शुक्रवार, फ़रवरी 21, 2014

श्रद्धांजलि ः कामता प्रसाद सड़ैया

श्रद्धांजलि ः कामता प्रसाद सड़ैया
ज्वाला को ज्योति में बदलने वाला व्यक्ति

वीरेन्द्र जैन
       सड़ैया जी के देहावसान की हतप्रभ कर देने वाली दुखद खबर जिस दिन और समय मिली तब तक बहुत देर हो चुकी थी और था उनके अंतिम दर्शन के लिए भोपाल से इन्दरगढ तक पहुँचना सम्भव नहीं था। मन में एक कसक बनी रही।
       सड़ैयाजी मुझ से वरिष्ठ थे और उनके छोटे भाई चन्द्र प्रकाश मेरे सहपाठी थे किंतु जब से मेरी साहित्यिक रुचि से वे परिचित हुये थे तब से वे मेरे बड़े भाई समान मित्र जैसे हो गये थे। उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि मुझे याद नहीं पड़ता कि मैंने उन्हें कभी नाराज होते या किसी का अपमान करते देखा हो। उन्हें अन्य दतियावासियों की तरह किसी की कमजोरियों का उपहास करते भी नहीं देखा। उनके स्वभाव से इतनी भलमनसाहत प्रकट होती थी कि कई बार बड़ी कोफ्त होती थी क्योंकि भरोसा ही नहीं होता था कि इस दौर में कोई ऐसा भी हो सकता है जो बुरे से बुरे को भी बुरा नहीं कहता हो। अप्रिय व्यक्तियों के प्रति भी उनके इस ठंडेपन से परेशान होकर मैं कह देता था कि आपके व्यवहार में नकलीपन झलकता है, पर वे न तो इसका बुरा मानते थे और न ही गुस्सा ही करते थे। मैंने उनसे एक बार कहा था कि आप भी मेरी तरह सीता किशोर जी के मुरीद हैं और लगता है कि वह पंक्ति उन्होंने आपके लिए ही लिखी है।
                “कौन सी? उन्होंने तुरंत पूछा था क्योंकि वे कविताओं पर मंत्रों की तरह श्रद्धा रखते थे।
       वही कि कम से कम इस सड़ाँध को सड़ाँध तो कहो मैंने कहा था और वे हँस कर टाल गये थे।
       बहुत निकट जाने पर पता चला था कि उनके अन्दर एक आग भरी है। इन्दरगढ के पास ही उनका गाँव था, और वे छात्र जीवन में लोकप्रिय सक्रिय छात्र नेता थे। उसी गाँव की स्थानीय राजनीतिक शत्रुता ने उनके घर पर डकैती डलवा दी थी। उनके परिवारियों पर प्राण घातक हमले हुये थे, और उनके परिवार को गाँव छोड़ना पड़ा था। इतना ही नहीं पिछली सदी के छठवें दशक की प्रभावी राजनीतिक शक्तियों ने उक्त अपराध के चिन्हित अपराधियों को पनाह दी थी क्योंकि छात्र नेता श्री सड़ैया उनका साथ नहीं दे रहे थे। इस अन्याय और अपमानबोध को उस क्षेत्र की परम्परा के अनुसार प्रतिहिंसा में बदल जाना चाहिए था किंतु श्री राधा रमण वैद्य से प्रशिक्षित सीताकिशोर और शिवचरन पाठक जैसे साथियों के प्रभाव ने उनके आक्रोश को साहित्य में रूपांतरित किया। उन्होंने उस ज्वाला को ज्योति बनाया। अब वे समझ गये थे कि यह व्यक्ति का नहीं व्यवस्था का दोष है और व्यवस्था को ही बदलना चाहिए। व्यक्तियों के प्रति उनके गुस्से की दिशा बदल चुकी थी। वे व्यवस्था बदलने के रास्ते की तलाश में थे और उन्हें हर वह व्यक्ति पसन्द था जो व्यवस्था बदलने की कोई बात करता था। दुर्भाग्य से सामंती व्यवस्था से मुक्त न हो पाने वाले इस क्षेत्र में व्यवस्था परिवर्तन का कोई प्रभावी आन्दोलन या संस्था नहीं थी इसलिए वे किसी से बँध नहीं सके। कुछ समय उन्होंने ग्वालियर में भी बिताया था और मुकुट बिहारी सरोज के निकट रहे। कभी वे विनोबा के सर्वोदय के प्रभाव में रहे तो कभी सुब्बाराव के साथ जुड़े। गाँधीवाद उन्हें अनुकूल लगता था इसलिए वे उसके पक्षधर थे। वे परम्पराओं से भी निरंतर जुड़े रहे और पूजा पाठ आदि के प्रति भी विरक्त नहीं हो सके भले ही हम लोगों के सामने उस पर बातचीत से बचते रहे हों। एक दौर में श्री राम उनका तकिया कलाम हो गया था और किसी भी टिप्पणी के लिए या टिप्पणी करने से बचने के लिए वे श्री राम का उद्घोष इस अन्दाज़ में करते थे कि हम सब लोगों के चेहरों पर मुस्कराहट खेल जाती थी। पर जब जय श्री राम को एक साम्प्रदायिक संगठन ने उत्तेजक नारे के रूप में बदल दिया तो वे श्री राम की जगह श्री कृष्ण कहने लगे थे, जो इस बात का प्रतीक था कि वे जड़ नहीं थे और समय अनुसार बदल सकते थे। प्रो. केबीएल पांडे जी के मार्गदर्शन में वे प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े और उसके जिला सचिव रहे तथा 1972 के एतिहासिक बाँदा सम्मेलन से लेकर अनेक राष्ट्रीय व प्रादेशिक सम्मेलनों, लेखक सम्मेलनों में भाग लिया।
       अपने सभी परिचितों, मित्रों, के लिए वे निकट के परिवारीजन की तरह थे और वैसे ही उनकी चिंता भी करते थे। बच्चों की शिक्षा की चिंता, उनके रोजगार की चिंता, शादी व्याह की चिंता, उनकी अच्छी बुरी आदतों की चिंता वे घर के बुजुर्ग की तरह करते थे पर कभी भी अपनी वरिष्ठता का दबाव नहीं बनाते थे।
       कविता उनका एकमात्र शौक था जिसके लिए वे किसी भी समय, किसी भी मौसम में, कितनी भी दूर जा सकते थे। जो कविताएं उन्हें पसन्द थीं वे उन्हें कंठस्थ थीं और वे उन्हें जीवन दर्शन की तरह मुग्धभाव से सुनाते थे। उन्हें प्रसाद, निराला, भवानी प्रसाद मिश्र, नीरज, जितना पसन्द थे उतने ही मुकुट बिहारी सरोज, रंग, चन्द्रकांत देवताले, सीताकिशोर खरे, आदि भी पसन्द थे। अपनी कविताएं सुनाने के लिए कभी दुराग्रह नहीं करते थे पर यदि सच्चे मन से आग्रह किया जाता था तो नखरे भी नहीं करते थे। उनकी कविता का कलेवर उनकी रुचियों के अनुसार परम्परावादी और प्रगतिशील कविता से मिलकर बना है। श्री राधा रमण वैद्य के स्कूल से निकले डा. सीता किशोर खरे, वेद शर्मा, डा, श्याम बिहारी, डा. कामिनी, के साथ सड़ैयाजी भी कविता जगत से जुड़े और प्रशिक्षित हुये। बाद में डा. केबीएल पांडे, डा. रत्नेश, डा. शफी हिदायत कुरैशी, वकार सिद्दीकी, अलमदार ज़ैदी, राज नारायण बौहरे, राम भरोसे मिश्र, जगदीश सुहाने, आदि के साथ चले विमर्श से निरंतर मँजते और माँजते चले गये। पाठक मंच के अंतर्गत आने वाली पुस्तकों के वे नियमित पाठक थे और व्यवस्था अनुसार उन पुस्तकों पर टिप्पणी भी करते थे। हम लोगों को यह रोचक लगता था कि वे हमेशा उन पुस्तकों के अच्छे पक्ष का ही चयन करके उनकी प्रशंसा करते थे जबकि हम लोग चाहते थे कि उन्हें उन पुस्तकों की कमियों पर भी निगाह डालना चाहिए। हम लोगों की यह इच्छा कभी पूरी नहीं हुयी क्योंकि वे बुरा देखने के लिए कभी तैयार ही नहीं होते थे।
       निरंतर घटती आत्मीयताओं की इस दुनिया में किसी ऐसे आत्मीय व्यक्ति का जाना जीवन में कितनी कमी पैदा करता है इसे आज महसूस कर रहा हूँ। उनके निकट के मित्र अलमदार ज़ैदी जो सेवानिवृत्ति के बाद और अधिक निकट हो गये थे, उनकी मृत्यु से कुछ दिन पहले ही दुनिया छोड़ गये और पीछे से सड़ैयाजी भी उनसे मिलने चले गये। प्रसिद्ध शायर इज़लाल मज़ीद का शे’र है-
कोई मरने से मर नहीं जाता
देखना वो यहीं कहीं होगा
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629


1 टिप्पणी:

  1. मेरे पिता ने छोटे संसाधन में अच्छे समाज के लिए भरसक कोशिश की। श्री वीरेऍद्र जैन ने बहुत अच्छा लिखा है धन्यवाद
    AMIT SARAIYA
    09532688081

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