गुरुवार, अप्रैल 05, 2012

चुनावी निष्कर्ष और भारतीय लोकतंत्र


चुनावी निष्कर्ष और भारतीय लोकतंत्र
वीरेन्द्र जैन
      हमारे देश में चुनावों में विजय की सम्भावनाओं और चुनाव परिणामों के बाद उनके निष्कर्ष निकालने के तरीके बहुत किताबी हैं। जबकि सच तो यह है कि जनता की लोकतांत्रिक चेतना और राजनीतिक दलों में कार्य प्रणाली का विकास् अभी बहुत ही प्रारम्भिक अवस्था में है तथा निरंतर जारी चुनाव सुधारों के काम में अभी बहुत कुछ और किया जाना बाकी है। बड़ी संख्या में निरक्षरता, हर समय बदलती रहने वाली चुनाव प्रणाली का अज्ञान, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, भाषावाद, क्षेत्रवाद, सामंतवाद, लोकप्रियतावाद, धनबल, बाहुबल, सत्तारूढ नेताओं से उम्मीदें, पुलिस प्रशासन का दुरुपयोग, आतंकवाद, आदि अनेक कारण हैं जो चुनावों को प्रभावित करते हैं और जिनकी गणना कर निष्कर्ष निकालना फिलहाल सम्भव नहीं है। लाल बुझक्कड़नुमा हमारे चुनाव विश्लेषक राजनीति के गूढ सिद्धांतों, चुनावी घोषणाओं, और राजनीतिक दलों के कार्यक्रम के आधार पर जीत हार का फैसला सुनाते रहते हैं जो आम तौर पर सही नहीं होता और जहाँ तुक्का लग जाता है वहाँ वे उसमें सफलता का प्रतिशत निकाल यह नहीं बताते कि जहाँ वे गलत सिद्ध हुए हैं वहाँ कौन सी सिद्धांतिकी लागू कर रहे हैं।
      हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों और उपचुनावों के बारे में विश्लेषणों की बाढ आ गयी है और ये विश्लेषण मतदाता की जगह विश्लेषणकर्ता की पसन्दगी या कल्पना पर आधारित हैं। अगर पाँच राज्यों के चुनाव परिणामों में से एक उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों के विश्लेषणों को देखें तो हम पाते हैं कि इनके द्वारानिम्नांकित निष्कर्ष निकाले गये हैं-
·         बहुजन समाज पार्टी साफ हो गयी है
·         लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक वोट दिया है
·         कांग्रेस का सूफड़ा साफ हो गया है
·         राहुल गान्धी की कलई खुल गयी है
·         हार के लिए कांग्रेस के प्रभारी दिग्विजय सिंह जिम्मेवार
·         कांग्रेस का बुन्देलखण्ड पैकेज, मुस्लिम आरक्षण का शगूफा, और बुनकरों को दिया पैकेज बेअसर
·         अखिलेश के नेतृत्व को पसंद किया गया है
·         समाजवादी पार्टी को व्यापक समर्थन मिला है
आदि आदि आदि
    आइए अब निष्कर्षों की हकीकत देखें-
·         बहुजन समाज पार्टी को इन चुनावों में उत्तर प्रदेश में सैंतीस लाख पचहत्तर हजार वोट पिछले चुनावों से ज्यादा मिले हैं, अगर इसे किसी सरकार की लोकप्रियता को पैमाना माना जाये तो विश्लेषक लोग किस निष्कर्ष पर पहुँचेंगे? क्या इसका मतलब ये नहीं निकाला जा सकता कि एक एक करोड़ छियानवे लाख बीएसपी के मतदाताओं को मायावती के भ्रष्ट प्रशासन से कोई शिकायत नहीं थी। इसके बाद भी उनके न केवल अस्सी उम्मीदवार जीते हैं, जो भाजपा और कांग्रेस के कुल विधायकों की संख्या से ज्यादा हैं, अपितु 209 उम्मीदवार दूसरे नम्बर पर रहे हैं।
·         जब चारों प्रमुख दलों के सदस्यों पर लगभग समान अनुपात में भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं तो यह कैसे माना जा सकता कि लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक वोट दिया है
·         प्रत्येक दक्षिण पंथी, मध्यममार्गी पार्टी चुनावों के दौरान अपने समर्थकों में उत्साह बनाये रखने के लिए न केवल जीत का अपितु सरकार बनाने का भी दावा करती है जबकि उसके नेता सच्चाई से खूब परिचित होते हैं। कांग्रेस ने भी ऐसा ही किया था। उसने राष्ट्रीय लोकदल के लिए बारह प्रतिशत सीटें छोड़ी थीं और फिर भी पिछले चुनावों में प्राप्त कुल वोटों से लगभग दुगने वोट पाये और सीटों में भी तीस प्रतिशत की बढोत्तरी दर्ज की, जबकि उसे केन्द्र में सत्तारूढ होने की एंटी इंकम्बेंसी, गठबन्धन के मंत्रियों के भ्रष्टाचार के खुलासे, मँहगाई की वृद्धि आदि समस्याओं से भी सामना करना पड़ा।
·         राहुल गान्धी स्टार प्रचारक थे इसलिए उनकी सभाओं में उमड़ती भीड़ से प्रैस को गलतफहमी होना स्वाभाविक थी और यही कारण है कि भीड़ को देखकर ही विभिन्न संचार माध्यमों ने भी कांग्रेस को लगभग अस्सी सीटें मिलने की उम्मीद की थी। राहुल गान्धी सीधे चुनाव में नहीं थे जबकि अखिलेश, मायावती, उमाभारती आदि पूर्व से ही घोषित मुख्यमंत्री की तरह थे। उल्लेखनीय यह भी है कि बेनी प्रसाद वर्मा, सलमान खुर्शीद, राज बब्बर, अजरुद्दीन, पी एल पूनिया, ही नहीं सोनिया गान्धी के निर्वाचन क्षेत्र से भी कोई उम्मीदवार नहीं जीत सका।
·         यद्यपि इसमें कोई सन्देह नहीं कि दिग्विजय सिंह ने भी उत्तर प्रदेश के प्रभावी होने के नाते काफी मेहनत की और धर्मनिरपेक्ष एजेंडे को सामने रख कर ही कांग्रेस के मत प्रतिशत में वृद्धि करवायी, पर इस प्रयास में वे सीधे सीधे साम्प्रदायिक शक्तियों के निशाने पर आ गये। ये शक्तियां किसी भी तरह कांग्रेस के अन्दर और बाहर दिग्विजय सिंह को नुकसान पहुँचाना चाहती हैं इसलिए चुनाव परिणामों में हुए सुधार को न देख कर इस हार को पूरी तरह से उन पर थोपना चाहती हैं। सच तो यह है कि उन्होंने सदैव ही स्थिति में सुधार का दावा भर किया था जो मिली है।
·         बुन्देलखण्ड पैकेज चुनावों से एक साल डेढ साल पहले आया था पर उसे भी मुस्लिम आरक्षण और बुनकरों को दिये गये पैकेज के साथ जोड़ कर उसके बेअसर होने की तरह देखा जा रहा है। चुनावों से पहले दिये गये प्रलोभनों का असर अगर होता तो मायावती द्वारा अठारह मंत्रियों के निष्कासन का लाभ भी उन्हें मिलना चाहिए था जो नहीं मिला। कांग्रेस के पास उत्तर प्रदेश में सचमुच ही उस संगठन का अभाव था जो सरकारी योजनाओं को सही तरीके से लागू करवाने और उसका लाभ पार्टी को दिलवाने में समर्थ होता है । वहाँ यह पार्टी, पद पाकर सत्ता के लाभ उठाने की आकांक्षाओं से भरे लोगों की जमात होकर रह गयी है। न उसके पास जाति का आधार है, न साम्प्रदायिकता का इसलिए वह उक्त आधार पर सक्रिय कर दिये गये मतदाताओं के बीच पिछड़ने के लिए अभिशप्त थी।
·         यह मानना सही नहीं है कि अखिलेश के व्यक्तितत्व को पसन्द किया गया है इसलिए समाजवादी पार्टी की जीत हुयी है। अखिलेश के व्यक्तित्व का ऐसा कोई भी गुण चुनावों तक सामने नहीं आया था जिसके कारण उसे दूसरों की तुलना में तरजीह मिलती। अमर सिंह को पार्टी से दूर करने में भी अखिलेश के चाचा रामगोपाल आदि की भूमिका रही, आजम खान को वापिस पार्टी में लाने में भी अमर सिंह का निष्काषन और मुलायम सिंह के झुकने की भूमिका रही। डीपी यादव को पार्टी से दूर रखने में जरूर उनका नाम लिया जाता है किंतु दूसरे वैसे ही बाहुबलियों को टिकिट देने और मंत्री बनने से न रोक पाने के कारण यह कार्य भी निष्प्रभावी हो गया।
·         समाजवादी पार्टी के नाम के साथ भले ही समाजवादी शब्द जुड़ा है और कभी गाहे बेगाहे वे लोहिया का नाम ले लेते हैं किंतु मुलायम सिंह को नेता मानने वाली इस यादववादी पार्टी का पार्टी संगठन, पार्टी लोकतंत्र, सिद्धांतों आदि से दूर का भी रिश्ता नहीं रहा। अमर सिंह के इशारे पर अपने जनसमर्थन को चन्द पूंजीपतियों के घर गिरवी रख कर इसने समाजवाद से दूरी बना ली थी। इस पार्टी की जीत कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी की एंटी इंकम्बेंसी, भाजपा के बहुमुखी पतन, और विश्वसनीय विकल्प के अभाव से मिले समर्थन की अप्रत्याशित,  लाटरीनुमा जीत है। इसमें यादव मुस्लिम जातिवादी वोटों का गठजोड़ मददगार हुआ होगा।     
      लोकतंत्र को चुनावों में मिले वोटों भर से आँका गया तो भूल हो जायेगी। मूल्यांकन तो तब होगा जब कोई सतारूढ पार्टी, पार्टी-कार्यक्रम के अंतर्गत प्रस्तावित समाज सुधार या अपनी सरकार द्वारा लायी गयी किसी योजना को कार्यकर्ताओं की मदद से सफलतापूर्वक लागू करा के दिखा दे। उल्लेखनीय होगा कि कांग्रेस सरकार द्वारा मनरेगा, या शिक्षा के अधिकार की निर्बल वर्ग की हितैषी अच्छी योजनाएं लायी गयी हैं किंतु सत्तारूढ दलों के कार्यकर्ताओं द्वारा कोई रुचि न लेने के कारण भ्रष्टाचार की शिकार होती जाती हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी तब जीती मानी जायेगी जब वह पार्टी में भरे हुए बाहुबलियों की ऊर्जा और उत्साह को समाजवादी पार्टी के किसी समाज हितैषी कार्यक्रम में लगा सकने में सफल हो सके। बरना ये आँधी के आम हैं तथा हर बार आँधी नहीं आती। 
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629
    

2 टिप्‍पणियां:

  1. The anactivity of all the communist parties also be added as an important factor for the election-results of U.P. Are you forgetting it intentionally ?

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  2. वे इस चुनाव में महत्वपूर्ण फैक्टर नहीं थे। ये कहानी चुनावी पार्टियों की है

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