
फिलहाल गुलगुलों से परहेज करती जेडी[यू] का पलड़ा भारी है
वीरेन्द्र जैन
हिन्दी में एक पुराना मुहावरा है ‘गुड़ खायें, गुलगुलों से परहेज करें”। बिहार में सत्तारूढ जेडी [यू] भी इसी रास्ते पर चलती नजर आ रही है। अभी हाल ही में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक समाप्त होने के बाद उसके अध्यक्ष शरद यादव, जो एनडीए के अध्यक्ष भी हैं, ने जो वक्तव्य दिया उससे ऐसा ही आभास होता है। जब वे एक ओर तो आगामी बिहार विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा से सीटों के बँटवारे की पुष्टि करते हुये कहते हैं कि सीटों के बँटवारे की और चुनाव प्रचार की पुरानी व्यवस्था कायम रहेगी, वहीं दूसरी ओर वे कहते हैं कि चुनाव में नरेन्द्र मोदी और वरुण गान्धी प्रचार में हिस्सा नहीं लेंगे। उल्लेखनीय है कि इससे पहले भाजपा दबे ढके कह चुकी है कि भाजपा की ओर से कौन चुनाव प्रचार करेगा इसका फैसला उसके गठबन्धन या चुनावी सहयोगी नहीं अपितु भाजपा स्वयं करेगी।
अगर भाजपा अपने शब्दों पर कायम रह सके तो उसके इस कथन में कुछ भी गलत नहीं है। किसी भी गठबन्धन का कोई भी सहयोगी गठबन्धन में रहने, न रहने के लिए तो स्वतंत्र है किंतु किसी दूसरे दल की कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप का उसे कोई अधिकार नहीं होता। स्मरणीय है कि यूपीए गठबन्धन को समर्थन देने से पहले बामपंथी दल श्रीमती सोनिया गान्धी के कटु आलोचक थे किंतु गठबन्धन को समर्थन देने के बाद जब उनसे पूछा गया था कि क्या वे सोनिया गान्धी को प्रधान मंत्री बनाये जाने पर भी यूपीए का समर्थन जारी रखेंगे तो बामपंथियों का उत्तर था कि हम तो न्यूनतम समझौता कार्यक्रम के आधार पर बाहर से यूपीए का समर्थन कर रहे हैं तथा नेता पद के लिए किसे चुनना है या किसे नहीं चुनना यह उनका आंतरिक मामला है। ठीक इसी तरह जेडी[यू] को भी एक बार बिना शर्त एनडीए गठबन्धन में सम्मलित होने के बाद भाजपा के आंतरिक मामलों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है, भले ही उनका नेता उसका अध्यक्ष ही क्यों न हो।
यद्यपि यह सुविख्यात है कि भाजपा एक अवसरवादी दल है और वह सत्ता के लिए किसी के आगे किसी भी आवश्यक कोण पर तना रह सकता है या झुक सकता है। बिहार में जेडी[यू] के समर्थन के बिना वे अपनी वर्तमान की सीटों में से आधी भी नहीं जीत सकते, इसलिए वे यह शर्त भी मान लेंगे किंतु यह उनकी स्वीकरोक्ति केवल कूटनीतिक होगी और जैसे ही अवसर मिलेगा वे जेडी[यू] से बदला लेने में नहीं चूकेंगे। आम मतदाताओं के सामने इस बहस से जो सन्देश जाना था वह जा ही चुका है। नरेन्द्र मोदी केवल हिन्दू साम्प्रदायिकता से कुप्रभावित लोगों के नायक हैं व शेष दुनिया के लिए खलनायक हैं, जिनमें जेडी[यू] के समर्थक भी सम्म्लित हैं। अपने इस वक्तव्य से उसने कितने मतों का नुकसान रोक लिया है यह चुनाव परिणाम ही बताएंगे।
बिहार में जो भी राजनीतिक दल सक्रिय हैं उनमें से भाजपा के साथ कोई नहीं जा सकता है। लालू प्रसाद की राष्ट्रीय छवि का निर्माण ही रथ यात्रा निकाल कर अपने पीछे दंगों की एक श्रंखला छोड़ते जाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार करने और धर्म निरपेक्षता का पक्ष लेते रहने से ही बनी है, राम विलास पासवान ने तो एनडीए सरकार से स्तीफा ही गुजरात में हुए साम्प्रदायिक दंगों के बाद दिया था और अब वे राज्यसभा की सदस्यता तक लालू प्रसाद की कृपा से पा सके हैं अतः वे लालू का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे। बामपंथी दलों और कांग्रेस का भाजपा से हाथ मिलाने का सवाल ही नहीं उठता इसलिए जेडी[यू] जानता है कि भाजपा, जो झारखण्ड में सरकार में सम्मलित होने के लिए शिबू सोरेन का समर्थन करने पर भी तैयार हो सकती है, उनकी हर शर्त मानेगी। पिछले दिनों बिहार व यूपी के लोगों के साथ महाराष्ट्र में भाजपा के स्वाभाविक गठबन्धन साथी शिवसेना के दोनों धड़ों ने जो कुछ भी किया और भाजपा चुपचाप देखती रही उससे भी बिहार के सभी वर्गों में गहरी नाराजी व्याप्त है। इसलिए अकेले भाजपा की बिहार में कोई गति नहीं है। बिहार भाजपा में नेतृत्व के सवाल पर भी काफी टकराव रहा है और सुशील कुमार मोदी के विरोध में पच्चीस से अधिक विधायक दिल्ली में हाई कमान के सामने एकजुट विरोध कर चुके हैं जिन्हें बहुत ही मुश्किल से सम्हाला गया था अन्यथा सरकार ही गिरने का खतरा पैदा हो गया था। यदि दुबारा सुशील कुमार मोदी को ही नेतृत्व सौंपा जाता है तो वे उन विधायकों को टिकिट ही नहीं पाने देंगे, जिससे एक नया संकट पैदा होगा। पिछले दिनों जब भाजपा के नव नियुक्त अध्यक्ष गडकरी ने अपनी कार्यकारिणी घोषित की थी तो शाहनवाज खान ने अपने पद से असंतुष्ट रह कर कई महीनों तक कार्य नहीं किया था। शत्रुघ्न सिन्हा तो कभी भी अनुशासन में नहीं रहे और गडकरी की टीम का मुखर विरोध करने वालों में सबसे आगे रहे हैं। उन्होंने तो प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन को महाराष्ट्र विधान सभा चुनावों में टिकिट मिलने का खुल कर विरोध किया था जबकि पूरी भाजपा महाजन परिवार के आगे साष्टांग रहने की मजबूरी पर कायम है।
यद्यपि 2004 के लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा ने श्रीमती सोनिया गान्धी के कांग्रेस दल का नेता चुने जाने पर जो अनुचित हस्तक्षेप किया था और श्रीमती गान्धी को पदत्याग की अंतर्प्रेरणा दी थी, वही भूल अब उनके गले की फांस बन सकती है, जेडी[यू] यह तर्क कर सकता है कि जब नेतृत्व के सवाल पर आप चुनाव में बहुमत प्राप्त दल के नेता चुने जाने के प्रश्न पर अनुचित हस्तक्षेप कर सकते हैं तो एनडीए के अध्यक्ष के रूप में शरद यादव चुनाव में प्रचार करने वाले नेताओं पर फैसला क्यों नहीं ले सकते, जबकि इससे चुनावी परिणामों के प्रभावित होने की सम्भावना हो।
भले ही शरद यादव की दलील में दम हो किंतु आडवाणी के रिटायरमेंट के बाद बदनाम ही सही पर नरेन्द्र मोदी भाजपा के सबसे चर्चित चेहरे हैं और वरुण गान्धी उनके सबसे महत्वपूर्ण मोहरे हैं। इन दोनों पर समझौता करने से भाजपा के कार्यकर्ताओं में दिशा का संकट पैदा होगा। अपना नेतृत्व वकीलों और वकीलनुमा पत्रकारों के हाथों में सौंप कर जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ नेता को पीछे की सीट पर धकेल देना कितना कारगर होगा यह भविष्य के गर्त में है। पर यह मोदी के सवाल पर अटल बिहारी वाजपेयी का स्तीफा रोकने वाले खुलासे के बाद फिर से उसी भाजपा में शामिल हो गये जसवंत सिंहों की क्या गति होगी जहाँ मोदी को स्टार प्रचारक मानने, न मानने पर बहस चल रही हो।
वीरेन्द्र जैन
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