गुरुवार, मार्च 13, 2014

1984 और 2002, कुछ विचारणीय तथ्य

1984 और 2002, कुछ विचारणीय तथ्य  
वीरेन्द्र जैन
       1984 में देश की प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गान्धी की उनके ही दो सिख सुरक्षा गार्डों द्वारा धोखे से की गयी हत्या के बाद उत्तेजित लोगों द्वारा सिखों का नरसंहार हुआ था जिसमें लगभग तीन हजार सिखों की हत्या हुयी थी। एक सूचना के अनुसार अभी भी दिल्ली गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी 2200 विधवाओं को पैंसन दे रही है। यह घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद थी। स्वतंत्र देश के इतिहास में श्रीमती गान्धी सर्वाधिक लोकप्रिय और विवादस्पद प्रधानमंत्री रही हैं जिनके कार्यकाल में एक ओर देश खाद्य उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हुआ, हमारे सबसे सक्रिय शत्रु देश के विभाजित होने से सुरक्षा व्यवस्था में कूटनीतिक लाभ मिला, पब्लिक सेक्टर का विकास हुआ, बैंकों व बीमा कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण हुआ, राजाओं के प्रिवी पर्स व विशेष अधिकारों की समाप्ति हुयी। दूसरी ओर उन्हीं के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ पैदा हुये आन्दोलन के बाद जयप्रकाश नारायण जी ने सम्पूर्ण क्रंति का नारा दिया, इमरजैंसी लगायी गयी, कांग्रेस का आंतरिक लोकतंत्र कमजोर पड़ा व पूरा संगठन अस्थायी समितियों के द्वारा संचालित होने लगा। उन्हीं के कार्यकाल में इंगलेंड व अमेरिका में रह रहे प्रवासियों की शह पर पंजाब में अलगाववादी आन्दोलन प्रारम्भ हुआ जिससे कश्मीर के अलगाववादियों को पनपने का मौका मिला। वे अपने अंतिम दिनों में विश्व के प्रमुख देशों के नेताओं में सबसे वरिष्ठ नेता थीं तथा अमेरिका इंगलेंड समेत कई साम्राज्यवादी देश उन्हें अपदस्थ किये जाने की राह तक रहे थे। उनकी मृत्यु ने देश में एक बड़ा शून्य पैदा किया था क्योंकि उस समय कोई दूसरा नेता उनके समतुल्य लोकप्रिय नहीं था। ऐसे नेता की मृत्यु पर देशव्यापी अशांति और इस अशांति का लाभ उठाने के लिए असामाजिक अवसरवादी तत्वों के सक्रिय हो जाने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता था, इसलिए सुरक्षा बलों को भी तुरंत दूर दूर तक पदस्थ कर दिया गया था।
       उल्लेखनीय है कि देश तोड़क खालिस्तानी आन्दोलन को रोकने के प्रयास में किये गये आपरेशन ब्लूस्टार के बाद पंजाब में खालिस्तान समर्थकों द्वारा सिखों और हिन्दुओं के बीच गहरी खाई पैदा करने व सैकड़ों बेकसूर हिन्दुओं को मार कर तनाव बढाने की कोशिश की गयी थी। इसका परिणाम यह हुआ था कि हिन्दुओं की राजनीति करने वाले जो संगठन सदैव कांग्रेस का विरोध करते थे वे भी आपरेशन ब्लू स्टार के बाद कांग्रेस के पक्ष में खड़े हो गये थे। यही कारण था कि श्रीमती गान्धी की हत्या के बाद हुये 1984-85 के आम चुनाव में कांग्रेस ने दिल्ली की सातों सीटों समेत देश भर में रिकार्ड विजय प्राप्त की थी व हिन्दुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा को पूरे देश में कुल दो सीटों तक सिमिट जाना पड़ा था। कहा जाता है संघ से सहानिभूति रखने वाले लोगों ने भी कांग्रेस का समर्थन किया था।  
       2002 में गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रैस की बोगी संख्या 6 में आगजनी की घटना हुयी थी जिसमें अयोध्या से लौट रहे दो कारसेवकों समेत 59 यात्री जल गये थे। बाद में इस घटना की प्रतिक्रिया के बहाने  पूरे गुजरात राज्य में मुसलमानों का नरसंहार हुआ था और तीन हजार लोग नहीं मिले जिसमें से लगभग नौ सौ लाशों के पोस्टमार्टम का रिकार्ड है व शेष को लापता बता कर उनके बारे में सरकारी आंकड़े कुछ नहीं बोलते। इस घटनाक्रम में भी करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति लूटी व जलायी गयी थी। इस नरसंहार की भी पूरी दुनिया में व्यापक निन्दा हुयी थी और भारत को एक जंगली राज्य होने के आरोप भी सहने पड़े थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तक को कहना पड़ा था कि अब मैं कौन सा मुँह लेकर विदेश जाऊंगा। उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी को राजधर्म निभाने की सलाह देना पड़ी थी। अगर जसवंत सिंह के कथन को सही माना जाये तो घटना से व्यथित वाजपेयी अपना स्तीफा देने जा रहे थे जिससे श्री सिंह ने ही रोका था। इसी हिंसा के कारण अमेरिका और इंगलेंड ने बाद में गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी को वीसा देने लायक नहीं समझा था।
       राजनीतिक रूप से जब भी कांग्रेस द्वारा गुजरात के नरसंहार की निन्दा की जाती रही है तो संघ परिवार के लोग अपनी सफाई देने के बजाय 1984 में दिल्ली की सिख विरोधी हिंसा से प्रतियोगिता दर्शाने लगते हैं। यद्यपि यह सच है कि प्रधानमंत्री इन्दिरा गान्धी की हत्या के बाद दिल्ली में हुयी सिख विरोधी हिंसा भी भयानक थी किंतु दोनों हिंसक घटनाओं का चरित्र एक जैसा नहीं है। 1984 की सिख विरोधी हिंसा देश के शिखरतम नेतृत्व पर धोखे से किये गये हमले की प्रतिक्रिया थी जिसे परोक्ष में देश पर किया गया हमला माना गया। इस मान्यता का कारण यह था क्योंकि यह हत्या राष्ट्रीय एकता की रक्षा करने के लिए किये गये आपरेशन ब्लूस्टार के विरोध में की गयी कार्यवाही की प्रतिक्रिया में योजना बना कर की गयी थी। भले ही दिल्ली में इस हिंसा में मरने वालों की संख्या सबसे अधिक थी किंतु यह हिंसा कानपुर मुरैना समेत देश के दूसरे अनेक हिस्सों में भी घटी थी, जो इस बात का प्रमाण थी कि यह हिंसा असंगठित और सहजस्फूर्त थी। इस पर शीघ्र ही काबू पा लिया गया था। उल्लेखनीय है कि उस समय देश के राष्ट्रपति के रूप में एक सिख ज्ञानी जैल सिंह पदस्थ थे व गृहमंत्री के रूप में सरदार बूटा सिंह पदस्थ थे। खालिस्तानी आन्दोलन का दुष्प्रचार रोकने के लिए उन दिनों कांग्रेस ने अपनी सभी राज्य सरकारों और कांग्रेस समितियों में यथा सम्भव सिख समुदाय को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया था। दूसरी ओर 2002 में गुजरात में हुये नरसंहार पर सबसे बड़ा आरोप यह लगता है कि उसे तत्कालीन भाजपा सरकार के मंत्रियों ने न केवल प्रोत्साहित किया था अपितु अपराधियों की मदद करते हुए उनको संरक्षण भी दिया था। भले ही दिल्ली की हिंसा में कांग्रेस के कुछ नेता सीधे तौर पर ज़िम्मेवार माने गये हैं किंतु इसे कांग्रेस संगठन की ओर से न तो कोई प्रोत्साहन दिया गया था और न ही संरक्षण दिया गया था। इसके विपरीत गुजरात में तो जानबूझ कर न केवल आरोपियों को संरक्षण दिया गया अपितु उन्हें मंत्री पद देकर बल भी प्रदान किया गया। एक स्टिंग आपरेशन में खुलासा हुआ कि किस तरह से सरकारी वकील ने आरोपियों की मदद करके उन्हें सम्भावित दण्ड से बचाने में मदद की। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और अब भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी ने इस घटना के बाद लगातार पीड़ितों के साथ भेदभाव किया। गोधरा में मारे गये लोगों अर्थात गैर मुस्लिमों को दो लाख का मुआवजा घोषित करते हुए शेष गुजरात में मारे गये लोगों को जिनमें शतप्रतिशत मुसलमान थे को एक लाख मुआवजा घोषित किया। आज बारह साल बाद भी हजारों की संख्या में पीड़ित मुसलमान सुविधाविहीन कैम्पों में रह रहे हैं और सरकार यथावत उदासीन है, जबकि दिल्ली में समुचित मुआवजा ही नहीं दिया गया अपितु पुनर्वास की अनेक योजनाएं लागू की गयीं। कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं ने क्षमा मांगी और उसके बाद सिखों और गैर सिखों के बीच कोई तनाव नहीं देखा गया।  
       1984 की सिख विरोधी हिंसा की गम्भीरता को स्वीकारते हुये यह देखना जरूरी है संघ परिवार से जन्मी भाजपा का चरित्र ही साम्प्रदायिक है और देश भर में शाखाएं लगाकर अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत का पाठ निरंतर पढाया जाता है। धर्म के नाम पर उनके आनुषांगिक संगठन केवल विवादास्पद धर्मस्थलों पर विवाद भड़काने का धर्म निबाहते हैं। गुजरात से पहले बाबरी मस्ज़िद राम जन्मभूमि मन्दिर के नाम पर देश भर में रथ घुमा कर दंगे भड़काये गये थे। सोनिया गान्धी के राजनीति में सक्रिय होते ही धर्म परिवर्तन रोकने के बहाने चर्चों और पादरियों पर हमले करवाये जाने लगे थे ताकि सोनिया गान्धी को ईसाई प्रचारित कर नया राजनीतिक ध्रुवीकरण किया जा सके। उल्लेखनीय है कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रैस की बोगी संख्या6 में हुयी जिस आगजनी को अयोध्या से लौटने वाले कारसेवकों पर हमला बता साम्प्रदायिक आधार पर बहुसंख्यक लोगों की सहानिभूति जुटाने की कोशिश की गयी थी उसमें 59 मृतकों में कारसेवकों की संख्या कुल दो थी। यद्यपि किसी भी निर्दोष व्यक्ति की हत्या गम्भीर दुख और क्रोध का विषय होता है किंतु सच सामने आने से घटना के मूल चरित्र में बदलाव हो जाता है। उससे साफ हो जाता है कि बोगी संख्या6 में हुयी आगजनी का चरित्र साम्प्रदायिक नहीं था और आँख बन्द करके पूरे गुजरात में मुसलमानों पर हमला कर देने वाले दुष्प्रचार से भ्रमित थे व सरकार में बैठ कर उनकी मदद करने वाले अपनी राजनीतिक कुटिलिता से यह सब करवा रहे थे। पिछले दिनों नकली वीडियो अपलोड करके मुज़फ्फरनगर में दंगा भड़काने वाले विधायकों का नरेन्द्र मोदी द्वारा किया गया सार्वजनिक अभिनन्दन इनके चरित्र का याज़ा उदाहरण है।
       यह सच है कि भाजपा 1984 अलगाववादी खालिस्तानी आन्दोलन के साथ नहीं थी और सिखों को हिन्दू मानने वाली यह पार्टी हिन्दूजाति में बिखराव की आशंका में सिख उग्रवादियों के खिलाफ थी। परिणाम स्वरूप भाजपा का समर्थक वर्ग भी श्रीमती गान्धी की हत्या के बाद सिखों के खिलाफ हुयी हिंसा में सिखों की रक्षा में सक्रिय नहीं हुआ। उल्लेखनीय है कि इतनी व्यापक हिंसा और आगजनी के बाद भी किसी भाजपा समर्थक की हिंसा और आग रोकने की कोशिश में उंगलियां भी नहीं झुलसीं। जब दिल्ली में भाजपा की राज्य सरकारें रहीं तब भी उन्होंने 1984 की हिंसा की जाँच के कोई सार्थक कदम नहीं उठाये।
       स्मरणीय है कि भगत सिंह ने अदालत में कहा था कि हिंसा के पीछे का उद्देश्य महत्वपूर्ण है अन्यथा मौत की सजा देने वाला न्यायाधीश भी हत्या के लिए जिम्मेदार होगा। दिल्ली और गुजरात की हिंसा को देखते समय भी हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों का चरित्र और उनका इतिहास ध्यान में रखना होगा।
वीरेन्द्र जैन
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1 टिप्पणी:

  1. जैन साब !!!
    ज़रा पता तो लगाइये कि गुजरात सरकार कितनी विधवाओं को पेंशन दे रही है या विहिप और संघ गोधरा अग्निकांड में मारे गए कितने कारसेवकों की विधवाओं/माओं को पेंशन दे रहा है।

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