बुधवार, अक्टूबर 12, 2011

दिशाहीन उथल-पुथल भरा समय

                     दिशाहीन उथल पुथल भरा समय
                                                               वीरेन्द्र जैन
      वर्ष 2011 का तीन चौथाई भाग बीत चुका है। वर्ष का यह भाग दुनिया और देश में हलचलों से भरा रहा है। दुनिया के हर कोने में कुछ ऐसा लगता रहा है कि जो कुछ चल रहा है वह ठीक नहीं है उसमें बदलाव चाहिए। वहीं दूसरी ओर बदलाव की ये चाहत कोई स्पष्ट विकल्प तलाशने में भी असमर्थ रही है जिससे एक विश्वव्यापी झुंझलाहट सी दर्ज होकर रह गयी है।
      काहिरा आदि में सत्ता पलट देने के बाद आयी नई सत्ता के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गये हैं। अफगानिस्तान और ईराक में लम्बे समय से जमी अमेरिका व उसके मित्र देशों की फौजें थक चुकी हैं और सम्मान जनक तरीकों से वापिस निकलना चाहती हैं किंतु वहाँ सक्रिय आतंकवादियों ने ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद भी हार नहीं मानी है वे अब भी संघर्ष के मोर्चे पर डटे हैं और उन फौजों तथा उनके दूतावासों  पर हमले कर रहे हैं। पूरे पाकिस्तान में लगातार इस तरह की आतंकी गतिविधियां संचालित हो रही हैं कि समझ में नहीं आता कि परमाणु हथियार रखने वाले उस देश पर किस का नियंत्रण है। जिस अमरीकी सहायता की दम पर वह देश पल रहा था, अब उसने उस से भी टकराहट मोल ले ली है जिससे उसकी चीन पर निर्भरता बढ सकती है और क्षेत्रीय संतुलन में परिवर्तन आ सकता है। अमेरिका स्वयं भी आर्थिक संकटों से टूट रहा है और वहाँ चुनाव सिर पर आ गये हैं। जनता की बैचैनी वहाँ भी प्रकट होने लगी है। वहाँ युवाओं के बड़े बड़े प्रदर्शन हो रहे हैं।
      अपने देश में राजनीतिक संकटों की शुरुआत तो गठबन्धन सरकारों के जन्म से ही शुरू हो गयी थी जो उन गठबन्धनों से और बढती रही जो बिना किसी न्यूनतम साझा कार्यक्रम के बनते हैं। इसमें समर्थन देने वाले दल अपने समर्थन की पूरी पूरी कीमत वसूलते रहते हैं जिसके पारिणामस्वरूप गठबन्धन का प्रमुख दल चकरघिन्नी बन जाता है। जिन राजनीतिक दलों का गठन किसी सुचिंतित राजनीतिक विचारों और कार्यक्रमों के बिना होता है वे निहित स्वार्थों के गिरोहों में बदल कर रह जाते हैं और उनमें सम्मलित व्यक्तियों की आस्थाएं उन्हें तत्काल लाभ दिला सकने वाले राजनेताओं में होती हैं। इन्हें अखबारी भाषा में कार्यकर्ता, पर आम भाषा में समर्थक, चमचे, पिछलग्गे, आदि कहा जाता है। केन्द्र या राज्य में सत्तारूढ या सत्ता में आ सकने की सम्भावना रखने वाले प्रमुख दलों में ऐसे राजनेताओं की भरमार है। जब इस तरह के कुछ नेता इकट्ठे हो जाते हैं तो वे परस्पर हित के लिए दल के अन्दर ही गुट बना लेते हैं। इन्हीं समर्पित समर्थकों के कारण ही वे चुनाव जीतने के लिए अपने एक विशिष्ट क्षेत्र को अनुकूल बना लेते हैं, और इसी क्षेत्र की दम पर वे अपने दल के नेता पर दबाव डालते रहते हैं और दबाव में न आने पर सुविधानुसार दलबदल करते रहते हैं। नेता के दल बदलते ही उसका समर्थन भी उसके साथ दल बदलता रहता है। अपने चुनाव क्षेत्र को सुरक्षित रखने के लिए ऐसे राजनेता सभी तरह के व्यक्तिगत तुष्टीकरण तो करते हैं, पर सार्वजनिक कामों में रुचि नहीं लेते।
      सूचना तकनीक के प्रसार ने प्रशासन में पारदर्शिता का प्रवेश करा दिया है। इसलिए अब जनता के बहुत सारे लोग बहुत कुछ जानते जा रहे हैं। पिछले वर्षों में सभी तरह के गठबन्धन किसी ना किसी रूप में सत्ता में रह चुके हैं, और आम जनता ने केवल भ्रष्टाचार को ही बढते हुए पाया है। उसने सत्ता पाने के लिए की जाने वाली अमानवीय घातें-प्रतिघातें भी देखी हैं। सत्ता मिलने से पहले जिनके जीवन एक आदर्श हुआ करते थे वे और उनका जीवन दर्शन सत्ता मिलने के बाद किस तरह से बदला है, जनता उसकी प्रत्यक्ष गवाह रही है। जिन नेताओं के पास साइकिल हुआ करती थी उनके घरों के बाहर दर्जनों की संख्या में बड़ी बड़ी गाड़ियां खड़ी रहती हैं। उनकी संतति और निकट के रिश्तेदार ही कुकिंग गैस, पैट्रोल पम्प, आदि एकाधिकार वाले व्यापार के एजेंसियां पा रहे हैं या सरकारी ठेकेदार, सप्लायर अथवा बिल्डर बन रहे हैं। महत्वपूर्ण पदों पर बैठने वाले अधिकारियों में 70 प्रतिशत से अधिक चयन इन्हीं परिवारों में से हो पाता है। यही कारण है कि सारे बड़े उद्योगपति और व्यापारी अपनी पसन्द की सरकार बनवा कर लाभांवित होने के लिए अपने खजाने खोल देते हैं और लागत का कई गुना वसूल करने के लिए अपनी सुविधानुसार नीतियां बनवा लेते हैं। 545 सदस्यों वाले सदन में तीन सौ से अधिक करोड़पतियों का होना इसी बात का प्रमाण है कि अधिक सम्पत्ति वाले लोग या तो सीधे सदन में दाखिल हो रहे हैं या अपने प्रतिनिधियों को वहाँ भेज रहे हैं। घनश्याम दास बिड़ला का वह कथन ऎतिहासिक बन गया है जब प्रधानमंत्री पद के लिए श्री मोरारजी भाई देसाई और श्रीमती इन्दिरा गान्धी के बीच चुनाव होने वाला था तब उन्होंने कहा था कि मोरारजी कैसे प्रधान मंत्री बन जाएंगे जबकि दो सौ सांसद तो मेरेहैं।
      विचारधारा हीन राजनीति का परिणाम तो यह ही होता है कि अरुण जैटली के साथ मंच साझा करने के सवाल पर जब दो गुट कानपुर में भिड़ गये और एक दूसरे का सिर फोड़ दिया, या भ्रष्टाचार के विरोध में हटाये गये उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री को पार्टी का वरिष्ठ उपाध्यक्ष बना दिया गया। जिन भ्रष्ट मंत्रियों के ड्राइवरों के लाकरों से करोड़ों निकलते हैं उन्हें ही निरंतर मलाईदार विभाग देकर मुख्यमंत्री संतुष्ट नजर आते हैं। एक छोटे प्रदेश में निर्दलीय को मुख्यमंत्री बनाना पड़ता है और वह एक साल में ही पाँच हजार करोड़ का धन एकत्रित कर लेता है। विमान दुर्घटना में जब एक मुख्यमंत्री का निधन हो जाता है तो उसका पुत्र हजारों करोड़ की आमदनी एक साल में दिखा कर सर्वाधिक आयकर दाता बन जाता है और अपनी अलग पार्टी बना कर मुख्य मंत्री बनने के सपने देखने लगता है। एक मुख्यमंत्री को अवैध खनन के मामले में बमुश्किल हटाया जाता है तो उसे अग्रिम जमानत माँगनी पड़ती है और उसके मंत्रिमण्डल के मंत्रियों के यहाँ छापे पड़ने के बाद जेल भेज दिये जाते हैं। एक बुजुर्ग मुख्यमंत्री के दो पुत्र उत्तराधिकार के लिए खूनी संघर्ष करते हैं और जब एक का अखबार दूसरे के खिलाफ कुछ छाप देता है तो दूसरा अखबार के दफ्तर पर हमला करा देता है जिसमें कई जानें जाती हैं। सब कुछ प्राचीन राजतंत्र की चल रहा है।
        यही कारण है कि राजनीतिक दलों द्वारा जनता की समस्याओं पर बुलवायी गयी रैलियों के अवसर पर जनता एकत्रित नहीं होती। इन रैलियों में या तो दल के वे सक्रिय सदस्य आते हैं जो दल के नेताओं को प्रभावित करना चाहते हैं या किराये के लोग जुटाये जाते हैं। वहीं दूसरी ओर अन्ना हजारे, ही नहीं रामदेव तक के आवाहन पर लोग स्वतःस्फूर्त ढंग से आ जाते हैं जो देश की राजनीतिक पार्टियों के लिए दर्पन दिखाने की तरह है। जिन लोगों के आवाहन पर जनता एकत्रित हो रही है उनके पास भी किसी वैकल्पिक व्यवस्था का ब्लूप्रिंट नहीं है।
      ये बेहद निराशा का समय है ऐसे ही समय में देश और उनकी सरकारें आपस में टकराने लगती हैं। ऐसे ही समय में समझदारी की परीक्षा होती है।
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, अक्टूबर 10, 2011

श्रद्धांजलि जगजीत सिंह

श्रद्धांजलि:जगजीतसिंह
वे हमारे लिए गाते थे, इसलिए अपने लगते थे

वीरेन्द्र जैन  
                
जगजीत सिंह हमारे लिए वैसे ही अपने थे जैसे कि दुष्यंत कुमार थे। अगर क्लासिक म्यूजिक एक खास क्लास के लिए होता है तो हम कह सकते हैं कि जगजीत सिंह जैसे लोगों का गायन हम निम्न मध्यम वर्गीय लोगों की सम्वेदना को स्पर्श करता था इसलिए अपने जैसा लगता था। उन्होंने गाने के लिए भी जिन गजलों का चुनाव किया था वे न तो कठिन उर्दू की थीं और न ही हास्यास्पद संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के शब्दों से भरी हुयी थीं अपितु उस भाषा की थीं जिसे हिन्दुस्तानी कहा जाता है, और जो मुँह चड़ी हुयी बोल चाल की भाषा में लिखी जाती हैं। उनके द्वारा गायी हुयी गजलों और नज्मों के रचनाकार मिर्जा गालिब, गुलजार, निदा फाजली, कृष्ण बिहारी नूर, आदि होते थे। सुप्रसिद्ध गीतकार नीरज के गीत की पंक्तियां हैं-
अपनी वाणी प्रेम की वाणी
घर समझे न गली समझे
या इसे नन्द लला समझे
या इसे बृज की लली समझे
हिन्दी नहीं यह उर्दू नहीं यह
यह है पिया की कसम
इसकी स्याही आँखों का पानी
दर्द की इसकी कलम
लागे किसी को मिसरी सी मीठी
कोई नमक की डली समझे
      इसी तरह की भाषा और सहज सम्वेदना की गजलें गाने वाले जगजीत सिंह को देश के संगीत प्रेमियों की ओर से जो प्यार मिला था उसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती। प्रवासी भारतीयों के बीच भी वे बेहद लोकप्रिय थे और अपने वतन की ओर से उन्होंने जो चिट्ठी इन प्रवासियों को भेजी थी उसे सुनकर कई लोग विदेश से अच्छी अच्छी नौकरियां छोड़ कर वापिस लौट आये थे।
      बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी, उनकी प्रिय नज्म थी और जब उन्हें पहली बार स्वतंत्र रूप से गाने का अवसर मिला तो उन्होंने इसी नज्म से शुरुआत की थी। एक बार कनाडा मैं एक महिला ने उनसे पूछा कि क्या वे कभी चेयरिटी के लिए गाते हैं, और उनके मुँह से हाँ सुनने के बाद उन्होंने कहा कि वे एक गुरुद्वारे के लिए चेयरिटी का कार्यक्रम करती हैं। यह सुनने के बाद जगजीत सिंह ने कहा कि वे गुरुद्वारों के लिए आयोजित चेयरिटी के लिए नहीं गाते।

रविवार, अक्टूबर 09, 2011

भाजपा में वरिष्ठ नागरिकों की दशा

                      भाजपा में वरिष्ठ नागरिकों की दशा
                                                              वीरेन्द्र जैन
      पिछले दिनों विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस 1 अक्टूबर को नई दिल्ली में आयोजित एक गैर सरकारी संस्था सम्पूर्णा की ओर से वरिष्ठ नागरिकों क सम्मान किया गया था। इस सम्मान समारोह में भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा था कि न केवल समाज सेवी संस्थाएं और सरकार अपितु औद्योगिक घरानों को भी वरिष्ठ नागरिकों की सेवा के लिए आगे आना चाहिए ताकि वरिष्ठ नागरिकों के अनुभव का प्रयोग देशहित में किया जा सके। उस समय ऐसा लगा था कि वे देश के बड़े औद्योगिक घरानों के प्रमुख मुकेश अम्बानी, रतन टाटा आदि ने गुजरात में औद्योगिक लाभ की अनुकूलता के लिए मोदी की जो तारीफें की थीं उससे प्रभावित होकर ही प्रधानमंत्री पद हेतु लालायित अडवाणीजी ने उनसे अनुभव अर्थात उन्हें न भुलाने का परोक्ष सन्देश दिया था। पर पिछले दिनों मध्य प्रदेश में घटित घटनाक्रम से ऐसा लगा कि इस राजनीतिक दल में बहुत सारे वयोवृद्ध सचमुच ही यूज अंड थ्रो से पीड़ित चल रहे हैं।
      गत दिनों भोपाल के पूर्व भाजपा सांसद सुशील चन्द्र वर्मा ने पार्टी में अपनी उपेक्षा से दुखी होकर छत से कूद कर आत्महत्या कर ली। गत 19 साल से लगातार उनके ड्राइवर रहे श्री रामवीर गौड़ ने इस दुखद अवसर पर संवाददाताओं को बताया कि वे भाजपा नेतृत्व द्वारा अपनी उपेक्षा से बहुत दुखी रहते थे। स्मरणीय है कि भाजपा ने देश की सत्ता हथियाने के अभियान में अनेक क्षेत्रों के लोकप्रिय लोगों को पार्टी में सम्मलित किया था, श्री वर्मा भी उनमें से एक थे। वे मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव रहे थे और अपनी ईमानदारी, समझदारी, व कार्य के प्रति समर्पण के लिए बहुत मशहूर थे। बाबुओं का शहर कही जाने वाली मध्यप्रदेश की इस राजधानी में सरकारी कर्मचारियों और कायस्थ समाज ने श्री वर्मा को जिताने के लिए जी जान लगा दी थी और उनके कारण ही 1967 में जगन्नाथ राव जोशी [जनसंघ] के बाद 1989 में भोपाल से पहली बार कोई भाजपा का सांसद चुना गया था। बाद में भी श्री वर्मा लगातार 1991, 1996, 1998 में चुने जाते रहे थे। उनकी अपनी लोकप्रियता और सम्पर्कों ने ही मध्य प्रदेश की राजधानी में भाजपा को जड़ें जमाने का मौका दिया था। वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रहे इस राजनेता ने अवसर आने पर अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री सुन्दरलाल पटवा का भी सार्वजनिक विरोध करने से गुरेज नहीं किया था।
      19 वर्ष तक पुत्रवत स्नेह पाये उनके ड्राइवर श्री रामवीर गौड़ ने दुखी मन से पत्रकारों को बताया था कि उसे याद नहीं कि उनके द्वारा पोषित यह सीट उनसे छीन लेने के बाद शायद ही कोई भाजपा नेता उनसे मिलने घर आया हो, पर जब तक उनके पास कुर्सी थी तब तक नेताओं की कतारें लगी रहती थीं। मुख्यमंत्री बनने के बाद एक बार बाबूलाल गौर उनसे सदस्यता का फार्म भरवाने के लिए आये थे, पर उन्होंने साफ इंकार कर दिया था। जो अडवाणीजी हर बार टिकिट देने से पहले उनसे बात करते थे उन्होंने भी उनका टिकिट काटने और उमा भारती को टिकिट देने से पहले उनसे बात भी नहीं की थी। खुद को नजरान्दाज किये जाने का यह दुख उन्हें लगातार सालता रहता था यही कारण था कि वर्माजी उसके बाद कभी भी भाजपा के किसी भी कार्यक्रम में नहीं गये।
      स्मरणीय है कि जिस तरह देश में कार्यरत बहु राष्ट्रीय कम्पनियां देश के जवान खून की प्यासी हैं और अच्छे वेतन का लालच देकर उन्हें चूस चूस कर फेंक रही हैं उसी तरह भाजपा भी किसी भी क्षेत्र में लोकप्रियता प्राप्त व्यक्ति की लोकप्रियता को भुना कर उसे फेंक देने में भरोसा रखती है। वर्तमान में भोपाल के सांसद कैलाश जोशी दशकों तक मध्यप्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे हैं जिनके द्वारा विधानसभा में की गयी बहसों का एक संकलन पिछले दिनों प्रकाशित हुआ है। इस संकलन को पढकर उनके गौरवमयी इतिहास का पता चलता है। पर भाजपा द्वारा सुषमा स्वराज को सुरक्षित सीट देने के लिए श्री जोशी का टिकिट काटा जा रहा था जिसे पाने के लिए उन्हें जी जान लगा देनी पड़ी थी। मध्य प्रदेश में ही लगातार जीतने का रिकार्ड बनाने वाले वरिष्ठ बाबू लाल गौर को हटाकर युवा शिवराज सिंह को बैठा दिया गया जबकि बहुमत उमा भारती के साथ था। इन्हीं बाबूलाल गौर ने जब अभी हैड क्वार्टर नागपुर जा कर प्रदेश की जर्जर सड़कें और शासन- प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार की शिकायत की तो मुख्यमंत्री के चापलूसों द्वारा उनको बुढापे में मुख्यमंत्री पद के लिए ललचाने वाला व्यक्ति कह कर उनकी खिल्ली उड़ाई गयी। प्रदेश में न केवल मुख्यमंत्री ही वरिष्ठता को लाँघ करके ही बनाया गया अपितु पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष पद भी स्थानीय वरिष्ठों की उपेक्षा कर बाहर के लोगों से भर दिया गया। जो अडवाणीजी औद्योगिक क्षेत्र के लोगों से अनुभव को सम्मान देने की अपील करते हैं वे ही अपनी पार्टी शासित राज्यों में अनुभव को दूर रखे जाने पर मौन बने रहते हैं।
      उम्र की वरिष्ठता के कारण जब भाजपा के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता अटल बिहारी वाजपेयी सार्वजनिक जीवन से दूर होने को विवश हो गये पर पोस्टरों पर से उनके फोटो न छापे जाने का फैसला तो नीति के रूप में लिया गया। सिकन्दर बख्त, जेना कृष्णमूर्ति मदनलाल खुराना, से लेकर केशुभाई पटेल तक एक लम्बी श्रंखला है। फिल्म अभिनेता धर्मेन्द्र तक को यह कह कर विदा होना पड़ा था कि इस पार्टी ने मुझे बहुत इमोशनली ब्लेकमेल किया। उधार के सिन्दूर से सुहागन बनी फिरती इस पार्टी का आधार जिन लोकप्रिय व्यक्तियों की लोकप्रियता पर टिका हुआ है यदि सुशील चन्द्र वर्मा की शहादत से समय रहते उन्हें समझ आ गयी तो वे इस पार्टी को उमाभारती और शत्रुघ्न सिन्हा की तरह नचाने लगेंगे।
वीरेन्द्र जैन
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शनिवार, अक्टूबर 01, 2011

साम्प्रदायिकता को मोदी विरोध तक केन्द्रित कर देने के खतरे



        साम्प्रदायिकता को मोदी विरोध तक केन्द्रित कर देने के खतरे
                                                                      वीरेन्द्र जैन
      जब से श्री नरेन्द्र मोदी ने जय श्री राम को याद करने की जगह गाड इस ग्रेट कहते हुए उपवास किया है तभी से उनके खिलाफ लेखों और टिप्पणियों की बाढ आ गयी है। उन्होंने अपनी परम प्रसन्नता में यह उपवास प्रदेश में सद्भावना के नाम पर तब किया जब 2002 में गुजरात में हुए नरसंहार से सम्बन्धित प्रकरण को सुप्रीम कोर्ट द्वारा फैसला करने के लिए लोअर कोर्ट में लौटा दिया। मोदी अपने समय के सबसे विवादास्पद मुख्यमंत्री हैं इसलिए उनके नाम पर देश में स्पष्ट विभाजन है। धरमनिरपेक्षता में भरोसा करने वाले ज्यादातर लोग उनसे गहरी नफरत करते हैं तो कुछ लोग उन्हें एक नायक भी मानते हैं। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि इस दौर में वे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के सबसे बड़े प्रतीक की तरह उभरे हैं। जहाँ देश का अधिकांश जनमत उनके खिलाफ है, वहीं हिन्दू साम्प्रदायिकता से प्रभावित एक वर्ग उनका अन्धसमर्थक बन कर भी उभरा है, जो विशेष रूप से गुजरात राज्य में केन्द्रित है। संयोग से अडवाणी समेत पूरी भाजपा में इस समय अन्य कोई भी ऐसा नेता नहीं है जो अकेले इतने अधिक अन्ध समर्थक रखता हो। यही कारण है कि यूपीए सरकार के इस कार्यकाल में देश में विभिन्न तरह के घोटालों के आरोप लगने, तथा दो राज्यों में बामपंथियों की चुनावी हार के बाद राजनीति में जो शून्य सम्भावित दिख रहा है उससे भाजपा को सत्ता में लौटने के सपने आने लगे हैं। इन स्वप्नदर्शियों में नरेन्द्र मोदी भी हैं जो अमरिका द्वारा जानबूझकर एक अध्य्यन रिपोर्ट के लीक कर दिये जाने के बाद स्वयं को प्रधानमंत्री प्रत्याशी के रूप में देखने लगे हैं।
      एक कहावत है कि बदनाम भी होंगे तो क्या नाम न होगा। नरेन्द्र मोदी ने इसी का उपयोग करने की ठान ली है। जिस तरह से कोई अच्छा बल्लेबाज उसे आउट करने के लिए फेंकी गयी किसी फास्ट बाल को बिना शक्ति खर्च किये, अपनी कलाई की कला से चौके छक्के में बदल देता है वैसे ही मोदी ने अपने आप पर केन्द्रित तीव्र निन्दा को हिन्दुओं या गुजरातियों की निन्दा प्रचारित कर उसे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे अपना कद बढाने में लगा दिया है। मोदी विरोधियों की भी सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि उन्होंने एक सुसंगठित संगठन के सोचे समझे कारनामों को एक व्यक्ति के ऊपर डाल कर उसका कद जरूरत से ज्यादा बड़ा दिया जिससे वह अपने पैर से बड़े जूते पहिनने की महात्वाकांक्षा पालने लगा।
      दर असल गुजरात के नरसंहार के लिए अकेले मोदी जिम्मेवार नहीं हैं अपितु पूरा का पूरा संघ परिवार अपने जन्मकाल से ही एक समुदाय विशेष के खिलाफ जो विषबीज बोता रहा है मोदी ने उसकी फसल काटी है। गुजरात में 2002 में हुए घटनाक्रम का सच पूरी दुनिया के सामने आ चुका है, उसके बारे में अधिक कुछ कहने की जरूरत नहीं है, पर यह स्मरणीय है कि मोदी अपने कारनामों को तब ही अंजाम दे सके जब केन्द्र में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार का शासन था, और लाल कृष्ण अडवाणी उसके गृहमंत्री थे जो बाद में उपप्रधानमंत्री तक भी पहुँचे थे। स्मरणीय यह भी है कि उपप्रधानमंत्री की शपथ लेने के बाद जब पत्रकारों ने उनसे पूछा था कि आप अब क्या काम करेंगे तो उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री के सारे काम जिन्हें मैं पहले ही से करता आ रहा हूं, अर्थात उन दिनों भी प्रधानमंत्री की जिम्मेवारियां भी वही सम्हाल रहे थे। यदि राज्य से लेकर केन्द्र तक का शासन पक्षपाती हो तो फिर निरीह अल्पसंख्यक जनता को नरसंहार से कौन बचाता! जिस समय अटल बिहारी बाजपेयी ने कहा था कि मैं अब कौन सा मुँह लेकर विदेश जाउंगा, या गोलमोल शब्दों में मोदी को राजधर्म निभाने की सीख दी थी तब तुरंत ही अडवाणी ने मोदी को पिछले पचास साल का सबसे लायक मुख्य मंत्री बतलाया था, और उनके कामों की भूरि भूरि प्रशंसा की थी। उक्त नरसंहार के काफी दिनों बाद जब अटलजी गुजरात यात्रा पर गये थे और राजधर्म निभाने का चर्चित बयान देकर आँखों के आगे रूमाल लगा कर फोटो खिंचवायी थी उसके बाद ही उन्हें छुट्टी मनाने के लिए मालद्वीप भेज दिया गया था जहाँ के लिए वे शानदार सफारी सूट पहिने आँखों पर काला चश्मा लगाये रवाना हुये थे।
      गुजरात में साम्प्रदायिकता का जहर लम्बे समय से भरा जा रहा था किंतु संयोग से डसने की स्थितियां उस समय पैदा की गयीं जब 27 फरबरी 2002 को साबरमती एक्सप्रैस की बोगी संख्या  छह में 59 लोग आगजनी का शिकार हुये जिनमें से दो अयोध्या से लौटते हुए कारसेवक भी थे। आगामी चुनावों को देखते हुए इस घटना को आधार बना कर पूरे गुजरात में मुसलमानों के खिलाफ जो माहौल पहले से ही सम्वेदनशील बना करके रखा गया था उसमें एक तीली लगा दी गयी और कानून के रखवालों को दंगाइयों के खिलाफ कार्यवाही करने से रोक दिया। बजरंग दल और विहिप के सदस्य खुलकर सामने आये और उन्होंने अपराधी जनजातियों को सरकार द्वारा कोई कार्यवाही न किये जाने का भरोसा दिया जिससे उन्होंने भी निर्भय होकर लूटपाट और हत्याएं कीं। यह काम करने वाला नरेन्द्र मोदी एक संज्ञा नहीं है अपितु एक विचार है और उसकी जगह कोई दूसरा संघ प्रचारक मुख्यमंत्री होता तो वह भी यही करता। उड़ीसा में तो कोई नरेन्द्र मोदी नहीं था फिर भी ईसाइयों के खिलाफ वैसी ही अन्ध हिंसा हुयी। कुष्ट रोगियों की सेवा के लिए सक्रिय आस्ट्रेलियाई पादरी फादर स्टेंस को जब दो मासूम बच्चों सहित जला दिया गया तब वहाँ नरेन्द्र भाई दामोदर दास मोदी नहीं था, पर मूल संगठन वही था।
      स्मरणीय है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक नरेन्द्र मोदी गुजरात की भाजपा के स्वतःस्फूर्त नेता नहीं थे अपितु उन्हें भाजपा हाई कमान ने केशूभाई पटेल की जगह रोप दिया था। ऐसा इसलिए करना पड़ा था कि क्योंकि गुजरात में भाजपा सरकार की छवि निरंतर खराब होती जा रही थी। जब मोदी ने उपचुनाव लड़ा तब चार सीटों पर उपचुनाव हुए थे जिनमें से तीन में भाजपा हार गयी थी और चौथी वह सीट थी जो मोदी ने मुख्यमंत्री होते हुए लड़ी थी, उसमें वे अपने पूर्ववर्ती की जीत से आधे से भी कम मतों से अपनी जीत दर्ज कर सके थे। ऐसी दशा में औद्योगिक रूप से निरंतर प्रगति करने वाले राज्य गुजरात में सरकार बनाये रखने के लिए साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण ही इकलौता सहारा था। अयोध्या में बाबरी मस्जिद वाली जगह पर ही ठीक उसी जगह राम जन्मभूमि मन्दिर बनाने के लिए किसी भी समुदाय में कोई बेचैनी नहीं थी, पर उसे वोटों का ध्रुवीकरण करने के लिए एक अभियान चला कर पैदा किया गया था। इसमें सैकड़ों जानें गयी थीं और पूरे देश में दंगे भड़के थे व अरबों रुपयों की सम्पत्ति फूंक दी गयी थी। इसके लिए अकेले एक नरेन्द्र मोदी जिम्मेवार नहीं था।
      जब भी एक सुसंगठित समूह द्वारा किये गये कृत्य का दोष एक व्यक्ति पर डाल दिया जाता है तो ज्यादा विरोध की दशा में उचित समय पर उसे पद मुक्ति देकर पूरे संगठन को दोषमुक्त प्रचारित कर दिया जाता है जबकि उसकी जड़ वहीं विद्यमान रहती है। मोदी के मामले में भी यही हो रहा है, जो काम एक पूरे राष्ट्रव्यापी संगठन ने किया है उसका दोष एक व्यक्ति पर केंद्रित किया जा रहा है जबकि उसके संगठन ने लोगों के बीच में असत्य और अर्धसत्य के सहारे ऐसी नफरत फैलायी है कि इस दौर का गुजरात एक के बाद दूसरा तीसरा नरेन्द्र मोदी पैदा कर लेगा। इसलिए जरूरत इस बात की है कि समाज में नफरत फैलाने वाली जमातों की तुलना में इंसान को इंसान मानने वाले लोग अपना बड़ा समाज बना सकें। एक मोदी पर सब कुछ केन्द्रित करने की जगह साम्प्रदायिकता के खिलाफ एक सक्रिय और प्रभावी आन्दोलन को मजबूत करने की जरूरत है।      
वीरेन्द्र जैन
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