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शुक्रवार, जून 27, 2025

फिल्म समीक्षा – सितारे जमीं पर फिल्मी सितारों के बिना फिल्म बनाने वाला सितारा – आमिर खान

 

फिल्म समीक्षा – सितारे जमीं पर

फिल्मी सितारों के बिना फिल्म बनाने वाला सितारा – आमिर खान

वीरेन्द्र जैन


पीके, दंगल, लगान, तारे जमीं पर जैसी फिल्में और सत्यमेव जयते जैसा टीवी शो बनाने वाले आमिर खान ने सामाजिक चेतना को झकझोर देने वाली एक और फिल्म बनायी है ‘सितारे जमीं पर’। आमिर की फिल्में हिन्दी सिनेमा की रूढियों को तोड़ते हुए बनती हैं। सितारों की लोकप्रियता के आधार पर फिल्म खींचने की परम्परा से बाहर निकल कर कथ्य के आधार पर फिल्में बनाते हैं जिनमें समाज की सच्चाई सामने आती है। इन फिल्मों से दर्पण देखने के बाद समाज अपने चेहरे की कमियों को पहचान कर उसे ठीक करने के लिए प्रेरित हो सकता है। वे उस दर्शक वर्ग की पसन्द के फिल्मकार हैं जो समाज में अच्छी सोच के साथ बदलाव चाहता है और अपेक्षाकृत ईमानदार है।

फिल्म निर्माण एक ऐसा व्यवसाय है जिसमें लागत बहुत लगती है और मुनाफा अनिश्चित रहता है। यही कारण है कि आम निर्माता ऐसी मनोरंजक फिल्में बनाता है जो उत्तेजना या सतही संवेदनाओं को उभार कर बाक्स आफिस पर कमाई कर सके और अपनी लागत निकाल सके। आमिर खान इन से अलग हैं। ‘तारे जमीं पर’ की सफलता के बाद वे चाहते तो फिल्म का नाम ‘तारे जमीं पर -2’ रख सकते थे किंतु ‘ लीक छांड़ तीनों चलें, शायर सिंह सपूत ‘ की तर्ज पर उन्होंने फिल्म का नाम सितारे जमीं पर रखा जबकि कथ्य उससे मिलता जुलता है। आमिर खान राज कपूर परम्परा के एक बड़े अभिनेता हैं, सफल हैं, लोकप्रिय हैं, और मनोरंजन को फिल्म की कथा से ही निकालते हैं उसे अलग से नहीं चिपकाते।

लगभग अस्सी प्रतिशत हिन्दी फिल्मों में नायक नायिका की शादी को जीवन की अंतिम उपलब्धि मानते हुए फिल्म को पूरा करते हैं किंतु राज कपूर ने कभी इस तरह से फिल्म को समाप्त नहीं किया। इस फिल्म में आमिर खान ने शादी को हैप्पी एंडिंग की तरह तो लिया है, किंतु नायक नायिका की शादी को नहीं अपितु नायक की परित्यक्ता माँ की घर के बाबर्ची के साथ शादी को दिखाया है।  एक परित्य्कता माँ जिसने अपने बेटे को आठ वर्ष के उम्र से माँ और बाप दोनों की भूमिका निभाते हुए बड़ा किया है, का भी अपना जीवन है। जैसे नायक की माँ अपने कम लम्बाई के बेटे को पाल कर उसे बास्केट बाल का खिलाड़ी और फिर कोच बनाती है, तो उसका भी दायित्व बनता है कि वह अपनी माँ की भावनाओं का खयाल रखे।

परिवार में बच्चा होने या न होने के बारे में नायक और उसकी पत्नी में मतभेद है। नायक बच्चा नहीं चाहता जबकि उसकी पत्नी चाहती है। इस मतभेद पर नायक घर छोड़ देता है, किंतु परित्यक्ता का दर्द समझने वाली माँ अपना बुटिक का व्यवसाय बहू को सौंप देती है। फिल्म का सबसे बड़ा सन्देश यह है कि जिसे हम नार्मल समझते हैं, वह सबके लिए नार्मल होना जरूरी नहीं। सबका अपना अपना नार्मल होता है और जब हम अपने नार्मल को दूसरे के ऊपर लादने की कोशिश करते हैं, वहीं से समस्या पैदा हो जाती है। कई हादसों से गुजर कर नायक को समझ में आता है कि वह अहंकारी [ इगोइस्ट ] है और अपने नार्मल को दूसरे के नार्मल पर लादना चाहता है। इसी कारण से उसका संस्थान के अपने सीनियर से झगड़ा होता है, मारपीट होती है, जिस पर दण्ड मिलने की उत्तेजना में वह शराब पीकर गाड़ी चलाते हुए कई लोगों की गाड़ी को ठोक देता है, जिसमें पुलिस की गाड़ी भी होती है। उसका चालान कटता है और कोर्ट से उसे सजा मिलती है जो जुर्माने के साथ साथ तीन महीने की कम्युनिटी सर्विस की होती है व उसकी विशेषज्ञता देखते हुए मानसिक विकलांग बच्चों को बास्केट बाल की कोचिंग देने की होती है। इन बच्चों में से एक सजा देने वाली मजिस्ट्रेट का भतीजा भी होता है।

भिन्न भिन्न तरह की पृष्ठभूमि से आये हुए बच्चों के अपने अपने काम्प्लेक्सेस होते हैं। कोई रंग के कारखाने में काम करता है, तो कोई होटल में बर्तन मांजता है, किसी की माँ प्रास्टीट्यूट है, एक पशु प्रेमी लड़का नहाने से डरता है क्योंकि वह डूबते डूबते बचा है, एक नाटी और मोटी लड़की स्वभाव से हिंसक है और बार बार चेतावनी देती रहती है कि मुझे लाइन मत मारना, एक लड़का जो बहुत अच्छा खिलाड़ी है किंतु नेशनल चयन में पक्षपात हो जाने के कारण उदासीनता का शिकार हो जाता है। इन सब की अपनी अपनी प्रतिक्रियाएं हैं, और उन्हें एक टीम में समेटना तराजू में मेंढक तौलने की तरह है। उन्हें खिलाने के लिए सार्वजनिक बस में चंडीगढ ले जाते समय उनकी हरकतों से यात्री डर जाते हैं और ‘पागलों’ को साथ ले जाने से मना कर के बीच रास्ते में ही उतार देते हैं। बच्चों को पागल कहने पर कोच [आमिर खान] का झगड़ा हो जाता है। रास्ते से ही वह अपनी पत्नी को फोन कर किसी गाड़ी की व्यवस्था करने को कहता है, जिससे उनका रुका हुआ संवाद शुरू होता है। इसी संवाद से उसे समझ में आता है कि वह इगोइस्ट है और सबका अपना अपना नार्मल होता है क्योंकि सबकी परिस्तिथियां भिन्न भिन्न हैं। जब बास्केट बाल की टीम फाइनल में पहुँच जाती है तो सेवा संघ का मैनेजर बताता कि उनके पास इतने पैसे नहीं हैं कि टीम को मुम्बई भेज सकें। मजबूरन कोच को कभी अभिनेत्री बनने की इच्छा रखने वाली पत्नी को पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका में लाकर मजदूरों का शोषण करने वाले होटल मैनेजर पर दबाव बनाना पड़ता है जिससे वह बच्चों को मुम्बई भिजवा दे।

इसी क्रम में आम हिन्दी फिल्मों की तरह का संयोग भी जोड़ा गया है जिसमें आश्रम जाने का कह कर बाबर्ची के साथ गयी उसकी माँ उसी होटल में टकरा जाती है और उसका राज खुल जाता है। आमिर क्रोधित होता है किंतु उसकी पत्नी मामले को शांत करती है। वह इसे उनका नार्मल मानने को मजबूर हो जाता है।

फाइनल मैच में बच्चे बहुत अच्छा खेलते हैं किंतु अंत में हार जाते हैं। वे हार पर भी खुश हैं और उनमें से एक कहता है कि मेरी माँ कहती है कि दो एक से बड़ा होता है। हमेशा जीतने और एक नम्बर पर होने की वासना से भरा कोच बच्चों की खुशी में अपना दुख भूल जाता है और सब खुशी मनाते हैं। इसी खुशी के माहौल में उसकी माँ और बाबर्ची की शादी हो जाती है।

फिल्म में तेज कार चलाने वाले, जल्दी गुस्सा हो जाने वाले कोच का लिफ्ट में जाने से डरना चरित्र मे अस्वाभाविकता पैदा करता है, फिर भी परोक्ष में फिल्म देश की विविधता को स्वीकार कर एकता का सन्देश देती है। एक नई नैतिकता अपनाने और पितृसत्ता के दोषों से मुक्त होने का सन्देश भी देती है। कुल मिला कर एक वर्ग विशेष के लिए आमिर खान की फिल्मों की श्रंखला में एक और अच्छी फिल्म है। आमिर खान तो अभिनय में हमेशा की तरह लाजबाब हैं ही, जेनेलिया में बहुत सम्भावनाएं नजर आती हैं, उनकी गिनती इस फिल्म से बड़ी अभिनेत्रियों में होने लगना तय है।       

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

  

मंगलवार, अगस्त 23, 2022

फिल्म लाल सिंह चड्ढा – इसके बायकाट पर हतप्रभ दर्शक

 

फिल्म लाल सिंह चड्ढा – इसके बायकाट पर हतप्रभ दर्शक

वीरेन्द्र जैन


जब खबर मिली की फिल्म लाल सिंह चड्ढा के बायकाट का प्रभाव हुआ है और टिकिट खिड़की पर पिट जाने के कारण सिनेमा घरों में यह आगे उपलब्ध नहीं होगी तो गुरुवार को अपनी व्यस्तता में से समय निकाल कर देखने जाना पड़ा। दिन में पौने बारह बजे जिस राज टाकीज में शो था उसने दर्शकों के अभाव में शो चलाने में असमर्थता व्यक्त कर दी। भागे भागे बारह बजे के शो वाले संगम सिनेमा हाल में गये तो उसने हम दो दर्शकों के होते हुए भी शो चलाने की सहमति दी। बाद में क्रमशः पाँच दर्शक और जुड़े जिनमें से भी दो किशोर किशोरी थे जो फिल्म देखने की जगह कम भीड़ वाले शो में एकांत का सुख लेने आये प्रतीत होते थे क्योंकि शो शुरू होते ही वे हमारे आगे की सीट से उठकर किसी कोने वाली सीट पर जाकर बैठ गये थे।

फिल्म समाप्त होने के बाद मेरे साथ गये दर्शक के मुँह से बायकाट कराने वालों के लिए एक भद्दी सी गाली निकली जो इस बात के लिए थी कि इस फिल्म में उन्हें बायकाट के लायक कुछ भी नजर नहीं आया जबकि पिछले दशक की दर्ज़न भर उन सफल फिल्मों के नाम और दृश्य उन्हें याद आ रहे थे जिनका कोई विरोध नहीं हुआ था। इस बायकाट के पीछे उन्हें इसे चर्चित करने के हथकण्डे की आशंका भी नजर आयी। सबसे ज्यादा गुस्सा उन्हें उन मूर्ख लोगों पर आया जिन्होंने बिना जाँचे परखे इस बायकाट का समर्थन करते हुए फिल्म से दूरी बनाये रखी। पूरी फिल्म बहुत शांत भाव से साहिर की युद्ध विरोधी नज़्म का पाठ सा करती नजर आती है, जिसमें नायक के नाना, परनाना, और पड़नाना क्रमशः पहले दूसरे विश्वयुद्ध और फिर पकिस्तान के साथ हुये युद्ध में शहीद हुये थे।  

यह आज़ादी के दो दशक बाद सिख परिवार में पैदा हुये उस मन्द बुद्धि कैलीपर्स के सहारे चलने वाले बच्चे की कहानी है जिसे अपनी शारीरिक और मानसिक कमजोरी के कारण समाज में अपनी माँ को छोड़ कर हर तरफ से नफरत झेलने को मिलती है तो दूसरी ओर घर से बाहर कहीं कहीं से मिली सहानिभूति की किरणों के सहारे वह अपनी कमजोरियों पर विजय पाता है और सन्देश देता है कि नफरत की तुलना में प्रेम ज्यादा शक्तिशाली होता है। इसमें उसकी माँ द्वारा जगाया गया यह आत्मविश्वास भी प्रेरक शक्ति बनता है कि वह किसी से कम नहीं है। आत्मविश्वास की जिस कमी के कारण उसे कैलीपर्स पहिनने पड़ते थे किंतु एक संकट के समय जब वह बचकर भागता है तो न केवल कैलीपर्स से मुक्त हो जाता है, अपितु वह अपने स्कूल कालेज की रेस में भी अव्वल नम्बर पर  आने लगता है। इसी प्रतिभा के सहारे उसे उसकी सहपाठी लड़की की ओर से न केवल सहानिभूति व प्रोत्साहन मिलता है अपितु अपने नानाओं के कदमों का अनुशरण करते हुए फौज में जाने का मौका मिलता है। फौज में उन अनुशासित लोगों को बहुत पसन्द किया जाता है जो यंत्रवत अपने कमाण्डर के दिमाग से काम करते हैं। वे निर्भय होते हैं और चालाकी उन्हें नहीं आती। बच्चे सबको इसीलिए तो अच्छे लगते हैं क्योंकि वे निश्छल होते हैं। लाल सिंह चड्ढा भी निश्छल और साहसी है। वह दिये गये आदर्शों से प्रेरित है और निस्वार्थ भाव से लोगों और अपने साथियों की सहायता करता है। जहाँ अन्याय देखता है वहाँ बिना आगा पीछे देखे भिड़ जाता है।

बचपन से जवान होने तक देश में घटी कुछ घटनाओं से वह प्रभावित है जिसमें खालिस्तानी आन्दोलन के दौरान अमृतसर के स्वर्ण  मन्दिर में छुपे आतंकियॉं पर गोलीबारी भी एक है, संयोग से उस समय वह वहीं पर होता है, दूसरी घटना श्रीमती इन्दिरा गाँधी की हत्या के विरोध में दिल्ली में सिख समुदाय के खिलाफ घटित हिंसा में फंस जाने के कारण बचने के लिए उसे केश कटवाना पड़े थे। बाबरी मस्ज़िद तोड़ने का माहौल बनाने के लिए अडवाणी की रथयात्रा, मस्ज़िद टूटने के बाद मुम्बई के साम्प्रदायिक दंगे, मण्डल कमीशन लागू करने के बाद आरक्षण के विरोध का सवर्ण छात्रों का आन्दोलन आदि उसकी स्मृतियों में दर्ज होते हैं और वह घर से बाहर नहीं आता क्योंकि उसकी माँ ऐसे अवसरों पर कहती थी कि बाहर मत निकलना, बाहर मलेरिया फैला हुआ है।

 सेना के प्रशिक्षण के दौरान उसकी दोस्ती ऐसे ही एक दक्षिण भारतीय सैनिक से होती है जिसके दिमाग में एक चड्ढी बनियान बनाने की फैक्ट्री डालने का सपना है जिसे वह रिटायरमेंट के बाद मिले पैसे से पूरा करना चाहता है। इसके लिए वह लाल सिंह को पार्टनर बनने का प्रस्ताव देता है जिसे वह स्वीकार करके पूरा करने का वचन देता है। इसी बीच कारगिल में घुसपैठ हो जाती है जिसका पता सुरक्षा बल को बकरियां चराने वालों से मिलता है। लाल सिंह और उसके सिपाही मित्र को फ्रंट पर भेजा जाता है जहाँ वह पूरी मुस्तैदी से न केवल अपना काम पूरा करता है अपितु युद्ध में घायल सिपाहियों को इतने सेवा भाव से बचाता है कि उसमें अपनी सेना के सिपाहियों और दुश्मन देश के सिपाही में भेद नहीं करता। लड़ाई में उसका सिपाही मित्र बाला शहीद हो जाता है।

बचपन से ही उसके साथ सहानिभूति रखने वाली लड़की एक गरीब परिवार से आती है जिसके पिता ने उसकी माँ को कुछ रुपयों के लिए मार डाला होता है। अनाथ लड़की अपनी एक रिश्तेदार के यहाँ शरण लेने को मजबूर होती है और वह रिश्तेदार लाल सिंह के परिवार में काम करने वाली बाई होती है जिस कारण लाल सिंह उसके साथ ही बड़ा होता है। गरीबी के दारुण अनुभवों से दुष्प्रभवित सुन्दर लड़की के मन में किसी भी तरह धनी बनने की महात्वाकांक्षा है, इसलिए वह मन्दबुद्धि लालसिंह के व्याह रचाने के प्रस्ताव पर ध्यान केन्द्रित करने की जगह, माडल से अभिनेत्री बनने की राह पर है जिसके लिए वह अपराधी माफिया की रखैल बन कर रहती है।

कहानी का समापन इस तरह से होता है कि रिटायरमेंट के बाद लाल सिंह अपने गाँव लौट आता है और अपने दोस्त बाला को दिये वचन के अनुसार चड्ढी बनियान का काम शुरू कर देता है, जिसमें बाद में वह पकिस्तानी सिपाही भी जुड़ जाता है जिसके इलाज के दौरान दोनों पैर कट जाते हैं और उसके देश की सेना उसे अपना मान कर वापिस ले जाने से इंकार कर चुकी है।

      इस बीच में जिस माफिया सरगना ने नायिका को रखैल बना कर रखा हुआ था, उसके पीछे पुलिस है इसलिए वह लाल सिंह के पास आकर रहने लगती है। बाद में वह माफिया पकड़ा जाता है और नायिका को भी पुलिस पकड़ने आती है तो वह लालसिंह को बिना बताये पुलिस के साथ चली जाती है। जब दोबारा उसे उसकी प्रेमिका मिल कर बिछुड़ जाती है व उसकी माँ की मृत्यु हो चुकी होती है तो वह देश भर की सड़्कों पर निरुद्देश्य दौड़ लगाना शुरू करता है। राष्ट्रपति से शौर्य पुरस्कार प्राप्त सैनिक के लगातार निरुद्देश्य दौड़ से वह देश के मीडिया के आकर्षण का केन्द्र बनता है। इस बीच नायिका कुछ महीने की सजा काट कर वापिस आती है तो उसे मीडिया से उसके दौड़ने की खबर मिलती है, पर निश्चित पता ठिकाना नहीं मिलता। जेल जाने से पहले लाल सिंह के साथ बिताये कुछ दिनों के परिणाम स्वरूप जेल से बाहर आने के बाद वह एक बच्चे को जन्म दे चुकी होती है, जिसका नाम वह अमन चड्ढा रखती है। देश भर की परिक्रमा पूरी कर एक दिन थक कर जब लाल सिंह वापिस लौटता है तब उसे उसका नौकर उसकी प्रेमिका द्वारा भेजी गयी ढेर सारी चिट्ठियां देता है। उनके सहारे वह नायिका तक पहुंचता है, जहाँ उसे उसके पिता बनने की जानकारी मिलती है। नायिका बीमार है और कुछ दिनों बाद उसकी मृत्यु हो जाती है।

राजकपूर के स्कूल को आगे बढाने वाले आमिरखान ने पीके और तारे जमीं पर की तरह श्रेष्ठ अभिनय किया है। कहानी में कुछ कुछ ‘उसने कहा था’ की झलक भी मिलती है। फिल्म में इस सिरे से उस सिरे तक कहीं भी ऐसा कुछ नहीं था कि दक्षिणपंथी हिन्दूवादी संगठन इसके बायकाट का आवाहन करें। उन्होंने और उनके अन्ध समर्थकों ने उनकी बात मान कर अपनी मूर्खता का ही परिचय दिया है, जिसके लिए उन्हें माफी मांगना चाहिए।   

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023      

बुधवार, अगस्त 26, 2020

आमिर खान पर संघी हमला तर्कहीनता की सीमा लांघ रहा है


आमिर खान पर संघी हमला तर्कहीनता की सीमा लांघ रहा है
Being tolerant? Twitterati slams Aamir Khan, wants to boycott ...


वीरेन्द्र जैन
यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का युग है और यह अधिकार होना भी चाहिए। किंतु अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब कल्पनाओं को सच बताने या झूठ बोलने की आज़ादी नहीं होता। इस आज़ादी में यह निहित है कि विचार को विचार की तरह सामने लाया जाये, न कि आँखों देखे समाचार की तरह। सूत्रों से प्राप्त बतायी गयी जानकारियों में, जब तक स्पष्ट खतरा न हो, सूत्रों के नाम सामने आने चाहिए और विचारों के साथ विमर्श की गुंजाइश व उसकी जिम्मेवारी लेने का साहस होना चाहिए। उक्त गुणों के बिना कही हुयी बातें अभिव्यक्ति की आज़ादी के जुमले का गलत स्तेमाल हैं। अभिव्यक्ति की ऐसी आज़ादी नहीं है, ना ही होना चाहिए।  
भाजपा का मुखपत्र अंग्रेजी में आर्गनाइजर के नाम से व हिन्दी में वह पांचज्न्य के नाम से छपता है। मुख पत्रमें कही गयी किसी भी बात को पार्टी की आधकारिक अभिव्यक्ति माना जाता है और अगर किसी त्रुटिवश कुछ प्रकाशित हो जाता है तो तुरंत दूसरे माध्यमों और अखबार के अगले अंक में भूल सुधार छपता है, छपना भी चाहिए। गत दिनों पांचजन्य [24 अगस्त 2020] में किन्हीं विशाल ठाकुर का एक लेख छापा गया जिसका शीर्षक है ‘ ड्रैगन का प्यारा खान’। यह लेख देश के शिखर के अभिनेता निर्माता आमिर खान की छवि को नुकसान पहुंचाने की दृष्टि से रचा गया है जिसमें कुतर्कों की भरमार है। इसकी खबरें देश और दुनिया के मीडिया में छपीं किंतु भाजपा के नेताओं ने 48 घंटे बीत जाने के बाद भी इसका खंडन नहीं किया। इतना ही नहीं विभिन्न टीवी चैनलों पर भाजपा के पक्ष में जोड़े गये उसके प्रवक्ता, संघ विचारक, स्वतंत्र विश्लेषक आदि के श्रीमुख से उक्त लेख के कथ्यों का अग्निधर्मा शब्दों से बचाव किया गया। यह स्पष्ट करता है कि इसके पीछे संघ व अमित शाह की डिजाइन पर काम करने वाली भाजपा नीति ही है।
आमिरखान को दुनिया भर में भारत के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, निर्माता, निर्देशकों में गिना जाता है जिन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों पर प्रभावी व प्रेरक फिल्में बनायी हैं, जो मनोरंजन से भरपूर होने के कारण जन जन तक पहुंचती भी हैं। उनकी इस पहुंच से वह सन्देश भी समाज तक पहुंचता है जो बहुत जरूरी है। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर ‘तारे जमीं पर’ और ‘थ्री ईडियट’ जैसी फिल्में बनायीं तो नारी सशक्तिकरण पर ‘दंगल’ और सीक्रेट सुपर स्टार’ जैसी फिल्म बना कर दुनिया में देश का नाम बढाया। अन्ध विश्वासों के खिलाफ ‘पीके’ जैसी फिल्म बना कर युवाओं को सावधान किया तो ‘लगान’ और ‘मंगल पांडे’ जैसी स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी फिल्में बनायीं। ‘रंग दे बसंती’ जैसी फिल्में बना कर एक ऐसा प्रयोग किया जो भगत सिंह के आन्दोलन की भावना को वर्तमान की राजनीतिक स्थितियों से जोड़ता है और भटक रही युवा पीढी में चेतना का संचार करता है। ‘पीपली लाइव’ बना कर मीडिया की भेड़ चाल की जम कर खिल्ली उड़ायी तो स्पाट पर शूटिंग कर के गाँवों में किसान की वास्तविक दुर्दशा भी दर्शायी। उनके अन्दर एक राजकपूर बैठा है जो सामाजिक सन्देश देते समय हमेशा यह ध्यान रखता है कि मनोरंजन के लिए आये दर्शक को मनोरंजन भी मिलना चाहिए। इसलिए वे सन्देश और मनोरंजन के बीच जो समन्वय बनाते हैं वह श्रद्धा पैदा करता है और वही उनकी फिल्मों को सफल बनाता है। आमिरखान की फिल्में केवल व्यावसायिक स्तर पर ही सफल नहीं होतीं अपितु पारखियों के निगाह में भी सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं। देश विदेश का ऐसा कौन सा पुरस्कार है जो उन्हें नहीं मिला हो या उनकी फिल्में उसके लिए नामित न हुयी हों।
‘रजनी’ के बाद प्रशासनिक सामाजिक समीक्षा और उनके हल हेतु प्रेरित करने के लिए किये गये प्रयासों पर बने सीरियलों में ‘सत्यमेव’ जयते का ऎतिहासिक महत्व रहा है। इस सीरियल में जिस करुणा और संवेदनशीलता के साथ घटनाओं को पिरोया गया है वे भीतर तक भेदती रही हैं। इस से ही समाज के वास्तविक नायकों को सम्मानित करने का सिलसिला प्रारम्भ हुआ, जिसे बाद में भी दुहराया गया। उस दौरान अनेक निजी संस्थानों द्वारा  समाज सेवा के कई प्रोजेक्टों की स्थापना भी हुयी और उनसे हजारों जरूरतमन्दों को सहायता मिली। 
कला की दुनिया के माध्यम से इतना बड़ा काम करने वालों से समाज की ज्वलंत समस्याओं के प्रति विचार निरपेक्ष रहने की उम्मीद नहीं की जा सकती। समाज को कलंकित करने वाली घटनाओं पर उनका ध्यान जाना और उस पर प्रतिक्रिया आना भी स्वाभाविक है। किंतु, फिल्मी दुनिया भले ही कला की दुनिया हो, पर वह एक बड़ी लागत का व्यवसाय भी है जिस पर बहुत सारे नियंत्रक कानून भी लागू होते हैं, जिनका सरकार दुरुपयोग कर के अपना राजनीतिक हित साध सकती है। यही कारण होता है कि फिल्मी दुनिया के सभी लोग मुखर होकर अपनी प्रतिक्रिया नहीं देते। मोदी सरकार के आने के बाद कुछ साम्प्रदायिक संगठन जिस तरह से हत्याओं पर उतर आये वह खतरनाक है। न केवल गौ हत्या का आरोप मढ कर मुसलमानों व दलितों की हत्याएं हुयीं अपितु देश के प्रमुख बुद्धिजीवियों की भी हत्याएं हुयीं जिनमें वैज्ञानिक गोबिन्द पंसारे, दाभोलकर,  कलबुर्गी, गौरी लंकेश, आदि की नृशंस हत्याएं हुयीं। खेद रहा कि सरकार ने अपराधियों को पकड़ने में कोई रुचि नहीं दिखायी, ना ही दुख प्रकट किया। आतंकवाद के खिलाफ अपनी जान न्योछावर कर देने वाले पुलिस अधिकारी करकरे को गद्दार बताया जाने लगा व नेहरू गांधी मौलाना आज़ाद आदि की चरित्र हत्याएं की जाने लगीं। तब देश के अनेक लेखकों ने इस असहिष्णुता पर सरकार द्वारा दिये अपने सम्मान पुरस्कार लौटा दिये। कुछ लोगों ने दबे स्वर में सरकार की इस सोच का विरोध किया जिनमें आमिर खान भी उनमें से एक थे। जो जिस तरीके से दब सकता था, सरकार ने उसे उस तरह से दबाने की कोशिश की। आमिर आदि की फिल्मों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गयी। उनकी सम्वेदनशीलता और लोकप्रियता से ज्यादा बड़ा खतरा था इसलिए वे निशाने पर रहे।
पांचजन्य के चार पेजों में प्रकाशित लेख में आमिर की आलोचना को कुछ मामूली कारणों में केन्द्रित किया गया है। उनमें से एक यह है कि उन्होंने अपनी आगामी फिल्म की शूटिंग तुर्की में करने का विचार किया है और वे इसके लिए तुर्की की प्रथम महिला एमिन एरदुगान से मिले। इसमें अपराध यह माना गया कि तुर्की कश्मीर के मामले में पाकिस्तान के पक्ष को सही मानता है, इसलिए दुश्मन देश है। इस लेख पर चर्चा होने से पहले शायद ही किसी को पता हो कि तुर्की को दुश्मन देश माना जाता है और वहाँ पर शूटिंग करने से देश की जनता की भावनाएं आहत होती हों। इस लेख के अनुसार यह काम आमिर खान की जेहादी मानसिकता दर्शाताहै। दूसरा गम्भीर आरोप यह है कि चीन में सलमान खान की फिल्म तो नहीं चली जो सिर्फ 40 करोड़ रुपये कमा पायी किंतु आमिरखान की दंगल ने 1400 करोड़ का कारोबार किया। इसके साथ ही वे चीनी मोबाइल फोन वीवो के विज्ञापन को आमिर खान का देशद्रोह बता रहे हैं। अभी बहुत दिन नहीं बीते जब भारत के प्रधानमंत्री चीन के प्रधानमंत्री को झूल झुला कर चाय पिला रहे थे, तामिलनाडु घुमा रहे थे और भी असंख्य समझौते कर रहे थे। अभी भी उससे व्यापारिक सम्बन्ध समाप्त नहीं किये गये हैं किंतु वीवो का विज्ञापन करने से आमिर खान को देश द्रोही बताया  जाता है और अन्धभक्तों के सहारे सोशल मीडिया पर उसकी फिल्मों के बहिष्कार की अपीलें की जाने लगती हैं।
ये सरकार और इसके संगठन जिस तरह से कुछ लोगों को साम्प्रदायिकता के आधार पर एकत्रित कर उन्हें अन्धभक्त बना रहे हैं व उसी गिरोह के सहारे अपना एजेंडा चलाते हैं, वैसी ही तार्किकता के सहारे वे पूरे देश को हांकना चाहते हैं। सरकार के विरोध को देश का विरोध बताया जाने लगता है। पांचजन्य के ऐसे लेखों से तो हो सकता है कि आमिर खान की फिल्म और अधिक चल जाये किंतु यह साफ हो जाता है कि ये आम जनता को नासमझ समझते हैं। शायद इसी बात का परीक्षण कभी थाली और कभी ताली या दिया जलवा कर बार बार करते रहते हैं।  
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629
           

सोमवार, दिसंबर 26, 2016

फिल्म समीक्षा दंगल - लैंगिक भेदभाव पर एक और बेहतरीन फिल्म

फिल्म समीक्षा
दंगल - लैंगिक भेदभाव पर एक और बेहतरीन फिल्म

वीरेन्द्र जैन
पिछले दो दशकों से साहित्य में महिला विमर्श को केन्द्र में लाया गया था जिसके प्रभाव में पिछले दिनों लैंगिक भेदभाव को चुनौती देने वाली कई फिल्में बनी हैं जिनमें से कुछ बैंडिट क्वीन, गुलाबी गैंग, नो वन किल्लिड जेसिका, क्वीन, पिंक, बोल, खुदा के लिए, आदि तो बहुत अच्छी हैं। आमिर खान की दंगल भी बिना कोई ऐसा दावा किये उनमें से एक है। इसमें यह भी जोड़ा जा सकता है कि जब कोई विषय किसी परिपक्व कलाकार के हाथ लगता है तो उसका निर्माण उसके सौन्दर्य और प्रभाव को कई गुना बढा देता है। पिछले दिनों खेल और उसकी समस्याओं को लेकर भी कुछ कथा फिल्में व बायोपिक जैसे चक दे इंडिया, भाग मिल्खा भाग, मैरी काम, पान सिंह तोमर आदि बनी हैं और सफल हुयी हैं, पर यह फिल्म दोनों का मेल है। यह फिल्म हरियाना जैसे राज्य में जहाँ पुरुषवादी मानसिकता इस तरह सवार है कि कन्या भ्रूण के गर्भपात के कारण लैंगिक अनुपात खराब हो गया है, की सच्ची घटना से जन्मी है और एक प्रेरक फिल्म है। जो लोग देश के आमजन को, स्वार्थी, गैरसंवेदनशील, अनपढ, और कूपमंडूप मान कर चलते हैं, इस फिल्म की व्यवसायिक सफलता उन लोगों को भी आइना दिखाती है। उल्लेखनीय है कि प्रफुल्लित स्कूटर, कार- स्टेंड वाले ने बताया कि नोटबन्दी के बाद आने वाली यह पहली फिल्म है जो लगातार तीन दिन से हाउसफुल चल रही है और उसका घाटा पूरा कर रही है।
व्यावसायिक स्तर पर सफल यह आम व्यावसायिक फिल्मों से इसलिए अलग है कि इसमें स्टार के नाम पर केवल आमिरखान हैं, और चार नई लड़कियां, फातिमा साना शेख, ज़ाइरा वसीम, सान्या मल्होत्रा, और सुहानी भटनागर हैं। इसमें न तो प्रेम कहानी है और न ही आइटम सोंग जैसे भड़कीले बदन दिखाऊ दृश्य हैं। इसमें न तो फूहड़ कामेडी है और न धाँय धायँ करती व्यवस्था को नकारती हिंसक घटनाएं हैं। यह किसी पाक शास्त्र में कुशल ऐसे रसोइये की कला है जो बिना मसाले के भी स्वादिष्ट और पोषक रसोई बनाना जानता है। इस फिल्म में अगर खून बहता हुआ नजर आता है तो वह आँखों से बहता हुआ नजर आता है, बकौल गालिब – जो आँख से ही न टपका तो फिर लहू क्या है। पूरी फिल्म में पात्रों की आँखें भरी हुई नजर आती हैं, कभी खुशी से तो कभी परिस्तिथिजन्य दुखों से। यही स्थिति दर्शकों की आँखों को भी बार बार भर देती है, पर न पात्रों की भरी आँखें छलकती हैं, न ही दर्शकों की। दिल का भर आना इसीको कहते हैं।    
छोटी सी कहानी में भी कितनी बातें समेटी जा सकती हैं यह बात राजकपूर की कला के सही उत्तराधिकारी आमिर खान से ही सीखी जा सकती है। एक खिलाड़ी जो देश के लिए खेलने की क्षमता और भावना रखता था उसे खेल छोड़ कर केवल इसलिए नौकरी करना पड़ती है क्योंकि उसके पिता का मानना है कि जिन्दा रहने के लिए रोटी जरूरी होती है, मेडलों को थाली में डाल कर नहीं खाया जा सकता। वह अपना सपना अगली पीढी के माध्यम से पूरा करना चाहता है किंतु उसके घर कोई लड़का पैदा नहीं होता जिसकी प्रतीक्षा में वह चार लड़कियां पैदा कर लेता है। मैडलों के न मिलने पर दुखी होते देश में मैडल जीतने वाले देशों की तरह खिलाड़ियों की देखभाल की उचित व्यवस्था नहीं है। खेल अधिकारी उसे बताता है कि खेल के लिए कुल कितना बज़ट आवंटित है और उसमें से भी कुश्ती के लिए इतना भी नहीं बचता कि जिससे गद्दे तो दूर एक मिठाई का डिब्बा भी न आ सके। लड़कियों की कुश्ती की तैयारी कराने के लिए भी दूसरी लड़कियां नहीं मिलतीं जिस कारण लड़की को अपने दूर के रिश्ते के भाई के साथ ही कुश्ती करके सीखना पड़ता है और पहली जीत किसी लड़के को पराजित करके ही जीतना पड़ती है। पुरुषवादी समाज में जब पिता कोच का काम करता है तो परम्परागत अनुभवों से सिखाता है और जिस कारण से उसका स्पोर्ट कालेज के कोच से टकराव भी होता है जो आधुनिक किताबी ज्ञान से सिखा रहा होता है। अंततः दोनों के समन्वय से खिलाड़ी लड़की द्वारा अपने विवेक से लिया गया फैसला ही जीत दिलाता है।
खेल के क्षेत्र में आगे बढने के लिए किसी लड़की का टकराव उसके मन में भर दिये गये एक कमजोर ज़ेन्डर होने की भावना से ही नहीं होता अपितु सहपाठियों और सामाजिक तानों बानों से भी होता है, पहनावा व हेयर स्टाइल बदलने के कारण भिन्न दिखने से भी होता है। उनके लिए तय कर दी गई कलाओं तक सीमित रहने की परम्परा से भी होता है। सामाजिक विरोध के साथ साथ जाति समाज के विरोध का सामना कोई पहलवान ही कर सकता है। किसी महिला के खिलाड़ी बनने के लिए उसे अपने परम्परागत सौन्दर्य बोध को मारना होता है। मैत्रीय पुष्पा अपने आत्मकथात्मक उपन्यास ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ में लिखती हैं कि उनकी माँ सरकारी नौकरी में एक साधारण सी कर्मचारी थीं जिन्हें गाँव गाँव की यात्रा करना पड़ती थी। इस नौकरी में सम्भवतः अपनी सुरक्षा के लिए वे रूखे सूखे रहने को अपना कवच मानती थीं, और केवल छुट्टियों में ही अपने बालों में तेल लगवाती थीं। इस फिल्म में खिलाड़ी लड़की द्वारा टीवी देखने, अपने बाल बढाये जाने और नेल पालिश लगाये जाने को भी उसका लक्ष्य विचलित होना माना जाना भी एक मार्मिक प्रसंग बन गया है।
हाउस फुल हाल में फिल्म प्रारम्भ होने के पहले राष्ट्रगीत बजाये जाते समय तक दर्शक अपनी सीट ही तलाश रहे होते हैं और अनचाहे भी वे राष्ट्रगीत के लिए तय मानकों का उल्लंघन कर रहे होते हैं, दूसरी ओर जब फिल्म की कहानी में राष्ट्रगीत बज रहा होता है, वे तब भी खड़े हो जाते हैं।   
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629


शुक्रवार, दिसंबर 26, 2014

फिल्म समीक्षा -‘पीके’ फिल्म - मनोरंजन के साथ सन्देश देने की कला



‘पीके’ फिल्म - मनोरंजन के साथ सन्देश देने की कला
वीरेन्द्र जैन

मुझे हाथरस के प्रोफेसर डा. राम कृपाल पांडे के सौजन्य से एक बार हिन्दी के सबसे प्रमुख आलोचक डा. राम विलास शर्मा से मिलने का सौभाग्य मिला था। उस अवसर पर मैंने उनसे हास्य और व्यंग का फर्क जानना चाहा तो उन्होंने उत्तर में कहा कि जब आदमी दाँत खोल कर हँसता है तो हास्य है और जब दाँत भींच कर हँसता है तो व्यंग्य है।
राज कुमार हीरानी की फिल्म ‘पीके’ एक दाँत भींच कर हँसने वाली फिल्म है। सोद्देश्य कहानी, विषय वस्तु के कुशल सम्पादन के साथ निर्देशन, राजकपूर की परम्परा के अभिनेता आमिर खान का सहज अभिनय, सामाजिक यथार्थ का निर्भीक प्रस्तुतीकरण जबरदस्त कटाक्ष करते हुए अपना सन्देश देने में सफल हैं। प्रत्येक धर्म अपने समय के श्रेष्ठ मनीषियों द्वारा उस समय मानवता के हित में दिये गये सर्वोत्तम सन्देशों का संकलन होता है, जो उस काल की बुराइयों और स्वार्थों से टकरा कर अपना स्थान बनाता है। ये मनीषी अपनी विनम्रतावश उन सन्देशों और कार्यों के परिपालन को सुनिश्चित करने के लिए उसे सुपर पावर द्वारा उनके माध्यम से भेजा गया सन्देश बता कर एक व्यवस्था बनाते आये हैं व उल्लंघन पर अज्ञात के दण्ड का भय भी बताते रहे हैं। इसी कारण उन के वारिस उन सन्देशों को वैसे का वैसा ही रख कर जड़ बना देते हैं। किंतु समय के साथ चुनौतियां भी बदलती है और उनसे टकराने के नये नये कार्य-विचार फिर से सामने आते हैं, जो अपने सन्देशों को वैसा ही धर्म बताते हैं और इसी कारण उनका पिछले धर्मों से टकराव होता है। इतिहास गवाह है कि दुनिया में सर्वाधिक हिंसा धर्मों के आपसी टकराव के कारण ही हुयी है और यह क्रम आज भी जारी है। यह हिंसा दुनिया की सर्वोत्तम उपल्ब्धियों को नुकसान पहुँचा रही है, पर धर्म के अन्धविश्वास से ग्रस्त लोग इस क्षेत्र में न तो विचार करने को तैयार होते हैं और न ही लोगों को अपने अपने विश्वास को स्वतंत्र रूप से मानने की आज़ादी देने को तैयार होते हैं। आज धार्मिक संगठनों के पास अटूट सम्पत्ति है, संगठन की हिंसक शक्ति है, अज्ञात का मनमाना लाभ और दण्ड की भयावह कथायें हैं। इसके साथ वोटों के व्यापारियों और अपराधियों के साथ अपवित्र गठजोड़ भी है। इसके विपरीत धर्मों को जीवंत और प्रगतिशील मानने वाली शक्तियों से टकराने वाले लोग बिखरे हुये हैं, असंगठित हैं, साधन और शक्तिहीन हैं तथा यथास्थिति से लाभान्वित होने वाली सत्ताधारी शक्तियां उनको नुकसान पहुँचाने के लिए तत्पर हैं। प्रत्येक धर्म में सत्य बोलने की बात कही गयी है किंतु आज सबसे अधिक जाने अनजाने झूठ बोलने वाले धार्मिक संस्थान ही हैं। आज हर तरह की अनैतिकताओं और अपराधों के समाचार धार्मिक संगठनों के स्थलों से ही आ रहे हैं। वे केवल विचार भिन्नता के कारण ही अलग अलग नहीं हैं अपितु वे निहित स्वार्थों के कारण अलग अलग हैं।
कोई भी धार्मिक संगठन अपने अलग अलग पंथों की सम्पत्ति, धर्मस्थलों, और भूमि भवनों को अपने धर्म के दूसरे पंथ के साथ तक बाँटने को तैयार नहीं है। प्राकृतिक आपदा ही नहीं अपितु धार्मिक स्थलों पर आयोजित मेलों ठेलों में भी जो हादसे घट जाते हैं उनके पीड़ितों को राहत देने के लिए भी ये संगठन आगे नहीं आते हैं। ईसाई मिशनरियों के प्रभाव और उनसे प्रतियोगिता के तात्कालिक कुछ उदाहरणों को छोड़ कर स्वास्थ और शिक्षा के क्षेत्रों में भी धार्मिक संगठनों की अटूट दौलत उपयोग में नहीं आती रही है। ऐसी स्थिति में धर्मों की बुराइयों से टकराने के लिए समाज के पास कटाक्ष जैसे सीमित और कमजोर कला के साधन ही बचते हैं। एक आम सुशिक्षित व्यक्ति की पाखण्डों से टकराने की जो दबी छुपी आकांक्षाएं हैं उन्हें ‘ओह माई गाड’ और ‘पीके’ जैसी फिल्में नैतिक समर्थन देने का काम करती हैं जिसका पता हाउस फुल सिनेमा घरों में बार बार बजती तालियों और विभिन्न तरह के प्रशंसक स्वरों से मिलता है। ये फिल्में धर्मों के ठेकेदारों द्वारा पैदा कर दी गयी बुराइयों को दूर कर के उनके अच्छे पक्ष को उभारने का काम कर रही हैं, और धर्मों को विवेक के केन्द्र बनाने की कोशिश कर रही हैं। वे वही काम कर रही हैं जो हमारे देश में कभी नानक, कबीर, आर्य समाज, नारायण स्वामी, विवेकानन्द, सहजानन्द सरस्वती, और महापंडित राहुल सांस्कृतायन महर्षि अरविन्द या ओशो जैसे लोगों ने किया था।
उपरोक्त लक्ष्य को पाने के लिए बनायी गयी फिल्म ‘पीके’ ने अपने सन्देश को मनोरंजन की चटनी के साथ प्रस्तुत किया है और उसके लिए जो कथा बुनी गयी है उसकी शुरुआत बर्टेंड रसेल की एक कहानी पर आधारित है। इस कहानी में एक पादरी है जो ज़िन्दगी भर ईसाई धर्म की शिक्षाओं का अक्षरशः पालन करता है और जिसे भरोसा है कि जब मरने के बाद वह स्वर्ग में जायेगा तो ईश्वर खुद ही बाँहें फैलाये उसके स्वागत के लिए दरवाजे पर खड़ा मिलेगा। पर जब वह स्वर्ग के बन्द दरवाजे पर पहुँचता है तो पाता है कि स्वर्ग का बन्द दरवाजा इतना मजबूत और विशाल है कि उसके सामने वह किसी पिस्सू से भी छोटा है। लम्बे समय तक इंतज़ार के बाद जब वह दरवाज़ा खुलता है और वह पादरी अन्दर प्रवेश करने की कोशिश करता है तो द्वारपाल उससे पूछ्ताछ करता है जिसमें वह अपने अनुशासित धर्मिक जीवन के बारे में बताता है। जब वह आने का स्थान पूछता है तो वह बहुत शान से अपने चर्च और गाँव का नाम बताता है। उसके आगे पूछने पर वह बताता है कि उक्त गाँव इंगलेंड में है।
यह इंगलेंड कहाँ है? चौकीदार पूछता है
इंगलेंड पृथ्वी पर है वह उत्तर देता है
कौन सी पृथ्वी? इस ब्रम्हाण्ड में करोड़ों पृथ्वियां हैं
वही जो सूरज के चारों ओर चक्कर लगाती है
कौन सा सूरज? इस ब्रम्हाण्ड में लाखों सूरज हैं, व ब्रम्हाण्ड भी अनेक हैं
यह सुन कर पादरी को चक्कर आ जाता है और उसे अपनी लघुता का अहसास होता है। इस फिल्म का प्रारम्भ भी इसी तरह की सूचना से होता है और किसी अनजान ग्रह से कोई एलियन अपनी प्राकृतिक अवस्था में इस पृथ्वी पर राजस्थान की धरती पर उतरता है। उसके पास उस यान को वापिस बुलाने का रिमोट जैसा दमकता हुआ यंत्र भर है। पहले ही दिन एक चोर उसका यंत्र छीन कर भाग जाता है। इस छीना झपटी में चोर का ट्रांजिस्टर उसके पास छूट जाता है। उस एलियन को हाथ पकड़ कर दूसरे के दिमाग की जानकारी को डाउनलोड करने की क्षमता प्राप्त है। वीराने स्थलों पर खड़ी ‘डांसिंग कारें’ उसके लिए कपड़ों और मुद्राओं का साधन बनती हैं। डासिंग कारें वे कारें हैं जिनमें छुप कर युवा जोड़े कपड़े उतार कर अपनी प्रेम क्रियाओं में खोये रहते हैं और उनकी कारें डांस करती रहती हैं। उस एलियन ने हाथ पकड़ कर खुद में जो भाषा डाउन लोड कर ली है वह भोजपुरी है। उसे न तो झूठ बोलना आता है और न ही किसी दूसरे के कथन को वह झूठ समझता है। यही कारण है कि अपने यंत्र की तलाश में जब वह सबसे यही उत्तर दुनता है कि ‘भगवान जानें’ तो वह सभी तरह के भगवानों के पास जाता है जिस यात्रा में पता चलता है कि भगवानों की कथित दुनिया में सब कुछ झूठ पर ही चल रहा होता है। इसी यात्रा में उसकी मुलाकात प्रेम में धोखा खाकर आयी एक टीवी पत्रकार से हो जाती है जो अपने पिता के गुरु से बदला लेने के लिए उस सच्चे आदमी का स्तेमाल करना चाहती है। इसी में सारे पाखण्ड निरावृत होते जाते हैं और मासूमियत व झूठ के टकराव में मजेदार हास्य पैदा होता रहता है। अंत में गलतफहमियां दूर होती जाती हैं।
ईसा मसीह ने कहा है कि स्वर्ग के दरवाजे उनके लिए खुले हैं जिनके ह्रदय बच्चों की तरह हैं और वह मासूम एलियन भी उसी तरह का मासूम देवता तुल्य है जो चार्ली चेप्लिन और राजकपूर की भूमिकाओं की याद दिलाता रहता है। उसकी उपस्थिति से पता चलता है कि हमारा आज का कथित धार्मिक समाज कितने झूठों और गलत विश्वासों में जीता रहता है और अपनी अन्धभक्ति में कभी विचार कर विवेकपूर्ण उत्तर तलाशने की कोशिश भी नहीं करता। शातिर बाबा इसी का लाभ उठा कर अपना घर भरते रहते हैं। अति महात्वाकांक्षाएं पाल कर भी मेहनत से बचने वाले ईश्वर की कृपा तलाशते तलाशते शार्टकट के चक्कर में निरंतर फँसते और लुटते चले जाते हैं।
फिल्म में शरद जोशी के व्यंग से उठाया गया नर्वसयाना, और कन्यफुजियना भी है तो काका हाथरसी की कविता नाम रूप का भेद भी पढवायी गयी है। बेढब बनारसी की ‘लेफ्टीनेंट पिग सन की डायरी’ में किसी अंग्रेज द्वारा पहली बार बुर्के वाली औरत को देख कर भूत समझने का व्यंग्य भी आया है, तो विभिन्न पूजा पद्धितियां और समाजिक मान्यताओं की विसंगतियां भी हास्य पैदा करती हैं। आज के नगरों, महानगरों की भाषा अंग्रेजी उर्दू मिश्रित खड़ी बोली है किंतु जब इन स्थानों के वासी अपनी देसी बोली में बोलते हैं तो यह विसंगति एक लुत्फ पैदा करती है। एक एलियन द्वारा बनारसी कानपुरी अन्दाज़ में पान खा कर भोजपुरी बोलना भी सहज हास्य को जन्म देता है।        
कुल मिला कर यह एक स्वस्थ सामाजिक सन्देश देकर अपने कामों को ठहर कर देखने का सन्देश देने वाली फिल्म है जिसे टैक्स फ्री कर देना चाहिए था और देश भर के कालेजों में उसके मुफ्त शो आयोजित किये जाने चाहिए थे। उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, त्रिपुरा, उड़ीसा तामिलनाडु की सरकारें तो ऐसा कर ही सकती थीं। इसके बाद भी दर्शक समुदाय ने भरपूर समर्थन देकर अपना सन्देश दे दिया है।
वीरेन्द्र जैन                                                                           
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शनिवार, जुलाई 09, 2011

देहली वैली - हिन्दी फिल्म उद्योग और राजनीति पर तेज प्रहार

देहली वैली- हिन्दी फिल्म उद्योग और राजनीति पर तेज प्रहार

वीरेन्द्र जैन

किसी फिल्म पुरस्कार समारोह में आमिर खान ने बरसात फिल्म के गाने पर अभिनय करके राज कपूर को जीवंत कर दिया था। इसमें कोई सन्देह नहीं कि आमिर खान इस युग के राज कपूर हैं जो समकालीन विषयों पर यथार्थवादी, मनोरंजक, और राजनीतिक सामाजिक विसंगतियों पर तेज प्रहार करने वाली फिल्में बनाते हैं। इन फिल्मों में अंतर्निहित व्यंग्य बिना किसी मुखर नारे के समाजिक यथार्थ के ऐसे दृष्य बिम्ब सामने लाता है जो हमको समाज के प्रति बढती उदासीनता के कारण उपेक्षित होते जा रहे विषयों पर विचार करने के लिए विवश कर देते हैं। खेद है कि इस फिल्म में पात्रों द्वारा प्रयुक्त गालियों से विचलित अनेक समीक्षक फिल्म के मूल विषय, उसके सन्देश और प्रभाव की उपेक्षा कर गये।

फिल्म का नाम देहली वैली है। कश्मीर वैली[घाटी] शब्द हमारे समाचार माध्यमों में इतना अधिक आया है कि वैली शब्द से ही एक ऐसे क्षेत्र की ध्वनि निकलती है जहाँ पिछले कई दशकों से क्षेत्र के निवासियों का एक वर्ग अलगाववादी हिंसक आन्दोलन चला रहा है, जिसके प्रति पूरा देश चिंतित है। देहली वैली[घाटी] नहीं है, किंतु असामाजिक तत्वों के काम, उनकी स्वतंत्र सत्ता, उनके उत्पीड़न, आदि इसे एक वैली ही बना देते हैं, जिसके प्रति एक दिशाहीन असंतोष मौजूद रहता है। देहली के राजधानी होने के कारण इसकी दशा पूरे देश की दशा का प्रतिनिधित्व करती है। फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है जो उसे केवल देहली शहर की फिल्म बताता हो, इस के जैसे कोलकता, मुम्बई और दूसरे साठ बड़े शहर भी हो सकते हैं। पुराने शहर के वही पुराने जर्जर मकान, तथा वैसे ही मकान मालिक, झरते चूने की दीवारें, शौचालय जीने, और जिन्दा रहने के लिए दिन प्रतिदिन झूझते निम्न मध्यमवर्गीय किरायेदार, उनके घिसटते पुराने वाहन, भी सभी जगह हैं। कलाएं ऐसे प्रतीक चुनती हैं जिससे किसी एक चावल को परख कर पूरी हंड़िया का पता चल सके। संघर्ष के कई रूप होते हैं, जिनमें से जीवन संघर्ष भी एक है।

आम हिन्दी फिल्मों की करीने से सजी साफ सुथरी गरीबी से अलग आमिर की फिल्में शायद पहली बार सच्चे मध्यम वर्ग को केन्द्र में रख कर बनायी जा रही हैं, और उसमें यथार्थ जगत से ही चुनकर ऐसे रोचक प्रसंग जोड़े जाते हैं कि फिल्म व्यावसायिक स्तर पर भी दूसरी सफल फिल्मों को पीछे छोड़ देती है। दर्शक इन फिल्मों में अपना घर परिवेश और खुद को देख कर इसी तरह हँसता है जैसे होली खेल कर आने के बाद हम आप आइने में अपनी शक्ल देख कर हँसते रहे हैं। व्यंग्य का एक सजग पाठक और छोटा मोटा लेखक होने के कारण मैं जानता हूं कि व्यंग्य की धार तेज करने के लिए उसमें अतिरंजना डालना पड़ती है। वह अतिरंजना उस मूल प्रवृत्ति को बहुत साफ साफ रेखांकित कर देती है जिस पर व्यंग्य किया जा रहा हो। यह वैसा ही है जैसे हम अपने लेखन में कुछ पंक्तियों को बोल्ड कर देते हैं।

एक पत्रकार, एक प्रैस फोटोग्राफर, और एक व्यावसायिक कार्टूनिस्ट एक साथ रहते हैं, और हास्टल के छात्रों की तरह एक साथ रहने, खाने पीने, आलस करने व अपना काम एक दूसरे पर टालने, आपस में गाली गलौज करते करते साथ जीवन गुजार रहे हैं, क्योंकि उनके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है। इस तरह के रहन सहन में वह बनावट नहीं होती, जिसे तथाकथित सभ्यता कहा जाता है। जिनसे आप अपनी सभ्यता की उम्मीद करते हैं, पहले उन्हें अपने जैसे संसाधन तो उपलब्ध कराइए। यह अ-सभ्यता जब रहन सहन में है तो भाषा और व्यवहार में होगी ही होगी। फिल्म में पात्रों द्वारा प्रयुक्त गालियां उनके रहन सहन के साथ इतनी एकाकार हैं कि उनके मुँह से अस्वाभाविक और यौनिक नहीं लगतीं। आमिर की फिल्मों से पहले बोलचाल की यह स्वाभाविकता तो बड़े बड़े नामी यथार्थवादी हिन्दी फिल्म निर्माता भी नहीं ला सके थे। परोक्ष में यह फिल्म व्यावसायिक फिल्म निर्माताओं पर वैसा ही कटाक्ष भी है जैसा कि पीपली लाइव में विजुअल मीडिया पर किया गया है। फिल्म की ग्लैमर केन्द्रित हीरोइन के नाज नखरे, फूहड़ स्वर में बेहूदे ढंग से गाने की कोशिश, अपने चित्रों को पत्रकारों को जबरदस्ती देना, नकली ढंग से शरमाते शरमाते अपनी मेक-अप करने वाली के इशारे पर गा कर दिखाना उस फिल्म जगत पर कटाक्ष है। समाज में अपसंस्कृति का फैलाव ऐसा हो गया है कि वही फूहड़ गाना एल्बम के रूप में सामने आकर एक महिला फिल्म पत्रकार की अच्छी कमाई करा देता है किंतु इस फिल्म के दर्शकों को संगीत के आनन्द की जगह हँसी आती है। दूसरी ओर परम्परागत संगीत की कक्षाएं ऐसे जर्जर भवन में चल रही हैं जहाँ नर्तकी के पाँव की धमक से फर्श नीचे चला जाता है व उसका पाँव शास्त्रीय कलाओं की तरह अधर में लटक जाता है जो न नीचे जा रहा होता है और न ऊपर आ रहा होता है।

फिल्म में बाजारू खाने की गन्दगी से उपजे पेट के रोगों, पानी की कमी और डिब्बा बन्द जूसों का आधिक्य आदि की दशा बताने के लिए इतनी बार शौचालय प्रसंग लाये गये हैं कि आम दर्शक घिना सकता है पर दूसरी ओर यही घृणास्पद स्थितियां एक बड़े समाज का यथार्थ भी हैं जिन्हें हम चाहे अनचाहे झेल रहे हैं। फिल्म में कानून व्यवस्था की खराब हालत, लोगों का पुलिस के पास जाने से बचना, अपराधियों का इस तरह व्यवहार करना जैसे कि उन्हें किसी से कोई भय ही नहीं है, असीमित समय तक बेबकूफ प्रबन्धक के नीचे काम करने वाले कार्टूनिस्ट की मजबूरी, फोटोग्राफर को मकान किराया चुकाने के लिए ब्लेकमेलिंग के लिए विवश होना तथा पत्रकार को बेहद निजी क्षणों में भी काम पर जाने की गुलामी को भी दर्शा कर असंगठित क्षेत्र में चल रहे शोषण की ओर संकेत किये गये हैं। कुल मिला कर यह चाशनी में मिला कर दी गयी कढुवी औषधि है। जो चाशनी के स्वाद में अटक कर रह गये हैं उन्हें भी इसमें छुपी दवा असर करेगी क्योंकि हम दूसरों पर हँसते समय यह तय कर लेते हैं कि हमें ऐसा कुछ नहीं करना है जिससे हम पर कोई हँस सके। जो लोग भी इसका विरोध कर रहे हैं वे दर्शकों का ध्यान खींच कर परोक्ष में निर्माता की व्यावसायिक मदद ही कर रहे हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि इस फिल्म के साथ रिलीज अमिताभ बच्चन की फिल्म बुड्ढा होगा तेरा बाप पीछे छूट गयी जबकि इसके विज्ञापन में अमिताभ को सबका बाप बताया जा रहा था।

वीरेन्द्र जैन

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