रविवार, मार्च 27, 2011

क्या यह साध्वी शब्द का अपमान नहीं है?


क्या यह साध्वी शब्द का अपमान नहीं है? वीरेन्द्र जैन
आज के हिन्दी मीडिया में तकनीकी ज्ञान से सुसज्जित जो नई फौज भरती हुयी है वह भाषा प्रयोग के प्रति लापरवाह है जिसके परिणाम स्वरूप उनके कहे का वही मतलब सम्प्रेषित नहीं होता जिसे वे सम्प्रेषित करना चाहते हैं। दूसरी ओर कुछ गैरईमानदार संगठन अनजाने में ही उन्हें वे शब्द थमा देते हैं जिससे उनके पक्ष का मतलब निकलता है। वे शब्दों की ऐसी लकीर पीटते हैं जैसे कि उन शब्दों के कुछ अर्थ ही नहीं होते हों। लम्बे समय तक महिला दस्युओं को दस्यु सुन्दरी शब्द से विभूषित किया जाता रहा जबकि फूलन देवी समेत अनेक महिला दस्यु जिस संघर्षमय परिवेश में विकसित हुयी थीं उसमें उनका स्वरूप एक जुझारू श्रमिक महिला से मिलता था और परम्परागत रूप से प्रयुक्त होने वाला सौन्दर्य शब्द का विशेषण उनके लिए फिट नहीं बैठता। इसी तरह पीले कपड़ों में रहने वाली महिला को साध्वी कहने का चलन चल पड़ा है, भले ही उसके धार्मिक ज्ञान या दीक्षा की कोई जानकारी किसी को न हो। इस शब्द के प्रयोग से सम्बन्धित के प्रति एक सहज श्रद्धा का भाव आमजन के मन में पैदा हो जाता है, जिसकी ओट में कई तरह के अपराध लम्बे समय तक छुपे रहते हैं। इसी भ्रम का प्रभाव था कि प्रज्ञा ठाकुर को साध्वी की तरह सम्बोधित करने का जो सिलसिला प्रारम्भ हुआ वह अभी तक जारी है, भले ही समाचार पत्रों में ही प्रकाशित समाचारों से यह सुस्पष्ट हो गया हो कि पीले कपड़ों की ओट में रहने वाली यह युवती भाजपा के छात्र संगठन से निकल, किसी व्यक्तिगत कुंठा का शिकार हो एक उग्रवादी बन गयी व इसने साम्प्रदायिक दंगे भड़काने के लिए न केवल मुस्लिम समूहों के बीच बम विस्फोट कराये अपितु हिन्दू समूहों को उत्तेजित करने के लिए उनके बीच भी बम विस्फोट कराये और इसे मुस्लिम उग्रवादियों द्वारा किये गये बतलाने के लिए नकली सबूत भी छोड़े। इसका परिणाम यह हुआ कि शार्टकट से काम चलाने वाला मीडिया उनके द्वारा वांछित राग अलापने लगा। उसके सहयोगियों द्वारा की गयी स्वीकरोक्ति से सामने आया है कि नफरत की आग से धधकती इस युवती ने न केवल अपने ही साथियों की हत्या कराने में गुरेज नहीं किया अपितु सन्देह के आधार पर अपने पितृ संगठन आर एस एस के पदाधिकारियों की हत्या कराने की योजना भी बनायी। बम विष्फोटों के बाद इस युवती का अपने साथियों से यह सवाल करना कि इतने कम लोग क्यों मरे, अपने आप में उसके निर्मम और अमानवीय सोच की कहानी कहता है।
इस युवती को राजद्रोही जैसे शब्दों से भी नहीं पुकारा जा सकता क्योंकि इसने अभी तक सीना ठोक कर अपने कृत्यों को स्वीकार करने का साहस भी नहीं दिखाया है, जैसा कि नक्सलवादी जैसे उग्रवादी संगठन करते हैं। ऐसी दशा में उसकी छवि एक ऐसे अपराधी की बन रही है जो बड़े से बड़ा अपराध करने के बाद भी अदालत से बचने के लिए हर हथकण्डा अपनाता है। यदि ऐसा नहीं होता तो बहुत सम्भव था कि कम से कम हिन्दू साम्प्रदायिकता के दुष्प्रभाव में आये लोग ही उसे नायकत्व दे देते। दूसरी ओर उसका संगठन, उसमें सम्मलित विभिन्न त्तरह के लोग, और उन्हीं में से कुछ के कबूलनामों से यह साफ है कि वह एक हिन्दू साम्प्रदायिकता से दुष्प्रभावित उग्रवादी के रूप में पहचानी जा रही है, और दर्जनों निरपराध लोगों की मौतें उस पर लगे आरोपों के खाते में दर्ज हैं। जेल में उससे मुलाकात करने के लिए कोई भक्त नहीं अपितु हिन्दूवादी दल भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ही पहुँचते हैं। ऐसी दशा में मीडिया द्वारा उसके नाम के आगे साध्वी शब्द का प्रयोग करना उसके मुखौटे को बल प्रदान करना है, जिससे जनित श्रद्धा की ओट में उसके जनविरोधी काम छुप सकते हैं।
जन आस्था से जुड़े शब्द सुपरिभाषित होने चाहिए और उनके प्रयोग के कुछ नियम होने चाहिए। पीले कपड़ों को छोड़कर प्रज्ञा ठाकुर को साध्वी पुकारे जाने का कोई आधार न पहले था और न अब बचा है। उसके एक साध्वी के रूप में किये जाने वाले कार्यों और आचरण के बारे में कोई इतिहास नहीं मिलता, न ही उसके धार्मिक ज्ञान या पुराणकथाओं पर आधारित प्रवचनों का कोई अता पता है, पर फिर भी मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री और उनके परिवार के साथ उसके फोटो अखबारों में छपे हैं। आडवाणीजी ने भी अयोध्या में बाबरी मस्जिद की जगह राम मन्दिर बनवाने के लिए जो यात्रा निकाली थी उसमें प्रयुक्त डीजल चलित वाहन डीसीएम टोयटा को रथ कहलवाया था। रथ एक पौराणिक काल का घोड़ों से चलने वाला वाहन होता था इस एक शब्द ने ऐसा प्रचार पाया कि उनकी राजनीतिक यात्रा धार्मिक यात्रा की तरह लगने लगी। यह भाषा से दिया गया धोखा था। अपात्र और आचरण विमुख लोगों को साधु या साध्वी के नाम से पुकारा जाना भी कुछ कुछ ऐसा ही है। कबीर दास ने बहुत पहले यह कह कर सावधान किया था-
मन न रंगायो, रंगायो जोगी कपड़ा............. शब्द के इसी दुरुपयोग के कारण साम्प्रदायिक लोग इस आधार पर वैमनस्य फैलाने की कोशिश कर रहे हैं कि सरकारी जाँच एजेंसी बेचारी साध्वी को सींखचों में बन्द करके उससे कठोर पूछताछ कर रही है, जिसके कारण वह अस्वस्थ हो गयी है। इस आधार पर कुछ लोगों के मन में उसके प्रति सहानिभूति भी पैदा हो रही है। भ्रष्टाचार के निरंतर हो रहे खुलासों से प्रभावित लोग उपरोक्त दुष्प्रचार के आधार पर गलत फैसले भी ले सकते हैं, जिससे देश अपने मार्ग़ से भटक सकता है। जरूरत इस बात की है धर्म की ओट में छुपे अपराधियों की पहचान की जाये और इन्हें अलग थलग किया जाये।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

6 टिप्‍पणियां:

  1. क्या इंदिरा, राजीव, संजय, राहुल या प्रियंका द्वारा गांधी शब्द का इस्तेमाल गांधी का अपमान नहीं? और ये कांग्रेस अगर 125 साल पुरानी है तो इंका यानि कांग्रेस (आई) किस चीज का नाम था? कैसे मिला फिरोज को गांधी शब्द इस्तेमाल करने का लाइसेंस? गांधी शब्द छीनने के बाद क्या आज तक इस परिवार के किसी भी सदस्य ने फिरोज की समाधि तक जाने की जहमत उठाई है? कैसे मरा एक हट्टा-कट्टा आदमी फिरोज गांधी एक घोटाले को उठाने के 2 साल के अंदर देहरादून में अकेले निर्वासित के तौर पर?
    साध्वी कसाब या अफजल गुरू या सोहराबुद्दीन से ज्यादा कमीनी है जो आज उसे एक वैजीटेबल बनाकर रख दिया गया है और हवालात में उसके गुप्तांगों तक पर हमला किया जा रहा है।

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    साध्वी कसाब या अफजल गुरू या सोहराबुद्दीन से ज्यादा कमीनी है जो आज उसे एक वैजीटेबल बनाकर रख दिया गया है और हवालात में उसके गुप्तांगों तक पर हमला किया जा रहा है।

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  6. ये बेनामी अपराधबोध के शिकार होते हैं इसलिए अपराधों की प्रतियोगिता करके अपने पक्ष को छुपाने की असफल कोशिश करते हैं। उनकी टिप्पणी में किये गये इशारे एक स्वतंत्र पोस्ट का विषय हो सकते हैं, जिसे उनको लिखना चाहिए। जेल और जाँच में मानव अधिकारों का हनन भी एक स्वतंत्र विशय है जो वस्तुनिष्ठ होना चाहिए।

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