही उन्हें देश में सबका विश्वास प्राप्त नहीं था।
हमारे बहुदलीय लोकतंत्र में सरकार बनाने वाले दल को सबका विश्वास सम्भव भी नहीं होता, इसमें मिले हुए समर्थन से भी बड़ा किंतु बिखरा विपक्ष सामने रहता है। दोनों ही बार स्पष्ट बहुमत वाली सदस्य संख्या से सरकार बना लेने के बाद भी भाजपा के पक्ष में क्रमशः 31% और 37% मत ही उन्हें मिले हैं। दक्षिण के राज्यों से उन्हें वैसी जीत नहीं मिली है जैसी मध्य और पश्चिमी राज्यों में मिली है।
असल में सबका विश्वास से उनका आशय सभी जातियों और धर्मों के लोगों का विश्वास प्राप्त करने से लगाया गया है। चूंकि भाजपा एक हिन्दूवादी सवर्ण पार्टी के रूप में जानी जाती है और अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुसलमानों का समर्थन भाजपा को नहीं मिलता। इतना ही नहीं अपितु माना जाता है कि मुसलमानों का वोट उस पार्टी को जाता है जो भाजपा को हराता हुआ नजर आती है। इस तरह से देश की लगभग बीस प्रतिशत आबादी का मत गैर राजनीतिक आधार पर लुट जाता है। शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार, मंहगाई, सुरक्षा आदि के सवाल उनकी पहचान और अस्तित्व की रक्षा के पीछे छुप जाते हैं। जिन्हें ये वोट मिल जाते हैं वे अपने मूल वोटों से मिला कर अपने कमजोर या बिना मुद्दों के भी चुनाव जीत जाते हैं। काँग्रेस, समाजवादी, बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल काँग्रेस ही नहीं कुछ हद तक वामपंथियों को भी इसका चुनावी लाभ मिला है। इसके विपरीत जनसंघ के नये रूप भाजपा को कट्टर हिन्दूवादी वोट भी ऐसे ही मिल जाते हैं।
लोकतंत्र को नुकसान पहुँचाने वाले ध्रुवीकरण से दोनों तरफ लाभ होता है किंतु हिन्दूवादी दलों को उसका अधिक लाभ मिलता है क्योंकि वे बहुसंख्यक हैं। यही कारण है कि विभिन्न निष्पक्ष जाँच आयोगों ने पाया है कि प्रायोजित दंगों में हिंसा किसी भी पक्ष की ओर से अधिक हुयी हो, पर साम्प्रदायिकता फैलाने का प्रारम्भ बहुसंख्यकों के दलों से जुड़े संगठन ही करते हैं। वे ही नफरत फैलाने और बनाये रखने के लिए मासूम किशोरों व बच्चों को जोड़ कर नियमित बैठकें करते रहते हैं, उन्हें असत्य इतिहास सिखाते हैं व नफरत के बीज बोते हैं। 1992 के बाद इसी होड़ में कुछ मुस्लिम संगठन भी यही काम करके परोक्ष में उनकी मदद करने लगे हैं। इससे वातावरण ज्वलनशील बना रहता है, जिसमें आग लगाने के लिए एक छोटी सी चिनगारी ही काफी होती है। भाजपा इसका उपयोग करने में सिद्धहस्त हो चुकी है। अब तो उसके पास कम्प्यूटराइज्ड आंकड़े और सोशल मीडिया भी दुरुपयोग के लिए उपलब्ध हैं। उल्लेखनीय है कि ताज़ा चुनावों में लगभग नब्बे प्रतिशत सदस्य करोड़पति हैं और 40% से अधिक लोग गम्भीर अपराधों के दागी हैं। ऐसा इसलिए सम्भव हुआ है क्योंकि चुनाव के मुद्दे वे नहीं थे जो होना चाहिए थे। ध्रुवीकरण, धनबल और बाहुबल ने साथ आकर लोकतंत्र का स्वरूप ही बदल दिया है।
सवाल उठता है कि जब सरकारी दल पिछले चुनावों की तुलना में अधिक समर्थन पाकर अधिक सीटों के साथ पुनः सत्तारूढ हो गया है तो सबका विश्वास क्या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छवि सुधारने का जुमला है या सचमुच का बदलाव है? सन्देह इसलिए भी होता है क्योंकि जब तक कि वे एक मध्यम मार्गी राजनीतिक दल के रूप में खुद को स्थापित नहीं कर लेते, ध्रुवीकरण से दूरी कैसे बना सकते हैं, जो उनकी सफलता का मूल आधार है और उसे छोड़ना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना होगा। भाजपा का जो मूल वोट है वह मुसलमानों के प्रति नफरत से ही जुड़ा हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर घटित आतंकी घटनाओं का स्तेमाल अपने देश के मुसलमानों के प्रति नफरत बढाने में किया जाता है। कश्मीर के अलगाववादियों को भी साम्प्रदायिक दृष्टि से देखा जाता है और प्रचारित किया जाता है। दूसरी तरफ कुछ मुस्लिम राजनीतिक दल मुसलमानों के बीच इस बात को प्रचारित करने में लगे हैं कि उनका हित धर्मनिरपेक्ष दलों की जगह उनके साथ आने में सुरक्षित है। इन दलों को तेलंगाना, असम, केरल और महाराष्ट्र में समर्थन बढता भी जा रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि स्वभावतः धर्मनिरपेक्षता की पक्षधर वामपंथी पार्टियों को समर्थन घटा है। अवसरवादी धर्मनिरपेक्ष दलों के सदस्य कब सत्तारूढ दल की गोदी में बैठ जायें इसकी कोई गारंटी नहीं है।
भाजपा भी अब पुरानी भाजपा नहीं है अपितु वह और अधिक चतुर मोदीशाह जनता पार्टी है, जो अटल बिहारी वाजपेयी तक की रीति नीतियों को सम्मान के साथ याद नहीं करती, अपितु उनके कार्यकाल को भी काँग्रेस शासन से जोड़ कर देखती है। पुराने सारे लोगों को किनारे लगा दिया गया है और उनका भी विश्वास इन्हें हासिल नहीं है। जो लोग चुन कर लाये गये हैं वे चुनाव जिता देने के लिए उपकृत भक्त तो हैं किंतु विश्वसनीय नहीं हैं इसलिए उन्हें सत्ता से दूर रखा जा रहा है। राजनाथ सिंह जैसे इक्के दुक्के पुराने मंत्री भी सत्ता में प्रतीक की तरह हैं और सत्ता के प्रमुख फैसलों के लिए नौकरशाही से लोग लाये गये हैं। यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी, राम जेठमलानी, आदि का विश्वास तो पहले ही हार चुके थे, अब तो अडवाणी, जोशी, शांता कुमार ही नहीं, सुषमा स्वराज और अरुण जैटली का विश्वास भी प्राप्त नहीं है। सुब्रम्यम स्वामी जैसे लोग तो पहले भी आलोचक रहे हैं और अब तो सारे अर्थशास्त्री भी उन जैसी भाषा बोलने लगे हैं। एनडीए के साथियों में से सबसे प्रमुख दल जेडी[यू] उनसे विमुख हो गया है व शिवसेना भी संतुष्ट नहीं हो पा रही है। अपना दल रूठा हुआ है, तो बीजू जनता दल तो सदा से दूरी बना कर चलता रहा है। तृणमूल काँग्रेस के लिए भरपूर कोशिश की गयी थी किंतु ममता बनर्जी भी फिलहाल दुश्मनी दिखा कर चल रही हैं।
जिन लोगों की हरकतों के कारण दुनिया भर में बदनामी हो रही है, उनके खिलाफ भी केवल जुबानी जमा खर्च चल रहा है, किसी के प्रति भी प्रभावी अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं हुयी है। कहा तो यह भी जा रहा है कि आरएसएस भी मोदीजी के कद को जरूरत से ज्यादा बढने में खतरा महसूस कर रहा है और छवि निखारने वाले किसी भी कदम को वापिस लेने का दबाव बना सकता है, जैसा कि प्रारम्भ में कथित गौरक्षकों के खिलाफ दिये गये अपने बयान से मोदी को पीछे हटना पड़ा था। उनका यह कहना भी जुमला ही साबित हुआ कि किसी दलित को मारने की जगह मुझे मारो। अब भी दलित उनके गुजरात में ही घोड़ों से उतार उतार पीटे जा रहे हैं।
क्या सबका विश्वास जीतने का जुमला केवल कुछ मुख्तार अबास नकवी, और शाहनवाज जोड़ने तक सीमित होकर रह जायेगा?   
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, जून 10, 2019

टुकड़े टुकड़े गैंग का सही पता


टुकड़े टुकड़े गैंग का सही पता
वीरेन्द्र जैन

जब किसी राजनीतिक दल के प्रचारकों द्वारा उछाले गये जुमले को देश का प्रधानमंत्री दुहराने लगे तो यह निश्चित है कि या तो मामला बहुत गम्भीर है या प्रधानमंत्री गैर गम्भीर है।
तीन वर्ष पहले एक वीडियो एक छात्र संगठन  द्वारा उछाला गया था, जिसमें देश के सबसे प्रमुख विश्वविद्यालय जवाहरलाल यूनिवेर्सिटी में कुछ युवा अफज़ल गुरु की वरसी पर नारे लगाते हुए दिख रहे हैं, जिनमें से एक नारा, ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह’, भी है। कहा जाता है कि अफज़ल गुरु को फांसी मिलने के बाद जेएनयू के छात्रों का एक छोटा सा गुट जो संसद पर हुए हमले में अफज़ल गुरु को निर्दोष मान कर, प्रति वर्ष 9 फरबरी को यह खुला आयोजन करता रहा है। यही आयोजन उसने सन्दर्भित वर्ष 2016 में भी किया था। अंतर इतना था कि तब तक देश में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बन चुकी थी। उल्लेखनीय यह भी है कि जे एन यू में देश की श्रेष्ठतम युवा मेधा अध्ययन और शोध करती है और विभिन्न विचारों के पुष्प एक साथ खिल कर एक सही लोकतांत्रिक हिन्दुस्तान के सच्चे विश्वविद्यालय का स्वरूप प्रस्तुत करते हैं। इस विश्व विद्यालय की स्थापना के समय से ही यहाँ के छात्र संघ पर वामपंथी रुझान के छात्र संघों का प्रभुत्व रहा है जो भाजपा जैसे दक्षिणपंथी और काँग्रेस जैसे मध्यम मार्गी दलों व उनके छात्र संगठनों को अखरता रहा है। केन्द्र में भाजपा की सरकार बनते ही यह विश्व विद्यालय उनके निशाने पर आ गया था। उल्लेखनीय है कि भाजपा नेता व राज्यसभा के सांसद सुब्रम्यम स्वामी ने सरकार बनते ही जे एन यू को बन्द करने की मांग रख दी थी। इस विश्व विद्यालय में सन्दर्भित वर्ष में एआईएसएफ [सीपीआई] छात्र संगठन के कन्हैया कुमार छात्र परिषद के अध्यक्ष थे, और आइसा [ सीपीआई एमएल] के छात्र संगठन की शहला रशीद उपाध्यक्ष थीं। अन्य पदों पर भी वापपंथी छात्र संगठन के छात्र पदाधिकारी थे। जब सुनिश्चित तिथि को कश्मीरी छात्रों के गुट ने स्मृति कार्यक्रम का आयोजन किया तो संसद पर हमले के एक मृत्यु दण्ड प्राप्त आरोपी को देशद्रोही मानने वाले एबीवीपी [भाजपा] छात्र संगठन के लोगों ने पहले से वीडियोग्राफी की व्यवस्था के साथ उन्हें रोकने या उनसे टकराने की कोशिश की थी। छात्रों के बीच झगड़े की खबर सुन कर कन्हैया कुमार समेत अन्य छात्र नेता भी उपस्थित हो गये थे। एबीवीपी ने इसे अवसर की तरह लिया और उसकी शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने जो केन्द्र सरकार के अधीन होती है, कन्हैया कुमार समेत अन्य छात्र नेताओं को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था और उन पर ही आरोप लगा दिया कि उन्होंने “ भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह, इंशा इल्लाह” के नारे लगाये। बाद में कोर्ट ने पाया कि उनके खिलाफ जो वीडियो प्रस्तुत किया गया था उसमें छेड़ छाड़ की गयी थी इसलिए कोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी थी। यदि ऐसे नारे लगाये गये थे तो नारे लगाने वालों को पुलिस कभी गिरफ्तार नहीं कर सकी। कन्हैया कुमार को जमानत के लिए ले जाते समय कुछ वकीलों ने पुलिस हिरासत में कन्हैया के साथ मारपीट की व कोर्ट परिसर में तिरंगे झंडे लहराये। इन्हीं वकीलों के फोटो भाजपा के बड़े बड़े मंत्रियों व नेताओं के साथ गलबहियां करते हुए विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुये किंतु पुलिस हिरासत में कोर्ट ले जाते समय कन्हैया पर किये गये हमले के सन्दर्भ में की गयी किसी दण्डात्मक कार्यवाही की कोई खबर देश को नहीं मिली। इस सब से देश भर में धारणा यह बनायी गयी कि वामपंथी व उसके छात्र संगठन के छात्र देश द्रोही हैं और वे देश के टुकड़े करना चाहते हैं। भले ही अदालत की ओर से उन्हें कोई सजा नहीं मिली किंतु भाजपा पक्ष की ओर से इन्हें लगातार ‘टुकड़े टुकड़े गैंग” की तरह सम्बोधित किया गया। यहाँ तक कि चुनावी प्रचार सभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा भी इस जुमले का प्रयोग किया गया। यह वैसा ही था कि जब भी कोई इस सरकार से सच जानने की कोशिश करता था तो उसे देशद्रोही कह दिया जाता था। उल्लेखनीय यह भी है कि देश के प्रसिद्ध वैज्ञानिकों, इतिहासकारों, लेखकों की हत्या के बाद जब सरकारी दल के संगठनों द्वारा हत्या के आरोपियों का पक्ष लिया गया, उनको संरक्षण दिया गया तो उसके विरोध में अपने पुरस्कार वापिस कर देने वाले देश के प्रतिष्ठित लोगों को ‘अवार्ड वापिसी गैंग’ कह कर पुकारा गया और इस जुमले को चुनाव प्रचार में नरेन्द्र मोदी ने भी दुहराया।
कोई आन्दोलनकारी जब भी कोई नारा लगाता है तो वह चाहता है कि उसे और उसकी विचारधारा को उस नारे के साथ पहचाना जाये। कन्हैया कुमार जिस लोकतांत्रिक संगठन से सम्बन्धित था उसका राष्ट्रीय एकता से तो सम्बन्ध है किंतु वे किसी भी तरह से अलगाववाद से नहीं जुड़े हैं और न ही उनका ऐसा कोई इतिहास रहा है। यह सब जानते हैं कि देश की सबसे प्रमुख इंटेलीजेंस संस्था के प्रमुख के माध्यम से देश के प्रधानमंत्री को तो इस सच का पता ही होगा। इसके बाद भी अगर वे देश के वामपंथियों के लिए टुकड़ टुकड़े गैंग और अवार्ड वापिसी गैंग जैसे जुमलों का प्रयोग करते हैं तो यह शर्म की बात है, क्योंकि देश के प्रधानमंत्री से चुनाव प्रचार में भी गलतबयानी की उम्मीद नहीं की जाती। किसी अन्य प्रधानमंत्री ने कभी ऐसी भाषा या गलत जानकारी का प्रयोग नहीं किया
देशद्रोह के कानून के गलत स्तेमाल ने उस कानून का मखौल बना कर रख दिया है। कोर्ट का फैसला है कि एक लोकतांत्रिक देश में बिना किसी सैनिक तैयारी के सरकार के खिलाफ बोलना देशद्रोह नहीं होता। यदि किसी ने अति क्रोध में ऐसे नारे भी लगाये हैं तो उसे सजा देने के लिए दूसरी अनेक धाराएं हैं। बार बार बात बात में देशद्रोह का आरोप लगाना देश की सैनिक शक्ति का भी अपमान है।
दूसरी ओर यह सच है कि देश में विभाजन का खतरा बढ रहा है और उन असल ताकतों को पहचानने की जरूरत है जिनके कारण यह खतरा बढ रहा है। उल्लेखनीय है कि स्वतंत्रता आन्दोलन के दौर में पाकिस्तान की मांग से पहले ‘ हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान’ का नारा आया था। यह नारा स्वयं में विभाजन के बीजारोपण करने वाला था, और हिन्दी के साथ मिल कर तो बड़े विभाजन के बीज बो रहा था। यही कारण था कि देश के सबसे बड़े राष्ट्रभक्त महात्मा गाँधी ने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति का गठन किया था और उसका मुख्यालय दक्षिण में बनाया था, जिससे दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रयोग को बढा कर राष्ट्रीय एकता अनायी जा सके। आज एक ऐसी सरकार है जो बार बार खुद की पहचान एक हिन्दूवादी सरकार की तरह कराने की कोशिश कर रही है। देश के अन्य अल्पसंख्यकों को जिस तरह से गौहत्या, लवजेहाद, घर वापिसी, धर्म परिवर्तन, आदि के नाम पर प्रताड़ित किया जाने लगा है और बात बात में उन्हें पाकिस्तान जाने को कहा जाने लगा ह। इसका परिणाम यह हुआ कि एक बड़ी आबादी अपने घर में ही खुद को पराया महसूस करने लगी है। इतना ही नहीं दलित जातियों को जिस तरह प्रताड़ित किया जाने लगा है, उससे लगता है कि गैरदलित जातियों के वर्चस्व के लोग सत्ता में हैं और वे कम होते रोजगार के अवसरों व सरकारी नौकरियों के कम होते जाने से जनित संभावित विरोध को आरक्षण से जोड़ना चाहते हैं, ताकि विरोध को विभाजित कर सकें। उत्तरपूर्व में वर्षों से चल रहे अलगाववादी आन्दोलनों को इस दौरान नयी हवा मिली है। आदिवासियों द्वारा अपने जंगलों और जमीनों के दोहन के खिलाफ किये गये प्रतिरोध को पुलिस दमन से दबाये जाने के प्रकरणों में वृद्धि हुयी है। विरोध करने वाले आदिवासियों को नक्सलवादी कह कर उस दमन को सही ठहराया जाता है। सीमा पर होने वाली हलचलों के समय पूरा देश एक साथ सरकार का सहयोग करता रहा है, किंतु अब देश के प्रमुख राजनीतिक दलों तक को सही सूचनाएं नहीं दी जा रही हैं, और पूछने पर उन्हीं को देशद्रोही व दुश्मन को खुश करने वाला बताया जाने लगा है। अपने चुनावी लाभ के लिए जातियों के विभाजन का लाभ लेने के लिए जातिवादी आधार पर टिकिट दिये जाते हैं। साक्षी महाराज को लोधी वोटों के आधार पर, व निरंजन ज्योति को मल्लाह वोटों के आधार पत टिकिट दिया गया। ठाकुर दिग्विजय सिंह के वोटों को काटने के लिए प्रज्ञा ठाकुर को लेकर आये। जहाँ जातियों के आधार पर चुनाव होते हैं, वहाँ चुनावों के दौरान पड़ी दरारें बाद तक बनी रहती हैं।
हाल ही मैं शिक्षानीति में हिन्दी को अनिवार्य करने के नाम पर दक्षिण में सोये हुए हिन्दी विरोध को फिर से कुरेद दिया गया है। उल्लेखनीय है कि चुनावों के दौरान अपने भाषण में सुप्रसिद्ध लेखक जावेद अख्तर ने सही कहा था कि समाज को विभिन्न कारणों से विभाजित करने वाली टुकड़े टुकड़े गैंग तो सत्ता में बैठे हुए लोग हैं जो अपनी गलत नीतियों, व गलत राजनीति से टुकड़ों टुकड़ों में बाँट रही हैं। टाइम पत्रिका ने अगर नरेन्द्र मोदी को डिवाइडर इन चीफ बताया है जो बिल्कुल निराधार तो नहीं है।    
यह जरूरी है कि चुनाव हो जाने के बाद देश में पदारूढ सरकार चुनावी मूड से बाहर निकले व प्रधानमंत्री अपने विभाग में बैठे सैकड़ों प्रतिभाशाली अधिकारियों से प्राप्त जानकारी लेकर ही अपनी बात कहने की आदत डालें, जिससे उनके भाषणों में होने वाली त्रुटियों को देश की त्रुटियों में न गिना जाये। राष्ट्रीय एकता सलामत रहे।
वीरेन्द्र जैन
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