मंगलवार, नवंबर 08, 2011

मीडिया पर जस्टिस मार्कण्डेय के विचार और घालमेल का संकट

मीडिया पर जस्टिस मार्कण्डेय के विचार और घालमेल का संकट 
वीरेन्द्र जैन
      एक बार फिर से आम पढा लिखा व्यक्ति दुविधा में है। वह जब जिस कोण से बात सुनता है उसे उसी की बात सही लगती है और वह समझ नहीं पाता कि सच किस तरफ है। दर असल दोष उसका नहीं है अपितु एक ही नाम से दो भिन्न प्रवृत्तियों को पुकारे जाने से यह भ्रम पैदा होता है।
      जैसे हमने किसान और कुलक[बड़ा किसान] को एक साथ किसान के नाम से पुकारा इसलिए किसानों की आत्महत्याओं से उपजी चिंताओं का लाभ ये कुलक उठा रहे हैं और किसान लगातार आत्महत्या किये जा रहे हैं। यही कुलक किसान नेता के नाम पर पंचायती राज व्यवस्था में पंच, सरपंच, जनपद अध्यक्ष, तथा विधायक, सांसद मंत्री आदि बन कर देश की लूट में हिस्सेदारी करते हैं और कृषि के नाम पर आयकर से लेकर अन्य बड़ी बड़ी छूटें, अनुदान आदि लेते रहते हैं। जब अतिरिक्त बड़ी आमदनी पर टैक्स लगाने का सवाल आता है तो ये जमींदार खेतों में पसीना बहाने वाले किसान का मुखौटा लगा कर प्रकट होते हैं व सरकार को कोसने लगते हैं जिससे सरकार दबाव में आ जाती है। दूसरी ओर मेहनत करने वाला किसान और खेत मजदूर कोई लाभ नहीं उठा पाता, व कर्ज के बोझ तले दबा दबा आत्महत्या की स्थिति तक पहुँच जाता है।
      प्रैस काउंसिल आफ इंडिया का अध्यक्ष बनने के बाद उच्चतम न्यायालय के भूतपूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय ने मीडिया के बारे में जो कुछ भी कहा उसकी भाषा बहुत कठोर है और वह एक ओर से सही होते हुए भी पूरे मीडिया पर लागू नहीं होती, क्योंकि मीडिया का एक वर्ग मुनाफा कमाने वाला उद्योग बन गया है। यही कारण है कि जिस आशंका पर मीडिया की जुबान पर नियंत्रण लगाने और एमरजैंसी जैसे हालात की बात की जा रही है वह मीडिया के माफिया गिरोहों के भय को अधिकप्रकट अकर रही है। सच तो यह है कि जिस मीडिया को एक पवित्र गाय समझा जाता रहा था उसके एक हिस्से ने भेड़िये का रूप ग्रहण कर लिया है और जब उसको नियंत्रण में लाने की बात की जाती है तो पवित्र गाय को आगे कर दिया जाता है। जब से मीडिया बड़ी पूंजी पर आश्रित हो गया है तबसे उसका स्वरूप ही बदल गया है और वह समाचार व विचार देने की जगह प्रचार एजेंसी में बदल गया है, और समाचार भी सच्चाइयों से दूर होकर विज्ञापनों की ही दूसरी किस्म में बदल गये हैं जो भुगतान पर वस्तुओं के अतिरंजित प्रचार की तरह ही व्यक्तियों, दलों, संस्थाओं के साथ अपराधियों और दूसरे समाज विरोधी तत्वों की वैसी छवि प्रस्तुत करने लगते हैं जैसी वे चाहते हैं। इतना ही नहीं कि वे अपने पास आये व्यक्तियों को ही उपकृत करते हैं अपितु वे स्वयं ही उनके पास जाकर सौदा करने लगे हैं। टूजी स्पैक्ट्रम वाले मामले में नीरा राडिया के टेपों से जो खुलासे हुये हैं उनसे तो मीडिया को मीडियेटर कहा जाने लगा है।
      गत लोकसभा चुनाव में भाजपा के लालजी टंडन ने उत्तर प्रदेश के एक बड़े अखबार द्वारा सौदे की पेशकश करने का खुलासा किया था तो मध्य प्रदेश में भाजपा की ही सुषमा स्वराज ने एक अखबार द्वारा दो करोड़ रुपये मांगने का खुलासा किया था, पर दोनों नेताओं ने चुनाव निबत जाने के बाद अखबार पर किसी कार्यवाही की जरूरत नहीं समझी और न ही इसे राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनाना चाहा। भाजपा के ये दोनों उम्मीदवार तो उनके शिखर के नेता हैं इसलिए वे बड़ी राशि माँगे जाने पर इंकार कर सके पर जिन कम चर्चित नेताओं के गुणगान करते हुए उनके जीतने की सम्भावनाओं की अतिरंजित खबरें ये अखबार छापते रहे हैं उन्होंने अवश्य ही इन अखबारों समेत दूसरे कई मीडिया संस्थानों के साथ सौदे किये होंगे। दूसरे दलों के नेताओं ने भी ऐसा ही कुछ किया होगा।
      सवाल यह है कि इस सच्चाई के बाद भी क्या इन आधारों पर पूरे मीडिया को एक ही लाठी से हांका जा सकता है? पूंजीपतियों द्वारा नियंत्रित मीडिया के अलावा मीडिया का एक हिस्सा ऐसा भी है जो निष्पक्ष होकर सच को सच कहते हुए पूरी ईमानदारी से अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहा है और समय समय पर सत्त्ता में प्रवेश कर गयी विकृत्तियों को भी अपने स्टिन्ग आपरेशंस आदि से देश हित में उजागर करता है। इससे सत्ता से जुड़े निहित स्वार्थ उनके दुश्मन हो जाते हैं और उन्हें नुकसान पहुँचाना चाहते हैं। यदि मीडिया के खिलाफ कोई कड़ा कानून लाया जाता है तो वो इन निहित स्वार्थों द्वारा ईमानदार मीडिया को प्रताड़ित करने का साधन भी बन सकता है। इसलिए यह जरूरी है कि रास्ता इनके बीच में से निकाला जाये जिससे साँप भी मर जाये और लाठी भी टूटने से बच जाये। जस्टिस मार्कण्डेय एक खरे व्यक्ति हैं और उनके कार्यकाल के फैसले बताते हैं कि वे हमेशा ही व्यवस्था में घर कर गयी विकृत्तियों के प्रति चिंतित रहे हैं। सामने नजर आ रहे दोषों और उन दोषों के लिए जिम्मेवार लोगों के प्रति वे नरम नहीं रह पाते, व कटु सत्य बोलते हैं। उन्होंने न्याय व्यवस्था और न्यायधीषों के खिलाफ भी कटु टिप्पणियाँ की हैं।
      आईबीएन-सीएनएन पर करण थापर को दिये साक्षात्कार के विवादास्पद मुद्दों को लें तो उससे स्पष्ट होता है कि उनकी सारी आपत्तियां सेठाश्रित मीडिया और सेठाश्रित व्यवस्था के प्रति हैं। वे कहते हैं कि
 मीडिया अक्सर लोगों का ध्यान वास्तविक समस्याओं से हटा देता है जो कि आर्थिक हैं। देश के अस्सी फीसदी लोग मुफलिसी में जी रहे हैं। वे बेरोजगारी, मँहगाई और स्वास्थ सम्बन्धी समस्याओं से जूझ रहे हैं जिससे ध्यान हटाकर फिल्मी सितारों, फैशन परेडों और क्रिकेट का मुजाहिरा करते हैं।
मीडिया अक्सर लोगों को बाँटने का काम करता है। उदाहरण के लिए जब भी मुम्बई, दिल्ली, बंगलौर आदि में बम विस्फोट होता है तो कुछ ही घंटों में तकरीबन हर चैनल दिखाने लगता है कि एक ई-मेल या एसएमएस आया है कि इंडियन मुजाहिदीन ने वारदात की जिम्मेवारी ली है, या जैशे मोहम्मद या हरकत उल जिहाद का नाम लिया जाता है। कुछ मुसलमान नाम आते हैं। देखने वाली बात यह है कि इस तरह के ई-मेल और एसएमएस कोई भी शरारती आदमी भेज सकता है। लेकिन टीवी चैनलों में यह दिखा कर और अगले महीने अखबारों में छाप कर आप महीन ढंग से यह सन्देश देते हैं कि सभी मुसलमान दहशतगर्द और बम फेंकने वाले हैं। इस तरह आप एक समुदाय को बुरा बना रहे हैं जबकि हकीकत यह है कि सभी समुदायों में निन्यानवे प्रतिशत लोग चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान अच्छे हैं।
मुझे यह कहने में अफसोस है कि मीडिया के ज्यादातर लोगों के विवेक का स्तर कफी निम्न है। मुझे इस बात पर शुबहा है कि उन्हें आर्थिक सिद्धांतों, राजनीति शास्त्र, दर्शन या साहित्य के बारे में कुछ पता होगा। मुझे शक है कि उन्होंने ये सारी चीजें पढी होंगी, जो उन्हें पढना चाहिए।
कई चैनल ज्योतिष दिखा रहे हैं, यह राशि है वह रशि, अखिर यह सब है क्या?
हर कोई लोकतंत्र में जबाबदेह है। कोई भी आजादी पूर्ण नहीं है। हर आजादी के लिए तर्कसंगत पाबन्दियां जरूरी हैं

जस्टिस मार्कण्डेय के उक्त विचारों से लगता है कि देश में कोई ऐसी ताकतवर लाबी है जो यह नहीं चाहती जनता की मुफलिसी, बेरोजगारी, मँहगाई,और स्वास्थ सम्बन्धी सवाल सामने आयें वही लोग मीडिया में क्रिकेट फैला दे रहे हैं, जो अफीम की तरह है। मीडिया जो जानबूझ कर एक खास अल्पसंख्यक समुदाय को आतंकी घटनाओं के प्रति जिम्मेवार ठहराने की कोशिश करता है वह यह विभाजन पैदा करके किस को लाभ पहुँचाना चाहता है और ऐसा करने के लिए उसे निश्चित रूप से बहुसंख्यकों की राजनीति करने वाली पार्टी ही प्रोत्साहित कर रही होगी। स्मरणीय है कि अभी हाल ही में अडवाणी की यात्रा के दौरान सतना में पत्रकारों को एक एक हजार रुपयों के लिफाफे देने वाला पकड़ा गया था ।
      इसी मीडिया का चरित्र चित्रण करती हुयी एक फिल्म पीपली लाइव कुछ समय पहले दिखायी गयी थी। इसे देख कर भी मीडिया को बिल्कुल भी शर्म नहीं आयी तथा उसकी घटिया हरकतें जारी रहीं, पर जनता ने जिस उत्साह के साथ उसका स्वागत किया उससे लगता है जनता को मीडिया की ऊटपटांग हरकतें पसन्द नहीं आ रहीं। भ्रष्टाचार के खिलाफ जिस तरह जनता ने अन्ना हजारे ही नहीं अपितु रामदेव तक का स्वागत किया उससे उसके मूड का पता चलता है। मीडिया घरानों की सम्पत्तियां जिस ढंग से उत्तरोत्तर बढ रही हैं और वे आईपीओ तक लाने लगे हैं, दूसरी ओर नये पत्रकारों की बेरोजगारी का लाभ लेते हुए उसे छोटी छोटी राशि का लाली-पाप पकड़ा कर मन चाहा लिखने को मजबूर कर रहे हैं। इससे लगता है कि जस्टिस मार्कण्डेय के विचार को जनता का समर्थन मिलेगा। यदि हम अच्छे और बुरे मीडिया के बीच के अंतर को उजागर कर नियम बनवा सकें तो गेंहू के साथ घुन पिसने से बच सकता है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629
 

1 टिप्पणी:

  1. वीरेन्द्र जी मै आपको पिचले कई महीनों से प्रवक्ता पर पढ़ रहा हु किन्तु आपके लेख बेतुके ही लगे जो .....................
    आज पहली बार किसी पत्रकार का लेख पद रहा हू ऐसा मुझे प्रतिक हो रहा है निश्चित रूप से सत्यपरक निष्पक्ष लेख

    आज मीडिया में ९९% लोग बिकाऊ है .
    मीडिया से जुड़े हर अदने कर्मचारी की प्रथम सोच होती है की वह निष्पक्षता का प्रतिक बने वह निष्पक्षता का अनुसरण भी करना चाहता है

    किन्तु प्रिंट मीडिया वा इलेक्ट्रानिक मीडिया के अलमबरदार(घाघ ) सबसे पहले ब्रेनवाश करते है हर पत्रकार संपादक का निष्पक्षता नाम के कीड़े से पीछा चुदते है क्योकि निष्पक्षता से प्रेस या मीडिया हॉउस नहीं चलते .

    आपको पता होगा एक संपादक पर कितना दबाव होता है अपने आकाओं का .
    इस दबाव को कम करने के लिए मीडिया का नियमन होना जरूरी है .अन्यथा आपके मेरे बच्चे न्यूज़ के नाम पर बिग बोस के भोडे कारनामे देखने को बाध्य है .

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