रविवार, जून 21, 2026

राम प्रकाश त्रिपाठी और उनके संस्मरणों की दो पुस्तकें

 

राम प्रकाश त्रिपाठी और उनके संस्मरणों की दो पुस्तकें

वीरेंद्र जैन

गत 8 मई 2026 को श्री राम प्रकाश त्रिपाठी की दो पुस्तकों का विमोचन और उन पर चर्चा का विशेष आयोजन हुआ। श्री त्रिपाठी गत पचास साल से भोपाल के सर्वाधिक सक्रिय सांस्कृतिक एक्टविस्ट हैं और उन्होंने भोपाल के सांस्कृतिक उत्थान पतन की अर्ध सदी में उल्लेखनीय भूमिका अदा की है। इस कार्यक्रम में उनका परिचय देते हुए वक्ताओं ने उनके बहु आयामी व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए राहत इंदौरी का वह शे'र उद्धृत किया कि –

फकीर, शाह, कलंदर, इमाम क्या क्या है

तुम्हें पता नहीं तेरा गुलाम क्या क्या है

अध्ययन के दौरान ग्वालियर में छात्र नेता के रूप में उन्होंने वहाँ के सामंती परिवेश में विचार की राजनीति की और स्टूडेंट फेडरेशन आफ इंडिया के सदस्य के रूप में महारानी लक्ष्मी बाई कालेज के छात्र परिषद के अध्यक्ष रहे। इस एतिहासिक कालेज में कभी अटल बिहारी वाजपेयी भी पढे थे। देश के अन्य अनेक राष्ट्रीय स्तर के नेता, अधिकारी, न्यायाधीश, वकील अदि इसी कालेज से निकले हैं।  इसी कालेज से प्रारम्भ छात्र आंदोलन ने म.प्र. में सरकार बदलवा कर कांग्रेस शासन की जगह संविद शासन कों स्थापित  किया था। त्रिपाठी जी की छात्र परिषद ने कालेज में बड़े बड़े साहित्यिक आयोजन सम्पन्न कराये थे जिनमें उस समय के शिखर के लेखक आते रहे थे। इन्हीं आंदोलनों के लिए उन्होंने छात्र जीवन में जेल यात्राएं भी कीं।

साहित्य के प्रखर छात्र होने के नाते उनकी भाषा पर पकड़ थी, इसीलिए ग्वालियर के संभाग स्तर के अखबारों ने उनसे सहयोग चाहा और उन्होंने कई समाचार पत्रों के सम्पादकों को उपकृत किया। उन दिनों अखबार कुछ कुछ स्वतंत्र हुआ करते थे और मालिकों के हितों को छोड़ कर शेष खबरों पर रोक टोक नहीं रहती थी। त्रिपाठी जी में सच कहने का साहस भी था और उन्हें सलीका भी आता था क्योंकि वे वैज्ञानिक चेतना से सम्पन्न थे। यही कारण रहा कि उन्होंने भोपाल में सरकारी नौकरी में आने के बाद भी लगातार ग्यारह बरस तक दैनिक जागरण जैसे बड़े अखबार में स्तम्भ लिखा जो बहुत लोकप्रिय रहा।

उनके छात्र नेतृत्व के अनुभव का ही परिणाम था कि वे गज़ब के निर्भीक रहे। वे साहित्य और राजनीति में सक्रिय प्रतिभाओं का सम्मान तो करते थे किंतु किसी से दब कर कभी नहीं मिले। अपनी पहली ही मुलाकात में किसी भी हस्ती के साथ अनौपचारिक हो जाने के गुण को उन्होंने हमेशा बनाये रखा। सत्तर के दशक से भारत भवन के निर्माण और अशोक वाजपेयी द्वारा देश भर के शिखर के साहित्यकारों को भोपाल में आमंत्रित और सम्मानित किये जाते रहने, उनकी पुस्तकों की सरकारी खरीद होने के बाद भोपाल को देश की सांस्कृतिक राजधानी मान लिये जाने तक हर विधा के शिखर के कलाकारों का भोपाल आवागमन होने लगा था। पुस्तकों की सरकारी खरीद और पत्रिकाओं को सरकारी विज्ञापनों की बाढ आने लगी थी। त्रिपाठी जी की प्रतिभा और सम्पर्कों के कारण उन्हें अनेक समितियों की सदस्यता मिलती रही, वे पुरस्कारों के लिए गठित जूरी के सदस्य रहे किंतु उन्होंने ना तो कभी किसी पुरस्कार का लालच किया और ना ही अनेक लेखकों की तरह विज्ञापनों के लिए पत्रिकाएं निकालीं। ये बात अलग है कि प्रदेश में अनेक पत्रिकाएं निकलीं जिनके सम्पादक उनसे निःशुल्क  सम्पादकीय लिखवाते रहे और अपने नाम से छपवाते रहे। भोपाल से छपी अनेक स्मारिकाओं के सम्पादन में उनका सहयोग रहा भले ही उनका नाम ना दिया जाता हो। साहित्य संस्कृति पर कोई भी आकर अपने लिए उनसे लिखवा कर ले जाता, जिसके लिए ना तो उन्होंने कभी नाम की चिंता की और ना ही नामे की। हिंदी ग्रंथ अकादमी में अधिकारी होने के नाते वे विभिन्न पुस्तक मेलों में जाते थे और देश भर के प्रकाशकों से उनका परिचय था। इस परिचय का लाभ लेते हुए जाने कितने लेखकों ने अपनी पुस्तकें चपवाने के लिए उनकी सिफारिश लगवा ली किंतु रामप्रकाश जी ने कभी अपनी पुस्तक छपवाने के बारे में कोई प्रयास नहीं किया। छात्र जीवन से ही वे कुशल वक्ता हैं, और कभी भी किसी भे कार्यक्रम के लिए वक्ता के रूप में तैयार रहते हैं। बड़े बड़े कार्यक्रमों के संचालन का भार भी उन्हें मित्रता के कारण उठाना पड़ता है, भले ही कला की किसी भी विधा का कार्यक्रम हो उनके संचालन में कोई कमी नहीं रहती।

रामप्रकाश जी घर परिवार वाले व्यक्ति रहे किंतु इतने यारवाज थे कि सुबह घर से दफ्तर के लिए तो उनका समय तय था किंतु लौटने का तय नहीं था। दफ्तर के काम कै अलवा वे नगर में होने वाले हर साहित्यिक सांस्कृतिक कार्यक्रम में उनकी भूमिका देखी जा सकती थी। उन दिनों भोपाल प्रगतिशील, जनवादी, संस्थाओं और उनमें सक्रिय लेखकों, कलाकारों का ही वर्चस्व था जिनमें रामप्रकाश जी का नेतृत्व किसी कार्यकर्ता की तरह होता था। ना उन्हें कभी मंच पर अध्यक्षता का मोह रहा ना संस्थाओं में पद का। ना वे पुरस्कारों के पीछे दौड़े, ना सम्मानों के और फिर भी हर जगह हाजिर रहते थे।

प्रदेश में साक्षरता आंदोलन चला किंतु बिना किसी लोभ मोह के उन्होंने अपना योगदान दिया। साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए चलने वाले अभियानों में वे सबसे आगे रहे। सामाजिक जागरूकता के नाटक हों, यात्राएं हों, सम्मेलन हों वहाँ वे सक्रियता से उपस्थित देखे जाते हैं। विनोदी स्वभाव के ऐसे व्यक्ति का परिचय और अनुभव क्षेत्र कितना व्यापक है इसका ज्ञान उनके साथ निरंतर रहने वालों को तो फुटकर फुटकर रूप में सुबबे को मिलता रहता था किंतु विस्तार से उसकी जानकारी इन दो पुस्तकों को पढ कर ही जानी जा सकती है। पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित इन संस्मरणों के संग्रह और उन्हें प्रकाशक तक पहुंचाने का काम आरती जैसी अनुभवी सम्पादक के प्रयासों से ही सम्भव हो सका जबकि उनके जीवन अनुभवों के न जाने कितने आयाम अभी प्रकट होना शेष होंगे।

उक्त दो पुस्तकें जो 'यदा कदा' और 'स्मरण में है आज जीवन' के नाम से छपी हैं, में साहित्य जगत के नागार्जुन. शरद जोशी, वेणु गोपाल, शिव कुमर मिश्र, मुद्रा राक्षस, शमीम फरहत, निदा फाज़ली, आफाक अहमद, हैं तो कला के क्षेत्र में शांति वर्धन, प्रभात गांगुली, गुलवर्धन, शकीला बानो भोपाली, पंदित जसराज, शरण रानी आदि हैं कला के क्षेत्र में भाउ समर्थ, विष्णु चिंचालकर. किशोर उमरेकर हैं तो कुछ लेखों में भोपाल की संस्कृति के बेहद चर्चित नामों को याद किया गया है जिनमें ताज भोपाली, शैरी भोपाली, कैफ भोपाली, फज़ल ताबिश, प्रो अक्षय कुमार जैन, भाई रतन कुमार, मथुरा बाबू, गोविंद बाबू, बालकिशन गुप्ता, मदन तापड़िया, घनश्याम मधुप, भगवत रावत, जीवन लाल वर्मा विद्रोही, राजेंद्र अनुरागी और घुर्रू मियां की चर्चा है। रामप्रकाश जी ने जो लेख कुछ प्रमुख साहित्यकार, कलाकारों की रचनाओं पर लिखे हैं वे 'यदा कदा' में संकलित हैं इनमें साहिर लुधियानवी, सआदत हसन मंटो, हबीब तनवीर, राजेश जोशी, विनय दुबे, रमेश उपाध्याय, कुमार अम्बुज, विजय तेंदुलकर, बंशी कौल, उदय शहाणे, नीलेश रघुवंशी, शह्नाज इमरानी, शम्भु दयाल गुरु, महेंद्र भटनागर, नवल जायसवाल, और नरेश जौहरी पर लिखे समीक्षात्मक लेख संकलित हैं जिनमें रमप्रकाश जी की अपनी दृष्टि झलकती है।

संस्मरण और आत्मकथाएं आजकल साहित्य की अन्य प्रमुख विधाओं से भी अधिक लोकप्रिय हो रही हैं, ये संग्रह पठनीय ही नहीं संग्रहणीय भी हैं।

 

 

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