गुरुवार, अगस्त 18, 2011

अन्ना हजारे के नाम खुला खत


अन्ना हजारे के नाम खुला खत

वीरेन्द्र जैन

आदरणीय हजारेजी

सादर प्रणाम

दरअसल यह खत आपकी टीम के नाम है जिनकी सलाह से आपके वक्तव्य सामने आते हैं, किंतु किसी भी संस्था को जब कोई पत्र दिया जाता है तो वह संस्था के प्रमुख को सम्बोधित किया जाता है जैसे कि ठेकों के टेंडर तक सम्बन्धित बाबू को नहीं अपितु राष्ट्रपति भारत सरकार को सम्बोधित होते हैं।

आपके अभियान के समांतर चलने वाले मायावान बाबा रामदेव के आचरण के विपरीत आपने अपने निश्चय और आचरण में जो दृड़ता दिखायी है उसके लिए देश में उन लोगों ने भी आपकी सराहना की है जो आपके जनलोकपाल से असहमत हैं। वैसे भी आपके जनलोकपाल से तो पूरी तरह कोई भी सहमत नहीं है, यहाँ तक कि इसे तैयार करने वालों ने भी इसे इसी तरह तैयार किया है ताकि सरकार से टकराव के अवसर आयें। वे इसमें सफल रहे हैं। इससे जनता के पास यह सन्देश पहुँचा है कि आपकी टीम देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाना चाहती है और देश की चुनी हुयी सरकार ऐसा नहीं चाहती। देश के विपक्षी दल भी सरकार की विकृत छवि के और विकृत होने से प्रसन्न हैं और आपके जनलोकपाल बिल के समर्थन में न होते हुए भी वे सरकार की छवि बिगाड़ने के अभियान में समानधर्मी महसूस करते हैं। आपके समर्थन में जो भीड़ उमड़ती दिख रही है वह भी विपक्षी दलों को सम्भावनाओं से भरी हुयी दिख रही है क्योंकि वह सतारूढ दल के विरोध में खड़ी नजर आ रही है। इन्हीं दिनों उज्जैन में चल रही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ चिंतन व समंवय बैठक ने अपने संगठनों को सन्देश दिया है कि भले ही अन्ना हजारे भाजपा और संघ से दूरी बना कर चल रहे हैं, लेकिन उनकी गिरफ्तारी और आन्दोलन से बने माहौल का फायदा उठाया जाना चाहिए। भाजपा अध्यक्ष गडकरी को बैठक में आने के बजाय अन्ना की गिरफ्तारी के खिलाफ आन्दोलन आदि का नेतृत्व करने को कह दिया गया है। विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय नेत्तृत्व ने भी यूथ अगैंस्ट करप्शन फोरम के आन्दोलन में कूदने को कहा है [दैनिक भास्कर भोपाल दिनांक 18 अगस्त 2011 में उज्जैन से मनोज जोशी की रिपोर्ट] टालस्टाय के एक उपन्यास में नायक कहता है कि- वो मुझे चाहती है या नहीं चाहती यह जरूरी नहीं पर मैं उसे चाहता हूं यह मेरे लिए काफी है। इसी तरह आप भले ही राजनीतिक दलों से दूरी बनाये रखने की बात करते हों पर राजनीतिक दल तो भीड़ पर भिनभिनाने से नहीं चूक सकते क्योंकि यह गुड़ और मक्खियों जैसा रिश्ता है। श्रीमती इन्दिरा गान्धी ने प्रेमधवन को दिये अपने आखिरी साक्षात्कार में विभिन्न धर्मस्थलों पर जाने का यही कारण बताया था कि वे जनता के आस्था स्थल हैं और बड़ी संख्या में जनता वहाँ पर जाती है।

राजनीतिक दलों ने आपकी बात का लिहाज रखा है इसलिए वे अपनी पार्टी के झंडे बैनर लेकर आपके आन्दोलन में सम्मलित नहीं हुए किंतु सब ने अपने अपने झंडे बैनरों के साथ आपकी गिरफ्तारी पर विरोध किया। रिन्द के रिन्द रहे हाथ से जन्नत न गयी।

आइए उस भीड़ का विश्लेषण करें जो 15 अगस्त को सड़कों पर नाबालिग बाल मजदूरों द्वारा बेचे गये झंडे लेकर आपके समर्थन में उतरी। इस भीड़ में बहुत बड़ी संख्या युवाओं की थी जो कालेजों में पढते हैं, या पढने के बाद नौकरी की तलाश में हैं। कुछ संख्या उन वकीलों की थी जो युवा हैं और जिनकी प्रैक्टिस नहीं चलती। आपकी टीम का आवाहन था कि पूरा देश 16 अगस्त से एक सप्ताह की छुट्टी ले और तिरंगा लेकर सड़कों गलियों में घूमे व अपने अपने मन से चयनित भ्रष्टाचारियों का विरोध करे। मुझे प्राप्त जानकारी के अनुसार 16 अगस्त को कहीं किसी ने छुट्टी नहीं ली, सारे दफ्तर सारे स्कूल भरे रहे यहाँ तक कि दुकानें भी खुली रहीं। जो युवा अलग अलग पार्कों, फास्ट फूड सेंटरों, या पिकनिक स्पाटों पर जेंडर मुक्त मित्रों के साथ मौसम का मजा लेते थे वे यही काम कुछ चौराहों या तयशुदा प्रदर्शन स्थलों पर कर रहे थे। उनके साथ कई जगह पैंट पर कुर्ता पहिनकर गान्धी थैला लटकाने वाले कुछ एनजियो नुमा लड़के और वैसी ही खिलखिलाती बिन्दास लड़कियां थीं। सारा माहौल एक उत्सव की तरह आल्हाद से भरा हुआ था, कहीं कोई गुस्सा नहीं था। कृप्या इसे अपने अहिंसा के सन्देश की शांति समझने की भूल न करें, क्योंकि इसमें एक रूमान छलक रहा था। हाथ उठा कर नारे लगाने में नृत्य था गीत था, आनन्द था।

इन लड़कों में से अधिकांश गरीब परिवारों से नहीं आये थे क्योंकि जो जितना गरीब है वह उतना ही प्रत्यक्ष भ्रष्टाचार से कम पीड़ित है। इनमें पिछड़े परिवारों के बच्चे भी नहीं थे क्योंकि वे बड़ी नौकरी न मिलने पर कोई छोटी नौकरी भी कर लेते हैं। इनमें अधिकांश उन परिवारों से आये बच्चे थे जिन परिवारों के मुखिया कहीं न कहीं स्वयं तो भ्रष्टाचार करते हैं किंतु उनके साथ दूसरे जो भ्रष्टाचार करते हैं उसको दूर करना चाहते हैं। इन्हें सत्ता पर बैठे व्यक्ति को गाली देने में और सरकार पलटने में अपनी भूमिका की कल्पना में एडवेंचर महसूस होता है। इनके पास भी आपकी टीम की तरह वैकल्पिक व्यवस्था का कोई ढांचा [विजन] नहीं है। ये कारों, मोटर साइकिलों वाले हैं, इनको पर्याप्त जेबखर्च मिलता है।

आदरणीय,

इसका मतलब यह नहीं कि मैं आपको अनशन न करने देने वाली और आपको गिरफ्तार करने वाली सरकार के पक्ष में हूं। मैं तो केवल यह बताना चाह रहा हूं कि आप जिनके सहारे बड़े परिवर्तन की उम्मीद कर रहे हैं वे वही लोग हैं जिनके खिलाफ लड़ाई लड़ी जानी है। आपसे उम्मीद पाले जो निरीह लोग आशा से तक रहे हैं उनके वोट लूटने के लिए स्थापित राजनीतिक दलों ने कमर कस ली है, इसलिए जरूरी है कि आप स्पष्ट करें कि भ्रष्टाचार के लिए आप जिस व्यवस्था को जिम्मेवार मानते हैं उसको हटाने के बाद नई व्यवस्था का आपका अगला खाका क्या है? क्या आपने अपने समर्थकों के लिए कुछ न्यूनतम पात्रताएं और आचार संहिताएं बनायी हैं, जिनके बिना किसी परिवर्तन की दशा में जार्ज की जगह जमुनाप्रसाद आ जायेंगे। यदि आप दल की सीमाओं में नहीं बँधना चाहते तो क्या उम्मीदवारों में कुछ न्यूनतम पात्रताएं, और कुछ न्यूनतम नकार बताना चाहेंगे, कि ये गुण होने चाहिए और ये अवगुण नहीं होने चाहिए। क्या आप चाहेंगे कि चयनित जन प्रतिनिधि पर लम्बित प्रकरणों की सुनवाई विशेष अदालतें दिन-प्रतिदिन के आधार पर करें और निश्चित समय में फैसला सुनाएं। क्या आप चाहेंगे कि एक बार चयनित होने के बाद विधायक, सांसद पेंशन पाकर सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित कर चुका जनप्रतिनिधि अपनी सारी चल अचल सम्पत्ति त्याग दे तब शपथ ग्रहण करे।

आदरणीय, भ्रष्टाचार दोषयुक्त व्यवस्था की पैदाइश होता है और इसे दूर करने के लिए व्यवस्था को बदलना ही होगा। कृपा करके इस सम्बन्ध में आपने जो सपना देखा होगा उससे देश को परिचित कराइए अन्यथा यह सब एक तमाशा होकर रह जायेगा।

आपका एक प्रशंसक

---------------------------------------------------------------------------------------------- वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

मोबाइल 9425674629

6 टिप्‍पणियां:

  1. aaj ke daur ki sbse jruri bat aapne kah diya virendra ji.iske liye shukriya .

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  2. अन्ना के समर्थन में जुट रहे हर व्यक्ति का चेहरा तमतमाया हुआ हो...ऐसी उम्मीद क्यों करते हैं आप ? लड़कियों के खिलखिलाने में क्या समस्या है...ये निहायत पुरुषवादी सोच है...आंदोलन में मौजूद लोग की बॉडी लैंग्वेज कैसी होगी, इसका कोई नियम है क्या ? मैं खुद ऐसे लोगों को जानता हूं जो छुट्टी लेकर वहां पहुंचे थे...और पहुंच रहे हैं...जो नहीं पहुंच पाए, वो साप्ताहिक छुट्टी के दिन पहुंचने की कोशिश करेंगे...कई राज्यों से लोग आए हुए हैं...ज्यादातर निम्न मध्यम वर्गीय हैं...ये कहकर उनका अपमान ना काजिए कि उनके परिवार के मुखिया भ्रष्टाचार कर रहे हैं...हो सकता है कुछ लोग ऐसे हों, पर क्या ये उनकी गलती है कि उनका मुखिया भ्रष्टाचार में लिप्त है...युवाओं का जो वर्ग मॉल और फूट सेंटरों में नज़र आता है, वो आज भी वहीं जा रहा है...और अगर उनमें से कोई वहां पहुंचा भी तो इसमें बुराई क्या है...आप उससे ये हक़ नहीं छीन सकते...और इस बात से भी सहमत नहीं हुआ जा सकता कि ये लड़ाई उनके खिलाफ है...ये लड़ाई सिस्टम के खिलाफ है...और जहां तक गरीब इंसान के वहां पहुंचने की बात है, तो जिस गरीब के सामने दो जून की रोटी का संकट है, उसके वहां पहुंचने की उम्मीद क्यों पाले बैठे हैं आप ? नेताओं की तरह उन्हें पैसा दे दीजिए एक दिन की कमाई के बराबर का, फिर देखिए...वो भी चल पड़ेंगे वहां पर...नेताओं की सभाओं में यही लोग भीड़ बनाते हैं...माफ कीजिएगा, आपने आंदोलन में पहुंच रहे लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का बहुत गलत और एक तरफा विश्लेषण किया है...मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आपका ये विश्लेषण टीवी पर दिखाए गई तस्वीरों को देखकर सामने आया है...आप मौके पर होते, तो शायद ऐसा कभी ना कहते...आपने राजनीति की बात की, .देश का एक ऐसा काम बता दीजिए जिसमें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति या नेताओं की सहभागिता ना हो...जब देश ही राजनेता चला रहे हैं, तो उन्हें अछूत क्यों समझा जाए...बात तो समर्थन देने, ना देने की है...जो दूरी अन्ना को बना कर रखनी चाहिए थी, वो उन्होंने बनाई हुई है...वरना उनका हश्र भी बाबा रामदेव जैसा होता...इस वक्त सबसे अहम बात ये है कि कम के कम आज लोग एक आवाज़ पर एकजुट हो रहे हैं...मकसद बहुत नेक है...हां, मैं इस बात से सहमत हूं कि बहुत से प्रश्न अभी अनुत्तरित हैं...लेकिन उनका जवाब मांगने के लिए ये ये वक्त ठीक नहीं...हालांकि ये आपके अपने विचार हैं..मैं उनकी कद्र करता हूं...पर मैं पूरी तरह असहमत हूं...

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  3. @सन्दीप जी
    आपका प्रोफाइल नहीं मिला इसलिए आपकी प्रतिक्रिया का उत्तर आपको समान उम्र का मानकर ही दे रहा हूं। पता नहीं लोग सार्वजनिक मंचों पर अपनी पहचान क्यों छुपाना चाहते हैं, बहरहाल-
    आजकल शव यात्रा में भी लोग खिलखिलाते और चुटकले सुनाते मिल जाते हैं मैं उनसे भी कुछ नहीं कहता किंतु यह समझ जाता हूं कि इन्हें किसी लिहाजवश ही आना पड़ा है। वैसे हर अवसर की अपनी भावभंगिमाएं होती हैं। उनसे ही उनके सरोकार प्रकट होते हैं। व्यवस्था परिवर्तन और सत्ता परिवर्तन के आन्दोलन में सम्मिलित लोगों से आन्दोलन के भविष्य का अनुमान किया जा सकता है, सचेत हुआ जा सकता है। मुझे किसी के हँसने या खुश रहने से कोई आपत्ति नहीं है। हर आन्दोलन त्याग चाहता है, एक सप्ताह की छुट्टी लेने का आवाहन किया गया था यदि लोगों ने इसे नहीं माना तो वे सुविधा के क्रांतिकारी हुये, जिन्हें कम्युनिष्टों की भाषा में संडे रिवोलुशनरी कहा जाता है। अगर आप भ्रष्टाचारियों के वर्ग का अनुमान करें तो अस्सी प्रतिशत उन्हीं परिवारों में आयेंगे जिन से ये लड़के लड़कियां आते हैं। मेरी आन्दोलन के मुद्दों से पूरी सहानिभूति और समर्थन है इसलिए दिखावे की भीड़ से मीडिया द्वारा लगाये गये अनुमानों चकित हूं। गिरधर कविराय ने कहा है कि- जो तरु पतरो होय एक दिन धोखा दै है, जा दिन चलै बयार टूट तब जर सें जै है।

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  4. अगर अपने देश को एकजुट होता देख आज का युवा झूम रहा है.. गा रहा है, तो इसमें बुराई क्या है..
    क्या बुराई के खिलाफ किसी लड़ाई में अपने विजयी होने का अहसास आनंदित नहीं करता है.सड़कों, गलियों में इन्कलाब के नारे जीत का नाद हैं.
    खैर, जो कुछ भी अपनी आँखों से देखा है, वो अधूरा है. कुछ चीजें आपकी आँखें देख नहीं पायीं हैं.
    टीवी कैमरों से दूर एक बुढिया चूरन और पानी लेकर आन्दोलन में आयी थी.. उसका मकसद था.. वहां आने वालों को पानी देना.. ताकि उनका उल्लास बुढ़िया के दो चुल्लू पानी की बदौलत बना रहे.. जाहिर है दो पानी नहीं उस बुढिया की भावनाएं लोगों में जूनून भर रहीं थीं.
    एक युवा लन्दन से आया था.. 'सत्य' का मौन और मूक समर्थक.. जो केवल उस हिन्दुस्तान का आकार बढाने की मंशा रखता था.. जो करप्शन के खिलाफ सड़कों पर उतर आया था
    हिन्दुस्तानी के लिए हर कुर्बानी, हर विरोध.. आनंद, उमंग, उल्लास, मतवालेपन जैसी सच्ची भावनाओं से ओतप्रोत रही है
    ये हिन्दुस्तानियों की अखंड उस ताकत का प्रदर्शन है, जिसे जाति और धर्म के नाम पर बाँट देने का मुगालता पाले बैठे थे सत्ता के मद में चूर राज-नेता.

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  5. अगर अपने देश को एकजुट होता देख आज का युवा झूम रहा है.. गा रहा है, तो इसमें बुराई क्या है..
    क्या बुराई के खिलाफ किसी लड़ाई में अपने विजयी होने का अहसास आनंदित नहीं करता है.सड़कों, गलियों में इन्कलाब के नारे जीत का नाद हैं.
    खैर, कुछ चीजें आपकी आँखें देख नहीं पायीं हैं.
    टीवी कैमरों से दूर एक बुढिया चूरन और पानी लेकर आन्दोलन में आयी थी.. उसका मकसद था.. वहां आने वालों को पानी देना.. ताकि उनका उल्लास बुढ़िया के दो चुल्लू पानी की बदौलत बना रहे.. जाहिर है दो पानी नहीं उस बुढिया की भावनाएं लोगों में जूनून भर रहीं थीं.
    एक युवा लन्दन से आया था.. 'सत्य' का मौन और मूक समर्थक.. जो केवल उस हिन्दुस्तान का आकार बढाने की मंशा रखता था.. जो करप्शन के खिलाफ सड़कों पर उतर आया था
    हिन्दुस्तानी के लिए हर कुर्बानी, हर विरोध.. आनंद, उमंग, उल्लास, मतवालेपन जैसी सच्ची भावनाओं से ओतप्रोत रही है
    ये हिन्दुस्तानियों की अखंड उस ताकत का प्रदर्शन है, जिसे जाति और धर्म के नाम पर बाँट देने का मुगालता पाले बैठे थे सत्ता के मद में चूर राज-नेता.

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  6. वीरेंद्र जी, आप निष्कर्ष पर बहुत जल्दी पहुंच जाते हैं...अगर किसी ने अपनी प्रोफाइल के साथ कॉमेंट नहीं किया तो इसका मतलब ये नहीं कि वो अपनी पहचान छुपाना चाहता है...उसकी कुछ और वजह भी हो सकती है...बहरहाल, बहुत ही आदर और सम्मान के साथ मैं बताना चाहता हूं कि मैं उम्र और अनुभव दोनों में आपसे बहुत छोटा हूं...पेशे से पत्रकार हूं....www.facebook/sandeepkumarrrr पर आप मेरी प्रोफाइल देख सकते हैं...वीरेंद्र सर, भले ही मैं आपसे असहमत हूं पर आपके विचारों की कद्र करता हूं (मैंने अपनी टिप्पणी में भी लिखा है)...दिल्ली में रहते हुए इस आंदोलन को काफी करीब से देख-समझ रहा हूं...16 अगस्त को मौके पर जाकर इस आंदोलन और उसमें शामिल हो रहे लोगों को बहुत नज़दीक से देखा...खैर, एक बार दोहरा दूं कि आपके अनुभव और विचारों के लिए मेरे दिल में बहुत इज्ज़त है...ये बात और है कि मैं उससे सहमत नहीं...आभार....

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