शुक्रवार, मार्च 25, 2011

श्रद्धांजलि कमला प्रसाद


एक कार्यकर्ता के प्रतिमान बने रहेंगे कमला प्रसादजी
वीरेन्द्र जैन
भोपाल में यह कामरेड प्रकाश करात की सभा थी जिसमें से अचानक उठ कर कमला प्रसादजी घर चले गये थे और हमारे सामने एक प्रश्न वाचक सवाल छोड़ गये थे। अगले दिन भी जब उन्हें केदारनाथ अग्रवाल के कृतित्व पर आयोजित एक साहित्य सभा में मुख्य भाषण देना था और उसमें भी नहीं आये थे तब जानकारी करने पर पर पता चला था कि उस दिन उन्हें अचानक ही कुछ ऐसा मानसिक झटका लगा था और उनकी बाँयीं आंख में कुछ ऐसा दोष उभर आया था कि उन्हें एक से अधिक छवियाँ दिखने लगी थीं। बाद में पता चला था कि उन्हें ब्लड कैंसर है। कुछ दिनों बाद जब उन्हें दुबारा देखने का अवसर आया था तो डाक्टरों ने उनकी बाँयीं आँख पर काला शीशा लगवा दिया था व वे यथावत उसी लगन और उत्साह से काम कर रहे थे। अपने स्टेनो से उन्होंने पत्र लिखवाये थे जिन्हें डिस्पैच करने का अंतिम समय था अतः उन्होंने हम लोगों से बात करने से पहले तेजी में लिफाफों पर पते लिखे और पत्रों को डिस्पेच के लिए समय से दे दिये। बाद में उन्होंने बताया कि वे अब ठीक हैं और कैंसर की जिस बीमारी की आशंका थी वह प्रथम स्टेज में ही सामने आ जाने के कारण ठीक हो रही, कैमीथेरेपी से कुछ कमजोरी आती है, पर चिंता की कोई बात नहीं। अपने स्वास्थ से सम्बन्धित इतनी सी बात करने के बाद वे बाद साहित्य, संगठन और विभिन्न समकालीन घटनाओं के बारे में चर्चा करने लगे थे, जैसे कि उन्हें केवल जुकाम हुआ हो और जो ठीक होने वाला हो। चलते चलते उन्होंने खुद उठ कर वसुधा के ताजा अंक हमें भेंट किये। उनकी जीवट को देख कर हमें सन्देह हुआ कि कहीं हमारी सूचना में ही कोई कमी रही है अन्यथा ऐसी बीमारी की सूचना ही आदमी को आधा मार देती है। अगले पखवाड़े अखबार में उनका नियमित स्तम्भ यथावत छपा था और पता चला था कि वे प्रगतिशील लेखक संघ की कार्यकारिणी की बैठक में भाग लेने के लिए केरल भी होकर आ गये हैं। उसके बाद वे विनोद तिवारी जी की अंतिम किताब के विमोचन के अवसर पर स्वयं आये थे और उस पर अपने विचार व्यक्त किये थे। कुछ ही दिन बाद विनोदजी के अंतिम संस्कार के दिन भी वे सुभाषनगर विश्राम घाट पर आये थे और बातचीत में पुनः दुहराया था कि थोड़ी कमजोरी जरूर है पर कैंसर का कोई दुष्प्रभाव नहीं है।
कमला प्रसादजी ने जब से पहल का सयुंक्त सम्पादन और प्रगतिशील लेखक संघ के संगठन का काम हाथ में लिया तो फिर पूरी तरह से समर्पित होकर किया। पहल के बाद वसुधा के सम्पादन से लेकर प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव बनने तक वे शायद इससे बाहर कुछ सोचते ही नहीं थे। आपसी बातचीत का सिलसिला कहीं से शुरू हो समाप्त उनके संगठन की चिंता से ही होती थी। समर्पित भाव से किये गये इस काम से वे हजारों लोगों से जुड़े और उतने ही शत्रु भी बनाये जो उन्हें अपने लक्ष्य से डिगा नहीं सके। अपने विचार से जुड़े सैकड़ों प्रतिबद्ध रचनाकारों और नवोदितों को उन्होंने पुरस्कारों और सम्मानों से प्रोत्साहित किया। जब भी इसका इतिहास लिखा जायेगा तो पता लगेगा कि देश में जिन महत्वपूर्ण हिन्दी लेखकों ने अपना स्थान बनाया है उसमें से कितने उनके कन्धों पर खड़े होकर शिखर को छू सके थे। किसी भी संगठन के कार्यकर्ता के लिए कमला प्रसादजी का जीवन एक प्रतिमान हो सकता है।
बाद में पता चला कि उन्हें चिरायु अस्पताल में भरती करना पड़ा है और आईसीयू में हैं। लोगों ने वहाँ बात करने से मना किया और बात नहीं हो सकी। होती तो शायद वे यही कह रहे होते कि कोई गम्भीर बात नहीं है और में ठीक हो रहा हूं, फिर अपुन मीटिंग करेंगे।



वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

2 टिप्‍पणियां:

  1. संगठन निर्माण (सो भी लेखकों और कवियों को जोड़ने, जिनमे से अनेक के लिए बर्नार्ड शा कि उक्ति अनुचित नहीं कि "जिस पृथ्वी पर मैं रहता हु, वह सूरज का चक्कर नहीं लगा सकती, सूरज ही इसकी परिक्रमा करता होगा" ) के लिए धीरज और सरलता पहली शर्त है, नेपथ्य से प्रेरित करने का कौशल अत्यंत जरुरी है. कमला बाबू में वह था. वे जानते थे कि कहाँ खामोश रह कर भी बोला जा सकता है और कहाँ खामोश करने के लिए बोलना जरुरी है. उन्हें कमांडर जिसने भी कहा सही कहा था. वे हिंदी साहित्य के कमांडर ही थे. निजी तौर पर वे अनेक सारी अच्छी संपदा की तरह, विरासत में मिले थे. पापा के साथ उनके रिश्ते गाढे थे. मुझे उन्होंने हमेशा उत्साहित करने की कोशिश ही कि. उनका जाना एक बड़ी रिक्ति है.

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