गुरुवार, मई 10, 2012

प्रमुख दलों में खुली अनुशसनहीनता के खतरे


प्रमुख दलों में खुली अनुशासन हीनता के खतरे
                                                                        वीरेन्द्र जैन
                वैसे फुटकर समाचार तो आते ही रहते थे किंतु जब एक साथ एक ही दिन एक ही राज्य से दो राष्ट्रीय दलों में खुली अनुशासन हीनता, रोने गाने, मारपीट और कपड़ों के फटने के समाचार मुखपृष्ठ पर एक साथ आये तो इस पर विषयगत की जगह वस्तुगत रूप में विचार करना जरूरी हो गया। गत दिनों राजस्थान से समाचार आये कि प्रदेश भाजपा में कोर कमेटी की बैठक में से बाहर निकल कर पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में विपक्ष की नेता वसन्धुरा राजे सिन्धिया ने पार्टी से त्यागपत्र देने का विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को पार्टी के सदस्यों की भावना से प्रभावित कर पाने में असमर्थ रही हूं इसलिए त्यागपत्र देने का विचार कर रही हूं। कुछ ही देर बाद पार्टी के 58 विधायकों और दो निर्दलीय विधायकों ने उन्हें अपने त्यागपत्र सौंप दिये। खबर के अनुसार इससे पहले बैठक में बहुत उत्तेजक बहस हुयी और इसी बीच राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने फोन पर संघ के नजदीकी गुलाब चन्द कटारिया की प्रस्तावित जनजागरण यात्रा का समर्थन करते हुए तिथि भी तय कर दी , इससे वसन्धुरा राजे सिन्धिया बिफर गयीं। उनका विश्वास है कि इस तरह की यात्रा का नेतृत्व करने वाला मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी बन सकता है इसलिए उनके अलावा किसी और के नेतृत्व में यह यात्रा नहीं होना चाहिए। उल्लेखनीय यह है कि भाजपा की मातृपितृ संस्था आरएसएस कटारिया के नेतृत्व में यात्रा के पक्ष में थी, क्योंके वे संघ के समर्पित स्वयं सेवकों में माने जाते हैं।
      दूसरी ओर राजस्थान के ही भरतपुर में उसी दिन कांग्रेस की सम्भागीय कार्यशाला चल रही थी जिसमें पूर्व सांसद विश्वेन्द्र सिंह और उनके समर्थकों ने कई पदाधिकारियों की लात घूंसों से पिटायी कर दी व कपड़े फाड़ दिये और प्रदेश अध्यक्ष डा. चन्द्रभान समेत मंचासीन लोग देखते ही रह गये। पूर्व राज परिवार से सम्बन्धित उक्त पूर्व सांसद ने भी पार्टी कार्यकर्ताओं के असंतुष्ट होने का बहाना बनाते हुए कहा कि भरतपुर में पार्टी के अध्यक्ष का पद एक ऐसे व्यक्ति को सौंप दिया गया है जिसकी भाजपा नेताओं से गहरी सांठ गाँठ है, व जो हत्या के मामले में आरोपी रह चुके हैं। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष को भी प्रदेश अध्यक्ष मानने से इंकार करते हुए कहा कि वे उनके नेता नहीं हैं। उनके नेता तो सोनिया गाँधी और अशोक गहलोत हैं।
      इससे कुछ दिन पूर्व ही उत्तरप्रदेश में भी नवनिर्वाचित समाजवादी पार्टी के शपथ ग्रहण समारोह के अवसर पर सैकड़ों युवा मंच पर चढ गये थे और उन्होंने जंग जीतने जैसे उत्साह में न केवल मंच की शोभा अपितु समारोह की गरिमा को भी नष्ट भ्रष्ट कर दिया था। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद से ही कानून व्यवस्था समाजवादी पार्टी के युवाओं की मर्जी से चल रही है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की अपीलें भी कुछ काम नहीं कर पा रही हैं।
      स्मरणीय है कि कुछ ही दिन पहले कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदुरप्पा ने अपने पक्ष के विधायकों की एक बैठक बुला कर स्वयं को पुनः मुख्यमंत्री बनवाने का प्रस्ताव पास किया था व राष्ट्रीय नेतृत्व को लगभग धमकाने वाले अन्दाज में चेतावनी दी थी कि एक खास तिथि तक उन्हें मुख्यमंत्री बनवा दें अन्यथा दक्षिण में भाजपा की इकलौती सरकार गिरने के लिए वे स्वयं जिम्मेवार होंगे। झारखण्ड के राज्य सभा चुनाव में भाजपा के लिए विदेश से डालरों में धन जुटाने वाले अंशुमान मिश्र की उम्मीदवारी से बौखलाये यशवंत सिन्हा ने उनकी उम्मीदवारी न बदलने की दशा में पार्टी छोड़ देने की धमकी दी थी जिससे केन्द्रीय नेतृत्व घबरा गया और प्रत्याशी बदल दिया जिसके परिणाम स्वरूप उनकी सरकार होते हुए भी उनका उम्मीदवार चुनाव हार गया। अभी हाल ही में दिल्ली नगर निगम के चुनाव में भाजपा का टिकिट चाहने वाले एक उम्मीदवार ने दूसरे को गोली मार दी थी।
      वाय एस रेड्डी की एक दुर्घटना में मृत्यु के बाद जगनमोहन रेड्डी द्वारा अपने दल के आदेशों के खुले उल्लंघन के बाद पार्टी छोड़ देने के बाद आन्ध्र प्रदेश में अस्थिरता बढ गयी है, व पहले से जारी पृथक तेलंगाना आन्दोलन और अधिक तीव्र हो गया है। कांग्रेस के सांसद भी अपनी ही सरकार के खिलाफ सदन में नारेबाजी कर रहे हैं और अनुशासनहीनता में उन्हें सदन से निलम्बित करना पड़ रहा है। उत्तराखण्ड में कांग्रेस हाईकमान द्वारा तय किये गये मुख्यमंत्री प्रत्याशी के खिलाफ कांग्रेस के ही दूसरे नेता ने खुला विद्रोह कर दिया था जिसे बमुश्किल मनाया जा सका। तृणमूल कांग्रेस ने अपने ही दल के रेल मंत्री के रेल बजट के बहाने उन्हें रेल मंत्री पद से हटाने की जिद ठान ली जिस निर्णय के विरोध में एक दूसरे सांसद ने ममता बनर्जी के खिलाफ झंडा उठा लिया और गीत लिख डाला। डीएमके में करुणानिधि के दोनों बेटों में उत्तराधिकार के लिए तीखी जंग चल रही है जो बहुधा हिंसक हो जाती है। शिवसेना तो दो भागों में विभाजित ही हो चुकी है, अकाली दल में से मनप्रीत सिंह बादल को भले ही चुनावी सफलता न मिली हो किंतु अकाली दल में रन्ध्र तो हो ही चुका है। अपने अनुशासन के लिए जाने जाने वाले बामपंथी दलों में भी राष्ट्रीय कांग्रेस के अवसर पर पोलित ब्यूरो सदस्य अनुपस्थित पाये जाने लगे हैं।
      विचारणीय यह है कि अनुशासनहीनता की यह बाढ क्यों आ गयी है, और जिन दलों या गठबन्धनों में अपना अनुशासन ही न हो उनसे अपने कार्यक्रम या घोषणाओं के पूरी होने की उम्मीद कैसे लगायी जा सकती है। इसका प्रणाम अभी हाल ही में मिला जब वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने संतुलित शब्दों में कहा कि गठबन्धन सरकारों में कार्यक्रम लागू करने में विलम्ब होता है।
      दर असल हमने अपने लोकतंत्र को लोगों की आकांक्षाओं के शासन की जगह उनके ऐसे वोटों का शासन बना दिया है जो उनकी आकांक्षाओं का प्रदर्शन नहीं करते अपितु वे वोट किसी लालच, दबाव, भ्रम, धोखे, भावुकता, या अज्ञानता से गिरवा लिये जाते हैं। ऐसा करने के लिए विचार, सिद्धांत, कार्यक्रम, या घोषणापत्रों की जगह, चुनावों के दौरान कुछ सेलीब्रिटीज, कुछ साम्प्रदायिकता, कुछ जातिवाद, कुछ भाषावाद, कुछ क्षेत्रवाद, आदि का प्रयोग कर लिया जाता है। चुने हुए प्रतिनिधि विशिष्ट प्रतिनिधि बन जाते हैं जो न केवल अपनी सुख सुविधाओं को ही बढाते रहते हैं, अपितु अपनी विशिष्ट स्थिति से नये नये धन्धे करते हैं, या पुराने धन्धों का विस्तार करते हैं। इस अर्जित विशिष्टता से वे अपनी गैरकानूनी और आपराधिक गतिविधियों में सुरक्षा पाते हैं। यही कारण है कि गैरकानूनी धन्धा करने वाले लोग ज्यादा से ज्यादा सत्ता की सम्भावनाओं वाले दलों से जुड़ने की कोशिश करने लगे हैं और ये खोटे सिक्के असली सिक्कों को बाजार से बाहर करने लगे हैं। सदनों में आज तीन चौथाई करोड़पति पहुँचने लगे हैं जो समाज सेवा की भावना से नहीं अपितु अपने व्यावसायिक लाभ या सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए वहाँ जाना चाहते हैं। चुने जाने के बाद वे सदन में नजर नहीं आते और ना ही बहसों में भाग लेने की कोशिश ही करते हैं। ऐसे लोग अपनी या अपने पक्ष के लोगों की उम्मीदवारी और चुनाव सुनिश्चित करने के लिए कुछ भी करने से नहीं चूकते। अरविन्द केजरीवाल और बाबा रामदेव द्वारा भले ही प्रतिवाद द्वारा सुर्खियों में आने के लिए सांसदों के खिलाफ निन्दनीय भाषा का प्रयोग किया गया हो, किंतु यह भी समरण रखना होगा कि ऐसा इसलिए भी किया गया है क्योंकि जनता का एक बड़ा वर्ग भी ऐसे ही विचार रखता है।
      राष्ट्रीय दलों में अनुशासनहीनता दलों में विभाजन और अधिक से अधिक गठबन्धन वाली अस्थिर सरकारों की ओर ही ले जायेगी जिसका परिणाम देश के लिए अच्छा नहीं होगा, इसके लिए जरूरी होगा कि सत्ता की चिंता किये बिना राजनीतिक दल अपने सिद्धांतों और विचारों पर दृड़ संगठनों का निर्माण करें। अनुशासनहीनता किसी भी हालत में सहनीय न हो और सभी दलों को इसके लिए किसी कानून से बाँधा जाये। सदन की उम्मीदवारी या लाभ के पद के लिए पार्टी में वरिष्ठता की सीमा तय हो ताकि एक दल से निकाला हुआ अनुशासनहीन व्यक्ति लाभ के लिए दूसरे दल में आश्रय न पा सके। विशिष्ट पद पर बैठे व्यक्तियों का जीवन पारदर्शी हो और उन्हें व्यापार व्यवसाय की अनुमति न हो। उन पर लगे आरोपों के खिलाफ त्वरित जाँच और शीघ्र न्याय की व्यवस्था हो। विशिष्ट व्यक्तियों के विचलन पर दण्ड भी विशिष्ट होना चाहिए। इस मामले में हाल ही में दिये गये बंगारू लक्ष्मण के मामले में दिये गये फैसले की भावना से प्रेरणा ली जा सकती है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हाल ही में अधिकारियों को निष्पक्ष कठोर फैसले लेने की सलाह दी है जिसे केवल अधिकारियों तक सीमित न मान कर दलों के अध्यक्ष समेत प्रत्येक निर्णायक व्यक्ति के लिए जरूरी माना जाना चाहिए।
वीरेन्द्र जैन
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