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रविवार, जुलाई 02, 2023

मेरे गुरु – जिनसे जीवन में सीखा

 

मेरे गुरु – जिनसे जीवन में सीखा

वीरेन्द्र जैन

गुरु पूर्णिमा, अपने गुरुओं को याद करने के दिन के रूप में जाना जाता है। वर्षों से लोगों को ऐसा करते हुए देख रहा हूं, जिसे देख कर लगता रहा है कि मुझे भी उन सब को याद करना चाहिए जिनसे मैंने जीवन में कुछ सीखा है। अब तक मैं यह मानता रहा हूं कि ऐसा करने का अधिकार केवल उन लोगों को है जो गुरुओं से सीख कर कुछ उल्लेखनीय काम कर चुके हैं। बिना कुछ महवपूर्ण किये अपने गुरुओं को याद करना उनकी क्षमता को कम करके बताना ही होगा। इसलिए इस स्मरण को मैं निजी दस्तावेज में दर्ज करने के लिए ही लिख रहा हूं, इसका कोई सार्वजनिक महत्व नहीं है [शायद] ।

जैसा कि परम्परावादी लोगों का होता है, वैसा मेरा कोई एक गुरु नहीं रहा जिस पर अपनी अच्छी बुरी निर्मिति का सारा बोझ डाल दिया जाये। यह शायद गुरुकुलों के जमाने की परम्परा रही हो जहाँ एक बार कच्चा माल डाल देने के बाद ढला हुआ माल ही बाहर निकलता होगा। आज के समय में हिन्दी का अध्यापक अलग होता है, गणित का अलग, खेलकूद का अलग तो विज्ञान का अलग। और ये भी कक्षा दर कक्षा बदलते रहते हैं। हमारे समय में फिल्में, नाटक, धार्मिक कथाएं, साहित्य, राजनीतिक आम सभाएं, कवि सम्मेलन भी कुछ ना कुछ सिखाने लगे थे, वही काम बाद में सैकड़ों चैनलों वाला टीवी और थ्रीजी,फोरजी मोबाइल, कम्प्यूटर और लेपटाप आदि करने लगे। बिना गुरू की पहचान के आन लाइन क्लासेज चलने लगे हैं, अब किसी बच्चे से यह नहीं पूछा जा सकता कि ये गन्दी आदतें तुम्हें किसने सिखायी हैं, तुम्हारे मम्मी-पापा या टीचर से शिकायत करेंगे।

“जैक आफ आल, मास्टर आफ नन “ जैसे लोगों में से एक मैं उन सब लोगों को याद करना चाहता हूं, जिन से कुछ सीखा। माता पिता तो सबके ही पहले गुरु होते ही हैं जिनसे हम प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करते हैं और पहली शिक्षा यह पाते हैं कि बिस्तर में पेशाब कर देना बुरी बात होती है, दूसरी यह कि दूध को बोतल या कटोरी चम्मच से पीना सीखना चाहिए। नंगे रहना बुरी बात होती है, इसलिए जल्दी से चड्डी पहिन लेना चाहिए। फिर कुछ ऐसा सीखते हैं जो बाद में झूठ साबित होता है, जैसे कि पढोगे लिखोगे तो बनोगे नबाब।

स्कूल में अक्षर ज्ञान से लेकर अंक ज्ञान तक विभिन्न कक्षाओं के भिन्न टीचर या ट्यूटर पढाते रहे हैं जिन्हें सरकार या घर के लोग वेतन अदा करते हैं, शायद इसी लिए किसी भी गुरुभक्त को इनके प्रति आभार व्यक्त करते नहीं देखा, सो मैं भी नहीं करूंगा। करना भी चाहूं तो उनके नम और चेहरा याद नहीं। जूनियर कक्षाओं तक कक्षा में जो पढता था वही परीक्षा में लिख कर पास हो जाता था। सर्व प्रथम आने जैसा भाव कभी मेरे मन में नहीं भरा गया, सो मैं आया भी नहीं। नवीं कक्षा से विज्ञान का विद्यार्थी हो गया था इसलिए पढाई में मेहनत करनी पड़ रही थी, कक्षा की पढाई से काम नहीं चल रहा था। दसवीं तक आते आते एक सामूहिक ट्यूटर श्री राम स्वरूप गोस्वामी जी के यहाँ पढने जाने लगा। वे हर तरह से देशी व्यक्ति थे, विज्ञान को बुन्देली भाषा में समझाते थे जो आसानी से समझ में आ जाती थी जिससे पढना अच्छा लगता था। डिवीजन तब भी सेकिंड ही रही क्योंकि और भी विषय थे और स्कूल के टीचर भी ट्यूशन करते थे व उसी के अनुसार नम्बर देते थे। कभी कभी किसी खाली क्लास को भरने के लिए एक लाल साफे वाले सरदार जी कक्षा लेने आ जाते थे जो अन्धविश्वासों के खिलाफ वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात करते थे जो बहुत अच्छी लगती थी। भूत प्रेतों और धार्मिक पाखंडों के खिलाफ उनके तर्क अच्छे लगते थे। उनका नाम तब भी पता नहीं था इसलिए अब याद न आना स्वाभाविक है। इसे दौरान हिन्दी के अध्यापक श्री राम रतन अवस्थी, श्री आर आर वैद्य और श्री घनश्याम कश्यप भी थे जो अध्यापन से इतर साहित्यिक सम्वाद से शिक्षित करते थे। चीन के साथ इसी दौर में सेमा विवाद हुआ और समारोहो में वीर रस की अनेक कविताओं से प्रेरित हुआ। इसी के प्रभाव में खुद भी लिखने की प्रेरणाएं मिलीं।

कालेज में आने के बाद फिजिक्स, कैमिस्ट्री, जूलौजी, बाटनी के विभिन्न प्रोफेसर्स रहे और सबने अपना कर्तव्य पूरा किया। मेडिकल में कुछ अंक कम होने के कारण प्रवेश न मिल पाने से निराश मैंने अपने सामान्य ज्ञान के आधार पर बीएससी किया और फिर अर्थशास्त्र में एम ए किया। इस पढाई में कोई गम्भीरता नहें थी। इसी दौरान आवारगी, बेरोजगारी, में राजनीतिक सम्वाद और सामाजिक विषयों पर बहस का चश्का लगा। एक बोहेमियन जिन्दगी जीने का इरादा पैदा हुआ। संयोग से इसी दौरान मैंने रजनीश को पढना शुरू कर दिया था जो बहुत भा रहे थे। चाय के होटल हमारे जैसे लोगों के अड्डे थे जिसमें एक वरिष्ठ अध्यापक श्री वंशीधर सक्सेना से मित्रता हुयी जो पहले से ही वैसा जीवन जी रहे थे जैसी प्रेरणा रजनीश साहित्य से मिल रही थी\ उम्र के अंतर के बाबजूद वे मित्र बन गये थे और रजनीश को पढने वाली पूरी मित्र मण्डली उन्हें गुरूजी मानने लगी थी। उनके परम्परा विरोधी विचार और आचरण हमें बहुत भाता था। वे अपने हम उम्रों और सहकर्मियों से अलग युवाओं के मण्डली के गुरु के रूप में जाने जाने लगे थे। उनके जीवन भर उन्हें हमारे गुरु के रूप में सम्मान मिला। वे अभी भी याद आते हैं क्योंकि उन्होंने हमारे प्रगतिशील विचारों को पुष्टि देकर बल दिया था। उन्होंने अपनी कोई बात हम पर नहीं थोपी।

1971 में मैं नौकरी में आ गया व शैक्षिणिक आवारगी के दिनों में जो आलोचनात्मक पढने का शौक लगा था वह और बढ गया। अब मैं ढेर सारी पत्रिकाएं और अखबार मंगाता था, नौकरी पूरी ईमानदारे किंतु बेमन से करता था। इस दौरान रजनीश साहित्य व साहित्यिक पत्रिकाओं को पढ कर बहुत अध्ययन सम्पन्न हो गया क्योंकि दोनों ही जगह बहुत पढे हुए लोग सार संक्षेप प्रस्तुत कर देते थे। कई पत्रिकाओं के कमजोर लेखन के प्रकाशन से मुझे लगा कि ऐसा या इससे अच्छा तो मैं भी लिख सकता हूं और मेरी लेखनी चल पड़ी। इसी दौरान मेरी मित्रता दतिया के ही एक ऐसे मित्र शिवमोहन लाल श्रीवस्तव से हुयी जो खूब छपता था। पहले मुझे अपनी रचनाओं की वापिसी पर बहुत क्षोभ होता था किंतु जब मैंने देखा कि उसकी प्रकाशित रचनाओं से कई गुनी रचनाएं वापिस भी होती हैं तो यह सब एक खेल लगने लगा। पत्रिकाओं को पढते पढते मुझे समझ में आ गया कि किस पत्रिका के लिए कौन सी रचना उपयुक्त होगी, जिसके परिणाम स्वरूप मैं लोकप्रिय पत्रिकाओं में खूब छपा। शिवमोहन के जीते जी तो यह मानने में संकोच होता था किंतु अब यह कह सकता हूं कि प्रकाशन के मामले में मैं उसका एकलव्य था। नामी गिरामी लोगों से पत्र व्यवहार करने की प्रेरणा भी उसी से मिली।

मैं नौकरी नहीं करते रहना चाहता था और विकल्प के रूप में कवि सम्मेलन के मंचों पर रचना पाठ से जीवन यापन की सोचने लगा था क्योंकि पत्रिकाओं में प्रकाशन से मेरा नाम जाना जाने लगा था। एक सुधी श्रोता के रूप में कवि सम्मेलनों में जाने का जो अनुभव था, उससे मुझे यहाँ भी लगा कि अगर मौका मिले तो मैं यहाँ भी बहुत सारे स्थापित लोगों से अच्छा कर सकता हूं। अनेक मंचों पर मैं ठीक ढंग से सुना भी गया और प्रमुख कवियों की आँखों में प्रशंसा भाव भी देखा। मैंने कवि सम्मेलनों के कवियों से अपने प्रकाशन का सन्दर्भ देते हुए पत्र व्यवहार करना शुरू किया और बिना किसी सौदे के अनेक मंचों पर जाकर खुद को आजमाया। अपनी गा न पाने की अक्षमता और उच्चारण दोष के कारण मैं सफल तो नहीं हो सका किंतु मौलिक विचारों के कारण सराहा गया। इस बीच में इस क्षेत्र में प्रतियोगिता व स्तरहीनता बहुत बढ गई थी।  कवि सम्मेलनों के कवियों में मुझे मुकुट बिहारी सरोज के व्यंग्य गीत बहुत पसन्द आते थे। वे मेरे द्रोणाचार्य बनते गये। इस प्रभाव को अन्य लोगों ने भी महसूस किया। घोषित गुरु तो नहीं किंतु जब जहाँ वे मिल जाते मैं उनका गुरु तुल्य ही सम्मान करता था। कह सकता हूं कि वे मेरे काव्य गुरु थे।

मैं सोच में वामपंथी था, मेरे बैंक की ट्रेड  यूनियन सीपीआई से जुड़ी थी इसलिए मैं सीपीआई के नेताओं के सम्पर्क में रहा किंतु 1977 में जब मैं भरतपुर पदस्थ था तब इमरजैंसी में सीपीआई का इन्दिरा गाँधी को समर्थन देना हजम नहीं हुआ। इसी दौरान में पहले सीपीएम के कामरेड राम बाबू शुक्ल और फिर उनके माध्यम से सव्य साची के सम्पर्क में आया। रामबाबू जी ने मुझे मार्क्सवाद समझाया और वामपंथी पार्टियों की व्याख्या की। सच तो यह है कि मार्क्सवाद के मेरे पहले गुरु रामबाबू शुक्ल ही रहे जिसे बाद में कामरेड सव्यसाची की अनेक क्लासिज ने परिपक्व किया। मार्क्सवाद समझने के बाद ही दुनिया और दुनियादारी समझ में आयी। इस समझ ने चित्त को प्रसन्नता से भर दिया। सव्यसाची तो हजारों लोगों को मार्क्सवाद पढा चुके थे जिनमें इन दिनों राष्ट्रीय स्तर पर चमक रहे अनेक नाम हैं। उन्हें गुरु कह सकता हूं, वैसे भी वे मास्साब के रूप में जाने जाते रहे।

हरिशंकर परसाई के व्यंग्यों ने मुझे राजनीति पर प्रतिक्रिया देना सिखाया। परसाईजी को मैंने एक विद्यार्थी की तरह भरपूर पढा और सीखा। यहाँ तक की कि जब व्यंग्य लेखों की मेरी पहली किताब आयी तो उस पर एक टिप्पणी यह भी थी कि ये परसाई की गैलेक्सी के सितारे हैं। यह बात कुछ हद तक सही भी थी। मैंने उन्हें कल्पना से लेकर नई दुनिया, जनयुग से लेकर करंट तक निरंतर पढा, यहाँ तक कि करंट में तो परसाईजी, कमलेश्वर, डा. राही मासूम रजा आदि के स्तम्भों के साथ मुझे भी व्यंग्य कविताएं लिखने का अवसर मिला। मेरी किताबों को प्रकाशन तक लाने में सुप्रसिद्ध कहानीकार से.रा. यात्री ने बड़े भाई जैसे स्नेह के साथ मदद की। मुझे भोपाल में नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, प्रभाष जोशी, मैनेजर पांडे, डा. के बी एल पांडे आदि के विद्वतापूर्ण भाषणों से सैकड़ों पुस्तकों का ज्ञान मिला। प्रेमचन्द के सम्पादकीय लेखों के बाद कमलेश्वर और राजेन्द्र यादव के सम्पादकीय लेखों ने मुझे भरपूर तर्क सम्पन्न किया। अमृता प्रीतम की कहानियों और नीरज के गीतों ने मेरे मर्म को छुआ।

सच तो यह है कि परम्परागत रूप से मेरा गुरु तो कोई नहीं रहा किंतु मैं अनेक लोगों का एकलव्य रहा और किसी को अंगूठा मांगने का मौका नहीं दिया। वैसे किसी ने कहा कि बादाम खाने से अकल नहीं आती, ठोकर खाने आती है, सो इसमें कोई कमी नहीं रही।

दुष्यंत के शब्दों में कह सकता हूं कि -

हमने तमाम उम्र अकेले सफर किया

हम पर किसी खुदा की इनायत नहीं रही

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

 

सोमवार, जुलाई 20, 2020

पद्मभूषण सम्मान से सम्मनित चीनी विद्वान जी जियानलिन



हमारे पद्मभूषण सम्मान से सम्मनित चीनी विद्वान जी जियानलिनRenowned Chinese scholar Ji Xianlin dies in Beijing - China News ...
वीरेन्द्र जैन
                6 जून 2008 जब अमृतसर में खालिस्तानी आन्दोलन का समर्थन करने वाले लोग तत्कालीन  राज्य सरकार की शह पर सिमरन जीत सिंह मान के नेतृत्व में अमृतसर मन्दिर में अलग खालिस्तान की वकालत कर  रहे थे, और जब ताकतवर गुर्जरों के लाठीधारी समूह राजस्थान में कई जगह रेल की पटरियों पर धरना देते हुये अपने को कमजोर वर्ग में सम्मिलित करने की मांग पर रेल यातायात रोक कर बैठे हुये थे, तब भारत के तत्कालीन विदेशमंत्री प्रणव मुखर्जी चीन के फौजी अस्पताल में एक 97 वर्षीय चीनी विद्वान को भारत के प्रथम चार सम्मानों में से एक पद्मभूषण सम्मान से सम्मनित कर रहे थे। सम्मानित होने वाले व्यक्ति का नाम जी जियानलिन था, जो सारी दुनिया के लोगों के विचारों को अनुवाद के द्वारा फैलाने का यथार्थवादी तरीका अपनाये जाने के पक्षधर रहे। हमारे प्राचीन ग्रन्थ ऋगवेद में जो कहा गया है-
आ नो भद्रा क्रतवो यंतु विश्वतः(अच्छे विचार सारी दुनिया से आने दीजिये)। यह अनुवाद के द्वारा ही संभव है।
                भारत के गणतंत्र दिवस पर विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाली चुनिंदा हस्तियों को भारत के राष्ट्रपति की ओर से सम्मानों की घोषणा की जाती है। सन 2008 की 26 जनवरी को भारत के राष्ट्रपति ने जिन लोगों को पद्म सम्मानों की घोषणा की थी उनमें चीन के विद्वान जी जियानलिन का नाम भी सम्मिलित था जिन्हें पद्मभूषण सम्मान के लिए चुना गया था। वे उन विरले विदेशी व्यक्तियों में से एक थे जिन्हैं साहित्य व शिक्षा के क्षेत्र में इस सम्मान  के लिए चुना गया था। इस चयन ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के प्रति बरबस ध्यान आकर्षित किया था।
                जी जियानलिन की उम्र उस समय 97 वर्ष थी, और उस उम्र में भी वे सक्रिय थे। इस सम्मान के अगले वर्ष 11जुलाई 2009 को 98 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हुआ। वे इतना जीवन से भरे हुए थे कि कहते थे कि असली उम्र तो सौवर्षों के बाद ही प्रारंभ होती है। गत 6 अगस्त 2005 को जी के 94वें जन्मदिन पर चीन की कन्फयूसियस फाउन्डेशन ने बीजिंग में जी जियानलिन रिसर्च इंस्टीट्यूट की शुरूआत की थी। यह संस्था जी के शोध कार्यों पर काम करने के लिए बनायी गयी व जिसमें चीन के शीर्षस्थ विद्वान तंगयीज्जी, ले दियान, और ली मेंग्यस्की वरिष्ठ सलाहकार के रूप में सम्मिलित हैं।
जब सन 2006 में चीन की सरकार द्वारा उनके अनुवाद कार्यों के लिए  लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया था तो उस अवसर पर जी ने कहा था कि गत पांच हजार सालों से चीन की संस्कृति के सतत जीवंत और सुसम्पन्न बने रहने का कारण यह है कि हम अनुवाद से जुड़े रहे। दूसरी संस्कृतियों से अनुवाद ने हमारी देह में सदा नये रक्त का संचार किया है।
                जी का एक स्थल पर कथन है कि ‘‘ चीन की नदियां घटती बढती रहती हें पर वे कभी सूखती नहीं हैं क्योंकि उनमें सदा नया जल आता रहता है। इसी तरह हमारी संस्कृति की नदी में भी भारत और पश्चिम से सदा नया जल आता रहता है इन दोनों ही स्थलों ने हमें अनुवाद के माध्यम से धन्य किया है। यह अनुवाद ही है जिसने चीनी सभ्यता को सदा जवान बनाये रखा है। अनुवाद बेहद लाभदायक है।’’

                भारत के गणतंत्र दिवस पर जब जी को पद्मभूषण सम्मान की घोषणा हुयी थी तब भारत चीन संस्कृतिक संबंधों के विशेषज्ञ जू के कियो ने कहा था कि चीन के लोग भारत की परंपरा और संस्कृति के बारे में जो कुछ भी जानते हैं वह जी के माध्यम से ही जानते हैं। उन्होंने भारत के प्राचीन ग्रन्थों को मूल संस्कृत से अनुवाद करके उसे चीनी काव्य में रूपान्तरित किया है।
                अपने नैतिक मूल्यों, उज्जवल चरित्र और व्यक्तित्व के लिए जी को चीन में बहुत आदर प्राप्त है। चीनी प्रीमियर वेन जियाबों ने भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कहा था कि जी हमारे सर्वोत्तम सलाहकार हैं। परम राष्ट्रभक्त जी का कहना था कि जब में राख में बदल जाऊॅंगा तब भी चीन के प्रति मेरा प्रेम कम नहीं होगा। उन्होंने अपने छात्र जीवन में ही जापान द्वारा घुसपैठ करने पर च्यांग काई शेक के खिलाफ याचिका दायर की थी।
                खाकी पोशाक और कपड़ों के जूतेां में स्कूल बैग लटकाये हुये जी एक ख्यात विद्वान से अधिक एक किसान और मजदूर नजर आते थे। वे सुबह साढे चार बजे उठ जाते और  पांच बजे नाश्ता करने के बाद लिखना प्रारंभ कर देते थे। उनका कहना था कि लिखने के लिए ही सुबह मुझे उठाती है। वे बहुत ही तेजी से लिखते थे पर विचारों के साथ भाषा पर मजबूत पकड़ होने के कारण उनके लेखन में कहीं झोल नहीं आता था। कहा जाता है कि उन्होंने अपना बहुप्रसि़द्ध निबंध ‘‘फारएवर रिग्रैट’’ कुछ ही घंटों में लिख लिया था, जिसे सदियों तक याद रखा जायेगा।
                जी अपने विचारों की अभिव्यक्ति में निर्भयता के लिए भी जाने जाते रहे। उन्होंने चीन की सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान ही रामायण के चीनी अनुवाद का दुस्साहसपूर्ण काम किया था। 1986 में उन्होंने अपने दोस्तों की सलाहों के खिलाफ विवादास्पद हू शी के बारे में लिखा ‘‘ फ्यिू वर्डस् फार हूशी”’। हू उस समय चीन में अनादर भाव से देखे जा रहे थे और उनके विचारों पर लिखने बोलने का कोई साहस नहीं कर रहा था। तब जी का कहना था कि रचनात्मक कार्यों को पहचाना जाना चाहिये और न केवल उनकी कमजोरियों को ही सामने आना चाहिये अपितु उनके आधुनिक साहित्य की अच्छाइयों को भी जाना जाना चाहिये। उनके लिखे हुये का ही परिणाम था जो चीन ने हूशी के काम को पुनः देखा और मान्यता दी।
जी का कहना था कि सांस्कृतिक आदानप्रदान ही मनुष्यता की बड़ी संचालक शक्ति है। वे कहते हैं कि एक दूसरे से सीख कर और उनकी कमियों को ठीक करके ही हम सतत प्रगति कर सकते हैं । उनका कहना था कि वैश्विक सद्भाव ही मानवता का लक्ष्य है। जी मानव संस्कृति को दो भागों में बांट कर चलते रहे, एक चीन-भारत अरब-इस्लामिक संस्कृति तथा दूसरी यूरोप-अमेरिकन पश्चिमी संस्कृति। वे पूरब और पश्चिम की संस्क्तियों के बीच में निरंतर समन्वय और आदानप्रदान के पक्षधर रहे।
जी को सम्मानित करके भारत सरकार ने विश्वबंधुत्व के एक प्रमुख यथार्थवादी घ्वजवाहक को सम्मानित करने का काम किया था। हजारों भाषाओं वाली दुनिया को अनुवाद से ही समझा जा सकता है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास  भोपाल म.प्र.
फोन 9425674629  





रविवार, अक्टूबर 07, 2018

पुस्तक विमर्श – यादों का कारवाँ [रुस्तम सैटिन स्मृति अंक]


पुस्तक विमर्श – यादों का कारवाँ [रुस्तम सैटिन स्मृति अंक]
वीरेन्द्र जैन

पिछले दिनों एक संयोग घटित हुआ।
जनसत्ता में महामना मदन मोहन मालवीय के पौत्र श्री लक्ष्मीधर मालवीय संस्मरण लिख रहे थे। उनमें से एक संस्मरण में उन्होंने रुस्तम सैटिन की चर्चा की जिनके छात्र जीवन में किये जा रहे स्वतंत्रता आन्दोलनों से प्रभावित होकर मालवीय जी ने स्वयं उन्हें बीएचयू में लाने और पढाई जारी रखने के लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था की थी। यह व्यवस्था उनके यह कहने के बाद भी की थी कि वे कम्युनिष्ट हैं। बाद में कामरेड रुस्तम सैटिन बनारस से विधायक भी चुने गये थे और चरण सिंह के नेतृत्व में बनी पहली संविद सरकार में पुलिस विभाग के उपमंत्री रहे थे।
इस लेख के साथ रुस्तम सैटिन जी का चित्र भी प्रकाशित हुआ था जिसे देख कर मुझे अपने पिता [श्री लक्ष्मी चन्द्र जैन] की कही बातें याद आयीं जो उनके साथ ही मैकडोनेल्ड हाई स्कूल झाँसी में पढते थे व उनके ही नेतृत्व में स्काउट के रूप में काम करते हुए राष्ट्रीय आन्दोलन में सहयोगी हुए थे। शायद उन्हीं से उन्होंने वामपंथी रुझान ग्रहण किया था। इसी रुझान के कारण उन्होंने उस समय चन्द्र शेखर आज़ाद के ग्रुप में सम्मलित होने का प्रयास किया था किंतु एक दुर्घटना में बचपन से ही उनका सिर हिलने के कारण उन्हें शामिल नहीं किया गया था क्योंकि भूमिगत आन्दोलन में उससे पहचान का खतरा था। बाद में वे उनके आउटर सर्किट में सहयोगी रहे थे व ललितपुर में नगरपालिका की नाकेदारी करके सूचना केन्द्र स्थापित किया था। आज़ाद जब खनियाधाना के जंगलों में बम बनाते थे तब सूचना और सामग्री पहुँचाने का केन्द्र यही नाका भी हुआ करता था। पिताजी से कामरेड रुस्तम सैटिन का नाम कई बार सुना था। जब वे चरण सिंह के मंत्रिमण्डल में मंत्री बने थे तब पिताजी बहुत खुश हुये थे। उनकी वह खुशी तब से मेरी स्मृतियों में दर्ज होकर रह गयी थी।  
जनसत्ता से फोटो लेकर अपने पिताजी के फोटो के साथ फेसबुक पर पोस्ट कर के मुझे आत्मीय खुशी मिली थी। यह बात आयी गयी हो गयी थी किंतु फेसबुक पिछले वर्षों की घटनाओं को फिर से याद दिलाया करता है सो इस वर्ष [2018] जब उसने उस पोस्ट की याद दिलायी तो मैंने उसे फिर शेयर कर दिया। संयोग यह हुआ कि इस पोस्ट को देख कर मेरी एक फेसबुक मित्र श्रीमती स्मिता तिवारी ने लाइक करते हुए लिखा कि कामरेड सैटिन उनके पिता के भी मित्र थे और उनके पुत्र श्री राजीव सैटिन उनके साथ ही बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में पढते थे। दुर्भाग्य से राजीव तो अब नहीं हैं किंतु उनकी जीवन संगिनी श्रीमती रविन्दर सैटिन भी उनकी मित्र हैं।
उनकी इस टिप्पणी को श्रीमती रविन्दिर सैटिन ने लाइक किया और इस पोस्ट के माध्यम से वे भी मेरी फेसबुक मित्र बन गयीं। पिताजी के छात्र जीवन व उनके सामाजिक कार्यों के बारे में मैं और अधिक जानना चाहता था क्योंकि इस विषय पर उनसे अधिक संवाद नहीं हुआ था, पर मेरी सबसे बड़ी बहिन ने जरूर कभी कभी कुछ बताया था। इस जिज्ञासा में श्रीमती रविन्द्र सैटिन से अपने पिता के साथ रुस्तम जी के सम्बन्धों की चर्चा करते हुए उनके जीवन से सम्बन्धित किसी पुस्तक की उपलब्धता के बारे में जानना चाहा। उत्तर में मुझे 2001 में प्रकाशित उक्त पुस्तक प्राप्त हुयी, जो कामरेड सैटिन के जीवन के बारे में सम्भवतः इकलौती पुस्तकाकार सामग्री है। कामरेड सैटिन की पीढी ने अपने बारे में कम से कम सोचते हुए निरंतर समाज के लिए काम किया। उनके जीवन संघर्ष को देखते हुए लगता है कि अगर इतना काम आज के किसी नेता ने किया होता तो वह और उसके समर्थक लगातार अतिरंजित गाथाएं बखानते रहते।
उनकी मृत्यु के दो वर्ष बाद प्रकाशित यह स्मृति ग्रंथ कामरेड सैटिन के जीवन से सम्बन्धित उपलब्ध सामग्री का ग्रंथन भर है जिसमें उन्होंने अपने अंतिम दिनों में अस्वस्थता की दशा में स्मृति अनुसार बोल बोल कर कुछ लिखवाया था। यह पुस्तक परम्परानुसार सजग होकर लिखवायी जीवनी जैसी नहीं है इसलिए इसमें बनावट नहीं है और सब जैसे का तैसा कहा गया है। स्मृतियों के अलावा इसमें उनकी राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में लिखी गयी छन्द कविताएं हैं जो ऎतिहासिक महत्व रखती हैं। उल्लेखनीय है डा. शिवमंगल सिंह सुमन बनारस में उनके सहपाठी ही नहीं आन्दोलन के साथी भी थे जिन्होंने रेलवे के कुलियों की हड़ताल से लेकर अनेक मजदूर आन्दोलनों में भी कन्धे से कन्धा मिला कर उनका साथ दिया था। कामरेड सैटिन के निधन के बाद विभिन्न समाचार पत्र पत्रिकाओं में उन पर जो सामग्री प्रकाशित हुयी उसमें से भी जो उपलब्ध हो सकी उसे भी जैसे का तैसा संकलित किया गया है। पूरी पुस्तक में 360 पृष्ठ हैं। एक कम्युनिष्ट की तरह उन्होंने अपने जीवन के बारे में बताते हुए अपने ऎतिहासिक आन्दोलनों का श्रेय स्मृति में रहे अपने सैकड़ों आन्दोलनकारी साथियों को देते हुए उन्हें याद किया है और पुस्तक के 27 पृष्ठों में उनकी चर्चा है।
कामरेड रुस्तम, जिनका जन्म 1910 में कराची के एक पारसी परिवार में हुआ था, का जीवन निरंतर उतार चढाव भरी घटनाओं से भरा रहा है और हमारे स्वतंत्रता आन्दोलन के प्रमुख वर्ष उनके जीवन में समाये हुये हैं। उनका जीवन भी स्वतंत्रता आन्दोलन और स्वतंत्रता के बाद कम्युनिष्ट आन्दोलन में समाया हुआ है। वे अपने सीमित संसाधनों के साथ आजीवन अनथक संघर्षरत रहे। उन्होंने न केवल समाज सुधार, शिक्षा, स्वतंत्रता संग्राम, मजदूर किसान आन्दोलनों में ही हिस्सेदारी की अपितु चुनावी राजनीति में भी शामिल रहे। 1952 के पहले आमचुनाव से लेकर चौथे आमचुनाव तक वे कम्युनिष्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े। अपने पहले आम चुनाव में उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री सम्पूर्णानन्द को लगभग हरा ही दिया था अगर परिणाम बदलने के लिए नौकरशाही ने अस्वस्थ तरीके न अपनाये होते। उन दिनों चुनाव प्रणाली अपनी प्रारम्भिक अवस्था में थी और उम्मीदवार के अनुसार मतपेटियां हुआ करती थीं। मुख्यमंत्री जैसे सरकार के सबसे प्रमुख व्यक्ति के लिए नौकरशाही कुछ भी कर सकती थी।
जलियांवाला कांड के समय अमृतसर में ही प्राथमिक कक्षा के छात्र होने के कारण उन्होंने नौ साल की उम्र में जो प्रभाव ग्रहण किया उसने उन्हें अंग्रेजों से नफरत और उन्हें हटाने के लिए लगातार संघर्ष की राह पर चला दिया था। व्यापारी पिता के व्यापार में उतार चढाव, कम उम्र में माँ का निधन आदि घटनाओं ने उन्हें बार बार स्थान बदलने व विभिन्न आश्रयों में रहने को विवश किया। उनकी अच्छी वक्तव्य कला को बचपन में ही जो पहचान. प्रोत्साहन और सराहना मिली उसने उनकी सम्वाद क्षमता को कई गुना बढा दिया था व उन्हें एक अच्छे संगठनकर्ता की भूमिका दे दी थी। आज अनुमान लगाया जा सकता है कि कैसे उन्होंने मैकडोनेल्ड हाई स्कूल झाँसी में पढते हुए स्काउटों का ग्रुप बना लिया होगा और उसके ग्रुप लीडर बन गये होंगे। इसी ग्रुप ने काँग्रेस अधिवेशन में स्वयंसेवकों के रूप में काम किया था।
उन दिनों 1857 की क्रांति को साठ सत्तर साल ही हुए थे। झांसी में अंग्रेजों की छावनी हुआ करती थी। यद्यपि इस पुस्तक में उसकी चर्चा नहीं है किंतु उस समय उस हाईस्कूल के जो प्रिंसिपल विपिन बिहारी बनर्जी हुआ करते थे. उनके दादा या परदादा वकील थे। कहा जाता है कि उनको महारानी लक्ष्मी बाई ने अंग्रेजों से अपना केस लड़ने के लिए बुलवाया और बसाया था। यह बात कम ही याद की गयी है कि अंग्रेजों के खिलाफ बगावत करने से पहले लक्ष्मीबाई ने चार साल तक अदालती लड़ाई लड़ी थी। प्रिंसिपल बनर्जी जी प्रगतिशील और अंग्रेज विरोधी ही रहे होंगे इसीलिए उनके कार्यकाल में पढे जो लोग निकले उनमें से कई नाम तो विभिन्न क्षेत्रों के इतिहास में रेखांकित हुये हैं, उनमें कामरेड रमेश सिंहा, सुप्रसिद्ध आलोचक डा. रामविलास शर्मा, हाकी खिलाड़ी ध्यानचन्द, और रुस्तम सैटिन जैसे नाम तो हैं ही, न जाने कितने और होंगे। जब एक हाकी मैच के बाद मेरे पिता की साइकिल एक अंग्रेज बच्चे से टकरा गयी थी व उसके डैमफूल कहने पर उन्होंने उसकी पिटाई कर दी थी तब कठोर प्रिंसिपल बनर्जी ने उन्होंने दण्ड देने की जगह हाकी मैच जीतने पर खुशी जता कर जाने दिया था।
जब जलियांवाला बाग का नरसंहार हुआ था तब गाँधीजी ने पूरे देश को एक दिन का उपवास करने के लिए कहा था तब उनकी [कामरेड सैटिन की] माँ ने भी उपवास किया था जबकि वे राजनीति के बारे में कुछ नहीं जानती थीं। इसी नरसंहार के प्रतिरोध में उन्होंने अंग्रेज सम्राट के भाई ड्यूक आफ केनोट के आगमन पर मिले मैडल को जूते के फीते से बांध लिया था जिसका अन्य छात्रों ने भी अनुशरण किया था। उसकी सजा भी मिली थी। कुछ ही दिनों बाद उन्हें अमृतसर से कराची में आना पड़ा। कराची में पहली बार कांग्रेस के बड़े नेता मौलाना मुहम्मद अली व शौकत अली की उपस्थिति में उन्हें स्कूल में बोलने का मौका मिला और उस उम्र में इतना अच्छा बोला कि वे एक पारसी के लड़के के इतने अच्छे विचारों से बहुत खुश हुये। दोनों नेताओं ने भरपूर प्रशंसा की और वे सबकी निगाहों में विशिष्ट हो गये। बाद में पारिवारिक परिस्तिथियोंवश उन्हें झंसी आना पड़ा था। अपने छात्र जीवन से ही उन्होंने भाषण देने का कौशल अर्जित कर लिया था। वे अपनी प्रतिभा से अपने साथियों को सहयोगी बना लेने में सक्षम हो गये थे।  
 1928 में झांसी में कांग्रेस का उत्तर प्रदेश का राजनैतिक सम्मेलन हुआ जिसमें उनके नेतृत्व में छात्रों की एक बड़ी टीम ने स्वयंसेवकों की भूमिका निभायी थी। इसमें जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता थी जिन्होंने उनके काम की जानकारी मिलने पर उनसे काफी देर बात की और अमृतसर व कराची की प्रेरणाप्रद घटनाओं को विस्तार से सुना। नेहरू जी ने उनसे कहा था कि मुझे उम्मीद है कि पढाई पूरी करने के बाद तुम अपना पूरा समय देश सेवा में दोगे। इस कांफ्रेंस की समाप्ति के बाद उसी पण्डाल में दूसरी कांफ्रेंस पीजेंट्स एंड वर्कर्स पार्टी के नाम से हुयी। इस कांफ्रेंस को संगठित करने के लिए पीसी जोशी आये थे, [ जिन्हें बाद में कम्युनिष्ट आन्दोलन के संस्थापक सदस्यों की तरह याद किया जाता है] जो उस समय इलाहाबाद यूनीवर्सिटी में पढते थे। इस कांफ्रेंस का मुख्य उद्देश्य कम्युनिष्ट आंदोलन को संगठित करना था जिसकी अध्यक्षता बम्बई के मजदूर नेता झाबवाला ने की थी। इस कांफ्रेंस के स्वयंसेवक भी कामरेड रुस्तम सैटिन ने ही जुटाये थे। पीसी जोशी वहाँ दस दिन रुके थे और इन दस दिनों में उन्होंने कामरेड सैटिन को कम्युनिष्ट बना दिया था व झांसी में एक गुप्त कम्युनिष्ट पार्टी की कमेटी बनवा दी थी। इन लोगों ने क्रांतिकारी नाम से एक साप्ताहिक अखबार भी निकाला था। इसके बाद रेलवे में एक हड़ताल हुयी थी जिसके लिए अंग्रेज कम्युनिष्ट कामरेड स्प्रेट और कामरेड ब्रेडले झांसी आये थे जिनके साथ कामरेड सैटिन ने मिल कर काम किया था। बाद में झांसी के बहुत सारे कम्युनिष्ट नेता मेरठ षड़यंत्र केस में गिरफ्तार कर लिये गये थे किंतु घर की तलाशी में कुछ न मिलने के कारण कामरेड सैटिन बच गये थे। इस भागीदारी और पुलिस दमन से निकल कर वे कम्युनिष्ट पार्टी के सदस्य बन गये थे। उन दिनों काँग्रेस स्वतंत्रता के लिए चलने वाला आन्दोलन थी जिसमें कम्युनिष्ट भी काम करते थे।
इसी दौरान उनका परिचय काँग्रेस नेत्री पिस्ता देवी से हुआ जो स्वतंत्रता आन्दोलन की बहुत सक्रिय नेता थीं। उनसे उन्हें मातृवत स्नेह मिला और बचपन में ही छूट गयी माँ की कमी की भरपाई सी लगी। कई वर्ष बाद इन्हीं की एक बेटी मनोरमा से उनकी शादी हुयी। विदेशी कपड़ों की होली जलाने में पिस्तादेवी और उनकी चारों लड़कियां आगे रहती थीं। उल्लेखनीय है कि चन्द्रशेखर आज़ाद भी फरारी के दौरान इन्हीं पिस्तादेवी के पड़ोस में रहने वाले मास्टर रुद्र नारायण के यहाँ रुकते थे। पूछ्ताछ के लिए कामरेड सैटिन को हवालात में बन्द कर भीषण यातनाएं दी गयी थीं पर उन्होंने आज़ाद के प्रवास के बारे में मुँह नहीं खोला था।
पूर्ण स्वतंत्रता की मांग के लिए कांग्रेस ने सरकार को एक साल का नोटिस दिया था और जनता को जानकारी देने व समर्थन व सहयोग पाने के लिए गांधीजी ने देश भर का दौरा शुरू कर दिया था। इसी दौरे के अंतर्गत वे झंसी भी आये थे। छात्र सैटिन ने भी चन्दा एकत्रित किया व छात्रों की ओर से 101/- रुपयों की थैली भेंट करना तय किया। थैली भेंट करने का कार्यक्रम एक बड़ी आमसभा में रखा गया था जिसमें कृपलानी जी की घोर असहमति के बाबजूद उन्होंने थैली देने से पहले बोलने की शर्त रखी जो गाँधीजी के हस्तक्षेप के बाद स्वीकार कर ली गयी। वे दस मिनिट बोले और गाँधी जी को कहा कि अगर आप लाहौर में होने वाले अगले अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पास नहीं करेंगे तो हम लोग आपका भी विरोध करेंगे। गाँधीजी ने मुस्करा कर पीठ ठौंकी और कहा कि जैसा तुम लोग चाहते हो वैसा ही होगा।
उस दौर में यह गाँधीजी का ही प्रभाव था जिसमें सामाजिक और राजनीतिक कामों में भेद नहीं था, अपितु वे एक दूसरे के पूरक थे। कामरेड सैटिन ने न केवल दलित समाज के साथ खानपान का भेद नहीं रखा अपितु हैजे या प्लेग के समय में अपने साथी छात्रों का सहयोग जुटाया। लाहौर अधिवेशन में पास 1930 में पूर्ण स्वराज की घोषणा को हर नगर में पढे जाने का कार्यक्रम रखा गया था और ऐसा करने वालों की गिरफ्तारियां हुयीं। झांसी में जो पाँच लोग गिरफ्तार हुये थे उनमें सबसे कम उम्र के रुस्तम सैटिन ही थे जो इस कारण से अपनी इंटर की परीक्षा भी नहीं दे सके थे।
इसके बाद तो उनका आन्दोलन, गिरफ्तारी, यातना, अनशन आदि का लगातार चलने वाला इतिहास है। वे जेल में भी कैदियों की मांगों के लिए अनशन करते रहे और जेलें बदलती रहीं। झांसी से फतेह गढ, फिर फर्रुखाबाद, प्रतापगढ और न जाने कहाँ कहाँ की जेलों में भेजा गया। स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास के बड़े बड़े नाम उनके साथ जेलों में रहे जिनसे जुड़े संस्मरण इस पुस्तक में दर्ज हैं। पं. बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ उनकी बगल वाली बैरक में थे और उसी दौरान उन्हें तनहाई में डाले जाने के समय जयशंकर प्रसाद की ‘आंसू’ पढने को मिली जिसका प्रभाव उनकी कविताओं पर पड़ा। झांसी में उसी समय बाबू सम्पूर्णानन्द भी जेल में आये थे जब सी क्लास के कैदियों को मिलने वाले खराब खाने के खिलाफ इन्होंने अनशन किया। बाद में जब इनका ट्रांसफर फैजाबाद जेल में कर दिया गया तब ए क्लास में जवाहरलाल नेहरू के साथ बी क्लास में राधेश्याम शर्मा, मंजर अली सोख्ता, फिरोज गाँधी, केशव देव मालवीय, महावीर त्यागी, बालकृष्ण शर्मा आदि इनके साथ थे। गदर पार्टी के मुस्तफा साहब भी थे जो जपानी जहाज पर भारत पर आक्रमण करके उसे मुक्त कराने के लिए आये थे। वे जौनपुर के थे और वर्षों से एक कोठरी में रहते हुए वृद्ध हो चुके थे किंतु छूटने के बाद फिर से अंग्रेजों से मोर्चा लेने के लिए कृत संकल्प थे। इसी जेल में कुछ दिन पहले हे अशफाक उल्लाह को फांसी लगी थी। साथी कैदियों ने बताया कि था कि वह बहुत सुन्दर स्वस्थ पढा लिखा नौजवान था जिसका स्वभाव इतना अच्छा था कि जेल सुप्रिंटिन्ट भी उसकी फांसी की कोठरी के आगे खड़े होकर आधे आधे घंटे तक बात किया करता था। जिस दिन उसे फांसी लगने वाली थी वह बहुत खुश था और गा रहा था। जेलर सुप्रिंटिंडेंट और मजिस्ट्रेट व सारे सिपाही इस तरह रो रहे थे जैसे उनके बेटे को फांसी लगनी हो।
फैजाबाद जेल में उनके अलावा कामरेड अशोक बोस भी बन्द थे। इन दो कम्युनिष्टों के साथ अनेक कांग्रेसी भी थे जो मेरठ षड़यंत्र केस के आरोपियों ने जो कम्युनिष्ट थे, खुल कर अपने ऊपर लगे आरोप स्वीकारे थे और उसको सही ठहराने के लिए अदालत में जो लम्बे लम्बे बयान दिये थे वे अखबारों में छप रहे थे जिससे पाठकों का एक बड़ा वर्ग प्रभावित हो रहा था।
एक बार छूटने के बाद उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया और लखनऊ के कैम्प जेल में रखा गया था जो टीन की चादरों वाले छत की जेल थी। इस जेल की गर्मी में अठारह सौ लोग मर गये थे। यहाँ खाना बनाना पड़ता था। उनके साथ झांसी के ही कृष्णा, बनारस के कमलापति त्रिपाठी, देहरादून के महावीर त्यागी आदि थे। जल्दी ही इन लोगों को बी क्लास मिल गया और कैम्प जेल से लखनऊ के ही जिला जेल में ट्रांसफर कर दिये गये। यहाँ बाबू शिव प्रसाद गुप्त, जवाहरलाल नेहरू के साले श्रीकृष्ण कौल आदि कई लोग थे। कौल साहब इंगलैंड से सांपों के जहर के बारे में पढ कर लौटे थे। जेल में उनके साथी कैदियों में गोबिन्द बल्लभ पंत, ही नहीं थे अपितु फिरोज गाँधी का बिस्तर बगल में लगता था जो पारसी होने के कारण उनके प्रति अतिरिक्त रूप से सह्रदय थे। काँग्रेस की 1933 का अधिवेशन कलकत्ता में रखा गया था तब पार्टी पर प्रतिबन्ध था इसलिए आयोजन गुप्त रूप से रखा गया था जहाँ छापा पड़ने के बाद वे गिरफ्तार कर लिये गये, उनके साथ आत्माराम गोबिन्द राम खेर भी थे। उन्हें दमदम जेल में रहना पड़ा। बीच में गिरफ्तार होते हुए जब अधिवेशन के अध्यक्ष मदन मोहन मालवीय कलकत्ता पहुँचे तब तक बहुत लाठी चार्ज हो चुके थे और सैकड़ों लोगों के सिर फूट चुके थे। उन्होंने इन घटनाओं की जाँच करने का निर्णय किया और सबसे बात की। रुस्तम सैटिन के प्रतिरोध को जानकर जब उन्होंने विस्तार से जाना कि आन्दोलनों के कारण वे पिछले तीन सालों में पढाई छूट जाने के कारण इंटरमीडिएट का इम्तिहान नहीं दे सके तो उन्होंने आगे पढने के लिए बनारस चलने और यूनीवर्सिटी में पढने का प्रस्ताव किया। कुछ संवाद के बाद वे बनारस जाने को तैयार हो गये जो उनके जीवन का अगला पढाव था। बाद में तो उनकी पढाई, आन्दोलन, जेल, अनशन, फिर चुनावों आदि के विस्तारित रोमांचक किस्से हैं। विधायक बनने के बाद किसानों के सम्बन्ध में उन्हीं के सवाल पर सरकार गिरी थी और काँग्रेस छोड़ने वाले चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी जिसमें वे उप पुलिस मंत्री बने और इस दौरान एक कम्युनिष्ट की तरह कुछ मानक स्थापित किये।
इस अमूल्य पुस्तक का कोई मूल्य मुद्रित नहीं है पर मेरे लिए अलग तरह से मूल्यवान है क्योंकि  इसके साथ मेरे पिता की यादें जुड़ी हैं। पर मैं यह जानता हूं कि पुस्तक की समुचित प्रतियां उपलब्ध नहीं होंगीं इसलिए आकांक्षा है कि इस पुस्तक को थोड़े संक्षिप्तीकरण और सम्पादन के साथ पुनर्प्रकाशित किया जाये। ऐसी पुस्तक स्वतंत्रता आन्दोलन में कम्युनिष्टों के योगदान व मुख्यधारा से सहयोग का अध्ययन करने वालों के लिए बहुत उपयोगी होगी।
वीरेन्द्र जैन
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