सोमवार, अक्तूबर 05, 2009

घूँघट वाली महिला ब्लोगर

महिला ब्लागर
पिछले दिनों कुछ महिला ब्लागरों की पोस्टें देखने को मिलीं जिनमें कही गयी बातों के कारण उनका प्रोफाइल देखने की इच्छा हुयी। उन्होंने अपनी पोस्टों में बातें तो बड़ी क्रान्तिकारी की थीं या दूसरे के कथन पर अपनी बोल्ड टिप्पणियां दी थीं किंतु अपने प्रोफाइल में वही पुराना परंम्परागत रवैया अपनाया हुआ था। अपनी जन्म तिथि को तो शायद ही किसी ने घोषित किया हो, अनकों ने अपना फोटो नहीं डाला हुआ था और अधिकतर ने अपना निवास स्थान और अपने कार्यालय का अता पता नहीं दिया हुआ था। ये सारी ही बातें एक आम महिला में देखी जाती हैं किंतु वे महिलाएं अपने ब्लागों पर बड़ी बड़ी बोल्ड बातें नहीं करतीं।
यह समय जैन्डर मुक्ति का समय है तथा ब्लाग पर आने वाली महिलाएं तो सारी दुनिया के सामने अपने मन को खोल देने वाले मंच पर आ रही हैं, ऐसे में यह संकोच उनके दावों के साथ मेल नहीं बैठा पाता। देह उघाड़ने की तुलना में मन का खोलना कम कठिन नहीं होता पर यहाँ तो उम्र व रंग रूप व परिचय तक छुपा कर क्रान्तिकारी बना जा रहा है। यहीं विश्वसनीयता का प्रश्न खड़ा होता है व सारा किया धरा बेकार लगने लगता है।
मैं मीरा बाई को देश की पहली फेमनिस्ट मानता हूँ जिन्होंने 'संतन ढिंग बैठ बैठ' लोक लाज को चुनौती दी थी और 'गोबिन्दा को मोल लेकर' घोषित कर दिया था के जिसके सिर पर मोर मुकुट है वही मेरा पति है। अपने विद्रोह के लिए उन्होंने जहर का प्याला भी पिया था और आंसुओं के जल से सींच सींच कर प्रेम की बेल बोयी थी।

15 टिप्‍पणियां:

  1. कहाँ नारी-मुक्ति के पुराने खयालों खोए हैं जी ,

    अब पुरुष-मुक्ति का समय आ गया!

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  2. blog padhnae aayae ho yaa mahila kaa chitr daekh kar uskaa ataa pataa jaan kar usko pehchaan kar uskae ghar kaa rashtaa dudndh rahae ho
    umr haen 60 saal aapki phir bhi kyaa lagan haen
    aesi laagii lagan meera hogayee magan wo to hari gun gaane lagaii
    aap bhi prabhukae gun gaao varna
    "rachna" aajayae gi aur phir dho jayaegi

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  3. aap vicharon ko padhe, baaki baaton se kya matlab,
    vyaktigat jaankaari ko blog per likhna blogger ka faisla hai...

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  4. हद है भाई जी जब चित्र लगते थे लोग कहते थे टिप्पणियाँ पाने को चित्र लगा रखा है.

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  5. बात तो आपने मार्के की कही हैं बशर्ते आपका कोई निजी एजेंडा न हो

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  6. मुझे लगता है कि हम चिट्ठे अपने विचारों को अन्य लोगों तक पहुँचाने के लिए लिखते हैं। यदि कुछ लोग टिप्पणी करते हैं या उस विचार विशेष पर बहस करते हैं तो सोने में सुहगा जैसा हो जाता है। अन्यथा तो अपने विचार लिखने भर से भी हमारी सोच कुछ अधिक साफ़ हो जाती है। व्यक्ति की उम्र,लिंग या शक्ल का इन विचरों के आदान प्रदान से क्या लेना देना? यदि कोई अपने नाम पते,चेहरे से सबको परिचित करवाता है तो यह उसका निजि निर्णय है। इससे पठकों को कोई अन्तर नहीं पड़ता।
    घुघूती बासूती

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  7. बहुत से लेखक अपनी पहचान छुपाते हुए छद्म नाम से लिखते रहे हैं ...अगर महिलाएं ऐसा करती हैं तो क्या परेशानी है ...और फिर ये भी हो सकता है की छद्म नाम हो ही ना ...कई लोग कई नामों से भी तो पुकारे जा सकते हैं ...जहाँ तक साहसिक होने की बात है ... ज्यादा से ज्यादा पुरुष मित्र बनाना आदि ही यदि साहसिक लेखन का मापदंड है तो ....घूघट वाली या बिना घूँघट वाली महिलाएं ऐसी साहसिकता से परहेज रखना चाहती हैं
    तो अच्छा ही है ...!!

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  8. Ghoonghat ki baat kyon? Mahilaaon ki hi baat kyon? Photo dekhakar kya karenge? Tippani deni hai ki nahin ye kya photo dekhkar tay karenge?

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  9. जैन साहब की बातों को सीरियसली क्यों लेते हैं आप लोग? कभी-कभी ये "मूड" में आ जाते हैं… :)

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  10. बहुत ही अजीब और ऊलजूलूल-सी सोच लगती है कि लिखनेवालियों(लिखनेवाले कतई नहीं)को अपनी निजी बातें भी बताना ज़रूरी हो। विचारों से आपको तब तक ही लेना देना है जब तक वो हरेक बात बताएं।

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  11. मित्रो
    कृपा करके इस पोस्ट का भाग दो देखें उसमें आपकी आलोचनाओं और आपत्तियों के उत्तर मिलेंगे

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