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शुक्रवार, अगस्त 22, 2025

पुस्तक चर्चा बाल कविता संग्रह ‘बच्चे होते फूल से’

 

पुस्तक चर्चा

बाल कविता संग्रह ‘बच्चे होते फूल से’


वीरेन्द्र जैन

देश के प्रसिद्ध नवगीतकारों में से एक मनोज जैन ‘मधुर’ अपने नवगीतों और उसकी वेब पत्रिकाओं के लिए जाने जाते हैं। वे मंचों के भी मधुर कंठी गीतकार हैं। उनके अनेक नवगीत संग्रह प्रकाशित होकर साहित्य जगत में चर्चित रहे हैं जिन पर अनेक संस्थाओं द्वारा उन्हें पुरस्कृत सम्मानित किया गया है। प्रस्तुत पुस्तक ‘ बच्चे होते फूल से ‘ उनका बाल कविताओं का संग्रह है। इस संग्रह के द्वारा उन्होंने सुधी समीक्षकों का ध्यान आकर्षित कर उनका आशीर्वाद हासिल किया है। इस संग्रह में उनकी वे कविताएं हैं जो उन्होंने मुग्धभाव से बच्चों के कार्यकलापों पर लिखी हैं, इनमें वे कविताएं भी है जो प्राथमिक पाठ सीखते बच्चों की जिज्ञासाएं और अर्जित ज्ञान को अपने दूसरे साथियों के साथ बांटने के क्रम में उनकी गतिविधियों में नजर आती हैं।

बाल कविताओं को हम दो तीन भागों में बांट सकते हैं। पहला भाग तो शिशु गीत होते हैं जिन्हें उनकी माँ, दादी और बुआ चाची आदि गाकर सुनाती हैं और उन्हें स्वर का प्राथमिक ज्ञान देती हैं। देश के प्रतिष्ठित कवि नरेश सक्सेना एक कविता में कहते हैं कि शिशु भाषा से पहले संगीत सीखता समझता है। बिना शब्द के आ आ आ आ के स्वर उसका ध्यान आकर्षित करते हैं और थपकी का संगीत उसे सुला देता है। भाषा का पहला पाठ भी वह माँ या माँ के समान घर की महिलाओं से सीखता है जो उसकी पहली भाषा की शिक्षक होती हैं और इस पाठ को ही मातृभाषा कहा गया है। इसी भाषा से वह माँ से छोटे छोटे संवाद सुनता है जो क्रमशः उसके मानस में बीज की तरह पड़ते हैं और बाद में अंकुरित होते रहते हैं। पहले कुछ वर्ष वह जो बात करता है वह घर में सुनी गयी बातों से सीखी हुयी, घर में देखी हुयी वस्तुओं और व्यक्तियों तक ही सीमित होती है। बात बनाना तो वह बहुत बाद में सीखता है। [ये बात नई है कि अपना समय बचाने के लिए अब घर के लोग उसे मोबाइल थमा देते हैं और वह उससे भी शब्दों को सीखता रहता है।] शिशुओं से संवाद की शैली स्वरों की शैली होती है, उसमें बोलने में कठिन शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता। मा [माँ] दादी दीदी, दुद्धू, आदि से सिखाया जाता है। उसी तरह के शिशु गीत होते हैं जो लल्ला लल्ला लोरी की तरह के होते है। म.प्र. साहित्य परिषद से पुरस्कृत अनवारे इस्लाम की पुस्तक का नाम है ‘ चकइ के चकधम ‘ । मनोज के इस संकलन में भी ‘ घर आयी है, बड़ी बुआ / आज बनेगा मालपुआ और ‘ लोरी गीत ’ जैसी कविताएं हैं, जो लय के सहारे उसका मन बहलाने का काम करती हैं ।

ओशो कहते हैं कि बच्चे किसी के भी हों वे प्यारे लगते हैं, और इसका कारण यह है कि वे सच्चे होते हैं। यह प्यार उस गुण के लिए है जो हर धर्म के मूल सिद्धांतों में सबसे ऊपर आता है। अगर सारे लोग सत्य ही बोलने जानने और जीने लगें तो दुनिया स्वर्ग से बेहतर हो सकती है। यही कारण है कि ईसा मसीह ने कहा था कि स्वर्ग के दरवाजे उनके लिए खुले हैं, जिनके ह्रदय बच्चों की तरह हैं। यह सत्य के प्रति स्वाभाविक आकर्षण है। फूलों समेत प्राकृतिक वस्तुएं उनके रंगों, कोमलता और स्वाभाविकता के लिए भी आकर्षित करती हैं।

हिन्दी साहित्य में सूरदास को शिखर पर इसीलिए प्रतिष्ठापित किया गया है कि उन्होंने सुन सुन कर ही कृष्ण की बाल लीलाओं और भोलेपन का जो वर्णन किया है वह मुग्धकारी है। जब बाल कृष्ण सबकी समझ में आने वाला मासूम तर्क देते हैं कि ‘ ग्वाल बाल सब बैर परे हैं, जबरईं मुख लिपटाओ, मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ‘। रसखान कहते हैं कि ‘ वा छवि खों रसखान विलोकित वारत काम कला निधि कोटी”। यही वात्सल्य निदा फाज़ली में इस तरह से आया है कि ‘ घास में खेलता है इक बच्चा, और माँ बैठी मुस्कराती है/ सोचता हूं मैं आखिर क्यों दुनिया, काबा या सोमनाथ जाती है ‘। वात्सल्य का यही गुण मनोज मधुर की अनेक कविताओं में बिखरा हुआ है।

 मुक्तिबोध साहित्य को संवेदनात्मक ज्ञान कहते हैं। ज्ञान दान में ज्ञान देनेवाले का जो महत्व है उतना ही महत्व है सीखने वाले का भी है, इसलिए दोनों के समन्वय के बिना शिक्षण प्रशिक्षण सम्भव नहीं होता। वे ही शिक्षक सफल हुये हैं जो शिक्षार्थी के स्तर पर उतर कर अपनी बात कहते हैं। उसे रोचक बना कर कहना एक विशेष गुण होता है। छन्द की कविता अपनी लय और अनुशासन के कारण उसे आसान कर देती है। आमिर खान की फिल्म ‘ सितारे जमीं पर ‘ इसी बात को कहती है कि जब शिक्षक गा कर और अभिनय के सहारे ज्ञान देता है तो कम विकसित दिमाग का बच्चा भी उसे समझने लगता है। सन्देश को ग्रहण करता है।

इस संकलन में अक्षर ज्ञान और भाषा को समझने वाले बच्चों को गीत कविता के माध्यम के सहारे ढेर सारी जानकारियां और अच्छी अच्छी बातें बतायी गयी हैं जिनमें ‘गिनती गीत’ ‘जादूगर’ ‘ मेरी प्यारी दोस्त गिलहरी’ ‘पुस्तक मेला’ ‘हमारा प्यारा भारत देश ‘ ‘चूहों के सरदार ने ‘ ‘सैर सुबह की ‘ ‘पाली क्लीनिक’ ‘ सैर करो जी ‘ ‘मेरा नाम जिराफ़ है’ ‘जाओ स्वेटर लेकर आओ’ ‘मैट्रो पकड़ी चिड़ियाघर की ‘ ‘विटामिन डी’ ‘दो गज की दूरी बहुत जरूरी ‘ ‘मोबाइल से दूरी ‘ ‘पानी है अनमोल ‘ ‘अल्मोड़ा’ आदि रचनाएं संकलित हैं। कुछ कथाएं भी गीत कविता के माध्यम से कही गयी हैं। यह हमारी परम्परा है कि रामायण से लेकर महाभारत तक कथात्मक ग्रंथों को काव्य के द्वारा व्यक्त किया गया है और इसीलिए वे कालजयी रचनाएं बन सकी हैं। बच्चों को जो उपदेशात्मक कविताएं बचपन में सिखायी जाती हैं वे जीवन भर उनके साथ रहती हैं। ‘ चन्दा मामा दूर के ‘ ‘ मछली जल की रानी है, उसका जीवन पानी है’ या ‘लकड़ी की काठी, काठी का घोड़ा’ सबको याद आती है। यदि बच्चे अपनी कविताएं खुद लिख पाते तो वही यथार्थ लिखते जिसे वे महसूस कर रहे होते हैं।

बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, उनके सहारे कौशल सीखते हैं वहीं दूसरी तरफ बड़े लोग बच्चों से खेलते हैं । फूल से कोमल स्पर्श वाले बच्चे उन्हें संवेदना सिखाते हैं। मंटो की एक कथा है जो कहती है कि साम्प्रदायिक दंगों के दौरान शाम को एक जगह बैठ कर दिन भर के कार्यकलाप बताते हैं कि किसने कितनी बहादुरी दिखा कर कितने विधर्मियों को मारा। उनमें एक व्यक्ति बुझा बुझा बैठा है और पूछने पर बताता है कि उसने आज एक बच्चे को मारा, तो उसकी बात पर सारे लोग हँसने लगते हैं कि बस एक बच्चे को मारा। इस प्रतिक्रिया पर वह कहता है कि बच्चे को मारना सबसे कठिन होता है। कारण पूछने पर वह बताता है कि बच्चे को मारते समय अपने बच्चे याद आने लगते हैं।

बच्चे फूलों की तरह दुनिया को सुन्दर बनाते हैं और जैसा कि नीत्शे ने कहा था ‘ सुन्दरता संसार को बचायेगी ‘ यह काम फूल से बच्चों को संवार कर ही होगा।    

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

 

 

 

 

 

 

 

शनिवार, नवंबर 19, 2022

समीक्षा नरेन्द्र मौर्य के गज़ल संग्रह ‘सदी पत्थरों की ‘ पर कुछ बेतरतीब विचार

 

समीक्षा

नरेन्द्र मौर्य के गज़ल संग्रह ‘सदी पत्थरों की ‘ पर  कुछ बेतरतीब विचार


वीरेन्द्र जैन

दुष्यंत कुमार के बाद हिन्दुस्तानी [ हिन्दी-उर्दू ] भाषा में व देवनागरी लिपि में लिखी गयी गज़लों की बाढ आ गयी क्योंकि यह विधा पाठकों और कवियों दोनों को भा रही थी। इस विधा ने हिन्दी के गीतों और दूसरे छन्दों को पीछे छोड़ दिया। नरेन्द्र मौर्य की ‘अपनी बात’ के अनुसार वे भी गत तीस वर्षों से इसी भाषा और लिपि में रचनारत हैं जिसे गज़ल या हिन्दी गज़ल कहा जाता है। इसे मैं गज़ल की मूल विधा या कहें कि उर्दू गज़ल से थोड़ा भिन्न इसलिए मानता हूं क्योंकि बहुत सारे रचनाकारों ने इसके मूल अनुशासन को तोड़ कर अपनी बात कही है और जहाँ कथ्य में दम था वहाँ शिल्प को नकार कर भी रचना स्वीकारी गयी है। चूंकि यह बाढ दुष्यंत कुमार के प्रभाव के बाद आयी थी इसलिए इसमें स्वातंत्रोत्तर राजनीति का मूल्यांकन प्रमुख रूप से उभरा। नरेन्द्र मौर्य लिखते हैं कि उन्होंने पत्र पत्रिकाओं में निरंतर लिखते हुए भी अपने संकलन को लाने का विचार तब किया जब उन्हें श्री अनवारे इस्लाम जैसे उस्ताद शायर की सलाह प्राप्त हुयी जिसके आधार पर उन्होंने पर्याप्त सुधार किये। उस्ताद की सलाह पर आये संकलनों को परोक्ष में संयुक्त उपक्रम माना जा सकता है जिसके लिए रचनाकार ने पुस्तक में आभार प्रकट किया ही है।

मैं भी दुष्यंत के बाद तेजी से फैली इस विधा को पसन्द करने वाले लोगों में रहा हूं इसलिए अनेक रचनाकार मुझे भी अपनी कृति भेंट करने की कृपा करते हैं और सौजन्यतावश उस पर अपने विचार बताने की व्यवहारिकता निभाते हैं, जबकि मेरे साथ वे भी जानते होंगे कि मैं पाठकीय प्रतिक्रिया ही दे सकता हूं और एक अधिकृत समीक्षक नहीं हूं। सन्दर्भित संकलन ‘ सदी पत्थरों की ‘ पर भी अपने विचार इन्हीं सीमाओं में रह कर व्यक्त कर रहा हूं।

गज़ल में मतले के शे’र में व्यक्त तुकांत के बाद का अनुशरण करते हुए भिन्न भिन्न रंग के शे’र कहे जा सकते हैं जो उसी बहर और काफिये में अलग विषय पर हो सकते हैं। इस संकलन में संकलित बहुत सारी गज़लों के शे’र , गीतों की तरह एक ही विषय पर कहे गये शे’र हैं। हिन्दी गज़ल के शे’र गज़लों की पुरानी परम्परा के अनुसार निजी प्रेम के सुख दुखों पर या महबूबा के सौन्दर्य या कोमलकांत व्यवहार, बफा बेबफाई आदि तक सीमित नहीं हैं अपितु उनमें जमाने भर के दुख दर्द शामिल हैं। रहबरों की रहजनों की तरह की जाने वाली हरकतों का वर्णन है।

मेरा मानना है कि वैज्ञानिक और अवैज्ञानिक विचारधारा साथ साथ नहीं चल सकती । बहुत सारे लोग यह घपला कर रहे हैं किंतु नरेन्द्र की गज़लों में कथित धार्मिकों और धर्म के ठेकेदारों के कारनामों की कलई खोली गयी है। ईश्वर के अस्तित्व के बारे में कुछ ना कहते हुए भी वे उसके ठेकेदारों द्वारा बनायी गयी दुर्व्यवस्था पर निरंतर सवाल उठाते हैं।

ये सरफिरा भी कैसे खुरापात करे है

अल्ला मियां से कैसे सवालात करे है

कैसी इमारतों मे खुदा कैद हो गया

खुद अपने घर को कौन हवालात करे है। [पृष्ठ 11 ]

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झूठ के देवता को नहीं मानते

जा तिरे हम खुदा को नहीं मानते

राम का नाम लेकर करें कत्ल जो

उस सियासी फ़जा को नहीं मानते [पृष्ठ 12]

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भूखे पेटों को रोटी चाहिए

जो भरे हैं पेट उनको राम दे  [पृष्ठ 27 ]

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हम तुम तो अपना हुनर बेचते हैं

शातिर, खुदाओं का डर बेचते हैं [ पृष्ठ 31 ]

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कहाँ वीरानियों में दिल लगे है

अकेला आदमी पागल लगे है

कहाँ जायें भला फरियाद करने

खुदा ही जानिए कातिल लगे है  [पृष्ठ 35]

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कितने पंडे पुजारी हैं मुल्ला यहाँ

और कितने तुझे अर्दली चाहिए [पृष्ठ 46 ]
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पता ही नहीं जिसकी मौजूदगी का

कभी दर पै उसके भी झुकना पड़ा है  [पृष्ठ 64 ]

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वही पत्थर जिसे हम पूजते थे

उसी से चोट खाना पड़ गया है [पृष्ठ 69 ]
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खुदाया लूट कर हमको तिरे खादिम यूं कहते हैं

जो मुश्किल में है पैगम्बर तो फिर तेरी गुजर क्यों हो [पृष्ठ 69 ]

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उनकी गज़लों में सियासत की बातें बहुत ही स्पष्ट और साफ साफ कही गयी हैं। गत तीस वर्षों की उनकी गज़लों के शे’रों में वर्तमान की राजनीति के चेहरे भी साफ पहचाने जा सकते हैं –

विरासत की बड़ी ऊंची इमारत

सियासत को गिराने की पड़ी है

नहीं कोई मियां सुनने को राजी

सभी को बस सुनाने की पड़ी है [ पृष्ठ 37 ]

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जो मानो तो ये फलसफा हो गया

वो झुक कर जरा सा, बड़ा होगया

जो पियक्कड़ थे खामोश पीते रहे

कठमुल्लों को लेकिन नशा हो गया

राह सूझी नहीं, बैठे जब तक रहे

उठके चलने लगे रास्ता हो गया

जमाने का उसपै असर ये हुआ

मदारी था अब मसखरा हो गया [ पृष्ठ 45 ]

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तेरे कायदे कानून दुनिया से निराले है

       लुटेरा भी यहाँ देखो तो पहरेदार मांगे है  [पृष्ठ 47 ]

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डोले है ये धरती जब अपनी ही मस्ती में

चाँद सितारों को आने लगते हैं चक्कर से

सरकस जैसी लगती है अब मुझे सियासत भी

जिसमें करतब करते रहते नेता जोकर से    [पृष्ठ 56 ]

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इस दौरे तरक्की के वल्लाह दो चेहरे हैं

इंडिया में उजाला है, भारत में अंधेरे हैं   [पृष्ठ 60 ]

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धर्म अहिंसा की पोथी तो बाँध के रख दी है सबने

अब तो भाई के सीने पर भाई ही गोली दागे है [पृष्ठ 95 ]

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जबसे हुजूर बज्मे सियासत में आ गये

जितने तमाशेबाज थे हरकत में आ गये

यार तू कातिल की भी दरियादिली तो देख

खुद कत्ल करके बेहया मैयत में आ गये [पृष्ठ 96 ]

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नाज था जिस पर सियासत देख ले

वो तेरा किरदार तो बौना हुआ    [पृष्ठ 100 ]

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करो फैसला और छोड़ दो लोगों पर

ये जनता की राय वाय अब छोड़ो भी

देखा है वादों का जुमला बन जाना

कितने धोखे खाय वाय अब छोड़ो भी

इन्हीं मसखरों से चलना है देश मने

कौन रहनुमा आय जाय अब छोड़ो भी [पृष्ठ 124 ]  

इस संग्रह में और कुछ याद रह जाने वाले शे’र हैं-

बहुत मुश्किल है यूं चुपचाप जीना

कभी तो आस्मा सर पर उठा रख

भले ही आंसुओं से सींच लेकिन

बस उम्मीद का पौधा हरा रख  [ पृष्ठ 24 ]

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छोड़ दे हमको किसी भी मोड़ पर

और उनको चाहे चारों धाम दे [ पृष्ठ 24 ]

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नहीं तो फकत खाली धुंआ है

बरस जाये तभी बादल लगे है  [ पृष्ठ 35 ]

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खोल में सब अपनी अपनी बन्द हैं

       लोग भी खुल कर यहाँ मिलते नहीं

उसको इक अच्छा सा नौकर चहिए

क्या करें पर बेजुबां मिलते नहीं   [ पृष्ठ 43 ]

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झूठ बोलना गुनाह है

सच कहूं तो दिल्लगी लगे  [पृष्ठ 58 ]

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शहर तक जो अभी पहुंचा नहीं है

उसे फिर गाँव जाना पड़ गया है  [पृष्ठ 69 ]

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कैसे जाहिल थे हम भी, शहर में ऐसे आ पहुंचे,

बच्चा ये स्कूल तो पहुंचा, घर में बस्ता भूल गया  [पृष्ठ 71 ]

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दो और दो अब चार नहीं होगा हमसे

कहता है सरकार नहीं होगा हमसे

बढता पानी देख डरे है दिल मेरा

अब ये दरिया पार नहीं होगा हमसे [पृष्ठ 106 ]

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समाज में निरंतर सूखती जा रही संवेदनाओं ने मानव जाति को जिस तरह के पत्थर में बदल दिया है उसे महसूस करके ही उन्होंने अपने संग्रह का नाम ‘ सदी पत्थरों की ‘ रखा है।   

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वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

 

 

गुरुवार, मार्च 24, 2022

समीक्षा – जिन्हें जुर्मे इश्क पे नाज था

 

समीक्षा – जिन्हें जुर्मे इश्क पे नाज था

संवेदनात्मक ज्ञान को चरितार्थ करती पुस्तक

वीरेन्द्र जैन

मुक्तिबोध ने कहा था कि साहित्य संवेदनात्मक ज्ञान है। उन्होंने किसी विधा विशेष के बारे में ऐसा नहीं कहा अपितु साहित्य की सभी विधाओं के बारे में टिप्पणी की थी। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जिस रचना में ज्ञान और संवेदना का संतुलन है वही साहित्य की श्रेणी में आती है।  

खुशी की बात है कि विधाओं की जड़ता लगातार टूट रही है या पुरानी विधाएं नये नये रूप में सामने आ रही हैं। दूधनाथ सिंह का आखिरी कलाम हो या कमलेश्वर का कितने पाकिस्तान , काशीनाथ सिंह का काशी का अस्सी हो या वीरेन्द्र जैन [दिल्ली] का डूब, सबने यह काम किया है। पंकज सुबीर की ‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क पे नाज़ था’ इसीकी अगली कड़ी है।

       अमूमन उपन्यास अनेक चरित्रों की अनेक कहानियों का ऐसा गुम्फन होता रहा है जिनके घटित होने का कालखण्ड लम्बा होता है और जो विभिन्न स्थलों पर घटती रही हैं। यही कारण रहा है कि उसे उसकी मोटाई अर्थात पृष्ठों की संख्या देख कर भी पहचाना जाता रहा है। चर्चित पुस्तक भी उपन्यास के रूप में सामने आती है। इसका कथानक भले ही छोटा हो, जिसका कालखण्ड ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यास ‘नरक यात्रा’ की तरह एक रात्रि तक सिमिटा हो किंतु तीन सौ पृष्ठों में फैला इसमें घटित घटनाओं से जुड़ा दर्शन और इतिहास उसे सशक्त रचना का रूप देता है भले ही किसी को उपन्यास मानने में संकोच हो रहा हो। ईश्वर की परिकल्पना को नकारने वाली यह कृति विश्व में धर्मों के जन्म, उनके विस्थापन में दूसरे धर्मों से चले हिंसक टकरावों, पुराने के पराभवों व नये की स्थापना में सत्ताओं के साथ परस्पर सहयोग का इतिहास विस्तार से बताती है। देश में स्वतंत्रता संग्राम से लेकर समकालीन राजनीति तक धार्मिक भावनाओं की भूमिका को यह कृति विस्तार से बताती है। इसमें साम्प्रदायिक दुष्प्रचार से प्रभावित एक छात्र को दुष्चक्र से निकालने के लिए उसके साथ किये गये सम्वाद के साथ उसके एक रिश्तेदार से फोन पर किये गये वार्तालाप द्वारा लेखक ने समाज में उठ रहे, और उठाये जा रहे सवालों के उत्त्तर दिये हैं। पुस्तक की भूमिका तो धार्मिक राष्ट्र [या कहें हिन्दू राष्ट्र] से सम्बन्धित एक सवाल के उत्तर में दे दी गयी है, जिससे अपने समय के खतरे की पहचान की जा सकती है।

 
       “जब किसी देश के लोग अचानक हिंसक होने लगें। जब उस देश के इतिहास में हुए महापुरुषों में से चुन-चुन कर उन लोगों को महिमा मंडित किया जाने लगे, जो हिंसा के समर्थक थे। इतिहास के उन सब महापुरुषों को अपशब्द कहे जाने लगें, जो अहिंसा के हामी थे। जब धार्मिक कर्मकांड और बाहरी दिखावा अचानक ही आक्रामक स्तर पर पहुँच जाए। जब कलाओं की सारी विधाओं में भी हिंसा नज़र आने लगे, विशेषकर लोकप्रिय कलाओं की विधा में हिंसा का बोलबाला होने लगे। जब उस देश के नागरिक अपने क्रोध पर क़ाबू रखने में बिलकुल असमर्थ होने लगें। छोटी-छोटी बातों पर हत्याएँ होने लगें। जब किसी देश के लोग जोम्बीज़ की तरह दिखाई देने लगें, तब समझना चाहिए कि उस देश में अब धार्मिक सत्ता आने वाली है। किसी भी देश में अचानक बढ़ती हुई धार्मिक कट्टरता और हिंसा ही सबसे बड़ा संकेत होती है कि इस देश में अब धर्म आधारित सत्ता आने को है।’’ रामेश्वर ने समझाते हुए कहा। “     

 

इस पुस्तक में टेलीफोन के इंटरसेप्ट होने के तरीके से इतिहास पुरुषों में ज़िन्ना, गाँधी, नाथूराम गोडसे के साथ सम्वाद किया गया है जैसा एक प्रयोग फिल्म ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ में किया गया था। इस वार्तालाप से उक्त इतिहास पुरुषों के बारे में फैलायी गयी भ्रांतियों या दुष्प्रचार से जन्मे सवालों के उत्तर मिल जाते हैं। कथा के माध्यम से निहित स्वार्थों द्वारा कुटिलता पूर्वक धार्मिक प्रतीकों के दुरुपयोग का भी सजीव चित्रण है।

नेहरूजी के निधन पर अपने सम्वेदना सन्देश में डा. राधाकृष्णन ने कहा था कि “ टाइम इज द एसैंस आफ सिचुएशन, एंड नेहरू वाज वैल अवेयर ओफ इट”। महावीर के दर्शन में जो सामायिक है वह बतलाता है कि वस्तुओं को परखते समय हम जो आयाम देखते हैं, उनमें एक अनदेखा आयाम समय भी होता है क्योंकि शेष सारे आयाम किसी खास समय में होते हैं। जब हम उस आयाम का ध्यान रखते हैं तो हमारी परख सार्थक होती है। पंकज की यह पुस्तक जिस समय आयी है वह इस पुस्तक के आने का बहुत सही समय है। कुटिल सत्तालोलुपों द्वारा न केवल धार्मिक भावनाओं का विदोहन कर सरल लोगों को ठगा जा रहा है, अपितु इतिहास और इतिहास पुरुषों को भी विकृत किया जा रहा है। पुराणों को इतिहास बताया जा रहा है और इतिहास को झुठलाया जा रहा है। आधुनिक सूचना माध्यमों का दुरुपयोग कर झूठ को स्थापित किया जा रहा है जिससे सतही सूचनाओं से कैरियर बनाने वाली पीढी दुष्प्रभावित हो रही है जिसका लाभ सत्ता से व्यापारिक लाभ लेने वाला तंत्र अपने पिट्ठू नेताओं को सत्ता में बैठा कर ले रहे हैं। ऐसे समय में ऐसी पुस्तकों की बहुत जरूरत होती है। यह पुस्तक सही समय पर आयी है। हर सोचने समझने वाले व्यक्ति की जिम्मेवारी है कि इसे उन लोगों तक पहुँचाने का हर सम्भव प्रयास करे जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। शायद यही कारण है कि देश के महत्वपूर्ण चिंतकों ने सुबीर को उनके साहस के लिए बधाई देते हुए उन्हें सावधान रहने की सलाह दी है।       

इस कृति की कथा सुखांत है, किंतु इसके सुखांत होने में संयोगों की भी बड़ी भूमिका है। कितने शाहनवाजों को रामेश्वर जैसे धैर्यवान उदार और समझदार गुरु मिल पाते हैं! कितने जिलों के जिलाधीश वरुण कुमार जैसे साहित्य मित्र होते हैं, विनोद सिंह जैसे पुलिस अधीक्षक होते हैं, और भारत यादव जैसे रिजर्व फोर्स के पुलिस अधिकारी मिल पाते हैं, जो रामेश्वर के छात्र भी रहे होते हैं व गुरु की तरह श्रद्धाभाव भी रखते हैं। आज जब देश का मीडिया, न्यायव्यवस्था, वित्तीय संस्थाएं, जाँच एजेंसियों सहित अधिकांश खरीदे जा सकते हों या सताये जा रहे हों, तब ऐसे इक्का दुक्का लोगों की उपस्थिति से क्या खतरों का मुकाबला किया जा सकता है या इसके लिए कुछ और प्रयत्न करने होंगे?

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

समीक्षा आड़ा वक्त [उपन्यास]

 

समीक्षा

आड़ा वक्त [उपन्यास]

लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस से प्रकाशित चर्चित कहानीकार राज नारायण बौहरे की नई औपन्यासिक कृति का नाम है। यह एक भारतीय किसान परिवार की जीवन कथा है। कथा का काल आज़ादी के बाद का है जिसमें ना तो फसल बीमा की सुविधा है, और ना ही जीवन बीमा की। उस पर समाज की रूढियां उसे जकड़े हुये हैं। यह मध्य भारत के किसानों के जीवन में आये परिवर्तनों और चुनौतियों को दर्शाने वाली कृति है। उपन्यास के पहले भाग में अविकसित असिंचित खेती से जूझते किसान का चित्रण है जिसे प्रकृति की प्रतिकूलता में मजदूरी करना पड़ती है दूसरी ओर समानांतर रूप से चल रहे देश निर्माण में शिक्षा के प्रचार प्रसार से किसान परिवार अपनी अगली पीढी को शिक्षित कर रहा है, गाँव के पास पालीटेक्निक कालेज खुल रहे हैं व देश की राजधानी में एम्स जैसे अस्पताल भी बन चुके हैं। इन परिवारों में गरीबी के बाबजूद बचा रह गया भाईचारा और समर्पण की भावना क्रमशः घट रही है। प्रारम्भ में सुख दुख में भागीदारी थी। आगे जैसे जैसे विकासशील देश में योजनाएं चलती हैं तो नौकारियों की सम्भावनाएं भी बढती जाती हैं। पहले नौकरियों के लिए आज की तरह की मारामारी नहीं थी कि कोई बड़ी बड़ी डिग्री लिये लिये ही ओवर एज हो जाये। पढने के बाद नौकरी मिल भी जाती थी।

कथा का मूल भाव किसान का जमीन के प्रति भावनात्मक लगाव है जिसकी रक्षा में वह मानवीय रिश्तों तक को तिलांजलि दे सकता है। खेत को उर्वर बनाने के लिए वह उसे बच्चे जैसा संवारता है और माँ जैसा सम्मान करता है। कैसी भी मजबूरी में अपनी जमीन को बेचने के प्रस्ताव पर उसे आग लग जाती है और वह ऐसे प्रस्तावक के प्रति सारे लिहाज भूल जाता है। कुंआ खुदवाने, जमीन को समतल करने के लिए, उसमें जम आयी छेवले की जड़ों को उखाड़ने से लेकर खरपतवार हटाने का काम वह खुद ही प्रतिदिन करता है। पैतृक सम्पत्ति में वैसे तो सभी वारिसों की बराबर से हिस्सेदारी होती है किंतु अन्य नौकरी या व्यवसाय करने वाले, किसानी करने वाले भाई द्वारा जमीन को सुधारने, संवारने व उसकी रक्षा करने का मूल्य नहीं समझते। अटूट प्रेम रखने वाले भाइयों के बीच यह टकराव का कारण बनता है। कथा नायक अपने किसान वर्ग के प्रति इतना सचेत है कि किसी की भी जमीन अधिग्रहण में आ रही हो तो उसके विरोध में उस अपरिचित का साथ देने देने के लिए तैयार हो जाता है। एक बार् अचानक ही किसान आन्दोलन में पहुँच जाने पर जब टीवी संवाददाता उसे आन्दोलनकारी किसान समझ सवाल करने लगते हैं तो वह उनके सवालों का किसी मंजे हुये नेता की तरह सटीक जबाब देता है, भले ही वह आन्दोलन का हिस्सा नहीं होता। अनुभवों के साथ उनकी अभिव्यक्ति की क्षमता ही व्यक्ति को नेता बना देती है। कथा नायक का सगा भाई जब ओवरसियर बन कर सुदूर छतीसगढ में प्रशासनिक कार्य करने लगता है तब उसे सरकारी कार्यों की असलियत समझ में आती है।

उपन्यास घटना प्रधान उतना नहीं है जितना वर्णनात्मक  है, इसमें नये नये ओवरसियर द्वारा ठेकेदारों से मिलने वाली दस्तूरी के प्रति प्रारम्भिक द्वन्द भी है। मंत्री द्वारा स्थानांतरण के लिए परोक्ष में मांगी गयी रिश्वत का वर्णन भी है। छतीसगढ के जीवन की विडम्बनाएं भी हैं कि कैसे वे नदी की रेत को छान कर उसमें से सोने के कण तलाशते हैं, या बेरोजगारी से लड़ते हुए मिशनरियों से मिली शिक्षा व सुविधाओं के लिए वे थोपे गये अनुपयोगी धर्म को छोड़ देने में ही अपना भला समझते हैं। उपन्यास में बताया गया बेरोजगारीके प्रभाव में कथा नायक की बहिन का पति किस तरह गड़े हुए खजानों के चक्कर में तांत्रिकों के चक्कर में फंस जाता है।

उपन्यास प्रारम्भ में तो बहुत विस्तारित ढंग से किसान जीवन का वर्णन करता है किंतु अंत आते आते ऐसा लगता है जैसे किसी दबाव में जल्दी से समेट दिया गया है। उसका प्रवाह एक जैसा नहीं बना रहता, फिर भी किसी उपन्यास के लिए अनिवार्य तत्व कहानी, कविता और नाटक थोड़े थोड़े मौजूद हैं।

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

 

 

समीक्षा राज नारायण बोहरे का उपन्यास ‘अस्थान’

 

समीक्षा

राज नारायण बोहरे का उपन्यास ‘अस्थान’

वीरेन्द्र जैन

अंतर्राष्ट्रीय ख्यति के फिल्म मिर्देशक श्याम बेनेगल ने एक फिल्म बनायी थी ‘मेकिंग आफ महात्मा’ । इस फिल्म में गाँधीजी के सक्रिय जीवन का वर्णन है कि किस तरह से वे जब दक्षिण अफ्रीका गये व वहाँ पर एशिया व अफ्रीकन मूल के लोगों का शोषण देखा तो अंग्रेज शासकों के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया। इस संघर्ष से जो व्यक्ति जन्मा वह हिन्दुस्तान वापिस लौट कर महात्मा बना। फिल्म बताती है कि परिवेश और परिस्तिथियां ही किसी के व्यक्तित्व को गढती हैं।

सेतु प्रकाशन से प्रकाशित राज नारायण बौहरे का उपन्यास ‘अस्थान’ भी दो ऐसे युवाओं की कथा है जो ऐसे संक्रमण काल में बड़े होते हैं जिसमें सामंत काल गया नहीं है और पूंजीवाद के कदम पड़ चुके हैं। कृषि युग से औद्योगिक युग में पदाक्रमण हो रहा है। समाज की सामंती संस्कृति को लोकतंत्र क़ॆ बैनर से ढक दिया गया है। जहाँ ज़िन्दा रहने का अधिकार तो है किंतु रोजगार का अधिकार नहीं है। जिन्दा रहने के लिए अंधेरे में हाथ पाँव मारने पड़ते हैं। जातिवादी समाज में सवर्ण समाज के लोग श्रम से जुड़े वे काम भी नहीं कर सकते जो उपलब्ध तो हैं किंतु जिन्हें नीची जाति का काम समझा जाता है। परिणाम यह निकलता है कि दो अलग अलग स्थानों में पले बढे सवर्ण परिवार में जन्मे युवाओं में से एक बीए पास करने के बाद भी सरकारी नौकरी नहीं पा पाता क्योंकि स्थानीय राजनीति में दूसरे गुट का समझे जाने के कारण निरपराध होते हुए भी हत्या का आरोपी बना दिया जाता है। वह छूट तो जाता है किंतु दागी कहलाता है।  बाद में रामलीला में भूमिका निभाने के अनुभव के कारण मानस का प्रवचनकर्ता बन जाता है, व मंच पर प्रस्तुतीकरण के नये नये तरीके अपना कर सफल हो जाता है। कुनावी राजनीति के लोग धार्मिक आस्था का विदोहन करने के लिए राम कथा, रामलीला से भी जुड़ते हैं और स्थानीय विधायक कथावाचक को आश्रम बनाने के लिए सरकारी जमीन पर कब्जा करा देते हैं।

दूसरा विवाहोत्सक युवक, अपने किसान परिवार की एक गलत परम्परा, कि उनके यहाँ पीढियों से मझला बेटा अविवाहित रहता है, कुंठित हो जाता है और खेती के प्रति भी उदासीन हो जाता है। इसी उदासीनता में वह साधुओं के सम्पर्क में आता है व उनकी जमात में शामिल हो जाता  है। उसे पागल घोषित कर उसके दोनों भाई उसके हिस्से की जमीन हड़प लेते हैं। वह एक आश्रम के महंत की सेवा टहल में जुट जाता है। आश्रमों में चल रहे आदर्श से विपरीत आचरण पाकर उसका मोह भंग होता है, अन्य अनैतिकताओं में लिप्त महंत जी आश्रम के बगीचे में गाँजे के पौधे उगाने के आरोप में पकड़े जाते हैं ।

मानसपाठी युवा धरनीधर अपने बाजारू तौर तरीकों और विधायक के सहयोग से सरकरी जमीन पर आकर्षक आश्रम तो बना लेते हैं, मन्दिर भी स्थापित कर लेते हैं और अतिरिक्त धन को विभिन्न जगह विनियोजित कर के सम्पत्ति बढा लेते हैं। अपनी व्यावसायिक सफलता के लिए वे अपने नाम के आगे उपशंकराचार्य लगाने लगते हैं। इसी क्रम में उनकी भेंट एक मधुरकंठी प्रवचनकर्ता से होती है और दोनों अपनी परिस्तिथियों में एक दूसरे के आकर्षण में विभिन्न सम्मेलनों में साथ विचरण करने लगते हैं। वे समय मिलते ही आश्रम में ऐसे साथ रहने लगते हैं, जिसे लिव इन कहा जाता है। उनके आश्रम में कोई किसी महिला की लाश फेंक जाता है व उसकी जाँच में पुलिस बेलिहाज होकर अपने पुलिसिया तरीके से पूछताछ करती है व उनके सामाजिक सम्मान का कोई लिहाज नहीं करती।  कुम्भ यात्रा पर निकले नागा बाबाओं का एक दल वहाँ से गुजरता है जो किसी भी मठ या आश्रम को अपनी रियासत समझता है और किसी राजा की तरह अपने नियम थोपता है, व जरूरत पड़ने पर दण्ड देता है। वे देश के किसी कानून को नहीं मानते व कानून को पालन कराने वाली एजेंसियां भी उन्हें ऐसा करने की पर्याप्त गुंजाइश देती हैं। खुद को उपशंकराचार्य लिखने के आरोप में नागा बाबा धरनीधर को  खड़ाऊं से पीटते ही नहीं अपितु कमरे में बन्द भी रखते हैं व अपमान भी करते हैं। उनके साथ की महिला का भी अपमान करते हैं, जिसे तात्कालिक रूप से बाहर भेजना पड़ता है, जहाँ पर भी उसे असम्मानजनक बातें सुनना पड़ती हैं। वह आश्रम छोड़ कर चली जाती है। आश्रम की महिमा घटते ही विरोधी पक्ष आश्रम की जमीन के अवैध होने आदि का मामला उठा देते हैं। पत्रकारिता के नाम पर काक दृष्टि रखने वाले बेरोजगार ब्लैकमेल करने की फिराक में रहते हैं। अपयश से आयोजकों की निगाह में उनकी कीमत घट जाती है, धन्धा मन्दा पड़ने लगता है। अपमान असहनीय हो जाता है और वे आश्रम छोड़ देते हैं।

इन्हीं दोनों व्यक्तियों की मुलाकात ट्रेन के एक डिब्बे में हो जाती है जिन्हें अपने वैरागी स्वरूप से भी वैराग्य हो गया है और अपने उस स्वरूप से निराश होकर लौट रहे हैं। आपसी संवाद और स्मृतियों के सहारे पूरी कथा कही गयी है। कृति बताती है कि इस अर्धसामंती, अर्धपूंजीवादी दौर में शांति उन्हें वहाँ भी नहीं मिलती जहाँ से भाग कर वे धर्म के धन्धे में उतरे थे। यहाँ भी ऐसी ही लपट झपट है, ऊंचे नीच है, एक दूसरे को उठाना गिराना है, सम्पत्ति जोड़ने की तमन्नाएं हैं, षड़यंत्र हैं, महंती के लिए मुकदमेबाजी तक है। शांति वहाँ भी नहीं है जहाँ वे जाने की सोच कर निकले है। ‘राग दरबारी’ का वह अंतिम वाक्य याद किया जा सकता है कि भाग कर कहाँ जाओगे रंगनाथ, जहाँ जाओगे तुम्हें किसी खन्ना की ही जगह मिलेगी।

कृति न केवल रोचक है अपितु ऐसे विषय पर सोच समझ कर विस्तृत अध्यन अनुभव व साक्षात्कार करके लिखी गयी है जिससे एक कम ज्ञात दुनिया में चल रहे कार्य व्यापार की विश्वसनीयता बनी रहे। इस क्षेत्र के लोगों की अपनी भाषा होती है, परखने के अपने कोड होते हैं, झंडे होते हैं, खानपान के नियम होते हैं, जिससे असली नकली की पहचान होती है। कृति में न केवल चुनावी राजनीति में धर्म के स्तेमाल, पुलिस प्रणाली, राजस्व प्रणाली, के कमजोर पक्ष को वर्णित किया गया है, अपितु सामाजिक कुंठाओं की ओर भी इशारा किया गया है।

उपन्यास पठनीय है।  

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

मंगलवार, सितंबर 17, 2019

समीक्षा – जिन्हें जुर्मे इश्क पे नाज था संवेदनात्मक ज्ञान को चरितार्थ करती पुस्तक


समीक्षा – जिन्हें जुर्मे इश्क पे नाज था 





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संवेदनात्मक ज्ञान को चरितार्थ करती पुस्तक
वीरेन्द्र जैन
मुक्तिबोध ने कहा था कि साहित्य संवेदनात्मक ज्ञान है। उन्होंने किसी विधा विशेष के बारे में ऐसा नहीं कहा अपितु साहित्य की सभी विधाओं के बारे में टिप्पणी की थी। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जिस रचना में ज्ञान और संवेदना का संतुलन है वही साहित्य की श्रेणी में आती है।  
खुशी की बात है कि विधाओं की जड़ता लगातार टूट रही है या पुरानी विधाएं नये नये रूप में सामने आ रही हैं। दूधनाथ सिंह का आखिरी कलाम हो या कमलेश्वर का कितने पाकिस्तान , काशीनाथ सिंह का काशी का अस्सी हो या वीरेन्द्र जैन [दिल्ली] का डूब, सबने यह काम किया है। पंकज सुबीर की ‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क पे नाज़ था’ इसीकी अगली कड़ी है।
       अमूमन उपन्यास अनेक चरित्रों की अनेक कहानियों का ऐसा गुम्फन होता रहा है जिनके घटित होने का कालखण्ड लम्बा होता है और जो विभिन्न स्थलों पर घटती रही हैं। यही कारण रहा है कि उसे उसकी मोटाई अर्थात पृष्ठों की संख्या देख कर भी पहचाना जाता रहा है। चर्चित पुस्तक भी उपन्यास के रूप में सामने आती है। इसका कथानक भले ही छोटा हो, जिसका कालखण्ड ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यास ‘नरक यात्रा’ की तरह एक रात्रि तक सिमिटा हो किंतु तीन सौ पृष्ठों में फैला इसमें घटित घटनाओं से जुड़ा दर्शन और इतिहास उसे सशक्त रचना का रूप देता है भले ही किसी को उपन्यास मानने में संकोच हो रहा हो। ईश्वर की परिकल्पना को नकारने वाली यह कृति विश्व में धर्मों के जन्म, उनके विस्थापन में दूसरे धर्मों से चले हिंसक टकरावों, पुराने के पराभवों व नये की स्थापना में सत्ताओं के साथ परस्पर सहयोग का इतिहास विस्तार से बताती है। देश में स्वतंत्रता संग्राम से लेकर समकालीन राजनीति तक धार्मिक भावनाओं की भूमिका को यह कृति विस्तार से बताती है। इसमें साम्प्रदायिक दुष्प्रचार से प्रभावित एक छात्र को दुष्चक्र से निकालने के लिए उसके साथ किये गये सम्वाद के साथ उसके एक रिश्तेदार से फोन पर किये गये वार्तालाप द्वारा लेखक ने समाज में उठ रहे, और उठाये जा रहे सवालों के उत्त्तर दिये हैं। पुस्तक की भूमिका तो धार्मिक राष्ट्र [या कहें हिन्दू राष्ट्र] से सम्बन्धित एक सवाल के उत्तर में दे दी गयी है, जिससे अपने समय के खतरे की पहचान की जा सकती है।
 
       “जब किसी देश के लोग अचानक हिंसक होने लगें। जब उस देश के इतिहास में हुए महापुरुषों में से चुन-चुन कर उन लोगों को महिमा मंडित किया जाने लगे, जो हिंसा के समर्थक थे। इतिहास के उन सब महापुरुषों को अपशब्द कहे जाने लगें, जो अहिंसा के हामी थे। जब धार्मिक कर्मकांड और बाहरी दिखावा अचानक ही आक्रामक स्तर पर पहुँच जाए। जब कलाओं की सारी विधाओं में भी हिंसा नज़र आने लगे, विशेषकर लोकप्रिय कलाओं की विधा में हिंसा का बोलबाला होने लगे। जब उस देश के नागरिक अपने क्रोध पर क़ाबू रखने में बिलकुल असमर्थ होने लगें। छोटी-छोटी बातों पर हत्याएँ होने लगें। जब किसी देश के लोग जोम्बीज़ की तरह दिखाई देने लगें, तब समझना चाहिए कि उस देश में अब धार्मिक सत्ता आने वाली है। किसी भी देश में अचानक बढ़ती हुई धार्मिक कट्टरता और हिंसा ही सबसे बड़ा संकेत होती है कि इस देश में अब धर्म आधारित सत्ता आने को है।’’ रामेश्वर ने समझाते हुए कहा। “     

इस पुस्तक में टेलीफोन के इंटरसेप्ट होने के तरीके से इतिहास पुरुषों में ज़िन्ना, गाँधी, नाथूराम गोडसे के साथ सम्वाद किया गया है जैसा एक प्रयोग फिल्म ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ में किया गया था। इस वार्तालाप से उक्त इतिहास पुरुषों के बारे में फैलायी गयी भ्रांतियों या दुष्प्रचार से जन्मे सवालों के उत्तर मिल जाते हैं। कथा के माध्यम से निहित स्वार्थों द्वारा कुटिलता पूर्वक धार्मिक प्रतीकों के दुरुपयोग का भी सजीव चित्रण है।
नेहरूजी के निधन पर अपने सम्वेदना सन्देश में डा. राधाकृष्णन ने कहा था कि “ टाइम इज द एसैंस आफ सिचुएशन, एंड नेहरू वाज वैल अवेयर ओफ इट”। महावीर के दर्शन में जो सामायिक है वह बतलाता है कि वस्तुओं को परखते समय हम जो आयाम देखते हैं, उनमें एक अनदेखा आयाम समय भी होता है क्योंकि शेष सारे आयाम किसी खास समय में होते हैं। जब हम उस आयाम का ध्यान रखते हैं तो हमारी परख सार्थक होती है। पंकज की यह पुस्तक जिस समय आयी है वह इस पुस्तक के आने का बहुत सही समय है। कुटिल सत्तालोलुपों द्वारा न केवल धार्मिक भावनाओं का विदोहन कर सरल लोगों को ठगा जा रहा है, अपितु इतिहास और इतिहास पुरुषों को भी विकृत किया जा रहा है। पुराणों को इतिहास बताया जा रहा है और इतिहास को झुठलाया जा रहा है। आधुनिक सूचना माध्यमों का दुरुपयोग कर झूठ को स्थापित किया जा रहा है जिससे सतही सूचनाओं से कैरियर बनाने वाली पीढी दुष्प्रभावित हो रही है जिसका लाभ सत्ता से व्यापारिक लाभ लेने वाला तंत्र अपने पिट्ठू नेताओं को सत्ता में बैठा कर ले रहे हैं। ऐसे समय में ऐसी पुस्तकों की बहुत जरूरत होती है। यह पुस्तक सही समय पर आयी है। हर सोचने समझने वाले व्यक्ति की जिम्मेवारी है कि इसे उन लोगों तक पहुँचाने का हर सम्भव प्रयास करे जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। शायद यही कारण है कि देश के महत्वपूर्ण चिंतकों ने सुबीर को उनके साहस के लिए बधाई देते हुए उन्हें सावधान रहने की सलाह दी है।       
इस कृति की कथा सुखांत है, किंतु इसके सुखांत होने में संयोगों की भी बड़ी भूमिका है। कितने शाहनवाजों को रामेश्वर जैसे धैर्यवान उदार और समझदार गुरु मिल पाते हैं! कितने जिलों के जिलाधीश वरुण कुमार जैसे साहित्य मित्र होते हैं, विनोद सिंह जैसे पुलिस अधीक्षक होते हैं, और भारत यादव जैसे रिजर्व फोर्स के पुलिस अधिकारी मिल पाते हैं, जो रामेश्वर के छात्र भी रहे होते हैं व गुरु की तरह श्रद्धाभाव भी रखते हैं। आज जब देश का मीडिया, न्यायव्यवस्था, वित्तीय संस्थाएं, जाँच एजेंसियों सहित अधिकांश खरीदे जा सकते हों या सताये जा रहे हों, तब ऐसे इक्का दुक्का लोगों की उपस्थिति से क्या खतरों का मुकाबला किया जा सकता है या इसके लिए कुछ और प्रयत्न करने होंगे?
वीरेन्द्र जैन
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