मंगलवार, अगस्त 25, 2020

निबन्ध एक उत्तर भारतीय ड्रामे का समापन


निबन्ध
एक उत्तर भारतीय ड्रामे का समापन
How to deal with post-festival waste – The Earthbound Report
वीरेन्द्र जैन
      क्लाईमेक्स तक उठाया गया झाग तलछट में बाकी कुछ मैल और गन्दा पानी छोड़ कर बैठ चुका है । नशा उतरने के बाद वाली स्थिति जैसे सूजे हुये चेहरों पर एक बासीपन सा छा गया है।
       दीवाली के त्योहार का समापन हो गया है।
            जिस कचरे को घरों के कोने कोने से बुहार कर सड़क पर फेंक दिया गया था और जिसे समेटने में नगर निगम, या नगर पालिकाओं में कार्यरत एक खास जाति के लोग त्योहर की तिथि के  दस दिनों पहले से निरंतर जुटे हुये थे वे अब उन्हीं मार्गों पर नया कचरा देख रहे हैं। एक ऐसा कचरा जिसमें धूल मिट्टी तो कम है पर पटाखों की बारूद से चिन्दी चिन्दी हुये कागजों की भरमार है। इसमें मिठाई के भाव तौले हुये डिब्बों के गत्ते भी शामिल हैं। नये नये इलोक्ट्रोनिक आइटमों को सम्हालने के लिए प्रयुक्त हुये थर्मोकौल के सांचे हैं, बेचने वाली दुकान या सामग्री के ब्रांड नेम मुद्रित पालिथिन थैले हैं जो प्रतिबन्ध के बाद भी धड़ल्ले से कानून का धुआँ उड़ाते हुए उपयोग में आ रहे हैं। तेल सोख कर जल चुके मिट्टी के कुछ दिये हैं, बच्चों वाले घरों में टूट फूट गयी कच्ची मिट्टी और कच्चे रंगों से पुती ग्वालिनें हैं। अपनी हैसियत को बढा-चढा कर दिखाने के लिए मेहमानों को पिलायी जा चुकी अच्छी पैकिंग में बन्द अंग्रेजी शराब की खाली बोतलें हैं। एक आवेशित उत्साह में पैदा किये गये कचरे की और भी नई नई किस्में हैं जिन्हें कचरे में से बीन कर कबाड़ वाले को बेचने वाले बच्चे अधिक जानते हैं। हमने त्योहार के नाम पर पिछले दिनों जो कुछ  किया है उसके लिए तो जीसस का वह अंतिम वचन याद आता है जिसमें उन्होंने कहा था कि - हे प्रभो, इन्हें माफ कर देना, ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।
            पिछले एक महीने से चारों ओर जोर शोर से यह फैलाया जा रहा था कि खुशी का त्योहार आ रहा है। खुशी, खुशी, खुशी, खुशी। खुशी हिटलर के प्रचार मंत्री गोयेबिल्स के झूठ को फैलाने की तरकीब का अनुशरण करके  फैलायी जा रही थी। केवल खुशी खुशी जैसे कि और कुछ हो ही नहीं। नये विदेशी बाजार के वाहक प्रिंट और दृश्य मीडिया ने एक आभासी खुशी की बाढ ला दी थी और उसमें सब डिग्री धारी मध्यम वर्गीय कुशिक्षित डूब गये थे। खुशी का यह दुष्प्रचार अपने दुखों को तलाशने और सहलाने का अवसर ही नहीं दे रहा था। परम्परा से जोड़ कर बाजार ने एक सामूहिक सम्मोहन का जाल डाल दिया था। बहुत सारे लोगों को तो पता ही नहीं है कि खुशी कैसी होती है, इसलिए उसे चीख चीख कर बताया जा रहा था तथा दुखी आदमी को भी उसमें खींचा जा रहा था। टीवी के सारे चैनल और एफ एम बैंड की महिला उदघोषिकाएं अपनी खनकती आवाज में बता रही थीं कि [अबे अन्धो] चारों ओर खुशी व उल्लास का वातावरण छाया हुआ है। दूसरों, तीसरों की तरह तू भी उठ और जेब में डेबिट क्रेडिट कार्ड डाल अपने घर के लिए नये से नया मँहगे से मँहगा चमकीला पेंट लेकर आ। इस पेंट किये हुए घर को चीन से आयी हुयी सजावटी सामग्री से सजा। कभी दीपों के कारण इस त्योहार का नाम दीपावली पड़ा था, पर अब उसकी जगह बिजली की झालरों और दूसरे रंग बिरंगे विद्युत उपकरणों से सजा। प्लास्टिक के बन्दनवार, प्लास्टिक के गमलों में प्लास्टिक के फूल लगे प्लास्टिक के पौधे सजा। मँहगी साड़ियां, सूटों, और बच्चों के कपड़ों से पूरे परिवार को तैयार कर। सौन्दर्य प्रसाधनों से भरपाई [मेक-अप] करके अपनी त्वचा, केश आदि को मानक सौन्दर्य में ढाल ले। परम्परागत हाथ जोड़ने की मुद्रा से लेकर हाथ मिलाने और गले मिलने के साथ एक झूठी मुस्कान ओढ ले। उपहार दे, उपहार पा। उपहार के बारे में जो तुम्हें नहीं पता है उसे चैनल वाले बताने में लगे हुए हैं। नये से नये माडल की कारें, बाइकें, स्कूटर, छरहरे होते जाते टीवी, कम्प्यूटर, लैपटाप, आईपैड, टूजी थ्रीजी, फोर जी, सोने चाँदी के गहने, बगैरह बगैरह। ये किश्तों में भुगतान की सुविधा के साथ साथ बैंक ऋण से भी उपलब्ध हैं। तू हो या न हो पर तुझे ये सामान खरीदकर खुश दिखना है, ताकि तुम्हारा प्रतियोगी पड़ोसी यह नहीं कह सके कि वो तुम से ज्यादा खुश है।
            जिनको ये सब कुछ करने में जेब परेशान करती हो उन्हें भी करना है। इस अवसर पर तुम्हारा दायित्व है कि खुश दिखो।
            खुशी कभी स्वाभाविक होती थी, और तिजोरी या बक्से में आयी रकम , मौसम, फसल, या स्वास्थ के आधार पर व्यक्त होती थी, उसे। अब एक सभ्यता अर्थात झूठ का हिस्सा बना दिया गया है। कभी लोग खुशी में गा उठते थे या नाचने लगते थे, पर अब महौल बदल गया है। अब गाने के लिए गाने वाली मशीनें हैं जो हमारे दैनिन्दन उपयोग की वस्तुओं तक में फिट हो गयी हैं। हमारे भजनों से लेकर मण्डलियों तक को इन मशीनों ने स्थगित कर दिया है। मन्दिरों में मशीनें लगा दी गयी हैं जो गाती रहती हैं जिससे पता ही नहीं चलता कि हमारे अन्दर भक्तिभाव है या नहीं। इनके चक्कर में हम गाना भूल गये हैं। बहुत सारी नकली हँसी खुशी में हम असली खुश होना ही भूल गये हैं। पूजा पाठ का तय समय और महूर्त होना एक बात थी पर खुश होने का समय तय कर देना बिल्कुल ही दूसरा मामला है।
            जिस तरह नाटक के खत्म होते ही सब अपनी अपनी पोषाकें उतार कर रख देते हैं, ठीक उसी तरह खुशी के मुखौटे उतार कर रख दिये गये हैं। भ्रष्ट नेता, रिश्वतखोर अधिकारी, कमीशनबाज ठेकेदार, और टैक्सचोर व्यापारियों की योजना में इस खुशी का बजट होता है। पर जो लोग इस नकल में कूद पड़ते हैं, उनके झल्लाने चिड़चिड़ाने  का भी समय है। लाखों लोग जबरदस्ती ट्रैनों, बसों, में ठुसे यहाँ से वहाँ होते हैं। ऊपर से पैसे देकर भी गिड़गिड़ा कर जगह पाते हैं और समय से वापिस पँहुचने के लिए इसी प्रक्रिया को दुहराते हैं।
            यह नकलीपन उत्तरोत्तर वृद्धि पर है और एक भी हाथ अस्वीकृति में नहीं उठ रहा। कोई नहीं कह रहा कि हे चैनलो, हमें मत सिखाओ कि हमें अपनी परम्परा को कैसे निभाना है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629


शनिवार, अगस्त 22, 2020

और अब बालीवुड में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के प्रयास


और अब बालीवुड में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के प्रयास
वीरेन्द्र जैन

सबसे पहले तो यह समझ लेना है कि लोकतंत्र के पहले की साम्प्रदायिकता और बाद की साम्प्रदायिकता अलग अलग है, भले ही वह हमेशा से ही सत्ता का औजार रही है। पहले जो धर्म के लक्ष्य होते थे, उन्हें प्राप्त करने के तरीकों में भेद होने व अपने तरीके को अधिक सही मानने के अहं के कारण टकराव होते थे। बाद में राजाओं ने प्रजा को अनुशासित करने के लिए पुरोहितों आदि के माध्यम से नियम बनवाये और पालन कराने के बदले में उन्हें दक्षिणाएं दीं। परिणाम यह हुआ कि जनता भगवान के डर से स्वतः अनुशासित हो कर रहती थी। राजा को भगवान का रूप मानती थी तथा उसी की न्ययिक व्यवस्था के अनुरूप ही मृत्योपरांत ईश्वर के न्याय की कल्पना रची गयी। लोकतंत्र में साम्प्रदायिक विभाजन से एक बड़े वर्ग का समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है जो चुनावों में बहुमत बनाने के काम आता है। किसी समाज में बहुसंख्यकों का दल इससे लाभ में रहता है इसलिए वह पहले तो बहुसंख्यकों के धर्म का सबसे बड़ा शुभचिंतक बना दिखता है और फिर स्वाभाविक रूप से विद्यमान न होने के बाबजूद समाज में साम्प्रदायिकता पैदा करने की कोशिश करता है। जब तनाव या हिंसा शुरू हो जाती है तो दोनों तरह के कट्टरवादी अवसर देख कर हमलावर या रक्षात्मक हो जाते हैं। इसका लाभ बहुसंख्यकों के दल को ही मिलता है इसलिए आमतौर पर इसकी शुरुआत बहुसंख़यकों के दलों की ओर से ही होती है। वे जरूरत के अवसर पर इनका उपयोग करने के लिए बारहों महीने अपने लठैत संगठनों की कक्षाएं लगाते रहते हैं। इतिहास और पुराणों को अपने अनुरूप ढालते हैं और उन्हें समाज में स्थापित कराने के लिए षड़यंत्र रचते रहते हैं। इसके लिए आजकल न केवल खरीदा हुआ मुख्य मीडिया अपितु सोशल मीडिया का प्रयोग बहुतायत में होने लगा है। 
साम्प्रदायिकता फैलाने के सुगठित संस्थान हैं जिन्हें उनसे लाभान्वित होने वाले दल और उन दलों से लाभान्वित होने वाले घराने पोषित करते रहते हैं। हमारे देश में सामंतवाद और पूंजीवाद का अनोखा गठजोड़ है और वे सिद्धांतों में विरोधी होने के बाबजूद एक जुट होकर काम कर रहे हैं। संघ और उसका आनुषांगिक संगठन भाजपा यही काम कर रहा है। बालीवुड में साम्प्रदायिकता फैलाना उसका नया पैंतरा है। स्मरणीय है कि हमारे देश का फिल्म उद्योग और उसमें विभिन्न स्तर पर काम करने वाले लोग मानक रूप से धर्मनिरपेक्ष रहे हैं और उन्होंने जो फिल्में बनायी हैं वे भी साम्प्रदायिकता और सामंती मूल्यों के खिलाफ समाज को सन्देश देती रही हैं। आजादी के बाद प्रगतिशीलों के नाट्य ग्रुप इप्टा के बहुत सारे सदस्य फिल्मों में अपनी प्रतिभा के लिए मशहूर हुये हैं। पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, गुरुदत्त, ख्वाजा अहमद अब्बास, कैफी आजमी, साहिर, हसरत, शैलेन्द्र, ए के हंगल, से लेकर एक लम्बी श्रंखला है। ये हिन्दी फिल्में ही हैं जिनमें सबसे ज्यादा लोकप्रिय मनभावन भजन शकील के लिखे, नौशाद के संगीतबद्ध किये और मुहम्म्द रफी के गाये हुये हैं। किसी आदर्श हिन्दू महिला की भूमिका निभाने के लिए मीना कुमारी की ही याद आती है जो मुस्लिम थीं जिनके घनिष्ठ मित्र अशोक कुमार, धर्मेन्द्र और गुलजार आदि रहे। एक बार मीना कुमारी बीमार थीं और डाक्टरों ने उन्हें रोजा न रखने की सलाह दी थी। उन्होंने अपना दुख गुलजार को बताया तो उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं आपकी जगह मैं रोजा रख लेता हूं। और उसके बाद सिख परिवार में जन्मे सम्पूर्ण सिंह कालरा अर्थात गुलजार वर्षों तक रोजा रखते रहे। साम्प्रदायिक सद्भाव पर ढेर सारी फिल्में ही नहीं बनीं उस विषय के गीत भी भरपूर लिखे गये हैं और वे जनमानस में अपना प्रभाव छोड़ते रहे हैं। दिलीप कुमार [यूसुफ खान ] आमिर खान, शाहरुख खान, सलमान खान, कादर खान, मेहमूद आदि ने भारतीय चरित्रों की जो भूमिकाएं निभायी हैं वे अविस्मरणीय और भारतीय संविधान के आदर्शों को ही प्रस्तुत करती हैं। गीत संगीत निर्देशन और निर्माण में हर वर्ग के लोग मिल कर काम करते हैं, व निजी शादी ब्याह में भी धर्म को आड़े नहीं आने देते। वे वह समाज बना और उसमें जी रहे होते हैं, जैसे का सपना हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों व संविधान निर्माताओं ने देखा था। हिन्दी फिल्मों और गीतों के माध्यम से उन्होंने हिन्दी भाषा को पूरे देश के स्तर पर फैला कर उसे सच्चे अर्थ में राष्ट्र भाषा बनाने का बड़ा काम किया है। यही बात साम्प्रदायिकता की राजनीति करने वालों को हजम नहीं हो रही। आज़ादी के समय धर्म के आधार पर अलग पाकिस्तान बन जाने और तीन तीन युद्ध हो जाने से धर्मनिरपेक्ष हिन्दुस्तान के हिन्दुओं के बीच में मुसलमानों के प्रति नफरत बोना अपेक्षाकृत आसान हो गया है। साम्प्रदायिक राजनीति करने वालों की कुल पूंजी यही है, जिसके सहारे वे आज केन्द्रीय सत्ता तक पहुंचने में सफल हो गये हैं, और इसको आगे के लिए भी बनाये रखना चाहते हैं।   
भाजपा के पितृ पुरुष लालकृष्ण अडवाणी भी पहले फिल्म पत्रकार रहे हैं और अटलबिहारी वाजपेयी भी दिलीप कुमार के फैन रहे हैं। ये लोग राजनीति में अपनी विचारधारा की अलोकप्रियता और समाज में फिल्मी अभिनेताओं की लोकप्रियता के महत्व को समझते रहे हैं इसलिए चुनाव जीतने के लिए इन्हें अनुबन्धित कर संसद में भेज कर बहुमत बनाने में सबसे आगे रहे हैं। हेमा मालिनी, धर्मेन्द्र, विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा, परेश रावल सनी देउल, से लेकर आज तक के सर्वाधिक लोकप्रिय अभिनेता, अभिनेत्रियों को चारा बना कर भीड़ जुटाने के लिए स्तेमाल करते रहे हैं। टीवी आने के बाद रामायण के कलाकार अरविन्द त्रिवेदी, दीपिका चिखलिया, दारा सिंह, किरण खेर या भोजपुरी और बंगाली फिल्मों के मनोज तिवारी, रविकिशन, रूपा गांगुली, बाबुल सुप्रियो या फिर दूसरी सर्वाधिक लोकप्रय सीरियलों में सास बहू की स्मृति ईरानी आदि को आगे करके उन्होंने इतना चुनावी लाभ उठाया है कि आज बुद्धिजीवी वर्ग में सबसे ज्यादा अलोकप्रिय सरकार को लोकप्रियता के आधार पर चुने गये सांसदों के बहुमत के सहारे वर्षों से चला रहे हैं। ये वे लोग हैं जो खुद् के विचार नहीं रखते अपितु दूसरों के लिखे डायलाग ही बोलने के आदी होते हैं, इसलिए संसद में चुप रहते हैं।
पिछले दो-एक सालों से फिल्म उद्योग में महात्वाकांक्षी किंतु वांछित सफलता पाने में असफल अभिनेता अभिनेत्रियों, व निर्माता निर्देशक गायकों संगीतकारों ने सरकार से सहयोग पाने के लिए एक गुट बना लिया है व उसके माध्यम से सफल लोगों पर भाई भतीजावाद चलाने के साथ साम्प्रदायिक विभाजन के आरोप लगाने शुरू कर दिये हैं। अनुपम खेर जैसे दो एक सफल और अच्छे अभिन्नेता भी अपनी पत्नी को टिकिट मिलने और अपने लिए पद्म पुरस्कार से उपकृत होकर सरकार की वकालत करने लगे हैं। सच तो यह है कि कला के क्षेत्र में भाई भतीजावाद एकाध बार ही चल सकता है। हेमा मालिनी धर्मेन्द्र की बेटियों को एकाध फिल्म तो मिल गयी किंतु वे सफल नहीं हो सकीं। इसी तरह अमिताभ जया के पुत्र और ऐश्वर्या राय के पति अभिषेक बच्चन भी परिवार के सहारे खास कुछ नहीं कर सके।
साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के सबसे ताजे उदाहरणों में सुशांत सिंह राजपूत का प्रकरण है जिनकी पिछले दिनों मृत्यु हो गयी जिसे आत्महत्या बताया गया। कोई सुसाइड नोट न मिलने और स्पष्ट कारण समझ में ना आने के कारण एक रहस्य सा बन गया। वे अच्छे कलाकार थे और सामान्य परिवार से उठकर उन्होंने युवा अवस्था में भरपूर धन कमाया जिससे उनकी एकाधिक महिला मित्र भी बनीं। वे परिवार से अपने धन और निजी जीवन को साझा नहीं करना चाहते थे इसलिए उन से दूर दूर रहने लगे थे। उनके निधन के बाद उनके वैधानिक उत्तराधिकारी उनके पिता को लगा कि उनके द्वारा कमाया गया धन उनकी कमाई से कम है तो पहले तो उन्होंने एक अनुमानित राशि को उनकी महिला मित्र द्वारा हड़प लिये जाने का आरोप लगाया और फिर सफलता के लिए बिहार सरकार का सहयोग चाहा, जो घटनाक्रम मुम्बई में घटित होने के कारण सम्भव नहीं था। बिहार में भाजपा गठबन्धन वाली सरकार है इसलिए उन्होंने उनका विशिष्ट सहयोग लेने के लिए मुस्लिम निर्माता निर्देशकों व कलाकारों पर भाई भतीजावाद चलाने व उन्हें काम न देने का आरोप लगा दिया। उन्होंने कहा कि इसी भाई भतीजावाद से निराश होने के कारण उन्होंने ऐसा कदम उठाया। ऐसा करते ही उन्हें बिहार सरकार का सहयोग मिल गया, उनकी रिपोर्ट दर्ज हो गयी व बाद में सीबीआई से जाँच की सिफारिश भेज दी गयी जो केन्द्र की भाजपा सरकार द्वारा मंजूर भी कर ली गयी।
सुशांत सिंह के पिता को न्याय मिलना चाहिए व अपराध की सही सही जांच भी होना चाहिए किंतु उसके लिए पूरे फिल्म उद्योग पर साम्प्रदायिक होने का आरोप लगा देना और उसे एक प्रकरण से जोड़ देना ठीक नहीं है। अपनी राजनीति के लिए राममन्दिर जैसा विषय उत्खनन करने वाली भाजपा से ऐसी उम्मीद अस्वाभाविक नहीं है किंतु कला के क्षेत्र के लोगों को सोचना  चाहिए कि किसी के राजनीतिक हितों के लिए फिल्मी दुनिया के सुन्दर वातावरण को विषाक्त न होने दें। दिलीप कुमार, नसरुद्दीन शाह, आमिर खान, जावेद अखतर जैसे लोग फिल्मी जगत और इस देश के कलाजगत के हीरे हैं। इन को नुकसान पहुंचाने की कोशिश देश को नुकसान पहुचाने के बराबर है। स्मरणीय है कि इसी तरह की हरकतों से हम लोगों ने पिछले दिनों एम एफ हुसैन को मौत की तरफ धकेल दिया। जिसका देश ने अभी तक प्रायश्चित नहीं किया। अब बकायदा अभियान चला कर मुस्लिम अभिनेताओं की फिल्मों का बहिष्कार करने की अपीलें की जाने लगी हैं।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629
      

गुरुवार, अगस्त 20, 2020

सच कह सकने का साहस - क्या उमा भारती ही भाजपा में इकलौती उम्मीद हैं?


सच कह सकने का साहस - क्या उमा भारती ही भाजपा में इकलौती उम्मीद हैं?
वीरेन्द्र जैन

मैं जानता हूं कि मेरी बात सुन कर लोग हँसेंगे, या मुस्करायेंगे और कुछ लोग तो इसे व्यंजना में कही बात समझेंगे, किंतु मैं इसे पूरी गम्भीरता से कह रहा हूं। इस उम्मीदी का सबसे बड़ा कारण उमा भारती कम हैं, अपितु भाजपा और परोक्ष रूप से देश की दशा ज्यादा है। जब पाकिस्तान में जिन्ना की मजार से लौट कर लालकृष्ण अडवाणी संघ वालों की निगाहों में गिर गये थे तब 2011 में मैंने एक लेख लिखा था जिसमें संभावना व्यक्त की गयी थी कि 2014 के आम चुनाव में अगर भाजपा अडवाणी जी को प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित नहीं करती तो उसके पास नरेन्द्र मोदी के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं होगा। मैंने कहा था कि भले ही श्री मोदी इस समय राष्ट्रीय नेता नहीं हैं किंतु वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम नेता तो हैं, और अमेरिका, ब्रिट्रेन आदि ने उन्हें वीजा न देकर उनकी नकारात्मक छवि को और बड़ा कर दिया है। जो छवि एक सोच के लोगों के बीच नकारात्मक है, वही दूसरे पक्ष के लोगों के बीच नायक बना देती है।  मैंने लिखा था -

“और अंत में विख्यात या कुख्यात नरेन्द्र मोदी आते हैं जिन्होंने भले ही गुजरात में मुसलमानों का नरसंहार करने के आरोप में दुनिया भर की बदनामी झेली हो पर इसी कारण से वे हिन्दू साम्प्रदायिकता से ग्रस्त हो चुके एक वर्ग के नायक भी बन चुके हैं। जो मोदी पहली बार विधानसभा के उपचुनाव में उस सीट के पूर्ववर्ती द्वारा अर्जित जीत के अंतर के आधे अंतर से ही जीत सके हों, पर आज वे गुजरात में सौ से अधिक विधानसभा सीटों या गुजरात की 75% लोकसभा सीटों में से जीत सकने में सक्षम हैं। संयोग से वे जिस राज्य के मुख्यमंत्री हैं वह प्रारम्भ से ही औद्योगिक रूप से विकासशील राज्य रहा है, जिसने मोदी के कार्यकाल में भी अपनी गति बनाये रखी। दूसरी ओर मोदी सरकार पर अपने विरोधियों के खिलाफ गैरकानूनी ढंग से हत्या करवाने तक के आरोप लगे हों, पर आर्थिक भ्रष्टाचार का कोई बड़ा आरोप नहीं लगा। वहाँ तुलनात्मक रूप से प्रशासनिक भ्रष्टाचार की शिकायतें कम हैं जिससे उनकी एक ऐसे प्रशासक की छवि निर्मित हुयी है जिसकी आकांक्षा आम तौर पर नौकरशाही से परेशान जनता करती है। केन्द्रीय सरकार की योजना के अंतर्गत सड़कों के चौड़ीकरण का काम तेजी से हुआ है जिससे प्रदेश के प्रमुख नगर एक ऐसी साफ सुथरी छवि देने लगे हैं जो मध्यम वर्ग को प्रभावित करती है। मोदी वाक्पटु भी हैं और अडवाणीजी की तरह शब्दों को चतुराईपूर्वक प्रयोग करने की क्षमता रखते हैं।“
मेरे द्वारा व्यक्त आशंका सही साबित हुयी थी। संघ ने सारे अनुमानों को नकारते हुए नरेन्द्र मोदी को ही प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित किया था।
नरेन्द्र मोदी ने आते ही भाजपा में उसके नाम के अलावा बहुत कुछ बदल गया।  उन्होंने पार्टी को हाथ में लेते ही वरिष्ठ व मुखर नेताओं तथा संजय जोशी जैसे अपने दुश्मनों को किनारे कर दिया। मीडिया हाउसों के साथ सौदा किया। भाजपा के पक्षधर पत्रकारों से ही वाजपेयी सरकार और उनके प्रति भक्तिभाव रखने वालों की छवि खराब करवायी, काँग्रेस नेताओं के भ्रष्टाचार की अतिरंजित छवि, और अपेक्षाकृत साफ छवि के नेताओं को अयोग्य व हास्यास्पद बताने में सोशल मीडिया का स्तेमाल करने की संस्थाएं बनवायीं। फिल्मी कलाकारों, लोकगायकों, पूर्व राजपरिवार के सदस्यों, धार्मिक वेषधारियों, खिलाड़ियों सहित हर तरह के सैलीब्रिटीज का सहारा चुनव जीतने के लिए लिया। काँग्रेस से लेकर राज्य स्तर की पार्टियों के नामी सदस्यों, रिटायर्ड सेना, पुलिस, और प्रशासनिक अधिकारियों को पार्टी में उनकी शर्तों पर शामिल किया। मुजफ्फरनगर आदि दंगों से हुए ध्रुवीकरण के एक पक्ष को खुला समर्थन देकर उसका फायदा उठाया। कार्पोरेट जगत से चुनावी सहायता भरपूर मात्रा में अर्जित की और उसे मतदाताओं के बीच वैसे ही खुले हाथों से खर्च भी किया। ड्रोन कैमरे से लेकर भीड़ को अतिरंजित दिखाने की तकनीक का भी सहारा लिया। इसके विपरीत मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की बारात का कोई नियंत्रक नहीं था। परिणाम स्वरूप उन्होंने न केवल सरकार बनाने का वांछित नम्बर पा लिया अपितु राज्य सरकारों में भी दखल बनाने में सफलता प्राप्त की। 
चुनावी सफलता के बाद मंत्रिमण्डल के गठन में अरुण जैटली और सुषमा स्वराज को छोड़ कर कोई इस कद का नहीं था जो कभी मोदी के लिए चुनौती बन सकता हो। इन दो का मुकाबला करने के लिए उन्होंने अमित शाह को न केवल मंत्रिमण्डल में शामिल कराया अपितु उन्हें भाजपा का अध्यक्ष भी बनवा दिया। अब पूरी सरकार और पार्टी उनकी पकड़ में थी। अटल जी पहले ही लकवा ग्रस्त हो गये थे। इसे संयोग ही कहेंगे कि गोपीनाथ मुंडे, सुषमा स्वराज, अरुण जैटली, अनंत कुमार, अनिल माधव दवे, मनोहर पारीकर, आदि को बीमारी ने दूर कर दिया। कभी कभी सिर उठाने वाले जसवंत सिंह अस्वस्थ हो गये। यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा का विरोध किसी काम नहीं आया। अडवाणी और सुषमा भक्त शिवराज सिंह ने मौका देख कर हथियार डाल दिये। मदन लाल खुराना दिवंगत हो गये, कल्याण सिंह को राज्यपाल बना दिया, राजनाथ सिंह कभी महात्वाकांक्षी नहीं रहे। जो नये लोग मोदीजी की कृपा से सरकारी पार्टी के सांसद बन गये वे उपकृत थे और उन्हें इससे अधिक नहीं चाहिए था, जिन्हें चाहिए था वे किसी ना किसी स्कैम या प्रकरण में फंसे हुये थे।
काँग्रेस केवल सत्ता की लूट के गिरोह का नाम होकर रह गया है सो जिन से सम्भव हुआ उन लोगों ने मौका देख कर दल बदल लिया, कुछ विपक्षियों पर सीबीआई के प्रकरण चल रहे थे और जिन पर कुछ नहीं था वे चुनावों में संसाधनों का मुकाबला कर सकने में सक्षम नहीं थे । राज्य स्तर की जो पार्टियां विपक्ष में थीं वे अपना उपयुक्त स्थान पाकर खुश रहने की आदत पाल चुकी थीं। मीडिया के मालिक चाशनी पी रहे थे और महत्वपूर्ण प्रशासनिक व सैनिक पदों पर विश्वस्त लोग बैठाये जा चुके थे। ध्यान भटकाने के लिए राम मन्दिर व दूसरे साम्प्रदायिक मुद्दों को सुलगता रखा जाता था। अर्थशास्त्री, बुद्धिजीवी, प्रोफेसर, कलाकार आदि जरूर निराश थे किंतु उनके पास देश में अभिव्यक्ति का मंच ही नहीं था, सो उनके विचार निष्प्रभावी थे। अर्थ व्यवस्था बुरी तरह डूब चुकी है, बेरोजगारी की स्थिति विस्फोटक है। ऐसे में परिवर्तन की उम्मीद केवल भाजपा में घुट रहे नेताओं द्वारा प्रभावी आवाज उठाने से ही सम्भव हो सकती है। ऐसी आवाज उठाने वाले नेतृत्व हेतु केवल एक नाम याद आता है और वह है उमा भारती का। यह नाम उस निर्भय बच्चे की तरह है जो राजा को नंगा कह सकता है।
उमाजी अपने दुस्साहस के भरोसे ही आज इस ऊंची स्थिति तक पहुंची हैं। वे जिस परिवेश से आयी थीं वहाँ उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं था, जो कुछ था वह पाने के लिए था। अवसरवादी षड़यंत्रकारी घाघ नेताओं ने उनकी मुखर अभिव्यक्ति और महिला प्रवचनकर्ता होने के कारण मिली सुविधा का जम कर उपयोग किया। जब उन्होंने उसका पारितोषक चाहा तो उन्हें धता बता दी गयी। पर अपने हक के लिए उन्होंने रणनीति में शामिल होने से जानी भाजपा की कमजोरियों की दम पर उल्टा दबाव बनाना शुरू किया। मजबूर होकर उन्हें वह सब कुछ देना पड़ा जो उन्होंने मांगा। उन्हें खजुराहो सीट से लोकसभा का टिकिट देना पड़ा, फिर उन्हें नेताओं के न चाहते हुए भी भोपाल से टिकिट देना पड़ा। केन्द्र में मंत्रीपद देना पड़ा। मध्यप्रदेश में चुनाव के लिए भेजा गया तो मुख्यमंत्री पद प्रत्याशी घोषित करना पड़ा, और जीत होने पर मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। एक कमजोर सा अवसर देख कर उन्हें बदल तो दिया गया, किंतु दुबारा बनाने का आश्वासन देना पड़ा। उन्होंने पार्टी की बिना अनुमति के तिरंगा यात्रा निकाली। फिर भी जब मुख्यमंत्री पद वापिस नहीं दिया तो उन्होंने राम रोटी पदयात्रा शुरू कर के मुश्किल खड़ी की। फिर पूरी प्रैस के सामने अटल और अडवाणी की क्लास ले ली क्योंकि अरुण जैटली ने उनके खिलाफ खबरें लीक की थीं। पार्टी अध्यक्ष वैंक्य्या नाइडू को इतना भला बुरा कहा कि उन्हें स्तीफा देकर भागना पड़ा। जब उन्होंने स्तीफे के पीछे पत्नी की बीमारी का झूठा बहाना बनाया तो उमाजी ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उन्होंने अपनी पत्नी की रजोनिवृति को राष्ट्रीय बीमारी बना दिया। सोनिया गाँधी को प्रधानमंत्री बनाये जाने के खिलाफ जब सुषमा स्वराज ने सिर मुंड़ाने और चने खाकर जमीन में सोने की धमकी दी तो उमा जी ने भी बिना अनुमति के ऐसा करने की घोषणा करके बात का मजाक बनवा दिया। फिर पार्टी छोड़ कर नई पार्टी बनायी, जिससे विधानसभा चुनाव लड़ा और भरपूर नुकसान पहुंचाया। इसी बीच गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जो खुद को विकास पुरुष बताते थे को विनाश पुरुष बताने का साहस किया। उन्हें समझौता करना पड़ा। अंततः उन्हें पार्टी में वापिस लेना पड़ा पर शिवराज सिंह की जिद के कारण मध्य प्रदेश से बाहर काम करने की शर्त रखी गयी । उनसे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए कहा गया तो उन्होंने मुख्यमंत्री पद प्रत्याशी घोषित करने की शर्त रख दी जिसे मानना पड़ा. भले ही कल्याण सिंह और योगी नाराज हो गये। वे विधायक बन गयीं किंतु शपथ लेने के अलावा कभी वहां की विधानसभा नहीं गयीं। 2014 के आम चुनाव में उन्हें फिर लोकसभा  का टिकिट देना पड़ा और केन्द्र में मंत्री बनाना पड़ा, भले ही विभाग और काम केवल अपने बंगले में पड़े रहने का दिया गया। उन्हें हटाने का फैसला लेकर भी मोदी उन्हें नहीं हटा सके, केवल मंत्रालय बदला गया। फिर उन्होंने अपनी मर्जी से लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ा, राजनीति से सन्यास की घोषणा की व कुछ दिनों बाद वापिस सक्रिय हो गयीं। भाजपा में उन्होंने सुन्दरलाल पटवा व उनके पटशिष्य शिवराज सिंह चौहान, सुषमा स्वराज, अरुण जैटली, वैंकय्या नायडू, कैलाश जोशी, अडवाणी जी, नरेन्द्र मोदी, आदि अनेक वरिष्ठ नेताओं से खुली टकराहट मोल ली।
उनके सलाहकार भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय सचिव गोबिन्दाचार्य हैं, जिन्होंने ही राममन्दिर अभियान के नाम से भाजपा को आज की स्थिति में पहुंचाया है। वे उनके राजनीतिक गुरु हैं। उमा भारती का दुस्साहस, मुखरता, उनसे कुछ भी करवा सकती है। वे भाजपा में घुट रहे पार्टी सदस्यों की आवाज बन सकती हैं। गोविन्दाचार्य के नेतृत्व में वे स्वदेशी आन्दोलन को पुनर्जीवित करेंगी तो विपक्ष का भी व्यपक समर्थन मिल सकता है, क्योंकि वे जमीन से जुड़ी नेता हैं। एक बार तो वे कह चुकी हैं कि मेरे पिता तो कम्युनिष्ट थे।
वीरेन्द्र जैन
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बुधवार, अगस्त 12, 2020

राहत इन्दौरी और उनकी शायरी की लोकप्रियता


राहत इन्दौरी और उनकी शायरी की लोकप्रियतानागरिकता कानून: राहत इन्‍दौरी ने ...
वीरेन्द्र जैन
राहत इन्दौरी के निधन के बाद उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ उनकी शायरी को याद करने वालों की बाढ सी आ गयी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उनके शे’रों ने हर एक को गुदगुदाया था और वे शे’र उनकी स्मृतियों में दर्ज हो गये थे।
किसी समय मैंने भी कवि सम्मेलन के मंचों पर स्थान बनाने की कोशिश की थी। इसी कोशिश में मैंने लोकप्रियता पाने के लिए पत्रिकाओं में लिखना शुरू किया था। ज्यादा छपने के लिए जैसा सम्पादक छापते थे, वैसा लिखना शुरू कर दिया था। मैं सुन तो लिया जाता था पर दूरगामी प्रभाव नहीं छोड़ पाता था। उन दिनों मेरे एक मित्र हास्य- व्यंग कवि हरि ओम बेचैन हुआ करते थे, जो मंचों पर बुलाये जाते थे। एक दिन उन्होंने मुझे सलाह दी कि मंच कोई भी हो रंगमंच या कविता का मंच, वहाँ प्रस्तुतीकरण बहुत महत्वपूर्ण होता है। मेरी समझ में बात आ गयी थी और मैंने उस दिशा में प्रयास बन्द कर दिये थे। राहत इन्दौरी की लोकप्रियता का मूल्यांकन करता हूं तो बेचैन की बात याद आती हैं। राहत जी की जो विशेषताएं थीं, उनमें से एक उनका सशक्त प्रस्तुतिकरण था। वे सम्वाद की तरह अपने शे’र सुनाते थे इसमें उनके हावभाव आकाश की ओर देखना हाथों का संचालन और स्वर का गर्जन शामिल था। श्रोताओं में कोई ऐसा नहीं होता था जो उनके रचना पाठ के समय आपसी बात कर रहा हो या सो रहा हो। आप पसन्द करें या ना करें किंतु जब राहत इन्दौरी सुना रहे होते थे तो आपको सुनना जरूरी होता था, कोई उठ कर नहीं जा सकता था। मंच से लेकर श्रोता समुदाय तक सबको ऐसा लगता था कि जैसे उसे ही सम्बोधित कर रहे हैं। उनकी गज़लें फिसलती नहीं थीं अपितु कील की तरह ठुकती थीं। यह सुनार की तरह की ठुक ठुक नहीं होती थी अपितु लुहार की तरह पूरी शक्ति से किये गये प्रहार की तरह होती थीं। वे दीवार में ठुकी उस कील की तरह होती थीं कि अगर ठोकने वाला उसे खुद भी उखाड़ना चाहे तो उसे मुश्किल पड़ेगी।
राहत इन्दौरी के कथ्य को मैं दुष्यंत कुमार से जोड़ कर देखता हूं। वे समकालीन राजनीति और समाज पर वैसी ही टिप्पणियां करते थे जैसी कि दुष्यंत ने इमरजैसी से पहले जय प्रकाश के सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन पर की थीं। वह जनता का स्वर था जिसे दुष्यंत ने शे’रों में ढाला था, ठीक इसी तरह राहत के शे’रों ने साम्प्रदायिक नफरत फैलाने वाले दौर में धर्म निरपेक्ष लोगों की आवाज बन कर किया। उनकी विशेषता यह भी थी कि वे अपने निशाने को साफ साफ लक्षित करते थे, और दूसरे धर्मनिरपेक्ष कवियों की तरह घुमा फिरा कर बात नहीं करते थे। इस स्पष्टवादिता के कुछ व्यावसायिक खतरे भी होते हैं, जिसे उठाने का काम राहत इन्दौरी ने किया और इस दुस्साहस को ही अपनी सफलता का आधार बना लिया। यह इस बात का भी प्रमाण था कि जनता क्या सोच रही है। राहत इन्दौरी का विरोध भी हुआ और इस विरोध ने भी उन्हें एक पहचान दी। उनका विरोध करने वालों में एक खास तरह की साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले ही सामने आये। कुछ लोग इसी आधार पर उन्हें मुस्लिम पक्षधर बता कर हिन्दू साम्प्रदायिकता से प्रभावित लोगों में उनके खिलाफ प्रचार करते थे। उनके मुँह से तो मैंने कभी नहीं सुना किंतु मेरे मन में उनकी पक्षधरता के लिए जो तर्क उभरे वे स्वाभाविक थे। मैं ऐसे लोगों से कहता था कि पाकिस्तान बनाने के लिए जिम्मेवार लोगों का अपराधबोध हिन्दुस्तान का मुसलमान क्यों सहे जबकि यहां रह जाने वाले वे लोग थे जिन्होंने उनके धर्म पर आधारित एक देश बन जाने के बाबजूद भी ऐसे देश में रहना मंजूर किया जो गांधी, नेहरू, पटेल और अबुल कलाम आज़ाद का मुल्क था जिसने एक स्वर से इसे धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाने की घोषणा की थी। उनका पकिस्तान न जाना उन्हें दूसरे गैर मुस्लिम धर्मावलम्बियों से अधिक देशभक्त बनाता है। जिनके पूर्वजों ने सात सौ साल इस देश पर बादशाह्त की वे इस देश को छोड़ कर क्यों जाते। राहत इन्दौरी का यही स्वर था जिसे पूरे हिन्दुस्तान का भरपूर समर्थन मिला कि – सभी का खून है शामिल वतन की मिट्टी में /किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़े है। इस देश के मुसलमानों को भी इस पर गर्व करने का उतना ही हक है और इसे व्यक्त करने के लिए राहत को कहना पड़ा कि – हमारे ताज अजायब घरों में रक्खे हैं। हमारे मिली जुली बस्तियों और उनके बीच एकता की जरूरत को रेखांकित करने के लिए उन्होंने कहा कि – लगेगी आग तो आयेंगे कई घर ज़द में, यहाँ पर सिर्फ हमारा मकान थोड़े है। लोकतंत्र में पद के अस्थायित्व की चर्चा करते हुए तानाशाही, राजशाही के तरीके अपनाने वालों को चेताते हुए वे कहते हैं- आज जो साहिबे मसनद हैं, कल नहीं होंगे, किरायेदार हैं, जाती मकान थोड़े है। मेरा मानना है के राष्ट्रगीत सुजलाम सुफलाम मलयज शीतलाम से ही नहीं ऐसे भी लिखा जा सकता है-
चलते फिरते हुए मेहताब दिखायेंगे तुम्हें
मुझसे मिलना कभी पंजाब दिखायेंगे तुम्हें
राहत की भाषा हिन्दी या उर्दू नहीं अपितु हिन्दुस्तानी है। प्रेमचन्द से लेकर नीरज तक ने इसी भाषा में साहित्य रचना के पक्ष में समर्थन दिया है। नीरज जी ने तो लिखा था –
अपनी बानी, प्रेम की बानी, घर समझे न गली समझे,
या इसे नन्द लला समझे, या इसे ब्रज की लली समझे /
हिन्दी नहीं यह उर्दू नहीं यह/ ये है पिया की कसम /
आंख का पानी इसकी सियाही / दर्द की इसकी कलम/
लागे किसी को मिसरी सी मीठी/ कोई नमक की डली समझे/  
इस दौर के जितने भी रचनाकारों ने लोकप्रियता अर्जित की है वे सभी हिन्दुस्तानी में लिखने वाले लोग हैं। नीरज, मुकुट बिहारी सरोज, बलवीर सिंह रंग, दुष्यंत कुमार, बशीर बद्र, मुनव्वर राना, निदा फाज़ली,  सभी अपनी भाषा विम्बों, और प्रतीकों में मिली जुली संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। राहत भी उनमें से एक हैं। उन्हें शायद ही कभी किसी शब्द का अर्थ बताने की जरूरत पड़ती थी। वे हिन्दी के कवि सम्मेलनों में भी उतने ही सम्मान के साथ बुलाये जाते थे, जितने कि मुशायरों में और दोनों में ही हर धर्म और भाषा बोलने वाले लोग उन्हें उतने ही चाव से सुनते थे।
वाचिक कविता का एक और गुण सहज ग्राह्यता का होना भी है। लुत्फ देने वाला शे’र जल्दी प्रवेश कर जाता है। जैसे खाना स्वादिष्ट और हल्का हो व उसके साथ ही चटनी भी हो। राहत की कविता में ये दोनों ही गुण थे। जिन लोगों की कविता में ये गुण नहीं होते उन्हें अपनी कविता सुनाने के पहले और बीच में लतीफों का सहारा लेना पड़ता है। राहत के शे’रों में ही ये गुण गुंथे हुये थे। हिन्दी के नये समीक्षकों के बीच भले ही साहित्य में स्थान देने के लिए लोकप्रियता को दुर्गुण की तरह लिया जाता हो, किंतु मुझे विश्वास है कि यह मापक किसी दिन गलत साबित होगा और लोकप्रियता को दूसरे मानकों के साथ उचित स्थान प्राप्त होगा। राहत के शे’र इतनी विविधता के साथ जनमानस में फैले हुये हैं कि उनका अलग से जिक्र करने की जरूरत मुझे महसूस नहीं हो रही है।   
वीरेन्द्र जैन
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