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बुधवार, अक्टूबर 07, 2015

अडवाणी जी के नाम खुला खत

 अडवाणी जी के नाम खुला खत
वीरेन्द्र जैन

मान्यवर,
अभिवादन, और उम्मीद कि आप सदा की तरह स्वस्थ होंगे।
पत्र प्रारम्भ करने से पहले एक लतीफा।
एक अध्यापक ने कक्षा में आकर छात्रों से कहा कि एक सवाल का उत्तर बताओ। ‘ दिल्ली से मुम्बई की ओर एक जहाज पाँच सौ किलोमीटर प्रति घंटा की गति से उड़ता है तो मेरी उम्र क्या है?’ यह सवाल सुन कर सारे छात्र हक्के बक्के रह गये किंतु पीछे बैठने वाले कक्षा के सबसे शैतान छात्र ने हाथ खड़ा कर दिया। वह इकलौता था इसलिए  अध्यापक ने उसे उत्तर बताने की अनुमति दी। उसने उत्तर में कहा कि ‘सर आपकी उम्र चालीस साल है’। उत्तर सुन कर अध्यापक गदगद हो गये और उसकी पीठ ठोकते हुए बोले, शाबाश, तुम इस कक्षा के सबसे समझदार लड़के हो, अब तुम इन मूर्खों को बताओ कि तुमने कैसे हिसाब लगाया और सही उत्तर तक पहुँचे।
छात्र गम्भीरतापूर्वक बोला- सर, मेरा एक भाई है, जो आधा पागल है और उसकी उम्र बीस साल है।
यह लतीफा आप पर लागू नहीं होता क्योंकि आप भारतीय राजनीति के सबसे वरिष्ठ, समझदार और चतुर राजनेता हो किंतु अगर किसी अन्य व्यक्ति ने वह बयान दिया होता जो आपने आगरा में एक पुस्तक के लोकार्पण समारोह के दौरान दिया, जिसमें आपने कहा कि ‘दादरी कांड पर यदि मैं कुछ बोलूंगा तो अटलजी नाराज हो जायेंगे’ तो उस पर यह अवश्य लागू हो जाता।  
देश के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी उम्र और स्वास्थ की उस अवस्था में हैं जब व्यक्ति नाराज होना भूल जाता है, यह बात आप अच्छी तरह से जानते हैं। ऐसी दशा में आप जैसे वरिष्ठ और सुलझे हुए व्यक्ति का उपरोक्त बयान हमें उस दशा में छोड़ देता है जो दशा हिन्दी के सामान्य पाठक की किसी बहु-पुरस्कृत कवि की नईकविता पढने के बाद होती है, जिसमें वह मानता तो है कि कविता उसे समझ में नहीं आयी किंतु वह दोष कवि की रचना प्रक्रिया को देने की जगह खुद की नासमझी को ही देता है।
आदरणीय, आप चाहते तो ‘नो कमेंट’ कह कर भी काम चला सकते थे, किंतु आपने वैसा नहीं किया। आप चाहते तो दादरी के हत्यारों को बेकसूर बता सकते थे, महेश शर्मा की तरह इसे दुर्घटना बता सकते थे व सत्तरह साल की लड़की को हाथ न लगाने के महान त्याग का बखान कर सकते थे, पर आपने वैसा भी नहीं किया। दूसरी ओर आपने खानपान के नाम पर मुसलमान परिवार को हमले का लक्ष्य बनाने की भावना की निन्दा भी नहीं की, उसमें कोई राजनीति भी नहीं देखी। आपने कहा कि ‘सरकार काम कर रही है। लेकिन आगे और बहुत कुछ करना होगा’। इस वाक्य में भी समर्थन और विरोध दोनों ही निहित हैं। परिणाम भी ऐसा ही निकला है जिसमें समर्थकों ने समर्थन तलाश लिया और विरोधियों ने विरोध के संकेत पा लिये। पहले भी आपके बयान इतने बहुअर्थी हुआ करते थे कि आपको बयान बदलने या उसे तोड़ मोड़ कर पेश करने वाला बताने की अधिक जरूरत नहीं पड़ी।
पिछले दिनों वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने कहा था कि वर्तमान सरकार ने अपने पचहत्तर पार नेताओं को ब्रेन डैड मान लिया है। उनका आशय था कि अनुभवी स्वस्थ नेताओं का उनके कद के अनुरूप कोई सदुपयोग नहीं किया जा रहा है। जाहिर है कि इनमें वे स्वयं अपनी और विशेष रूप से आप, शांता कुमार और मुरली मनोहर जोशी की ओर इंगित करते महसूस हो रहे थे। उनके इस स्पष्ट बयान के बाद भी पार्टी में कोई हलचल नहीं हुयी। इस जैसे अन्य कई बयान भी सूखी रेत में गिरे पनी की तरह सोख लिये गये। सवाल यह है कि क्या भाजपा अब जीवंत लोगों का समूह है या केवल मृतक समान लोगों की भीड़ भर होकर रह गयी है। आप पार्टी के सबसे वरिष्ठ, सबसे अनुभवी, सबसे चतुर, राजनेता थे जो कई बार राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे, पार्टी निर्माण की सबसे प्रमुख योजनाओं के वास्तुकार रहे, संवैधानिक पदों पर रहे तथा उपप्रधानमंत्री के रूप में काम करते हुए परोक्ष में प्रधानमंत्री रहे। पार्टी में आपके प्रशंसक भी समुचित रहे। फिर ऐसा क्या हो गया था कि जब मोदी को प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी के रूप में मनोनीत करने के खिलाफ आपने त्यागपत्र दिया तो आपके साथ बहुत  सारे लोग खड़े नहीं हुये जबकि शांता कुमार और शिवराज सिंह चौहान जैसे बहुत सारे लोग मोदी को उस पद पर नहीं देखना चाहते थे। कहने का अर्थ यह है कि पार्टी जिस लोकतांत्रिक स्वरूप का दावा करती थी वह कहीं नजर नहीं आया। तय था कि प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी का चुनाव अगर लोकतांत्रिक तरीके से हुआ होता तो आपका पलड़ा भारी रहा होता भले ही चुनाव परिणाम कुछ भिन्न आते। संजय जोशी को बाहर करने के मामले में भी कहीं लोकतंत्र नजर नहीं आया। सच्चा लोकतंत्र तब ही होता है जब फैसला बहुमत का माना जाये किंतु उस फैसले की आशंका से अल्पमत खुद ही अपनी आवाज दबा देने को मजबूर न हो। चिंता की बात तो यह है कि भाजपा में आवाज उठना ही बन्द हो गयी है। इमरजैंसी के दौरान इन्दिरा गाँधी की चापलूसी करने इन्दिरा को इंडिया बतलाने या संजय गाँधी के जूते उठाने वालों की सबसे कटु निन्दा भाजपा के नेता ही करते रहे हैं। काश आपने मध्य प्रदेश के वर्तमान पार्टी अध्यक्ष द्वारा मोदी और शिवराज को भगवान व देवता बताये जाने वाले भाषण सुने हों। जब राम जेठमलानी, शांता कुमार, आर के सिंह, या शत्रुघ्न सिन्हा कोई अलग बात कहते हैं तो सबके मुँह में दही जम जाता है। उन बयानों पर कोई तर्क वितर्क नहीं होता। अमित शाह जैसे व्यक्ति को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में बिना चूं चपड़ के सह लिया जाता है। आखिर ऐसा क्या डर है कि आप जैसा वरिष्ठ नेता भी अपनी बात को घुमा फिरा कर कहे जिसका कोई स्पष्ट सन्देश नहीं जा रहा हो। क्या जीवन की लम्बाई इतनी कीमती है कि आदमी अपनी जुबान कटा कर और हाथ पैर बँधवा कर भी बना रहे। मुँह से गों गों की ऐसी आवाज निकाले जो किसी की समझ में ही नहीं आये। आप जैसे अनुभवी व्यक्ति को संकेत मिल रहे होंगे कि असंतोष कितना है किंतु वह अन्दर ही अन्दर खलबला रहा है। जार्ज आरवेल के ऎनिमल फार्म  सोल्झेनित्सिन के वार्ड नम्बर नौ या ‘1984’  से भी बुरे हाल हैं।
आदरणीय, इस आवाज को बाहर निकलने के लिए कुछ कीजिए बरना यह अन्दर ही अन्दर जहर बन जायेगी और यह जहर कब, कहाँ, कैसे फूटेगा यह कहा नहीं जा सकता।
वीरेन्द्र जैन                                                                          
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गुरुवार, मार्च 27, 2014

अनैतिकिता और अवसरवाद की अति तंत्र में अनास्था उपजाती है

अनैतिकिता और अवसरवाद की अति तंत्र में अनास्था उपजाती है
वीरेन्द्र जैन

                भाजपा केम्प से प्रतिदिन जो खबरें आ रही हैं वे भीड़ के नाम पर अवसरवादी भिखमंगे एकत्रित करने की खबरें हैं। उल्लेखनीय है कि एक प्रदेश की राजधानी में नगर के बीचों बीच एक पार्क है और उसके किनारे रैन बसेरा है। इस पार्क के आसपास सैकड़ों की संख्या में भिखारी रहते हैं जो अपने काम पर निकलने के अलावा अपना पूरा समय इसी पार्क में बिताते हैं और बहुत अधिक प्रतिकूल मौसम में रैन बसेरे का सहारा ले लेते हैं। यह पार्क राजनीतिक दलों और स्वयंसेवी गैर सरकारी संगठनों की रैलियों धरनों अनशन आदि के काम में भी आता है। उक्त भिखारियों का एक ठेकेदार है जो तय दर पर राजनीतिक दलों या गैर सरकारी संगठनों के लिए भीड़ सप्लाई करने का काम करता है। उस दिन ये सारे भिखारी चन्द रुपयों और भरपेट भोजन के लिए उस दल या संगठन के कार्यकर्ता बन जाते हैं। भाजपा आदि दलों में इस चुनाव के दौर में सम्मलित होने वाले राजनेता भी इन्हीं भिखमंगों का दूसरा रूप हैं।  
       नगर पालिका के स्तर पर होने वाली राजनीति का यही काम आज राष्ट्रीय स्तर पर हो रहा है और अपने लालच की पूर्ति के लिए चन्द नेता अचानक इतने विपरीत विचार के दलों या गठबन्धनों में एकत्रित हो रहे हैं कि उनकी बेशर्मी पर घृणा पैदा हो रही है। विचार परिवर्तन या दल परिवर्तन तो स्वाभाविक और स्वस्थ संकेत है बशर्ते कि यह सचमुच विचार परिवर्तन हो। किंतु जब ठीक चुनाव के समय अपने मूल दल के साथ सौदेबाजी में असफल हो जाने पर दूसरे दल में टिकिट मिलने की शर्त पर यह काम किया जाता है तो जुगुप्सा जगाता है।
       हर मोबाइल में उपलब्ध वीडियो कैमरे, सीसी कैमरे, हिडिन कैमरे और टेप रिकार्डर, मीडिया की प्रतियोगिता में हो रहे स्टिंग आपरेशन, नेट के माध्यम से तीव्र गति की सम्प्रेषण क्षमता, मोबाइल फोन से लोकेशन की जानकारी, आदि ने दुनिया को बेहद पारदर्शी बना दिया है। ऐसी दशा में नकली आचरण वाली राजनीति की उम्र लम्बी नहीं हो सकती। इन दिनों जो कुछ भी परदे के पीछे घटित होता है वह क्षणों में सामने आ जाता है। अमेरिका के राष्ट्रपति भवन के कारनामों से लेकर विकीलीक्स द्वारा एकत्रित किये गये बातचीत के टेप और इंतरनेट सन्देशों की चोरी से गोपनीयता दुर्लभ चीज हो गयी है। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों एनसीपी नेता शरद पवार पहले नकार के बाद भी मोदी से अपनी गुप्त भेंट को छुपा नहीं सके थे।  
       इस सच के बाद भी अवसरवादी अनैतिक आचरणों की भरमार जनता के विवेक को सीधी चुनौती देते लगते हैं। इससे भी अधिक चुनौतीपूर्ण उस दल का आचरण लगता है जो ऐसे लोगों को सार्वजनिक रूप से गले लगाते हुए उन्हें वे सर्वोच्च पद दे देता है जिनके लिए उनके कर्मठ कार्यकर्ता वर्षों से उम्मीद कर रहे होते हैं। ये कार्यकर्ता भले ही तुरंत अपने दल के नेताओं के प्रति विद्रोह करते नज़र न आते हों किंतु वे जिन आदर्शों के लिए उससे जुड़े होते हैं वह विश्वास डगमगा जाता है, व राजनीति का उद्देश्य स्वार्थ की येन केन प्रकारेण पूर्ति में बदल  जाता है। अपने नेताओं के पीछे पीछे क्षणों में दल बदल लेने वाले लोग कार्यकर्ता से गिरोह में बदल जाते हैं और उनका लक्ष्य भी सामाजिक परिवर्तन और विकास का न हो कर व्यक्तिगत हित साधन हो जाता है।
       ऐसी गतिविधियां लोकतंत्र में अनास्था पैदा करती हैं क्योंकि सच्चे वोटर ने जिस घोषणा पत्र से आकर्षित होकर अपना समर्थन दिया होता है वह ठगा हुआ महसूस करता है। शिक्षित क्षेत्र में कम मतदान और पहली बार पाँच विधानसभा चुनावों में नोटा की सुविधा मिलने पर अच्छी संख्या में उसका उपयोग होना इसका संकेत है। लोकतंत्र की रक्षा के लिए अब प्रत्येक दल में सदस्यता नियमों और टिकिट वितरण की आचार संहिता को अनिवार्य किया जाना चाहिए। मान्यता प्राप्त दलों द्वारा संसद और विधानसभा में टिकिट की पात्रता के लिए न्यूनतम दो साल की वरिष्ठता को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।         
       मीडिया के सामने आँखें पौंछते हुए जसवंत सिंह हों, या बार बार रूठ कर अपना असंतोष व्यक्त करते अडवाणी हों, मुरली मनोहर जोशी हों, वरिष्ठ समर्पित नेता हरेन पाठक हों, लालमुनि चौबे हों, लालजी टण्डन हों, सिद्धू हों, अपने स्वय़ं सेवकों से नमो नमो का जाप न करने की सलाह देते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत हों, सभी मोदी की आक्रमकता से आहत और असमर्थ से प्रतीत हो रहे हैं। दूसरी ओर जिस कांग्रेस मुक्त भारत का आवाहन किया जा रहा हो उसी कांग्रेस के नेताओं को बिना सदस्यता फार्म भराये भर्ती वाले दिन ही टिकिट भी दे दिया जा रहा है। सुषमा स्वराज जैसी वरिष्ठ नेता और शैडो मंत्रिमण्डल के माडल के अनुरूप प्रधानमंत्री पद की स्वाभाविक दावेदार को दुख व्यक्त करते हुए कहना पड़ रहा है कि जसवंत सिंह को टिकिट न देने का फैसला असाधारण है और संसदीय बोर्ड की बैठक से बाहर लिया गया है। देश भर में अपनी लहर का दावा करने वाले का डर इतना ज्यादा है कि दो जगहों से उम्मीदवारी घोषित कर देने के बाद भी न तो गुजरात विधानसभा की विधायकी छोड़ने को तैयार है और न ही मुख्यमंत्री पद छोड़ने को तैयार है।
       दुर्भाग्य से हमारी न्याय व्यवस्था में आस्था कमजोर होते जाने से समाज में हिंसा और जंगली न्याय जगह बनाते जा रहे हैं। संसद में कामकाज निरंतर बाधित किया जा रहा है। भ्रष्टाचार ने कार्यपालिका को नाकारा बना दिया है। दुनिया का इतिहास गवाह है कि जब जनता की आस्था लोकतंत्र से टूटती है तो अराजकता आती है या उसका स्थान तानाशाही या फौजी शासन ही लेता है। इसलिए लोकतंत्र का मखौल बनाना खतरनाक हो सकता है।    
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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बुधवार, फ़रवरी 19, 2014

तमाशों और षड़यंत्रों की राजनीति

तमाशों और षड़यंत्रों की राजनीति
वीरेन्द्र जैन

       अपने शैशव काल में बच्चे कपड़ों में ही मलमूत्र विसर्जन कर देते हैं जिसे उनकी गलती नहीं माना जाता, किंतु यही काम जब वे थोड़ा बड़ा होने पर करते हैं तो यह असहनीय होता है। खेद है कि हमारा लोकतंत्र एक लम्बा समय गुजार लेने के बाद भी वैसी ही भूलें कर रहा है जैसी वह अपनी शैशव काल में करता था। प्रारम्भिक चुनावों में स्वतंत्रता आन्दोलन की सेना के रूप में कार्यरत कांग्रेस देश में लोकतांत्रिक रूप से चुनी जाने की स्वाभाविक अधिकारी थी, और कांग्रेस के अलावा कम्युनिष्ट या समाजवादी धड़ों में भी कांग्रेस के स्वतंत्रता आन्दोलन से निकले लोग थे। मुझे अपने बचपन की याद है कि 1962 में कांग्रेस का प्रचार करने आये लोगों से राष्ट्रकवि मैथली शरण गुप्त ने एक रोचक वाक्य कहा था कि वोट देने का अधिकार सबको है पर वोट लेने का अधिकार केवल कांग्रेस को है। प्रारम्भिक दिनों में हिन्दू महासभा एक प्रमुख दल हुआ करता था और उसकी लोकप्रियता जनसंघ से अधिक थी। मैंने सातवें दशक में इसके अध्यक्ष बृज नारायण बृजेश के कुछ भाषण सुने हैं जिनके अंश अब भी स्मृति में हैं। 1967 में श्रीमती विजयाराजे सिन्धिया के जनसंघ में चले जाने पर टिप्पणी करते हुये बृजेशजी का भाषण इस तरह का हुआ करता था- राजमाता ने आपको क्या दिया?
“दिया [दीपक जो जनसंघ का चुनाव चिन्ह होता था]”
”ग्वालियर की जनता को क्या दिया?”
“दिया”
“बेटे को क्या दिया?”
“दिया [माधव राव सिन्धिया पहले जनसंघ के सदस्य थे]”
और इस ‘दिया’ की लम्बी श्रंखला के बाद वे कहते थे कि कुछ लिया न दिया और तुम्हारे दरवाजे पर चिपका दिया। अरे तुम लोग क्या राजमाता को देखने भीड़ बना कर चले आते हो, एक पाँच रुपये की लक्स की बट्टी [साबुन] खरीदो और उससे अपनी घरवाली को नहलाओ तो वही राजमाता जैसी दिखने लगेगी।
       श्री बृजेश के भाषण आम जनता के बीच आकर्षण का केन्द्र होते थे और कहा जाता है कि इसी शैली की नकल जनसंघ के तत्कालीन नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी और हिन्दी पट्टी में उन्होंने भी भाषण की लगभग इसी परम्परा को आगे बढाया था। 1971 के आम चुनावों के दौरान उनके भाषण का एक अंश याद आता है- “इन्दिरा गान्धी कैत्ती यें [कहती हैं] कि गरीबी हट्टाओ, अरे भाई हट्टान्ने का अर्थ है इधर से हट्टा कर उधर रख दी, उधर से हट्टा कर इधर रख दी। पर मैं नईं कैत्ता कि गरीबी हट्टाओ, मैं कैत्ता हूँ कि गरीबी मिट्टाओ। इन्दिराजी कैत्ती यें कि जब मैं दोनों हाथ उठाकर भाषण देता हूं तो उन्हें हिटलर की याद आती है, पर मुझे भाषण की कोई ऐसी शैली नहीं पता कि जिसमें टाँग उठाकर भाषण दिया जाता हो। इत्यादि। बाद में स्थानीय भाषा और मुहावरे के साथ विनोद के प्रयोग राजनारायण और लालू प्रसाद जैसे राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय नेताओं ने भी किये। परिणाम यह हुआ कि जिस तरह चुटकलेबाजों ने कविता के मंच से गम्भीर साहित्य को बाहर कर दिया, ठीक उसी तरह राजनीतिक मंच की इस चुटकलेबाजी ने वैचारिक राजनीति को हाशिये पर धकेल दिया।  
       देश में प्रारम्भिक आम चुनावों के बाद हम लोग एक दर्जन से अधिक आम चुनावों से गुजर चुके हैं और इस दौरान न केवल शिक्षा व साक्षरता में संख्यात्मक व गुणात्मक परिवर्तन आया है अपितु सूचना और संचार के साधनों का भी तेज विकास हुआ है किंतु हमारे कुछ राजनीतिक दल व राजनेता अभी भी जनता को तरह तरह के तमाशों और शब्द जालों में उलझा, वोट झटक कर सत्ता हथियाने की तरकीबों का प्रयोग करने में लगे हैं। दुर्भाग्य यह है कि भौतिक विकास के कई सोपान चढ जाने के बाद भी देश में राजनीतिक चेतना को विकसित करने की दिशा में समुचित काम नहीं हुआ और लटकों झटकों व तमाशों की राजनीति करने वाले व्यक्ति व दल दुनिया में हमें शर्मसार कर रहे हैं। अडवाणीजी एक डीजल चालित वाहन को रथ के रूप में परिवर्तित कराते हैं और एक विवादित मस्ज़िद को ध्वंश कराने के उद्देश्य से दशहरा आदि की शोभायात्राओं की तरह रामलीला के पात्रों जैसे पूरे देश की यात्रा करते हैं। इस तरह एकत्रित भीड़ की ओट में दूसरे समुदाय के खिलाफ अप्रिय नारे लगा उन्हें उत्तेजित कर दंगों की देशव्यापी श्रंखला बनायी जाती है। उनके उक्त वाहन पर उनकी पार्टी का चुनाव चिन्ह बना होता था। उनकी आम सभाओं में एक विशालकाय चित्र चलता था जिसमें वैष्णवों के आराध्य श्रीराम को सलाखों के पीछे कैद दिखाया जाता था और उनकी कल्पित मुक्ति के लिए संघर्ष का आवाहन होता था। वे एक-एक घर से मन्दिर निर्माण के लिए ईँट एकत्रित करने के बहाने अपना चुनाव प्रचार करते हैं और सर्वाधिक अविकसित बीमारू राज्यों के सीधे सरल धर्मप्राण लोगों को ध्रुवीक्रत करके लोकसभा में अपनी संख्या दो से दो सौ तक बढा लेते हैं, व क्रमशः देश की सत्ता प्राप्त करने के लिए अपने प्रमुख मुद्दों को स्थगित करने का समझौता कर लेते हैं। आज भी नेता आदिवासी पट्टी पर जाकर तीरकमान उठा कर फोटो खिंचवाते हैं या तलवार लिए मंच पर खड़े हो जाते हैं। स्थानीय लोगों से एकजुटता दुखाने के लिए वे उनकी ढीली-ढाली पोषाक पहिन कर बागड़ बिल्ले की तरह दिखते हैं।
       उक्त रथयात्रा का दौर वही दौर होता है जब देश में एक निर्माणाधीन लोकतंत्र की इमारत कमजोर होने लगती है और आन्ध्र में तेलगुदेशम, उड़ीसा में बीजू जनता दल, तामिलनाडु में डीएमके, एआईडीएमके, केरल में केरल कांग्रेस, बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, महाराष्ट्र में शिवसेना, पंजाब में अकालीदल, कश्मीर व उत्तरपूर्व में स्थानीय व अलगाववादी दल, उ,प्र, में यादववादी समाजवादी पार्टी, मुस्लिम लीग, रामदेव की स्वाभिमान पार्टी, आदि दल, राष्ट्रीय दलों और राष्ट्रीय सोच का स्थान हथियाने लगते हैं और इसके लिए वैसे ही हथकण्डे अपनाने लगते हैं जैसे कि भाजपा अपना कर सफल हो चुकी होती है। अभी नवोदित आम आदमी पार्टी भी उसी रास्ते से आगे बढने का प्रयास कर रही है। वे चलन से दूर हो चुकी गान्धीवादी टोपी को सिंथेटिक पेंट शर्ट के साथ पहिन कर अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह को अपने प्रतीक चिन्ह की तरह स्तेमाल करते हुए झाड़ू लहरा रहे हैं। मंत्रिमण्डल के सदस्य स्वयं संविधान की शपथ लेकर गैर संवैधानिक काम कर रहे हैं और जो आन्दोलन उनके दल को करना चाहिए उसे सस्ती लोकप्रियता के लिए मुख्यमंत्री कर रहे हैं। दुखद है कि अधिकांश दल फिल्मी और खेल की दुनिया से लेकर तरह तरह के लोकप्रिय गैर राजनीतिक व्यक्तियों की लोकप्रियता को वोटों में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं।         
       अगर सत्ता पाने हेतु चुनाव जीतने के लिए दंगे करवाना और तमाशे करना जरूरी लगने लगे तो हमें अपनी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर दुबारा विचार करने और अविलम्ब आवश्यक सुधार करने की जरूरत है। राजनीतिक दलों के लिए एक साझा आचार संहिता बनायी ही जाना चाहिए जिससे कि लोकतंत्र तमाशों से न चलकर राजनीति से संचालित हो।
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, जून 20, 2013

भाजपा में छाया स्वार्थ का आपातकाल

भाजपा में छाया स्वार्थ का आपातकाल
वीरेन्द्र जैन       
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       संघ परिवार के लोग न तो लोकतंत्रिक हैं, न सच्चे, न ईमानदार,और न ही निर्भय। हाल में ही घटित मोदी प्रकरण के बाद यह बात और अधिक पुष्ट हो चुकी है। वे अवसरवादी, लालची, सिद्धांतहीन, और भयजनित हिंसा से भरे हुये लोग हैं जो मौका लगने पर कमजोरों को मारकर अपनी बहादुरी बखानते रहते हैं, और उसमें भी दूसरों को उकसाने व स्वयं को खतरों से दूर रख कर अवसर पर भुजायें पुजवाने के लिए आगे खड़े मिलते हैं। इनका नेतृत्व सवर्णों या सम्पन्नों के पास रहता है किंतु हिंसक गतिविधियों के लिए ये दलितों, आदिवासियों या पिछड़ों को आगे करते रहते हैं। इतना सब साफ और स्पष्ट हो जाने के बाद भी कि भाजपा आरएसएस का ही आनुषांगिक संगठन है और छोटी से छोटी बात में भी उसी का फैसला अंतिम होता है, ये गलतबयानी करते हुये कहते हैं कि संघ तो केवल माँगने पर सलाह देता है।
       मोदी को इन दिनों इस तरह से भाजपा, एनडीए, के केन्द्र में ले आया गया है, गोया उनके बिना देश की संसद में  सबसे अधिक संख्या वाले विपक्षी दल का अनाथ हो जाना तय हो। 2002 में गुजरात के अन्दर घटित मुस्लिमों के नरसंहार से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम हुए मोदी को विकास पुरुष, लौह पुरुष, अच्छा प्रशासक, आदि आदि विशेषणों से मण्डित करके उनके करनामों पर परदा डालने का सोचा समझा काम किया गया तथा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के शिकार हुए हिन्दुओं को मोदी के पीछे लामबन्द करने की चाल चली गयी। इस अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को अगर भाजपा के वरिष्ठ नेता, पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण अडवाणी और एनडीए के अध्यक्ष शरद यादव ने बीच में ही थाम नहीं लिया होता तो बहुत सम्भव था कि अडवाणी के रथ की तरह यह भी अपने पीछे पीछे एक खूनी लकीर खींचता हुआ निकल चुका होता।
       सच तो यह है कि मोदी के व्यक्तित्व का सारा महल झूठ पर खड़ा किया गया है और अभी भी अवसर के अनुकूल उनको वापिस खींचने के अनेक चोर रास्ते खुले रखे गये हैं। अभी तक भी उनको भले ही मीडिया में भाजपा की ओर से अगले प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी के नाम से उछाला जा रहा हो, पर, पार्टी की किसी भी फोरम पर उन्हें प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित नहीं किया गया है। अभी तक भी यह बहुत स्पष्ट नहीं है कि उन्हें इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों के प्रचार का ही चेयरमैन बनाया गया है या अगले साल सम्भावित लोकसभा चुनावों के लिए प्रभारी बनाया गया है। यदि यह पद इतना ही महत्वपूर्ण है तो इसके ठीक से निर्वाह के लिए मोदी ने गुजरात के मुख्य मंत्री पद को छोड़ने या अपना उत्तराधिकारी तय करने का काम क्यों नहीं किया! क्या भाजपा इतनी ही नेतृत्वशून्य हो चुकी है कि कहीं भी मोदी का विकल्प संघ के पदाधिकारियों को नज़र ही नहीं आता! प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी के लिए तो मोदी, प्रचार समिति के चेयरमैन पद के लिए भी मोदी और गुजरात के मुख्यमंत्री पद के लिए भी मोदी ही चाहिए! दुनिया में सबसे बड़ी क्रांति के नेता ने कहा था कि अच्छा नेता वह नहीं है जो बहुत सारे अनुयायी बनाये अपितु अच्छा नेता वह है जो और और अपने जैसे नेता विकसित करे। यह तब ही सम्भव है जब कोई पार्टी किसी सिद्धांत पर आधारित हो और सरकार के बनने, बिखरने की चिंता किये बिना अनुशासन से कोई समझौता नहीं करे। उचित नेतृत्व के अभाव में भाजपा को बंगारू लक्ष्मण जैसे नेताओं को अध्यक्ष बनाना पड़ता है जो किसी काल्पनिक रक्षा उपकरण की खरीद में मदद करने के नाम पर धन लेते और अगली बार डालर में माँगते हुए कैमरे में कैद हो जाते हैं तथा जिन्हें बाद में सजा और ज़ुर्माना भी होता है। पर इस बीच में उनकी पत्नी को सांसद का टिकिट देकर व राजस्थान के सुरक्षित क्षेत्र से सांसद बना कर उपकृत किया जाता है। रोचक यह है कि जरा जरा से स्वार्थों पर पार्टी के झगड़े उजागर हो जाने पर ये पार्टी के अन्दर लोकतंत्र की दुहाई देने से नहीं चूकते पर अध्यक्ष जैसे अति महत्वपूर्ण विषयों पर यह लोकतंत्र कहीं नज़र नहीं आता। जब संघ चाहता है तो गडकरी जैसे व्यापारी नेताओं को न केवल थोप देता है अपितु दुबारा भी थोपने के लिए संविधान बदलवा देता है। दूसरी बार अगर कहीं मामूली सा विरोध देखने में आता है तो वह उन वकील नेताओं की ओर से देखने में आता है जिन्हें बतौर मेहनताना राज्यसभा की सदस्यता और पार्टी में पद देकर उपकृत किया गया होता है। कभी अडवाणी के हनुमानों को अध्यक्ष पद दे दिया जाता है जो घबरा कर अपनी पत्नी की बीमारी के बहाने उसे छोड़ कर भाग जाते हैं पर बाद में बीमारी के रहते ही उपाध्यक्ष पद स्वीकार कर लेते हैं।
       आइए अब भाजपा के सर्वोत्तम प्रचारित किये जा रहे नेता मोदी की बात करें। नरेन्द्रमोदी स्वाभाविक नेता के रूप में उभरकर मुख्यमंत्री नहीं बने थे अपितु उन्हें ऊपर से थोपा गया था। यह पद उन्होंने दिल्ली में पार्टी प्रवक्ता का का र्य करते हुए और गोबिन्दाचार्य के साथ रहते हुये जुगाड़ जमा कर पाया था। यह पद पाने के लिए उन्होंने भाजपा के ही विधिवत चुने हुये मुख्यमंत्री को विस्थापित किया था। वे उस समय विधायक भी नहीं थे तथा जब उन्होंने उपचुनाव लड़ कर विधानसभा की सदस्यता प्राप्त की उस समय विधानसभा की चार सीटों के लिए उपचुनाव हुये थे जिनमें से तीन पर भाजपा हार गयी थी व मुख्यमंत्री रहते हुये नरेन्दमोदी जिस सीट से जीते थे उसे उससे पूर्व जीते भाजपा प्रत्याशी ने  उन से दुगने मतों से जीता था। यह नरेन्द्रमोदी की कथित  'लोकप्रियता' का नमूना था कि उस सीट पर भाजपा की जीत आधी रह गयी थी । मोदी को लोकप्रियता गोधरा में साबरमती एक्सप्रैस की बोगी संख्या 6 में हुयी आगजनी और उसके बारे में किये गये गलत प्रचार के बाद मिली जिसके आलोक में उन्होंने साम्प्रदायिकता से दुष्प्रभावित हो चुके एक वर्ग को हिंसा और लूटपाट की खुली छूट देकर अपने प्रभाव में ले लिया तथा बाद में उनके अपराधबोध में उन्हें सुरक्षा का आश्वासन भी दिया, जिससे वे उनके गुलाम हो गये। जब गुजरात में पैदा कर दिये गये साम्प्रदायिक तनावों को देखते हुए तत्कालीन चुनव आयुक्त लिंगदोह ने चुनावों को कुछ समय के लिए स्थगित किया था तो इन्हीं मोदी ने उन जैसे ईमानदार प्रशासक के लिए जिस भाषा का प्रयोग किया था उसे याद करने के बाद अगर कोई उन्हें प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाने की सोचता भी है तो उसकी सोच पर शर्म आती है। आज तक देश का कोई प्रधानमंत्री ऐसा नहीं हुआ जिसने ऐसी भाषा बोली हो या जिसके इतिहास में मोदी जैसे आरोप लगे हों। आज भाजपा के लोग प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मौनमोहन सिंह या मौनी बाबा कहते हैं किंतु अडवाणीजी बतायें कि भाजपा सरकार के ही एक वरिष्ठ मंत्री हरेन पंड्या की हत्या के बाद जब वह देश के गृह मंत्री रहते हुए शोक प्रकट करने गये थे तब हरेन पंड्या के पिता ने जोर शोर से नरेन्द्र मोदी पर हत्या के लिए जिम्मेवार होने का आरोप लगया था तब अडवाणी जी के मुँह में दही क्या इसलिए जम गया था क्योंकि वह गुजरात के गान्धी नगर से चुनाव लड़ने के लिए वहाँ के मुख्यमन्त्री की कृपा पर निर्भर रहते हैं। अडवाणीजी ही क्यों पाँच साल राज्यसभा में विपक्ष के नेता रहने के कार्यकाल में जिनकी सम्पत्ति 23 करोड़ से 256 करोड़ हो जाती है ऐसे एडवोकेट अरुण जैटली भी राज्य सभा में पहुँचने के लिए मोदी की दया पर रहते हैं। अपने और अपने मंत्रियों पर चल रहे आपराधिक मुक़दमों के लिए देश के सबसे अच्छे क्रिमिनल वकील राम जेठमलानी को भी मोदी  राजस्थान से राज्य सभा में भेजकर मेहनताने का एक भाग चुकाते हैं। ये वही जेठमलानी हैं जिन्होंने भाजपा के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ चुनाव में खड़े होकर चुनौती दी थी, पर मोदी को अपने आगे कोई नहीं दिखता।  स्मरणीय है कि भाजपा के अनुशासन को ठेंगे पर रखने वाले मोदीप्रिय जेठमलानी को जब अनुशासनहीनता के आरोप में पार्टी से निकाल दिया गया तो उन्होंने धमकी भरे अन्दाज़ में कहा कि पार्टी में आने के लिए भाजपा के नेताओं ने ही हाथ जोड़े थे तब वे वापिस आये थे तथा अब भी अगर वे नहीं माने तो उनकी पोलपट्टी खोलकर देश को सच बता देंगे। ये वही मोदी मित्र जेठमलानी हैं जो इससे पहले भी तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के भ्रष्टाचार के मामलों पर सवाल उठा चुके हैं।
       यदि मोदी 2002 में हुए मुस्लिमों के नरसंहार के लिए स्वयं को और अपने लोगों को दोषी नहीं मानते हैं तो उन्होंने कभी अपने गर्वीले गुजरात के इन निर्दोष नागरिकों के मारे जाने पर चिंता और दुख व्यक्त क्यों नहीं किया व दोषियों को दण्ड दिलाने के लिए कुछ क्यों नहीं किया? इसके विपरीत माया कोडनानी और अमित शाह जैसे लोगों को अपने मंत्रिमण्डल में सम्मलित करने के अलावा उनके पास विकल्प क्यों नहीं था? अपनी ईमानदारी का ढोंग करने वाले इस व्यक्ति को क्या पता नहीं था कि उसके मंत्रियों गोरधन झड़पिया और बाबूभाई बुकारिया आदि ने क्या क्या काला पीला किया हुआ है। आज गुजरात सर्वाधिक कर्ज़दार राज्य क्यों है और क्यों कर्ज़ ले ले कर बाहर से बुलाये गये उद्योगपतियों को अटूट सुविधायें लुटाकर अपई छवि बनायी जा रही है?
       सत्ता के सुख का गुलाम और ज़मीनों जायज़ादों की भूख में लिप्त भाजपायी कभी भी सच बात नहीं बोल पाता जिसका पता बलराज मधोक, कल्याण सिंह, उमा भारती, मदनलाल खुराना, केशूभाई पटेल, शंकर सिंह बघेला, सुरेश मेहता, काँशीराम राणा, के बाद लाल कृष्ण अडवाणी तक को लग चुका है। जब उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के वरिष्ठ नेता अमित शाह को प्रभारी बनाने के सवाल पर कुछ नहीं बोल पाते तो शायद वे कभी भी कुछ नहीं बोलेंगे। इस मौन का सबक तो अब जनता ही उन्हें सिखायेगी, जिसे अडवाणीजी समझ भी चुके हैं और कह भी चुके हैं।   
वीरेन्द्र जैन
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मोबाइल 9425674629

               

सोमवार, जून 10, 2013

मोदी कोचर्चा में बनाये रखने की तरकीब

मोदी को चर्चा में बनाये रखने की तरकीब

वीरेन्द्र जैन
       बदनाम भी होंगे तो क्या नाम न होगा?
                लोकप्रियतावाद के शिकार लोकतंत्र में भाजपा इसी सिद्धांत से काम करती है इसलिए हर तरह की लोकप्रियता को भुनाने के लिए विख्यात और कुख्यात दोनों तरह के चर्चित लोगों के सहारे वोटों के फल झड़ाने का जतन करती है। शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना, दीपिका चिखलिया, दारा सिंह, हेमा मालिनी, धर्मेन्द्र, ही नहीं अपितु अरविन्द त्रिवेदी, और नवज्योत सिंह सिद्धु, आदि से लेकर साधु-साध्वियों के भेष में रहने वाले बहुरूपिये, क्रिकेट खिलाड़ी, मंच के कवि, पूर्व राजे-महाराजे, आदि सैकडों विख्यात और कुख्यात लोगों की पूंछ पकड़ कर चुनाव की बैतरणी पार करती रही है। नरेन्द्र मोदी उनके नये संसाधन बनते जा रहे हैं। प्रचार कुशल भाजपा किसी भी असत्य या अर्धसत्य को गोयेबल्स की नीति के अनुसार इतनी बार दुहराती है कि सामान्य जन को वह सत्य सा महसूस होने लगता है। झूठ का यह महायज्ञ वे चुनावों के आसपास ही प्रारम्भ करते हैं और इसी बीच सम्पन्न चुनावों में वे अपनी नैया पार लगा लेते रहे हैं।
       पिछले दिनों कर्नाटक में भाजपा ने येदुरप्पा को भरपूर बदनाम होने का अवसर देकर भी पद पर बनाये रखा था और फिर जब उनके सारे पाप अकेले येदुरप्पा में केन्द्रित होकर रह गये थे तब उन्हें इतनी सावधानी से पार्टी से निकाल दिया तकि राज्य सरकार बनी रहे और लगे कि भाजपा तो शुद्धतम है जिसमें से मवाद  को बाहर निकाल दिया गया है। उल्लेखनीय है कि येदुरप्पा उन लोगों में से एक थे जिन्होंने अपना पूरा बचपन ही नहीं अपितु यौवन भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयं सेवक की तरह से निकाला था व जेल यात्राएं की थी।  वे 1970 में ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शिकारीपुर इकाई के सचिव नियुक्त हुये। 1972 में वे जनसंघ [भाजपा] की तालुक इकाई के अध्यक्ष चुन लिये गये। 1975 में  वे शिकारीपुर की नगरपालिका के पार्षद और  1977 में चेयरमेन चुने गये थे। एक बार निरीक्षण के दौरान उन पर घातक हमला किया गया था। 1975 से 1977 के दौरान लगी इमरजैंसी  में वे  45 दिन तक बेल्लारी और शिमोगा की जेलों में रहे। 1980 में शिकारीपुर तालुका के भाजपा अध्यक्ष के रूप में चुने जाने की बाद 1985 में वे शिमोगा के जिला अध्यक्ष बना दिये गये। अगले तीन साल के अन्दर ही वे भाजपा की कर्नाटक राज्य भाजपा के अध्यक्ष चुन लिये गये। 1983 में पहली बार शिकारीपुर से विधायक चुने जाने के बाद वे छह बार इसी क्षेत्र से चुने गये। वे तब भी जीते जब 1985 में उनकी पार्टी के कुल दो सदस्य विजयी हो सके थे। बीच में कुल एक बार चुनाव हार जाने के कारण उन्हें विधान परिषद में जाना पड़ा। 1999 में वे विपक्ष के नेता रहे। स्मरणीय है कि इस पूरे दौर में उन पर भ्रष्टाचार का कोई दाग नहीं लग सका था। 
        जब रेड्डी बन्धु संघ की समर्पित कार्यकर्ता शोभा कलिंजिद्रे को हटाने या सरकार गिराने की धमकी दे रहे थे तब सरकार बचाने के लिए शोभा को मंत्रिमण्डल से हटाने के निर्देश किसने दिये थे? स्मरणीय है कि तब येदुरप्पा इस सैद्धांतिक मामले पर सरकार को कुर्बान करने के लिए तैयार थे। दूसरी बार जब विधायकों के एक गुट ने विद्रोह कर दिया था और कुछ विधायकों ने त्यागपत्र दे दिया था तब उसका प्रबन्धन किसने किया था। केन्द्रीय नेताओं ने किसके बूते यह कहा था कि येदि को कोई ताकत हटा नहीं सकती और वे पूरे कार्यकाल तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे। उस समय तक जब पूरा देश जान चुका था कि यह कहानी उस समय से शुरू होती है जब श्रीमती  गान्धी ने बेल्लारी से चुनाव लड़ा था और उनके विरोध के लिए सुषमा स्वराज को उतारा गया था तब रेड्डी बन्धुओं से भाजपा का समझौता हुआ था तथा भाजपा की जड़ें इसी खनन माफिया से ही पल्लवित पुष्पित हुयी हैं व उनके द्वारा ही जुटाये गये समर्थन से ही दक्षिण में भाजपा को अपने डैने फैलाने का मौका मिला था। क्या यह अनायास था कि रेड्डी बन्धुओं द्वारा बेल्लारी में आयोजित होने वाली वरलक्ष्मी पूजा में 1999 के बाद सुषमा स्वराज तब तक लगातार आती रही हैं जब तक कि रेड्डी बन्धुओं पर उठने वाले छींटे उन तक पहुँचने लगे थे। जब भाजपा के वरिष्ठतम नेताओं में से एक शांता कुमार ने जो कर्नाटक के प्रभारी थे येदुरप्पा के कारनामों से पार्टी को सवधान किया था तब भी किसी के कान पर जूं भी नहीं रेंगी थी और नुकसान शांता कुमार का ही हुआ था।
       भाजपा इतने चतुर सुजानों की पार्टी है कि वह मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की मूर्खता कभी नहीं करेगी, क्योंकि वह जानती है कि पिछली एनडीए की सरकार मोदी के कारनामों के कारण ही टूटी थी। आज जो मोदी के लाउडस्पीकर बन रहे हैं उनमें कोई भी ऐसा नया व्यक्ति नहीं है जो पूर्व से ही भाजपा के साम्प्रदायिक स्वरूप का अन्ध समर्थक न रहा हो। एक साथ एक सी पुकार लगाने पर स्वर में ध्वनि विस्तारक का प्रभाव पैदा होता है, मोदी को प्रतीत होता समर्थन भी लगभग ऐसा ही है। अनुभवी अडवाणी समेत भाजपा के वरिष्ठ नेता पहले ही घोषित कर चुके थे कि यूपीए सरकार पर लगे आरोपों से पैदा की गयी अलोकप्रियता के बाद भी जनता भाजपा को विकल्प के रूप में नही देख रही है। उसके तिकड़मबाजी के इतिहास को देखते हुए ऐसा लगता है कि उन्होंने गुजरात और शेष भारत के कट्टरतावादियों को एकजुट करने के लिए मोदी का नाम उछाल दिया है त्तकि छीझते समर्थन से निराश अडवाणी जैसे नेताओं को प्रोत्साहित किया जा सके। इसी कारण से मोदी के विरोध और समर्थन की नौटंकियां खेली जा रही हैं और मोदी को लगातार सुर्खियों में रखा जा रहा है। आखिर क्या कारण रहा कि मोदी को प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित करने की जगह प्रचार अभियान समिति का चेयेरमैन भर बना कर छोड़ दिया गया। आखिर वो कौन सा मंत्र फूंका गया कि मोदी का लगातार विरोध करने वाले नेताओं ने रातों रात अपना विरोध वापिस ले लिया? आखिर अमित शाह जैसे गम्भीर आरोपों से घिरे व्यक्ति को उत्तरप्रदेश का प्रभारी बनाने के सवाल पर भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह मिमयाने क्यों लगते हैं?
       उल्लेखनीय है कि हाल ही के उप चुनावों में मुज़फ्फरपुर में जेडी[यू] द्वारा राजद की सीट न हथिया पाने को मोदी की जीत के रूप में प्रचारित किया गया और बिके हुए अखबारों ने अपने प्रथम पृष्ठ पर यह झूठ लिख कि मोदी समर्थकों द्वारा जेडी[यू] को समर्थन न देने से यह हार हुयी है, जबकि सच्चाई यह है कि जेडी[यू] को पहले भी भाजपा के साथ और पूरे समर्थन से चुनाव लड़ने के बाद भी पराजय मिली थी तथा गत चुनव में मिले 208813 मतों के विरुद्ध इस बार दो लाख चवालीस हजार मत मिले हैं। स्मरणीय है कि इस बार जेडी[यू] का पिछला उम्मीदवार ही दल बदल कर आरजेडी का उम्मीदवार था जो अपने साथ अपने व्यक्तिगत वोट भी लेता गया था। जब मैंने कुछ परिचित रिपोर्टरों से उनके निष्कर्ष का आधार पूछा तो वे हँस कर टाल गये। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह पेड न्यूज का ही हिस्सा था। संयोग से जब काँग्रेस के एक वरिष्ठ महासचिव ने उसी दिन सवाल पूछा कि मोदी बताएं कि गुजरात सबसे अधिक कर्ज़ वाला राज्य क्यों है और गर्वीले गुजरात का प्रत्येक नागरिक सबसे अधिक कर्ज़ में क्यों है तो किसी ने इसे प्रथम पृष्ठ पर जगह देने की ज़रूरत नहीं समझी।
       भाजपा नेताओं की बीमारियों के तो इतने रोचक और मनोरंजक किस्से हैं कि उन पर भाजपा नेतृत्व समेत शायद ही कोई विश्वास करता होगा। उल्लेखनीय है कि बात बात में बीमारी का बहाना बनाने वाली उमाभारती ने खजुराहो चुनाव क्षेत्र छोड़ कर भोपाल को चुनाव क्षेत्र बनाने के पीछे जो तर्क दिया था वह यह था कि वहाँ उस क्षेत्र में उनका स्वास्थ ठीक नहीं रहता, पर जब भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष वैकैय्या नायडू ने अपनी पत्नी की बीमारी के नाम पर अध्यक्ष पद से स्तीफा दिया तो उमाजी ने ही भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को पत्र लिख कर कहा था कि वैंकय्याजी ने अपनी पत्नी की रजोनिवृत्ति को राष्ट्रीय बीमारी बना दिया। उम्मीद है कि आदरणीय अडवाणीजी अपनी बीमीरी से, वह चाहे जो भी हो, शीघ्र मुक्त होकर स्वास्थ लाभ करेंगे। स्वस्थ लोकतंत्र में भरोसा रखने वाले सभी लोगों की शुभकामनाएं उनके साथ हैं। जहाँ तक आरोपों का सवाल है तो न तो मोदी उससे मुक्त हैं और न ही अडवाणीजी, शायद बहुत खोजने पर कोई मिल जाये!   
वीरेन्द्र जैन
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बुधवार, फ़रवरी 06, 2013

चुनावों के लिए भोजशाला को अयोध्या बनाने की तैयारी


चुनावों के लिए भोजशाला को अयोध्या बनाने की तैयारियां
वीरेन्द्र जैन
                प्रतिदिन मिल रही सूचनाओं के कारण मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के हाथ पाँव फूल रहे हैं और वे सरकारी धन के सहारे न केवल ताबड़तोड़ पंचायतें, किसान सम्मेलन आदि ही कर रहे हैं अपितु अपने कार्यकर्ता सम्मेलनों में साफ साफ कह भी रहे हैं कि विपक्षी चुनौती के आगे हैट्रिक आसान नहीं है। पिछले दिनों गडकरी को दुबारा अध्यक्ष न बनने देने की योजनाओं में अडवाणीजी भी ‘अनैकिताओं के प्रति शून्य सहनशीलता’ का नारा उछाल बैठे जबकि गुजरात को छोड़ कर भाजपा की कोई सरकार ऐसी नहीं है जिसके मंत्रिमण्डल का बहुमत सुस्पष्ट बड़े भ्रष्टाचार में लिप्त होने की चर्चाओं में न हो। ये लोग कानून के रन्ध्रों और न्याय को अनिश्चित काल तक विलम्बित रखे जाने के दोषों के कारण ही पद का सुख भोग पा रहे हैं। गुजरात के भाजपा नेता हिंसा और अपराधों के मामलों में या तो जेल में हैं या अदालतों या जाँच आयोगों को भटकाने के प्रयासों में लगे हैं। ऐसे में अडवाणीजी का नारा या तो एक बड़ा मजाक बन जायेगा या मध्य प्रदेश में चुनावों तक मंत्रिमण्डल के कुछ सदस्यों को पिछली बार की तरह थोड़ा छुपा कर रखा जायेगा। स्मरणीय है कि आयकर से सम्बन्धित छापों की बदनामियों से बचने के लिए दो मंत्रियों को प्रारम्भ में मंत्रिमण्डल में नहीं लिया गया था, पर लोकसभा चुनाव निबटते ही उन्हें न केवल मंत्रिमण्डल में ही सम्मलित कर लिया अपितु भरपूर मलाईदार विभागों से लाद दिया गया। उक्त मंत्रियों के भ्रष्टाचार के ताजा किस्से प्रदेश भर में चर्चित हैं जिसके नुकसान से बचने के लिए उन्होंने अभी से अपने चुनाव क्षेत्र में हर मुखर व्यक्ति के लिए खैरातों की बाढ ला दी है। सम्मेलनों और पंचायतों के नाम पर जिस तरह से आरामदायक बसों में बारातियों की तरह से सत्कार करते हुए भीड़ जुटायी जाती है वह अपूर्व है, किंतु फिर भी बसों में स्थान खाली रह जाते हैं, भाषणों पर स्वतःस्फूर्त तालियां नहीं बजतीं और न ही नारों में दम दिखायी देती है। छुटभैए नेता कहते सुने जाते हैं कि साले नमक खा कर भी नमकहरामी कर रहे हैं।
       गुजरात के चुनावों में मिली सफलता के बाद भाजपा की नीति बनती जा रही है कि एक ओर विकास का भ्रम पैदा किया जाये और दूसरी ओर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण में तेजी लायी जाये। मध्यप्रदेश में पिछले वर्षों में दर्जनों साम्प्रदायिक घटनाएं हो चुकी हैं और विभिन्न जाँच समितियों ने पाया कि ये घटनाएं प्रायोजित की गयी थीं, तथा पुलिस को जाने समझे तरीके से पक्षपात करने के इशारे थे ताकि हिन्दू साम्प्रदायिकता का आत्मविश्वास बढे और वह आक्रामक हो। इन घटनाओं में ध्रुवीकरण की स्थानीयता होती है इसलिए अब प्रदेश के विधानसभा चुनावों को देखते हुए अयोध्या के जन्मभूमि मन्दिर की तरह धार की भोजशाला में साम्प्रदायिकता के बीजों को पकाया जा रहा है। कभी सरस्वती का मन्दिर रहे इस स्थान पर स्थापित मूर्ति गत दो शताब्दियों से इंगलेंड के म्यूजियम की शोभा है और कुछ पुरातत्व शास्त्रियों का मानना है कि वह बाग्देवी की प्रतिमा न होकर किसी जैन देवी की मूर्ति है। देश में 1998 से 2004 तक भाजपा के नेतृत्व में केन्द्र की सरकार रही वे इससे पहले भी जनसंघ के नेता 1977 से 1979 तक जनता पार्टी में मंत्रिमण्डल के प्रमुख पदों पर रहे। इस दौरन इन्हें उस मूर्ति को वापिस भारत लाने का खयाल नहीं आया और न ही इनके अनुषांगिक संगठनों ने इसकी वापिसी के लिए कोई आन्दोलन ही किया। पर 2003 के चुनाव आते ही जब इन्होंने अपने उन 350 उन स्थानों की सूची को खंगाला जिनमें हिन्दुओं का मुसलमानों के साथ कोई विवाद है तो भोजशाला इन्हें बहुत ही आसान मुद्दा लगा जिसे तुरंत उभार कर सुर्खियों में ला दिया गया। वहाँ हिंसक घटनाएं की गयीं और मालवा में जगह जगह फैले प्रचारकों व स्रस्वती शिशु मन्दिरों में भरे संघ के कार्यकर्ताओं के द्वारा विषाक्त वातावरण तैयार कर दिया गया। प्रदेश के सारे प्रमुख नेताओं को पीछे करते हुए साध्वी के भेष में रहने वाली एक नेता को मुख्यमंत्री पद प्रत्याषी घोषित करके उतारा गया। अब यह इतिहास में दर्ज है कि ऐसे ही ढेर सारे तरीकों से विधानसभा का वह चुनाव जीत लिया गया। गत दस वर्षों तक इन्होंने प्रदेश को किस तरह से लूटा तथा संघ के अनुषांगिक संगठनों समेत प्रमुख कार्पोरेट घरानों को किस तरह से भूमि भवन आवंटित किये वह दुखद गाथा है जो देश भर की समाचार पत्रिकाओं में भरी पड़ी है। इस अति भोज और चुनावों में जनता का सामना करने की भयाकुलता ने एक बार फिर से उनके सामने भोजशाला के सोये मुद्दे को उभारने की जरूरत पैदा कर दी है यही कारण है कि मध्य प्रदेश में संघपरिवार के शकुनियों की भीड़ लगनी शुरू हो गयी है।
       स्मरणीय है कि अयोध्या में रामजन्मभूमि –बाबरी मस्जिद का मुद्दा भी 1984 तक एक सुषुप्त मामला था जिसे चुनावों में उपयोगिता की दृष्टि से साम्प्रदायिक वातावरण बनाने के लिए ही उभारा गया था, तथा चुनावी लाभ उठाने के बाद दरी के नीचे दबा दिया गया था। अब मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों की दृष्टि से भोजशाला को भड़काने की तैयारी शुरू कर दी गयी है। तोगड़िया और आचार्य धर्मेन्द्र जैसे लोगों की ‘धर्म सभाएं’ प्ररम्भ कर दी गयी हैं। 20 जनवरी को बैरसिया में संघ में प्रमुख हैसियत रखने वाले दत्तात्रय हौसबोले की अध्यक्षता में भाजपा, विश्व हिन्दू परिषद, विद्यार्थी परिषद, मजदूर संघ समेत अनेक आनुषांगिक संगठनों की बैठक की गयी जिसके बारे में प्रैस को बतया गया कि विवेकानन्द की 150वीं जयंती मनाने से सम्बन्धित थी। 22 जनवरी को धार के नाथ मन्दिर में ‘धर्मसभा’ रखी गयी जिसमें विहिप के आचार्य धर्मेन्द्र, गोबिन्दाचार्य, और हिन्दू जनजागृति समिति के डा. चारुदत्त पिंगले ने भाग लिया। सरस्वती जन्मोत्सव समिति के मार्गदर्शक नवल किशोर शर्माने इस बार [चुनाव वर्ष] भोजशाला में केवल यज्ञ और पूजा की अनुमति देने की मांग की, और कहा कि नमाज के लिए प्रशासन अन्य जगह मुहैया कराये। 22 जनवरी को भोजशाला के सामने संरक्षित क्षेत्र में विवादित निर्माण व मलबे को प्रशासन ने अतिक्रमण मान कर हटा दिया। पूर्व भाजपा नेता गोबिन्दाचार्य ने कहा कि भोजशाला में पंचमी पर पूजन हिन्दुओं का संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि अतिवादी ज़िद्दी तत्वों के आगे सरकार न झुके। 25 जनवरी को दमोह में तोगड़िया ने कहा कि अगर मैं देश का प्रधानमंत्री बना तो मुसलमानों से मताधिकार छीन लूंगा। 27 जनवरी को तोगड़िया ने भोपाल में कहा कि हिन्दुओं को संगठित होकर राजसत्ता पर नियंत्रण करना होगा। भारत हिन्दू राष्ट्र है और इसका संविधान बनाने के लिए जनमानस तैयार करें। इसी दिन विद्यार्थी परिषद के कार्यालय में पत्रकारों से कहा कि भोजशाला हिन्दुओं की है इससे किसी दूसरे समुदाय का कोई लेना देना नहीं है। उन्होंने कहा कि हिन्दू गौमाँस भक्षकों को बगल में भी नहीं बैठायेंगे।
       भोपाल से लेकर इन्दौर धार और पूरे मालवा क्षेत्र में भोजशाला के मुद्दे को भड़काया जा रहा है ताकि चुनावों तक इतने दंगे हो जायें जिससे किसी तरह भाजपा को सम्भावित नुकसान की भरपाई हो सके। भाजपा दुष्प्रचार में कुशल है वही उसका विपक्ष उसकी तरह सुगठित और संगठित नहीं है जिसका नुकसान हमेशा की तरह आम आदमी को भुगतना पड़ेगा। सबसे गरीब आदमी सबसे अधिक असुरक्षित होता है व लाशों के आधार पर वोट बटोरने वाली राजनीति करने वालों को केवल लाशें ही चाहिए होती हैं।           
वीरेन्द्र जैन
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शनिवार, अक्टूबर 27, 2012

गडकरी के कारनामों की ज़िम्मेवारी संघ पर भी आती है


                 गडकरी के कारनामों की ज़िम्मेवारी संघ पर भी आती है
                                                                                                                         वीरेन्द्र जैन
      जब कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह गत एक वर्ष से लगातार यह सवाल पूछ रहे थे कि गडकरीजी के पास इतना पैसा कहाँ से आया तो दुर्भाग्य से न तो मीडिया और न ही प्रशासन इसे गम्भीरता से ले रहा था। उनके इस बयान को केवल एक राजनीतिक बयान मान कर हाशिए पर कर दिया गया था, जबकि सच्ची बात तो यह है दिग्विजय सिंह के पिछले सारे बयान तथ्यात्मक और गम्भीर प्रकृति के रहे हैं, जो बाद में सच साबित हुए हैं। संघ परिवार तो उनके बयानों से इतना भयग्रस्त रहता है कि उसने तो कभी भी उन पर गम्भीर प्रतिक्रिया नहीं की, अपितु छिछले तरीके से उन्हें हास्यास्पद बता गाली गलौज कर उनसे बचने की कोशिश की। सोशल मीडिया के प्रमाण बताते हैं कि संघ परिवार ने ऐसे लोगों की एक बड़ी टीम बना रखी है जो सैकड़ों छद्म नामों से उन सभी महत्वपूर्ण लेखकों, पत्रकारों, व राजनेताओं को गाली गलौज करके हतोत्साहित करने, और उनकी छवि खराब करने की कोशिश करते रहते हैं, जो संघ परिवार के कार्यों की समीक्षा करते हैं। आज जब सच्चाइयां सामने आ रही हैं तब ये भी जरूरी है कि सोशल मीडिया में ऐसे छद्मनाम धारी खाते खोलने वालों की न केवल तलाश की जाये अपितु उनके इस अपराध के उद्देश्य के बारे में गहन पूछ्ताछ की जाये ताकि समाज में साम्प्रदायिकता के बीज बोकर देश की दिशा को गलत रास्ते पर ले जाने के षड़यंत्र का पर्दाफाश हो सके। उल्लेखनीय है कि अपने सारे साम्प्रदायिक हिंसक कारनामों, उनके खुलासों, अदालत की टिप्पणियों, आयोगों की रिपोर्टों के बाद भी नरेन्द्र मोदी गुजरात में लोकप्रियता इसलिए बनाये हुए हैं क्योंकि अपने झूठ के सहारे संघ परिवार ने समाज के एक हिस्से में साम्प्रदायिकता की जड़ें गहरी कर दी हैं, और यह काम एक दिन में नहीं हुआ है। प्रतिक्रिया में मुस्लिम और ईसाई धर्म को मानने वाले लोगों ने भी अपने अपने राजनीतिक दल बनाने शुरू कर दिये हैं जिनका असर केरल और असम में प्रत्यक्ष दिखने लगा है। इसलिए जरूरी है कि साम्प्रदायिकता से मुकाबले का काम भी उसी निरंतरता और सक्रियता से किया जाये जितनी निरंतरता और सक्रियता से साम्प्रदायिक बीज बोये जा रहे हैं। खेद की बात है कि सत्तारूढ यूपीए में सम्मलित दलों में दिग्विजय जैसे दूरदर्शी लोग अल्पसंख्यक हो गये हैं।
     
      इस बात का अब शायद ही किसी को सन्देह हो कि भाजपा संघ का ही एक सहायक संगठन है और उसकी सारी प्रमुख नीतियां व सांगठनिक निर्णय संघ द्वारा ही लिए जाते हैं जिन्हें लागू करना भाजपा के लिए जरूरी होता है। भाजपा अध्यक्ष के रूप में गडकरी के चयन के प्रति जब भाजपा के अन्दर कोई कल्पना तक नहीं कर रहा था तब संघ द्वारा उन्हें अध्यक्ष के रूप में लाद दिया गया था। उनके इस चयन के प्रति न केवल पूरा मीडिया अपितु स्वयं भाजपा के बड़े बड़े नेताओं के मुँह खुले रह गये थे। स्मरणीय है कि उन दिनों जब संघ प्रमुख से भाजपा के अगले अध्यक्ष के बारे में पूछा गया था तब उन्होंने कहा था कि दिल्ली के गेंग डी फोर, अर्थात वैंक्य्या नायडू, सुषमा स्वराज, अरुण जैटली, और अनंत कुमार में से कोई नहीं। बाद में हुआ भी ऐसा ही और एक फासिस्ट संगठन ने पूरी भाजपा पर गडकरी को थोप दिया था। इतना ही नहीं गडकरी को दूसरा कार्यकाल देने के लिए संविधान में संशोधन भी उन्हीं के निर्देश पर किया गया जिसका मूल लक्ष्य गडकरी को दुबारा अध्यक्ष पद पर पदारूढ करना रहा था।

      संघ की कार्यप्रणाली को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि वे श्री गडकरी के कार्यकलापों से अनभिज्ञ रहे होंगे या बाद में दिग्विजय सिंह जैसे संघ विरोधी नेताओं द्वारा सवाल उठाये जाने पर जिज्ञासाएं न पैदा हुयी हों, किंतु उन्होंने सब कुछ जानते हुए भी न केवल गडकरी को भाजपा पर थोपा अपितु दूसरे कार्यकाल के लिए भी रास्ता बनवाया। सच तो यह है कि गडकरी का कार्यकाल किसी भी पूर्व अध्यक्ष से अधिक अच्छा नहीं रहा था जिन्हें ऐसी विशेष सुविधा मिली हो। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में पहले से अच्छा परिणाम देने के बाद भी जब कान्ग्रेस के अपेक्षाओं के अनुरूप परिणाम नहीं आये तो उस जिम्मेवारी का अहसास राहुल गाँधी समेत कांग्रेस के जिम्मेवार नेताओं पर देखा जा सकता था, किंतु वोटों और सीटों के मामले में पहले से पिछड़ने के बाद भी भाजपा के लोगों के समक्ष गडकरी के चेहरे पर कोई शर्म नहीं थी क्योंकि उनका भविष्य पार्टी नहीं अपितु संघ द्वारा तय किया जाना था और जब तक संघ उन्हें चाहता तब तक वे किसी की परवाह नहीं करना चाह्ते। उनके कार्यकाल में हुए विधानसभा चुनावों में गोआ जैसे छोटे राज्य को छोड़ कर कहीं भी सफलता नहीं मिली। अपनी अध्यक्षता के बाद पहली रैली के दौरान ही वे चक्कर खाकर बेहोश हो गये थे जिन्हें संयोग से वयोवृद्ध अडवाणीजी के कन्धों का सहारा मिल गया अन्यथा कोई बड़ी घटना भी सम्भावित थी। इसी दौरान उन्होंने अपने शरीर की चर्बी कम कराने के लिए शल्य चिकित्सा करायी। जब पूरा देश गम्भीर राजनीतिक गतिविधियों से उद्वेलित था तब मुख्य विपक्षी दल के अध्यक्ष गडकरीजी अपने परिवार के साथ विदेश भ्रमण के लिए चले गये। राज्य सभा के चुनावों में उन्होंने जिस तरह से अपने धनी मित्रों को टिकिट दिये उससे पार्टी में ही विद्रोह की स्थिति खड़ी हो गयी और झारखण्ड में अपने सबसे मुखर नेता श्री आहलूवालिया को नहीं जिता सके। अध्य्क्ष बनने के बाद उन्होंने जिस तरह से पार्टी को ठुकराने वाले नेताओं पर कृपादृष्टि करने का अहसान प्रदर्शित करना चाहा था उसके उत्तर में उन्हें कभी पार्टी के थिंकटैंक कहे जाने वाले गोबिन्दाचार्य से जो अपशब्द सुन कर मौन रह जाना पड़ा था वैसा व्यवहार उन जैसा  स्वाभिमानहीन व्यक्ति ही कर सकता है। उनकी कार में मृत पायी गयी लड़की की घटना हो या उनके बेटों की शादी में दौलत के शर्मनाक प्रदर्शन का मामला हो, शरद पवार और उनके भतीजे अजीत पवार से उनके व्यापारिक सम्बन्धों का मामला हो, संघ ने कभी भी कोई आपत्ति प्रकट नहीं की। कहा जाता है कि नरेन्द्र मोदी के साथ अपनी पिछली बैठक में संघ ने उन्हें गडकरी के एक और कार्यकाल के लिए मनाने की कोशिश की थी और शायद उसमें सफल भी हो गये थे।
      स्मरणीय है कि अटलबिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में पैट्रोल पम्प और गैस एजेंसियों के आवंटन में संघ के लोगों के हित में जो पक्षपात किया गया था और अटलबिहारी वाजपेयी ने जिस पर अपना त्यागपत्र देने की पेशकश तक कर दी थी, उससे संघ की शुचिता पर सन्देह के दाग लग चुके हैं। गडकरी के कारनामों के खुलासों और संघ द्वारा उन्हें अध्यक्ष बनाने व बनाये रखने की कोशिशों से ये सन्देह फिर से उभर आये हैं। ऐसे आचरणों की निरंतरता से आश्चर्य नहीं कि भविष्य में जब भ्रष्ट जननायकों की सूची और फोटो प्रकाशित हों तो उनमें संघ के पदाधिकारिय़ों के नाम भी सम्मलित दिखाई दें। गडकरी के खिलाफ साबित होने वाले किसी भी आरोप से संघ को मुक्त नहीं माना जा सकता।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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मंगलवार, अगस्त 07, 2012

क्या अब संघ परिवार अन्नाटीम के सहारे सत्ता हथियाना चाहती है ?


                क्या अब संघ परिवार अन्ना टीम के सहारे सत्ता हथियाना चाहता है?
                                                                                वीरेन्द्र जैन
       दक्षिण पंथ की राजनीति में अर्थ और आशय में बहुत अंतर होते हैं। नेताओं के बयानों के जो अर्थ होते हैं जरूरी नहीं कि उनका आशय भी वही हो। इस विषय पर आज से पच्चीस वर्ष पहले रमेश शर्मा की एक फिल्म आयी थी ‘न्यू दिल्ली टाइम्स’ जिसमें मीडिया का उपयोग करते हुए सत्ता की राजनीति के दोगले चरित्र का बहुत ही कुशल चित्रण था। माननीय श्री लाल कृष्ण अडवाणीजी की ताजा भविष्यवाणी को भी ‘बिटवीन दि लाइंस’ पढे जाने की जरूरत है जिसमें उन्होंने कहा है कि आगामी प्रधानमंत्री न भाजपा का होगा और न ही कांग्रेस का। इस भविष्यवाणी का भी वही आशय नहीं हो सकता जो इसका भाषायी अर्थ दे रहा है।
       प्रमुख प्रश्न है इस भविष्यवाणी के समय का। 2014 अभी इतनी दूर है कि सामान्य अवस्था में श्री अडवाणीजी को अभी से ऐसी भविष्यवाणी करने की जरूरत नहीं थी जिससे गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ और राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनावों से पूर्व ही भाजपा कैडर में हताशा फैले। आम तौर पर चुनाव लड़ने वाले नेता तो अंतिम समय तक अपनी पार्टी की जीत होने की घोषणाएं करते हुए कार्यकर्ताओं में उत्साह बनाये रखते हैं। अडवाणीजी के इस बयान के दौरान की प्रमुख घटना अन्नाहजारे और उनकी टीम द्वारा अनशन समाप्त करके चुनाव लड़ने की घोषणा करना है। मँहगाई, बेरोजगारी तथा भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा कांग्रेस शासन और राज्यों में समान आरोपों के साथ साम्प्रदायिकता का अतिरिक्त कलंक लिये भाजपा से भी जनता में निराशा छायी है इसको अडवाणी से पहले आरएसएस सूंघ चुका है और सार्वजनिक रूप से व्यक्त भी कर चुका है। एक तीसरे विकल्प के प्रयोग की सम्भावनाएं बलवती दिखाई देने लगी हैं, जिसे इन दो दलों में से किसी की जरूरत पड़ सकती है। पर भाजपा के साथ गठबन्धन करने में प्रत्येक दल नाक भौं सिकोड़ता है, उनका साथ कोई भी दल किसी मजबूरी में ही लेता देता है, जिसका सर्वोत्तम नमूना बिहार में जेडी[यू] के साथ उनकी बिहार में बनी राज्य सरकार है, जो उनके प्रति अपनी नफरत को कभी नहीं छुपाती। यही कारण रहा कि मीडिया और संघ परिवार के सहारे अपनी राष्ट्रव्यापी छवि बना चुकी टीम अन्ना ने चुनाव में उतरने की घोषणा कर दी। इस घोषणा से नकारात्मक मतों का छींका टूटने की आस में बैठी भाजपा का निराश होना सहज स्वाभाविक है क्योंकि वह मुख्य विपक्षी दल है। सम्भवतः अडवाणीजी ने इसी यथार्थ में से संघ परिवार के हस्तक्षेप के लिए जगह तलाशने हेतु परखी लगायी है।
       स्मरणीय है कि संघ परिवार बहुत पहले ही यह समझ चुका था कि साम्प्रदायिक संकीर्णता की राजनीति द्वारा वे कभी भी हिन्दुस्तान पर शासन नहीं कर सकते इसलिए उन्होंने दूसरे के कन्धों पर बन्दूक रख कर चलाने की कोशिश की जिसमें वे बहुत हद तक सफल भी रहे अन्यथा विचार के आधार पर उनकी हैसियत अकाली दल या शिवसेना से अधिक समर्थन जुटाने की नहीं है। वे आज जिस स्थिति में हैं उसके पीछे इसी चतुराई का हाथ रहा है। भले ही गैर-कांग्रेसवाद का नारा लोहियाजी ने दिया था किंतु उससे लाभ उठाने वाले संघ परिवार के लोग रहे हैं। 1967 में जब कांग्रेस के असंतुष्टों के नेतृत्व में संविद सरकारें बनना प्रारम्भ हुयीं तब उनमें आतुर हो सबसे आगे बढ कर सहयोग देने वालों में जनसंघ ही था। 1977 में तो उन्होंने अपनी पूरी पार्टी को ही जनता पार्टी में विलीन कर देने का दिखावा किया क्योंकि वे अपनी बदनाम पहचान से अधिक सत्ता के दुरुपयोग के अवसरों के लिए सदैव तत्पर रहते रहे हैं। जनता पार्टी की सरकार में उन्होंने तब भी शामिल होना स्वीकार किया जब इसका नेतृत्व कांग्रेस से बाहर निकले मोरारजी देसाई, जगजीवन राम, हेमवती नन्दन बहुगुणा, आदि कर रहे थे। उनका यह विलीनीकरण नकली और षड़यंत्रकारी था इसलिए उनकी दुहरी सदस्यता के सवाल पर ही देश की पहली गैर-कांग्रेसी केन्द्र सरकार गिरी और ये लोग जैसे गये थे वैसे ही समूचे बाहर आ गये। इस बीच उन्होंने विदेश मंत्रालय और सूचना और प्रसारण मंत्रालय का मंत्रीपद लेकर अपनी जड़ें मजबूत कीं। अडवाणी जी के कार्यकाल में बहुत बड़ी संख्या में संघ के लोग मीडिया जगत में प्रविष्ट करा दिये गये जिन्होंने उसे आज के दूसरे सबसे बड़े दल तक पहुँचाने में बड़ा योगदान दिया। जनसंघ नाम से कोई मोह न रखने के कारण उन्होंने भाजपा नाम से नया नामकरण कर लिया, व जनता के बीच अपनी स्वीकारता बढाने के लिए अपनी पार्टी के लक्ष्यों मैं ‘गान्धीवादी समाजवाद’ को जोड़ दिया। 1985 के लोक सभा चुनावों में दो सीटों तक सिमिट गयी इस पार्टी ने हिम्मत नहीं हारी और फिर नया कन्धा तलाशने में जुट गयी। जल्दी ही उसे जनमोर्चा बना कर कांग्रेस से अलग हुए वीपी सिंह का साथ मिल गया और वे सुहाने सपने देखने लगे। पर दुर्भाग्य से चुनाव परिणाम ऐसे आये कि दोनों दल मिल कर भी सरकार बना सकने लायक संख्या बल नहीं जुटा सकते थे इसलिए उन्हें बामपंथी दलों के सहयोग की जरूरत पड़ी। बिडम्बना यह रही कि उन्होंने इस शर्त पर बाहर से समर्थन देना मंजूर किया कि भाजपा भी सरकार में सम्मलित नहीं होगी, सो वे मन मारकर रह गये। बाद में रामजन्म भूमि मन्दिर के नाम रथयात्रा के पीछे पीछे चलने वाले दंगों, बाबरी मस्ज्द ध्वंस और मुम्बई बम विस्फोटों ने व्यापक ध्रुवीकरण किया जिसके सहारे 98 के बाद उनकी सीटें अधिक आ गयीं तब कांग्रेस के खिलाफ चुनाव जीत कर आये क्षेत्रीय दलों के सहयोग से उन्होंने सरकार बनाने की कोशिश की। यह कोशिश तब सफल हुयी जब सहयोगी दलों की शर्तों के अनुसार उन्होंने अपनी पहचान के तीन प्रमुख मुद्दे, रामजन्म भूमि मन्दिर निर्माण. धारा 370, और समान आचार संहिता को अलग कर दिया। कर्नाटक में तरह तरह के दाग रखने वाले येदुरप्पा के आगे इन्होंने जिस तरह से आत्म समर्पण किया वह इनके सत्ता समर्पण की सर्वज्ञात ताजा कथा है। कहने का अर्थ यह है कि सत्ता के लिए समझौता परस्ती का उनका पुराना इतिहास है और मन वचन में भेद के सर्वोत्तम राजनीतिक प्रतीक हैं। यही कारण है कि सत्ता के लिए सिद्धांतों से किंचित भी समझौता न करने वाले बामपंथी इनके सबसे बड़े स्वाभाविक शत्रु हैं।
       जब यह सुनिश्चित हो गया कि अन्ना हजारे की टीम अब राजनीति में उतरेगी और निराश जनता के लिए तीसरी शक्ति के रूप में वह किसी उम्मीद की किरण लग सकती है तो उन्होंने सत्ता में उनके सहारे प्रवेश की सम्भावना तलाशी। बदनाम और राजनीतिक अछूत पार्टी की छवि से उबरने के लिए वे जनसंघ के विलीनीकरण की तरह पार्टी में कृत्रिम विभाजन भी दिखा सकते हैं जो टीमअन्ना की राजनीतिक पार्टी का समर्थक बनके प्रकट हो। आन्दोलन में सहयोग के कारण उनका साथ तो पुराना है। एक स्वीकार्य प्रतीक बनने के लिए भाजपा में वैचारिक विभाजन का माहौल प्रचारित किया जाने लगा। संघ के संजय जोशी और मोदी के मतभेद, अडवाणी और मोदी के मतभेद, केशुभाई और मोदी के मतभेद, धूमल और शांता कुमार के मतभेद, कोश्यारी और खण्डूरी के मतभेद, गडकरी और गोपीनाथ मुण्डे के मतभेद, अनंतकुमार और येदुरप्पा के मतभेद, वसुन्धरा और गुलाब चन्द्र कटारिया के मतभेद, शिवराज और उमा भारती के मतभेद आदि मतभेद जग जाहिर किये गये हैं। यदि इनमें से कुछ लोग सोची समझी तरकीब से एक अलग दल बना लेते हैं तो पहले से अंतर्सम्बन्ध और तीसरे विकल्प की उम्मीद पाले बैठी टीम अन्ना के साथ उनका गठबन्धन बन सकता है जिससे टीम अन्ना पर भाजपा से गठबन्धन की बदनामी का आरोप नहीं लग सकेगा। दल के नाम के प्रति वे वैसे ही बहुत भावुक नहीं होते ये जनसंघ के विलीनीकरण के समय देख चुके हैं। उनके लिए मूल चीज सत्ता में भागीदारी है वह किसी भी तरह मिले।
       बहुत सम्भव है कि यह एक अनुमान भर हो किंतु किसी भी तरह सत्ता से जुड़े रहने को कृत संकल्प संघ परिवार के राजनीतिक चरित्र को देखते हुए बेबुनियाद नहीं है। भाजपा के शिखर पुरुष अडवाणीजी का असमय का वक्तव्य अकारण नहीं हो सकता। संसद में घनघोर विरोध करने के बाद सुखराम से सहयोग ले लेने वाले, जयललिता से समर्थन ले लेने वाले, झारखण्ड में सत्ता से जुड़ने के लिए शिबू सोरेन के साथ गठबन्धन कर लेने वाले दल के पुराने घाघ राजनेता इस संकट काल में किसी न किसी तरह का मुखौटा लगा कर प्रकट होंगे, जिसकी एक सम्भावना यह भी है।
वीरेन्द्र जैन
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