शुक्रवार, जुलाई 15, 2016

कश्मीर के बाहर कश्मीर समस्या

कश्मीर के बाहर कश्मीर समस्या
वीरेन्द्र जैन

कश्मीर अगर समस्या बन गया है तो उसके दो हिस्से हैं। पहला हिस्सा विभाजित हिन्दुस्तान में कश्मीर राज्य के विलय से सम्बन्धित है तो दूसरा हिस्सा भाजपा या संघ परिवार द्वारा अपने राजनीतिक हित के लिए उसको साम्प्रदायिक कोण से देखने की ही नहीं अपितु उसे और अधिक साम्प्रदायिक रूप से प्रस्तुत करने की भी है।
कश्मीर के इतिहास में कभी साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुये। उल्लेखनीय यह भी है कि देश विभाजन के दौर में जब गाँधीजी कश्मीर गये थे तब उनका स्वागत फूलमालाओं से किया गया था दूसरी ओर जब ज़िन्ना वहाँ गये थे तब उन्हें काले झंडे दिखाये गये थे। नब्बे के दशक में पाकिस्तान से घुसपैठ करके आये आतंकियों ने जब अपनी आतंकी कार्यवाहियों के साथ साथ कश्मीरी पंडितों पर भी हमले किये तो वे सुरक्षा की दृष्टि से वहाँ से भाग कर राज्य के दूसरे इलाके जम्मू में बस गये। यह लगभग वैसा ही था जैसे कि चम्बल और बुन्देलखण्ड क्षेत्र में डकैतों के डर से साहुकार लोग गाँव छोड़ कर नगरों में बस गये या जातिवादी उत्पीड़न से बहुत सारे मजदूर दिल्ली में भवन निर्माण मजदूर हो गये, जहाँ भले ही उन्हें मजदूरी की राशि और महानगर के व्यय के अनुपात में कोई विशेष आर्थिक लाभ नहीं हुआ हो किंतु उन्हें जाति आधारित अपमान नहीं सहना पड़ता। बुन्देलखण्ड के छतरपुर, टीकमगढ, पन्ना, महोबा, बाँदा, आदि जिलों में सामंती उत्पीड़न की कहानियां बाहर तक नहीं आ पातीं। तत्कालीन सरकार द्वारा कूटनीतिक कारणों से कश्मीरी पंडितों को न केवल समुचित आर्थिक सहायता, राशन, व निवास स्थल ही दिया गया  अपितु उनकी समस्याओं व उन पर हुयी ज्यादतियों का भरपूर प्रचार भी किया गया। बाद में तो हालात यह हुयी कि उनमें से बहुत सारे लोग असुरक्षा के बहाने कश्मीर वापिस नहीं लौटना चाहते रहे पर अपनी पीड़ा का बयान पीड़ा से कई गुना अधिक करते रहे।
यह सच है कि विस्थापन पीड़ादायक होता है और जीवन पर बहुत दुष्प्रभाव डालता है, किंतु इतिहास में इस पीड़ा को झेलने वाले कश्मीरी पंडित अकेले नहीं हैं। देश के विभाजन के दौर में सिन्धियों, पंजाबियों, बंगालियों आदि की पीड़ाओं की असंख्य मार्मिक कथाएं हैं। आजादी के बाद विकास के नाम पर जो बाँध बनाये गये उनसे उजड़ने वालों की दर्दनाक कहानियां नर्मदा बचाओ आन्दोलन सहित इस क्षेत्र में काम करने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं के मुँह से सुनने पर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उजड़ने का मुआवजा बाँटने वाले अफसरों के घरों से सैकड़ों करोड़ रुपये आये दिन पकड़े जा रहे हैं जो अपराधी गिरोह की हांड़ी के दो चार चावलों में से होते हैं। ये घटनाएं बताती हैं कि सरकारी कोष से मुआवजे के नाम पर निकाला गया अपर्याप्त पैसा भी पीड़ितों तक नहीं पहुँच पाता।  
भाजपा की विभाजनकारी राजनीति के प्रचार अभियान में कश्मीरी पंडितों का मामला हिन्दू मुस्लिम का मामला बना कर पेश किया जाता है। इस के साथ में वे यह झूठ भी लपेट देते हैं कि देश का विभाजन हिन्दू मुस्लिम देशों के रूप में हुआ था और हिन्दुओं के देश में ही हिन्दुओं को पलायन करना पड़ना रहा है व शरणार्थी की तरह रहना पड़ रहा है। नासमझ सरल लोग इस दुष्प्रचार में आ जाते हैं जब कि सच यह है कि देश के विभाजन के समय भले ही पाकिस्तान की पहचान एक मुस्लिम देश के रूप में बनी हो किंतु हिन्दुस्तान ने सर्वसम्मति से खुद को एक धर्मनिरपेक्ष देश घोषित किया था जिसमें नागरिकों के बीच लिंग, धर्म, जाति, रंग और भाषा के आधार पर कोई भेद न होने की घोषणा की गयी थी व बहुत बड़ी संख्या में मुसलमानों ने इसी देश में रहना मंजूर किया था। अम्बेडकर के नेतृत्व में पाँच लाख से अधिक दलितों द्वारा हिन्दू धर्म छोड़ कर बौद्ध धर्म अपनाने पर कोई हलचल नहीं हुयी थी।
यह इतिहास तो सर्वज्ञात है कि किस तरह महाराजा हरि सिंह के समानांतर कश्मीर में शेरे’कश्मीर शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में व्यवस्था चल रही थी व वे ज़मींदारी प्रथा उन्मूलन से लेकर अनेक मांगें  मनवा चुके थे। जनता के प्रतिरोध से डर कर महाराजा हरि सिंह केवल जम्मू के महल तक सीमित होकर रह गये थे पर फिर भी वे अंत अंत तक यही चाहते रहे कि उनके राज्य का विलय न हिन्दुस्तान में हो और न ही पाकिस्तान में हो। जब किराये के अफगानी सैनिकों के सहारे पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला करा दिया जिसका मुकाबला शेख अब्दुल्ला के सैनिकों ने किया व भारत सरकार को साथ साथ मुकाबले के लिए कहा तब दबाव में महाराजा हरि सिंह ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किये। इस तरह हम आधा कश्मीर बचा पाये। शेख अब्दुल्ला के साथ किये गये समझौते के भंग होने, कठपुतली सरकारों के बनते बिगड़ते रहने से कश्मीर में एक अलगाववादी आन्दोलन हमेशा बना रहा जो पाकिस्तान के समर्थन और घुसपैठियों के आतंकी कारनामों के कारण कम ज्यादा होता रहा। तत्कालीन परिस्तिथियों में भाजपा ने पीडीपी के नेतृत्व में बेमेल गठबन्धन की सरकार बनायी। इसी दौर में आतंकी गतिविधियों व घुसपैठियों के प्रवेश में बढोत्तरी हुयी।
अपने राजनीतिक लाभ के लिए भाजपा एक ओर तो नेहरू की छवि को ध्वस्त करने के लिए सारी समस्याओं का ठीकरा नेहरू के सिर फोड़ती रहती है व उनकी भक्त मंडली सोशल मीडिया पर अपशब्दों का प्रयोग करती रहती है। दूसरी ओर वह कश्मीर को हिन्दू बनाम मुसलमान की तरह प्रस्तुत करके यह प्रचारित करती रहती है कि कश्मीर के सारे मुस्लिम नागरिक  आतंकवाद के समर्थक हैं और वे पाकिस्तान से धन प्राप्त करके सेनाओं पर पत्थर फिंकवाते हैं। सच तो यह है कि नेहरू जो खुद कश्मीरी पंडित थे, के संकल्प के कारण ही कश्मीर भारत का हिस्सा बना रह सका। जिस कश्मीर में अब तक अलगाववादी आन्दोलन में 94000 से अधिक लोग मारे जा चुके हों वहाँ कूटनीतिक प्रयास ही करने पड़ेंगे। भाजपा को समझना चाहिए कि अब वह सत्ता में है और उसे खुद को विपक्षी दल समझने की आदत को भूल जाना चाहिए। जरूरी है कि वह विपक्षी के रूप में दिये गये असंगत बयानों से दूरी बना ले। कश्मीर का भूभाग ही नहीं अपितु उस क्षेत्र में रहने वाले भी हमारा अभिन्न अंग हैं, उन्हें दुश्मनों की तरह नहीं मारा जा सकता।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

          

सोमवार, जुलाई 04, 2016

राज्यसभा के प्रतिनिधित्व का एक नमूना

राज्यसभा के प्रतिनिधित्व का एक नमूना

वीरेन्द्र जैन
एसोशियेशन आफ डेमोक्रेटिक रिफोर्म [एडीआर] एक ऐसी संस्था है जिसने देश में अनेक चुनाव सुधार करवाये हैं और अभी भी इस दिशा में लगातार सक्रिय है। सिद्धांत और व्यवहार का जो दोहरापन हमारे लोकतंत्र में चल रहा था उसे सामने लाकर इस संस्था ने देश की जनता और उसके कर्णधारों को सोचने के लिए दिशा दी है। इस संस्था के प्रयासों के कारण ही अब हर उम्मीदवार को अपनी शिक्षा सम्पत्ति और दायित्वों तथा उस पर चल रहे प्रकरणों के सम्बन्ध में शपथपत्र देना होता है। यह संस्था उन समस्त शपथपत्रों को समेकित करके रिपोर्ट तैयार करती है और सूचना माध्यमों द्वारा जनता के सामने रखती है।
जन विश्वास है कि चुनावी नेताओं द्वारा दिये गये शपथपत्र शतप्रतिशत भले ही तकनीकी रूप से सही हों किंतु वे चुनावों में जिस तरह से धन बहाते हैं उससे वे असत्य ही लगते हैं। एडीआर ने शपथपत्रों के आधार पर हाल ही में चुने गये 57 राज्यसभा सदस्यों के चरित्रों की जाँच पड़ताल की है। इसके निष्कर्ष संवेदनशील सामाजिक सोच वाले व्यक्तियों के लिए विचारोत्तेजक हो सकते हैं।   
·         चुने गये सभी 57 सदस्यों में से 55 [96%] करोड़पति हैं जिनसे समाज के अंतिम व्यक्ति की सेवा करने की उम्मीद की जाती है। इन सदस्यों की औसत सम्पत्ति 35.84 करोड़ रुपये है।
·         कुल 19 सांसदों पर एक करोड़ से अधिक की देनदारी भी है।
·         उम्र की दृष्टि से दोनों ओर के रिकार्ड बिहार की आरजेडी ने तोड़े हैं जिसमें एक ओर तो 92 वर्ष के रामजेठमलानी चुने गये हैं तो दूसरी ओर 41 वर्ष की मीसा भारती भी चुनी गयी हैं। बीच की उम्र के 25 [44%] 41 से 60 वर्ष के बीच के हैं तो 31 [54%] 61 से 80 वर्ष की उम्र के हैं।
·         33% महिलाओं का जोर शोर से समर्थन करने वाले दलों ने कुल 4 [7%] महिलाओं को उच्च सदन में भेजा ।  
·         इन सदस्यों में से सभी के पास शिक्षा के प्रमाणपत्र हैं जिनमें से 2 [4%] पीएचडी 33 [58%] स्नातकोत्तर, 18 [32%] स्नातक और 3 [5%] मैट्रिकुलेट हैं।
·         इन [सु]शिक्षित करोड़पति राजनेताओं में से 13 [23%] के खिलाफ आपराधिक प्रकरण चल रहे हैं ऐसा उन्होंने अपने शपथपत्र में बताया है।
·         सबसे अधिक सम्पत्ति घोषित करने वालों में पहला नाम शरद पवार की पार्टी एन सी पी के प्रफुल्ल पटेल हैं जिनकी सम्पत्ति 252 करोड़ है तो दूसरे नम्बर पर काँग्रेस के कपिल सिब्बल हैं जिनकी सम्पत्ति 212 करोड़ है। तीसरे नम्बर पर भी भाजपा नहीं है अपितु बीएसपी के सतीश चन्द्र मिश्रा हैं जिनकी घोषित सम्पत्ति 193 करोड़ है।
·         सबसे कम सम्पत्ति वालों में भाजपा ने पहले दो स्थान अर्जित किये हैं जिनमें 66 लाख की सम्पत्ति घोषित करने वाले अनिल माधव दवे हैं तो 86 लाख की सम्पत्ति घोषित करने वाले रामकुमार हैं। तीसरे नम्बर पर् एक करोड़ आठ लाख घोषित करने वाले काँग्रेस के प्रदीप टम्टा हैं।
·         इनमें से कुछ दोबारा चुने गये हैं और पिछले चुनाव के दौरान घोषित सम्पत्ति की तुलना में इन्होंने चौंकाने वाली प्रगति दर्ज की है। एक बार फिर भाजपा के श्री अनिल माधव दवे का उल्लेख आया है जिन्होंने 2010 के चुनाव में कुल दो लाख पचहत्तर हजार की कुल सम्पत्ति से 2111% का विकास करके 66 लाख तक पहुँचे हैं। दूसरे नम्बर पर शिवसेना के श्री संजय राजाराम रावत हैं जिन्होंने 2010 में घोषित एक करोड़ 51 लाख से 14 करोड़ 22 लाख अर्थात 841% की आर्थिक प्रगति घोषित की है। तीसरे नम्बर पर प्रगति के प्रतिशत में बीएसपी के श्री सतीश चन्द्र मिश्रा हैं जिन्होंने 2010 में घोषित 24 करोड़ 18 लाख से 193 करोड़ तक पहुँच कर 698% विकास करने की घोषणा की है।
·         राजनीति से समाज सेवा करते हुए वर्ष 2014-15 की आयकर विवरणी में सबसे अधिक आय घोषित करने वाले काँग्रेस के कपिल सिब्बल हैं जिन्होंने 39 करोड़ से अधिक की आय घोषित की है तो दूसरे नम्बर पर भी काँग्रेस के श्री विवेक तन्खा हैं जिन्होंने 15 करोड़ 19 लाख से अधिक की आय घोषित की है। तीसरे नम्बर पर एनसीपी के प्रफुल्ल पटेल हैं जिन्होंने भी 15 करोड़ से अधिक की पारिवारिक आय दर्शायी है।
आंकड़े बहुत सारे हैं पर सब का निष्कर्ष यही है कि राज्यसभा में पहुँचने वाले ज्यादातर पैसे वाले या उनके प्रतिनिधि ही होते हैं, जिनमें से भी ज्यादातर वकील होते हैं। विकास का पाठ पढाने वाले कालेजों को राज्यसभा के अनेक सांसदों को आमंत्रित कर आर्थिक विकास पर व्याख्यान आयोजित करवाना चाहिए।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629


शनिवार, जून 18, 2016

फिल्म समीक्षा उड़ता पंजाब – सेंसर बोर्ड विवाद से पूर्ण हुयी फिल्म

फिल्म समीक्षा
उड़ता पंजाब – सेंसर बोर्ड विवाद से पूर्ण हुयी फिल्म
वीरेन्द्र जैन

विवाद से प्रचार का ऐसा नाता जुड़ गया है कि फिल्मों से जुड़े अनेक विवाद सन्देहास्पद और नकली लगते हुए उसके व्यापार का एक हिस्सा लगते हैं। किंतु अनुराग कश्यप की फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ का विवाद पूर्व नियोजित नहीं था। फिल्मी दुनिया के साथ साथ बाहर के लोगों को भी लगा, और सही लगा कि अपनी पद स्थापना से ही कमतरी का आरोप झेल रहे सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष ने अपने राजनीतिक आकाओं के हित में एक बड़ी समस्या पर बनी फिल्म की रिलीज में अड़ंगा लगाने की कोशिश की है। इसी विवाद के बीच सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रह्लाद निहलानी ने इस बहस में खुद को नरेन्द्र मोदी का चमचा होने का आरोप स्वीकारते हुए इस आशंका को बल दिया कि फिल्म में दिखायी गई सच्चाई से भाजपा-अकाली दल की आगामी चुनावी सम्भावनाएं प्रभावित हो सकती हैं। फिल्म के काटे गये हिस्सों को दिखाने की अनुमति देकर न्यायालय ने विवाद को समाप्त कर दिया। पीड़ित के पक्ष में न्याय के साथ खड़े होने वाले बहुत सारे लोगों ने अपना समर्थन व्यक्त करने के लिए फिल्म को पहले दिन ही देखने का फैसला किया जिनमें से मैं भी एक हूं।
 सच तो यह है कि फिल्म में ऐसा कुछ भी नया उद्घाटित नही किया गया है जिसका विभिन्न मीडिया माध्यमों द्वारा पहले से खुलासा नहीं किया जा चुका हो। फिल्म की जिम्मेवारी थी कि उन जानकारियों को एक कथा के माध्यम से प्रस्तुत कर के संवेदनाओं से जोड़े। खेद है कि इस फिल्म में सूचनाएं तो हैं किंतु उन सूचनाओं को देने के लिए रची गयी कथा बालीवुड की चालू फिल्मों की तरह है। जरूरत यह थी कि इस विषय पर कलात्मक फिल्म बनायी जाती। कथा में इतने फूहड़ संयोग हैं जिनसे विषय को बल मिलने की जगह वह कमजोर होता है। यह तो ठीक रहा कि न्यायालय ने इसे बिना किसी कट के जारी करने का आदेश दे दिया बरना फिल्म कथा की सारी कमजोरियों का दोष भी सेंसर बोर्ड की कटौतियों के सिर जाता।
पंजाब में कृषि क्रांति के बाद आई सम्पन्नता से जन्मा अतिरिक्त धन नशे की भेंट चढ गया। शराब पर लगने वाले टैक्स साल दर साल बढते गये जिससे नशे के आदी हो चुके कमजोर आर्थिक वर्ग ने अपेक्षाकृत सस्ते नशों का उपयोग प्रारम्भ किया और इस चक्कर में हेरोइन जैसे किस्म किस्म के नशे वाले रासायनिक पदार्थ समाज में आने लगे। ये सब पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे देशों से स्मगल हो कर आते हैं जिसके बदले में उन्हें अवैध हथियारों की सप्लाई आदि की व्यवस्थाएं भी की जाती हैं जिसके लिए देश हित को नुकसान पहुँचाने वाला एक बड़ा तंत्र स्थापित हो चुका है। इस तंत्र में सत्तारूढ दल के मंत्री, नेता, पुलिस आदि सुरक्षा एजेंसियां भी भागीदार बन चुकी हैं। इस नशे की तासीर ऐसी होती है कि जल्दी ही इसका सेवन करने वाला इसका आदी बन जाता है व इस एडिक्शन की गुलामी में वह कुछ भी करने को तैयार हो जाता है। इस तरह से जुझारू कौम की एक पूरी पीढी के तेवरों को ढीला कर उन्हें गुलाम बना लिया गया है। कहा जाता है कि पंजाब में खालिस्तानी आन्दोलन के दुष्प्रचार से भटके नौजवानों को एक दूसरे भटकाव में धकेलने के लिए तत्कालीन सरकार के जिम्मेवार लोगों ने इसे प्रारम्भ में ही रोकने की गम्भीर कोशिशें नहीं कीं। बाद में लाभान्वित पुलिस आदि सुरक्षा बलों के लोगों की दाढों में खून  लग चुका था जिन्होंने अगली सरकारों को भी उसी रंग में रंग दिया। कुछ दिनों बाद तो वे पिछलों से बहुत आगे निकल गये।
फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ में तीन अध्याय हैं। एक में पुलिस की मिली भगत से राजनीतिक संरक्षण पाये हुए एक माफिया से एक सोशल एक्टविस्ट लेडी डाक्टर के टकराने की कहानी है। यह लेडी डाक्टर [करीना कपूर] नशे के उन्मूलन के लिए चिकित्सकीय सेवायें दे रही है, पर वह इस रैकिट का खुलासा कर उसका खात्मा भी चाहती है। नशे के कारोबार से ऊपरी कमाई करने वाले पुलिस के एक असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर का छोटा भाई नशे का एडिक्ट हो जाता है तब उसे इसकी गम्भीरता का पता चलता है और वह उस लेडी डाक्टर का सहयोगी हो जाता है। दूसरा अध्याय एक राक स्टार [शाहिद कपूर] के नशे की गिरफ्त में आने का है जो गिरफ्तार होने के बाद नशा छोड़ने के साथ अपनी कलात्मकता भी खो देता है और कभी युवाओं की आँखों का सितारा रहा होने के बाद उनके आक्रोश का शिकार होता है। तीसरे अध्ययाय में बिहार में कभी हाकी खिलाड़ी रही एक लड़की [आलिया भट्ट] को मजदूरी करने के लिए पंजाब में आना पड़ता है जिसके हाथ नशे के पाउडर की एक थैली लग जाती है और उसे बेचने के चक्कर में वह नशे के माफिया की गिरफ्त में आ जाती है जो उसको न केवल कैद रखते हैं अपितु उसे नशे का इंजैक्शन दे दे कर उसका दैहिक शोषण भी करते हैं। बाद में इन तीनों अध्यायों को बालीवुड अन्दाज में बेतरतीब ढंग से जोड़ दिया गया है व रक्त रंजित अंत दिखा कर फिल्म निबटा दी गई है। अनुभवी कलाकारों ने अपनी भूमिका का यथोचित निर्वाह किया है क्योंकि कथा में ज्यादा कुछ करने की गुंजाइश ही नहीं थी।
पुलिस, राजनेता, के कारनामे सहित नशे की भयावहता के एक अंश को संकेत के रूप में दिखाने का काम तो फिल्म ने किया है पर उसकी व्यापकता और गम्भीरता को उससे पहले उठे सेंसर बोर्ड के विवाद ने कर दिया जिसे फिल्म का ही एक हिस्सा माना जा सकता है। इस विवाद के बिना यह बहुत साधारण फिल्मों में ही गिनी जाती।   
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, मई 20, 2016

पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम ; उर्फ अन्धों का हाथी

पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम ; उर्फ अन्धों का हाथी
वीरेन्द्र जैन
बहुत सावधानी और सुरक्षा के लिए दो महीनों तक खींचे गये पाँच राज्यों की विधानसभाओं के चुना परिणाम तय तिथि पर घोषित हो गये। यद्यपि चुनाव सर्वेक्षण सामने दिखाई दे रहे माहौल से लगाये जा रहे अनुमान से अधिक कुछ नहीं होते हैं, सो लगभग वैसे ही परिणाम सामने आये जैसी सम्भावना सूंघी जा रही थी। ये चुनाव इस विशाल और विविधिताओं से भरे देश के उत्तर पूर्व से लेकर धुर दक्षिण तक के राज्यों में हो रहे थे और परिणाम भी वैसे ही आये। इन परिणामों से देश के मिजाज का कोई अनुमान निकालना नामुमकिन है।
चुनावों में छह मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल और अनेक राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त दल चुनाव लड़ रहे थे, जिनमें से असम में भाजपा, पादुचेरि [पाण्डुचेरी] में काँग्रेस, केरल में सीपीएम-सीपीआई के नेतृत्व वाला वाममोर्चा सरकार गठित करने जा रहा है तो दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में तृणमूल काँग्रेस और तामिलनाडु में एआईडीएमके की सरकार बनने जा रही है जो राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त व्यक्ति केन्द्रित दल हैं। इन सभी दलों की विचार धाराओं और संगठनों में कोई साम्य नहीं है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि जनता ने इसके पक्ष में, या उस विचार या कार्य के विरोध में अपना मत व्यक्त किया है।
भाजपा इसलिए खुशी का मुखौटा लगा रही है क्योंकि उसे पहली बार उत्तरपूर्व के किसी राज्य में सरकार बनाने का मौका मिला है और देश के पश्चिमी राज्यों की पार्टी होने की उसकी पहचान में बदलाव आया है। अब वह तकनीकी आधार से बाहर जाकर भी खुद को राष्ट्रीय पार्टी कह सकती है, भले ही उसके आलोचक कह रहे हों कि यह उसकी विचारधारा की जीत नहीं अपितु यह अवसर काँग्रेस के कुछ महात्वाकांक्षी विधायकों के दल बदलने से उसे मिल पाया है। आंकड़े वाले लोग कह रहे हैं कि उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनावों में ही 36.5% मत मिल चुके थे पर इन विधानसभा चुनावों में 29.8% रह गये। इसी प्रतिशत के आधार पर भाजपा पश्चिम बंगाल और केरल में सीटों की संख्या में पिछड़ने के बाद भी अपने दल का विकास दिखा रही है। जीत के इस अहंकार में कोई नहीं देख रहा कि असम में दूसरे साम्प्रदायिक और अलगाववादी दलों ने भी अपना समर्थन और सीटों दोनों में वृद्धि की है। एआईयूडीएफ ने 12.4% प्रतिशत मत लेकर 12 सीटें जीती हैं, तो बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट ने भी 3.8% प्रतिशत मत लेकर 12 सीटें जीती हैं। भाजपा ने केरल में एक सीट से प्रवेश कर के बंगाल में दो सीटें जीती हैं। गुजरात के एक् उपचुनाव में भी भाजपा ने ही जीत हासिल कर ली, भले ही काँग्रेस ने बराबर की टक्कर दी।
वाम मोर्चा बंगाल में 26 सीटों तक सिमिट कर रह गया जबकि उसके चुनावी सहयोगी काँग्रेस को 45 सीटें मिल गयीं। दूसरी ओर वह इस बात से खुश है कि उसने सबसे शिक्षित, सबसे प्रगतिशील राज्य केरल में दुबारा से सत्ता प्राप्त कर ली है। वहीं तमिलनाडु में 10% से भी अधिक मत पाकर भी पिछली विधान सभा में जीती अपनी 20 सीटें नहीं बचा सकी। उसकी ऐसी क्षति उसकी राष्ट्रीय मान्यता पर भी खतरा ला सकती है। वामपंथी दल भारतीय राजनीति के सबसे अधिक संवैधानिक नियमों का पालन करने वाले, अनुशासित और ईमानदार दल हैं जो अपने अध्य्यन और वैज्ञानिक चिंतन व व्यवहार से लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखे हुए हैं। उनकी कमजोर उपस्थिति भी महत्वपूर्ण होती है।
तामिलनाडु में व्यक्ति केन्द्रित दो दलों ने अपना वर्चस्व बना रखा है। इस इक्कीसवीं शताब्दी के लोकतंत्र में भी ऐसी अन्धभक्ति अचम्भित करती है जिसमे जयललिता के जेल जाने पर वैकल्पिक मुख्यमंत्री साष्टांग दण्डवत करता नजर आता हो और उनके जेल से बाहर आने के बाद रामकथा के भरत की तरह अपना राज पाठ जस का तस सौंप देने में रत्ती भर संकोच न करता हो। उल्लेखनीय है कि भाजपा में जब जब किसी मुख्यमंत्री को बदलने की कोशिश हाई कमान ने की वह विद्रोही हो गया व दूसरा दल बना लिया। कल्याण सिंह, उमा भारती, येदुरप्पा, मदनलाल खुराना, जैसे अनेक उदाहरण हैं। वसुन्धरा राजे ने हाई कमान की लाख कोशिशों के बाद भी पद नहीं छोड़ा था। पुराणों में वर्णित भगवानों की भूमिका करने वाले फिल्मी अभिनेता की पहचान ही दक्षिण की राजनीति का प्रवेश द्वार माना जाता है। भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल जाने के बाद भी सस्ता चावल व उपहार देने वाली पूर्व अभिनेत्री जयललिता का जादू बरकरार है भले ही वैसे ही आरोपों वाले उनके प्रतिद्वन्दी ने बराबर की टक्कर दे कर् ठीक ठाक सीटें प्राप्त कर लीं।
काँग्रेस भले ही सब ओर से पराजित नजर आ रही हो किंतु आंकड़ों के चश्मे से देखने पर वह भी आत्मसंतोष का घूंट पी सकती है। भले ही 30 सीटों वाले एक छोटे से राज्य में सरकार बनाने का अवसर मिला हो किंतु जो कभी सबसे बड़ी पार्टी रही हो उसे शून्य से मुक्ति तो मिल ही गयी है। भले ही काँग्रेस ने असम की सत्ता खो दी हो किंतु उसने अकेले चुनाव लड़ कर 31.1% मत प्राप्त किये जबकि उसकी प्रतिद्वन्दी भाजपा को कुल 29.8% मत ही मिले हैं जिसने असम गण संग्राम परिषद से समझौता करके चुनाव लड़ा था। काँग्रेस गर्व के साथ कह रही है कि उसने साम्प्रदायिक माने जाने वाले एआईयूडीएफ के आग्रह के बाद भी समझौता नहीं किया। आज के आंकड़े बता रहे हैं कि ऐसा करके वह चुनाव जीत सकती थी। बंगाल में उसने लेफ्ट फ्रंट से अधिक सीटें जीत कर विरोधी दल का हक प्राप्त कर लिया। केरल में उसके कुल 5% वोट ही कम हुये हैं, ये बात अलग है कि वहाँ एक सीट के अंतर से ही उसने पिछली सत्ता पायी थी।
सास भी कभी बहू थी की तरह तृणमूल काँग्रेस भी कभी काँग्रेस ही थी और उसी से निकली ममता बनर्जी ने काँग्रेसियों के आचरणों से अलग अपने अथक संघर्ष और कम्युनिष्टों जैसी सादगी के स्वरूप से ऐसी लोकप्रियता प्राप्त कर ली कि गुरु गुड़ ही रह गया और चेला शक्कर हो गया। वामपंथ के शासन काल में काँग्रेस की जगह तृणमूल काँग्रेस ने विपक्ष का पद हथिया लिया और एंटी इंकम्बेंसी का लाभ भी उसे ही मिला। भक्ति अन्धी ही होती है इसलिए शारदा घोटाले में उसके नेताओं के जेल जाने, और स्टिंग आपरेशन में पकड़े जाने के बाद भी उनके समर्थन में कमी नहीं आयी। माल्दा जैसी हिंसक घटनाएं भी उनका समर्थन कम नहीं कर सकीं, भले ही भाजपा ने फिल्मी कलाकारों, सुभाष बोस की फाइलों का तूमार बाँध कर उनके पड़पोते को उनके खिलाफ खड़ा कर दिया हो। संघर्षशील बौद्धिक बंगाल में ममता बनर्जी ने अपना जो स्थान बनाये रखा है वह अचम्भित करता है, पर सच है।  
चुनाव परिणामों में किसी के हाथ में हाथी का कान आया है और किसी के हाथ में उसका पांव आया है। वे उसी आधार पर अपने निष्कर्ष निकाल रहे हैं जबकि सच तो यह है कि ये चुनाव परिणाम आगे की ओर नहीं ले जाते।   
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, मई 17, 2016

सिंहस्थ के विचार महाकुम्भ में मोदी

सिंहस्थ के विचार महाकुम्भ में मोदी
वीरेन्द्र जैन

किसी अवसर पर परम्परागत रूप से जुटने वाले जनसमुदाय को अगर सामाजिक परिवर्तन का साधन बनाया जा सके तो उससे लोगों को जुटाने की आधी समस्या तो वैसे ही हल हो जाती है। इसलिए सिंहस्थ में विचार महाकुम्भ के विचार को एक अच्छा कदम माना जा सकता था बशर्ते इसका वैसा ही स्तेमाल हुआ होता। जब उज्जैन में आयोजित होने वाले कुम्भ मेले में विचार कुम्भ की योजना के संकेत मिले थे तो उसके प्रति प्रशंसा के भाव उभरे थे। किंतु इसे एक राजनीतिक प्रचार का अवसर बना देने से इसका पावन उद्देश्य खो गया व जनता से टैक्स के रूप में वसूले गये धन के अपव्यय का एक और साधन बना दिया गया जैसा कि दिशाहीन सांस्कृतिक आयोजनों के नाम के नाम पर चीन्ह चीन्ह के रेवड़ियां बांटने का काम दशकों से चल रहा है।
उल्लेखनीय है कि तीन दिवसीय विचार महाकुम्भ के पहले दिन सबसे अधिक सर्कुलेशन का दावा करने वाले सूचना [समाचार] पत्र ने लिखा “तीस करोड़ व्यय वाले वातानुकूलित पंडाल में सरकारी अधिकारी - कर्मचारियों की फौज के साथ संघ के बहुसंख्यक कार्यकर्ताओं की उपस्थिति से प्रारंभ में ही यह अनुभूति होती है कि आप संघ के कार्यक्रम में हैं”। पहले सत्र में मोहन भागवत की अध्यक्षता में तो कुर्सियां भरी भी थीं किंतु बाद के सत्र में जब राम माधव वाले सत्र में किसी ने रुचि नहीं ली तो कुर्सियां खाली रहीं। छत्तीसगढ की एक भाजपा महिला नेत्री ने कहा कि इस कार्यक्रम के लिए वह दो बसें भर कर लायी है। देश और प्रदेश के स्वतंत्र विचारकों को आमंत्रण भेजने की बजाय भाजपा और संघ के कार्यकर्ताओं को ही बुलाया गया था। केवल वन्दना शिवा का नाम अपवाद था।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाषण उनके पिछली चुनावी सभाओं में दिये गये भाषणों से पक चुके लोगों को ताज़ा हवा की तरह लगा होगा। उन्होंने भारतीय समाज की जागरूकता और परिवर्तनशीलता को कुम्भ से जोड़ते हुए कहा कि “पहले कुम्भ के दौरान संत और समाजवेत्ता समाज की चिंता करते थे और भविष्य के लिए नई विधाओं का अन्वेषण करते थे। अगले बारह साल के लिए समाज की दिशा और कार्य योजना तय होती थी। पर धीरे धीरे इस परम्परा के प्राण खो गये”। अगर वे चाहते तो अपने वक्तव्य में नेहरू की पंचवर्षीय योजना को भी ला सकते थे जिसके सहारे ही आज़ादी के बाद इस देश ने विकास के मूल आधार स्थापित किये थे। खेद की बात तो यह है कि उन्होंने खुद ही योजना आयोग को समाप्त कर दिया है और उसकी जगह नीति आयोग बना दिया है। 
कभी तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने परमाणु परीक्षण के बाद शास्त्री जी के नारे ‘जय जवान, जय किसान’ में ‘जय विज्ञान’ जोड़ा था किंतु बाद में वह केवल जुमला बन कर रह गया था। मोदी जी ने मुम्बई में मुकेश अम्बानी के एक अस्पताल का उद्घाटन करते हुए गणेश मूर्तियों की कथा के माध्यम से शल्य चिकित्सा के पुराने ज्ञान का जो उल्लेख किया था उससे उनकी वैज्ञानिक समझ पर प्रश्न चिन्ह लगे थे। उससे जुड़ी आलोचनाओं के बाद उन्होंने वैसे तर्क बाद में नहीं दिये भले ही इतिहास के ज्ञान सम्बन्धी कुछ भूलें अवश्य चर्चा में आयीं। इस विचार कुम्भ में उन्होंने कहा कि भारतीय मूल्यों और ज्ञान को वैज्ञानिक आधार पर दुनिया के सामने रखना होगा। विचार को कर्म से जोड़ने के सफल उदाहरण के रूप में उन्होंने शास्त्री जी द्वारा प्रति सोमवार को उपवास का आवाहन और हाल ही में गैस सब्सिडी छोड़ने को बताया। उन्होंने कहा कि हमारे सामने चुनौती है कि समय की कसौटी पर खरे उतरें। श्री मोदी ने सिहस्थ मेले को विमान से देखा। न तो उन्होंने नदी में स्नान किया और न ही महाकाल मन्दिर में दर्शानार्थ गये।  
इस विचार महाकुम्भ में  विचार को कर्म से जोड़ने के कुछ प्रयास हो सकते थे जो नहीं हुये। जैसे एक बार आनन्द्पुर साहब में प्रत्येक आगुंतक को प्रसाद के रूप में एक एक पौधा दिया गया था और इस पौधे को रोपने के लिए कहा गया था। प्रसाद के पौधे को सबने अपना कर्तव्य समझ कर रोपा और इस प्रयास से लाखों पौधे रोपे गये। अच्छा होता यदि ऐसा ही कोई प्रयास इस कुम्भ में भी किया गया होता। जिस तरह से स्वतंत्रता संग्राम के समय तिलक ने गणेश पंडालों के माध्यम से स्वतंत्रता के प्रति जागरूकता बढायी थी वैसा ही कोई प्रयास इस दौरान हो सकता था। अगर लाखों लोग नियत तिथि पर बिना आमन्त्रण के कुम्भ में पहुँच सकते हैं तो उनकी इस ऊर्जा का देश के हित में सार्थक स्तेमाल भी हो सकता है, बशर्ते इसे एक संगठन या दल के हित में कार्यक्रम बनाने की जगह राष्ट्रीय हित के कार्यक्रम में बदला जाये। इस बार के कुम्भ में बहुत बड़ी राशि व्यय की गयी है जबकि देश और प्रदेश अनेक प्राकृतिक संकटों से जूझ रहा है। इसलिए जरूरी है कि ऐसा लगे कि उक्त राशि किसी समुदाय विशेष की भावनाओं के तुष्टिकरण के लिए नहीं अपितु ‘सब जन हिताय’ व्यय हुयी है। दूसरी ओर विभिन्न धार्मिक संस्थानों में अटूट धन राशि एकत्रित होती जा रही है जिसका अगर योजनाबद्ध ढंग से उचित स्तेमाल नहीं होगा तो वह हिंसक टकराव का कारण बन सकती है। इस अवसर पर यदि इसकी कोई योजना बन सकती तो अच्छा था। उम्मीद की जाना चाहिए कि अगले कुम्भ सरकारी धन की जगह आस्थावानों और धार्मिक संस्थानों में जमा दौलत से संचालित होंगे। 
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

  

गुरुवार, मई 12, 2016

उत्तराखण्ड प्रकरण - यह काँग्रेस की जीत भी है हार भी है

उत्तराखण्ड प्रकरण -  यह काँग्रेस की जीत भी है हार भी है
वीरेन्द्र जैन
पहले हाई कोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के प्रकाश में उत्तराखण्ड की रावत सरकार ने सदन में बहुमत साबित कर दिया है जिसे काँग्रेस के नेता लोकतंत्र की जीत बता रहे हैं।
पर क्या सचमुच ऐसा है?
यह सच है कि षड़यंत्रों, शगूफों, सत्य को तोड़-मरोड़ करने के साथ जोड़-तोड़ करने, कैलाश विजयवर्गीय को चार्टर्ड प्लेन से चक्कर लगवाने वाली भाजपा की राजनीति सफल नहीं हो सकी है। राज्यों की सत्ता पर अधिकार जमाने की उसकी फूहड़ जल्दबाजी की सर्वत्र निन्दा हो रही है व न्यायालयों ने उसके इन प्रयासों पर कठोर टिप्पणियां की हैं। केन्द्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार चलाते हुए भी वह विपक्ष की तरह बचकाने व्यवहार कर रही है व चुनाव में कमजोर साबित हो चुके विपक्षी दल को ऎन केन प्रकारेण और कमजोर करने की अनावश्यक प्रशासकीय कोशिशें कर रही है। इन कोशिशों की असफलता से भाजपा का सीधे सीधे कोई राजनीतिक नुकसान नहीं हुआ है और नैतिकता की उसने कभी चिंता नहीं की। अगर नैतिकता की चिंता की होती तो अपने इतिहास में अब तक कई बार डूब मरी होती। अमित शाह को निर्विरोध अध्यक्ष स्वीकार कर लेने वाले भाजपा के प्रमुख सदस्यों में से किसी में भी यह साहस नहीं बचा है कि वह अनैतिक कदमों का वैसा विरोध कर सके जैसा कि उनके गठबन्धन साथी शिवसेना वाले कर रहे हैं।
सत्ता के लाभ पाने को ही राजनीति मानने वाले काँग्रेसी सदन के पटल पर बहुमत मिलने पर, भले ही फूले नहीं समा रहे हों किंतु यह बहुमत तो उन्हें चुनाव से ही प्राप्त था जिसे उनके ही कारनामों ने खतरे में डाला था। मूल समस्या तो यह थी कि मुख्यमंत्री ने अपने कुछ सदस्यों का विश्वास खो दिया था। खुशी केवल इस बात की हो सकती है कि किसी तरह उनकी सरकार फिर से बन गई। काँग्रेसियों को यह सोचने की फुरसत नहीं है कि ऐसी नौबत क्यों आई, और क्यों उसके अपने ही वरिष्ठ विधायकों ने विद्रोह  किया। घोषित नीतियों के अनुसार काँग्रेस और भाजपा ऐसे दो ध्रुवों पर खड़े हैं जो कभी मिल नहीं सकते किंतु अपने नेता और संगठन से नाराज होकर काँग्रेसी भाजपा की ओर ही भागते हैं। अपने काँग्रेसी होने के कार्यकाल में वे जिन बातों के लिए भाजपा की निन्दा करते रहते हैं उससे लगता है कि अपने नेता, संगठन और गुट से उन्हें कितना भी असंतोष हो किंतु वे भाजपा में कभी नहीं जायेंगे। किंतु होता इसका उल्टा ही है, काँग्रेसी, जहाज के चूहों की तरह मौका देख कर कूद जाता है और सीधे भाजपा में दिखाई देता है। भाजपा को भी उसे जस का तस ले लेने में कोई नैतिक संकट महसूस नहीं होता। विधायक को विधायकी और केबिनेट मंत्री को केबिनेट मंत्री का पद वहाँ भी दे दिया जाता है। संसद में भाजपा के 116 सदस्य ऐसे हैं जो किन्हीं दूसरे दलों से आये हैं।  
काँग्रेस के सामने संकट यह है कि उसकी अपनी कोई पहचान नहीं रह गयी है। न पोषाक में, न रहन सहन में, न खान-पान में। किसी भी अन्य बाहरी स्वरूप को देख कर किसी के काँग्रेसी होने की पहचान नहीं बनती। भाजपाइयों के भगवे गमछे की नकल में तिरंगा गमछा भी कुछ ही कांग्रेसी कभी कभी डालते हैं। टोपियों की वपिसी तो अन्ना आन्दोलन के बाद हुयी जिसमें छुपे भाजपाइयों ने भी सफेद टोपी लगाई थी जो बाद में केवल आम आदमी वालों तक सीमित होकर रह गई थी। दिल्ली विधानसभा चुनाव में तो भाजपाइयों तक को नकल में भगवा टोपी पहिनना पड़ी थी पर उसका कोई लाभ नहीं हुआ सो उन्होंने उतर दी फिर बिहार विधानसभा चुनाव में नहीं पहनी। जो भी व्यक्ति अपने निजी स्वार्थ के लिए सत्ता से जुड़ना चाहता है या पूरे हो रहे स्वार्थ में वृद्धि के लिए अपनी ही पार्टी के समकक्ष लोगों से टकरा रहा होता है वह ‘काँग्रेसी’ होता है। पुस्तिकाओं में लिखे गये विचारों का न तो उन्हें पता होता है, न ही उन पर अमल करने की कोई बाध्यता होती है। धर्म निरपेक्षता केवल संघ से भयभीत मुस्लिम वोट बटोरने हेतु दिखावा है। साम्प्रदायिक दंगों के समय काँग्रेसी हिन्दू या मुसलमान हो जाता है। दंगे रोकने के लिए जान न्योछावर करने वाले काँग्रेसियों की कहीं कोई खबर नहीं मिलती, जबकि अपने उस्ताद नेता के लिए पट्ठों की जान कभी कभी जाती भी रहती है। न आप किसी की बैठक [ड्राइंग रूम] से उसके काँग्रेसी होने का पता चला सकते हैं और न ही फर्नीचर आदि से। शादी ब्याह आदि में भी उनकी कोई अलग पहचान नहीं बनती जबकि अपने अंतिम वर्षों में गाँधीजी ने सिर्फ अंतर्जातीय विवाहों में ही भाग लेने का फैसला लिया था व उसे निभाया भी था। आज का काँग्रेसी वोटों की खातिर दहेज विवाह से लेकर बालविवाह तक सब में भाग लेता है। जातियों के सम्मेलन में जाता है और विवादास्पद पाखंडी साधु संतों के आश्रमों में भी दिखाई दे जाता है। 
विधानसभा चुनाव के बाद जब उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री का चयन हुआ था तब भी उसका फैसला दिल्ली में हुआ था। मंत्रिमण्डल का गठन भी निर्विवाद नहीं था तथा इससे शुरू हुआ विवाद लगातार पलता रहा था। लोकसभा चुनावों में काँग्रेस पाँचों सीटें भाजपा से हार गयी थी। जब ताजा असंतोष सामने आया तब भी असंतोष का कोई स्पष्ट मुद्दा नहीं अपितु वैसे ही अस्पष्ट आरोप थे जैसे कि आम तौर पर सभी मुख्यमंत्रियों के खिलाफ लगते रहते हैं। हरीश रावत की कुर्सी के बचाव में विधानसभा अध्यक्ष की चतुराई पूर्ण समझदारी की भी बड़ी भूमिका रही है व निष्पक्ष न्यायधीशों के मजबूत सही फैसले भी उनके मददगार हुये। कहा जाता है कि भाजपा में पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोशियारी की सहानिभूति हरीश रावत के साथ रही है। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि हार दोनों तरफ है पर हरीश रावत कुछ और दिनों तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
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सोमवार, मई 02, 2016

यह केवल आर्थिक अपराध भर नहीं है

यह केवल आर्थिक अपराध भर नहीं है

वीरेन्द्र जैन
पिछले दिनों आन्ध्र प्रदेश की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा ने एक आई ए एस अधिकारी के यहाँ छापा मारा जो उप परिवहन आयुक्त के पद पर नियुक्त था। उसके यहाँ से छापे में आठ सौ करोड़ से अधिक की सम्पत्ति बरामद की गई, जिसमें दो किलो सोना, पाँच किलो चाँदी, चौदह फ्लैटों के कागजात, 4700 मीटर जमीन, हैदराबाद के पाश जुबली हिल्स इलाके में चार मंजिला इमारत, दर्जनों बैंक एकाउंट आदि सम्मलित हैं। उसकी बड़ी बेटी के नाम आठ कम्पनियां हैं जिनकी कीमत सौ से एक सौ बीस करोड़ के बीच आंकी गई है।
मध्य प्रदेश में ऐसे छापे लगभग प्रति सप्ताह पड़ते रहते हैं और आईएएस ही नहीं पटवारियों, चपरासियों ड्राइवरों तक के यहाँ से बड़ी बड़ी रकमें बरामद होती रहती हैं। इस तरह के मामलों में सरकार और समाज की जो उदासीनता देखने को मिल रही है उससे लगता है कि यह आखिरी मामला भी नहीं होगा। यह धारणा है कि जो राशि पकड़ी जाती है वह सम्बन्धित के वास्तविक भ्रष्टाचार से बहुत कम होती है और उसका एक बड़ा हिस्सा वह पहले ही खर्च कर चुका होता है। मुझे एक आयकर अधिकारी ने  बताया था कि राजनेताओं के जनप्रतिनिधि रहते हुए उन पर छापा न मारने की एक अलिखित नीति सी है इसलिए वे लोग बहुत कुछ जानते हुए भी राजनेताओं के यहाँ छापा नहीं मारते। विजीलेंस आयुक्त ने कभी कहा था कि सौ में से केवल चार मामले पकड़े जाते हैं और उनमें से केवल एक को ही सजा हो पाती है। मैंने एक व्यापारी से सवाल पूछा था कि किसी अधिकारी के रंगे हाथों पकड़े जाने के कुछ महीने तक तो उसका उत्तराधिकारी साफ सुथरा व्यवहार करता होगा। मेरी इस बात पर उसने हँसते हुए कहा था कि अगले दिन से ही उसका उत्तराधिकारी बँधे हुए रेट से पैसे लेने लगता है और अपने पूर्वाधिकारी को अकुशल मानता है जिस कारण वह पकड़ा गया। उसका अपनी भाषा में कहना था कि यह व्यक्ति का नहीं व्यवस्था का मामला है।
भूल यह हो रही है कि हम ऐसे प्रत्येक मामले को व्यक्ति तक सीमित करके देखते हैं और उसको सजा दिलवाने की कमजोर सी कोशिश का दिखावा ही हमारा लक्ष्य बन कर रह जाता है। जाँच करने से लेकर सजा दिलाने तक अनेक कमजोर कड़ियां होती हैं जो अपनी कीमत लेकर आरोपी को मुक्त कर देने में रुचि रखती हैं। यही कारण है कि ऐसे कुछ पदों पर नियुक्तियों, प्रमोशनों, और पदस्थापनाओं के लिए बड़ी बड़ी बोलियां लगने की बातें बाहर तक सुनी जाती हैं। पकड़े गये ज्यादातर मामलों में जमानत मिल जाती है, और निलम्बन के दौरान पहले छह महीने तक आधा और फिर तीन चौथाई वेतन पाने वाला अधिकारी/ कर्मचारी तनावमुक्त होकर पूर्ण विलासता का जीवन गुजारते हुए समाज को जीभ चिढाता रहता है, क्योंकि न्याय की प्रक्रिया बहुत लम्बी होती है।  
भ्रष्टाचार के कुछ दूसरे आयाम भी हैं, क्योंकि सरकारी स्तर पर किया गया भ्रष्टाचार पूरे समाज पर् दूरगामी मार करता है। सबसे पहले तो वह सरकार के विकास सम्बन्धी आंकड़ों को कटघरे में खड़ा करता है क्योंकि अधिकांश भ्रष्टाचार तो कार्य व विकास के झूठे आंकड़े बना कर, लक्ष्य से कम काम कराके ज्यादा दिखाने, या काम की गुणवत्ता खराब करके किया जाता है। सड़कें जल्दी उखड़ जाती हैं, पुल जल्दी गिर जाते हैं भवन रहने और काम करने लायक नहीं रहते। खेत असिंचित रह जाते हैं, सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं मिल पाने के कारण प्रतिवर्ष हजारों लोग अकाल मृत्यु के शिकार हो जाते हैं, पर्याप्त टीकाकरण और स्वच्छता न मिल पाने के कारण लाखों करोड़ों लोग अपना स्वास्थ गिरा लेते हैं, उम्र घटा लेते हैं। न्याय की उम्मीद न होने के कारण लोग कानून अपने हाथ में लेने लगते हैं और अपराधी खुले आम अपराध करने लगते हैं। राजनीति में लोग पैसा कमाने के लिए आने लगते हैं व समाज सेवा के उद्देश्य से राजनीति से जुड़ने वालों को हाशिए पर खिसका देते हैं। कहने का अर्थ यह है सारा भ्रष्टाचार जनता की सुख सुविधाओं में कटौती करके किया जाता है व विकास के झूठे प्रचार में करोड़ों रुपये फूंके जाते हैं। इसके विपरीत हमारी व्यवस्था धन सम्पत्ति के साथ पकड़ में आये व्यक्ति को सजा दिलवाने की जिम्मेदारी से अधिक नहीं सोचती। भ्रष्टाचार से हो रहे दूसरे नुकसानों, जिसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था में घटती जाती आस्था भी सम्मलित है की कोई गिनती ही नहीं होती। निरीह आम जनता भी केवल उत्सुकता और आश्चर्य से तमाशा सा देख कर सब कुछ भुला देती है। लोग भ्रष्टाचारियों को यथावत सम्मान देते हैं व उनकी धन सम्पत्ति के प्रभाव में अपने परिवार का रिश्ता जोड़ने में कोई संकोच नहीं करते। विभिन्न तरह के चुनावों में उन्हें विजय दिलाते हैं, पद देते हैं, और उनके अधीन बने रहते हैं।
चीन में पिछले दिनों एक बैंक मैनेजर और उसे भ्रष्टाचार के लिए प्रोत्साहित करने वाली उसकी पत्नी को मौत की सजा सुनायी गई थी, क्योंकि वे उसको भ्रष्टाचार के लिए प्रोत्साहित करती थी। हमें यह सजा बहुत कठोर लग सकती है किंतु कानून के पालन का वातावरण बनाने का प्रभाव यह हुआ था कि हिदुस्तान के लोगों तक में उसकी धमक माहसूस की गई थी।
जब कोई भ्रष्टाचार में पकड़ा जाता है तो सम्बन्धित कार्यालय के कामकाज की कमजोरियां भी सामने आनी चाहिए किन्तु कभी नहीं सुना जाता कि उन कमजोरियों को रेखांकित किया गया है और दूर करने के कोई उपाय किये गये हैं, ना ही उसी सीट पर उससे पहले हुए वैसे ही काम या पूर्व पदस्थ रहे अधिकारियों के कार्यों व उनकी सम्पत्तियों को परखने की कोशिश की जाती है। यदि मध्यप्रदेश सरकार की कन्यादान योजना में नकली मंगलसूत्र पाये गये हैं तो क्यों नहीं अब तक के सभी हजारों विवाहों में दिये मंगलसूत्रों की कैरिटोमीटर से जाँच के आदेश दिये गये, जबकि यह तय है कि ये हरकतें पुराने समय से चली आ रही होंगीं। जब प्रदेश की लाखों भांजियों को यह पता कलेगा कि उनके कन्यादान के नाम पर किसका घर भरा जा रहा है तब क्या होगा? पर ऐसी जाँच सरकारी स्तर पर कभी नहीं होगी न ही प्रदेश में ऐसा कोई विपक्ष मौजूद है जो यह काम कराये। भ्रष्टाचार की पकड़ में आये लोग जिन स्थनों से सोना चाँदी खरीदते हैं, उनके यहाँ से दूसरे भ्रष्टाचारी भी खरीदते होंगे। फिर क्यों नहीं उनसे गहन पूछ्ताछ की जाती जबकि साइकिल चोरों को मार मार कर उससे सारी पिछली चोरियां कुबूल करा ली जाती हैं।
भ्रष्टाचारी कर्मचारी कभी अपने वर्ग की सेवा शर्तों में सुधार के लिए आन्दोलन नहीं करते और न ही किसी हड़ताल में मन से सम्मलित होते हैं। इस तरह वे अपने समकक्षों की सेवा शर्तों के सुधार हेतु सामूहिकता स्थापित नहीं होने देते जिस कारण मांगें पूरी नहीं हो पातीं। ट्रेड यूनियनों के बल में आने वाली कमजोरियों में भ्रष्टाचार की भी भूमिका रहती है।
हर भ्रष्टाचार जनता की जेब से कुछ चुरा रहा है और जनता यह समझ कर सो रही है चोरी दूसरे के यहाँ हो रही है। 
वीरेन्द्र जैन
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