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शनिवार, दिसंबर 17, 2011

राजनीतिक दलों में उद्योगपति, भूमाफिया, बिल्डर और शिक्षा माफिया


राजनीतिक दलों में उद्योगपति, भूमाफिया, बिल्डर, और शिक्षामाफिया
                                                               वीरेन्द्र जैन
      कोई भी भारतीय नागरिक देश में चुनाव आयोग के पास  पंजीकृत डेढ हजार दलों में से [कैडर आधारित एक बामपंथी दल को छोड़ कर] किसी भी दल की सदस्यता सरलता पूर्वक ग्रहण कर सकता है और शायद ही किसी दल ने सदस्यता के लिए आवेदन करने वाले नागरिक को साधारण सदस्य बनाने से इंकार किया हो। जो दल साम्प्रदायिक समझे जाते हैं वे भी दूसरे समुदाय के सदस्य मिलने पर अपने ऊपर लगे दाग को धोने का नमूना बनाते हुए उसे खुशी खुशी सदस्यता देते हैं, और अन्यथा न जीतने की सम्भावना वाली सीटों से टिकिट भी देते हैं।
      पिछले कुछ वर्षों के दौरान चुनाव आयोग ने स्वच्छ चुनाव कराने की दृष्टि से कुछ  नियमों का पालन करना अनिवार्य तो किया है पर दलों पर ऐसी कोई आचार संहिता लागू नहीं की गयी है जिससे वे हमारे संविधान निर्माताओं के सपनों के अनुसार ही आचरण कर के एक आदर्श लोकतंत्र स्थापित करने में मदद करें। आज हमारे अधिकांश प्रमुख राजनीतिक दल अनेकानेक विकृत्तियों के शिकार हैं और ऎन केन प्रकारेण सत्ता हथियाने व उसका दुरुपयोग करने का प्रयास करने वालों के गिरोह बन गये हैं। किसी दल का व्यय कैसे चलता है इसकी जानकारी ना तो चुनाव आयोग को होती है और ना ही यह जानकारी सार्वजनिक  होती है। आज जब चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को अपनी सम्पत्ति घोषित करना और चुनाव खर्च का दैनिक अडिट होना अनिवार्य कर दिया गया है तो उन उम्मीदवारों को टिकिट देने वाले राजनीतिक दलों के आय व्यय को गोपनीय क्यों रहना चाहिए। जो दल देश के शासक बन सकते हैं उन्हें पारदर्शी होना चाहिए।
      किसी उद्योग द्वारा किसी दल को चन्दा देना कहाँ तक उचित है? यह काम अगर कोई व्यक्ति करता है तो एक मतदाता के रूप में यह उसकी व्यक्तिगत पसन्दगी नापसन्दगी का सवाल होता है किंतु प्रतिष्ठान के रूप में किसी कम्पनी द्वारा किसी दल को चन्दा देने का सीधा सीधा मतलब होता है कि वह एक अनुचित पक्षधरता की चाह में दी गयी रिश्वत है, ताकि सरकार बनने की स्तिथि में उक्त दल उनका मददगार हो। ऐसा होता भी है। रोचक यह है कि एक ही औद्योगिक संस्थान एक से अधिक दलों को चुनावी चन्दा देते हैं जो निश्चित रूप से चुनावी चन्दा नहीं हो सकता क्योंकि एक वोट देने की क्षमता रखने वाला कोई व्यक्ति या कम्पनी का निदेशक भिन्न विचारधारा वाले एक से अधिक दलों में विश्वास कैसे व्यक्त कर सकता है। यह परोक्ष में एक व्यापारिक सौदेबाजी ही होती है। नीरा राडिया के टेप्स और जनार्दन रेड्डी द्वारा अपनी जेब का मुख्य मंत्री बनवाने के बाद वैसे ही प्रधानमंत्री बनवाने का सपना देखने की खबरें इसका ज्वलंत उदाहरण है। यह बात आज पूरा देश जानता है कि भूमाफिया. खननमाफिया, बिल्डर, शिक्षामाफिया, शासकीय सप्लायर, ठेकेदार, आयातक निर्यातक, उद्योगापति आदि ही सरकारें बनवाने में भूमिकाएं निभा रहे हैं अपने पक्ष में नीतियां बनवा रहे हैं। मंत्री और जनप्रतिनिधि इनसे घिरे रहते हैं तथा उनके दस्तखत किये हुए खाली लैटरहैड उनके ब्रीफकेस में पड़े रहते हैं।
      आम तौर पर दल अपने सिद्धांत और घोषणाएं कुछ और बताते हैं तथा चुनाव के बाद आचरण कुछ और करते हैं। जब कोई छोटी मोटी चीज बेचने वाला अपने पैकिट पर  लिखी सामग्री से कुछ भिन्न बेचती पाया जाता है तो अपराधी माना जाता है किंतु पूरे देश की जनता को धोखा देने वाला किसी कानून के अंतर्गत नहीं आता। चुनाव आयोग के पास दलों को अपने चुनावी लाभ के लिए अपने घोषित सिद्धांतों से विचलित होने को रोकने के कोई अधिकार नहीं हैं और न ही इसके लिए ऐसी ही कोई अन्य संस्था या विभाग कार्यरत है। कुछ दलों को छोड़ कर अधिकतर दल किसी नेता की अपनी महात्वाकांक्षा, उसके जातीय, क्षेत्रीय सम्पर्क या गैर राजनैतिक कारणों से अर्जित लोकप्रियता को भुनाने के उद्देश्य से बना लिए जाते हैं। ऐसा कोई नियम नहीं है कि चुनाव आयोग में पंजीकृत कराते समय उसके कार्यक्रम और घोषणा पत्र पर आयोग द्वारा उससे पूछा जाये कि जब उसके दल के घोषणा पत्र में वे ही सारे विन्दु हैं जो पहले से पंजीकृत दूसरे दल में भी हैं तो वह उस दल के साथ मिलकर काम क्यों नहीं कर सकता! बहुत सारे छोटे दल दूसरे बड़े दलों को चुनावी नुकसान पहुँचाने अर्थात लोकतंत्र की भावना को विचलित करने के लिए बना लिये जाते हैं, जिन्हें परोक्ष में उनके विपक्षी मदद कर रहे होते हैं। कुल मिलाकर सारी कवायद लोकतंत्र के नाम पर शासन को कुछ निहित स्वार्थों तक केन्द्रित कर देने के लिए होती है। यह बात पहले कभी दबी छुपी रहती थी पर अब जग जाहिर हो चुकी है। किसी भी व्यवस्था में अगर समय रहते सुधार नहीं होते हैं तो फिर विकृतियों से जनित दुर्व्यवस्था के खिलाफ कभी भी अचानक गुस्सा फूट पड़ता है जो सुधार तो नहीं कर पाता पर स्थापित व्यवस्था को नुकसान अवश्य पहुँचा देता है। इसलिए जरूरी है कि उभरती विकृतियों के समानांतर उसके उपचार भी किये जायें। कुछ उपाय निम्न बिन्दुओं पर केन्द्रित किये जा सकते हैं-
  • राजनीतिक दलों और उनके सदस्यों को एक घोषित आचार संहिता में बाँधा जाये, तथा उस का पालन अनिवार्य किया जाय।
  • दलों की सदस्यता को बेकामों, बेरोजगारों की फौज बनाने की जगह अपने दल की घोषणाओं के लिए काम करने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं के रूप में अनिवार्य बनाये जाने के उपाय किये जायें। इसके लिए दलों में पदोन्नति के लिए राजनीतिक प्रशिक्षण की कक्षाओं को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
  • दलों द्वारा अपनाये गये सामाजिक सुधार के कुछ निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराया जाना चाहिए, जैसे कि सक्षम सदस्यों द्वारा रक्तदान, नेत्र दान, परिवार में टीकाकरण, परिवार नियोजन के आदर्शों का पालन, अपने द्वारा पालित बच्चों को अनिवार्य शिक्षा, सती प्रथा, दहेज प्रथा, साम्प्रदायिकता का सक्रिय विरोध आदि
  • प्रत्येक सदस्य से आय के अनुपात में लेवी तय की जाना चाहिए।
  • चुनाव के लिए टिकिट दिये जाने के सम्बन्ध में कुछ न्यूनतम पात्रताएं तय की जाना चाहिए। इसमें दल में सदस्यता की अवधि भी एक प्रमुख पात्रता होना चाहिए।
  • किसी दल का सदस्य यदि कोई अपराध करता है तो उसके मूल में दल की सामूहिकता का बल भी उसके ध्यान में रहता है। इसलिए आरोप लगने पर दल द्वारा तुरंत जाँच और उसके अनुसार कार्यवाही का किया जाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए ताकि उसकी आँच दल तक न पहुँचे और कोई दल के भरोसे अपराध करने से बचे।
सभी पंजीकृत दलों में आंतरिक लोकतंत्र को बढावा देकर भी दलों और परोक्ष में देश की शासन व्यवस्था में सुधार लाया जा सकता है। इससे कुकरमुत्तों की तरह उग आये जेबी दल भी कम हो कर सच्चे लोकतंत्र को स्थापित होने में सहयोग करेंगे।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629

गुरुवार, दिसंबर 08, 2011

लोकतंत्र का स्वरूप बदलने की जरूरत तो है पर अवसर नहीं




           लोकतंत्र का स्वरूप बदलने की जरूरत तो है पर अवसर नहीं
                                                             वीरेन्द्र जैन
            केन्द्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला का कहना है कि अब देश में नियंत्रित लोकतंत्र अपनाने का समय आ गया है। उनका कहना एक ओर तो समस्याओं की ओर उनकी चिंताओं को दर्शाता है किंतु दूसरी ओर ऐसा हल प्रस्तुत करता है जिसकी स्वीकार्यता बनाने के लिए एक तानाशाही शासन स्थापित करना होगा। स्मरणीय है कि लोकतंत्र का सुख भोग चुके समाज में अब यह सहज सम्भव नहीं है। श्रीमती इन्दिरागान्धी ने एमरजैंसी लगाने के बाद चुनाव हारा था और दुबारा चुन कर आने के बाद कहा था कि वे अब दुबारा कभी एमरजैंसी नहीं लगायेंगीं।
      असल में हमारे देश में जो लोकतंत्र है, उसमें आदर्श घोषणाएं तो बहुत हैं पर व्यवहार में सक्षम द्वारा निर्बल का शोषण सम्भव है। कमजोर न्याय व्यवस्था के कारण सबल और शोषक द्वारा निर्बल के शोषण के खिलाफ दोषियों को दण्डित करना सम्भव नहीं हो पाता, भले ही इसके लिए हमने अच्छे अच्छे कानून बना रखे हैं। प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण विकास और सशक्तीकरण के कार्यक्रम सफल नहीं हो पाते। इसी भ्रष्टाचार से जनित ताकत का प्रभाव चुनावी व्यवस्था पर भी पड़ता है परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में शोषकों के प्रतिनिधि वहाँ बैठ जाते हैं और संसदीय सुधार द्वारा परिवर्तन को सम्भव नहीं होने देते। राष्ट्र के प्रति चिंतित प्रत्येक व्यक्ति के मन में इस दुष्चक्र को तोड़ने की चिंता स्वाभाविक है किंतु यह उन लोगों द्वारा सम्भव नहीं है किंतु जो स्वयं भी इस तंत्र की कमजोरियों से लाभान्वित हो रहे हैं।
      लोकतंत्र से मिले मानव अधिकारों का सर्वाधिक उपयोग भी शोषकवर्ग कर रहा है और मानव अधिकार की ओट में सुरक्षा प्राप्त कर रहा है। न्याय व्यवस्था के छिद्रों के कारण अधिकांश सक्षम लोग दण्ड से बच जाते हैं और घटित अपराध की किसी को भी सजा न मिलने के कारण समाज में कानून के शासन के प्रति अविश्वास बढता जा रहा है, जिससे जंगली न्याय बढता जा रहा है। अदालत से अपने पक्ष में लम्बे समय के लिए स्टे [यथास्थिति] ले लेना और मुकदमों को लम्बा खींचना आम बात हो गयी है। झूठी गवाही से गलत फैसला होने और लालच के आधार पर गवाही से मुकर जाने वालों को जब दण्ड नहीं मिल पाता तो न्याय मजाक सा लगने लगता है। सक्षम लोग इसीलिए अपना फैसला अपनी लाठी से आप ही करने लगे हैं।
      जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था में पचास प्रतिशत से अधिक लोग मतदान ही नहीं करते हों और दिये गये मतों में असली नकली का प्रतिशत निकालना कठिन होता हो तो उस लोकतंत्र पर सन्देह होना स्वाभाविक है। लगातार किये गये विभिन्न चुनाव सुधारों के आते रहने से पता चलता है कि हम पिछले दिनों किस तरह के विकृत चुनावी तंत्र से स्थापित शासनों द्वारा शासित होते रहे हैं। राजनीतिक रूप से अशिक्षित मतदाताओं के डाले गये मत भी उस भावना का प्रतिनिधित्व नहीं करते जो किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की भावना होती है। वे मत तो दबाव से, लालच से, भटका के, साम्प्रदायिक, जातिवादी, क्षेत्रवादी, भाषावादी भावनाएं उभारकर भी डलवा लिये जाते हैं। अपने स्वार्थों के लिए सत्ता हथियाने के प्रयास करने वाले गलत तुष्टीकरण से लेकर गैरकानूनी काम करने वालों को मदद करने तक के हथकण्डे अपनाते हैं जिसके परिणाम स्वरूप अपराधी तत्व राजनेताओं पर दबाव बना कर रहते हैं। जो तंत्र स्वयं के बनाये कानून के खिलाफ काम करने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं के दबाव में काम करने को विवश हो उसे कितना सफल कहा जा सकता है! जिन परम्पराओं, रूढियों, और अन्धविश्वासों को दूर करने के लिए नेतृत्व को काम करना चाहिए था वही वोटों की लालच में उन्हें बढाने में लग गया है। एक तरह की साम्प्रदायिकता का विरोध करते हुए दूसरे तरह की साम्प्रदायिकता से आँखें मूंद ली जाती हैं जिससे साम्प्रदायिकता का उन्मूलन होने की जगह उनमें प्रतियोगिताएं बढ रही हैं।  
      पुलिस तो अपने विशेष अधिकारों और शक्तियों के कारण पहले ही से बदनाम थी पर नौकरशाही और सेना में भी जिस तरह के भ्रष्टाचार उजागर हुये हैं वे हतप्रभ कर देने वाले हैं। जिस मीडिया को लोकतंत्र के हित में वाचडाग की तरह काम करना चाहिए था, वह बिकाऊ बन चुका है जिसका मतलब है कि चौकीदार चोरों से कमीशन ले रहा है। वह चुनावी नेताओं की वैसी छवि बनाने का धन्धा करने लगा है जैसे वे नहीं हैं, किंतु  वैसी बनावटी छवि से उन्हें चुनावी सफलता मिलना सम्भव हो सके।
      कुल मिला कर कहा जा सकता है कि हम जिसे लोकतंत्र मान रहे हैं वह लोकतंत्र है ही नहीं। जरूरत इस बात की है कि लोकतंत्र जिस स्वरूप में होना चाहिए था और नहीं हो पा रहा है उसकी बाधाओं को दूर किया जाये व इसके लिए न्याय व्यवस्था में उचित संशोधन किया जाये। मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मुहम्मद के सुर में सुर मिलाते हुए केंद्रीयमंत्री फारुख अब्दुल्ला जिस मर्यादित लोकतंत्र की बात करने लगे हैं वह इस व्यवस्था में गैर कानूनी लोगों से ज्यादा उन लोगों को नियंत्रित करने लगेगी जो सच्चे लोकतांत्रिक हैं और सार्थक ढंग से असहमति व्यक्त करते हैं। फारुख अब्दुल्ला साहब ने यह नहीं बतलाया कि कथित मर्यादित लोकतंत्र की जिम्मेवारी जिन लोगों के कन्धों पर आयेगी वे किस आधार पर चुने गये होंगे। इसलिए पहली आवश्यकता है जनता को जागरूक बनाना और चुनावी प्रणाली मैं सुधार में सुधार किया जाना।
वीरेन्द्र जैन
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बुधवार, नवंबर 30, 2011

संविधान कानून और अनियंत्रित बयान



संविधान कानून और अनियंत्रित बयान  
                                                               वीरेन्द्र जैन
      संसद और विधानसभाओं के लिए चुने जाने के बाद नेता लोग संविधान की शपथ खाते हैं और उसमें विश्वास व्यक्त करते हैं किंतु इन्हीं नेताओं के आचरण बताते हैं कि या तो वे संविधान में भरोसा नहीं करते या उसकी परवाह नहीं करते। खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश की अनुमति देने के बारे में राजनीतिक दलों में मतभेद हो सकते हैं और वे लोकतांत्रिक तरीके से संसद और उसके बाहर अपनी असहमति दिखाने को स्वतंत्र हैं, किंतु एक राजनीतिक दल की एक कद्दावर नेता जो एक प्रदेश की मुख्यमंत्री भी रह चुकी हों, का यह कहना कि वे विदेशी निवेश वाली खुदरा दुकानों में आग लगा देंगीं, कहाँ तक उचित है! उनकी पार्टी ने भी उनके इस बयान पर कोई असंतोष व्यक्त नहीं किया है। क्या किसी नेता को यह अधिकार है कि वह इस तरह से खुले आम इस तरह की आपराधिक गतिविधि की धमकी देकर भी पूर्व मुख्यमंत्री और सांसद को प्राप्त विशेष अधिकारों और सुविधाओं को प्राप्त कर सके। ये वही मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने पार्टी छोड़ने के बाद अपनी त्यागी हुयी पार्टी के मुख्यमंत्री पर अपनी हत्या का षड़यंत्र रचने का आरोप लगाया था, बाद में वे फिर से उसी पार्टी में सम्मलित हो गयीं।
      किसी भी दल के नेता को विरोध करने का अधिकार कानून की सीमा तक ही होता है। जो सरकार को सीधी चुनौती देते हुये कानून का उल्लंघन करते हैं वे उग्रवादियों की श्रेणी में आते हैं जिनके साथ सुरक्षा एजेंसियां वैसा ही व्यवहार करती रही हैं जैसा कि उन्होंने अभी किशनजी के साथ किया है या इससे पहले कई हजार नक्सलियों, खालिस्तानियों, या लश्कर के लोगों के साथ करती रही है। क्या हमारी सरकार चुनाव लड़ने वाले उग्रवादियों और चुनाव न लड़ने वाले उग्रवादियों में फर्क करती है? क्या उक्त नेता के दल के प्रमुख लोगों, जिनमें देश के नामी गिरामी वकील शामिल हैं, को भी यह ज्ञान नहीं है कि ऐसा बयान देना आपराधिक है और उसके खिलाफ कोई कानून भी है। इसी दल के एक प्रदेश अध्यक्ष जो अपने आप को एक बड़ा पत्रकार मानते आये हैं और इसी आधार पर बाहरी होते हुए भी एक प्रदेश का अध्यक्ष पद व राज्यसभा की सदस्यता प्राप्त किये हुये हैं, अपनी मांगें न माने जाने की दशा में राष्ट्रपति से प्राण त्यागने का अनुरोध करते हैं। यह अनुरोध भले ही हास्यास्पद और छद्म हो किंतु आपराधिक तो है।
 यही काम अगर किसी आम आदमी ने किया होता तो उसको तरह तरह से कानूनी संकट झेलना पड़ता किंतु सरकारी वेतन और पेंशन के साथ ढेर सारी सरकारी सुविधाएं पाने वाले ये लोग वोटरों को बरगलाने के लिए इसी तरह के शगूफे छोड़ते रहते हैं। शायद इन्हें ये भरोसा होगा कि कानून इनके लिए नहीं है।
      उत्तर प्रदेश के एक मंत्री जिनके कार्यकाल में दो अधिकारियों की हत्या हो गयी और तीसरे की जेल में सन्दिग्ध मृत्यु हुयी जिसे आत्महत्या बताया गया। उस मंत्री ने मंत्रिमण्डल से निकाले जाने के बाद अपनी ही पार्टी और एक मुख्य सचिव से अपने जीवन को खतरा बताया। माना जाता है कि उनके पास विभाग में व्याप्त अकूत भ्रष्टाचार के अलावा पार्टी द्वारा एकत्रित दौलत के भी भंडार रहे हैं और उन्हें पार्टी से निकाले जाने के बाद इस दौलत के लिए खूनी संघर्ष छिड़ सकता है।
      मध्य प्रदेश की एक मुँहफट महिला विधायक ने तो अभी हाल के अविश्वास प्रस्ताव पर बोलते हुए ही कहा कि इस विधानसभा पर ताला लगा दिया जाना चाहिए। ऐसा कहते हुए वे यह भूल गयीं कि उन्हें विधायक होते हुए ही अभिव्यक्ति के ये सारे अधिकार प्राप्त हैं और बैठने वाली डाल को काटने वालों को समझदार नहीं कहा जाता। संसद और विधानसभाएं लोकतंत्र के मन्दिर हैं जो देश को बड़े संघर्ष के बाद प्राप्त हुए हैं, इन पर ताला लगा देने के बाद तो तानाशाही या मिलेट्री शासन ही विकल्प बनते हैं।
      मुम्बई में गत 26/11/2008 को हुये हमले के दौरान पकड़े गये एक मात्र आतंकी कसाब की सुरक्षा पर होने वाले खर्च के अतिरंजित आंकड़ों के आधार पर कुछ संगठन यह प्रकट करते रहते हैं जैसे कि सरकार अपने वोट बैंक के लिए उसे दामादों की तरह पाल रही है, जबकि सच यह है कि प्रज्ञा सिंह समेत किसी भी विचाराधीन कैदी को जेल के मैन्यूल के अनुसार ही सुविधाएं मिलती हैं और किसी भी विचाराधीन कैदी की सुरक्षा सरकार की जिम्मेवारी होती है जो सम्भावित खतरों के अनुसार मिलती है। यह नहीं भूला जाना चाहिए कि कसाब और उसको मदद करने के आरोपियों का मुकदमा लड़ने वाले वकील की हत्या कर दी गयी है जिसकी वकालत पर उसको मदद करने के आरोपी बरी हो गये थे। कसाब को कानून के अनुसार दण्ड दिलाना देश में कानून के शासन का प्रमाण है जिसके कारण ही यही सुविधा महात्मा गान्धी और इन्दिरा गान्धी के हत्यारों को भी मिली थी। सरकार पर वोट बैंक के लिए कसाब को सुविधाएं देने के आरोप लगाने वाले बहुत ही गन्दी राजनीति कर रहे हैं क्योंकि इस तरह वे परोक्ष में इस देश के मुस्लिम वोटरों पर भी पाकिस्तान के आतंकवादियों के प्रति सहानिभूति रखने का आरोप भी लगा रहे होते हैं।
      इस समय देश कुछ गम्भीर परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है और राजनेताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने बयानों में न केवल गम्भीर और तथ्यात्मक हों अपितु उनकी भाषा भी संयमित हो। राज्य सभा का एक संसद सदस्य जो अभी जेल में रह चुका है इतना गैर गम्भीर रहा है कि एक रुपये में परमानन्दा दिलाने या झंडू बाम बेचने वाले फिल्मी अभिनेता को देश का राष्ट्रपति बनाने का प्रस्ताव देने लगता है। देश के सर्वोच्च पद को इतने सस्ते में लेना देश के लोकतंत्र का अपमान है। राजनीतिक दलों को भी अपने सदस्यों के बयानों पर अनुशासन बनाना चाहिए।
वीरेन्द्र जैन
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