गुरुवार, अक्तूबर 24, 2013

न सुधरने को कृतसंकल्प रामदेव और कानून के हाथ

न सुधरने को कृतसंकल्प रामदेव और कानून के हाथ  
वीरेन्द्र जैन

      इस बात को अभी बहुत दिन नहीं बीते हैं जब रामदेव किसी महिला के कपड़े पहिन कर रामलीला मैदान से भागे थे और उसके बाद जब अनशन करने का दावा किया था तब चौथे दिन ही कोमा में चले गये थे या बचे खुचे सम्मान को बनाये रख कर अनशन तोड़ने के लिए वैसा बहाना किया था। उस समय ऐसा लगता था कि उस भूल से उन्होंने सबक लिया होगा और असत्य को आधार बनाने के भाजपायी हथकण्डे से तौबा कर लेंगे, पर उनकी ताज़ा गतिविधियां ऐसा संकेत नहीं देतीं।
      यह मात्र संयोग ही है कि रामदेव ने अपने योग प्रशिक्षण के लिए उपयुक्त समय पर प्रचार का उपयुक्त माध्यम पाया और उससे अर्जित लोकप्रियता को व्यावसयिकता में बदलवाने वाले सलाहकार भी पाये। भारत की इस प्राचीनतम विद्या के न तो वे अविष्कारक हैं और न ही पहले प्रशिक्षक। देश के विकासक्रम में तेजी से विकसित हुए उच्च मध्यम वर्ग के घर तक पहुँचने के रंगीन टीवी के अनगिनित चैनल जैसे माध्यम जिस काल में फैले उसी दौर में योगसनों की मांग भी सर्वाधिक पैदा हुयी। संयोग से ही रामदेव बाज़ारू उत्पाद के वैसे ही ब्रांड बन गये जो उचित समय पर बाज़ार में आने, और उचित वितरण एजेंसी हाथ लग जाने पर अचानक छा जाता है। जिस तरह अपने समय के लोकप्रिय फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन को वस्तुओं के विज्ञापन करने की सलाह उचित समय पर मिली थी और जब उन्होंने संकोच छोड़ कर उसे अपनाया तो उससे अपने व्यावसायिक नुकसान की पूर्ति ही नहीं की अपितु वे इसके शिखर पर पहुँच गये। अमिताभ बच्चन एक सुशिक्षित और संस्कारवान परिवेश में विकसित हुये थे इसलिए उन्होंने कभी अपने बचपन के मित्र राजीव गान्धी के अनुरोध पर उनकी चुनावी सहायता तो की किंतु इस लोकप्रियता को राजनीतिक जगत के शिखर पर पहुँचने का साधन नहीं माना व उचित समय पर अपने मूल काम को अपना लिया। दूसरी ओर रामदेव को संयोगवश हाथ लगी व्यावसायिक सफलता ने भ्रमित कर दिया और वे अपने आप को जन्मजात दिव्य पुरुष समझने लगे। दुर्भाग्य से सिद्धांतहीन, विचारहीन राजनीति के इस दौर में जब ढेर सारी राजनीतिक पार्टियां किसी भी तरह की लोकप्रियता को अपने पक्ष में भुनाने को उतारू बैठी रहती हैं तब इन पार्टियों के आग्रह के प्रभाव में उनकी अमर्यादित महात्वाकांक्षाओं ने उन्हें स्वतंत्र राजनीतिक दल बनाने की ओर तक प्रेरित किया जिससे न केवल उनकी नासमझदारी ही प्रकट हो गयी अपितु वे उन राजनीतिक दलों की आँख की किरकिरी बन गये। भगवा रंग को थोक में भुनाने का एकाधार चाहने वाली भाजपा को उनका यह विचार सबसे अधिक खला था क्योंकि इस तरह वे अंततः उन्हीं के वोटों में सेंध लगाने वाले थे। स्मरणीय है रामदेव उर्फ राम किशन यादव की लोकप्रियता के विकसित होते समय भाजपा ही नहीं मुलायम सिंह और लालू प्रसाद की यादववादी पार्टियां और कांग्रेस के नारायन दत्त तिवारी और सुबोधकांत सहाय जैसे नेताओं ने भी उनकी मदद की थी, किंतु अलग राजनीतिक दल बनाने के उनके विचार का किसी ने भी समर्थन नहीं किया। अपने अन्दाज़ में आलोचना करते हुए लालू प्रसाद ने तो कहा था कि पेट फुलाने पिचकाने से कोई राजनेता बनने की पात्रता अर्जित नहीं कर लेता।
      भाजपा के नेता, जो उन्हें दवा उद्योग चलाने और सेवादार के नाम से मजदूरों का शोषण कर अनैतिक मुनाफा कमाने में उनकी मदद करते रहे थे, भी उनके आलोचक बन गये थे। उत्तराखण्ड में जिस भाजपा शासन ने उन्हें कौड़ी के मोल कीमती ज़मीनें देकर बदले में चुनाव के लिए समुचित चन्दा भी हस्तगत किया था, अपने सहयोगी हाथ सिकोड़ लिये थे। जब अन्ना हजारे के अनशन के समय वे मंच की ओर बढने जा रहे थे तब अपने आन्दोलन को गैरराजनीतिक मानने वाले अन्ना के समर्थकों ने उन्हें खदेड़ दिया था। सच है कि राजनीतिक दल उनकी लोकप्रियता का लाभ लेना चाहते थे किंतु उन्हें स्वतंत्र रूप से राजनीतिक दल के रूप में मान्यता देने के विचार से सहमत नहीं थे।
      रामदेव किसी विचार या मुद्दे को लेकर राजनीति में नहीं आये थे अपितु राजनीति में प्रवेश करने के लिए उन्होंने मुद्दा आयात किया। वे विदेशों में जमा काले धन के जिस अस्पष्ट  मुद्दे को लेकर सामने आये वह बामपंथी पार्टियों द्वारा बहुत वर्षों से उठाया जाता रहा था व पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान जेडी-यू व भाजपा ने भी उस पर काफी जोर दिया था। मुद्रास्फीति के इस दौर में उन्होंने काले धन को नियंत्रित करने के लिए बड़े नोटों को बन्द करने का अव्यवहारिक विचार दिया जो उनकी अनुभवहीनता का नमूना था। रामदेव के गुरु एक दिन अचानक ही गायब हो गये थे किंतु उन्होंने उनके गायब होने की कोई चिंता नहीं की, अपितु उस घटना पर चर्चा से ही परहेज करते रहे। रामदेव की क्षमता केवल योगासनों के प्रशिक्षक तक तो ठीक थी और तब विचार देने का काम उनके सहयोगी राजीव दीक्षित किया करते थे जिनका अचानक ही संदिग्ध स्थितियों में निधन हो गया जिससे रामदेव का संस्थान विकलांगता महसूस करने लगा। भाजपा के चतुर नेताओं ने उन्हें उनकी हैसियत समझा दी और राजनीतिक दल बनाने का विचार छोड़ देने को विवश करते हुए उन्हें अपना प्रचारक बना लिया।
      एक्टविस्ट और कुशल वक्ता राजीव दीक्षित के निधन के बाद रामदेव के मुँह से जो निजी विचार निकले उसने उनकी कलई खोल दी। न उनके पास विचार हैं, न भाषा, और न ही शिष्टता, विनम्रता, करुणा जैसे गुण ही हैं, जो उन्हें राजनेता और संत दोनों के लिए अयोग्य होने को प्रकट करते हैं। उनका हाल पंचतंत्र की कथा में शेर की खाल ओढ लेने वाले पशु की तरह से हो गया जो जब अपने स्वर में बोलने लगा तो उसकी पहचान हो गयी और उसी अनुरूप में उसने दण्ड भुगता।
      रामदेव ने अपनी लोकप्रियता से जो ब्रांडवैल्यू अर्जित की उससे उन्होंने अपने को जिस व्यापार की दुनिया में उतारा उसमें भी सारी व्यापारिक अनियमितताएं अपनायीं जिसमें मिलावट, श्रम कानूनों के उल्लंघन से लेकर कर वंचना तक के हथकण्डे सम्मलित रहे। योगप्रशिक्षक की अपनी लोकप्रियता को भुनाने के लिए उन्होंने दूसरी कम्पनियों में निर्मित किराना सामग्री से लेकर टूथब्रुश तक सब कुछ बेचना चाहा। सरकारी संस्थानों को गलत जानकारियां देकर अनुचित लाभ उठाया और योग प्रशिक्षण के नाम पर ज़मीन हस्तगत कर उसे उद्योग व व्यापार के लिए उसका स्तेमाल किया। इस पर भी जब वे भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे किसी राजनीतिक दल के प्रचारक बन कर चुनाव वाले राज्यों में योग के बहाने अभद्र भाषा में नैतिकता का पाठ पढाने की कोशिश करने लगे तो सूप और चलनी वाली कहावत चरितार्थ होते देर नहीं लगी। उनके भाषणों के विषय को देखते हुए चुनाव आयोग को उनकी सभाओं के खर्च को भाजपा के चुनाव खर्च में जोड़ने के आदेश देने पड़े। ऐसा लगता है कि वे अपनी अनियमित्ताओं को राजनीतिक विषय के साथ जोड़ कर कार्यवाही से बचने का वैसा ही बहाना ले रहे हैं जिस तरह से सीबीआई की सम्भावित कार्यवाही से सुरक्षा के लिए मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित कर दिया है। पर लालूप्रसाद, जगन्नाथ मिश्र, और आशाराम के खिलाफ चली कार्यवाहियों ने उम्मीद बँधायी है कि न्यायपालिका स्वतंत्र है और वह भले ही देर कर दे पर अपना काम करेगी। बकरी की माँ कब तक खैर मनायेगी!
वीरेन्द्र जैन
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1 टिप्पणी:

  1. इतिहास इस बात का साक्षी है कि आज़ाद, भगतसिंह एवम् दुर्गा भाभी इत्यादि वीर और वीराङ्गनायें समय-समय वेश बदल कर पर अपने उद्देश्य पूर्ति में संलग्न रहे हैं तो अपने प्राण बचाने के लिए बाबा रामदेव ने अपना वेश बदल लिया तो कौन सा गुनाह कर दिया ? वे भी भारत के नागरिक हैं और अन्याय के खिलाफ खडे होने का उन्हें भी पूरा अधिकार है । " बाबा ने रामलीला से सरकार को चेताया है । जनतंत्र के महत्व को गॉधी की ज़ुबान में समझाया है । बाबा तुम अकेले नहीं हो हिन्दुस्तान तुम्हारे साथ है । देश ने सत्याग्रह को तुम्हारे होठों से गाया है । बाबा तुम निश्चिन्त रहो जनता जाग गई है । जयप्रकाश का ऑंदोलन आज रंग लाया है । राज करते-करते शासन-दुशासन हो गया । मिश्र जैसा माहौल आज भारत में आया है । 'शकुन' जा तू भी गेरुआ पहन ले । काले अ‍ॅग्रेज़ों को भगाने वो गॉधी गेरुआ पहन कर आया है ।

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