शुक्रवार, जनवरी 24, 2014

केजरीवाल की तेजी कहीं उम्मीद की भ्रूणहत्या न कर दे

केजरीवाल की तेजी कहीं उम्मीद की भ्रूणहत्या न कर दे
वीरेन्द्र जैन
       अरविन्द केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी आज एक व्यक्ति या पार्टी का नाम नहीं अपितु एक उस  उम्मीद का नाम है जो लम्बे समय से छले जाते नाउम्मीद लोगों ने एक बार फिर से बाँधी है। राजतंत्र से निकल कर आये देश ने लोकतंत्र का अर्थ अपने शासक के चयन का अधिकार समझा और पुराने राजा की जगह अपनी पसन्द का ‘राजा’ चुनने लगे, व समय समय पर उन्हें बदल कर देखने लगे, जबकि लोकतंत्र में जनता की भूमिका को बदलना चाहिए था, जो यथावत प्रजा बनी रही। समय समय पर निराशा की अवस्था में जनता ने कभी समाजवाद और गरीबी हटाओ वाली नई कांग्रेस से, सम्पूर्ण क्रांति का नारा देने वाले जय प्रकाश नारायण से, तो कभी स्वच्छ सरकार और रोजगार का अधिकार देने का वादा करने वाले वीपी सिंह से उम्मीदें बाँधी थीं पर यथास्थिति ने उनके प्रयासों को अपने में वैसे ही समाहित कर लिया जैसे कि कुछ हलचल के बाद कबीर नानक जैसे भक्त कवियों और आर्यसमाज व रामकृष्ण मिशन जैसे सामाजिक आन्दोलनों को पचा लिया गया था।
        बताया जाता है कि आम आदमी पार्टी के कनाट प्लेस स्थित कार्यालय में डेड़ सौ से अधिक आईटी प्रशिक्षित कर्मचारी मनोयोग से काम करते हुये सभी उपयोगी जानकारी एकत्रित करते हैं और नीतियां व कार्यक्रम बनाते हैं जिनमें मीडिया से लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक आवश्यक सूचनाओं का भंडार रहता है। यही कारण है कि अरविन्द केजरीवाल को मात्र एक युवा उत्साही, हवाई आदर्शवादी, या नौसिखिया राजनीतिज्ञ भर नहीं समझा जा सकता। कोई उन्हें किताबी राजनीतिज्ञ कह कर भले ही अवमूल्यित करने की कोशिश करे किंतु आईआईटी से निकले इस व्यक्ति ने इनकम टैक्स कमिश्नर, आरटीआई एक्टिविस्ट के रूप में मैगसेसे पुरस्कार विजेता, अन्ना के आन्दोलन के सूत्रधार और फिर उचित अवसर देख कर एक राजनीतिक पार्टी के गठन, विधानसभा चुनाव में सफल भागीदारी और फिर दिल्ली में सरकार बनाने तक की सीढियां क्रमशः चढी हैं। अब यह साफ है कि अन्ना हजारे केवल एक गान्धी टोपीधारी, स्वच्छ छवि, अनशन विशेषज्ञ मुखौटे के रूप में चुने गये थे जिन्होंने अपने गाँव और प्रदेश में समाज सुधार के कुछ महत्वपूर्ण काम किये थे। अनुभव को ऊर्जा से अधिक महत्व देने वाले हमारे समाज में उनकी छवि एक बुजुर्ग नेतृत्व के रूप में प्रभावकारी तो थी किंतु जनलोकपाल आन्दोलन का सारा संचालन केजरीवाल मित्र मण्डल के पास ही था।
       यह आन्दोलन जानसमझ कर चलाया गया कि लोकपाल विधेयक का विचार दशकों से लम्बित है और कई बार सरकारें बदलने के बाद भी इसे पास नहीं किया गया क्योंकि ऐसा करना अनेक शासकों, प्रशासकों के पक्ष में नहीं है। विसंगति यह थी कि इसके महत्व से कोई इंकार ही नहीं कर सकता था इसलिए इस विधेयक में भांजी मारने वाले राजनेता भी मौखिक रूप से इसकी पक्षधरता करते नजर आते थे। राजनेताओं का यही दोहरापन इस आन्दोलन की जान था क्योंकि इसके स्वरूप पर मतभेद रखने के बहाने जो इसे पास ही नहीं होने देना चाहते थे वे इसका खुला विरोध नहीं कर पा रहे थे। केजरीवाल ने सोचे समझे ढंग से इसे गैरराजनीतिक रखा और हर आन्दोलन को हड़पने का प्रयास करने वाले संघ परिवार से परोक्ष मदद लेकर भी सार्वजनिक रूप से उसके नेताओं को मंच पर नहीं चढने दिया व उमा भारती, रामदेव आदि को कार्यकर्ताओं ने खदेड़ दिया था भले ही बाद में अन्ना हजारे ने पत्र लिख कर खेद व्यक्त कर दिया हो। स्वामी अग्निवेश जैसे लोगों पर आन्दोलनकारियों ने सतर्क निगाह रखी और उनके फोन का वीडियो बना कर उसे सार्वजनिक कर दिया जिसके बाद वे लम्बे समय तक सार्वजनिक मंचों पर नहीं दिख सके। रामदेव ने अपना अलग मंच बना कर अपनी जो फजीहत करायी तो उसके बाद अनेक सरकारी विभागों का ध्यान उनके संस्थानों की ओर गया और जाँच के बाद कर चोरी के अनेक प्रकरण सामने आये। उनके गुरु के गायब होने की जाँच भी उन्हें सन्देह के घेरे में ले गयी जिससे उबरने के लिए उन्हें भाजपा का शरणागत होकर मोदी की अन्धभक्ति में ही बचाव का रास्ता दिखायी दिया। इसी दौरान उन्होंने तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी और अम्बानी परिवार से जुड़े कुछ आर्थिक खुलासे किये।
       अन्ना हजारे बहुत ही सरल और गैरराजनीतिक व्यक्ति हैं इसलिए उन्हें यह गलतफहमी हो गयी थी कि लोकपाल का सारा आन्दोलन उनके विचार और नेतृत्व का परिणाम है जब कि यह सच नहीं था। आन्दोलन के दबाव में जब सरकार लोकपाल विधेयक लायी तो केजरीवाल ने उसे कमजोर विधेयक बता कर उसका विरोध किया ताकि आन्दोलन ज़िन्दा रहे। इस पर स्वाभाविक रूप से संसद के पक्ष और विपक्ष द्वारा यह कहा गया कि कानून बनाने का अधिकार संसद का होता है और अपनी पसन्द का विधेयक लाने के लिए आन्दोलनकारियों को चुनाव का सामना करते हुए संसद में पहुँच कर अपना विधेयक लाना होगा। यह सलाह उन्हें राजनीतिक दल बनाने का नैतिक आधार देती थी इसलिए उन्होंने राजनीतिक दल बनाने की मजबूरी दर्शाते हुये आम आदमी पार्टी की नींव रख ली और इस विचार से असहमत अन्ना हजारे के मुखौटे से मुक्ति पा ली। आन्दोलन का शेष बचा समर्थन भी केजरीवाल ने अपना लिया। यूपीए गठबन्धन के मंत्रियों के भ्रष्टाचार के खुलासे और मँहगाई के कारण जो लोग कांग्रेस से नाराज थे वही लोग भाजपा की राज्य सरकारों के भ्रष्टाचार और कुप्रशासन से भी नाराज थे ऐसे में एक भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिल के लिए आन्दोलन करने वाली तीसरी बेदाग अछूती पार्टी की ओर उम्मीद से देखा जाना स्वाभाविक ही था। आम आदमी पार्टी ने अपना पहला चुनाव केवल दिल्ली विधानसभा के लिए लड़ने की समझदारी दिखायी जबकि उसी समय पाँच विधान सभाओं के चुनाव हो रहे थे। वे जानते थे कि दिल्ली में राजनीतिक वोट अधिक है जबकि पिछड़े राज्यों में जाति, धर्म, क्षेत्र,  धन और भय के प्रभाव से पड़ने वाले वोट राजनीतिक आधार पर दिये गये वोटों को निर्मूल कर देते हैं और यही कारण है कि वामपंथी यहाँ कभी सफल नहीं हो सके। दिल्ली में 28 विधान सभा सीटों की विजय के बाद उनका राजनीतिक पक्ष पूरे देश में चर्चा का विषय बना जबकि 350 से अधिक सीटों पर जीतने वाली भाजपा की जीत का राजनीतिक मूल्यांकन नहीं हुआ। दिल्ली में उन्होंने प्राप्त किये 29 प्रतिशत वोटों में साढे ग्यारह प्रतिशत मत कांग्रेस के व ढाई प्रतिशत मत भाजपा के मतों में से जुटाये। आम आदमी पार्टी ने दक्षिण और वाम दोनों से ही दूर रहने की नीति अपनायी ताकि किसी की पक्षधरता का नुकसान दूसरी ओर से न उठाना पड़े। रहन सहन, सादगी, संघर्ष और ईमानदारी में वे वामपंथियों जैसे दिखे तो नई आर्थिक नीतियों में वे दक्षिणपंथियों के पक्ष में खड़े हुये। भाजपा और कांग्रेस दोनों से ही उन्होंने सरकार बनाने के लिए सहयोग न लेने का संकल्प दुहराया और खुद मांगी भी नहीं। कांग्रेस द्वारा स्वयं दिये सहयोग को स्वीकारने से पहले दूसरे चुनाव खर्च से बचने के नाम पर जनता से पूछने का विकल्प दिया। लालबत्ती की गाड़ी न लेने, बड़े बंगले न लेने, कम वेतन लेने, के साथ साथ उन्होंने रामलीला मैदान में शपथ लेने का प्रदर्शन किया व शपथ के बाद जो गाना गाया उसके बोल थे- इंसान का इंसान से हो भाईचारा, यही पैगाम हमारा। यह गाना साम्प्रदायिक सद्भाव वाला फिल्मी गाना है जिसके बोल साम्प्रदायिकता की राजनीति करने वाली भाजपा को लक्ष्य बनाते हैं। बाद में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के नाम पर पुलिस और केन्द्र सरकार से टकराव लिया और कांग्रेस से दूरी का संकेत भी दिया। इसके लिए धरना स्थल का चुनाव भी वह स्थान रखा जहाँ देश के सबसे बड़े पर्व का आयोजन होना था और मीडिया समेत देश भर से लोग जुटने वाले थे।            
       आगामी लोकसभा चुनाव के लिए तैयारी में जुटी आम आदमी पार्टी के सबसे प्रमुख सहयोगी गैर सरकारी संगठन हैं जिनकी संख्या देश के प्राथमिक स्कूलों से भी अधिक है और जो देशव्यापी हैं। सदस्यता अभियान सब के लिए खुला और निःशुल्क है व उसके बहाने लाखों लोगों के मोबाइल नम्बर प्राप्त कर लिये गये हैं और उम्मीदवारी के लिए भी एक हजार लोगों के पते व मोबाइल नम्बरों सहित जनप्रस्ताव की शर्त रखी गयी है, जिससे बड़ी संख्या में लोगों के साथ एसएमएस सम्पर्क की सुविधा स्थापित हो गयी है, यह नई तकनीक का उपयोग है। उग्र वामपंथ के कुछ संगठनों की सहानिभूति भी इस पार्टी के साथ है जो  प्राथमिक रूप से व्यवस्था विरोधी प्रतीत होती है। प्रशासनिक भ्रष्टाचार और राजनेताओं की सादगी मध्यमवर्ग को खूब भाती है। अपनी जीत के लिए बार बार भगवान, खुदा और वाहेगुरु का आभारी होना धार्मिक लोगों को लुभाता है। सब मिला कर यह पार्टी एक शोले जैसी फिल्म है जिसमें सारे फिल्मी मसाले डाल दिये गये हैं।
       इतने सारे कोणों से काम करने वाला व्यक्ति सीधा सरल दिख सकता है, हो नहीं सकता। उसने मध्यमवर्ग में उम्मीदों के जीएम बीज बोये हैं और वह फसल काटने की बहुत जल्दी में प्रतीत होता है। यह फसल स्वास्थ के लिए कैसी होगी यह भविष्य के गर्त में है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629

  

2 टिप्‍पणियां:

  1. Bahut achha likha. An eye opner. Dimag valon ko kejri ji ki sangat nahin karni chahiye. Kyonki ise kejiri chup chap hijack kar lenge. Kuch aisi hi ek science fiction film maine dekhi thi barson pahle. Meaning thereby keep the mouth shut when you are with Mr. Arvind Kejrival. He may used you and your ideas and then kick you out. This what I derived from this researched article. Thanks Shri Virendra Jain ji.

    Pl see also my blog - 2290dee.blogspot.in- Yaadein/Nostalgia.

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  2. इन दिनों केसरियां की तरह कुछ केजरिये लठैत भी फेसबुक के अखाड़े में लंगोटा घुमाये घूम रहे हैं. उनके कहर से बचे रहे यह कामना है !!
    बाकी सब सच है .
    "इतने सारे कोणों से काम करने वाला व्यक्ति सीधा सरल दिख सकता है, हो नहीं सकता। उसने मध्यमवर्ग में उम्मीदों के जीएम बीज बोये हैं और वह फसल काटने की बहुत जल्दी में प्रतीत होता है। यह फसल स्वास्थ के लिए कैसी होगी यह भविष्य के गर्त में है। "

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