सोमवार, अप्रैल 18, 2011

वासुदेव गोस्वामी- जन्म दिवस पर विशेष

जन्मदिवस [18 अप्रैल ] पर विशेष
वासुदेव गोस्वामी अपनी प्रत्युत्पन्नमति के लिए भी मशहूर थे
वीरेन्द्र जैन
हिन्दी की हास्य व्यंग्य कविता के लिए देश में जो नाम शिखर पर लिए जाते रहे हें उनमें वासुदेव गोस्वामी का नाम एकदम से ध्यान में नहीं आता किंतु वे उन नामों में से किसी से भी पीछे और कम प्रतिभाशाली नहीं थे। पर यह बाजार का युग है और अपना माल बेचने की कला माल की गुणवत्ता से अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है। वे दतिया नामक एक छोटे से कस्बे में तब रहे जब संचार के साधनों के रूप में केवल डाक का साधन ही सुलभ था। इस लेख में मैं वासुदेवजी के पूरे लेखन पर चर्चा नहीं करने जा रहा हूँ क्योंकि एक तो मैं उसका अधिकारी विद्वान नहीं हूँ दूसरे उनके काव्य गुणों पर चर्चा के लिए एक लेख से काम नहीं चल सकता।
अपने लेखन के कक्ष में बैठ कर फुरसत में अच्छा व्यंग्य लेखन कर लेना एक बात है किंतु असल परीक्षा तो जीवन के सहज क्षणों में हास्य पैदा करने व उसमें व्यंग्य की मार कर सकने की क्षमता से होती है। वासुदेवजी उसमें निपुण थे। कुछ घटनाएं जो स्मृति में हैं वे यहाँ लिख रहा हूँ।
• एक समय दतिया में चोरियां बहुत होने लगी थीं जिससे पुलिस अधिकारियों की बहुत आलोचना होने लगी थी। इससे दुखी होकर जिले के पुलिस अधीक्षक ने पुलिस की गशत का गोपनीय निरीक्षण करने का फैसला लिया और एक रात वे औरत की पोषाक में जाँच के लिए निकल पड़े। पता नहीं कैसे एक पुलिस वाले ने उन्हें पहचान लिया और सैल्यूट भी ठोक दिया। यह खबर बहुत रूचि के साथ शहर भर की चर्चा में आ गयी। अगले ही दिन के अखबार में वासुदेवजी की कविता छपी-
पुलिस की गशत अब दी सी नजर आने लगी है
पुलिस में बहुत फुर्ती सी नजर आने लगी है
कि जब से एसपी जी औरतों के भेष में घूमे
मुझे अब हर हसीना एसपी सी नजर आने लगी है
• बजट आया तो उसमें कुछ नई वस्तुओं पर टैक्स लगाये गये थे व मनोरंजन पर कर बढा दिया गया था। वासुदेवजी ने अगले ही दिन लिखा-
मिस्सी है कर मुक्त किंतु मंजन पर कर है
सुरमा पर कुछ नहीं नेत्र अंजन पर कर है
खुशमिजाज होने से पहले सोच समझ लो
मनहूसियत मुआफ मनोरंजन पर कर है
• उन्हें नास्तिक नहीं कहा गया किंतु कतिपय धार्मिक रीति रिवाजों और विश्वासों पर चुटकियां लेने में उन्होंने सदैव ही कबीर से होड़ की। एक नागपंचमी वाले दिन बोले जानते हो नाग की पूजा क्यों की जाती है। जब मैंने नहीं में सिर हिलाया तो बोले, इसलिए क्योंकि जो गुण ईश्वर में माने गये हैं वे ही नाग में होते हैं। उनकी इस व्याख्या पर मेरा चेहरा जब और ज्यादा प्रश्नवाचक बन गया तो उन्होंने स्पष्ट किया- बिन पग चलै, सुनहि बिन काना, बिन कर कर्म करहि विधि नाना- ही तो ईश्वर के गुण हैं और यही गुण नाग में भी हैं इसीलिए उसकी पूजा की जाती है।
• शिवरात्रि को भक्त लोग भगवान शिव के विवाह की रात्रि के रूप में मनाते हैं। वासुदेवजी की पैनी निगाह इस विसंगति पर भी गयी कि दूसरे देवताओं की तो जन्म की तिथि मनायी जाती है पर शिवजी के विवाह को मनाया जाता है। उन्होंने लिखा-
अपने विवाह की मनाते सदा वर्षगांठ
हैं तो बूढे बाबा, पर बड़े आधुनिक हैं
• एक बार नगर के इकलौते सिनेमा हाल में 'बालक' नामक बच्चों की फिल्म लगी थी जो टैक्स फ्री होने के कारण बहुत भीड़ खींच रही थी। दर कम होने के कारण लोअर क्लास का र्दशक भी बालकनी में फिल्म देख रहा था। यह बात भी चर्चा का विषय बन गयी। अगले दिन ही वासुदेवजी की कविता अखबार में थी-
उसी दिवस को हो गया मुझको सच्चा इल्म
नगर सिनेमा में लगी जिस दिन बालक फिल्म
जिस दिन बालक फिल्म कहा पत्नी ने जाओ
अगली पंक्तियां मैं भूल रहा हूँ जिसमें आशय यह था कि मैं उसी दिन सिनेमा के टिकिट लेकर आया जो ऊँचे दर्जें के थे और मेंने उन्हें गर्व के साथ ये बात बतायी कि मैं तुम्हारे लिए बालकनी का टिकिट ले कर आया हूँ। इस पर वे बोलीं-
टिकिट कटाने का भी तुमको नहीं सलीका,
'बालक' का मंगवाया लाये 'बालकनी' का
• नगर में साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधियों को संरक्षण देने वाले एक सर्राफा व्यापारी श्री रामप्रसाद कटारे थे जो बेहद साहित्यिप्रेमी ही नहीं थे अपितु सभी तरह की सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करते थे। शाम को उनकी दुकान साहित्यकारों कलाकारों के क्लब में बदल जाती थी। एक दिन उन्होंने यों ही मजाक में पूछ लिया कि जो पुरूष पहिनते हैं उसे तो धोती कहते हैं और जो नारी पहनती है उसे साड़ी क्यों कहते हैं। थोड़ी ही देर में वासुदेव जी ने कटारे जी की शांका का समाधान करते हुये एक छन्द सुनाया-
कहा कटारे ने इससे दुविधा होती है
साड़ी क्यों कहलाती नारी की धोती है
मैंने कहा कि उस सब को साड़ी कहते हैं
दूध ढांकने की जिसमें क्षमता होती है
उल्लेखनीय है कि गर्म दूध को ठंडा करने पर उस पर जो मलाई पड़ जाती है बुन्देलखण्ड में उसे साड़ी पड़ना कहा जाता है।
• वासुदेवजी अपने किसी आपरेशन के लिए अस्पताल में गये। आपरेशन के लिए आपरेशन थियेटर में जाने वाले मरीज आमतौर पर ऐसे हो जाते हें जैसे किसी बधस्थल में जा रहे हों पर वासुदेवजी ने आपरेशन थियेटर में एनस्थीसिया दिये जाने से पहले डाक्टर से पूछा- डाक्टर साहब आपके इष्ट कौन हैं?
डाक्टर ने सोचा होगा शायद ये डर रहे हैं तो वह बोला चिंता न करें आप सब ठीक हो जायेगा
वे बोले वो तो हो जायेगा। पर शायद आपको अपने इष्ट का नाम पता नहीं है इसलिए मैं बताये देता हूं।
डाक्टर व्यवधान पर दुखी था पर उसने धैर्य रखा होगा।
वे बोले- आपके इष्ट हैं, नरसिंह भगवान
''कैसे?'' अब उसने सवाल किया
'' इसलिए क्योंकि वे भी चीरफाड़ करते थे और आप भी करते हैं। इसीलिए तो आपके अस्पताल को नरसिंग होम कहते हैं।''
अब माहौल हल्का था। और आपरेशन सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया।
• जब विन्ध्यप्रदेश की राजधानी रीवा हुआ करती थी तब वे वहाँ आडीटर जनरल जैसी किसी पोस्ट पर कार्यरत थे तथा उनके साहित्यिक मित्रों में विद्यानिवास मिश्र जैसे लोग हुआ करते थे। एक बार उन्होंने बताया कि रीवा में हम लोग एक दैनिक अखबार निकालते थे। मैं सचमुच दैनिक अखबार निकालने के नाम पर चौंक गया था तथा आशचर्य तब और भी बढ गया जब उन्होंने कहा कि वह चौबीस पेज का होता था और हस्त लिखित था। उन्होंने बतौर प्रमाण अखबार दिखाया और बताया कि वह केवल एक साल चला।
अखबार सचमुच हस्त लिखित था और चौबीस पेज का था पर उस पर लिखा हुआ था ''तीन सौ पैंसठ संयुक्तांक'' और उसकी केवल एक ही कापी होली के अवसर पर प्रकाशित की गयी थी जिसमें विद्यानिवास मिश्र से लेकर अनेक महत्वपूर्ण लोगों की रचनाएं थीं, समाचार थे और विज्ञापन भी थे।
• एक बार तो एक कवि सम्मेलन में अध्यक्षता डीआइजी से करायी गयी तथा पुलिस अधीक्षक समेत एक दो और कवि पुलिस अधिकारी मंच पर मौजूद थे तब उन्होंने जो कविता सुनायी उसका आाशय यह था कि जरूर किसी कवि पर कविता चुराने का शक है शायद इसीलिए ये इतने पुलिस अधिकारी यहाँ उपस्थित हैं।
• वे दोहावली को हाहावली कहते थे जिस पर उनका तर्क था कि दोहा माने 2 हा अर्थात हा हा इसलिए हाहावली। उनके इस सहज हास्य के पीछे जरूर कोई गहरा हाहाकार था तभी वे लिख सके हैं-
फूल चुनने को वाटिका में जाता कैसे
कांटोंसे खुद को बचाना नहीं आता है
माल में बनाता तो बनाता कैसे वासुदेव
सुमनों में सुई का चुभाना नहीं आता है
अब तक तो सुलझाई गुत्थियां ही अनकों मैंने
मुझको तो गांठ का लगाना नहीं आता है
भीतर से हिय हुलसाना ही सीखा सदा
ऊपर से माल पहिनाना नहीं आता है
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

1 टिप्पणी:

  1. मिस्सी है कर मुक्त किंतु मंजन पर कर है
    सुरमा पर कुछ नहीं नेत्र अंजन पर कर है
    खुशमिजाज होने से पहले सोच समझ लो
    मनहूसियत मुआफ मनोरंजन पर कर है
    ...
    फूल चुनने को वाटिका में जाता कैसे
    कांटोंसे खुद को बचाना नहीं आता है
    माल में बनाता तो बनाता कैसे वासुदेव
    सुमनों में सुई का चुभाना नहीं आता है
    अब तक तो सुलझाई गुत्थियां ही अनकों मैंने
    मुझको तो गांठ का लगाना नहीं आता है
    भीतर से हिय हुलसाना ही सीखा सदा
    ऊपर से माल पहिनाना नहीं आता है
    bahut khoob. ab itne samvedansheelta kahan dikhai deti hai.

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