गुरुवार, जून 27, 2024

पुस्तक समीक्षा एक आलोचक की गीत कविताएं

 

 पुस्तक समीक्षा

एक आलोचक की गीत कविताएं


[ प्रोफेसर डा. कृष्ण बिहारी लाल पांडेय का गीत संग्रह ‘ लिख रहे वे नदी की अंतर्कथाएं ‘ ]

वीरेन्द्र जैन

सुप्रसिद्ध प्रोफेसर डा. कृष्ण बिहारी लाल पाण्डेय, जिन्हें अधिकतर लोग के.बी.एल. पाण्डेय के नाम से जानते हैं, का गीत संग्रह ‘ लिख रहे वे नदी की अंतर्कथाएं ‘ लोकमित्र प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। बहत्तर पृष्ठ के इस संग्रह में 89 वर्षीय प्रोफेसर के कुल 36 गीत संकलित हैं। ज्ञात हुआ है कि यह पहला संग्रह भी उन्होंने प्रसिद्ध कथाकार श्री राज नारायण बोहरे के विशेष आग्रह पर दिया है।

प्रोफेसर पाण्डेय लम्बे समय तक कालेज में हिन्दी के उन प्रोफेसर्स में रहे हैं जो हिन्दी के साथ अंग्रेजी में भी एम ए और पी एचडी भर नहीं थे अपितु समकालीन साहित्य की गतिविधियों में निरंतर सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं और विभिन्न सम्मेलनों, सेमिनारों में देश के प्रतिष्ठित प्राध्यपकों, साहित्यकारों, सम्पादकों, आलोचकों के साथ निरंतर विमर्श करते रहे हैं। उनकी यह भागीदारी विभागीय औपचारिकता भर नहीं होती रही अपितु वे अपने विषय की विभिन्न विधाओं में चल रही प्रवृत्तियों पर सतर्क निगाह रखने से जनित समालोचना के साथ मौलिक उल्लेखनीय टिप्पणी के साथ होती रही है। सुप्रसिद्ध कथाकार मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों पर भी उन्होंने विशेष समीक्षात्मक टिप्पणियां की हैं। इतना ही नहीं उन्होंने यह पुस्तक भी उनके कालजयी उपन्यासों की समाज से जूझती हुयी चर्चित नायिकाओं का स्मरण करते हुए उन्हें ही समर्पित की है। बुन्देलखण्ड में जन्मे और पले बड़े तथा पूरा जीवन बुन्देलखण्ड में ही गुजार देने वाले डा. पाण्डेय इस क्षेत्र की मिट्टी की रग रग से परिचित हैं। उनके निर्देशन में ईसुरी समेत अनेक बुन्देली रचनाकारों पर शोध हुआ है। बुन्देलखण्ड के साहित्य, संस्कृति, पुरातत्व, इतिहास आदि पर जब भी बाहर से कोई अध्येता आता है तो वह पाण्डेय जी से सलाह लिए बिना नहीं जाता। यह भूमिका मैंने इसलिए दी है कि ताकि यह समझा जा सके कि कोई आलोचक जब स्वयं रचना करता है तो वह अपनी संवेदनात्मक अभिव्यक्ति के साथ यह भी दृष्टि में रखता है कि उसके पूर्व के रचनाकारों ने अपनी रचनाओं में क्या क्या त्रुटियां की थीं, और उनके किसी भी तरह के दुहराव से भी बचना है। इसलिए इसे एक निर्दोष [बे एब]  गीत संग्रह माना जा सकता है।

कह सकते हैं कि डा. पाण्डेय का यह संग्रह एक ऐसे सतर्क कवि की रचनाओं का संग्रह है जिसने केवल संख्या बढाने के लिए रचनाएं नहीं कीं अपितु अपने अनुभवों, अध्ययन, और समझ से अपनी संवेदनाओं को शब्दों से संवारा है। ये रचनाएं नवगीत की श्रेणी में आती हैं भले ही संकलन में इसे गीत संग्रह कहा गया है, क्योंकि अपनी नवता के साथ नवगीत भी गीत ही है। दिवंगत विनोद निगम ने नवगीत की बहुत सरल सी परिभाषा दी थी कि गीत में निजी दुख को गाया जाता है और नवगीत में सामाजिक, सार्वभौमिक पीड़ा को व्यक्त किया जाता है। नचिकेता जी ‘नवगीत’ की जगह ‘समकालीन गीत’ शब्द के प्रयोग पर जोर देते थे। इस संग्रह के गीत भी इन्हीं परिभाषाओं के अंतर्गत आने वाले गीत हैं। ये गीत अपने समय की पहचान कराते हुए उन धोखों और चालाकियों की ओर इंगित करते हैं जो स्वतंत्रता की घोषित तारीख के बाद निर्मित होते देश में स्थापित होते लोकतंत्र को लागू करते समय पैदा हुयी हैं। इसलिए इसमें तल्खी या व्यंग्य आना भी स्वाभाविक है। जो धोखे मासूम जनता को लगातार दिये जाते रहे हैं, उन्हें मुकुट बिहारी सरोज अपने ‘असफल नाटकों का गीत ‘ में इन शब्दों में पहचानते रहे हैं-

नामकरण कुछ और खेल का, खेल रहे दूजा

प्रतिभा करती गई दिखायी, लक्ष्मी की पूजा

इस संग्रह का शीर्षक गीत भी दूसरों के योगदान को चुरा कर अपने नाम कर लेने वालों पर करारा व्यंग्य है।

घाट पर बैठे हुए हैं जो सुरक्षित

लिख रहे वे नदी की अंतर्कथाएं

आचमन तक के लिए उतरे नहीं जो

कह रहे वे खास वंशज हैं नदी के

सोचना भी अभी सीखा है जिन्होंने      

बन गये वे प्रवक्ता पूरी सदी के

या

पुरातत्व विवेचना में, व्यस्त हैं वे

उंगलियों से हटा कर दो इंच माटी

हो रहे ऐसे पुरस्कृत गर्व से वे

खोज ली जैसे उन्होंने सिन्धु घाटी

हर धर्म में दो सूत्र प्रमुखता से आते हैं, एक सत्य बोलो. और दूसरा चोरी मत करो। चोरी चाहे वस्तु की हो. श्रेय की हो, पद की हो या अन्य किसी भी वस्तु की वह चोरी ही होती है। मेरे पिता जिन काव्य पंक्तियों को गाहे बगाहे दुहराते थे उनमें दो पंक्तियां ये भी थीं –

जो पर पदार्थ के इच्छुक हैं  / वे चोर नहीं तो भिक्षुक हैं

नकल करके, पेपर आउट कराके, नम्बर बढवा के, नकली प्रमाणपत्रों के सहारे, सिफारिश से, नौकरी या अन्य पद, पुरस्कार या सम्मान पा जाने वाले लोग्, सुपात्रों का हक छीनने के बाद उन्हीं पर आँखें दिखाते रहे हैं। इस तरह के छद्म से पूरा तंत्र भरा हुआ है। कवि ने इसे जगह जगह अन्धकार के रूप में चित्रित किया है जो रोशनी के नाम पर परोसा जा रहा है। फज़ल ताबिश का शे’र है – रेशा रेशा उधेड़ कर देखो / रोशनी किस जगह से काली है। संग्रह की रचनाएं, इसी तरह रेशा रेशा उधेड़ कर देखने की कोशिश हैं। ये मुकुट बिहारी सरोज की परम्परा की रचनाएं हैं, जो अर्धसामंती समाज, भ्रम पैदा करने वाली व्यवस्था की राजनीति, प्रशासन और न्याय द्वारा निभाये जा रहे दोहरे चरित्र का खुलासा करती हैं।

अन्धकार के साथ जिन्होंने / सन्धि पत्र लिख दिये खुशी से / उन्हें सूर्य के संघर्षों का /

कोई क्या महत्व समझाये

बिजली के तारों पर बैठे जमे अंधेरे / चिड़ियों के, बेदखल छतों से हुये बसेरे / अंधकार की उम्र बढ गई इतनी ज्यादा / धुंधले धुंधले लगते हैं सब शुभ्र सवेरे

       किसी प्रोफेसर के गीत, शिक्षण, पुस्तकों और ज्ञान के आस पास से ही प्रतीक लेते हैं। देखें –

हम यहाँ पर किस तरह हैं / आपको अब क्या बताएं / जगह भरने को छपी हों / जिस तरह कुछ लघु कथाएं

सुबह लिये जो भी पुनीत व्रत / डूब गये सन्ध्या के रंग में / रह गयी अधूरी हर भूमिका / महाकाव्य लिखने के ढंग में

       भूल गये अभिनेता अपने संवाद / रह गये सुभाषित बस लेखक को याद

हर क्यारी में जहां लगी हैं / नागफनी की ही कक्षाएं / उस आश्रम में भला कमल के / कौन सही पर्याय बताये

दर्द काव्य का क्या जाने / ये चौड़े चौड़े रिक्त हाशिए / जैसा राजयोग तिनकों ने / वृक्षों के अधिकार पालिए

सच तो रफ कापी में ही रह गया बचा / उज्जवल प्रति तक आने में कागज़ ही बदल गया

जिन्दगी की पांडुलिपियों / को मिले कैसे प्रकाशन / जब पुरस्कृत हो रहे हैं / जुगनुओं के भजन कीर्तन

उद्घाटन भर करने आये समारोह में जो / सबने उनकी ही स्वागत में गौरव वचन कहे / और जिन्होंने पूरा रचना तंत्र बनाया था / धन्यवाद तक की सूची में वे इत्यादि रहे

सनसनी भरा हर दिन बीता / माया या मनोहर कहानी सा

है कथानक सभी का वही दुख भरा / ज़िन्दगी सिर्फ शीर्षक बदलती रही

 

आम तौर पर पारम्परिक गीतों में कवि पुरानी सभ्यता संस्कृति को महान मानता हुआ जीवन के संकटों को आधुनिकता की देन मानता और बताता है, किंतु नवगीत में ऐसा नहीं होता है। इस संग्रह में कहीं पुराने गाँव का, हल बैल या पनघट का या देवस्थानों से जुड़ी अन्ध आस्थाओं का गुणगान नहीं मिलता है, अपितु अन्धआस्थाओं, उनके व्यावसायिक विदोहन पर व्यंग्य किया गया है-

धर्म के प्रति आदमी की रुचि बढेगी / अगरबत्ती और भी ज्यादा बिकेगी /पापियों का अंत होगा अब धरा से / सिर्फ एक पवित्रता जीवित रहेगी / आपका ही तना होगा हर जगह पंडाल / ऐसा ज्योतिषी जी कह रहे हैं ।

आरती के दीप ने ही जब जला दी है हथेली / ज्योति का हर पर्व अब बेकार सा लगने लगा है ।

इतनी दूर आ गये हम / उत्पादन के इतिहास में / भूल गये अंतर करना अब / भूख और उपवास में

सबके सिर पर धर्मग्रंथ हैं / सबके हाथों में गंगाजल / किस न्यायालय में अब कोई / झूठ सत्य का न्याय कराये

जिनके पात्र विदूषक भाषा पुरातत्व वाली / क्या निकलेगा उस बेहद कमजोर कहानी से

हमें पता है यहां कुशल कुछ लोगों की है / बाकी तो ईश्वर से नेक चाहते रहते /एक दूसरे का मन रखने को वैसे ही / सिर्फ औपचारिकता में वे ये बातें करते / क्या देखें पंचांग किसलिए समय विचारें /हमको जैसा सोमवार वैसा मंगल है / मगर अंत में यह मत लिखना शेष कुशल है।

       न्याय से भी उम्मीद घटती जा रही है –

बात अब किससे कहें बोलो / आप कहते हैं कि मन खोलो / खो चुके हैं शब्द अपना सच/ लग रहा है, बैठ कर रो लो । किसे सौंपें न्याय की अर्जी/ सब यहां पर बने बैठे चौधरी हैं । 

सच कहने वालों को यहाँ , गवाह न मिल पाये / लोग जीतते रहे मुकदमे गलत बयानी से

समाज में गलत दिशा में हो रहे परिवर्तनों पर भी कवि की निगाह है। शार्टकट संस्कृति, रेडीमेड फास्ट फूड, और आम जन के स्वास्थ की कीमत पर सुदर्शन वस्तुओं के व्यावसायिक उत्पादन भी कवि को अखरते हैं-    

डाल पर अब पक न पाते फल / हमारे पास कितना कम समय है/ कौन मौसम के भरोसे बैठता अब / चाहतों के लिए पूरी उम्र कम है / मंडियां सम्भावनाएं तौलती हैं / स्वाद के बाज़ार के अपने नियम हैं ।

  पिछले दिनों रहीम पर बोलते हुए प्रसिद्ध कवि अरुण कमल ने बताया था कि रहीम ने अपनी कविता में भले ही मायथोलोजी से बहुत सारे प्रतीक लिये हैं किंतु उनकी कविता में ईश्वर के भरोसे सब होने या उसकी कृपाकांक्षा के कोई संकेत नहीं मिलते हैं। इस संग्रह के नवगीत भी इसी गुण से सम्पन्न हैं। जगह जगह पाखंड और उसके सहारे पल रही समाज व्यवस्था और राजनीति पर उंगली उठाई गयी है। आधुनिक हो रहे समाज में भी सभी कुछ अच्छा नहीं अपितु उसमें भी विकृतिंया आती रहती हैं। सामाजिक सम्बन्धों में दुख दर्द भी आते रहते हैं। वे लिखते हैं कि

इतना अपनापन तुम में बढा / जो कुछ भी देखा अपना लिया / सिर्फ शपथ खानी थी वन्धुवर / तुमने तो हर विधान खा लिया ।

ओढ लिये हमने विदूषकी मुखौटे / अपनी ही दृष्टि में हुए हैं हम छोटे

इंकलाब के कंठ मुखर हैं / अब दरबारी बातों में / नाच रहे चेतक के वंशज / घुंघरू पहिन बरातों में

लग सका जो न हिलते हुए लक्ष्य पर / उस बहकते हुए बान सी ज़िन्दगी

डालियां जिसकी स्वयं ही आचरण करती वधिक का / भूल भी कितनी मधुर थी नीड़ उस तरु पर बनाना

लोरियां ही झँप गईं पर दर्द यह सोता नहीं है / मन नहीं पाषाण जो आघात पर रोता नहीं है

ज़िन्दगी में बस अभी तक / यही हमको मिल सका है /गलतियों का सफर पश्चाताप /पर आकर थका है

इन गीतों में सामाजिक चेतना की अभिव्यक्ति भी दिखती है –

चुप्पियों का अर्थ केवल डर नहीं है / यह किसी प्रतिरोध की आवाज भी है / मौन का आशय महज स्वीकृति नहीं है / वह असहमति का नया अन्दाज भी है

लोरियों से, क्रुद्ध पीड़ाएं नहीं सोतीं / व्रत कथाएं भूख के उत्तर नहीं होतीं

समाज का नेतृत्व करने वाले नेताओं और राजनीति से कवि की कविता सवाल पूछती है –

जिस सुबह के लिए सारी रात जागे हम / आपने वह लिखी अपनी जमींदारी में

       कौन सी जलवायु निर्मित आपने कर ली / आपकी फसलें पनपती हैं अकालों से  

मिट्ठुओ पहले कहो तुम चित्रकोटी / फिर खिलायेंगे तुम्हें हम दूध रोटी / और वह भी बन्द पिंजरे में/ क्या पता तुम बैठ जाओ दूसरी ही डाल पर / आइए बैठें जरा चर्चा करें चौपाल पर

शब्द अब एकार्थवाची हो चले हैं / खोजिए ये कहाँ जन्मे हैं, पले हैं / लिखी है प्रस्तावना ‘हम लोग भारत के’ / पर हमारे अलग सबके मामले हैं

गांव गांव का चरित्र युद्ध प्रिय / होता जा रहा राजधानी सा

ऐसी हवा चली तुलसी के बिरवे आज बबूल हो गये / आंगन आंगन जुड़ी संसदें, इतने अधिक उसूल हो गये / फूलों के बदले उगते अब कांटों भरे सवाल / न जाने कैसा फागुन आया

इतना बड़ा अपरिचय, हमसे नाम पूछती अपनी छाया

जाना क्या घुल गया कुएं में, सारा गांव लगे बौराया

छोड़ो हम भी क्या ले बैठे, दो कौड़ी की बातें छोटी / आखिर देश प्रेम भी है कुछ, जब देखो तब रोटी रोटी / करतल ध्वनि में आज़ादी का झंडा आप चढाते रहना / कभी कभी बस आते रहना

इतना था विस्तार धूप का रोज नहाया करते थे / पहला लोटा डाल आपकी जय ही गाया करते थे / जिसने हमसे धूप छीन ली, उसको ईडी सम्मन दें / चलो धूप को ज्ञापन दें

 बड़े बड़े प्रस्थान चले, पर थोड़ी दूर चले / चलते रहे विमर्श मगर निष्कर्ष नहीं निकले / या

जाइए जिस घाट हत्यारे वहीं पर / रक्त रंजित वस्त्र अपने धो रहे हैं / भूख से बेचैन इस वातावरण में रात्रि भोजों के तमाशे हो रहे हैं / मोक्ष के कुछ और दरवाजे खुले हैं / कार में, तन्दूर में या बेकरी में ।

अंततः कवि को कहना पड़ता है

अच्छा बोलो, अपना भी कोई जीवन है / या उंगली पर स्याही भर अपना विधान है / कुछ तो लगे कि हाँ यह है अधिकार हमारा / या सब कुछ कर कमलों का कृपादान है / इसीलिए कुछ प्रश्न उछालो, उत्तर मांगो, / आखिर यहां हमारा होना क्यों असफल है 

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

 

सोमवार, जनवरी 29, 2024

श्रदेधांजलि/ संस्मरण डा. धनंजय वर्मा

 

डा. धनंजय वर्मा श्रद्धांजलि
डा. धनंजय वर्मा से पहली मुलाकात महेश कटारे के गाँव में कमला प्रसाद जी के नेतृत्व में आयोजित ग्राम यात्रा में सम्मलित होते हुये हुई थी। तब परिचय के समय उन्होंने कहा था कि एक वीरेन्द्र जैन दतिया में भी हैं, और मैंने उन्हें विनम्रता से बताया था कि मैं वही हूं। बाद में भोपाल आने पर शिखर वार्ता में प्रकाशित उनके एक लेख पर मैंने प्रतिकूल टिप्पणी की थी पर उनका व्यवहार सदैव स्नेहिल बना रहा। बाद में तो उनकी अध्यक्षता और मुख्य आतिथ्य में कई कार्यक्रमों में सम्मलित होने का अवसर मिलता रहा। वे सदैव स्पष्टवादी और मुखर रहे, उन्होंने अपने मतभेदों को कभी छुपाया नहीं। प्रदेश में पुरस्कारों की राजनीति पर उन्होंने " मुझको मालूम है जन्नत की हकीकत " नाम से एक पुस्तिका भी लिख डाली थी।
दिल्ली के एक प्रकाशक मेरे मेहमान हुआ करते थे। उन्होंने भोपाल के कुछ प्रतिष्ठित लेखकों से पुस्तकें दिलवाने का अनुरोध किया तो मैंने वर्माजी से सम्पर्क कराया, और उन्होंने मेरा अनुरोध सहर्ष स्वीकार कर लिया।
पिछले कुछ दिनों से श्रद्धेय लोग निरंतर घटते जा रहे हैं, उनमें से एक और प्रतिष्ठित अलोचक का जाना डराता है। विनम्र श्रद्धांजलि

सभी रिएक्शन:
Shrikant Choudhary, Mahesh Soni और 1 अन्य


शुक्रवार, दिसंबर 15, 2023

श्रद्धांजलि / संस्मरण मधुप पांडेय

 

श्रद्धांजलि / संस्मरण मधुप पांडेय

प्रो. मधुप पांडेय अपने क्षेत्र के कवियों के मुखिया थे

वीरेन्द्र जैन


मधुप पांडेय जी मेरे धर्मयुग परिवार के सदस्य थे और मैं विनोद में उन्हें धर्म [युग] भाई कहता था। धर्मयुग के रंग और व्यंग्य स्तम्भ में वे मेरे वरिष्ठ थे इसलिए आदरणीय थे। नवभारत विदर्भ क्षेत्र का ही नहीं, किसी समय हिन्दुस्तान का सबसे अधिक सर्कुलेशन वाला अखबार था जिसके रविवारीय परिशिष्ट में स्तम्भ लिखा करते थे। वे अखबार के मालिकों के प्रिय और विश्वासपात्र थे। नागपुर के सीतावर्डी में विदर्भ साहित्य सम्मेलन नामक संस्था का भवन था जिसमें पुस्तकालय, वाचनालय के साथ गोष्ठी कक्ष भी थे। इस संस्था का नियंत्रण नवभारत के मालिक महेश्वरी बन्धुओं के पास था और मधुप पान्डेय एक समय उसकी संचालन समिति के प्रमुख सदस्यों में से एक थे। उनकी लोकप्रियता का एक और आयाम था कि वे पूरे विदर्भ क्षेत्र में होने वाले कवि सम्मेलनों के पसन्दीदा संचालक थे। गणेश उत्सवों के दौरान कवि सम्मेलनों की श्रंखला चला करती थी जिसके संचालक होने के कारण वे देश भर के मंचीय कवियों के आकर्षण का केन्द्र रहा करते थे।

मैंने जब धर्मयुग में छपने का अवसर पाया तो रचनाएं भेजने में निरंतरता बनाये रखी। इसे देख कर तत्कालीन उपसम्पादक सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने मुझ से रंग और व्यंग्य स्तम्भ में लतीफे लिखने के लिए कहा। इस आग्रह या कहें कि मौके को मैं ठुकरा नहीं सका और पूरी क्षमता से इस स्तम्भ में नये नये प्रयोग किये जिनमें से एक साहित्यकारों पर झूठे लतीफे लिखना भी था। इसमें विनोद के लिए लतीफे में साहित्यकार का नाम जोड़ दिया जाता था। कवि सम्मेलन के कवियों का नाम धर्मयुग में आने से उनकी लोकप्रियता में और वृद्धि होती थी। वे इससे खुश होते थे।

इसी दौरान मुझे मधुप पांडेय जी का एक पत्र मिला जिसमें लिखा था कि ‘ इन दिनों आप धर्मयुग में धड़ल्ले से छप रहे हैं, इसी क्रम में एकाध लतीफा मेरे ऊपर भी चिपका दिया करें’। मुझे पत्र पाकर अच्छा लगा और मन में मंचों पर मौका पाने की दबी छुपी कुलबुलाती आकांक्षा को रास्ता मिलता दिखा। मैंने उनका नाम भी जोड़ा, किंतु तभी एक हादसा सा हो गया। मैंने एक लतीफा लिखा था जिसमें मधुप पांडेय के बेटे के स्कूल जाने के प्रारम्भिक अनुभव पर व्यंग्य था।

लतीफे के प्रकाशन के कुछ दिनों बाद उनका पत्र आया कि ‘ आपके लतीफे से एक गड़बड़ हो गयी है। दर असल मेरे कोई संतान नहीं है और आपका लतीफा पढ कर अनेक लोगों ने पिता बनने की बधाइयां देना शुरू कर दिया है।‘ यह महसूस ही किया जा सकता है कि ऐसी दशा में परिवार को कैसा महसूस हो रहा होगा। मैंने क्षमा याचना तो की ही किंतु झूठे लतीफे लिखना बन्द कर दिया।

जब मेरा नागपुर ट्रांसफर हुआ तो उन्होंने विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मेलन भवन में मेरा परिचय कराया जिनमें भाऊ समर्थ, कार्यालय प्रबन्धक परसाई, राजेन्द्र पटौरिया आदि थे। दामोदर खडसे भी उन दिनों नागपुर ही पदस्थ थे जिनसे मैं पूर्व से ही परिचित था। कार्यालीन परिस्तिथिवश मैं नागपुर कुल तीन महीने ही रह सका किंतु इसी दौरान मधुप जी के कारण पूरे नागपुर का हिन्दी साहित्य परिवार मेरा अपना परिवार बन चुका था। नवभारत के एक पूर्व सम्पादक शुक्ला जी भी मोर भवन [ सम्मेलन के भवन का नाम ] नियमित रूप से आते थे और उनके लम्बे सम्पादकीय काल के संस्मरण और उनकी स्मृति दंग कर देती थी। नागपुर से विदा होते समय उन्होंने घर पर खाने के लिए बुलाया था और मैं लतीफे वाली घटना से एक अपराध बोध सा लेकर उनके घर गया था। असमंजस में रहा था कि भाभीजी से क्षमा मांग कर कहीं पुरानी बात को कुरेद कर दुख ना पहुंचा दूं इसलिए लगातार अव्यक्त क्षमाप्रार्थी बना रहा।

मधुप जी की स्मृतियों को सादर नमन। 

शनिवार, नवंबर 18, 2023

श्रद्धांजलि / संस्मरण से.रा.यात्री मेरे बड़े भाई से बढ कर रहे यात्रीजी

 श्रद्धांजलि / संस्मरण से.रा.यात्री मेरे बड़े भाई से बढ कर रहे यात्रीजी


वीरेन्द्र जैन
सुप्रसिद्ध कथाकार से रा यात्री नहीं रहे। वे 91 वर्ष के थे। जब तक मैं यात्रीजी से नहीं मिला था तब तक मैं खुद को भाई विहीन मानता था क्योंकि मैं अपने पिता का अकेला पुत्र था किंतु उनसे मिले स्नेह और वरद हस्त के बाद मैंने पहली बार जाना कि एक बड़ा भाई क्या होता है।
जबसे मैंने कुछ कुछ लिखना प्रारम्भ किया था तब लिखना केवल छपने के लिए होता था और जिस विधा में भी छपने की गुंजाइश देखता था, उसी विधा में हाथ आजमाने का प्रयास करता था। एक बार एक पुस्तकालय की रद्दी की बिक्री में मुझे कई किलो कादम्बिनी पत्रिकाएं सस्ते में मिल गयीं। रामानन्द दोषी के सम्पादन में निकलने वाली इस पत्रिका में श्रेष्ठ विदेशी साहित्य के हिन्दी अनुवाद के सार संक्षेप सहित समकालीन श्रेष्ठ हिन्दी साहित्य का प्रकाशन होता था। इसकी सामग्री के चयन में यह सावधानी रखी जाती थी कि रचनाओं का आकार बहुत बड़ा न हो, वे सुगम्य, हों रोचक हों और गागर में सागर भरती हुयी लगें। जापानी हाइकू की तरह छोटी कविताओं का नियमित प्रकाशन भी क्षणिका के नाम से कादम्बिनी ने ही प्रारम्भ किया था। किसी भी राष्ट्रीय स्तर की पत्रिका में मेरी पहली रचना क्षणिका के रूप में कादम्बिनी में ही छपी थी। कादम्बिनी का एक और गुण उसे दूसरी पत्रिकाओं से अलग करता था और वह यह कि वे लेखकों के पते भी छापते थे जिससे जरूरत पड़ने पर पाठक उनसे सीधे संवाद कर सकते थे। अपने एक मित्र से प्रभावित होकर मैंने चर्चित व्यक्तियों से पत्र व्यवहार का रोग पाल लिया था व कादम्बिनी के अंकों ने मुझे सैकड़ों की संख्या में पते उपलब्ध करा दिये थे। कई बार तो किसी की रचना पर कोई भी असंगत सवाल उठा कर उससे पत्र व्यवहार का गौरव ओढ कर खुश हो लेता था।
से.रा. यात्री जी का पता भी ऐसे ही मेरी डायरी में दर्ज हो गया था।
बाद में ऐसा हुआ कि मैं अपने समय की श्रेष्ठतम पत्रिका धर्मयुग में व्यंग्य कविताएं लिखने लगा और लगभग नियमित रूप से लतीफे भी लिखने लगा। इसी दौरान एक विवादवश धर्मयुग ने मेरे नाम के साथ मेरे नगर का नाम भी जोड़ना शुरू कर दिया था व मेरे नाम के इस अनूठेपन के कारण यह पाठकों की निगाह में खटकने लगा था। उन दिनों मैं एक छोटे बैंक में नौकरी करता था जिसमें स्थानांतरण अखिल भारतीय स्तर पर होते थे। इसी क्रम में मेरा स्थानांतरण भरतपुर से गाज़ियाबाद हो गया। एक ओर तो दिल्ली के निकट गाज़ियाबाद स्थानांतरण से मैं उत्साहित था तो दूसरी ओर कम वेतन में महानगर में रहने की समस्याएं भी थीं। मैं ने अपनी डायरी देखी और उसमें जो प्रमुख नाम सामने आया वह से.रा. यात्री का ही था। उनके नाम का संक्षिप्तीकरण मुझे पहले भी आकर्षित करता रहा था।
मैंने उन्हें पत्र लिख दिया तथा अपने बारे में पूरा परिचय देते हुए बहुत विनम्रता से निवास खोजने में मदद की याचना की। उनका उत्तर आने से पहले ही मैं एक रविवार गाज़ियाबाद के लिए निकल पड़ा ताकि ज्वाइनिंग से पहले मकान तलाश कर सकूं। बिस्तरबन्द और अटैची एक सस्ते से होटल में रखे और सबसे पहले यात्रीजी के पते कवि नगर की ओर निकल पड़ा\ अपनी पहली मुलाकात में ही मुझे उनकी प्यार भरी डांट खानी पड़ी व उसके साथ भरे पेट में भी खाना खाना पड़ा। डांट इसलिए कि मैंने होटल में कमरा क्यों लिया और सीधे घर पर क्यों नहीं आया और जोर देकर यह भी नहीं कह सका कि खाना भी होटल में खा कर आया हूं। उस पहली मुलाकात में ऐसा नहीं लगा कि किसी इतने जाने माने लेखक से पहली बार मिल रहा हूं। आज जब छोटे से छोटे परिवार में भी किसी मेहमान के आने से घर छोटा पड़ने लगता है और दिल सिकुड़ने लगते हैं लेकिन यात्रीजी के पाँच बच्चों और एक डागी के परिवार में दो बैड रूम के कमरे में वे अनजान मेहमान को घर में रुकवाने के आग्रही थे। यह बात मुझे अन्दर तक भिगो गयी। उन्होंने मेरे लिये एक वन रूम सैट का फ्लैट देख लिया था और उसी दिन मकान भी तय हो गया जो यात्री जी के निवास और मेरी बैंक की शाखा के बीच में ही बराबर दूरी पर था। मैं गाज़ियाबाद में लगभग दो वर्ष रहा और कभी भी ऐसा नहीं लगा कि मेरा कोई सरपरस्त नहीं है।
मेरा परिवार उनके जितना मेहमान नवाज नहीं था और हम लोग उनकी मेहमान नवाजी का जवाब उसी भाषा में नहीं दे पाते थे किंतु इस आधार पर उनके व्यवहार में कभी कमी नहीं आयी। उनके घर पर साहित्यकारों का आना जाना लगा ही रहता था और वे सब उनके परिवार के सदस्य की तरह ही सहज होकर आते थे। सब एक साथ बैठ कर मटर छीलने या प्याज काटने का काम करते थे। सारिका कार्यालय मुम्बई से दिल्ली आ गया था और वरिष्ठ् उप सम्पादक अवध नारायण मुद्गल को कार्यकारी सम्पादक होकर अकेले ही दिल्ली आना पड़ा, चित्रा जी को बच्चों की पढाई के लिए मुम्बई ही रहना पड़ा था।। मुद्गल जी अक्सर ही शनिवार को गाज़ियाबाद आ जाते थे और यात्री जी के यहाँ गोष्ठी जमती थी। मैं जो कभी सारिका जैसी पत्रिका का मुरीद था, व उसमें लघु कथाएं लिखता था, इसलिए उसके तत्कालीन सम्पादक के साथ बैठकी कर गर्व महसूस करता था।
एक बार राजेन्द्र यादव की चेखव के बारे में एक किताब यात्री जी लाये थे व उसको आधार बना कर वे सारिका में लगातार स्तम्भ लिख रहे थे। राजेन्द्र यादव ने पुस्तक वापिस मंगवायी थी जिसे लौटाने के लिए हम दोनों लोग उनके आफिस में गये थे तो राजेन्द्रजी बोले यात्री तुम अपना कवच साथ में लाये हो। उसी समय राजेन्द्र जी ने शानी जी के पक्ष में इन्दिरा गाँधी के नाम एक ज्ञापन लिखा था क्योंकि नवभारत टाइम्स ने शानी जी की छत्तीसगढ से सरकारी नौकरी छुड़वा कर रविवारीय परिशिष्ट के सम्पादक के रूप में बुलवाया था और एक साल पूरा होते ही उन्हें सेवा मुक्त कर दिया था। राजेन्द्र जी चाहते थे कि उनके साहित्यिक कद के अनुरूप उन्हें कोई सरकारी पद मिले। उस ज्ञापन पर उन्होंने यात्रीजी के हस्ताक्षर लिये और मुझ से भी दस्तखत करने को कहा। पहले तीन नामों में हम लोगों के नाम थे। तब ऐसी छोटी मोटी बातों से भी बड़ी खुशी मिलती थी इसीलिए घटना याद बनी रही।
जब में हाथरस में था तो एक बार मुरसान गेट से गुजरते हुए अचानक मुझसे मिलने काका हाथरसी मेरी ब्रांच में आये तो पूरी ब्रांच के सदस्यों ने उनके साथ फोटो खिंचवाना चाहा। पड़ोस के एक फोटोग्राफर ने तुरंत फोटो भी खींच लिये। उन्होंने मेरे साथ इन्टरव्यू मुद्रा में अलग से फोटो खिंचवाया। मैं वह फोटो फ्रेम में जड़वा कर टीवी के ऊपर रखता था। एक दिन यात्रीजी आये और उन्होंने कहा कि आपके साथ काका बहुत अच्छे लग रहे हैं। मैं उनका व्यंग्य समझ गया और उस दिन के बाद मैंने वह फोटो तो हटा ही दी, उसके बाद किसी भी चर्चित विशिष्ट व्यक्ति के साथ कभी फोटो नहीं खिंचवायी। इसी घटना से याद आया कि प्रबन्धन से टकराहट के कारण मेरा ट्रांसफर गाज़ियाबाद से हैदराबाद कर दिया गया तो यात्रीजी मेरे लिये दुखी थे। मैं अपने उस समय के ब्लैक एंड व्हाइट टीवी के ट्रांस्पोर्टेशन में असुरक्षा के प्रति चिंतित था तो उन्होंने उस टीवी की पूरी कीमत पर अपने पास रख लिया और कहा कि तुम वहाँ दूसरा खरीद लेना। उन्होंने पूरी सहानिभूति और आत्मीयता के न जाने ऐसे कितने अहसान किये। हैदराबाद जाते हुए मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं घर से बाहर जा रहा हूं। वे स्टेशन पर छोड़ने आये थे। सामान में किताबों से भरा एक भारी स्टील का बक्सा भी था। कुलियों ने मजबूरी समझ कर कुछ ज्यादा ही पैसे मांग लिये तो उन्हें गुस्सा आ गया और बोले कि इसे हम लोग खुद ले जायेंगे। हम दोनों लोगों ने एक एक कुन्दा पकड़ा और ऊंचे जीने पर चढा कर ले गये। इस प्रयास में उनका अंगूठा भी चोटिल हो गया था। हैदराबाद पहुंचने तक भी उनकी चिंता मेरे प्रति बनी रही और उन्होंने कल्पना पत्रिका की पुरानी टीम के सदस्यों, मुनीन्द्रजी और ओम प्रकाश निर्मल को पत्र लिखे जिससे मुझे वहाँ के साहित्यकारों के बीच अपने कद से अधिक सम्मान और स्नेह मिला। मुनीन्द्रजी के साप्ताहिक पत्र हैदराबाद समाचार [ अब दक्षिण समाचार] में मुझे निरंतर लिखने का मौका मिला जिससे मेरा गद्य व्यंग्य बहुत सुधरा। इस दौरान भी मेरा उनसे पत्र व्यवहार और निजी सलाह लेने का रिश्ता बना रहा। जब हैदराबाद के बाद नागपुर होते हुए मेरा ट्रांसफर जबलपुर हुआ तो उन्होंने ज्ञानरंजन जी को मेरे लिए पत्र लिखा। जब मैं ज्ञानजी से मिलने गया तो उन्होंने कहा कि तुम्हारे कारण बहुत वर्षों बाद यात्री जी का पत्र मिला। ऐसे ही एक ट्रांसफर पर उन्होंने मुझे लिखा था कि नाम तो मेरा यात्री है पर असली यात्री तो तुम हो।
1984 में मैं हरपालपुर पदस्थ हो गया था, तब तक मेरे पास इतने व्यंग्य हो गये थे कि एक संग्रह आ सकता था। उस समय का चलन था कि नये लोग अपना पैसा खुद लगा कर संग्रह छपवाते थे, पर मेरी जिद थी कि अपने पैसे लगा कर संग्रह नहीं छपवाऊंगा। मैं अपनी पाण्डुलिपि लेकर सीधा गाज़ियाबाद पहुंच गया और अपनी बात रख दी। यात्रीजी कई प्रकाशकों के लिए पाण्डुलिपि के सम्पादन में सहयोग देने का काम भी करते थे। उन्होंने उस समय के बहु चर्चित प्रकाशक पराग प्रकाशन के श्रीकृष्ण अग्रवाल से मिलवा दिया और प्रकाशन के लिए कहा। वे यात्रीजी के आदेश से इंकार नहीं कर सके और मेरी पहली पुस्तक छप गयी। बाद में जब मैं सेवानिवृत्ति लेकर भोपाल रहने लगा तो वे एक प्रकाशक को लेकर भोपाल आये और उसके सरकारी काम में सहयोग करने व स्थानीय साहित्यकारों से परिचित कराने की जिम्मेवारी सौंप गये। मैंने उनका भरपूर सहयोग किया और कई बड़े लेखकों से पुस्तकें देने को कहा। उन्होंने मेरी दो पुस्तकें छापीं। उनके साथ मेरा अनुभव अच्छा नहीं रहा पर मैंने यात्री जी से कभी शिकायत नहीं की और ना ही जैसे को तैसा वाली नीति अपनायी क्योंकि वे यात्री जी द्वारा भेजे गये थे।
1986 में मैं फिरसे नगरी नगरी द्वारे द्वारे भटकने को मजबूर हो गया था क्योंकि बैंक ने मुझे इंस्पेक्टर [आडीटर] बना दिया था। उन दिनों मैं लखनऊ प्रवास पर ही था जब वहाँ प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना का स्वर्ण जयंती आयोजन हो रहा था। मैं छुट्टी लेकर उस आयोजन में शामिल होने का लोभ संवरण नहीं कर सका। संयोग से अतिथि के रूप में आमंत्रित यात्रीजी से मुलाकात हो गयी। मैं जिस होटल में रुका हुआ था वह आयोजन स्थल के समीप में ही था। दो तीन दिन उनका साथ रहा और दो भाइयों के बीच निजी बातें होती रहीं।
वे बहुत ही पतले अक्षरों में स्पष्ट लिखते थे और अंतर्देशीय पत्र या पोस्टकार्ड का ही प्रयोग करते थे। अपनी लम्बी लम्बी टांगों से वे प्रतिदिन कई किलोमीटर पैदल ही चलते थे। कुछ लोग कहते हैं कि वे पहले सोशलिस्टों वाली लाल टोपी लगाते थे किंतु मैंने उन्हें कभी टोपी लगाये नहें देखा। उनका कुर्ता जरूर लम्बा होता था। उसके बारे में एक बार होली के अवसर पर बीबीसी लन्दन से एक संस्मरण सुना था कि उनके मित्रों द्वारा किसी दूर दराज के निर्जन स्थल पर भांग की पार्टी रखी गयी। उसके सेवन के बाद प्यास लगी। पास में ही एक कुंआ दिखा किंतु रस्सी नहीं थी। विचार बना कि यात्री जी का कुर्ता तो लम्बा है इसलिए वे झाड़ी के पीछे जा कर पाजामा उतार दें जिससे बाल्टी बांध कर पानी निकाल लिया जाये। इस अभियान में जब भांग का सेवन किये हुए एक साथी के हाथ से रस्सी बना पाजामा छूट गया और बाल्टी सहित पाजामा कुंएं में चला गया। यात्रीजी झाड़ी के पीछे ही खड़े रह गये।
ऐसा नहीं है कि यह सब उन्होंने मेरे लिए ही किया अपितु उनका स्वभाव ही ऐसा था कि किसी की भी सहायता करने में पीछे नहीं रहते थे। देश भर के साहित्यकारों पत्रकारों कलाकारों आदि का जो प्रेम उन्हें मिला वह दुर्लभ है। जो भी उनके सम्पर्क में आया वह उनका हो गया। वे अजातशत्रु थे। उनकी स्मृति बनी रहेगी।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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