सोमवार, फ़रवरी 24, 2020

वारिस पठान के नाम खुला खत


वारिस पठान के नाम खुला खत
वीरेन्द्र जैन
प्रिय वारिस पठान
तुम अपने एक बयान से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बने हो। इस बयान में तुमने भाजपा और संघ परिवार का वह काम करने की कोशिश की है जिसमें उक्त संगठन खुद से असफल हो गये थे। तुम अच्छी तरह जानते थे कि हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है और इसमें सत्ता की शक्ति बहुमत के आधार पर अर्जित होती है। अगर देश में समाज हिन्दू मुस्लिम के आधार पर विभाजित हो जायेगा तो जो दल बहुसंख्यक अर्थात हिन्दू पक्ष का नेतृत्व प्राप्त कर लेगा वह सत्ता और उसकी शक्ति प्राप्त कर लेगा। हमारे स्वतंत्रता संग्राम में जब हिन्दू मुस्लिम दोनों ही अंग्रेजों के खिलाफ साथ साथ मिल कर लड़े तो मुट्ठी भर अंग्रेजों ने अपनी बन्दूकों की ताकत के साथ साथ हिन्दू मुसलमानों की एकता को तोड़ने की कूटनीति भी स्तेमाल की। जनसंघ से लेकर भाजपा के रूप में उसके मुखौटा बदलने तक इस दल और उसके पितृ संगठन का एक ही लक्ष्य रहा है कि इस एकता को तोड़ा जाये व स्वयं को हिन्दुओं का इकलौता खैरख्वाह घोषित किया जाये। यही कारण रहा कि इन्होंने पहले हिन्दू महासभा का सफाया किया, और दूसरे लगातार मुस्लिमों के खिलाफ नफरत फैलाते हुए साम्प्रदायिक तनाव बढाने के लिए काम करते रहे। आज की उनकी हैसियत इसी कूटनीति का परिणाम है। वे तनाव बढाने के लिए निरंतर काम करते रहते हैं, गलत इतिहास पढाते हैं, अफवाहें फैलाते हैं और उनके समर्पित भोले भाले लोग उसे सच मानने लगते हैं। डिजिटल मीडिया आने के बाद तो इनका काम और आसान हो गया है. पिछले दिनों बेहूदा आर्थिक नीतियों, और गलत कदमों ने अर्थ व्यवस्था को चौपट कर दिया है, मंहगाई आकाश छूने लगी है और बेरोजगारों की फौज खड़ी कर दी है, जिससे सरकार का संकट और बड़ा हो गया है।  इससे बचने के लिए सरकार ने साम्प्रदायिक विभाजन के प्रयास तेज कर दिये हैं। नागरिकता कानून संशोधन तो इन प्रयासों का चरम है जिसे संख्या बल के आधार पर स्वीकृत करा लिया गया है।
इस कानून के विरोध में सभी धर्मनिरपेक्ष संगठन उतरे और उन्होंने लड़ाई को हिन्दू-मुसलमानों की जगह साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता का रूप दे दिया जिससे भाजपा की कूटनीति को करारा तमाचा लगा। इसकी काट के लिए ही उन्होंने इस आन्दोलन को हिन्दू बनाम मुसलमान बनाने की  पूरी पूरी कोशिश की, प्रधानमंत्री ने स्वयं ही आन्दोलन कारियों को उनके कपड़ों से पहचानने का बयान दिया, आन्दोलनकारी महिलाओं को 500\- रुपये की दैनिक मजदूर बताया व भीषण सर्दी में रात बिताने वाली महिलाओं को मुफ्त बिरियानी खाने वाली बताया। इस आन्दोलन का पूरा इतिहास तो जगजाहिर है इसलिए इसकी शांति भंग करने और इसे हिन्दू बनाम मुसलमान के रूप में बदलने के प्रयास किये जाने लगे।
वारिस पठान जी, तुम्हारा बयान भी इसी का हिस्सा लगा क्योंकि कोई भी स्वस्थ मस्तिष्क तो इसे हजम नहीं कर पा रहा है। तुमने उक्त बयान सार्वजनिक मंच से यह प्रभाव बनाते हुए दिया जैसे यह लड़ाई सौ करोड़ हिन्दुओं और 15 करोड़ मुसलमानों के बीच हो रही हो जिसका फैसला किसी पानीपत के मैदान में सैनिकों की बहादुरी के आधार पर होना हो। मित्र, मनुष्य मनुष्य सब बराबर हैं व इतिहास में वीरता के किस्से हर तरफ मौजूद हैं, तुम्हारे बयान के पक्ष में कोई हिन्दू मुसलमान सामने नहीं आया अपितु ज्यादातर मुसलमानों ने तुम्हारे नेतृत्व और बयान को अस्वीकृत करते हुए खुद को 135 करोड़ हिन्दुस्तानियों का हिस्सा बताया जिन्हें आम नागरिकों की तरह लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त हैं, व इन्हीं का उपयोग करते हुए वे अपनी सरकार के फैसलों के विरोध में देश भर में आन्दोलनरत हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे यह अहिंसक लोकतांत्रिक लड़ाई मुसलमान के रूप में नहीं लड़ रहे हैं अपितु धर्म निरपेक्षता में भरोसा करने वाले वामपंथियों, दलितों, छात्रों व मध्यममार्गी दलों के साथ मिल कर लड़ रहे हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि ना तो एक तरफ कुल 15 करोड़ हैं और ना ही दूसरी तरफ सौ करोड़ हैं। इसी कमजोरी को समझते हुए ही आर एस एस प्रमुख को आदिवासियों को हिन्दू बनाने के प्रयास तेज करने का आवाहन करना पड़ा। राष्ट्रवाद को हिटलरशाही बताना पड़ा।
वारिस भाई, तुम्हारे बयान से ना तो देश भर में चल रहे शाहीन बाग जैसे तीनसौ धरनों को कोई बल मिला है और ना ही उनके आन्दोलनों की कोई मदद हुयी है। इसके उलट इसे हिन्दू मुस्लिम बनाने की कोशिश करने वालों को अपनी बात सही साबित करने का एक तर्क मिला है। जोर शोर से यह साबित हो जाने के बाद भी कि तुम्हारे साथ कोई मुसलमान संगठन या समुदाय नहीं है, भाजपा के सम्बित पात्रा जैसे लोग तुम्हारी आवाज को पूरे मुसलमानों की आवाज बताने में जुट गये हैं व उनके अन्धभक्त उस पर भरोसा भी कर रहे हैं। जब यह सिद्ध हो चुका है कि तुम उनका प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हो, और भाजपा नेताओं के साथ गलबहियां करते हुए तुम्हारे फोटो वायरल हो रहे हैं तब तुम किसकी मदद कर रहे हो? जब भाजपा उत्तराखण्ड से गोआ और कर्नाटक तक विधायकों की खरीद फरोख्त के लिए जानी जाने लगी है, तब तुम्हारी उपरोक्त हरकत को अगर लोग सौदेबाजी भी कह रहे हैं, तो क्या गलत कह रहे हैं! अगर सौदेबाजी नहीं भी हो तो कम से कम मूर्खतापूर्ण काम तो है ही!
क्या तुम आत्मनिरीक्षण करके कुछ कहोगे और अपनी भूल के लिए क्षमा मांगोगे? नहीं मांगोगे तो पिछले सत्तर दिनों से धरने पर बैठी महिलाएं तुम्हें कभी क्षमा नहीं करेंगी। 
वीरेन्द्र जैन
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राजनेताओं के बयानों और आचरण में गम्भीरता का अभाव

राजनेताओं के बयानों और आचरण में गम्भीरता का अभाव
वीरेन्द्र जैन

भारत एक बड़ा व महान देश है जिसे इन दिनों ओछे और निचले स्तर के नेता चला रहे हैं।
पिछले दिनों जब पुलवामा कांड को एक साल पूरी हुआ तब राहुल गाँधी ने एक सवाल पूछा कि उक्त घटना की जाँच रिपोर्ट में क्या निकला, व हमारे 40 जवानों को शिकार बना देने वाली घटना की खामियों के लिए किसको उत्तरदायी ठहराया गया। देश की सबसे बड़ी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष की इस बात पर मोदीशाह की भाजपा के सभी महत्वपूर्ण नेता बौखला गये| इस स्वाभाविक सवाल का सीधा जबाब देने की जगह सम्बित पात्रा टीवी की बहसों की तरह विषय को भटका कर उन्हें लश्करे-ए तैयाबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठनों के साथ सहानिभूति रखने वाला बताने लगे। उल्लेखनीय है कि घटना के ठीक बाद जम्मू कश्मीर के राज्यपाल ने सुरक्षा में खामियों की चर्चा की थी। उनके ही एक और बड़बोले प्रवक्ता जीवीएल नरसिंहाराव ने तो इसे सुरक्षा बलों पर निशाना बता दिया व राहुल गाँधी को शर्म करने की सलाह देते हुए टिप्पणी की कि वे पाकिस्तान से सवाल नहीं करेंगे, अर्थात उनकी सहानिभूति दुश्मन देश पाकिस्तान से है। ।
मैं और जिन लोगों से भी मैंने चर्चा की, वे भी यह नहीं समझ पाये कि इस उचित सवाल को करने वाले को परोक्ष में गद्दार और देशद्रोही बताना कहाँ तक उचित है? यह सही है कि पहले से संकेत मिल जाने के बाद भी हमारी सुरक्षा सम्बन्धी खामियों के कारण ही हमारे इतने जवान एक साथ मारे गये, इसलिए जरूरी था कि उन खामियों को पहचाना जाये व संकेत मिलने के बाद भी चूक करने वाले को नियमानुसार दण्डित किया जाये। इसके विपरीत जाँच रिपोर्ट को छुपाया जा रहा है जिससे लग सकता है कि दोषियों को बचाया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि इस घटना के बाद सीमा पर युद्ध का वातावरण बनाते हुए जो चुनाव सम्पन्न हुये उनके प्रचार में इस घटना का भरपूर चुनावी उपयोग किया गया। जनता की निगाह में गद्दार और देशद्रोही ठहराये जाने के खतरे से बचने के लिए देशहित में विपक्ष ने सरकार के साथ खड़े होने की घोषणा की। इसका भी सत्तारूढ दल ने चुनावी लाभ उठाया। यहाँ सवाल राहुल या किसी अन्य नेता के चरित्र चित्रण का नहीं है अपितु देश की सुरक्षा की खामियों और उसके सहारे राजनीति करने का है। सच तो यह है कि राहुल गाँधी से पहले इस सवाल को तो देशभक्ति का ढिंढोरा पीटने वाली भाजपा के ही किसी सदस्य को पूछना चाहिए था। खेदजनक है कि मोदीशाह का नेतृत्व आने के बाद भाजपा में ऐसे नेता सक्रिय नहीं हैं जो खुद सोच सकें, और सोच कर सवाल पूछने का साहस कर सकें। केवल पूर्व सांसद उदित राज ही यह सवाल उठा सके, पर वे भाजपा छोड़ चुके हैं।
केजरीवाल ने अपने चुनाव प्रचार में किसी पत्रकार के पूछने पर पूरा हनुमान चालीसा सुना दिया। पता नहीं यह घटना स्वाभाविक रूप से घटी या आपकी अदालत की तरह प्रायोजित थी, किंतु उसके बाद केजरीवाल हनुमान मन्दिर में पूजा करने गये। चुनाव परिणाम में जीतने की सूचना आने के बाद उन्होंने अपने समर्थकों को याद दिलाया कि आज मंगल है, हनुमान जी का दिन है और उनके आशीर्वाद से विजय मिली है। वे बाद में भी सपरिवार हनुमान मन्दिर गये। कहा जाता है कि इस बार चुनावों के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने उनके लिए काम किया था और बहुत सम्भव है कि चुनाव में मुख्य प्रतियोगी भाजपा के धार्मिक, राम मन्दिर, कार्ड की काट के लिए उन्हें हनुमान भक्त बनने की सलाह दी गयी हो। उल्लेखनीय है कि दो-ढाई वर्ष पूर्व केजरीवाल ने जैनमुनि तरुण सागर को अपने निवास पर आमंत्रित किया था और उसके बाद ही अरुण जैटली प्रकरण में क्षमा मांग ली थी। वैसे तो यह उनका निजी ममला है किंतु यह सब कुछ सार्वजनिक हुआ था, जिससे इसका राजनीतिक महत्व भी हो जाता है।
केजरीवाल ने जब अन्ना आदि के साथ मिल कर लोकपाल के लिए आन्दोलन किया था तब उस आन्दोलन को शुद्ध रूप से गैरराजनीतिक आन्दोलन बताया था तथा इसे हड़पने की कोशिश करने वाले राजनीतिक दलों के लोगों को जिनमें उमा भारती, और स्वभिमान दल के रामदेव आदि को धरना स्थल से बाहर करवा दिया था। बाद में जब आन्दोलन बिखर गया तब उन्होंने खुद राजनीतिक दल बनाया और भिन्न तरह की ईमानदार राजनीति का वादा किया। रामलीला मैदान में पहली बार शपथ ग्रहण करते समय जो गीत गाया, उसके बोल थे-
इंसान का इंसान से हो भाईचारा / यही पैगाम हमारा
यह गीत धरमनिरपेक्षता का पैगाम देता था। इस बार उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय शांति गीत ‘ हम होंगे कामयाब, एक दिन’ का समूह पाठ किया। उन्होंने अपना लोकसभा का चुनाव भी सीधे प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी के खिलाफ लड़ कर भी ऐसा ही सन्देश देने की कोशिश की थी। अपनी जीत को हनुमानजी की कृपा से जोड़ने के बाद उनके राजनीतिक सन्देश का सुर बदला हुआ लगता है। या तो वे भाजपा की कूटनीति की तरह आस्थावानों को बहलाने की कोशिश कर रहे हैं या वे स्वयं अपनी समाजसेवा की राजनीति से देवकृपा की चुनावी कूटनीति की ओर बढ रहे हैं। जो भी हो वे कहीं न कहीं अपने आन्दोलनकारी समर्थकों व मतदाताओं के एक हिस्से के साथ छल कर रहे हैं। केवल आर्थिक ईमानदारी ही ईमानदारी नहीं होती। अपनी चुनावी जीत के लिए चुनावी प्रबन्धकों की सलाह पर धार्मिक व्यवहार का विज्ञापन करते हुए सरकार बना लेने से आपकी राजनीति के भिन्न होने प्रचार फुस्स हो गया है। काँग्रेस से मिल कर तो सरकार बना ही चुके हैं और तीन तलाक से लेकर 370 व सीएए तक भाजपा का साथ दे ही चुके हैं, किसी दिन उसके साथ सरकार भी बना लेंगे। वे ना तो खुल कर जे एन यू और ज़ामिया के छात्रों के साथ आये ना ही शाहीन बाग के आन्दोलनकारियों का साथ देते नजर आये।
काँग्रेस के सिकुड़ जाने व भाजपा के दो लोगों की मनमानी में सिमिट कर असफल सरकार चलाने से राष्ट्रीय स्तर पर एक राजनीतिक शून्यता छा गयी है जिसे कब कौन सी उत्तेजना पर सवार कोई व्यक्ति या संगठन भर ले कहा नहीं जा सकता। साहस की कमी व नियंत्रित विवेक वाले सदस्यों के संख्या बल वाली मोदी सरकार अपनी गलत नीतियों के कारण खोखली हो चुकी है, तो काँग्रेस के सूबेदार अंतिम सांसें गिन रहे हैं। जातिवादी क्षेत्रीय दल अपने अपने कोने सम्हाल कर राष्ट्रीय एकता को भूल चुके हैं, व भाजपा की नीतियों ने हिन्दू मुस्लिम विभाजन को तेज कर दिया है। तीसरे पक्ष के पास केवल थ्योरी और बयानबाजी बची रह गयी है।
क्या हम भारत को उसके पुराने युग में धकेले दे रहे हैं जहाँ अलग अलग राज्य थे और राजे रजवाड़े थे, जिन्हें केवल अपनी चिंता थी।
वीरेन्द्र जैन
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शनिवार, फ़रवरी 15, 2020

दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम, जीत के गुलदस्ते में कांटे


दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम, जीत के गुलदस्ते में कांटे  

वीरेन्द्र जैन
दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणामों ने देश भर में एक उत्साह का संचार किया है। ये चुनाव असाधारण परिस्तिथियों में हुये थे जब तानाशाही प्रवृत्ति के साम्प्रदायिक दकियानूसी संगठन संचालित दल से देश के लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील लोग असंगठित रूप से मुकाबला कर रहे थे। केन्द्र में सत्तारूढ होने के कारण सुरक्षा बलों का नियंत्रण भी इसी दल के पास था जिसका प्रयोग हो रहा था, व इनका पितृ संगठन हजारों हिन्दू युवाओं को खुद भी शस्त्र संचालन का प्रशिक्षण नियमित रूप से देता है। इसी क्रम में देश भर में एक बड़ा जन आन्दोलन चल रहा था जो नागरिकता संशोधन कानून की ओट में एक साम्प्रदायिक एजेंडा लादने के खिलाफ था। इस आन्दोलन को छात्रों, युवाओं, बुद्धिजीवियों, अल्पसंख्यकों, दलितों, और विपक्षी दलों का समर्थन प्राप्त था, और विरोध में सत्तारूढ दल दुष्प्रचार, झूठ, और दमन का सहारा ले रहा था। जिस विषय पर आन्दोलन था, उससे सत्तारूढ दल के गठबन्धन-सहयोगी दलों के बीच भी सहमति नहीं थी।
इस दौर में दिल्ली राज्य पर एक विचारधाराहीन दल का शासन था जो प्रशासनिक सुधार की राहत देने के नारे पर सत्तारूढ हुआ था और उससे अर्जित लोकप्रियता पर ही वोट मांग रहा था। यह दल ना तो अपनी राजनीति प्रकट करता है और ना ही सक्रिय राजनीति से जुड़े जन आन्दोलनों में भागीदारी करता है। उसके पास ऐसा कोई संगठन भी नहीं है जो देश की राजधानी जैसे संवेदनशील स्थल पर त्वरित कार्यवाही के लिए लोगों को एकजुट कर सके। यही कारण रहा कि राजधानी के विश्वविद्यालयों में छात्रों के खिलाफ लगातार हुये दमन के विरोध में यह दल सक्रिय नहीं दिखा। स्वयं इस दल के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल पर भी कई बार हमले हुये और अभी हाल ही में एक जीते हुए विधायक के साथी पर गोली चला कर मार डाला गया, किंतु इस हिंसा का मुकाबला कहीं नजर नहीं आया।  
दिल्ली एक आधा अधूरा राज्य है जिसके पास ना तो अपनी पुलिस है, ना ही नगर निगम उसके अंतर्गत आते हैं, किसी भी काम के लिए भूमि आवंटन का अधिकार भी उसके पास नहीं है। ऐसी स्थिति में पराजय से फनफनाते केन्द्र में सत्तारूढ दल के खिलाफ एक संगठन विहीन दल द्वारा सरकार चलाना चुनौती भरा काम रहा है और आगे भी रहेगा। न केवल लेफ्टीनेंट गवर्नर अपितु आईएएस अधिकारियों के संगठन भी दिल्ली की आप सरकार के खिलाफ रहे हैं। अतिरिक्त कमाई की आदी प्रशासनिक मशीनरी का एक हिस्सा भी कमाई बन्द या कम हो जाने से असंतुष्ट चलती है। सच तो यह है कि देश में चल रहे जन आन्दोलनों और अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा महसूस किये गये खतरे के कारण ही दिल्ली विधानसभा चुनावों के परिणाम भिन्न आये हैं। कुटिल उपायों से बचने के लिए केजरीवाल को धार्मिक प्रतीकों के स्तेमाल में भी प्रतियोगिता करना पड़ी। इन परिणामों में एक सीमा से अधिक उम्मीद करना ठीक नहीं होगा। जो इसमें राष्ट्रीय दल की सम्भावनाएं देखने लगे हैं, वे या तो भ्रमित हैं, या भ्रमित कर रहे हैं।
इस जीत के बीच यह महत्वपूर्ण सवाल ही विलोपित हो गया कि उच्च स्तरीय संचार के इस युग में कुल सत्तर विधानसभा क्षेत्र में हुये चुनावों के वोटिंग प्रतिशत की जानकारी मिलने में इतनी देर क्यों लगी, और प्रारम्भिक सूचनाओं से अचानक पाँच प्रतिशत की वृद्धि क्यों नजर आने लगी। चुनावों के दौरान जो धन और शराब आदि पकड़ी गयी उसमें किस दल से जुड़े व्यक्ति शामिल थे यह बात गोपनीय क्यों रखी जाती है। विजेता और पराजित दोनों ही दलों का चरित्र प्रकट क्यों नहीं होने दिया जाता है ताकि विभिन्न चुनावों के बाद बार बार किये जाने वाले बहुमत के दावे की असलियत को जनता जान सके। उल्लेखनीय है कि दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा की सीटें दोगुना हो गयी हैं और उसे पिछले विधानसभा चुनावों से पाँच प्रतिशत वोट अधिक मिले हैं। ये वोट भले ही उसे लोकसभा चुनावों में मिले वोटों से बहुत कम हैं तो सवाल यह भी उठता है कि यह विचलन क्यों और कैसे हुआ। क्या लोकसभा चुनावों के दौरान ईवीएम मशीनों में छेड़छाड़ के जो आरोप लगे थे वे सही थे या दिल्ली की जनता इतनी चेतन हो गयी है जो लोकसभा के लिए एक तरह के लोगों को जिता दे और विधानसभा के लिए बिल्कुल ही भिन्न तरह के लोगों को चुन ले। चुनाव प्रणाली अधिक पारदर्शी होने की जगह क्यों अधिक रहस्यमयी होती जा रही है। दिल्ली विधानसभा चुनावों में जीते हुए विधायकों में 74% के करोड़पति होने व दागी विधायकों की संख्या का दोगुना होना क्या चिंता का विषय नहीं है! ईमानदारी केवल सरकार में ही नहीं अपितु सरकार में पहुँचने के चुनावी तरीकों में भी दिखना चाहिए।
एक सच यह भी है कि विजेता दल का नाम और सरकार में आने वाले सदस्यों का नाम कुछ भी हो किंतु जनता ने जिस भावना पर अपना मत दिया है उसमें संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता की रक्षा भी प्रमुख है और चुनावों से अलग जो पत्रकार, लेखक, कलाकार, बुद्धिजीवी साम्प्रदायिकता के खिलाफ लगातार लड़ाई लड़ते रहते हैं, उनकी भी जीत है। जो गलत आर्थिक नीतियों के खिलाफ केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा करते रहे हैं वे अर्थशास्त्री भी इस जीत के हिस्सेदार हैं। जिन छात्रों ने शिक्षा जगत पर हो रहे हमलों के खिलाफ संघर्ष कर के केन्द्र सरकार का चरित्र उजागर किया वे भी इस जीत के पीछे हैं। ये उनकी भी जीत है।
मेरे पिता बताते थे कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद देश के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एक गीत गाते थे-
ओ विप्लव के थके साथियो, विजय मिली विश्राम न समझो !
इन पंक्तियों को दुहराने की जरूरत है।
वीरेन्द्र जैन
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बुधवार, फ़रवरी 05, 2020

बयानों में झलकता नेताओं की नजर में जनता का स्तर


बयानों में झलकता नेताओं की नजर में जनता का स्तर Image result for भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा"
वीरेन्द्र जैन
पिछले दिनों भाजपा के कुछ प्रतिष्ठित नेताओं के बयानों की चतुर्दिक निन्दा हो चुकी है और चुनाव आयोग द्वारा उन स्टार प्रचारकों पर 48 घंटे प्रचार पर रोक का हास्यास्पद प्रतिबन्ध लगाया जा चुका है जिसकी परवाह या शर्मिन्दगी कहीं नहीं दिखी। सवाल यह है कि उन्होंने जो उत्तेजक बयान दिये वह उनकी सोच को दर्शाता है या कूटनीति को? जाहिर है कि इतने बड़े बड़े पदों तक पहुंचे नेता ऐसा नहीं सोच सकते कि अगर उनकी पार्टी नहीं जीती तो विजेता पार्टी लोगों के घरों में जाकर उनकी बहू बेटियों के साथ बलात्कार करेगी, और उन्हें मोदी शाह के अलावा कोई नहीं बचा सकता।
डा. राही मासूम रजा ने किसी फिल्म को सत्ता विरोधी ठहरा कर प्रतिबन्ध लगाये जाने के सवाल पर लिखा था कि ऐसे तो शोले फिल्म सबसे बड़ी सत्ता विरोधी फिल्म है, जिसमें एक पूर्व पुलिस अधिकारी क्षेत्र के डाकुओं से मुक्ति के लिए व्यवस्था पर भरोसा खो चुका है और दो नामी बदमाशों को उनके जेल से छूटने के बाद अपने गाँव में बुला लेता है। फिल्म बताती है कि यही एक तरीका उस पूर्व पुलिस अधिकारी को समझ में आया था। क्या यह फिल्म व्यवस्था पर विश्वास न होने का प्रचार करती नजर नहीं आती! जब देश का एक सांसद और केन्द्रीय मंत्री जनता को अराजक तत्वों से डराता है तो क्या वह व्यवस्था के खिलाफ नहीं बोल रहा होता है? यदि चुनावों में दुरुपयोग की जाने वाली सन्दिग्ध सर्जीकल स्ट्राइक का सबूत मांगना देशद्रोह बतलाया जाता है तो क्या यह देशद्रोह के अंतर्गत नहीं आता?
उल्लेखनीय है कि जब रजाकारों के नेता कासिम रिजवी ने सरदार पटेल से कहा था कि अगर आप हैदराबाद रियासत को भारत में शामिल करने का कदम उठायेंगे तो हम लाखों लोगों को काट डालेंगे। इस पर सरदार पटेल ने कहा था कि आप ऐसा करेंगे तो क्या हम देखते रह जायेंगे! हुआ भी यही था कि उस के हैदराबाद पहुंचने से पहले ही भारत की सेना ने पुलिस एक्शन के नाम पर हैदराबाद को हजारों रजाकारों से मुक्त करा लिया था, जिसमें काफी जनहानि हुयी थी। स्वयं को सरदार पटेल का वंशज बताने वाले आज के नेता वोटों की खातिर निराधार आशंकाएं फैला कर खुद ही जनता को डरा रहे हैं। केन्द्र में भाजपा का शासन है, दिल्ली की पुलिस उनके पास है, एनसीआर क्षेत्र में भी भाजपा शासित राज्य हैं फिर भी जनता को डराने का एक मतलब यह भी निकलता है कि वे स्वयं को कानून व्यवस्था लागू करने में अक्षम मान रहे हैं।   
यह भी स्मरणीय है कि जब प्रारम्भ में पंचवर्षीय योजनाओं में हाइड्रो इलेक्ट्रिक आयी थी तो जनसंघ के नेता किसानों से कहते थे कि ये कांग्रेस पानी में से बिजली निकाल लेती है तो वह सिंचाई के लायक नहीं बचता, या दो बैलों की जोड़ी पर क्रास की मुहर लगाने का मतलब होता है गौवंश को कटने के लिए भेजना। किंतु आज़ादी के सत्तर साल बाद सत्तारूढ पार्टी बन जाने तक भी नेताओं द्वारा इस तरह के बयान दिये जाना व प्रमुख नेताओं द्वारा किसी तरह की असहमति न व्यक्त करना लोकतंत्र को गम्भीरता से न लेने की तरह है। पिछले ही दिनों एक भाजपा नेता ने कहा था कि दिल्ली का चुनाव तो हम कैसे भी जीत ही जायेंगे। ऐसी ही बातों से लोग ईवीएम पर सन्देह करने लगते हैं क्योंकि जब लोकतांत्रिक तरीके से किये जा रहे शाहीन बाग जैसे जन आन्दोलन को चुनावों के लिए साम्प्रदायिक और विदेशी आन्दोलन बताया जाने लगता है तो यह लोकतंत्रिक तरीकों पर भी बड़ा हमला होता है। सत्तारूढ दल के लोग भले ही किसी आन्दोलन से कितना भी असहमत हों किंतु उसके चरित्र का गलत चित्रण लोकतंत्र के खिलाफ अपराध है। इस तरह के विरोध से यह भी प्रकट होता है कि सरकार अपने पक्ष को कमजोर पा रही है और अपना पक्ष रख कर उसका विरोध नहीं कर पा रही है। शाहीन बाग का आन्दोलन न केवल लोकतांत्रिक है, देशव्यापी है, अपितु चरित्र में सेक्युलर भी है। यह साम्प्रदायिक या जातिवादी भावनाएं उभार कर किये जाने वाले आन्दोलनों से भिन्न है। खेद यह है कि वोटों के लिए इसे पाकिस्तानी कहा जा रहा है क्योंकि आम जन मानस के मन में पाकिस्तान के प्रति दुश्मनी का भाव है।
लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार तो है, किंतु झूठ बोलने और झूठ गढने की आज़ादी का अधिकार नहीं है। दुर्भाग्य से हो यह रहा है कि इस नाम पर झूठ गढे जा रहे हैं. चरित्र हत्याएं की जा रही हैं और नंगे झूठ बोले जा रहे हैं। यह नासमझी में नहीं अपितु जानबूझ कर किया जा रहा है। गोधरा में निजी दुश्मनी में साबरमती एक्सप्रैस की एक बोगी संख्या 6 में निजी बदले में लगायी गयी आग को रामभक्तों से भरी पूरी ट्रेन में लगायी गयी आग प्रचारित कर दी जाती है व उस नाम पर पूरे गुजरात में निरपराध मुसलमानों के खिलाफ नृशंस अपराध किये जाते हैं और अटूट सम्पत्ति लूट ली जाती है या बरबाद कर दी जाती है। नरेन्द्र मोदी के स्थापित होने का इतिहास इसी ध्रुवीकरण से शुरू होता है। बाद में तो राजनीतिक हत्याओं की श्रंखला शुरू हो जाती है, व सभी मृतक बड़े नेताओं को मारने के इरादों से आये बताये जाते हैं।
इस इंटरनैट व डिजीटल मीडिया के दौर में भी वे झूठ बोलने से नहीं हिचकते और झूठ पकड़े जाने पर शर्मिन्दगी भी महसूस नहीं करते, क्योंकि जनता के विवेक और याद्दाश्त को वे कमजोर समझते हैं। स्टिंग आपरेशन में कैद हो जाने वाला बाबू बजरंगी कहता है कि मेरा कथन तो मेरे द्वारा खेले जाने नाटक का एक हिस्सा था। मोदी को विकास पुरुष नहीं विनाश पुरुष बताने वाली उमाभारती अहमादाबाद से बड़ौदा आने तक अपना विचार बदल लेती हैं और कहती हैं कि यह रास्ते में दिखे विकास के कारण उनके विचारों में परिवर्तन आया।
जनता को धोखा देने के लिए झूठ बोलने पर जब तक सजा नहीं होती तब तक लोकतंत्र मजाक ही बना रहेगा।  
    वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, जनवरी 28, 2020

इमरजैंसी का पूर्वाभास और मुक्तिबोध बकौल अशोक वाजपेयी


इमरजैंसी का पूर्वाभास और मुक्तिबोध बकौल अशोक वाजपेयी 

वीरेन्द्र जैन
देश में चल रहे हालात को देख कर, एक पुरानी घटना याद आ गयी। कई वर्ष पहले राजनन्दगाँव [छत्तीसगढ] में आयोजित ‘त्रिधारा’ संगोष्ठी में व्याख्यान देते हुए प्रसिद्ध कवि आलोचक अशोक वाजपेयी ने कहा था-
“मुक्तिबोध द्वारा 1962-63 में कविता ‘अंधेरे में’ लिखी गयी थी। वे परम अर्थ में राजनीतिक कवि हैं, और वो परम अर्थ यह है कि जो होने जा रहा है, राजनीति के क्षेत्र में उसका जितना गहरा पूर्वाभास मुक्तिबोध में है, वैसा कम से कम हिन्दी के किसी और कवि को मैं नहीं जानता। आप [श्रोता] चतुर सुजान हैं, मैं हिन्दी का अबोध विद्यार्थी हूं, इसलिए हो सकता है आपको मेरे हिन्दी ज्ञान में थोड़ी थोड़ी दया आये, तो उसे जरूर दिखाइये। लेकिन मैं नहीं जानता कि किसी में ऐसा पूर्वाभास हो। आप ‘अंधेरे में’ को पढिये, जो 1962-63 में लिखी गयी और 1976 में इमरजैसी है। बारह बरस बाद , और उसके ऐसे अनेक दृश्य आप देख सकते हैं जो मुक्तिबोध ने इमरजैंसी ‘देख’ कर लिखे हैं। मैं एक अंश आपको पढ कर सुनाता हूं-
“कर्नल ब्रिग्रेडियर, जनरल, मार्शल
कई और सेनापति सेनाध्यक्ष
चेहरे, वे मेरे जाने बूझे से लगते
उनके चित्र समाचार पत्रों में छपे थे
उनके लेख देखे थे
भई वाह!  
उनमें कई प्रकांड आलोचक, विचारक
जगमगाते कविगण,
मंत्री भी उद्योगपति और विद्वान
यहाँ तक कि शहर का हत्यारा कुख्यात्
डोमाजी उस्ताद
और हालांकि वो एक ऐसी दुनिया है
जिसमें कहीं आग लग गई है
कहीं गोली लग गई है
सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक
चिंतक, शिल्पकार और नर्तक चुप हैं
उनके खयाल से ये सब गप है
मात्र किवदंती “
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अशोक वाजपेयी ने अपनी विनम्रता और उसके प्रदर्शन हेतु स्वयं को हिन्दी का अबोध विद्यार्थी कहा। वे अपने क्षेत्र के अप्रतिम विद्वान और अध्येता हैं। सच तो यह है कि अशोक वाजपेयी और उनके आसपास रहने वाले कवि, आलोचक छन्द कविता को बहुत हिकारत की दृष्टि से देखते रहे हैं, अन्यथा 1959 में प्रकाशित मुकुट बिहारी सरोज के गीत संकलन ‘किनारे के पेड़’ में प्रकाशित एक गीत “ सब प्रश्नों के उत्तर दूंगा, लेकिन आज नहीं “ में भी इमरजैंसी का वैसा ही पूर्वाभास देख लिया गया था। इस गीत की कुछ पंक्तियां यहां प्रस्तुत हैं-
सब प्रश्नों के उत्तर दूंगा, लेकिन आज नहीं
आज इसलिए नहीं, कि तुम मन की कर लो
बाकी बचे न एक, खूब तबियत भर लो
आज बहुत अनुकूल ग्रहों की बेला है
चूको मत, अपने अरमानों को वर लो
कल की साइत जो आयेगी
सारी कालिख धो जायेगी
इसलिए कि अंधियारे की होती उम्र दराज नहीं
सब प्रश्नों के उत्तर दूंगा, लेकिन आज नहीं
आज सत्य की गतिविधियों पर पहरे हैं
क्योंकि स्वार्थ के कान, जन्म से बहरे हैं
ले दे के अपनी बिगड़ी बनवा लो तुम
निर्णायक इन दिनों बाग में ठहरे हैं
कल ऐसी बात नहीं होगी
ऐसी बरसात नहीं होगी
इसलिए कि दुनिया में रोने का आम रिवाज नहीं
सब प्रश्नों के उत्तर दूंगा, लेकिन आज नहीं ..................
मुझे लगता है कि बातचीत के अन्दाज में व्यंग्य गीत रचने वाले सरोज जी अपनी तरह के अनूठे कवि रहे हैं। उनका छन्द विधान व विषय सबसे अलग तो थे ही, वे पूरी तरह एक राजनीतिक कवि थे।
मुक्तिबोध कवि के साथ एक बहुत अच्छे विचारक और लेखक भी थे। मेरे जैसे गैर साहित्यिक पाठकों को वे कवि की तुलना में विचारक अधिक अच्छे लगते हैं। मुकुट बिहारी सरोज, और उनके समय के अनेक नागुर्जनों, शीलों, व केदारनाथ अग्रवालों को नई कविता के विश्वविद्यालयी आलोचकों ने हाशिए पर धकेला हुआ है। साहित्य की पुस्तकों, व पत्रिकाओं में इन लोगों के साहित्य पर कम से कम लिखा गया है। जो छुटपुट लिखा भी गया है, वह उनके लेखक संगठन वालों ने ही लिखा है, इसलिए भी उसको कम महत्व मिल सका है।
मैं याद दिलाना चाहूंगा कि मुक्तिबोध की सन्दर्भित कविता सर्व प्रथम हैदराबाद से निकलने वाली ‘कल्पना’ पत्रिका में प्रकाशित हुयी थी तथा उसका शीर्षक था “सम्भावनाओं के दीप अंधेरे में”। यह बात मुझे कल्पना के सम्पादकीय मंडल के वरिष्ठ सदस्य मुनीन्द्र जी ने बतायी थी।  
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

शुक्रवार, जनवरी 17, 2020

फिल्म समीक्षा छपाक – ब्लैक का अगला संस्करण


फिल्म समीक्षा
छपाक – ब्लैक का अगला संस्करण 
Image result for छपाक movie
वीरेन्द्र जैन
हमारे देश में भी अच्छी फिल्में बन रही हैं जिनमें बहुत सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक समस्याएं उठायी गयी हैं, किंतु उनकी समीक्षा बहुत स्थूल ढंग से हो रही है। दीपिका पाडुकोण की फिल्म छपाक के साथ भी ऐसा ही हुआ है। तेजाब के हमले से घायल होकर बच गयी लड़कियों की समस्या पर केन्द्रित कथा पर यह फिल्म बनायी गयी है। संयोग से या सोचे समझे ढंग से जे एन यू के छात्रों पर हुए हमलों के विरोध में सहानिभूति प्रदर्शित करने पहुंची दीपिका पाडुकोण की प्रशंसा और विरोध में यह फिल्म चर्चित भी हुयी। विरोध के किसी भी रूप को सहन न कर पाने वाली सरकारी पार्टी के लोगों ने बिना इसकी महत्ता व संवेदना पर विचार किये, फिल्म का अन्ध विरोध करवा दिया। फिल्म के बाक्स आफिस पर सफल या असफल होना तो अलग बात है, किंतु इस सब में सरकार का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। एक सामाजिक समस्या पर बनी फिल्म का विरोध ही नहीं, उस पर झूठे साम्प्रदायिक आरोप लगवाने में भी सरकारी पार्टी नहीं चूकी। ऐसा लग रहा था कि जैसे फिल्म के सफल होते ही सरकार को गिर जाने का खतरा पैदा हो गया है।
फिल्म की कथा या कहें कि घटना केवल इतनी है कि घर की आर्थिक स्थिति से परेशान एक लड़की पढाई छोड़ कर एक टेलर मास्टर के पास सिलाई सीखने लगती है, और लड़की की उम्र से बड़ा प्रशिक्षक टेलर बदले में उसे अपनी सम्पत्ति समझने लगता है। इस सब से अनजान लड़की जब अपने पुराने सहपाठी से मिलती है तो नाराज टेलर मास्टर अपनी बहिन की मदद से उस के चेहरे पर तेजाब फेंक देता है। पीड़ित लड़की इसी क्रम में एक ऐसे एनजीओ के सम्पर्क में आती है जो तेजाब के हमले से शिकार लड़कियों पर ही काम कर रहा होता है। यह संयोग है कि उक्त लड़की की इलाज में मदद वह गृहस्वामिनी करती है, जिसके यहाँ उसका पिता खानसामा था, और उसकी ही एक एडवोकेट मित्र दोषी को सजा दिलाने में मदद करती है। इन लोगों का प्रयास या कहें कि संघर्ष सफल होता है और न केवल हमलावरों को सजा मिलती है अपितु राज्य सरकारों द्वारा एसिड की बिक्री पर नियंत्रण रखने का आदेश भी मिलता है।
आम तौर पर समीक्षक इस या इस जैसी फिल्मों को यहीं तक देखते हैं, और उन पर लिखते हैं। किंतु फिल्म आगे तक जाती है। जीवन सम्पूर्णता में जिया जाता है, भले ही किसी समय विशेष में एक विशेष समस्या दूसरी बातों को हाशिये पर रखती हैं। एसिड हमले से पीड़ित एक महिला का इलाज और कानूनी लड़ाई जीवन के शेष हिस्से को खत्म नहीं कर देती। सौन्दर्य बोध केवल चेहरे तक ही सीमित नहीं होता अपितु व्यक्ति के मानवीय गुण भी उसके सौन्दर्य को प्रकट करते हैं। व्यक्ति चाहता है कि अपने चेहरे के आकर्षण के अलावा उसके गुणों के कारण भी उसे पसन्द किया जाये। चेहरा विकृत हो जाने से उसके जीवन की दूसरी आवश्यकताएं समाप्त नहीं हो जातीं। उसे जिन्दा रहने के लिए रोटी कपड़ा और मकान की भी जरूरत होती है जिसके लिए एक अदद सवैतनिक नौकरी की जरूरत होती है। जब अच्छे अच्छे चेहरों तक को नौकरी के लाले पड़ रहे हों तब विकृत होकर असामान्य चेहरे वालों को नौकरी कौन देता है। हमलावरों को मिली सजा, या एसिड बिक्री पर लगी रोक उसके जीवन की अन्य समस्याओं को राहत नहीं देतीं। उसे विकलांग श्रेणी का भी नहीं समझा जाता। बस में माँएं अपने बच्चों को पीड़िता की ओर देखने से रोक्ती हैं और कई बच्चे उसे देख कर चीख पड़ते हैं, जिसे सुन कर अपने आप से घृणा होने लगती है। एक विकृत चेहरे वाली महिला को भी जीवन में प्रेम और दैहिक साथ की जरूरत होती है, किंतु प्लास्टिक सर्जरी के बाद भी विपरीत लिंग के लोगों की आंखों में वह आकर्षण नहीं टपकता, जो एसिड अटैक से पहले दिखता था। उल्लेखनीय है कि कुछ दिनों पहले एक फिल्म आयी थी, जिसमें जब एक विकलांग लड़की की बहिन उसका जन्मदिन मनाती है और उससे वांछित उपहार पूछती है तो वह कहती है कि मैं सेक्स करना चाहती हूं।
इसी तरह फिल्म ब्लैक में गूंगी बहरी नायिका को उसका वयोवृद्ध शिक्षक होठों पर उंगली रख कर संवाद सिखाता है, किंतु एक युवा लड़की के होठों पर उंगली रखने से जनित संवेदनाएं अपने निकट रह रहे पुरुष के प्रति आकर्षण पैदा करती हैं, जिससे शिक्षक नैतिक असमंजस में फंस जाता है। यह फिल्म भी बताती है कि उस दिव्यांग लड़की के जीवन की समस्याएं, सम्वाद के लिए भाषा के ज्ञान आने तक समाप्त नहीं हो जातीं। फिल्म में इस बात को चित्रित किया गया था किंतु फिल्म पर विचार करने वालों ने अपनी समीक्षाओं में इस बात का कहीं उल्लेख नहीं किया। छपाक भी परोक्ष रूप से ब्लैक में उभारी गयी बात को ही आगे बढाती है।
छपाक की निर्देशक मेघना गुलजार और सह निर्मात्री व नायिका दीपिका पाडुकोण ने यह फिल्म बना कर बहुत साहसिक काम किया है। फिल्म बाक्स आफिस पर बहुत ज्यादा सफल नहीं हो सकी है किंतु घाटा भी नहीं दे रही। दीपिका के दुस्साहस की दाद दी जाना चहिए कि उसने मुख्यधारा की नायिका रहते हुए इस विशिष्ट भूमिका को चुना। इतना ही नहीं उसने अपनी भूमिका के प्रति पूरा पूरा न्याय किया है। मेघना का निर्देशन सफल है। दीपिका की भूमिका फिल्म के बाहर पूरे देश के स्तर पर भी सफल है। ऐसे ही साहस कला को ज़िन्दा रखते हैं।
 वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023 मो. 9425674629            

सन्देश सम्प्रेषण तो गाँधी जी से सीखें


सन्देश सम्प्रेषण तो गाँधी जी से सीखें

वीरेन्द्र जैन
कोई वाक्य या वक्तव्य, सन्देश तब ही बन पता है, जब वह उन लोगों तक सम्प्रेषित हो सके जिन्हें वह सम्बोधित किया गया है। यदि वक्तव्य सम्प्रेषित हो सकने में असमर्थ रह जाता है तो उस कथ्य का महत्व उस समय शून्य रहता है। कोई भी सन्देश एकांगी नहीं हो सकता क्योंकि उसमें देने वाले और ग्रहण करने वाले दो पक्ष होते हैं। इन दोनों के बीच समन्वय अनिवार्य है। जहाँ जैसा समन्वय सम्भव हो पाता है, वैसा ही सन्देश सम्प्रेषित हो पाता है, और वैसी ही कार्यवाही सम्भव हो पाती है।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गाँधी ऐसे नेता रहे जिनका सन्देश देश की जनता तक सरलता से सम्प्रेषित हो सका। इसी गुण के कारण वे दूसरे नेताओं की तुलना में प्रभावी नेतृत्व कर सके। गाँधीजी में सन्देश सम्प्रेषण की अद्भुत क्षमता थी। वे सम्प्रेषण की प्रत्येक सम्भव विधि का बेहद कुशलता से उपयोग करते थे। 
सन 1918 के कलकत्ता अधिवेशन में महामना तिलक ने अंग्रेजी में बहुत सारगर्भित भाषण दिया पर गान्धीजी ने महसूस किया कि अधिवेशन में उपस्थित चार सौ प्रतिनिधियों में से अधिकांश तक उनकी बात नहीं पंहुच सकी है। गाँधीजी का क्रम आने पर उन्होंने सभा से पूछा कि अगर आप कहें तो मैं हिन्दी में बोलूं? उनके इस सवाल पर सभा की ओर से भरपूर सहमति का स्वर सुनायी दिया। उस दिन गाँधीजी के भाषण पर बार-बार करतल ध्वनि गूंजी। बाद में तिलक जी ने कहा कि अगली बार मैं भी हिन्दी में बोलूंगा। अपने श्रोताओं तक सन्देश पहुंचा सकने वाली भाषा के चुनाव के प्रति गाँधीजी सदैव सजग रहे। अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ही उन्होंने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना की थी। इसी दौरान इस समिति का कार्यालय मद्रास [चेन्नई] में खोलने का फैसला कितना दूरगामी था।
शिक्षित और साक्षर लोगों तक पहुंचने के लिए उन्होंने ‘हरिजन’ और ‘यंग इंडियन’ नामक समाचार पत्र निकाले व उनका सम्पादन किया। अपने अफ्रीका प्रवास के दौरान भी उन्होंने वहाँ ‘इंडियन ओपीनियन‘ नामक अखबार निकाला था जिससे वे अनुभव सम्पन्न हुये थे। आज की तरह अपने पक्ष का टेलीविजन और रेडियो स्टेशन न होते हुए भी उन्होंने अपनी बात को देश के कोने कोने में पहुंचाया।
गांधीजी आस्तिक थे और अपने आपको वैष्णव बताते हुये भी उन अर्थों में धार्मिक नहीं थे जिन अर्थों में आज इस शब्द का प्रयोग होता है और जो जोड़ने से अधिक लोगों को बांटने के काम अधिक आता है। गाँधीजी धार्मिक होने को जोड़ने के काम में लेते थे। उनके आश्रम में तथा आश्रम के बाहर की दिनचर्या में भी प्रार्थना अनिवार्य होती थी। इन प्रार्थनाओं में गाये जाने वाले भजनों का चयन गाँधीजी ने स्वयं किया था। जिनके बोल सामाजिक एकता का सन्देश देते थे। ‘रघुपति राघव राजाराम, पतित के पावन सीताराम’ के साथ ‘ अल्लाह ईश्वर एकहि नाम , सबको सन्मति दे भगवान’ भी सम्मलित था। उनके प्रिय भजनों में “ वैष्णवजन तो तेने कहिए, जे पीर पराई जाणे है’ था जो कि वैष्णवजनों के आचरणों को परिभाषित करती है। उनकी प्रार्थना सभा में सभी धर्मों की प्रार्थनाएं सम्मलित होती थीं जिन्हें हर जाति और धर्म के सभी उपस्थित एक साथ गाते थे।
भले ही उन दिनों आज की राजनीति के समान ‘प्रैस मैनेजमेंट’ का काम नहीं किया जाता था, पर गाँधीजी प्रैस के महत्व को समझते थे। उनके आश्रमों में मेहमान पत्रकारों का सदैव स्वागत था और उनका समुचित ध्यान रखा जाता था। उनकी दांडी यात्रा के दौरान बी बी सी लन्दन के दो पत्रकार पूरी यात्रा के समय उनके साथ रहे और प्रतिदिन सूचनाएं भेजते रहे जिससे गाँधी जी के आन्दोलन के अभिनव प्रयोग पूरी दुनिया तक पहुंचते रहे। दांडी यात्रा नमक बनाने के लिए कानून तोड़ने की घोषित यात्रा थी। नमक जो हर घर के लिए जरूरी चीज होने के कारण सबसे जुड़ी थी।
गाँधीजी ने अपनी वेषभूषा और व्यवहार से भी निरंतर सन्देश दिया। केवल एक धोती पहिन कर लन्दन में गोलमेज कांफ्रेंस में जाकर उन्होंने प्रैस के माध्यम से पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर व परोक्ष में अपने स्वाधीनता संघर्ष की ओर आकर्षित किया। उनसे कहा गया था कि ब्रिटिश शासन के नियमों व परम्परा के अनुसार ही कपड़े पहिन कर आयें किंतु उन्होंने इसे नहीं माना। जब वायसराय ने उनसे पूछा कि गाँधी आपके कपड़े कहाँ हैं? तो उन्होंने उत्तर दिया कि न केवल मेरे अपितु मेरे पूरे देशवासियों के कपड़े तो आप अंग्रेजों ने लूट लिये हैं, और यही बात कहने मैं यहाँ आया हूं। स्मरणीय है कि भगत सिंह ने पार्लियामेंट में जो बम फेंका था वह इतना शक्तिशाली था कि उससे कई जानें जा सकती थीं, किंतु उन्होंने बम को ऐसे स्थान पर फेंका जिससे किसी को कोई नुकसान नहीं हुआ। उसके बाद उन्होंने स्वयं गिरफ्तारी दी और कहा कि यह धमाका तो मैंने बहरों को अपनी बात सुनाने के लिए किया है। कहते हैं कि बम फेंकने की जिम्मेवारी लेने के लिए भगत सिंह और चन्द्र शेखर आज़ाद के बीच बहस भी हुयी थी क्योंकि आज़ाद खुद यह काम करना चाहते थे। पर भगत सिंह जो बहुत उच्च स्तर के बौद्धिक थे, ने कहा कि मुकदमें की बहस के माध्यम से हम अपना सन्देश पूरे देश को दे सकते हैं, और यह काम मैं बेहतर कर सकता हूं। उल्लेखनीय है कि भगत सिंह ने उक्त प्रकरण में अपनी बहस खुद की थी।
किसी के द्वारा कई पन्नों में गाँधीजी की निन्दा का पत्र आने पर गाँधीजी ने उसमें से आलपिन निकाल ली और कहा कि इस सब में यही एक काम की चीज है। उन्होंने सही ही कहा था कि मेरा जीवन ही मेरा सन्देश है। वे अपने प्रत्येक काम से अपना सन्देश देते थे।
गाँधीजी जब माउंट्बेटन से मिलने गये तो उनके कमरे में कूलर चल रहा था। फ्रीडम एट मिडनाइट के लेखक लपियर कालिंस के अनुसार तब भारत में चलने वाला शायद वह एकमात्र कूलर रहा होगा। गाँधीजी बोले मुझे सर्दी लग रही है, ऐसा कह कर उन्होंने बातचीत से पहले वहाँ का कूलर बन्द करा दिया। ऐसा कर के उन्होंने सन्देश दिया कि तुम्हारी मशीनों से मैं चमत्कृत नहीं हूं, व हमें बराबरी से बात करनी होगी। इस समय भी उन्होंने अपनी ओर से कोई बात नहीं छेड़ी, केवल अपनी उस घड़ी की चर्चा करते रहे जो चोरी चली गयी थी। परोक्ष में वे कह रहे थे कि राजा तेरे राज्य में मेरी घड़ी भी सुरक्षित नहीं है।
उनका एक चम्मच था जिससे वे दही खाते थे । जब वह चम्मच टूट गयी तो उन्होंने उसमें एक खपच्ची बाँध ली और लगातार उसका उपयोग करते रहे। जब लेडी माउंटबेटन ने मेज पर नाश्ता लगवाया तो उन्होंने अपनी थैली में से वही टूटा चम्मच और दही निकाल लिया और बोले अपना नाश्ता मैं खुद लाया हूं। उस साम्राज्य के प्रतिनिधि के सामने जिसके राज्य में सूरज नहीं डूबता था, ऐसा व्यवहार कर के गाँधी अपनी विनम्र चुनौती रखते थे। इस व्यवहार का सन्देश दूर दूर तक गया।
साबरमती आश्रम का नियम था कि चाहे जिस जाति का व्यक्ति आकर रुके, उसे अपना पाखाना खुद ही साफ करना होगा। यह एक परम्परागत समाज में विद्रोह का संगीत था। देश काल परिस्तिथि को देखते हुए स्वच्छता के लिए उन्होंने आज की तरह घर घर शौचालय का सन्देश नहीं दिया अपितु इतना कहा कि शौच जाने के बाद उसे वहीं की मिट्टी से दबा देना चाहिए, ताकि गन्दगी न फैले।
आज़ादी की लड़ाई का अपना सन्देश व्यापक स्तर तक पंहुचाने के लिए उन्होंने कितने कितने रूप धरे। समाज सुधारक, महात्मा, प्राकृतिक चिकित्सक, कुष्टरोगियों के सेवक, रैडक्रास वालंटियर, सम्पादक, लेखक, संगठनकर्ता,आदि आदि। जिस व्यक्ति के पास जिस माध्यम से सन्देश जा सकता है, उसे पहुंचाना उनका काम था। विभिन्न तरह के लोगों के बीच विभिन्न तरीकों से ही जुड़ा जा सकता है। खेद की बात तो यह है कि उनकी सम्प्रेषण शक्ति को उनके नाम से राजनीति करने वाले नहीं अपना रहे जबकि विघटनकारी ताकतें उनके औजारों का दुरुपयोग कर रही हैं।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629