शुक्रवार, दिसंबर 15, 2023

श्रद्धांजलि / संस्मरण मधुप पांडेय

 

श्रद्धांजलि / संस्मरण मधुप पांडेय

प्रो. मधुप पांडेय अपने क्षेत्र के कवियों के मुखिया थे

वीरेन्द्र जैन


मधुप पांडेय जी मेरे धर्मयुग परिवार के सदस्य थे और मैं विनोद में उन्हें धर्म [युग] भाई कहता था। धर्मयुग के रंग और व्यंग्य स्तम्भ में वे मेरे वरिष्ठ थे इसलिए आदरणीय थे। नवभारत विदर्भ क्षेत्र का ही नहीं, किसी समय हिन्दुस्तान का सबसे अधिक सर्कुलेशन वाला अखबार था जिसके रविवारीय परिशिष्ट में स्तम्भ लिखा करते थे। वे अखबार के मालिकों के प्रिय और विश्वासपात्र थे। नागपुर के सीतावर्डी में विदर्भ साहित्य सम्मेलन नामक संस्था का भवन था जिसमें पुस्तकालय, वाचनालय के साथ गोष्ठी कक्ष भी थे। इस संस्था का नियंत्रण नवभारत के मालिक महेश्वरी बन्धुओं के पास था और मधुप पान्डेय एक समय उसकी संचालन समिति के प्रमुख सदस्यों में से एक थे। उनकी लोकप्रियता का एक और आयाम था कि वे पूरे विदर्भ क्षेत्र में होने वाले कवि सम्मेलनों के पसन्दीदा संचालक थे। गणेश उत्सवों के दौरान कवि सम्मेलनों की श्रंखला चला करती थी जिसके संचालक होने के कारण वे देश भर के मंचीय कवियों के आकर्षण का केन्द्र रहा करते थे।

मैंने जब धर्मयुग में छपने का अवसर पाया तो रचनाएं भेजने में निरंतरता बनाये रखी। इसे देख कर तत्कालीन उपसम्पादक सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने मुझ से रंग और व्यंग्य स्तम्भ में लतीफे लिखने के लिए कहा। इस आग्रह या कहें कि मौके को मैं ठुकरा नहीं सका और पूरी क्षमता से इस स्तम्भ में नये नये प्रयोग किये जिनमें से एक साहित्यकारों पर झूठे लतीफे लिखना भी था। इसमें विनोद के लिए लतीफे में साहित्यकार का नाम जोड़ दिया जाता था। कवि सम्मेलन के कवियों का नाम धर्मयुग में आने से उनकी लोकप्रियता में और वृद्धि होती थी। वे इससे खुश होते थे।

इसी दौरान मुझे मधुप पांडेय जी का एक पत्र मिला जिसमें लिखा था कि ‘ इन दिनों आप धर्मयुग में धड़ल्ले से छप रहे हैं, इसी क्रम में एकाध लतीफा मेरे ऊपर भी चिपका दिया करें’। मुझे पत्र पाकर अच्छा लगा और मन में मंचों पर मौका पाने की दबी छुपी कुलबुलाती आकांक्षा को रास्ता मिलता दिखा। मैंने उनका नाम भी जोड़ा, किंतु तभी एक हादसा सा हो गया। मैंने एक लतीफा लिखा था जिसमें मधुप पांडेय के बेटे के स्कूल जाने के प्रारम्भिक अनुभव पर व्यंग्य था।

लतीफे के प्रकाशन के कुछ दिनों बाद उनका पत्र आया कि ‘ आपके लतीफे से एक गड़बड़ हो गयी है। दर असल मेरे कोई संतान नहीं है और आपका लतीफा पढ कर अनेक लोगों ने पिता बनने की बधाइयां देना शुरू कर दिया है।‘ यह महसूस ही किया जा सकता है कि ऐसी दशा में परिवार को कैसा महसूस हो रहा होगा। मैंने क्षमा याचना तो की ही किंतु झूठे लतीफे लिखना बन्द कर दिया।

जब मेरा नागपुर ट्रांसफर हुआ तो उन्होंने विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मेलन भवन में मेरा परिचय कराया जिनमें भाऊ समर्थ, कार्यालय प्रबन्धक परसाई, राजेन्द्र पटौरिया आदि थे। दामोदर खडसे भी उन दिनों नागपुर ही पदस्थ थे जिनसे मैं पूर्व से ही परिचित था। कार्यालीन परिस्तिथिवश मैं नागपुर कुल तीन महीने ही रह सका किंतु इसी दौरान मधुप जी के कारण पूरे नागपुर का हिन्दी साहित्य परिवार मेरा अपना परिवार बन चुका था। नवभारत के एक पूर्व सम्पादक शुक्ला जी भी मोर भवन [ सम्मेलन के भवन का नाम ] नियमित रूप से आते थे और उनके लम्बे सम्पादकीय काल के संस्मरण और उनकी स्मृति दंग कर देती थी। नागपुर से विदा होते समय उन्होंने घर पर खाने के लिए बुलाया था और मैं लतीफे वाली घटना से एक अपराध बोध सा लेकर उनके घर गया था। असमंजस में रहा था कि भाभीजी से क्षमा मांग कर कहीं पुरानी बात को कुरेद कर दुख ना पहुंचा दूं इसलिए लगातार अव्यक्त क्षमाप्रार्थी बना रहा।

मधुप जी की स्मृतियों को सादर नमन। 

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