मंगलवार, सितंबर 15, 2020

षड़यंत्रकारी राजनीति के मुकाबले आक्रामक राजनीति

 

षड़यंत्रकारी राजनीति के मुकाबले आक्रामक राजनीति 


वीरेन्द्र जैन

इस समय पूरा देश कुछ मीडिया चैनलों द्वारा प्रस्तुत राजनैतिक दंगल देख रहा है। पिछले तीस सालों में ऐसे दृश्य देखने को नहीं मिले थे जैसे इन दिनों देखे जा रहे हैं।

आजादी मिलने पर स्वतंत्रता आन्दोलन की सबसे बड़ी अहिंसक फौज के रूप में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस देशवासियों के सामने थी और उसे सरकार बनाने का पूरा नैतिक अधिकार था। दूसरे सबसे बड़े दल के रूप में कम्युनिष्ट पार्टी थी जो रूस चीन से लेकर पूरी दुनिया में चर्चित हो रहे कम्युनिष्ट आन्दोलनों की प्रतिनिधि के रूप में स्वाभाविक विपक्ष थी। इसी दौरान देश ने बंटवारे, साम्प्रदायिक हिंसा और गाँधीजी की हत्या के रूप में बड़े बड़े हादसे देख लिये थे। गाँधीजी की हत्या के बाद अपने ऊपर लगे प्रतिबन्ध को हटवाने के लिए आर एस एस ने पटेल को लिखित वादा किया था कि वे सामाजिक संगठन के रूप में ही काम करेंगे और चुनावों में भाग नहीं लेंगे। बाद में सरदार पटेल के निधन के बाद संघ ने अपने चार स्वयंसेवक भेज कर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में भारतीय जनसंघ की स्थापना करायी थी। संघ से भेजे गये लोगों में अटल बिहारी बाजपेयी और लालकृष्ण अडवाणी प्रमुख थे। 1951 से 1971 तक  इस दल को 3% से लेकर 6% तक वोट मिलते रहे जबकि 1977 में इन्होंने अपनी पार्टी का विलय जनता पार्टी में कर दिया और सरकार बनने पर कहीं अधिक प्रतिशत में सत्ता में भागीदारी प्राप्त की। बाद में 1980 में इन्हीं के पूरे मन से विलय न करने व इनकी समानांतर रूप से संघ की सदस्यता बनाये रखने के आरोपों के कारण ही पहली बार बनी गैरकांग्रेसी जनता पार्टी सरकार टूटी और इन्हें जैसे गये थे वैसे ही वापिस होना पड़ा। बाद में इन्होंने ही दल का नाम बदल कर भारतीय जनता पार्टी रख लिया, जिसके कार्यक्रम और घोषणापत्र वही रहे जो जनसंघ के थे। उस समय से ही यह स्पष्ट हो गया था कि यह संगठन सत्ता पाने के लिए कुछ भी कर सकता है। ये लोग ही देश में दलबदल को प्रोत्साहित करने वालों और धन के सहारे वोट प्राप्त करने वालों की दुष्प्रवृत्ति के जन्मदाता के रूप में अंकित हुये हैं, जो बाद में दूसरे दलों में भी फैली। ये पार्टी व्यापारियों, उद्योगपतियों के पक्ष में खड़ी होने वाली पार्टी के रूप में जानी जाती थी इसलिए उसे धन की कमी कभी नहीं रही। बाद में तो राज छिन जाने से नाराज पूर्व राजा रानियों का भी समर्थन उसे मिलने लगा क्योंकि 1969 में कम्युनिष्टों के दबाव में इन्दिरा गाँधी ने पूर्व राजा रानियों के विशेष अधिकार व प्रिवी पर्स को खत्म कर दिया था।

साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिकता फैलाना दो अलग अलग बातें हैं। साम्प्रदायिकता तो अपने परम्परागत धर्म को सर्वश्रेष्ठ और दूसरे के धर्म को गलत मानने के भाव के कारण पैदा हो जाती है किंतु इसी भाव में जानबूझ कर गलत बातें डालकर या सूत्रों की गलत व्याख्या कर के, अपने निहित स्वार्थों के लिए साम्प्रदायिकता फैलायी जाती है और हिंसा के लिए संसाधन उपलब्ध कराये जाते हैं। संघ परिवार का यह विश्वास रहा है कि लोकतंत्र में चुनाव सिर गिनने से होते हैं और अगर चुनावों को धार्मिक आधार पर समाज को बांट कर कराये जायेंगे तो बहुसंख्यक धर्मावलम्बी ही चुनाव जीतेंगे। इसलिए देश की सत्ता पर अधिकार करने के लिए यह संस्था एक ओर तो राजतंत्र के इतिहास की गलत जानकारी व उसे अपने लक्ष्य के अनुसार व्याख्यायित करने का काम करती है, वहीं दूसरी ओर उन मुद्दों को तलाशती है जिनके आधार पर दो समाजों के बीच संघर्ष हो चुका हो या होने की सम्भावना हो। इसलिए समाजों के बीच समरसता और धर्मनिरपेक्षता की बात करने वालों को भी ये बराबर के दुश्मन मानते हैं। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जगायी गयी राष्ट्रभक्ति की भावना को भी ये एक काल्पनिक हिन्दूराष्ट्र से जोड़ कर इसका विदोहन करने का प्रयास करते हैं। वे ऊपर से शरीफ दिखते हैं और प्राकृतिक व निजी आपदाओं के समय अपने संगठन से साम्प्रदायिक आधार पर मदद करके अपना विस्तार करते हैं। देश के सबसे बड़े धार्मिक अल्पसंख्यक मुसलमान हैं जिनके खिलाफ होकर इनको अपना लक्ष्य आसानी से मिल जाता है क्योंकि वे सातसौ साल तक इस देश के शासक वर्ग में रहे हैं और उनके सत्ता संघर्ष को साम्प्रदायिक रूप देकर इन्हें आसानी से अपने संघर्ष की जगह मिल जाती है। मुसलमानों के कुछ नेताओं ने धर्म के आधार पर देश को विभाजित करा के इन्हें एक मजबूत आधार दे दिया है, जबकि पाकिस्तान से अधिक मुसलमान तो धर्म निरपेक्ष भारत में रह गये थे।

भारत में रह गये मुसलमान इनकी हरकतें देख कर रक्षात्मक रूप से साम्प्रदायिक होते गये और इसी आधार पर एकजुट हो उन्हें वोट करने लगे जो भाजपा को हरा रहा होता था। बिना राजनीतिक कर्म किये सत्तारूढ होती रही कांग्रेस के लिए ये एकजुट मुसलमान बड़ी पूंजी साबित हुये। दलितों के वोट बैंक से मिलकर कांग्रेस ने दशकों तक निर्बाध शासन किया जबकि संघ परिवार बिना शोर शराबे के अपना काम करता रहा व इतिहास एवं समाज को विकृत करता रहा।

किसी राजतंत्र की तरह अपना विशेष अधिकार समझने वाले काँग्रेसी सत्ताखोर होते गये। उन्होंने सत्ता के सहारे न केवल धन संचय किया अपितु चुनावी मुकाबलों में भाजपा के साथ धन के प्रयोग की प्रतियोगिता भी करने लगे। एक ओर सरकारें जनता से धन खींचती थीं तो दूसरी ओर ये सत्ताखोर सरकारी व्यवस्था में सेंधें लगा कर उस धन को चूसते रहते थे। क्रमशः वे विलासी होते गये, उन की सम्पत्ति बेतहाशा बढती रही और  रिश्तेदार लाभ के पदों को सुशोभित करते रहे। सुरक्षित वोटों के भरोसे कांग्रेसियों ने राजनीतिक विमर्श ही बन्द कर दिया। उनकी राजनीति अपने नेता के जयकारे तक सीमित हो गयी।

बाद में जब 1969 में श्रीमती गाँधी ने काँग्रेस में विभाजन का सामना किया और उन्हें बहुमत के लिए कम्युनिष्टों की जरूरत पढी तो दबाव में उन्होंने पूर्व राजाओं के प्रिवी पर्स और विशेष अधिकार बन्द कर दिये व 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इससे मिले व्यापक समर्थन के कारण उन्होंने कुछ लोकप्रिय नारे दिये और भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी की मदद से अपनी छवि निखारी। इससे दक्षिणपंथी विपक्ष एकदम से हमलावर हो गया। परिणामस्वरूप इमरजैंसी व संजय गाँधी के उभरने जैसे संकट सामने आये। संजय गाँधी ने इमरजैंसी में भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी को दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका तब उन्हें अपनी भूल समझ में आयी, जिसे उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार की और वाममोर्चे के हिस्से बने। काँग्रेस पहली बार केन्द्रीय सत्ता से बाहर हुयी पर 1980 में जनता ने जनता पार्टी के प्रयोग को ठुकरा दिया जिससे इन्दिरा गाँधी दोबारा सत्ता में आ गयीं। संजय गाँधी का एक दुर्घटना में निधन हुआ। दलितों ने अपनी अलग पार्टी बना ली और इमरजैंसी की ज्याद्तियों के कारण मुसलमान सशंकित हो गये थे, सीपीआई उससे अलग हो चुकी थी, ऐसे में अलगाववादी खालिस्तानी आन्दोलन हिंसक हो उठा। कांग्रेसजन, जो सत्ता में लूट को ही राजनीति मानने लगा था मुकाबला करने में असमर्थ साबित हुआ। कमजोर इन्दिरा गाँधी ने स्वर्ण मन्दिर में छुपे आतंकियों पर हमला करने का दुस्साहसिक फैसला लियी जिसके परिणाम स्वरूप मिले एक धोखे में उन्हें अपनी जान गंवाना पड़ी। उसके बाद सहानिभूति की लहर में काँग्रेस ने सीटें तो जीत लीं, किन्तु अपेक्षाकृत अनुभवहीन राजीव गाँधी को उनकी प्रकृति और रुचि के विरुद्ध प्रधानमंत्री पद सौंपना पड़ा। नेतृत्व की कमजोरी से नियंत्रण ढीला पड़ता रहा, क्षेत्रीय दल मजबूत होते गये। मौका देख कर उनके वित्तमंत्री व्हीपी सिंह ने टंगड़ी मार दी, बोफोर्स कांड का वबंडर खड़ा कर दिया गया। लिट्टे भारत के ही खिलाफ उठ कर खड़ा हो गया। शाहबानो के फैसले के खिलाफ एकजुट हुये मुसलमानों ने ब्लैकमेल कर फैसले को पलटने को मजबूर कर दिया। सरकार पलट गयी और कमजोर हो चुकी काँग्रेस का एक हिस्सा व्हीपी सिंह के साथ हो लिया क्योंकि उसे तो सत्ता चाहिए थी। मध्यावधि चुनाव हुये और इसी दौरान राजीव गाँधी की हत्या हो गयी। काँग्रेस नेतृत्व विहीन हो गयी शेष बचे काँग्रेसी दूसरे को नेता मानने के लिए तैयार नहीं थे।  सब को केक में से दूसरे से बड़ा हिस्सा चाहिए था।

यह वही समय था जब भाजपा ने मौका ताड़ लिया। वैसे तो उसके पास काँग्रेस की नीतियों से अलग कोई आकर्षक और बेहतर नीतियां थी ही नहीं सो उसने साम्प्रदायिकता का सहारा लियी और उसके लिए रामजन्म भूमि मन्दिर का भूमिगत मुद्दा उछाल दिया जगह जगह दंगे करा दिये, अडवाणी जी को एक डीसीएम टोयटा वाहन को रथ का रूप देकर घुमाना शुरू किया और योजनानुसार मुस्लिम बहुल इलाकों में उत्तेजक नारे लगवाते हुये खून खराबा करते गये। उसी समय से मीडिया की खरीद शुरू हो गयी और मनमुताबिक रिपोर्टें सामने आती रहीं। पूरा देश ही ध्रुवीकृत हो गया होता अगर व्हीपी सिंह समय से मंडल कमीशन का दांव नहीं खेल देते। केवल राम जन्मभूमि मुद्दे, व्यापारियों के धन, और संघ के संगठन के सहारे उन्होंने दो से दो सौ तक का सफर किया और अंततः अटलबिहारी की सरकार बनवा ही ली। असत्य, अर्धसत्य, तोड़ेमोड़े सत्य से सफेद झूठ तक व सिद्धांतहीन गठबन्धन से लेकर सांसदों, विधायकों की खरीद फरोख्त से लगातार सत्ता से जुड़े रहे। अपने खरीदे हुये मीडिया से वे अपने सारे खोटे सिक्के चलाते रहे। इस बीच काँग्रेस निरीह सी देखती रही उसने इनके किसी भी खतरनाक प्रयोग का विरोध नहीं किया अपितु छींका टूटने की प्रतीक्षा में टकटकी लगाये रही। जब छींका टूट गया तो जय जय बरना अघाये आलसी की तरह चुपचाप लेटे रहे अथवा आफर मिला तो दल बदल लिया। वह कैंसर के मरीज की तरह धीरे धीरे घुलती रही। बीच में जो मौके आये उसमें किसी काँग्रेसी के किसी प्रयास का कोई योगदान नहीं रहा। यूपीए की दो सरकारें बनने में भाजपा के प्रति जनता की नफरत का ही नकारात्मक योगदान रहा। किंतु भाजपा केन्द्र की मुख्यधारा की राजनीति में आ चुकी थी। यूपीए सरकारों के दौरान भी राजनीतिक एजेंडा उसी ने तय किया। 

इन दिनों महाराष्ट्र में घटित घटनाक्रम इतना ही है कि भाजपा ने जिस शिवसेना नामक शेर पर इतने लम्बे समय से सवारी की थी वही पलट कर सामने आ गया। अब ना तो इन्हें निगलते बन रहा था ना ही उगलते। सुशांत सिंह की मौत के मामले में इन्होंने एक षड़यंत्र के सहारे मुम्बई पुलिस और ठाकरे सरकार को कटघरे में खड़ा किया व सीबीआई और ईडी के साथ साथ एनसीबी को भी लगा दिया। पहले दो में मुँह की खायी तो तीसरी जाँच एजेंसी को मुख्य जाँच एजेंसी की तरह बीच में ले आया गया, जिसमे अपराध तो था किंतु देश भर में चलते रहने वाला अपराध था। उसके सहारे किसी विशेष राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। इस अपराध में इससे पहले कितने लोगों को सजा हुयी? जबकि छापों में जो माल बरामद होता है उसके आधार पर ना जाने कितने लाख लोग उसका सेवन करते होंगे। इसी काम में चर्चित होने को उतावली एक हीरोइन और एक टीवी एंकर को भी लगा दिया गया। वे सोच रहे थे कि लुंज पुंज जर्जर काँग्रेस की तरह शिवसेना पूंछ दबा कर बैठ जायेगी। किंतु उनकी सोच गलत निकली। उसने भले ही राजतंत्र के तानाशाहों की तरह व्यवहार किया किंतु देखना होगा कि दुश्मन कौन था व उसका इतिहास और चरित्र क्या रहा है। ये जैसे को तैसा का सन्देश किसी हीरोइन को नहीं अपितु एक षड़यंत्रकारी पार्टी को दिया गया है।

यह भूलने की बात नहीं है कि भाजपा परिवार के सारे प्रयोग लुंज पुंज काँग्रेस के काल में ही पलते रहे हैं जो ठीक तरह रक्षात्मक भी नहीं हुयी। यदि 1995 में तत्कालीन सरकार ने और कांग्रेस पार्टी ने गणेशजी की मूर्तियों को दूध पिलाने की ही ठीक से जाँच करा के कार्यवाही की होती तो अफवाहें फैलाने के षड़यंत्रों की इतना प्रसार न हो पाता। काँग्रेस ज़िन्दा तभी बच सकती है जब वह आक्रामक होकर काम करेगी। इसके लिए काँग्रेसियों को अपना चरित्र बदलना होगा। शिवसेना ने वही किया है।

वीरेन्द्र जैन

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