संघपरिवार् लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
संघपरिवार् लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, अक्टूबर 31, 2010

अरुन्धति और सटोरिया देशभक्ति

अरुन्धति, और सटोरिया देशभक्ति
वीरेन्द्र जैन
कश्मीर समस्या पर अरुन्धति के बेबाक बयान ने देश में तहलका मचा दिया है। उन्होंने वह कह दिया है जिसे रेत में गरदन छुपाये हुए कोई शुतुरमुर्ग सुनना नहीं चाहता। ‘नब्रूयात सत्यम अप्रियम” को मानने वाले वर्ग को अप्रिय सत्य सुनने को मजबूर कर दिया गया है। “ए बुल इन द चाइना शाप” की तरह अरुन्धति के अप्रिय वचन भ्रष्टाचार के क्षीरसागर में डूबे हुए लोगों को खतरे की घंटी की तरह लग रहे हैं। उन्होंने जो कहना चाहा उसे निर्भयता से कहा। कहने के बाद यह नहीं कहा कि उनके बयानों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया है या उनका आशय यह नहीं था। उन्होंने जो कहा वह स्वयं कहा किसी छद्म नाम से नहीं कहा या अपने किसी मित्र, परिचित, रिश्तेदार के नाम से नहीं कहा। किसी साध्वी का भेष बना बम विस्फोट कराने के बाद उससे इंकार करने की तरह नहीं कहा। अगर उनका कथन गैरकानूनी है तो उसके लिए वे कानून द्वारा निर्धारित सजा को भोगने के लिए तैयार हैं। कहीं न कहीं सत्ता और व्यवस्था से जुड़े लोगों को उनका बयान बेचैन कर गया है पर वे उसका जबाब नहीं दे पा रहे अपितु अरुन्धति पर मुकदमा चलाने, फाँसी देने, देश निकाला देने आदि के फतवे जारी कर रहे हैं। सत्तारूढ कांग्रेस ने प्रारम्भ में बयान का अध्य्यन करने, मुकदमा चलाने, के बाद कहा है कि सरकार अरुन्धति पर मुकदमा चला कर उन्हें अनावश्यक प्रचार नहीं देना चाहती इससे अलगाववादियों को ही मौका मिलेगा। अर्थात उनके कहे को अनकहा मान लिया जाये। असल में कश्मीर की मूल समस्या यही है कि देश के कर्णधार कश्मीर पर चर्चा से बचना चाहते हैं। इस बात पर बिना विचार किये हुये कि अरुन्धति ने सही कहा या गलत कहा, उन्हें किस जगह, किन लोगों के साथ क्या कहना चाहिए था या क्या नहीं कहना चाहिए था, उनको इस बात के लिए साधुवाद दिया जाना चाहिए कि उन्होंने गत साठ सालों से लगातार दरी के नीचे दबा कर रख दिये जाने वाले मुद्दे को बीच आंगन में लाकर खड़ा कर दिया है। भीष्म साहनी की सुप्रसिद्ध कहानी चीफ की दावत में जब एक कर्मचारी के यहाँ बड़े साहब को खाना खाने के लिए आमंत्रित किया जाता है तो चापलूसी में उनके सामने घर की सारी सुन्दर और अच्छी चीजें ही सामने लाने की कोशिश की जाती है और इस कोशिश में बूढी, कमजोर और बीमार माँ को एक कोठरी में कैद कर दिया जाता है ताकि चीफ के सामने कुछ भी असुन्दर न आये। आज अरुन्धति ने उस माँ को कोठरी से निकाल कर ड्राइंग रूम में ठीक उस समय खड़ा कर दिया है जब देश की सरकार के सबसे खास मेहमान आने वाले थे।
यह मुसीबत केवल सरकार के सामने ही नहीं है अपितु देश के प्रमुख विपक्षी दल भाजपा के सामने उस से भी बड़ी समस्या खड़ी हो गयी है। उसका अस्तित्व तो देशभक्ति के नकाब में ढका छुपा रहकर ही सुरक्षित रहता है। उसकी देशभक्ति तो उन सटोरियों के धन्धे वाली देशभक्ति है, जिसके आधार पर वे देश की टीम को जिताने का माहौल बनवाकर सट्टा लगवा देते हैं पर जब सट्टे में अच्छी बुकिंग हो जाती है तो उसे हरवाने के लिए खिलाड़ियों को फिक्स कर लिया जाता है। अधिकतम लाभ इसी में निहित होता है। भाजपा देश की कीमत पर भी सत्ता की राजनीति करती रहती है। देशभक्ति की राजनीति से चुनाव जीतकर वे क्या करते हैं यह अब किसी से छुपा नहीं है। वे जानते हैं कि इस विषय में सच क्या है, किंतु संवाद को दबाना और केन्द्र सरकार को समस्या के लिए गरियाना उनकी चुनावी रणनीति है। ये वही लोग हैं जो इमरजैंसी में छुपते फिरे थे और जो पकड़े गये थे वे बाद में माफी माँग कर जेल से बाहर आये थे। इतना ही नहीं जब उनकी सरकार आयी तो उस जेल यात्रा के लिए उन्होंने जिन्दगी भर के लिए पेंशन की व्यवस्था कर ली। पर अब वे स्वतंत्र और निर्भीक आवाज के साथ संवाद न करके उसे दबाना चाहते हैं।
डा. हरिवंश राय बच्चन ने एक साक्षात्कार में कहा था कि मैं आजाद को भी इतनी आजादी देना चाहूंगा कि वो अगर चाहे तो गुलामी स्वीकार कर सके। लोकतंत्र और स्वतंत्रता इस सीमा तक होनी चाहिए। किंतु भाजपा का चरित्र अपने आप में फासिस्ट है और उसी के अनुसार उसकी भाषा और आचरण भी फासिस्ट हैं। इनके अनुषांगिक संगठन विचारों से असहमत होने पर पुस्तकें जलाते हैं, कलाकृतियां जलाते हैं, फिल्में नहीं बनने देते बन जाएं तो चलने नहीं देते, प्रेम को प्रतिबन्धित करना चाहते हैं और वेलंटाइन डे पर हिंसक हमले करते हैं। वे समाज में ड्रेस कोड लागू करवाने की कोशिश करते हैं। ये ही किसी साम्राज्यवादी की तरह किसी भी आजादी के विचार पर फासिस्ट भाषा में विषवमन करने लगते हैं।
कश्मीर की आजादी का सवाल एक विवेकहीन भावुक विचार है जो सैन्य संगठनों के कठोर नियंत्रण में लम्बे समय तक रहने के कारण मजबूत हुआ है। अपने भौगोलिक, राजनीतिक और अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के पेंच में कश्मीर स्वतंत्र राज्य नहीं रह सकता। उसे हिन्दुस्तान या पाकिस्तान में से किसी एक के साथ रहना ही होगा। कश्मीर का कुल क्षेत्रफल कुल जम्मू-कश्मीर राज्य का 15% है और भारत के नियंत्रण वाले भाग का कुल 7% है। आजादी की माँग करने वाला यह हिस्सा कुल 4500 वर्गकिलोमीटर होगी अर्थात भूटान के दसवें हिस्से के बराबर। इसकी सीमा किसी समुद्र किनारे से नहीं लगती और वेटिकन सिटी व लक्समवर्ग व एकाध अन्य को छोड़ कर दूसरा कोई ऐसा स्वतंत्र राष्ट्र अस्तित्व नहीं बनाये रख सका। तय है कि इसे पाकिस्तान हड़पने की कोशिश करेगा जिसे या तो उन्हें स्वीकारना पड़ेगा या और कठिन संघर्ष करना पड़ेगा। आजाद होने की दशा में यह तीन तरफ से पाकिस्तान, चीन और भारत से घिरा होगा। पाकिस्तान के हालात देखते हुए कश्मीर का पाकिस्तान के साथ होना हिन्दुस्तान के साथ होने से किसी भी स्तर पर बेहतर नहीं कहा जा सकता। भारत में पाकिस्तान समेत दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा मुसलमान हैं और अपने मजहबी मामलों में अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्र हैं। भारत की अर्थव्यवस्था पाकिस्तान की तुलना में अधिक मजबूत और आत्मनिर्भर है तथा भारत में एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक शासन प्रणाली है। किसी विदेशी हमले या विद्रोह की स्तिथि में, उसका मुकाबला करने में सक्षम सैन्यशक्ति उसके पास है। पाकिस्तान के नियंत्रण वाले आजाद कश्मीर की तुलना में हिन्दुस्तान के साथ वाला कश्मीर अधिक स्वतंत्र है। आवश्यकता है कि कश्मीर में विदेशी घुसपैठियों को रोका जाये, अलगाववादियों पर कठोर कार्यवाही की जाये और सही प्रतिनिधित्व को राज्य की सत्ता सौंपी जाये। इसके लिए संवाद कायम किया जाना और उसे निरंतर बनाये रखना बेहद जरूरी है। यह चाहे जैसे भी हो। अरुन्धति वह पहली गैर कश्मीरी भारतीय महिला हैं जिन्होंने उनकी आवाज के साथ आवाज मिलायी है। जिनकी आवाज को पर मनन करने के लिए असहमति के बाद भी सुना जाना चाहिए और उन्हें आगे सम्वाद के लिए माध्यम बनाना चाहिए। सत्ता के सटोरियों द्वारा पैदा की गयी अंध राष्ट्रभक्ति अरुन्धति को फाँसी देने की माँग कर रही है वह वैसी ही भावुक और बचकानी है, जैसी कि कश्मीर की आजादी की हवाई माँग है।
संवाद के साथ साथ उन बाधाओं को दूर किया जाना चाहिए जिन के कारण अपना भला बुरा सोचने की कश्मीरी दृष्टि धुंधलाई हुयी है। अरुन्धति ने देश और कश्मीर दोनों ही जगह संवाद की सम्भावनाएं पैदा की हैं।



वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

बुधवार, फ़रवरी 10, 2010

थ्री ईडियट्स जैसी फिल्म का विरोध किसने किया था

[मुम्बई में थ्री ईडियट्स के पोस्टर फाड़ते भाजपा कार्यकर्ता अपने झन्डों के साथ]
थ्री ईडियटस- जैसी एक बहु प्रशंसित फिल्म के विरोधी कौन थे?
वीरेन्द्र जैन
थ्री ईडियट्स आमिर खान की बेहतरीन फिल्मों की श्रंखला में एक मील का पत्थर साबित हुयी है जिसने भरपूर मनोरंजन के साथ आज के युवावर्ग की इतनी सारी समस्याएं एक साथ उठायी हैं कि आश्चर्य होता है। इस फिल्म को न केवल व्यापारिक स्तर पर ही सफलता मिली है अपितु हर वर्ग के फिल्म समीक्षक को इसकी मुक्त कण्ठ से प्रशंसा करने के लिये विवश होना पड़ा है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और भूतपूर्व उपप्रधान मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी जो अपनी जवानी के दिनों में फिल्मी पत्रकार हुआ करते थे और फिल्मों की समीक्षा लिखते थे, को भी इसकी तारीफ करने को विवश होना पड़ा है।
जहाँ इस फिल्म की चारों दिशाओं में तारीफ हुयी है वहाँ इसका विरोध करने वाले केवल भाजपा के कार्यकर्ता थे जो आमिर खान द्वारा रंग दे बसंती जैसी फिल्म बनाने के बाद से ही उनसे नाराज चल रहे हैं क्योंकि उस फिल्म में न केवल अमर शहीद भगत सिंह के विचारों पर ही प्रकाश डाला गया अपितु साम्प्रदायिकता और तत्कालीन भाजपा सरकार के आचरण को भी समीक्षा के केन्द्र में लाया गया था। यही कारण था कि भाजपा के इकलौते फासिस्ट शासन वाले राज्य गुजरात में रंग दे बसंती जैसी बेहतरीन फिल्म को प्रदर्शित नहीं होने दिया गया और लोगों को सीडी और टीवी पर देख कर काम चलाना पड़ा।
उसके बाद से वे आमिर की हर एक फिल्म का विरोध करते हैं, भले ही उसके सफल हो जाने के बाद जनता का मूड भाँप कर आडवाणी जी आग को ठंडा करने का स्वाँग करते रहते हों। जब तारे ज़मीं पर अत्यंत सफल हुयी तो आगामी चुनाव और जनता का मूड भाँप कर आडवाणी जी ने फिल्म देख कर आँसू भी बहाये और उन आँसुओं के बहने को प्रचारित भी कराया था।
थ्री ईडियट्स में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विज्ञान विषय के रट्टू तोतों के बीच फर्क दिखाया है जिसमें विज्ञान में टाप करने की चाह रखने वाला रट्टू लड़का देवी देवताओं को पूज कर सफल होना चाहता है जबकि फिल्म का हीरो अपनी छोटी छोटी समस्याओं को अपनी वैज्ञानिक बुद्धि से हल करता है। फिल्म में गरीबी की विवशता है, तो अमीरी की बदमाशी भी है जो दूसरे के नाम से परीक्षा की डिग्री हासिल करके धन कमाता है। फिल्म में रैगिंग के रोग का प्रोटेस्ट भी है तो शिक्षा की भाषा का सवाल भी उठाया गया है। फिल्म में नवधनाड्यों की सोच की सीमा भी बतायी गयी है तो गरीबी की विशाल ह्रदयता और ईमानदारी की मिशालें हैं। फिल्म में गीता का दर्शन- जो होता है सब अच्छा होता है- को गीत आल इज वैल के माध्यम से दिया गया है, तो रोचकता बनाये रखने के लिये ग्लोबल वार्मिंग जैसी हल्की फुल्की टिप्पणी भी है। सुशिक्षित लोगों द्वारा कहीं भी गन्दगी कर देने की बुरी आदतों पर कटाक्ष भी है तो परीक्षकों के पक्षपात के दोष भी दर्षाये गये हैं। निर्देशन का कमाल हर जगह नज़र आता है जिसमें गरीबी को ब्लेक एंड व्हाइट दिखा कर उनके उसी पुराने युग में जीने की विवशता को बताया गया है। माँ बाप के सपनों को बच्चों पर लाद कर उन्हें पैसा पैदा करने की मशीन में ढालने की भूल को भी उभार कर बताया गया है कि बच्चे अपनी सामर्थ और रुचि के अनुसार ही सही विकास पाते हैं।
जब लोगों के द्रष्टिकोण में वैज्ञानिकता आयेगी तब चीजों को विवेक के आधार पर देखने की तमीज़ भी जागेगी जिससे ढोंग, पाखण्ड और अन्धविश्वासों को फैला कर मलाई काटने वालों का पत्ता साफ हो जायेगा। तब लोग एक अफवाह पर गणेशजी की मूर्ति को दूध पिलाने नहीं दौड़ पड़ेंगे। इसलिये अन्न्धविश्वासों से लाभांवित लोग हर वैज्ञानिक कदम को भटकाने का प्रयास करते हैं या उसका विरोध करने लगते हैं।
फिल्म को सफल करके लोगों ने न केवल अपनी परिपक़्वता का ही परिचय दिया है अपितु साहित्य चित्रकला फिल्म और विभिन्न कलाओं का डंडे से विरोध करने वाली भाजपा को करारा जबाब भी दिया है। शायद यही कारण है कि शाहरुख खान की फिल्म का विरोध उन्होंने अपने गठबन्धन वाले शिव सेना पर ही छोड़ दिया है। कला और संस्कृति के संगठनों और मोर्चों की ज़रूरत आज पहले से ज्यादा बड़ गयी है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629