मंगलवार, जनवरी 13, 2015

भाषायी गुलामी केवल अंग्रेजी की ही नहीं

भाषायी गुलामी केवल अंग्रेजी की ही नहीं
वीरेन्द्र जैन
हम आये दिन भाषायी गुलामी का स्यापा यहाँ वहाँ सुनते रहते हैं व 14 सितम्बर के आस पास यह रूदन और तीव्र हो जाता है क्योंकि देश में सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थान आने के बाद वहाँ प्रतिवर्ष यह आयोजन धन सम्मान आदि देकर कराया जाता है इसलिए रूदालों की एक राष्ट्रव्यापी टीम खड़ी हो गयी है जो हिमालय से कन्याकुमारी और अटक से कटक तक जाकर ऑंसू बहाते हैं। रोचक यह भी है कि इस रूदन कार्यक्रम में वे लोग भी सम्मिलित होते हैं जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में वयस्क अवस्था प्राप्त कर लेने के बाद भी आजादी की लड़ाई में कोई हिस्सा नहीं लिया था तथा अभी भी उन लोगों के पीछे खड़े नजर आते हैं जिनका आजादी की लड़ाई में कोई योगदान नहीं रहा तथा आजादी के मतवालों का जो हमेशा ही साम्प्रदायिकता फैला कर विरोध करते रहे।
      आखिर ये भाषायी गुलामी होती क्या बला है! इसे जानने से पहले हमें आजादी और गुलामी को भी सही तरीके से समझना होगा। क्या जिस देश में सारे लोग एक समान न हों वहाँ क्या आजादी और गुलामी सब के लिए एक जैसी हो सकती है? जिन देशों   में दास प्रथा थी वहाँ की राष्ट्रीय आजादी के बाद भी क्या दासों को आजादी मिल गयी थी? अमेरिका के पहले सोलह राष्ट्रपति स्वयं दासों के मालिक रहे हैं। हमारे देश के प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन के आठ साल बाद सन 1865 में वहाँ दास प्रथा समाप्त हुयी। इसके भी सौ साल बाद तक भी वहाँ रंगभेद चला और काले लोगों को पुलिस, जेल-व्यवस्था तथा केकेके अर्थात कु क्लक्स और क्लान के छापामार दस्तों का दमन झेलना पड़ा। 1967 के पहले काले लोगों को गोरे लोगों के स्कूलों में पढने नहीं दिया जाता था और ना ही वे उनके शौचालयों, बसस्टेशनों, और फव्वारों की ओर जा सकते थे। 1967 में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने काले और गोरे लोगों के बीच विवाह और यौन सम्बंधों की इजाजत दी जो पहले प्रतिबंधित थे। इतना ही नहीं अभी पिछले दिनों बराक ओबामा की उम्मीदवारी के चुनाव के दौरान हिलेरी क्लिंटन ने उनकी चमड़ी के रंग को आधार बना कर अपना चुनाव प्रचार चलाया था। उल्लेखनीय है कि हमारे देश में भी हमारे संविधान की रचना में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बाबा साहब अम्बेडकर भी उस समय अंग्रेजों से आजादी के पक्षधर नहीं थे क्योंकि उनका मानना था कि आखिर यह आजादी किसको मिलेगी! उसी उच्च कहलाने वाले सवर्ण वर्ग को। दलित तो गुलाम के गुलाम रहेंगे और जब तक कि दलितों के लिए उनकी 'आजादी' के हालात नहीं बन जाते तब तक यह एक बहुत सीमित आजादी ही होगी। गांधीजी ने उनकी बात समझी थी इसीलिए हरिजन उद्धार के सामाजिक आन्दोलनों को राजनीतिक आन्दोलनों की बराबरी पर चलाया था और उसके विरोध का परिणाम भी झेला था- स्मरणीय है कि गांधीजी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे ने गांधीजी को गोली मारने के बाद दिये गये बयानों में कहा था कि मैंने ऐसे साँप को मारा है जो हिन्दू धर्म को डॅंस रहा था। उसकी निगाह में वर्णव्यवस्था ही हिन्दू धर्म था। बाद में अम्बेडकर ने भी हिन्दू धर्म से आजादी ली थी और पाँच लाख दलितों के साथ नागपुर में हिन्दूधर्म छोड़ने के लिये सामूहिक रूप से बौद्ध धर्म अपनाया था।
      इसलिए भेद भाव वाले समाज में भाषायी गुलामी भी सबके लिए एक जैसी नहीं हो सकती। आम तौर पर हिन्दी भाषी लोगों को अंग्रेजी में मजबूरन व्यवहार करने की विवशता को भाषायी गुलामी माना जाता है जबकि उच्चवर्ग के जो लोग अंग्रेजी स्कूलों में पढ लिख कर बड़े होते हैं उन्हें जब कभी हिन्दी में व्यवहार करना पड़ता है तो उनके चेहरों पर गुलामी का संदेश साफ पढा जा सकता है। एक आम स्कूल में पढा हिन्दीभाषी भी कार्यालयों में जो अनुवाद की हिन्दी चल रही है उसके व्यवहार में गुलामी महसूस करता है। वैसे भी किसी भी कार्यालय के कार्यों की अपनी शब्दावली होती है व वह उसी लिपि के जानने वाले किसी भी दूसरे व्यक्ति के लिए विदेशी भाषा की तरह ही होती है, हम लोग किसी विभाग के फार्म भरते समय यह परेशानी झेलते रहते हैं। हिन्दी की बोलियों का प्रयोग करने वालों के लिए खड़ी बोली भी कम से कम आधी विदेशी तो होती ही है। मैं जब बचपन में अपने गाँव जाकर अपने कस्बे की भाषा में बात करने की कोशिश करता था तो गाँव की महिलाएँ कहती थीं कि ये तो बिल्कुल रेडियो की बोली बोलता है। उनके लिए खड़ी बोली रेडियो की बोली थी। वैसे भी हम लोग आपस में बात करते समय या पुस्तकों की समीक्षा करते समय कहते ही रहते हैं कि अभिजात्य भाषा का प्रयोग किया गया है अर्थात उसी भाषा में भी अभिजात्य की भाषा अलग होती है। (माना गया है कि प्रेम के कुछ क्षणों में मौन भी भाषा बन जाता है।)
असल में सचाई तो यह है कि जब हम अपने मन की बात लगभग वैसी की वैसी सामने वाले तक पहुँचाना चाहते हैं तो उसके लिए जिन शब्दों का प्रयोग करके हम सफल होते हैं वही हमारी भाषा हो सकती है व इसके अलावा इस लक्ष्य को पाने के लिए किन्हीं अन्य शब्दों के प्रयोग की विवशता भाषायी गुलामी है। हमें सोचने विचारने में कभी भाषा का संकट नहीं आता यह संकट तो तब आता है जब हमें अपने विचार दूसरे अथवा दूसरों तक पहुँचाने होते हैं। यह संकट तब और भी बढ जाता है जब दूसरा कुछ ज्यादा ही दूसरा होता है।
      सन 1969 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरागांधी को अपनी सरकार बचाने के लिए कम्युनिष्टों का समर्थन पाने हेतु बैंकों, बीमा कंपनियों आदि का राष्ट्रीयकरण करना पड़ा व उसके बाद इन संस्थानों को आम आदमी से जुड़ने को मजबूर होना पड़ा तब उन्हें आम आदमी की भाषा समझने वाले लोगों की जरूरत पड़ी। सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों में हिन्दी अधिकारियों की नियुक्तियाँ और भाषा विभागों आदि के गठन उसी काल की देन हैं जबकि मनमोहनसिंह की नई आर्थिक नीतियों के आने के बाद हिन्दी की जाजम लपेटने का काम प्रारंभ हो गया। देश में आम आदमी के बीच लोकप्रिय वक्ता रहे अटलबिहारी बाजपेयी आम सभाओं में 'लतीफों और हास्यकथाओं की भाषा' (सहज समप्रेषण) में बात किया करते रहे तो राजनारायण से लेकर लालू प्रसाद तक आम आदमी के बोलचाल की भाषा में बात करके ही जन नेता बन सके हैं। ( लालू जी की टूटीफूटी अंग्रेजी भी अपना संदेश दे जाती है।)
भाषा संवाद का माध्यम है और उसकी बात संवाद, संवादी, उनके वर्ग, उनके बीच के सम्बंध, सम्बंधों के बीच की ईमानदारी आदि पर निर्भर करेगी। एक लतीफे में टेलीफोन पर छोटे भाई की सारी बातें बड़े भाई की समझ में आती रहती हैं पर जब वह माँ के इलाज के लिए पैसे मांगता है तो बड़े भाई को सुनाई देना बंद हो जाता है और वह कहता है कि आवाज नहीं आ रही। असल में संवादियों के बीच यदि आपसी सौहार्द है तो भाषा के सारे अवरोध दूर किये जा सकते हैं किंतु जब एक व्यक्ति दूसरे को लूटना चाहता हो तो उसके लिए भाषा को भी आधार बना सकता है। अधिकतर सरकारी कार्यालय ऐसा ही कर रहे हैं जबकि बीमा एजेन्ट को कोई परेशानी नहीं होती और ना ही ग्राहक को बीमा करवाते समय होती है। इसलिए मेरी दृष्टि में भाषा की गुलामी का सवाल बाद में आने वाला सवाल है और उसे पहले उठाना ऐसा लगता है जैसे घोड़े के आगे गाड़ी बाँधी जा रही हो। हमारे पास भी जब गाँव की बोली में बोलता हुआ आदमी आता है तो उसको भी वैसी ही गुलामी का अहसास होता है जैसा कि हमें अंग्रेजी वालों के साथ होता है। यदि सरकार अवरोध को वास्तव में दूर करना चाहेगी तो सबसे पहले सरकारी कार्यालयों से भ्रष्टाचार को समाप्त करना होगा तथा काम करने की संस्कृति  विकसित करना होगी, भाषा की समस्या तो चंद अनुवादकों की नियुक्ति से हल हो जायेगी।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास  भोपाल मप्र
फोन 9425674629







शुक्रवार, जनवरी 09, 2015

डा. सुरेश तन्मय का नया कविता संकलन -शेष कुशल है



डा. सुरेश तन्मय का नया कविता संकलन -शेष कुशल है
वीरेन्द्र जैन
                सुपरिचित कवि गीतकार सुरेश तन्मय के पाँचवें कविता संकलन-शेष कुशल है- का विमोचन जबलपुर में होने जा रहा है। वे साहित्य के प्रति समर्पित कवि हैं जो खड़ी बोली हिन्दी के साथ साथ निमाड़ी में भी रचना करते हैं, और निमाड़ी के शिखर के कवियों में गिने जाते हैं।
                इस नये संकलन में ‘गाँव से बड़े भाई की चिट्ठी’ नामक लम्बी कविता के अलावा अठारह अन्य कविताएं हैं। संकलन में सम्मलित ज्यादातर कविताएं रिश्तों के बारे में हैं। ‘गाँव से बड़े भाई की चिट्ठी’ में जहाँ भाई भाभी और अन्य रिश्ते नाते दारों, गाँव वालों समेत गाँव की स्मृतियों को समेटा गया है वहीं नगरों के रिश्तों विहीन सम्बन्धों की शुष्कता पर दुख भी है। यह विस्थापन का समय है और पूरे देश में कहीं शिक्षा के नाम पर, नौकरी के नाम पर, कहीं बाँध के नाम पर, कहीं रेलमार्ग, हाईवे, उद्योग विकास के नाम पर तो कहीं धार्मिक टकरावों के चलते तो कहीं जातिवादी शोषण के कारण, तो कहीं डकैतों, दबंगों के कारण करोड़ों लोग अपने मूल स्थान को छोड़ कर विस्थापित हुये हैं और अपनी जड़ों से कट गये हैं। न उन्हें गाँवों में चैन था और न ही नगरों में सुकून मिल पा रहा है। कुँवर बेचैन के एक गीत की पंक्तियां हैं-
जब धागा था तो सुई न थी, जब सुई मिली तो डोर नहीं,
ना जाने कैसी स्थिति तक हम फटी कमीजें आ पहुँचीं
                इसी तकलीफ से प्रभावित जब कैलाश गौतम का नायक गाँव पहुँचता है तो उन्हें लिखना पड़ता है-
गाँव गया था गाँव से भागा.......
रामराज का हाल देखकर
पंचायत की चाल देखकर
आँगन में दीवाल देखकर
सिर पर आती डाल देखकर
नदी का पानी लाल देखकर
और आँख में बाल देखकर
गाँव गया था गाँव से भागा।   
                श्री तन्मय भी समय के इसी दर्द को पहचानने की कोशिश करते हैं जिससे आदमी की विवशताओं की कई पर्तें खुलती हैं। आखिरकार संकलन की अंतिम नुक्कड़ कविता- जाग जमूरे में उन्हें कहना ही पड़ता है-
चोर चोर मौसेरे भाई- हाँ उस्ताद  
डाकिन है घर की ही दाई- हाँ उस्ताद  
खेत में तूने फसल उगाई- हाँ उस्ताद  
और दबन्गों ने कटवाई- हाँ उस्ताद  
उठा दरांती भिड़ जा इनसे
ये कायर जायेंगे भाग
जाग जमूरे अब तो जाग
                संकलन में पिता, माँ, बेटियां, बहू, मित्र, के साथ साथ आत्मस्थ, और वृद्धराग जैसी कविताएं हैं जो सम्बन्धों की पुरानी आँच और उनमें आ रहे बदलावों को पहिचानने की कोशिश करती हैं। डा. तन्मय एक सिद्धहस्त रचनाकार हैं और ऐसा लगता है कि विषय का चुनाव करने के बाद उस पर रचना लिख डालने में उन्हें अधिक समय नहीं लगता होगा। उनकी भाषा और विम्ब सरल है, व किसी व्याख्या के मोहताज नहीं हैं। नीचे दी जा रही पंक्तियां उसका प्रमाण हैं।
किसमें कितनी पोल जमूरे
तोल मोल कर बोल जमूरे
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हाथ मिलाये हैं फसलों ने खरपतवारों से
मठों आश्रमों ने राजा के दरबारों से 
विद्या ने वैभव से मिलकर जुगत भिड़ाई
और कलम ने लफ्फाजों से प्रीति बढाई
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जो नहीं कुछ भी बोलते होंगे
दिल तो उनके भी खौलते होंगे
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मौन मन का मीत
मौन परम सखा है
..... बाँटने को व्यग्र हम
जो गांठ में बाँधे रखा है
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पाया जो जग से अब तक लौटाने की है बारी
देखें कर्ज चुकाने की क्या की हमने तैयारी
सींचें उन्हें और जिनसे जीवन रसधार बही है
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                तन्मय जी का रचना कर्म निरंतर जारी है और उनकी प्रत्येक नई रचना एक पायदान ऊपर की ओर जाती महसूस होती है। आशा की जाना चाहिए कि उनके अगले संकलन इसी क्रम में नई ऊँचाइयां स्पर्श करते जायेंगे।
वीरेन्द्र जैन                                                                           
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बुधवार, जनवरी 07, 2015

फर्क, म्युनिसिपिल्टी और केन्द्र सरकार का



फर्क, म्युनिसिपिल्टी और केन्द्र सरकार का
वीरेन्द्र जैन

       वरिष्ठ भाजपा नेता और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के पूर्व मंत्री अरुण शौरी ने नरेन्द्र मोदी सरकार पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि म्युनिसिपिल्टी और केन्द्र की सरकार चलाने में फर्क होता है। श्री शौरी एक प्रतिष्ठित अखबार के बड़े पत्रकार लेखक रहे हैं और अपनी बात कहने के मामले में शब्दों के चयन में भूल करने वाले नहीं माने जा सकते। वे न तो सुब्रम्यम स्वामी की तरह चौंचलेबाज हैं जो पीके फिल्म में आईएसआई का पैसा लगा होने जैसे बयान देते हैं, और न ही श्री लालू प्रसाद यादव की तरह बयान में अति रोचकता डालने की नीति के पक्षधर हैं, इसलिए उनका बयान गम्भीरता से विश्लेषण की अपेक्षा रखता है। यह बयान श्री नरेन्द्र मोदी पर ही नहीं अपितु उनके मंत्रिमण्डल के सदस्य व समर्थक सदस्यॉं पर भी लागू होता है।  
राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह बात सर्वमान्य है कि प्रधान मंत्री पद पर बैठने वाले जवाहरलाल नेहरू, इन्दिरा गाँधी, वीपी सिंह जननेता होने के साथ साथ अच्छे प्रशासक भी रहे हैं जबकि मोरारजी भाई देसाई, नरसिंहा राव, मनमोहन सिंह, इन्द्र कुमार गुजराल, अच्छे प्रशासक थे पर जन नेता नहीं थे। लाल बहादुर शास्त्री, राजीव गाँधी, अटल बिहारी वाजपेयी, विभिन्न कारणों से लोकप्रिय नेता थे किंतु उनकी प्रशासनिक क्षमता पद के लिए वांछित योग्यता से कम आँकी गयी है। शास्त्रीजी के निधन पर तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राधा कृष्णन के शब्दों को याद करें कि उन्होंने कहा था – सिंसियरिटी इस बैटर दैन एबिलिटी........... श्री वैकट रमन ने अपनी पुस्तक माई प्रेसीडेंशियल डेज में श्री राजीव गाँधी के मानवीय पक्ष की प्रशंसा करते हुए भी उनकी कमजोर प्रशासनिक क्षमता की ओर इंगित किया है। श्री चरण सिंह, चन्द्र शेखर और देवगौड़ा अच्छे व्यक्तित्व वाले लोकप्रिय क्षेत्रीय नेता होने के कारण परिस्तिथिवश इस महत्वपूर्ण पद पर पहुँच गये थे इसलिए कम समय तक ही पद पर रह सके। श्री नरेन्द्र मोदी एक जननेता भी हैं और गुजरात राज्य में उन्होंने अपनी प्रशासनिक क्षमताओं का प्रदर्शन भी किया है। यही कारण रहा कि लोकसभा में अपने चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने भाजपा या अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल को चुनावी प्रचार का मुद्दा बनाने की जगह गुजरात के विकास को माडल के रूप में, और अटल अडवाणी समेत सारे नेताओं को नीचे करके अपने नाम को ही प्रचार में आगे रखने की नीति से सफलता पायी। श्री अरुण शौरी ने अपने बयान में उनकी प्रशासनिक क्षमताओं पर कोई प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया है अपितु उन क्षमताओं के स्तर की सीमाओं की ओर उंगली उठायी है। इसमें वे गलत प्रतीत नहीं होते।
श्री मोदी जब भी आम लोगों को सम्बोधित करते हैं तब वे यह भूल जाते हैं कि वे इस महान देश के सर्वोच्च पद को सुशोभित करने वाले प्रधानमंत्री हैं न कि वोट झटकने के लिए भाजपा के गैरजिम्मेवार चुनाव प्रचारक। उनकी भाषा और अन्दाज चुनावी आयोजनों में अपने विरोधी की अतिरंजित आलोचना और उपहास करने वाला रहा है। छोटे मोटे चुनावों में यह मान कर गैरजिम्मेवार ढंग से वादे किये जाते हैं कि उनको कोई गम्भीरता से नहीं लेता और इन वादों के प्रति उत्तरदायित्व नहीं बनता। मोदीजी ने प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित हो जाने के बाद भी उसी तरह से भाषण दिये थे जिसका नुकसान उन्हें काले धन की वापिसी के मामले में उठाना पड़ा। श्री मनमोहन सिंह एक ईमानदार और जिम्मेवार राजनेता थे जिन्हें अनचाहे पद सम्हालना पड़ा था। उनसे नीतियों पर मतभेद हो सकते हैं और उनकी नीतियों की असफलता की आलोचना की जा सकती है किंतु योग्यता और ईमानदारी पर सवाल उठाने का कोई आधार नहीं बनता था। किंतु चुनावी सभाओं में मोदी ने स्वयं जिस भाषा में जिस तरह के आरोप लगाये उससे उनको सौंपे गये पद की मर्यादाएं ही घटीं।
भाषा के प्रयोग में अतिचतुर अडवाणी ने उन्हें एक अच्छा इवेंट मैनेजर कहा तो उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद वीजा देने वाले बराक ओबामा ने मैन आफ एक्शन कहा। तय है कि इन दोनों ही कथनों को व्यंजना में भी कहा हुआ माना जा सकता है। पश्चिमी इवेंट मैनेजरों की सलाह पर जापान में उनका ढोल बजाना या चीनी राष्ट्रपति को गुजरात में झूला झुलाना देश के लोगों को हजम नहीं हुआ। हर घंटे पोषाकें बदलने की सलाह किसी विदेशी सलाहकार ने ही दी होगी जो भारतीय मानस को कम समझता हो। आस्ट्रेलिया और अमेरिका में भारतीयों की रैली प्रायोजित करने से भारत में उनके अन्ध प्रशंसक भले ही मुदित हो गये हों किंतु उन देशों के अखबारों ने उनकी नौटंकी को अन्दर के पेजों पर जो स्थान दिया उससे ही इसके प्रभाव का पता चलता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ में या दूसरे कई स्थानों में हिन्दी में बोल कर उन्होंने समझदारी का काम किया क्योंकि ब्रिस्क की अपनी पहली बैठक में उनका अंग्रेजी में भाषण बहुत निष्प्रभावी माना गया था। भाषा सम्प्रेषण का माध्यम है और जिस भाषा मे आप सहज हों उसका ही प्रयोग करना चाहिए। लालू प्रसाद या अन्य स्थानीय नेता अपनी बोली में जब सम्बोधित करते हैं तो भले ही अभिजात्य वर्ग को मनोरंजक लगता हो किंतु उस क्षेत्र के लोगों को वह एक ईमानदार बयान लगता है। मोदीजी अंग्रेजी जानते हैं किंतु अब तक के कार्यव्यवहार में उसका प्रयोग न करने के कारण वे अभ्यासी नहीं हैं, इसलिए स्वाभाविकता नहीं आती। मनमोहन सिंह सरकारी कार्यक्रमों के अलावा कम से कम बोलते थे या तैयार किया हुआ भाषण पढते थे।
अम्बानी द्वारा शुरू किये गये अस्पताल के उद्घाटन के अवसर पर उन्होंने गणेशजी को हाथी का सिर लगाये जाने की पौराणिक कथा का उल्लेख करते हुए इसे प्राचीन काल की शल्य चिकित्सा के गौरव से जोड़ने की जो हास्यास्पद बात की उससे उनकी ही नहीं उनका समर्थन करने वालों की भी बड़ी किरकिरी हुयी। वे यह भूल गये कि वे अब भारत देश के प्रधानमंत्री भी हैं और उनके कथन में इस देश का प्रतिनिधित्व भी होता है, जिसमें अनेक दर्शन हैं और एक दर्शन चार्वाक का भी है। एक प्रधानमंत्री को वैज्ञानिकिता से विमुख नहीं होना चहिए। दूसरे परमाणु विस्फोट के अवसर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने शास्त्रीजी के नारे – जय जवान जय किसान में जय विज्ञान भी जोड़ा था। अटलजी को भुलाना मोदीजी की अपनी राजनीतिक जरूरत हो सकती है किंतु पौराणिक कथाओं के भरोसे आधुनिक विज्ञान को भुलाना तो आत्मघाती होगा।
आतंकवाद के नाम पर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की मुहिम तब ठंडी पड़ गयी थी जब मडगाँव, मालेगाँव, समझौता एक्सप्रैस, हैदराबाद, अजमेर आदि में हुए बम विस्फोटों के रहस्य खुल गये थे और जिम्मेवार लोगों की पहचान सामने आयी थी। स्मरणीय है कि उससे पहले भाजपा आतंकवाद को देश की सबसे पहली समस्या बता कर एक वर्ग के खिलाफ नफरत फैलाने की राजनीति करती थी। बाद में कुछ पुलिस अधिकारियों और अन्य लोगों के बयानों से यह भी स्पष्ट हुआ कि गुजरात में जो अनेक फर्ज़ी एनकाउंटर किये गये थे उनमें मृतकों पर आरोप लगा दिया गया था कि वे मोदी को मारने के इरादे से आये थे। अक्षरधाम मन्दिर पर किये गये हमले के षड़यंत्र के सहयोगी बताये गये आरोपियों को पिछले साल बाइज्जत बरी कर दिया गया है। अब यही बात निराधार रूप से जाँच से पूर्व ही एक विदेशी नाव के विस्फोट से डूब जाने के बाद कही जाने लगी थी कि उस नाव में आतंकी सवार थे और वे छब्बीस ग्यारह दुहराने आ रहे थे। जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति को भारत के प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में आयोजित कर के सम्बन्ध सुधारने के दावे किये जा रहे हों तब सरकारी तौर पर आरोप लगाने से पहले जाँच तो पूरी करा लेना चाहिए थी। बच्चों की गलतियां तो माफ की जा सकती हैं किंतु बड़ों की गलतियों से गलत परिणाम निकल सकते हैं। यही कारण है कि श्री अरुण शौरी को म्युनिसिपिल्टी और केन्द्र सरकार का फर्क याद दिलाना पड़ा। इसका स्वच्छता अभियान या लालकिले से घर घर शौचालय बनवाने के आवाहन से कोई सम्बन्ध नहीं है।
वीरेन्द्र जैन                                                                           
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