रविवार, जून 26, 2022

 

संस्मरण

शाहनाज इमरानी – जिसके बारे में उसकी मौत के बाद जान सका

वीरेन्द्र जैन


मनोज कुलकर्णी का सन्देश व्हाट्स एप्प और फेसबुक पर मिला कि कवि शाहनाज इमरानी नहीं रहीं। पढते ही एक चेहरा तो याद आ गया किंतु उसके व्यक्तित्व और कृतित्व का स्वरूप एकदम से नहीं उभर सका। बाद में लगातार राम प्रकाश त्रिपाठी, राजेश जोशी, शैलेन्द्र कुमार शैली, आदि के सूचनात्मक शोक सन्देश मय फोटो के मिले तो एकदम से याद आ गया कि एक दो साल पहले मेरे फेसबुक पेज पर नियमित रूप से लाइक और कमेंट करने वाली युवती ही शाहनाज इमरानी थी। मेरी उससे इतनी ही जान पहचान थी कि साहित्यिक सांस्कृतिक जगत पर निरंतर हो रहे हमलों के खिलाफ चौराहों और पार्कों आदि में जो विरोध प्रदर्शन होते थे उसमें एक अनिवर्य उपस्थिति शाहनाज की भी होती थी।

वह सुन्दर थी किंतु इतनी सादा थी कि किसी को भी उसे देख कर बहनापा महसूस हो सकता था। सादा कपड़ों में उसका सात्विक भाव श्रद्धा जगाता था। पिछले दशक से मैंने कवि गोष्ठियों में जाना छोड़ दिया था इसलिए उसके कवि रूप को नहीं जान सका था। उसकी मृत्यु के वाद देश के जिन जाने माने कवियों और कला समीक्षकों ने अपने श्रद्धांजलि लेख में जो कविताएं उद्धृत कीं उन्हें पढ कर लगा कि उसकी कविताएं भी उसके जैसी ही सादा थीं और एक अवसाद को बुनती दिखती थीं। [वैसे मैंने कुछ ही कविताएं पढी हैं ] ।

उसकी म्रत्यु के बाद ही पता चला कि उसके पिता कामरेड थे और उसकी माँ की मृत्यु के समय वह कुल दो वर्ष की थी। इसलिए वह मशहूर कवि शायर फज़ल ताबिश के यहाँ पल कर बड़ी हुयी। फज़ल ताबिश बड़े सिर वाले ही नहीं बहुत बड़े दिल वाले इंसान थे और भोपाल के समस्त प्रगतिशील जनवादी साहित्यकारों के यार थे। कविता के संस्कार उसने वहीं पर पाये थे। बताया गया कि उसका विवाह सात साल तक चला जिससे उसकी एक बेटी भी हुयी जो उसके संरक्षण में ही बड़ी हुयी और इन दिनों कालेज में है। ये बात अलग है कि शाहनाज को देख कर लगता था कि जैसे उसकी उम्र रुक सी गयी है। सुन्दर दंतपंक्ति और मुस्कान की मालिक के अन्दर क्या गम थे ये किसी को पता नहीं थे क्योंकि कि वह किसी को अपने दुखों के बारे में कुछ बताती ही नहीं थी, जबकि दूसरों के दुख में मदद करने के लिए वह सबसे आगे रहती थी।

उसे कैंसर हो गया था, उससे पहले उसे कोरोना हो चुक था और एक स्कूटर की टक्कर में अपना पैर भी तुड़वा चुकी थी। शायद परेशानियों ने उसका पीछा कभी नहीं छूटा था। उसकी शोकसभा में भोपाल साहित्य जगत की सभी चुनिन्दा हस्तियां जैसे विजय बहादुर सिंह, राम प्रकाश त्रिपाठी, राजेश जोशी, कुमार अम्बुज, नीलेश रघुवंशी, रमाकांत, सुबोध श्रीवास्तव,बादल सरोज, सन्ध्या शैली, जसविन्दर सिंह, पलाश सुरजन, प्रज्ञा रावत, प्रतिभा गोटेवाले, श्रुति कुशवाहा, वसंत सकरगाये, अवधेश, बालेन्दु परसाई, डा.स्वतंत्र सक्सेना, शैलेन्द्र कुमार शैली, बद्र वास्ती, शायान कुरैशी उसकी बेटी, फज़ल ताबिश का परिवार, शाहनवाज खान, आदि ने अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किये। मुझे यही अफसोस रहा कि अमृता प्रीतम की किसी कथा नायिका जो हम सब के बीच विचरण कर रही थी, मैं उसके बारे में अनजान रहा।

सोशल मीडिया पर भी शरद कोकास और सुरेन्द्र रघुवंशी आदि के संस्मरणात्मक लेख भरपूर देखे गये। उसकी कविता पुस्तक की चर्चा हुयी व अप्रकाशित कविताओं को प्रकाशित करने का संकल्प लिया गया। देखना होगा कि यह संकल्प कब तक पूरा हो पता है।  

वीरेन्द्र जैन

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अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

 

 

शनिवार, जून 18, 2022

गामा पहलवान के नाम से जुड़ी यादें

 गामा पहलवान के नाम से जुड़ी यादें

वीरेन्द्र जैन


मेरा जन्म 1949 में हुआ था और उसी वर्ष मेरे पिता का ट्रांसफर ललितपुर से दतिया हो गया था अतः मैं अपना जन्म स्थान दतिया ही मानता रहा हूं क्योंकि 1971 में एम.ए. तक की शिक्षा प्राप्त करने तक मैं दतिया में ही रहा हूं। बाहर जाने पर अपने परिचय में दतिया का नाम जोड़ने पर लोग दो बातें ही याद करते थे, एक गामा पहलवान की, दूसरी दतिया को ‘गले का हार’ बताने वाली कहावत की। बचपन में मैं इतना दुबला था कि मुझे गामा की नगरी से जोड़ने के बाद लोग मुस्कराते जरूर थे।
प्रसिद्ध लोगों और विधाओं को अपने राज्य के साथ जोड़ कर राजा लोग सुख पाते थे। गामा पहलवान को दतिया महाराज भवानी सिंह ने राजाश्रय दिया था क्योंकि गामा का ननिहाल दतिया में ही था। कहते हैं कि उनकी खुराक बहुत अधिक थी जिसमें दॆढ पाउंड बादाम, दस सेर दूध, मटन, छ्ह देशी मुर्गे आदि शामिल थे। बड़े लोगों को आश्रय भी उनके अनुकूल चाहिए होता है, इसलिए बाद में पटियाला महाराज ने उन्हें बुलवा लिया था, व बाद में जो जमीन उन्होंने उन्हें दी थी वह बंटवारे के बाद पाकिस्तान में आ गयी थी, इसलिए उन्हें पाकिस्तान गया हुआ मान लिया गया। 1947 के बद भी वे लगातार हिन्दुस्तान आते रहे क्योंकि एकीकृत देश का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने जो सम्मान पाया, उसकी स्मृति ने उन्हें कभी विभाजन को स्वीकार नहीं करने दिया।
दतिया के होली पुरा पर इनकी एक हवेली थी। वह हवेली धीरे धीरे ध्वस्त होकर खण्डहर में बदल गयी थी। लोग रात विरात उसमें से निर्माण सामग्री ले जाते थे। उसी मुहल्ले में रहने वाले मेरे पिता के आफिस के एक गार्ड रात्रि में उसमें से कुछ मटेरियल उठाने गये थे कि दीवार और पत्थर गिर गये। उन्हें अस्पताल भिजवाया गया जहाँ उन्हें खून की उल्टी हुयी। डाक्टर समेत सारे लोग घबरा गये। बाद में पता चला कि खून का महत्व समझते हुये उनके सिर से जो खून बह रहा था उसे वे पीते गये थे वही उल्टी में निकला था। गामा के नाम से मेरा यह पहला परिचय था।
एक दो बार गामा और उनके भाई दतिया में आये जिनका अतिथ्य दतिया के नगर सेठ रतन लाल अग्रवाल करते थे जिनके परिवार के अनेक लोगों को पहलवानी का शौक था और उन्होंने अपने बगीचे ‘मोदी का बाग’ में अखाड़ा बनवा रखा था। यह स्थान लगातार कई तरह से चर्चित रहा है। हमारे दौर के युवाओं में से दर्जनों लोग वहाँ जाकर अखाड़ेबाजी और कसरत करते रहे। किवदंति रही है कि उस बाग में गामा कसरत करते रहे थे।
1989 से चले अयोध्या के रामजन्मभूमि अभियान के बाद जो साम्प्रदायिक वातावरण बना उसने मुझे बहुत संवेदनशील कर दिया था। मैं राजेन्द्र यादव, प्रभाष जोशी आदि से प्रेरित हो रहा था। उस समय मैं कई राज्यों में घूम घाम कर दतिया लौट आया था और वहाँ के लीड बैंक आफिस में पदस्थ था। साहित्य के साथ साथ मैं एक स्थानीय दैनिक अखबार में कबीर नाम से एक स्तम्भ भी लिखता था। इस तरह से मैं अपने राजनीतिक सामाजिक विचार भी व्यक्त करता रहता था। यह 1993-94 की बात रही होगी जब मध्य प्रदेश के सभी जिलों में खेल स्टेडियम का निर्माण करवाया गया था। दतिया में भी हुआ और उसके नामकरण का प्रस्ताव भी चर्चा में आया। मैंने अखबार के अपने स्तम्भ में लिखा कि गामा पहलवान का सम्बन्ध दतिया से रहा है इसलिए स्टेडियम का नाम गामा स्टेडियम ही ठीक रहेगा।
दतिया के एक खिलाड़ी और खेल प्रशिक्षक श्री बाबूलाल पटेरिया थे। वे हाकी खिलाड़ी के रूप में बड़े बड़े मैच खेल चुके थे, और ध्यान चन्द आदि के समकालीन थे। उनका उठना बैठना मेरे पिताजी के साथ भी रहा था। अपने योगदान को देखते हुए और उम्र को देखते हुए उनकी इच्छा थी कि स्टेडियम उनके नाम पर हो तो ठीक रहेगा। जब उन्होंने मेरा स्तम्भ पढा तो उन्होंने अखबार के कार्यालय में जाकर मालूम किया कि कबीर कौन हैं। वे चल कर मेरे कार्यालय में आये और अपना परिचय देने लगे। मैंने उठ कर उनके पांव छुये और अपना परिचय दिया कि आप तो मेरे पिताजी के साथियों में से हैं। आप दतिया में दशकों पूर्व लगातार जो हाकी टूर्नामेंट करवाते रहे हैं उसकी ख्याति से कौन परिचित नहीं हैं। नामकरण के बारे में मैंने तो केवल अपना विचार व्यक्त किया था अंतिम निर्णय तो जिलाधीश के नेतृत्व वाली समिति को लेना है।
रोचक यह रहा कि मेरा विचार तत्कालीन जिलाधीश को भी पसन्द आ रहा था। उस समिति में भाजपा के दो नेता भी थे, उनमें से एक ने कहा कि गामा पाकिस्तान चले गये थे इसलिए उनके नाम से स्टेडियम का नाम नहीं रखा जाना चाहिए किंतु उसी बैठक में दूसरे भाजपा नेता जो एक प्रसिद्ध वकील थे और जिनसे अक्सर मेरी नोक झोंक चलती रहती थी ने गामा के नाम का पक्ष लिया और कहा कि अल्लामा इकबाल भी तो पाकिस्तान चले गये थे फिर क्यों उनके ‘सारा जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा को क्यों गाते हो’। बहस आगे बढ गयी तो समिति ने फैसला किया कि स्टेडियम का नाम ‘दतिया स्टेडियम’ ही रख दिया जाये।
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, मार्च 24, 2022

समीक्षा – जिन्हें जुर्मे इश्क पे नाज था

 

समीक्षा – जिन्हें जुर्मे इश्क पे नाज था

संवेदनात्मक ज्ञान को चरितार्थ करती पुस्तक

वीरेन्द्र जैन

मुक्तिबोध ने कहा था कि साहित्य संवेदनात्मक ज्ञान है। उन्होंने किसी विधा विशेष के बारे में ऐसा नहीं कहा अपितु साहित्य की सभी विधाओं के बारे में टिप्पणी की थी। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जिस रचना में ज्ञान और संवेदना का संतुलन है वही साहित्य की श्रेणी में आती है।  

खुशी की बात है कि विधाओं की जड़ता लगातार टूट रही है या पुरानी विधाएं नये नये रूप में सामने आ रही हैं। दूधनाथ सिंह का आखिरी कलाम हो या कमलेश्वर का कितने पाकिस्तान , काशीनाथ सिंह का काशी का अस्सी हो या वीरेन्द्र जैन [दिल्ली] का डूब, सबने यह काम किया है। पंकज सुबीर की जिन्हें जुर्म-ए-इश्क पे नाज़ थाइसीकी अगली कड़ी है।

       अमूमन उपन्यास अनेक चरित्रों की अनेक कहानियों का ऐसा गुम्फन होता रहा है जिनके घटित होने का कालखण्ड लम्बा होता है और जो विभिन्न स्थलों पर घटती रही हैं। यही कारण रहा है कि उसे उसकी मोटाई अर्थात पृष्ठों की संख्या देख कर भी पहचाना जाता रहा है। चर्चित पुस्तक भी उपन्यास के रूप में सामने आती है। इसका कथानक भले ही छोटा हो, जिसका कालखण्ड ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यास नरक यात्राकी तरह एक रात्रि तक सिमिटा हो किंतु तीन सौ पृष्ठों में फैला इसमें घटित घटनाओं से जुड़ा दर्शन और इतिहास उसे सशक्त रचना का रूप देता है भले ही किसी को उपन्यास मानने में संकोच हो रहा हो। ईश्वर की परिकल्पना को नकारने वाली यह कृति विश्व में धर्मों के जन्म, उनके विस्थापन में दूसरे धर्मों से चले हिंसक टकरावों, पुराने के पराभवों व नये की स्थापना में सत्ताओं के साथ परस्पर सहयोग का इतिहास विस्तार से बताती है। देश में स्वतंत्रता संग्राम से लेकर समकालीन राजनीति तक धार्मिक भावनाओं की भूमिका को यह कृति विस्तार से बताती है। इसमें साम्प्रदायिक दुष्प्रचार से प्रभावित एक छात्र को दुष्चक्र से निकालने के लिए उसके साथ किये गये सम्वाद के साथ उसके एक रिश्तेदार से फोन पर किये गये वार्तालाप द्वारा लेखक ने समाज में उठ रहे, और उठाये जा रहे सवालों के उत्त्तर दिये हैं। पुस्तक की भूमिका तो धार्मिक राष्ट्र [या कहें हिन्दू राष्ट्र] से सम्बन्धित एक सवाल के उत्तर में दे दी गयी है, जिससे अपने समय के खतरे की पहचान की जा सकती है।

 
       “जब किसी देश के लोग अचानक हिंसक होने लगें। जब उस देश के इतिहास में हुए महापुरुषों में से चुन-चुन कर उन लोगों को महिमा मंडित किया जाने लगेजो हिंसा के समर्थक थे। इतिहास के उन सब महापुरुषों को अपशब्द कहे जाने लगेंजो अहिंसा के हामी थे। जब धार्मिक कर्मकांड और बाहरी दिखावा अचानक ही आक्रामक स्तर पर पहुँच जाए। जब कलाओं की सारी विधाओं में भी हिंसा नज़र आने लगेविशेषकर लोकप्रिय कलाओं की विधा में हिंसा का बोलबाला होने लगे। जब उस देश के नागरिक अपने क्रोध पर क़ाबू रखने में बिलकुल असमर्थ होने लगें। छोटी-छोटी बातों पर हत्याएँ होने लगें। जब किसी देश के लोग जोम्बीज़ की तरह दिखाई देने लगेंतब समझना चाहिए कि उस देश में अब धार्मिक सत्ता आने वाली है। किसी भी देश में अचानक बढ़ती हुई धार्मिक कट्टरता और हिंसा ही सबसे बड़ा संकेत होती है कि इस देश में अब धर्म आधारित सत्ता आने को है।’’ रामेश्वर ने समझाते हुए कहा।      

 

इस पुस्तक में टेलीफोन के इंटरसेप्ट होने के तरीके से इतिहास पुरुषों में ज़िन्ना, गाँधी, नाथूराम गोडसे के साथ सम्वाद किया गया है जैसा एक प्रयोग फिल्म लगे रहो मुन्नाभाईमें किया गया था। इस वार्तालाप से उक्त इतिहास पुरुषों के बारे में फैलायी गयी भ्रांतियों या दुष्प्रचार से जन्मे सवालों के उत्तर मिल जाते हैं। कथा के माध्यम से निहित स्वार्थों द्वारा कुटिलता पूर्वक धार्मिक प्रतीकों के दुरुपयोग का भी सजीव चित्रण है।

नेहरूजी के निधन पर अपने सम्वेदना सन्देश में डा. राधाकृष्णन ने कहा था कि टाइम इज द एसैंस आफ सिचुएशन, एंड नेहरू वाज वैल अवेयर ओफ इट। महावीर के दर्शन में जो सामायिक है वह बतलाता है कि वस्तुओं को परखते समय हम जो आयाम देखते हैं, उनमें एक अनदेखा आयाम समय भी होता है क्योंकि शेष सारे आयाम किसी खास समय में होते हैं। जब हम उस आयाम का ध्यान रखते हैं तो हमारी परख सार्थक होती है। पंकज की यह पुस्तक जिस समय आयी है वह इस पुस्तक के आने का बहुत सही समय है। कुटिल सत्तालोलुपों द्वारा न केवल धार्मिक भावनाओं का विदोहन कर सरल लोगों को ठगा जा रहा है, अपितु इतिहास और इतिहास पुरुषों को भी विकृत किया जा रहा है। पुराणों को इतिहास बताया जा रहा है और इतिहास को झुठलाया जा रहा है। आधुनिक सूचना माध्यमों का दुरुपयोग कर झूठ को स्थापित किया जा रहा है जिससे सतही सूचनाओं से कैरियर बनाने वाली पीढी दुष्प्रभावित हो रही है जिसका लाभ सत्ता से व्यापारिक लाभ लेने वाला तंत्र अपने पिट्ठू नेताओं को सत्ता में बैठा कर ले रहे हैं। ऐसे समय में ऐसी पुस्तकों की बहुत जरूरत होती है। यह पुस्तक सही समय पर आयी है। हर सोचने समझने वाले व्यक्ति की जिम्मेवारी है कि इसे उन लोगों तक पहुँचाने का हर सम्भव प्रयास करे जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। शायद यही कारण है कि देश के महत्वपूर्ण चिंतकों ने सुबीर को उनके साहस के लिए बधाई देते हुए उन्हें सावधान रहने की सलाह दी है।       

इस कृति की कथा सुखांत है, किंतु इसके सुखांत होने में संयोगों की भी बड़ी भूमिका है। कितने शाहनवाजों को रामेश्वर जैसे धैर्यवान उदार और समझदार गुरु मिल पाते हैं! कितने जिलों के जिलाधीश वरुण कुमार जैसे साहित्य मित्र होते हैं, विनोद सिंह जैसे पुलिस अधीक्षक होते हैं, और भारत यादव जैसे रिजर्व फोर्स के पुलिस अधिकारी मिल पाते हैं, जो रामेश्वर के छात्र भी रहे होते हैं व गुरु की तरह श्रद्धाभाव भी रखते हैं। आज जब देश का मीडिया, न्यायव्यवस्था, वित्तीय संस्थाएं, जाँच एजेंसियों सहित अधिकांश खरीदे जा सकते हों या सताये जा रहे हों, तब ऐसे इक्का दुक्का लोगों की उपस्थिति से क्या खतरों का मुकाबला किया जा सकता है या इसके लिए कुछ और प्रयत्न करने होंगे?

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

समीक्षा आड़ा वक्त [उपन्यास]

 

समीक्षा

आड़ा वक्त [उपन्यास]

लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस से प्रकाशित चर्चित कहानीकार राज नारायण बौहरे की नई औपन्यासिक कृति का नाम है। यह एक भारतीय किसान परिवार की जीवन कथा है। कथा का काल आज़ादी के बाद का है जिसमें ना तो फसल बीमा की सुविधा है, और ना ही जीवन बीमा की। उस पर समाज की रूढियां उसे जकड़े हुये हैं। यह मध्य भारत के किसानों के जीवन में आये परिवर्तनों और चुनौतियों को दर्शाने वाली कृति है। उपन्यास के पहले भाग में अविकसित असिंचित खेती से जूझते किसान का चित्रण है जिसे प्रकृति की प्रतिकूलता में मजदूरी करना पड़ती है दूसरी ओर समानांतर रूप से चल रहे देश निर्माण में शिक्षा के प्रचार प्रसार से किसान परिवार अपनी अगली पीढी को शिक्षित कर रहा है, गाँव के पास पालीटेक्निक कालेज खुल रहे हैं व देश की राजधानी में एम्स जैसे अस्पताल भी बन चुके हैं। इन परिवारों में गरीबी के बाबजूद बचा रह गया भाईचारा और समर्पण की भावना क्रमशः घट रही है। प्रारम्भ में सुख दुख में भागीदारी थी। आगे जैसे जैसे विकासशील देश में योजनाएं चलती हैं तो नौकारियों की सम्भावनाएं भी बढती जाती हैं। पहले नौकरियों के लिए आज की तरह की मारामारी नहीं थी कि कोई बड़ी बड़ी डिग्री लिये लिये ही ओवर एज हो जाये। पढने के बाद नौकरी मिल भी जाती थी।

कथा का मूल भाव किसान का जमीन के प्रति भावनात्मक लगाव है जिसकी रक्षा में वह मानवीय रिश्तों तक को तिलांजलि दे सकता है। खेत को उर्वर बनाने के लिए वह उसे बच्चे जैसा संवारता है और माँ जैसा सम्मान करता है। कैसी भी मजबूरी में अपनी जमीन को बेचने के प्रस्ताव पर उसे आग लग जाती है और वह ऐसे प्रस्तावक के प्रति सारे लिहाज भूल जाता है। कुंआ खुदवाने, जमीन को समतल करने के लिए, उसमें जम आयी छेवले की जड़ों को उखाड़ने से लेकर खरपतवार हटाने का काम वह खुद ही प्रतिदिन करता है। पैतृक सम्पत्ति में वैसे तो सभी वारिसों की बराबर से हिस्सेदारी होती है किंतु अन्य नौकरी या व्यवसाय करने वाले, किसानी करने वाले भाई द्वारा जमीन को सुधारने, संवारने व उसकी रक्षा करने का मूल्य नहीं समझते। अटूट प्रेम रखने वाले भाइयों के बीच यह टकराव का कारण बनता है। कथा नायक अपने किसान वर्ग के प्रति इतना सचेत है कि किसी की भी जमीन अधिग्रहण में आ रही हो तो उसके विरोध में उस अपरिचित का साथ देने देने के लिए तैयार हो जाता है। एक बार् अचानक ही किसान आन्दोलन में पहुँच जाने पर जब टीवी संवाददाता उसे आन्दोलनकारी किसान समझ सवाल करने लगते हैं तो वह उनके सवालों का किसी मंजे हुये नेता की तरह सटीक जबाब देता है, भले ही वह आन्दोलन का हिस्सा नहीं होता। अनुभवों के साथ उनकी अभिव्यक्ति की क्षमता ही व्यक्ति को नेता बना देती है। कथा नायक का सगा भाई जब ओवरसियर बन कर सुदूर छतीसगढ में प्रशासनिक कार्य करने लगता है तब उसे सरकारी कार्यों की असलियत समझ में आती है।

उपन्यास घटना प्रधान उतना नहीं है जितना वर्णनात्मक  है, इसमें नये नये ओवरसियर द्वारा ठेकेदारों से मिलने वाली दस्तूरी के प्रति प्रारम्भिक द्वन्द भी है। मंत्री द्वारा स्थानांतरण के लिए परोक्ष में मांगी गयी रिश्वत का वर्णन भी है। छतीसगढ के जीवन की विडम्बनाएं भी हैं कि कैसे वे नदी की रेत को छान कर उसमें से सोने के कण तलाशते हैं, या बेरोजगारी से लड़ते हुए मिशनरियों से मिली शिक्षा व सुविधाओं के लिए वे थोपे गये अनुपयोगी धर्म को छोड़ देने में ही अपना भला समझते हैं। उपन्यास में बताया गया बेरोजगारीके प्रभाव में कथा नायक की बहिन का पति किस तरह गड़े हुए खजानों के चक्कर में तांत्रिकों के चक्कर में फंस जाता है।

उपन्यास प्रारम्भ में तो बहुत विस्तारित ढंग से किसान जीवन का वर्णन करता है किंतु अंत आते आते ऐसा लगता है जैसे किसी दबाव में जल्दी से समेट दिया गया है। उसका प्रवाह एक जैसा नहीं बना रहता, फिर भी किसी उपन्यास के लिए अनिवार्य तत्व कहानी, कविता और नाटक थोड़े थोड़े मौजूद हैं।

वीरेन्द्र जैन

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समीक्षा राज नारायण बोहरे का उपन्यास ‘अस्थान’

 

समीक्षा

राज नारायण बोहरे का उपन्यास ‘अस्थान’

वीरेन्द्र जैन

अंतर्राष्ट्रीय ख्यति के फिल्म मिर्देशक श्याम बेनेगल ने एक फिल्म बनायी थी ‘मेकिंग आफ महात्मा’ । इस फिल्म में गाँधीजी के सक्रिय जीवन का वर्णन है कि किस तरह से वे जब दक्षिण अफ्रीका गये व वहाँ पर एशिया व अफ्रीकन मूल के लोगों का शोषण देखा तो अंग्रेज शासकों के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया। इस संघर्ष से जो व्यक्ति जन्मा वह हिन्दुस्तान वापिस लौट कर महात्मा बना। फिल्म बताती है कि परिवेश और परिस्तिथियां ही किसी के व्यक्तित्व को गढती हैं।

सेतु प्रकाशन से प्रकाशित राज नारायण बौहरे का उपन्यास ‘अस्थान’ भी दो ऐसे युवाओं की कथा है जो ऐसे संक्रमण काल में बड़े होते हैं जिसमें सामंत काल गया नहीं है और पूंजीवाद के कदम पड़ चुके हैं। कृषि युग से औद्योगिक युग में पदाक्रमण हो रहा है। समाज की सामंती संस्कृति को लोकतंत्र क़ॆ बैनर से ढक दिया गया है। जहाँ ज़िन्दा रहने का अधिकार तो है किंतु रोजगार का अधिकार नहीं है। जिन्दा रहने के लिए अंधेरे में हाथ पाँव मारने पड़ते हैं। जातिवादी समाज में सवर्ण समाज के लोग श्रम से जुड़े वे काम भी नहीं कर सकते जो उपलब्ध तो हैं किंतु जिन्हें नीची जाति का काम समझा जाता है। परिणाम यह निकलता है कि दो अलग अलग स्थानों में पले बढे सवर्ण परिवार में जन्मे युवाओं में से एक बीए पास करने के बाद भी सरकारी नौकरी नहीं पा पाता क्योंकि स्थानीय राजनीति में दूसरे गुट का समझे जाने के कारण निरपराध होते हुए भी हत्या का आरोपी बना दिया जाता है। वह छूट तो जाता है किंतु दागी कहलाता है।  बाद में रामलीला में भूमिका निभाने के अनुभव के कारण मानस का प्रवचनकर्ता बन जाता है, व मंच पर प्रस्तुतीकरण के नये नये तरीके अपना कर सफल हो जाता है। कुनावी राजनीति के लोग धार्मिक आस्था का विदोहन करने के लिए राम कथा, रामलीला से भी जुड़ते हैं और स्थानीय विधायक कथावाचक को आश्रम बनाने के लिए सरकारी जमीन पर कब्जा करा देते हैं।

दूसरा विवाहोत्सक युवक, अपने किसान परिवार की एक गलत परम्परा, कि उनके यहाँ पीढियों से मझला बेटा अविवाहित रहता है, कुंठित हो जाता है और खेती के प्रति भी उदासीन हो जाता है। इसी उदासीनता में वह साधुओं के सम्पर्क में आता है व उनकी जमात में शामिल हो जाता  है। उसे पागल घोषित कर उसके दोनों भाई उसके हिस्से की जमीन हड़प लेते हैं। वह एक आश्रम के महंत की सेवा टहल में जुट जाता है। आश्रमों में चल रहे आदर्श से विपरीत आचरण पाकर उसका मोह भंग होता है, अन्य अनैतिकताओं में लिप्त महंत जी आश्रम के बगीचे में गाँजे के पौधे उगाने के आरोप में पकड़े जाते हैं ।

मानसपाठी युवा धरनीधर अपने बाजारू तौर तरीकों और विधायक के सहयोग से सरकरी जमीन पर आकर्षक आश्रम तो बना लेते हैं, मन्दिर भी स्थापित कर लेते हैं और अतिरिक्त धन को विभिन्न जगह विनियोजित कर के सम्पत्ति बढा लेते हैं। अपनी व्यावसायिक सफलता के लिए वे अपने नाम के आगे उपशंकराचार्य लगाने लगते हैं। इसी क्रम में उनकी भेंट एक मधुरकंठी प्रवचनकर्ता से होती है और दोनों अपनी परिस्तिथियों में एक दूसरे के आकर्षण में विभिन्न सम्मेलनों में साथ विचरण करने लगते हैं। वे समय मिलते ही आश्रम में ऐसे साथ रहने लगते हैं, जिसे लिव इन कहा जाता है। उनके आश्रम में कोई किसी महिला की लाश फेंक जाता है व उसकी जाँच में पुलिस बेलिहाज होकर अपने पुलिसिया तरीके से पूछताछ करती है व उनके सामाजिक सम्मान का कोई लिहाज नहीं करती।  कुम्भ यात्रा पर निकले नागा बाबाओं का एक दल वहाँ से गुजरता है जो किसी भी मठ या आश्रम को अपनी रियासत समझता है और किसी राजा की तरह अपने नियम थोपता है, व जरूरत पड़ने पर दण्ड देता है। वे देश के किसी कानून को नहीं मानते व कानून को पालन कराने वाली एजेंसियां भी उन्हें ऐसा करने की पर्याप्त गुंजाइश देती हैं। खुद को उपशंकराचार्य लिखने के आरोप में नागा बाबा धरनीधर को  खड़ाऊं से पीटते ही नहीं अपितु कमरे में बन्द भी रखते हैं व अपमान भी करते हैं। उनके साथ की महिला का भी अपमान करते हैं, जिसे तात्कालिक रूप से बाहर भेजना पड़ता है, जहाँ पर भी उसे असम्मानजनक बातें सुनना पड़ती हैं। वह आश्रम छोड़ कर चली जाती है। आश्रम की महिमा घटते ही विरोधी पक्ष आश्रम की जमीन के अवैध होने आदि का मामला उठा देते हैं। पत्रकारिता के नाम पर काक दृष्टि रखने वाले बेरोजगार ब्लैकमेल करने की फिराक में रहते हैं। अपयश से आयोजकों की निगाह में उनकी कीमत घट जाती है, धन्धा मन्दा पड़ने लगता है। अपमान असहनीय हो जाता है और वे आश्रम छोड़ देते हैं।

इन्हीं दोनों व्यक्तियों की मुलाकात ट्रेन के एक डिब्बे में हो जाती है जिन्हें अपने वैरागी स्वरूप से भी वैराग्य हो गया है और अपने उस स्वरूप से निराश होकर लौट रहे हैं। आपसी संवाद और स्मृतियों के सहारे पूरी कथा कही गयी है। कृति बताती है कि इस अर्धसामंती, अर्धपूंजीवादी दौर में शांति उन्हें वहाँ भी नहीं मिलती जहाँ से भाग कर वे धर्म के धन्धे में उतरे थे। यहाँ भी ऐसी ही लपट झपट है, ऊंचे नीच है, एक दूसरे को उठाना गिराना है, सम्पत्ति जोड़ने की तमन्नाएं हैं, षड़यंत्र हैं, महंती के लिए मुकदमेबाजी तक है। शांति वहाँ भी नहीं है जहाँ वे जाने की सोच कर निकले है। ‘राग दरबारी’ का वह अंतिम वाक्य याद किया जा सकता है कि भाग कर कहाँ जाओगे रंगनाथ, जहाँ जाओगे तुम्हें किसी खन्ना की ही जगह मिलेगी।

कृति न केवल रोचक है अपितु ऐसे विषय पर सोच समझ कर विस्तृत अध्यन अनुभव व साक्षात्कार करके लिखी गयी है जिससे एक कम ज्ञात दुनिया में चल रहे कार्य व्यापार की विश्वसनीयता बनी रहे। इस क्षेत्र के लोगों की अपनी भाषा होती है, परखने के अपने कोड होते हैं, झंडे होते हैं, खानपान के नियम होते हैं, जिससे असली नकली की पहचान होती है। कृति में न केवल चुनावी राजनीति में धर्म के स्तेमाल, पुलिस प्रणाली, राजस्व प्रणाली, के कमजोर पक्ष को वर्णित किया गया है, अपितु सामाजिक कुंठाओं की ओर भी इशारा किया गया है।

उपन्यास पठनीय है।  

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

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सोमवार, फ़रवरी 21, 2022

कुमार विश्वास का विश्वासघात

 

कुमार विश्वास का विश्वासघात



वीरेन्द्र जैन

पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान अनुकूल संयोगों के कारण जब आम आदमी पार्टी पंजाब में कुछ बेहतर करने की स्थिति में दिख रही थी तब खराब कवि सम्मेलनों के एक अच्छे संचालक कुमार विश्वास ने एक बयान देकर उसे नुकसान पहुंचाने और अरविन्द केजरीवाल की छवि खराब करने की कोशिश की। आम आदमी पार्टी की ओर से भी उनकी बात का जबाब दिया गया। इस अनावश्यक घटनाक्रम में न केवल भाजपा और काँग्रेस पार्टी को तनाव में खुश होने का अवसर मिला भले ही उन्हें चुनावी लाभ मिलना सन्दिग्ध है। 

अतिमहात्वाकांक्षी कुमार विश्वास ने यह सोच कर बोला कि उनका कुछ भी दांव पर नहीं लगा है, और इस तरह वे केजरीवाल से उन्हें राज्यसभा में न भेजने का बदला ले लेंगे। दूसरी ओर वे काँग्रेस की राजस्थान सरकार द्वारा उनकी पत्नी को लोक सेवा आयोग की सदस्य बनाये जाने का अहसान चुका देंगे।

रोचक यह है कि इस घटनाक्रम में दोनों ही पक्ष अर्धसत्य बोल रहे हैं। यह सत्य है कि कुमार विश्वास अन्ना आन्दोलन में जुड़ते समय मंच के एक लोकप्रिय संचालक व कवि थे और अरविन्द केजरीवाल से अधिक लोकप्रिय थे। लगातार मंच संचालन और कालेज में पढाने के अनुभव से वे धाराप्रवाह रूप से बोल सकने में सक्षम थे, उनका सामान्य ज्ञान भी अच्छा है और प्रत्युन्मति [हाजिर जबाबी] भी अच्छी है। इसी आधार पर वे आन्दोलन के प्रभावी नेता के रूप में उभरे थे। आन्दोलन के एक राजनीतिक पार्टी में बदल जाने के बाद इसी आधार पर वे दल के नेतृत्व में आगे आये व जहाँ अरविन्द केजरीवाल ने भाजपा के प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ा तो कुमार विश्वास को काँग्रेस के प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी राहुल गाँधी को उतारा गया था।

पारदर्शिता की बात करने वाले इस दल में बाद में न जाने क्या हुआ कि शांति भूषण, प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, कुमार विश्वास सहित ज्यादातर नेतृत्वकारी लोग अलग होते गये और पहली बार हाथ आये अवसर पर दिल्ली के दो वैश्य समाज के लोगों को राज्य सभा में भेज दिया गया जिन्होंने कुछ ही दिन पहले पार्टी ज्वाइन की थी। उल्लेखनीय है कि विधानसभा में भरपूर बहुमत लाने वाली पार्टी लोकसभा में सातों सीटें भाजपा से हार गयी थी।

कुमार विश्वास धीरे धीरे केजरीवाल के खिलाफ बोलने में मुखर होते गये और निरंतर कवि सम्मेलनों के मंचों पर अवसर पाने के कारण उनकी सार्वजनिक आलोचना में कटुता भी बढती गयी। उनकी आपत्तियां भी उचित जैसी ही थीं क्योंकि दूसरे पक्ष की ओर से कुछ भी सुनने को नहीं मिल रहा था जिससे लग रहा था कि ‘कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है’।

पिछले दिनों कुमार विश्वास ने जो कुछ कहा, उसके बारे में वे शपथ उठा कर कह सकते हैं कि वह सच है व केजरीवाल ने ऐसा ही कहा होगा, किंतु उन्होंने जब जिस सन्दर्भ के साथ कह कर जो व्याख्या की और करवायी वह बेईमानी है। वे दोनों मित्र थे और निजी बातचीत में हास्य व्यंग्य का पुट चलता ही है। सीएम न बन पाने पर एक देश का पीएम बन जाने जैसी बात में कोई गम्भीरता तलाशना नितांत बचकानापन और बच्चों की लड़ाई में कुछ भी कह देने जैसी बात हो गयी। उल्लेखनीय है कि देश में एक समय खालिस्तान के नाम से एक अलगाववादी आन्दोलन चला था जिसमे लगातार सैकड़ों लो मारे गये और बाद में हरमन्दिर साहब में छुपे आतंकियों को बाहर निकालने के लिए गोले चलाने पड़े जिसके बदले में प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी की हत्या हुयी। फिर देश में सिख विरोधी दंगे हुये जिसमें हजारों सिखों को जान गंवाना पड़ी। बाद में राजीव गाँधी की हत्या के बाद इकलौती राष्ट्रव्यापी पार्टी काँग्रेस नेतृत्व विहीन हो गयी जिस शून्य को भरने के लिए भाजपा जैसी उत्तर भारत की हिन्दूवादी पार्टी हाथ पांव मारने लगी व संगठित आरएसएस के कारण उसे आंशिक सफलता भी मिलती गयी। वह लगातार अपने प्रयास करने और साम्प्रदायिक षड़यंत्र रचने लगी जिससे देश के दूसरे सारे दल आशंकित रहने लगे। भाजपा व्यापक रूप से अस्वीकृत पार्टी रही और 2014 की जुगाड़ से पहले उसे पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाने का मौका नहीं मिला।

केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का उदय भी इसी दौरान हुआ और स्थापित पार्टियों के बीच उसने एक उम्मीद व विश्वसनीयता के आधार पर सफलता प्राप्त की। वह कुछ राज्यों में जगह जगह से टूटी फूटी और निरंतर झरती काँग्रेस का विकल्प बन सकती है व मजबूरी में चुनी गयी भाजपा को उसकी मूल स्थिति में पहुंचा सकती है। पंजाब में किसी अलगाववादी आन्दोलन के फिर से उभरने की दूर दूर तक सम्भावना नहीं है और अगर केजरीवाल अपने वोटरों को विश्वास में लिए बिना किसी ऐसी संस्था से सहानिभूति रखेंगे तो वापिस जमीन पर आने में देर न्नहीं लगेगी।

घटना के पाँच साल बाद पंजाब के चुनावों से दो दिन पहले इस मामले को सनसनीखेज तरीके से उठाना उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती है। दूसरी बात यह कि केजरीवाल और कुमार विश्वास को अपनी राजनीति स्पष्ट करना चाहिए। प्रशासनिक सुधारों और लफ्फाजी से कुछ नहीं बदलेगा। मुकुट बिहारी सरोज ने कहा है-

जिनके पांव पराये हैं, जो मन से पास नहीं

घटना बन सकते हैं वे लेकिन इतिहास नहीं

   वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

                           

शनिवार, दिसंबर 18, 2021

संस्मरण मेरी गाय – चैरई और रिश्ते

 

संस्मरण

मेरी गाय – चैरई और रिश्ते

वीरेन्द्र जैन


बचपन की यादों में, मैं घर में पली गाय के बारे में नहीं भूल पाता। मैं ना तो कभी गाँव में रहा और ना ही मेरे यहाँ कोई खेत थे। हम लोग जिला मुख्यालय वाले एक कस्बे दतिया में रहते थे। आज़ादी से पहले यह स्टेट हुआ करती थी और कहा जाता है कि कभी एक दीवान एनुद्दीन ने इसे तबियत से संवारा था। कुछ सड़कें बनवायी थीं, नालियां बनवायी थीं, फुटपाथ बनवाये थे, पार्क, फव्वारे और दोनों ओर खजूर के पेड़ों से घिरी एक लम्बी सड़क भी बनवाई थी जिसके दोनों तरफ फव्वारे और गेट बने थे। ये सब कुछ अब नष्ट हो चुका है और इनमें से अधिक से अधिक पर अतिक्रमण हो चुका है। इन दिनों राजनीति में सक्रिय होने का एक ही मतलब रह गया है, सरकारी और जन उपयोगी जमीन पर कब्जा करना। कुछ लोगों के निजी घर तो सर्वसुविधा सम्पन्न व मार्बल, टाइल्स मंडित हो चुके हैं किंतु नगर का सौन्दर्य बिगड़ चुका है। पहले साधारण घर होते थे पर चारों ओर कुछ हवेलियां होती थीं जो राजपरिवारों के लोगों की होती थीं इसके साथ साथ दो हवेलियों की मुझे और याद है जिनमें से एक सुप्रसिद्ध राज गायिका शक्का की, और दूसरी पखावज वादक कुंदऊं सिंह की होती थी। इन्हीं दो हवेलियों के बीच हमारा किराये का मकान था जो नगर के बीच से गुजरने वाली इकलौती पक्की सरकुलर सड़क पर था। तब अतिक्रमण नहीं था इसलिए इसी सड़क से दतिया को सेंवड़ा जाने वाली बस भी गुजरती थी। मेरे किराये का मकान भी पन्नालाल खुशालीराम फर्म का था जिनके परिवार से विन्ध्य प्रदेश विधानसभा के लिए पहले विधायक चुने गये थे। सन्दर्भ के लिए बता दूं कि यह मकान भोपाल की मेयर रही विभा पटेल के चाचाओं का था, और बाद में उनके पिता डा. बलवंत सिंह के हिस्से में आया था।

इसी मकान में मेरा बचपन गुजरा जिसके बाहर पिताजी अपनी गाय बांधते थे जिसे चराने के लिए बरेदी सुबह सुबह ले जाता था और शाम को लौटा कर लाता था। पिताजी भले ही नगर के इकलौते बैंक में बाबू थे जब बैंक में केवल सम्पन्न लोगों का ही आना जाना होता था, इसलिए वे छोटे नगर में सबसे सुपरिचित व सम्मानित थे। किंतु उनके अन्दर बाबूगीरी कभी नहीं आयी और वे हर तरह से एक देशज नागरिक बने रहे। हमारे घर सिरौल गांव से दूध देने के लिए पहलू नाम का दूध वाला आता था जिसके सौजन्य से उन्होंने यह गाय खरीद ली थी। इतनी सीधी गाय मैंने दूसरी नहीं देखी। घर में मैं और मुझ से दो साल बड़ी बहिन थी व मुझ से दो साल छोटा भांजा रहा करता था अर्थात मिला कर तीन बच्चे थे। हम तीनों ही उस गाय के थन से सीधे दूध पीते थे। चूंकि दूध निकालने के हिसाब से हम लोग बहुत छोटे थे इसलिए पिताजी हमारे खुले मुँह में सीधी धार लगा देते थे जो कभी कभी चेहरे पर भी पड़ जाती थी। गाय का नाम उन्होंने चैरई रखा था और उसके नाम से पुकारने पर ही वह चैतन्य हो जाती थी। उसके पूरे शरीर पर हाथ फेर कर हम लोगों को ही नहीं शायद उसे भी वात्सल्य सुख मिलता हो  क्योंकि ऐसा करते समय उसने कभी सींग तो क्या पूंछ भी नही फटकारी। हमारे छोटे से परिवार की जरूरत के हिसाब से भरपूर दूध होता था।  उन दिनों फ्रिज और गैस नहीं होती थी इसलिए माँ चूल्हे की बची आँच मे एक नीचे से गोल बर्तन में रखे रहती थीं जिसे कांसिया कहा जाता था। दिन भर मद्धम आँच पर रखे उस दूध  में बहुत मोटी मलाई पड़ती रहती थी और ऊपर चिकनाई की बूंदे उतराने लगती थीं। उस दूध को हमें पिलाने की कोशिशें की जाती थीं किंतु वह दूध हमें कभी पसन्द नहीं आया, जो शायद पाचन कमजोर होने के कारण हो इसलिए हम लोग सीधे थन वाला दूध ही पीना पसन्द करते थे। पिताजी उसे धारोष्ण दूध कह कर उसकी तारीफों के पुल बांधते हुए कहते थे कि देखो इसी दूध को पीकर बछड़े कैसे उछलते हैं। कभी कभी माँ जिन्हें हम आई कहते थे, दूध को जमा देती थीं और फिर बाद में उससे मक्खन निकालती थीं, जिसे नैनू कहा जाता था। कई बार स्कूल जाने से पहले बासी रोटी पर नैनू चुपड़ कर और उस पर पिसी शक्कर भुरक पुंगी [रोल] बनाकर हमें नाश्ते में दी जाती थी जो इतनी  स्वादिष्ट लगती थी कि उसका स्वाद अभी  तक याद है। हमारे मन में गाय के पूज्य होने जैसा भाव कभी नहीं आया किंतु वह घर के सदस्य जैसी थी। कोई हरे चारे के पूरे दे जाता था जिसे हम लोग उसके सामने बैठ कर धीरे धीरे खिलाते थे।

कई साल बाद पिताजी ने एक पुराना मकान खरीद लिया जिसकी मालकिन दो बहिनें थीं जिसमें से एक संतान रहित विधवा थीं तो दूसरी का निधन हो चुका था और मृत्यु से पहले वे उस मकान का एक कमरा बेच गयीं थीं। उनके पति पिताजी के परिचित थे जिन्हें यह कह कर मना लिया गया था कि उन्होंने अपना हिस्सा ले लिया है। बहरहाल दो हजार के उस मकान में से उन्हें 500/- रुपये भी दिये गये थे और 1500/- रुपये जीवित बहिन को मिले थे। अपने पिता से मिले उस मकान के प्रति वे बहुत भावुक थीं, इसलिए पिताजी ने उन्हें जीवन भर बहिन मानने और इस घर को मायका मानने का आश्वासन दिया था। घर में गाय बांधने की जगह नहीं थी, इसलिए पिताजी ने इन मुँह बोली बहिन को गाय भी उपहार में दे दी थी। जब तक पिता जीवित रहे वे हर रक्षा बन्धन पर राखी बांधने व अन्य त्योहारों पर आती रहीं व उन्हें वैसा ही सम्मान भी मिलता रहा। जब भी वे बुआ आती थीं तब हम लोग भावुक होकर अपनी गाय के बारे में जरूर पूछते थे।

आज जब रिश्ते छीजते जा रहे हैं और सगे रिश्ते भी दूर के रिश्ते होते जा रहे हैं, तब इन रिश्तों की याद करके मन भावुक हो जाता है। मैं नौकरी में बाहर निकल आया, पिताजी नहीं रहे। बुआजी भी नहीं रहीं। इन रिश्तों को याद कर के मुनव्वर राना का शे’र कौंध जाता है-

अमीरे शहर को रिश्ते में कोई कुछ नहीं लगता

गरीबी चाँद को भी अपना मामा मान लेती है 

पिताजी कुछ सपने भी देखते थे जिनमें से एक था कि कभी एक बैलगाड़ी में एक स्टोव और खाना बनाने का सामान रख कर गाड़ी के पीछे गाय को बाँध कर भारत भ्रमण के लिए निकला जाये। यह एक ऐसा सपना था जो सपना ही रहा, पर उन्होंने रिटायरमेंट के बाद मैथिली शरण गुप्त की पुस्तकों के विभिन्न विश्व विद्यालयों के कोर्स में लगवाने के एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में प्रकाशक की ओर से भारत के बहुत सारे हिस्से को देखने का सपना पूरा किया।

  वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023