मंगलवार, अगस्त 25, 2020

निबन्ध एक उत्तर भारतीय ड्रामे का समापन


निबन्ध
एक उत्तर भारतीय ड्रामे का समापन
How to deal with post-festival waste – The Earthbound Report
वीरेन्द्र जैन
      क्लाईमेक्स तक उठाया गया झाग तलछट में बाकी कुछ मैल और गन्दा पानी छोड़ कर बैठ चुका है नशा उतरने के बाद वाली स्थिति जैसे सूजे हुये चेहरों पर एक बासीपन सा छा गया है।
       दीवाली के त्योहार का समापन हो गया है।
            जिस कचरे को घरों के कोने कोने से बुहार कर सड़क पर फेंक दिया गया था और जिसे समेटने में नगर निगम, या नगर पालिकाओं में कार्यरत एक खास जाति के लोग त्योहर की तिथि के  दस दिनों पहले से निरंतर जुटे हुये थे वे अब उन्हीं मार्गों पर नया कचरा देख रहे हैं। एक ऐसा कचरा जिसमें धू मिट्टी तो कम है पर पटाखों की बारूद से चिन्दी चिन्दी हुये कागजों की भरमार है। इसमें मिठाई के भाव तौले हुये डिब्बों के गत्ते भी शामिल हैं। नये नये इलोक्ट्रोनिक आइटमों को सम्हालने के लिए प्रयुक्त हुये थर्मोकौल के सांचे हैं, बेचने वाली दुकान या सामग्री के ब्रांड नेम मुद्रित पालिथिन थैले हैं जो प्रतिबन्ध के बाद भी धड़ल्ले से कानून का धुआँ उड़ाते हुए उपयोग में रहे हैंतेल सोख कर जल चुके मिट्टी के कुछ दिये हैं, बच्चों वाले घरों में टूट फूट गयी कच्ची मिट्टी और कच्चे रंगों से पुती ग्वालिनें हैं। अपनी हैसियत को बढा-चढा कर दिखाने के लिए मेहमानों को पिलायी जा चुकी अच्छी पैकिंग में बन्द अंग्रेजी शराब की खाली बोतलें हैं। एक आवेशित उत्साह में पैदा किये गये कचरे की और भी नई नई किस्में हैं जिन्हें कचरे में से बीन कर कबाड़ वाले को बेचने वाले बच्चे अधिक जानते हैं हमने त्योहार के नाम पर पिछले दिनों जो कुछ  किया है उसके लिए तो जीसस का वह अंतिम वचन याद आता है जिसमें उन्होंने कहा था कि - हे प्रभो, इन्हें माफ कर देना, ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।
            पिछले एक महीने से चारों ओर जोर शोर से यह फैलाया जा रहा था कि खुशी का त्योहार रहा है। खुशी, खुशी, खुशी, खुशी खुशी हिटलर के प्रचार मंत्री गोयेबिल्स के झूठ को फैलाने की तरकीब का अनुशरण करके  फैलायी जा रही थी। केवल खुशी खुशी जैसे कि और कुछ हो ही नहीं। नये विदेशी बाजार के वाहक प्रिंट और दृश्य मीडिया ने एक आभासी खुशी की बाढ ला दी थी और उसमें सब डिग्री धारी मध्यम वर्गीय कुशिक्षित डूब गये थे। खुशी का यह दुष्प्रचार अपने दुखों को तलाशने और सहलाने का अवसर ही नहीं दे रहा था। परम्परा से जोड़ कर बाजार ने एक सामूहिक सम्मोहन का जाल डाल दिया था। बहुत सारे लोगों को तो पता ही नहीं है कि खुशी कैसी होती है, इसलिए उसे चीख चीख कर बताया जा रहा था तथा दुखी आदमी को भी उसमें खींचा जा रहा था। टीवी के सारे चैनल और एफ एम बैंड की महिला उदघोषिकाएं अपनी खनकती आवाज में बता रही थीं कि [अबे अन्धो] चारों ओर खुशी उल्लास का वातावरण छाया हुआ है। दूसरों, तीसरों की तरह तू भी उठ और जेब में डेबिट क्रेडिट कार्ड डाल अपने घर के लिए नये से नया मँहगे से मँहगा चमकीला पेंट लेकर आ। इस पेंट किये हुए घर को चीन से आयी हुयी सजावटी सामग्री से सजा। कभी दीपों के कारण इस त्योहार का नाम दीपावली पड़ा था, पर अब उसकी जगह बिजली की झालरों और दूसरे रंग बिरंगे विद्युत उपकरणों से सजा। प्लास्टिक के बन्दनवार, प्लास्टिक के गमलों में प्लास्टिक के फूल लगे प्लास्टिक के पौधे सजा। मँहगी साड़ियां, सूटों, और बच्चों के कपड़ों से पूरे परिवार को तैयार कर। सौन्दर्य प्रसाधनों से भरपाई [मेक-अप] करके अपनी त्वचा, केश आदि को मानक सौन्दर्य में ढाल ले। परम्परागत हाजोड़ने की मुद्रा से लेकर हाथ मिलाने और गले मिलने के साथ एक झूठी मुस्कान ओढ ले। उपहार दे, उपहार पा। उपहार के बारे में जो तुम्हें नहीं पता है उसे चैनल वाले बताने में लगे हुए हैं। नये से नये माडल की कारें, बाइकें, स्कूटर, छरहरे होते जाते टीवी, कम्प्यूटर, लैपटाप, आईपैड, टूजी थ्रीजी, फोर जी, सोने चाँदी के गहने, बगैरह बगैरह। ये किश्तों में भुगतान की सुविधा के साथ साथ बैंक ऋण से भी उपलब्ध हैं। तू हो या हो पर तुझे ये सामान खरीदकर खुश दिखना है, ताकि तुम्हारा प्रतियोगी पड़ोसी यह नहीं कह सके कि वो तुम से ज्यादा खुश है।
            जिनको ये सब कुछ करने में जेब परेशान करती हो उन्हें भी करना है। इस अवसर पर तुम्हारा दायित्व है कि खुश दिखो।
            खुशी कभी स्वाभाविक होती थी, और तिजोरी या बक्से में आयी रकम , मौसम, फसल, या स्वास्थ के आधार पर व्यक्त होती थी, उसे। अब एक सभ्यता अर्थात झूठ का हिस्सा बना दिया गया है। कभी लोग खुशी में गा उठते थे या नाचने लगते थे, पर अब महौल बदल गया है। अब गाने के लिए गाने वाली मशीनें हैं जो हमारे दैनिन्दन उपयोग की वस्तुओं तक में फिट हो गयी हैं। हमारे भजनों से लेकर मण्डलियों तक को इन मशीनों ने स्थगित कर दिया है। मन्दिरों में मशीनें लगा दी गयी हैं जो गाती रहती हैं जिससे पता ही नहीं चलता कि हमारे अन्दर भक्तिभाव है या नहीं। इनके चक्कर में हम गाना भूल गये हैं। बहुत सारी नकली हँसी खुशी में हम असली खुश होना ही भूल गये हैं। पूजा पाठ का तय समय और महूर्त होना एक बात थी पर खुश होने का समय तय कर देना बिल्कुल ही दूसरा मामला है।
            जिस तरह नाटक के खत्म होते ही सब अपनी अपनी पोषाकें उतार कर रख देते हैं, ठीक उसी तरह खुशी के मुखौटे उतार कर रख दिये गये हैं। भ्रष्ट नेता, रिश्वतखोर अधिकारी, कमीशनबाज ठेकेदार, और टैक्सचोर व्यापारियों की योजना में इस खुशी का बजट होता है। पर जो लोग इस नकल में कूद पड़ते हैं, उनके झल्लाने चिड़चिड़ाने  का भी समय है। लाखों लोग जबरदस्ती ट्रैनों, बसों, में ठुसे यहाँ से वहाँ होते हैं। ऊपर से पैसे देकर भी गिड़गिड़ा कर जगह पाते हैं और समय से वापिस पँहुचने के लिए इसी प्रक्रिया को दुहराते हैं।
            यह नकलीपन उत्तरोत्तर वृद्धि पर है और एक भी हाथ अस्वीकृति में नहीं उठ रहा। कोई नहीं कह रहा कि हे चैनलो, हमें मत सिखाओ कि हमें अपनी परम्परा को कैसे निभाना है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629


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