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गुरुवार, अक्टूबर 11, 2012

केजरीवाल के लिए चुनव क्षेत्र और उम्मीदवार तैयार करते अन्ना हजारे


केजरीवाल के लिए चुनाव क्षेत्र और उम्मीदवार तय करते अन्ना हजारे
वीरेन्द्र जैन
      अब यह लगभग पुष्ट हो चुका है कि इंडिया अगेंस्ट करप्शन आन्दोलन के पीछे मुख्य सूत्रधार अरविन्द केजरीवाल थे जिन्होंने एक साफ सुथरे चेहरे या कहें कि मुखौटे के रूप में अन्ना हजारे को आगे किया था। परिस्तिथियां ऐसी थीं कि उन्हें पूरे देश में कोई भी चर्चित आदर्श राष्ट्रीय चेहरा नजर नहीं आया इसलिए उन्हें एक क्षेत्रीय चेहरे को राष्ट्रीय चेहरा बनाना पड़ा। इस आन्दोलन का चेहरा बनने से पहले महाराष्ट्र में अपने अनशनों से ध्यान आकर्षित करने के बाद भी अन्ना हजारे की अखिल भरतीय छवि निर्मित नहीं हुयी थी और न ही उनकी सोच इतनी व्यापक थी कि राष्ट्रीय नेतृत्व करने की पात्रता पाने के लिए वे समस्याओं और उनके निराकरण के बारे में समग्रता से सोच कर कोई हल देने का प्रयास करते। उनकी क्षमता केवल इतनी थी कि वे अपनी सीमित मांगों के लिए अपेक्षाकृत लम्बे समय तक अनशन पर बैठ सकते थे, जबकि जनता को अपेक्षा रहती है किसी भी आन्दोलन का राष्ट्रीय नेतृत्व सम्बन्धित समस्या को सभी कोणों से समझ कर आन्दोलन को गति दे। यही कारण रहा कि एक बार भड़कने के बाद इस आन्दोलन का लगातार क्षरण होता रहा। स्वामी अग्निवेष, संतोष हेगेड़े, सन्दीप पाण्डे, कुमार विश्वास,  अरुन्धति राय, मेधा पाटकर, से लेकर किरण बेदी ही नहीं खुद अन्ना हजारे को भी अपना मार्ग अलग घोषित करना पड़ा।
      आन्दोलन की बिडम्बना यह रही कि इसने एक ओर तो इसी संसदीय लोकतंत्र में पूर्ण विश्वास घोषित किया और वहीं दूसरी ओर इसी व्यवस्था से निर्वाचित संसद को चोर उचक्कों और अपराधिओं का अड्डा बताते रहे। यद्यपि कुल संसद सदस्यों का कुछ प्रतिशत इन आरोपों से घिरा हुआ है तो भी उन्हें इसी व्यवस्था के अंतर्गत मतदाताओं ने चुन कर भेजा है और इस संविधान में भरोसा करने वाले लोगों को उन्हें स्वीकारना ही पड़ता है व उसी में से राह खोजना पड़ती है। जब पूरा देश इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास के कारण गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को लगातार सहन करती आ रहा है, मधु कौड़ा को निर्दलीय विधायक होने के बाद भी झारखण्ड के मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार किया था, और राबड़ी देवी के नेतृत्व में बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्य की सरकार को सहन किया तब एक ओर इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास घोषित करते हुए व दूसरी ओर  कुल संसद की निन्दा करना परोक्ष में उस जनता को गाली देना है जिसने उनको चुन कर संसद में भेजा है। इस बिडम्बना को सामने आने में बहुत देर नहीं लगी और अन्ना व अरविन्द को अपने अपने रास्ते अलग अलग करने पड़े। अरविन्द केजरीवाल ने राजनीतिक दल के गठन की घोषणा और चुनावों में भागीदारी पर सहमति के साथ लोकतंत्र की इसी प्रणाली को स्वीकार करने की घोषणा कर दी थी वहीं दूसरी ओर अन्ना हजारे ने राजनीतिक दल के गठन से असहमति व्यक्त करते हुए केवल आन्दोलन का सहारा लेने की घोषणा करके अपनी असहमति को सार्वजनिक कर दिया था। इस विभाजन ने मुख और मुखौटे का भेद प्रकट कर दिया था। इससे यह भी साफ हो गया कि अन्ना का मुखौटा लगाते समय या तो केजरीवाल के पास कोई दूरदृष्टि नहीं थी या उन्होंने सच को छुपा, अन्ना को आगे कर अपना लक्ष्य प्राप्त करने का खेल खेला। कहा जा रहा है कि अब अन्ना टीम के आन्दोलन का संचालन किरण बेदी के हाथों में होगा किंतु इसी समय अन्ना ने यह भी घोषित कर दिया है कि वे अब इस आन्दोलन के लिए अनशन का सहारा नहीं लेंगे। सवाल उठता है कि एक तेज तर्रार पुलिस अधिकारी रही देश के पहली महिला आईपीएस के रूप में विख्यात और इसी कारण बहुचर्चित किरण बेदी अनशन की जगह आन्दोलन का क्या तरीका अपनायेंगीं?
      बिडम्बना यह भी है कि अन्ना हजारे उन बाबा रामदेव से गलबहियां कर रहे हैं जो खुद अपने दल को चुनाव में उतारना चाहते रहे हैं और जिनके द्वारा बहुत ही अल्प समय में अकूत धन सम्पत्ति जोड़ी गयी है जिस कारण से विभिन्न तरह के कर वसूलने वाली एजेंसियां उन पर वे ही आरोप लगा रही हैं जिनके खिलाफ अन्ना आन्दोलन चलाने का रास्ता अपनाये हुए हैं। यही बाबा रामदेव पिछले दिनों सार्वजनिक मंच से नरेन्द्र मोदी की भूरि भूरि प्रशंसा कर चुके हैं। ध्यान देने योग्य यह भी है कि अपनी जन्मतिथि के कारण विवादों में रहे पूर्व सेनाध्यक्ष वी के सिंह बाबा रामदेव के साथ अपना भविष्य जोड़ने में लगे हुए हैं।
      अरविन्द केजरीवाल से मतभेद सामने आने के बाद अन्ना ने अपना मार्ग अलग करते हुए कहा था कि वे न तो अपना फोटो ही इस्तेमाल करने देंगे और न ही किसी उम्मीदवार के लिए प्रचार करेंगे, पर अब उन्होंने कह दिया है कि अगर अरविन्द केजरीवाल कपिल सिब्बल के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं तो वे उनका प्रचार करेंगे। इसका अर्थ है कि अब अन्ना न केवल उम्मीदवार तय कर रहे हैं अपितु चुनाव क्षेत्र भी निर्धारित कर रहे हैं। यदि ऐसा है तो ये अन्ना को बधाई मिलनी चाहिए कि वे थोड़ी सी न नुकर करने के बाद राजनीति में उतर आये हैं और इसी संसदीय लोकतंत्र में समस्याओं के हल तलाशना चाहते हैं। लगता है कि उनके जो रस्ते केजरीवाल से अलग हो गये थे वे जुड़ने लगे हैं।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629

        

शुक्रवार, अगस्त 03, 2012

अगर अन्ना हजारे अपने शब्दों पर सचमुच गम्भीर हैं तो .................


अगर अन्ना अपने शब्दों पर सचमुच गम्भीर हैं तो......
वीरेन्द्र जैन
[यह लेख अन्नाटीम द्वारा अनशन त्यागने और चुनावी समर में उतरने कीघोषणा से कुछ दिन पूर्व ही लिखा गया था]  
       यह अविश्वास का समय है। किसी भी क्षेत्र के नेतृत्वकारी लोगों पर पूर्ण भरोसा करने वाले लोगों की संख्या दिनों दिन घटती जा रही है। गान्धी नेहरू के बाद शायद जयप्रकाश नारायण वह अंतिम व्यक्ति थे जिन पर देश के एक बड़े वर्ग ने भरोसा किया था। यही कारण है कि देश में परिवर्तन चाहने वाले लोगों को पुराने प्रतीकों से काम चलाना पड़ता है। सम्भवतः इसी समझ के कारण केजरीवाल-सिसोदिया ग्रुप ने अपने आन्दोलन की विश्वसनीयता के लिए एक गान्धीनुमा प्रतीक का चयन किया जिन्हें लोग अन्ना हजारे के नाम से जानते हैं। फौज की साधारण नौकरी छोड़ कर आये अन्ना हजारे ने अपना परिवार नहीं बनाया, अपने गाँव में जनसहयोग के माध्यम से उन्होंने समाज सुधार के कुछ सफल काम किये और गान्धी के अनशन अस्त्र का प्रयोग करके महाराष्ट्र राज्य में कुछ दागी मंत्रियों को पद से मुक्त कराने में सफलता का श्रेय प्राप्त किया,[भले ही इसमें सत्तारूढों की दलीय गुटबाजी की भी एक भूमिका रही हो]।
       पर अन्ना हजारे, गान्धी जैसे सुशिक्षित, अनुभवी, चतुर और समझदार नहीं हैं। एक लोकप्रिय शायर का शे’र है- ‘ये जाफरानी पुलोवर, उसी का हिस्सा है/ दूसरा कोई जो पहिने तो दूसरा ही लगे’। गान्धी के इस पुराने अस्त्र का प्रयोग करते समय यह ध्यान रखना होगा कि अनशन दुश्मन को नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं अपितु अपने लोगों की सम्वेदनाओं को झकझोरने के लिए किया जाता है। नेहरूजी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मैं कई बार गान्धीजी से सहमत नहीं था, पर वे अनशन पर बैठ गये थे और मैं नहीं चाहता था कि गान्धीजी को कुछ नुकसान हो इसलिए मुझे उनकी बात माननी पड़ी। अम्बेडकर को मनाने के लिए भी उन्होंने यर्वदा जेल में अनशन किया था जिस कारण असहमत होते हुए भी अम्बेडकर को अपनी माँगों से पीछे हटना पड़ा था। यह गान्धीजी के व्यक्तित्व का ही प्रभाव था कि उनके जीवन को बचाने के लिए लोग जिस तरह से सहमत हो जाते थे या उदासीनता त्याग कर आन्दोलन में सम्मलित होते जाते थे, आज न वैसे लोग हैं और न ही अनशनकारियों का वैसा व्यक्तित्व ही है। व्यक्तियों में बदल चुके समाज और बाज़ारवादी संस्कृति ने सबसे बड़ा हमला हमारी सम्वेदना पर ही किया है। आज दुर्घटना में घायल हुए व्यक्ति के पास से सैकड़ों वाहन गुजर जाते हैं पर कोई उसकी सहायता के लिए नहीं रुकता। भोपाल के पास मंडीदीप में शराब की बोतलों से भरा एक ट्रक उलट गया तो लोग शराब की बोतलें तो लूट ले गये किंतु दबे हुए ड्राइवर क्लीनर को किसी ने नहीं निकाला और उनकी मृत्यु हो गयी। भोपाल से ही एक क्रिकेट खिलाड़ी को अचानक राष्ट्रीय स्तर पर खेल के लिए बुलावा आ गया तो उसके लिए किसी ने भी अपनी फ्लाइट कैंसिल करके अपनी सीट उसे नहीं दी जिससे उसका मैच चूक गया, जबकि ऐसा नहीं हो सकता कि सारे ही लोग ऐसे काम से जा रहे हों जिसे एक दिन टाला नहीं जा सकता हो। ऐसी असंख्य घटनाएं प्रतिदिन हमारे चारों ओर घट रही हैं। यह समय गान्धीजी के समय की सम्वेदना से बहुत भिन्न है, इसलिए पिछले दस वर्षों से लगातार अनशन कर रही इरोम शर्मिला के अनशन से न तो सरकार और न ही समाज में कोई हलचल देखने को नहीं मिली।
       गान्धीजी के कटुतम आलोचकों ने भी इस बात को स्वीकारा है कि उन से असहमतियां हो सकती हैं पर  वे एक सच बोलने वाले आदमी थे। इन दिनों दूरदर्शन पर एक सन्देश विज्ञापन आता है जिसमें भी गान्धीजी कहते हुए दिखाये गये हैं कि मैं तो सच्ची सच्ची बात कहने वाला आदमी हूं.................। उनकी आत्म कथा का नाम भी ‘सत्य के प्रयोग’ ही है। अन्नाजी जब गान्धी जी के तरीके का स्तेमाल कर रहे हैं तो उन्हें अपने व्यक्तित्व को एक सच्चे आदमी की तरह मान्य बनाना होगा। यह उल्लेख करना गलत नहीं होगा कि आज देश में प्रतिवर्ष सैकड़ों की संख्या में ‘आमरण अनशन’ होते हैं जिनकी अवधि भी पहले से तय होती है। इन ‘आमरण अनशनों’ को एक दिन की स्थानीय कवरेज से अधिक का महत्व नहीं मिलता क्योंकि सब मानते हैं कि यह ड्रामा अपना व्यक्तिगत स्वार्थ हल कराने के लिए मामले को सार्वजनिक सा दिखाने की कोशिश है। परिणाम स्वरूप इस सम्वेदनहीन समय में यदि कोई सचमुच गम्भीर भी है तो भी लोग सन्देह करते हैं। ऐसे में अगर अन्ना हजारे अपेक्षाकृत बड़े समुदाय का ध्यान आकर्षित करने में सफल हुए हैं तो उसका कारण गान्धी की छवि का प्रभाव है। दूसरी ओर वे जैसे जैसे गान्धी की छवि से दूर जाते हैं वसे ही वैसे उनकी विश्वसनीयता घटती है। दुर्भाग्य यह है कि वे आज की असत्य पर आधारित राजनीति के चंगुल में फँसते जा रहे हैं और उनकी विश्वसनीयता दिनों दिन घटती जा रही है।
       अन्ना से उम्मीद रखने वाले लोगों के लिए यह जानना एक बड़े धक्के की तरह था कि गान्धी की छवि को आधार बनाने वाला व्यक्ति गान्धी की हत्या के विचार के जनक संगठन से गलबहियां कर रहा है जिनकी प्रचार सामग्री में आज भी गान्धी की हत्या को ‘गान्धी वध’ और गोडसे की किताबें बिकती हैं। जब अन्ना अनशन करते हैं तो भीड़ जुटाने के लिए इसी संगठन के लोग अपनी पहचान छुपा और अपना खजाना खोल कर हजारों लोगों के लंगर की व्यवस्था करते हैं और बाद में दावे के साथ लोगों को बताते भी हैं। अन्ना की जगह अगर गान्धीजी होते तो वे शुरू से ही इसे छुपाने की कोशिश नहीं करते पर अन्ना हजारे और उनकी टीम ने उस पर परदा डालने का काम किया। लोगों को यह सन्देह होना स्वाभाविक ही है कि अभी जो बातें सामने नहीं आयी हैं वे न जाने कितनी होंगीं। स्मरणीय है कि गान्धीजी की हत्या से जुड़े संग़ठन की भाषा भले ही बदल गयी हो पर न तो आज तक उसने कभी अपने किये का खेद व्यक्त किया और न ही अपने विचार ही बदले हैं। उन्हें जब भी मौका मिलता है वे राष्ट्र की धर्मनिरपेक्षता को चोट पहुँचाने से गुरेज नहीं करते और केन्द्र तथा गुजरात राज्य में सत्ता होने पर तो उन्होंने अपना असली स्वरूप ही दिखा दिया जिसके बाद उनके साथ हाथ मिलाना तक एक राष्ट्रीय शर्म बन चुकी है। उनके साथ गठबन्धन करने वाले दल तक उनके साथ बैठने को एक मजबूरी बताते हैं। दूसरी ओर जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आन्दोलन कर रहे हैं उनके ये सहयोगी उसमें आकंठ लिप्त हैं, इसे देश का बच्चा बच्चा जानता है। उक्त संग़ठन अगर किसी के साथ सहयोग करते हैं तो उसके अस्तित्व और उसके समर्थन को हड़पने के लिए करते हैं, इसलिए यह उम्मीद करना कि उनका सहयोग लेकर अपने आन्दोलन की घोषित भावना को बचा कर रखा जा सकता है, समझदारी नहीं कही जा सकती। वे या तो मौका देख कर अपना आधार खींच लेंगे या गुलाम बना लेंगे और ये दोनों ही बातें अन्ना के आन्दोलन और स्वयं अन्ना के हित में नहीं होंगीं। लगभग ऐसा ही हाल आयुर्वेदिक दवाओं के व्यापारी बाबा भेषधारी रामदेव के साथ सहयोग का भी है जो अपनी व्यापारिक अनियमिताओं के कारण कानून की नजर में है और बिना किसी द्वेष के भी कानूनी कार्यवाही से उनका साम्राज्य ध्वस्त हो सकता है। एक ओर तो उनकी राजनीतिक महात्वाकांक्षाएं हैं और दूसरी ओर अपने व्यावसायिक हितों के संरक्षण के लिए उन्हें ग्राहिकी और जनसमर्थन चाहिए।
       गान्धीजी इस समझदारी के लिए विख्यात थे कि वे अपनी विचारधारा से विचलन को स्वीकार नहीं करते थे और तात्कालिक सफलता के लिए किसी भी तरह का समझौता करना पसन्द नहीं करते थे। स्मरणीय है कि चौरी चौरा कांड में घटित हिंसा के बाद गान्धीजी ने व्यापक रूप से सफल हो रहे अपने आन्दोलन को वापिस ले लिया था। यही कारण है कि उनके विचारों और सन्देशों में एक ताकत थी और उनका अनशन एक आन्दोलन बन जाता था।
       भीड़ की चिंता करना चुनावी पार्टियों का काम है और गलत दोस्तों की तुलना में समझदार दुश्मन ज्यादा अच्छा होता है। अन्ना अगर बार बार दिखावटी अनशन करते रहे तो वे क्रमशः अपनी धार खोते जायेंगे और  वीकेंड मनाने वाली भीड़ के नेता होकर रह जायेंगे, पर यदि वे किसी ज़िद में आकर सचमुच ही लम्बा अनशन कर बैठे तो इस सम्वेदनहीन समाज में इरोम शर्मीला होकर रह जायेंगे। उन्होंने देश के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण समस्या को हल करने के आन्दोलन का प्रतीक पुरुष बनना स्वीकार किया है, पर यह समस्या सचमुच हल भी हो सके इसके लिए समयानुकूल व्यवहारिक समाधान की तलाश की ओर बढना चाहिए। विचार करने की जरूरत यह भी है क्यों कुछ प्रमुख लोग उनके आन्दोलन को छोड़ कर चले गये हैं क्योंकि उनमें से सभी नकली नहीं थे। 
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, अगस्त 18, 2011

अन्ना हजारे के नाम खुला खत


अन्ना हजारे के नाम खुला खत

वीरेन्द्र जैन

आदरणीय हजारेजी

सादर प्रणाम

दरअसल यह खत आपकी टीम के नाम है जिनकी सलाह से आपके वक्तव्य सामने आते हैं, किंतु किसी भी संस्था को जब कोई पत्र दिया जाता है तो वह संस्था के प्रमुख को सम्बोधित किया जाता है जैसे कि ठेकों के टेंडर तक सम्बन्धित बाबू को नहीं अपितु राष्ट्रपति भारत सरकार को सम्बोधित होते हैं।

आपके अभियान के समांतर चलने वाले मायावान बाबा रामदेव के आचरण के विपरीत आपने अपने निश्चय और आचरण में जो दृड़ता दिखायी है उसके लिए देश में उन लोगों ने भी आपकी सराहना की है जो आपके जनलोकपाल से असहमत हैं। वैसे भी आपके जनलोकपाल से तो पूरी तरह कोई भी सहमत नहीं है, यहाँ तक कि इसे तैयार करने वालों ने भी इसे इसी तरह तैयार किया है ताकि सरकार से टकराव के अवसर आयें। वे इसमें सफल रहे हैं। इससे जनता के पास यह सन्देश पहुँचा है कि आपकी टीम देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाना चाहती है और देश की चुनी हुयी सरकार ऐसा नहीं चाहती। देश के विपक्षी दल भी सरकार की विकृत छवि के और विकृत होने से प्रसन्न हैं और आपके जनलोकपाल बिल के समर्थन में न होते हुए भी वे सरकार की छवि बिगाड़ने के अभियान में समानधर्मी महसूस करते हैं। आपके समर्थन में जो भीड़ उमड़ती दिख रही है वह भी विपक्षी दलों को सम्भावनाओं से भरी हुयी दिख रही है क्योंकि वह सतारूढ दल के विरोध में खड़ी नजर आ रही है। इन्हीं दिनों उज्जैन में चल रही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ चिंतन व समंवय बैठक ने अपने संगठनों को सन्देश दिया है कि भले ही अन्ना हजारे भाजपा और संघ से दूरी बना कर चल रहे हैं, लेकिन उनकी गिरफ्तारी और आन्दोलन से बने माहौल का फायदा उठाया जाना चाहिए। भाजपा अध्यक्ष गडकरी को बैठक में आने के बजाय अन्ना की गिरफ्तारी के खिलाफ आन्दोलन आदि का नेतृत्व करने को कह दिया गया है। विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय नेत्तृत्व ने भी यूथ अगैंस्ट करप्शन फोरम के आन्दोलन में कूदने को कहा है [दैनिक भास्कर भोपाल दिनांक 18 अगस्त 2011 में उज्जैन से मनोज जोशी की रिपोर्ट] टालस्टाय के एक उपन्यास में नायक कहता है कि- वो मुझे चाहती है या नहीं चाहती यह जरूरी नहीं पर मैं उसे चाहता हूं यह मेरे लिए काफी है। इसी तरह आप भले ही राजनीतिक दलों से दूरी बनाये रखने की बात करते हों पर राजनीतिक दल तो भीड़ पर भिनभिनाने से नहीं चूक सकते क्योंकि यह गुड़ और मक्खियों जैसा रिश्ता है। श्रीमती इन्दिरा गान्धी ने प्रेमधवन को दिये अपने आखिरी साक्षात्कार में विभिन्न धर्मस्थलों पर जाने का यही कारण बताया था कि वे जनता के आस्था स्थल हैं और बड़ी संख्या में जनता वहाँ पर जाती है।

राजनीतिक दलों ने आपकी बात का लिहाज रखा है इसलिए वे अपनी पार्टी के झंडे बैनर लेकर आपके आन्दोलन में सम्मलित नहीं हुए किंतु सब ने अपने अपने झंडे बैनरों के साथ आपकी गिरफ्तारी पर विरोध किया। रिन्द के रिन्द रहे हाथ से जन्नत न गयी।

आइए उस भीड़ का विश्लेषण करें जो 15 अगस्त को सड़कों पर नाबालिग बाल मजदूरों द्वारा बेचे गये झंडे लेकर आपके समर्थन में उतरी। इस भीड़ में बहुत बड़ी संख्या युवाओं की थी जो कालेजों में पढते हैं, या पढने के बाद नौकरी की तलाश में हैं। कुछ संख्या उन वकीलों की थी जो युवा हैं और जिनकी प्रैक्टिस नहीं चलती। आपकी टीम का आवाहन था कि पूरा देश 16 अगस्त से एक सप्ताह की छुट्टी ले और तिरंगा लेकर सड़कों गलियों में घूमे व अपने अपने मन से चयनित भ्रष्टाचारियों का विरोध करे। मुझे प्राप्त जानकारी के अनुसार 16 अगस्त को कहीं किसी ने छुट्टी नहीं ली, सारे दफ्तर सारे स्कूल भरे रहे यहाँ तक कि दुकानें भी खुली रहीं। जो युवा अलग अलग पार्कों, फास्ट फूड सेंटरों, या पिकनिक स्पाटों पर जेंडर मुक्त मित्रों के साथ मौसम का मजा लेते थे वे यही काम कुछ चौराहों या तयशुदा प्रदर्शन स्थलों पर कर रहे थे। उनके साथ कई जगह पैंट पर कुर्ता पहिनकर गान्धी थैला लटकाने वाले कुछ एनजियो नुमा लड़के और वैसी ही खिलखिलाती बिन्दास लड़कियां थीं। सारा माहौल एक उत्सव की तरह आल्हाद से भरा हुआ था, कहीं कोई गुस्सा नहीं था। कृप्या इसे अपने अहिंसा के सन्देश की शांति समझने की भूल न करें, क्योंकि इसमें एक रूमान छलक रहा था। हाथ उठा कर नारे लगाने में नृत्य था गीत था, आनन्द था।

इन लड़कों में से अधिकांश गरीब परिवारों से नहीं आये थे क्योंकि जो जितना गरीब है वह उतना ही प्रत्यक्ष भ्रष्टाचार से कम पीड़ित है। इनमें पिछड़े परिवारों के बच्चे भी नहीं थे क्योंकि वे बड़ी नौकरी न मिलने पर कोई छोटी नौकरी भी कर लेते हैं। इनमें अधिकांश उन परिवारों से आये बच्चे थे जिन परिवारों के मुखिया कहीं न कहीं स्वयं तो भ्रष्टाचार करते हैं किंतु उनके साथ दूसरे जो भ्रष्टाचार करते हैं उसको दूर करना चाहते हैं। इन्हें सत्ता पर बैठे व्यक्ति को गाली देने में और सरकार पलटने में अपनी भूमिका की कल्पना में एडवेंचर महसूस होता है। इनके पास भी आपकी टीम की तरह वैकल्पिक व्यवस्था का कोई ढांचा [विजन] नहीं है। ये कारों, मोटर साइकिलों वाले हैं, इनको पर्याप्त जेबखर्च मिलता है।

आदरणीय,

इसका मतलब यह नहीं कि मैं आपको अनशन न करने देने वाली और आपको गिरफ्तार करने वाली सरकार के पक्ष में हूं। मैं तो केवल यह बताना चाह रहा हूं कि आप जिनके सहारे बड़े परिवर्तन की उम्मीद कर रहे हैं वे वही लोग हैं जिनके खिलाफ लड़ाई लड़ी जानी है। आपसे उम्मीद पाले जो निरीह लोग आशा से तक रहे हैं उनके वोट लूटने के लिए स्थापित राजनीतिक दलों ने कमर कस ली है, इसलिए जरूरी है कि आप स्पष्ट करें कि भ्रष्टाचार के लिए आप जिस व्यवस्था को जिम्मेवार मानते हैं उसको हटाने के बाद नई व्यवस्था का आपका अगला खाका क्या है? क्या आपने अपने समर्थकों के लिए कुछ न्यूनतम पात्रताएं और आचार संहिताएं बनायी हैं, जिनके बिना किसी परिवर्तन की दशा में जार्ज की जगह जमुनाप्रसाद आ जायेंगे। यदि आप दल की सीमाओं में नहीं बँधना चाहते तो क्या उम्मीदवारों में कुछ न्यूनतम पात्रताएं, और कुछ न्यूनतम नकार बताना चाहेंगे, कि ये गुण होने चाहिए और ये अवगुण नहीं होने चाहिए। क्या आप चाहेंगे कि चयनित जन प्रतिनिधि पर लम्बित प्रकरणों की सुनवाई विशेष अदालतें दिन-प्रतिदिन के आधार पर करें और निश्चित समय में फैसला सुनाएं। क्या आप चाहेंगे कि एक बार चयनित होने के बाद विधायक, सांसद पेंशन पाकर सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित कर चुका जनप्रतिनिधि अपनी सारी चल अचल सम्पत्ति त्याग दे तब शपथ ग्रहण करे।

आदरणीय, भ्रष्टाचार दोषयुक्त व्यवस्था की पैदाइश होता है और इसे दूर करने के लिए व्यवस्था को बदलना ही होगा। कृपा करके इस सम्बन्ध में आपने जो सपना देखा होगा उससे देश को परिचित कराइए अन्यथा यह सब एक तमाशा होकर रह जायेगा।

आपका एक प्रशंसक

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मंगलवार, अप्रैल 12, 2011

अन्ना के अनशन से क्या हासिल हुआ?


अन्ना के अनशन से क्या हासिल हुआ!
वीरेन्द्र जैन
किसी बड़े और चमत्कारी परिवर्तन की उम्मीद पाल बैठे कुछ निराश लोगों का विचार है कि चार दिन की अखबारी सुर्खियों और मीडिया की सनसनी के बाद अन्ना हजारे के अनशन से जन्मा ज्वार उतर गया है। आइ पी एल, आदर्श सोसाइटी, कामनवैल्थ घोटाला, टू जी घोटाला, इसरो घोटाला, आदि आदि सैकड़ों घोटालों की ओर केन्द्रित हो गया ध्यान अब फिर से वैसे ही आइ पी एल जनित सतही उत्तेजना की ओर केन्द्रित हो जायेगा जैसे कि क्रिकेट के वर्ल्ड कप की उत्पादित उत्तेजना के नशे में कई करोड़ मध्यमवर्गीय लोग भ्रष्टाचार को भूल गये थे। अनन्त कालों तक चलने वाली जाँचों की तरह जन लोकपाल विधेयक बनने की तारीखें थोड़ा थोड़ा करके आगे खिसकती रहेंगीं और फिर किसी छेददार गुब्बारे की तरह का एक रंग बिरंगा कानून आ जायेगा जिसमें कभी भी हवा नहीं भरी जा सकेगी। वैसे भी भले ही लोगों ने मीडिया के आक्रामक प्रचार के वशीभूत टीवी कैमरों के सामने आकर भीड़ जुटा ली हो और मोमबत्तियां जला ली हों, किंतु इस दौरान एक भी उदाहरण ऐसा नहीं मिला कि भ्रष्टाचारी डर गये हों और जहाँ भी रिश्वतखोरी और कमीशन चलता है वहाँ किसी ने इसे लेने में संकोच किया हो। कानून उन्हें पास करना है जिन के ऊपर सारे आरोप हैं। सवाल यह है कि आखिर कोई अपना सलीब खुद क्यों बनायेगा। सलीब तो वह उन लोगों का बनायेगा जो उसको सलीब पर चढाने का भोला सा सपना पाले हुये हैं। कभी नेहरूजी ने भी कहा था कि सारे भ्रष्टाचारियों को बिजली के खम्भे पर लटका कर फ़ाँसी दे देना चाहिए। पर हुआ यह कि-
उसी का शहर, वही मुद्दई, वही मुंसिफ
हमें यकीन हमारा कसूर निकलेगा
निराशावादी मित्रों की ये आशंकाएं किसी हद तक सही हो सकती है किंतु ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि अन्ना हजारे के अनशन से बिल्कुल भी कुछ हासिल नहीं हुआ। वैसे तो उन्होंने स्वयं भी माना है कि यह शुरुआत है, अभियान आगे चलेगा। आइए देखें कि अन्ना के आन्दोलन के अदृष्य हासिल क्या हैं-
• इस अभियान के द्वारा हमें पता चला है कि देश की जनता का भरोसा राजनीतिक दलों की तुलना में स्वच्छ छवि वाले सादगी पसन्द समाज सेवियों में अधिक है, और उनकी आशाएं वहीं टिकी हैं। यह इस बात का भी प्रमाण है कि हमारे चुनावी राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता समाप्तप्रायः है तथा उनसे किसी बदलाव की कोई उम्मीद वे नहीं रखते।
• यदि आवाहन किसी सच्चे सुपात्र का हो तो देश की एक बड़ी आबादी को अभी भी गान्धीवादी तरीके में भरोसा है, पर ऐसे भरोसेमन्द सुपात्र लोग कितने बचे हैं!
• कई बड़े राजनीतिक दल इतने खोखले हैं कि वे इस आन्दोलन की ताकत को पहचान कर अपना राजनीतिक हित साधने के लिए उसके इर्दगिर्द जुटने लगे थे और आन्दोलन के समर्थकों व नेताओं द्वारा उनसे दूर रहने को कहने के बाद भी अपने किसी एजेंट के माध्यम से जुड़े रहना चाहते थे। जरा जरा सी बात पर उत्तेजित होकर पार्टी छोड़ देने, तोड़ देने के लिए जानी जाने वाली उमा भारती ने धरना स्थल से खदेड़े जाने के बाद भी अन्ना को पत्र लिख कर कहा कि वे फिर भी उनके साथ हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी से लेकर राज्य सरकारों के भ्रष्टतम मंत्री और नेता भी अन्ना को समर्थन देने के लिए विवश थे भले ही यदि यह विधेयक अमल में आ पाता है तो उनकी मुश्किलें बढ जाने वाली हैं और वे दिल से बिल्कुल भी नहीं चाहते कि यह विधेयक पास हो।
• इस आन्दोलन से देश में विपक्ष की भूमिका बदली हुयी नजर आती है। इस अनशन के दौरान भाजपा के गडकरी और संघ के मोहन भागवत को कई घंटों तक बाबा रामदेव से गोपनीय बात करने की जरूरत महसूस हुयी, जिससे आन्दोलन में रामदेव की हैसियत में कमी आयी। यही रामदेव पहले दो दिन तक धरना स्थल पर नजर नहीं आये। इससे आन्दोलन में उनकी भूमिका का पता चलता है। इसके बाद बाबा रामदेव ने कानूनी प्रारूप के लिए बनी समिति में उन्हें न लिये जाने पर किरन बेदी के नाम के बहाने आपत्ति उठाना शुरू कर दी।
• अन्ना एक धर्मनिरपेक्ष गान्धीवादी हैं। सामाजिक समस्याओं के बहाने साम्प्रदायिक राजनीति के लिए ज़मीन तैयार करने वाले लोगों को वे राजनीतिक लाभ नहीं उठाने देंगे और जब वे धर्म निरपेक्षता के ज्वलंत सवाल पर अपने विचार रखेंगे तब साम्प्रदायिक राजनीति अपने आप हाशिये पर चली जायेगी। ऐसे में तय है कि साम्प्रदायिक संगठन विधेयक में खामियां निकाल कर इसे पास होने में अड़चनें डालेंगे जैसे कि महिला आरक्षण विधेयक सबके मौखिक समर्थन के बाद भी अभी तक पास नहीं हो सका। इससे साम्प्रदायिक दलों के मुखौटे उतरेंगे।
• इस अनशन से मालूम चला है कि देश में कितने गैर सरकारी संगठन सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं और कितने कागजों पर काम कर रहे हैं। अगर वे सभी किसी मुद्दे पर एकजुट हो जायें तो कुछ हलचल पैदा कर सकते हैं, और सरकारों को जनहित में झुका सकते हैं।
• भले ही यह बिल उन्हीं जनप्रतिनिधियों के समर्थन से पास हो सकता है जिन पर सबसे अधिक आरोप हैं किंतु किसी भी दल का कोई भी व्यक्ति अब तक इसके खुले आम विरोध का साहस नहीं जुटा सका है। इससे उनके अपराध बोध का पता चलता है। रोचक यह भी है कि विधेयक को समर्थन की घोषणाओं के बाद भी किसी ने अपने दल के आरोपियों को दल से बाहर निकालने की प्रक्रिया शुरू नहीं की है। सारी जाँचें सरकारी स्तर पर चल रही हैं किंतु दलों के स्तर पर किसी ने भी जाँचें नहीं बैठायी हैं।
• इस अभियान में जहाँ संघ से सहानिभूति रखने वाले बाबा रामदेव भी सम्मलित हैं वहीं नक्सलवादियों से सहानिभूति रखने वाले स्वामी अग्निवेष भी सम्मलित हैं। यदि राजनीतिक दल बाद में विधेयक में किंतु परंतु लगा कर कन्नी काटते हैं तो परोक्ष में नक्सलवादियों को ही बल मिलने का खतरा सामने रहेगा।
कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि इस अभियान ने अचेत पड़े देश और निर्द्वन्द होकर चर रहे राजनेताओं, नौकरशाहों के बीच एक हलचल पैदा की है, और यह हलचल कुछ न कुछ तो शुरुआत करेगी। ये मोमबत्तियां ही मशालों को जलाने का साधन भी बन सकती हैं। दुष्यंत कुमार ने कभी कहा था- एक चिनगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तो इस दिये में तेल से भीगी हुयी बाती तो है

वीरेन्द्र जैन
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