शुक्रवार, दिसंबर 06, 2013

संस्मरण---- राजेन्द्र यादव, लोकतांत्रिक, निर्भय, साहसी और तार्किक थे

संस्मरण
राजेन्द्र यादव, लोकतांत्रिक, निर्भय, साहसी और तार्किक थे

वीरेन्द्र जैन
      राजेन्द्र जी को निकट से जानने और उनके सम्पर्क में आने वालों की संख्या हजारों में तथा उनके प्रशंसकों, निन्दकों की संख्या लाखों में होगी इसलिए उन पर कुछ बहुत अलग से लिख पाने का सुपात्र मैं नहीं हूं, किंतु मैं जिस गहराई से उन्हें पसन्द करता रहा हूं, उसके आधार पर अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए कुछ लिखने से अपने आप को रोक भी नहीं सकता।
      मैंने जिन तीन लेखकों के सम्पादकीय लेखों को पढ कर अपना मानस गढा है, उनमें प्रेमचन्द, कमलेश्वर, और राजेन्द्र यादव की त्रयी आती है। प्रेमचन्द ने वे सम्पादकीय बीसवीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों के घटनाक्रम पर जागरण में लिखे थे तो कलेश्वर ने इमरजैंसी के खिलाफ बनी सरकारों के दौर में विचारहीन गठबन्धन सरकारों की कार्यप्रणाली पर सारिका में तथा बाद में स्तम्भ के रूप में विभिन्न समाचार पत्रों के लिये लिखे थे। राजेन्द्र यादव के सम्पादकीय लेख 1987 से उनके सम्पादन में पुनर्प्रकाशित हंस में प्रकाशित होते रहे हैं और उनकी धार निरंतर तीव्र से तीव्रतर होती गयी थी। कमलेश्वर और राजेन्द्र यादव के लेखों का में समकालीन पाठक और प्रशंसक रहा हूं।
      मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शे’र कुछ कुछ ऐसा है-
देखिये तकरीर की लज़्ज़त कि उसने जो कहा
सुनने वाला भी ये समझे ये हमारे दिल में है
राजेन्द्रजी को पढते समय मुझे कई बार ऐसा लगता रहा है कि उन्होंने मेरे विचारों को ही शब्द दे दिये हैं। उनके बहुत कम ऐसे लेख मैंने पढे होंगे जो समझ में न आये हों या उनसे असहमति बनी हो। यही कारण रहा है कि लगातार पच्चीस वर्षों तक उनका सम्पादकीय पढने के लिए हर माह हंस के नये अंक का इंतज़ार बना रहा। सच कहने और सुनने का साहस और समझ रखने वाले वे दुर्लभ व्यक्तियों में से थे, जो अपनी बात को उसी तेवर के साथ अपने पाठकों, श्रोताओं को समझा भी सकता हो। उन्हें अपनी विचारधारा की ताकत और अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर इतना भरोसा था कि वे अपने घोर विरोधियों को उकसाते थे, उगलवाते थे, और बिना उत्तेजित हुये उनकी गलत बात को काट सकते थे। उनको पढ और सुन कर लगता था कि जो दूसरे लोग बहस से बचते हैं, उन्हें या तो अपनी विचारधारा पर भरोसा नहीं होता या उन्हें उसको प्रस्तुत करना नहीं आता है। अनेक नामधारी लोगों को उनकी बात की मार से बिलबिलाते देखा जाता रहा है। उनके सम्पादन के दौर में हंस मे सर्वाधिक बहसें चली हैं और उन बहसों में सभी पक्षों को समान अवसर मिलता रहा है। हंस और जनसत्ता ही ऐसे माध्यम रहे हैं जिनमें उनके सम्पादकों के खिलाफ भी कटुतम लिखा गया है और जो छपा भी है। पाठकों, लेखकों के निर्भीक पत्रों के लिए हंस में समुचित स्थान मिलता रहा है और उन पत्रों में भी रचना का आस्वाद व मौलिक विचारों के तेवर देखने को मिलते रहे हैं। लोकतांत्रिकता का जो प्रयोग हंस में होता रहा है उसके लिए बड़ा आत्मविश्वास चाहिये होता है, जो उनके पास था। कथाकार सत्येन कुमार या शैलेश मटियानी की गालियों को भी उनका बचकानापन सिद्ध करते हुये वे उनका मजाक बना सकते थे। जब सत्येन कुमार ने लिखा था कि जनवादी प्रगतिशील रेवड़ को एक गड़रिया हाँक रहा है तो उन्होंने उत्तर में याद दिलाया था कि वे हिन्दी के ऐसे इकलौते लेखक हैं जिनकी चार पीढियां ग्रेजुएट रही हैं और फिर भी उन्हें उनकी जाति याद दिलायी जा रही है। उन्होंने कहा था कि जिन्हें परम्परा से ऊँची जाति का स्वाभिमान मिला है उनकी प्रतिभा तो उधार की है। यही कारण था कि वे ठाकुर सत्येन कुमार को उधारीलाल कहने लगे थे।
      सचमुच यह कैसी बिडम्बना थी कि जब लोग उनकी प्रतिभा से मुकाबला नहीं कर पाते थे तो इस इक्कीसवीं सदी में भी जाति के आधार पर अपने आहत अहं को सांत्वना देते थे।
      जब शैलेश मटियानी ने अपना एक साम्प्रदायिक विचारों वाला लेख उन्हें भेजा और उसे हंस में छापने की चुनौती दी तो राजेन्द्र जी ने उस लेख को छापते हुये केवल एक टिप्पणी लगा दी थी कि इनका इतिहास मुसलमानों के आने के बाद ही शुरू होता है। इस एक टिप्पणी से शैलेश मटियानी का पूरा लेख ही हास्यास्पद हो गया था। जिन धार्मिक असहिष्णुताओं का अतिरंजित वर्णन उन्होंने उस लेख में किया था वैसी तो मुगलकाल के पूर्व के भारतीय इतिहास में भी भरी पड़ी हैं।
      6 दिसम्बर 92 के बाद जब पूरा देश और दुनिया हिन्दू कट्टरवाद को एक स्वर से गरिया रहा था तब राजेन्द्र जी ने जनवरी 93 के अंक में हंस का सम्पादकीय मुस्लिम कट्टरवाद की आलोचना से प्रारम्भ करते हुये लिखा था कि किसी भी मुल्क में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा उनके साम्प्रदायिक संगठन नहीं कर सकते क्योंकि हिंसक संघर्ष में तो बहुसंख्यकों का जीतना ही तय है। उसके लिए जरूरी है कि अल्पसंख्यक देश में एक धर्मनिरपेक्ष वातावरण को बल दें, और उनका साथ दें। शाहबानो के मामले पर पर बोट क्लब में जुटी पाँच लाख मुसलमानों की भीड़ और ईंट से ईंट बज देने की चेतावनी के प्रभाव में राजीव सरकार द्वारा कानून बदलने को भी उन्होंने 6 दिसम्बर की घटना का बड़ा कारण माना था।
      साहित्य की दुनिया में वे जड़ता नहीं आने देते थे और समय समय पर साहित्य के मठाधीशों को चुनौती देते रहते थे। एक सम्मेलन के अवसर पर उन्होंने बर्र के छत्ते में यह कह कर हाथ डाल दिया था कि ये कालेज के प्रोफेसर केवल आलोचना या कविताएं ही क्यों लिखते हैं, कहानियां क्यों नहीं लिखते क्योंकि कहानियां लिखने में जान लगती है। आलोचना तो लिखे लिखाये को लिखना है। फिर क्या था सारे प्रोफेसर अपनी सफाई देने में निरंतर हास्यास्पद होते गये और राजेन्द्र जी दूर बैठ कर मजे लेते रहे।
      मुझे उन्हें सम्मेलनों, सेमिनारों, भाषण मालाओं, में तो सुनने का मौका मिला ही पर दस पाँच बार छोटे समूहों में भी साथ बैठ कर चर्चाओं में शामिल होने का अवसर भी मिला। एक बार तो शैलेन्द्र शैली स्मृति व्याख्यान माला में मैं उनका मेजबान था और पूरे दिन उनके साथ सीधी लम्बी बातचीत हुयी जो ज़िन्दगी के यादगार अनुभवों में बनी रहेगी। तीन साल तक प्रसार भारती बोर्ड के सदस्य रहने के अलावा उन्होंने कभी किसी सरकारी तंत्र का हिस्सा बनना पसन्द नहीं किया। प्रसार भारती बोर्ड का उनका कार्यकाल भी बहुत प्रभावकारी रहा और बोर्ड के इतिहास में ढेर सारी उपलब्धियों से भरा और निर्मलतम रहा।
      अनैतिकता और दूसरी नैतिकता के भेद को भी उन्होंने जिस साहस के साथ स्पष्ट किया वैसा साहस उनसे पहले कभी किसी ने नहीं दिखाया। दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, हो या ‘कामरेड का कोट’ से लेकर उदय प्रकाश की अनेक कहानियों पर महीने दर महीने चली बहसों ने परत दर परत अंधेरे की चादर को जिस तरह चीर कर संवेदनात्मक ज्ञान की जिस लालिमा के दर्शन कराये हैं, उसके लिए कभी धर्मयुग में पढा एक नवगीत याद आता है-
रामदीन अँधियारे की कुछ परतें फाड़ रहे
खुरपी लेकर मरी भैंस की खाल उतार रहे
राजेन्द्रजी ने यह दलित कर्म पूरे मन और क्षमता से किया और साहित्य के सारे कथित सवर्णों को चुनौती देते हुए किया।
      लेनिन ने कहा था कि ‘अच्छा लीडर ज्यादा अनुयायी नहीं बनाता अपितु अपने जैसे ज्यादा लीडर बनाता है।‘ राजेन्द्र जी ने अपने लोकतांत्रिक आचरणों द्वारा अपने जैसे अनेक प्रतिभावान बुद्धिजीवी, लेखक, सम्पादक, पीछे छोड़े हैं। आज हंस की परम्परा में कई पत्रिकाएं निकल रही हैं। ये लोग राजेन्द्र जी की जगह की कमी को पूरा कर रहे हैं और करेंगे। उनका काम उनके बिना भी आगे बढेगा और वे बिना भरे हुये खाली स्थान की तरह नहीं अपितु पीछे आते कारवाँ के कारण लगातार याद किये जायेंगे। इस मामले में भी वे अपने पूर्ववर्तियों और समकालीनों से भिन्न रहेंगे।

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा के टाकीज पास भोपाल [म.प्र.] 462023मो. 09425674629              

1 टिप्पणी:

  1. //साहित्य की दुनिया में वे जड़ता नहीं आने देते थे और समय समय पर साहित्य के मठाधीशों को चुनौती देते रहते थे। एक सम्मेलन के अवसर पर उन्होंने बर्र के छत्ते में यह कह कर हाथ डाल दिया था कि ये कालेज के प्रोफेसर केवल आलोचना या कविताएं ही क्यों लिखते हैं, कहानियां क्यों नहीं लिखते क्योंकि कहानियां लिखने में जान लगती है। आलोचना तो लिखे लिखाये को लिखना है। फिर क्या था सारे प्रोफेसर अपनी सफाई देने में निरंतर हास्यास्पद होते गये और राजेन्द्र जी दूर बैठ कर मजे लेते रहे।//---------व्यक्तित्व की विवेचना बेहद ही सहज भाव में चित्रण आपने , एक पल के लिए लगा हम भी शामिल थे वहाँ। सादर नमन आपको इस संस्मरण को हम सबके संग बांटने के लिए।

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