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शुक्रवार, अक्टूबर 31, 2025

जय संतोषी माता का नया संस्करण

 जय संतोषी माता का नया संस्करण

वीरेन्द्र जैन
सन 1975 में हिन्दी की अब तक की सबसे लोकप्रिय फिल्म शोले रिलीज हुयी थी। इसके समानांतर एक और फिल्म रिलीज हुयी थी जिसने उस समय की सूचनाओं के अनुसार शोले से भी अधिक बिजनेस किया था। उसका नाम था ‘जय संतोषी माता” । पुराने पंडितों धर्म धुरन्धरों से पूछने पर किसी ने भी मान्य शास्त्रों में इस देवी की कथा के बारे में नहीं बताया किंतु सत्तर के दशक में पूरे उत्तर भारत में शुक्रवार के दिन महिलाएं संतोषी माता का व्रत रखने लगी थीं और खटाई खाने व बनाने से परहेज करने लगी थीं। कई स्थानों पर उनके स्वतंत्र मन्दिर बन गये थे और कई पुराने मन्दिरों में एक वेदी भी संतोषी माता के लिए सुरक्षित कर दी गयी थी। जब मैं हाथरस में था तो मेरा एक कैशियर स्टाफ कुशल पाल सिंह शुक्रवार को संतोषी माता का व्रत रखता था जिसका उसके दूसरे साथी मजाक बनाते थे।
पिछले पन्द्रह बीस सालों में मुझे कहीं भी संतोषी माता का मन्दिर नजर नहीं आया और ना ही व्रत उपवास किये महिलाओं से मुलाकात हुयी। पुरानी भक्तिन भाभियों से पूछने पर वे हँस कर रह जाती हैं। हिन्दी के सुपरिचित आलोचक श्री राम प्रकाश त्रिपाठी जो मुरैना जिले के मूल निवासी हैं किसी पंडित जी की चर्चा करते हैं जिन्होंने कथा वार्ता का धन्धा मन्दा होने के कारण नवोन्मेष में उक्त कथा रची थी और कथा की पुस्तिकाएं छपवायी थीं और सफल रहे थे। एक दूसरी अफवाह इस कथा की रचना का श्रेय प्रसिद्ध कवि निर्भय हाथरसी को देते हैं जो अच्छी हास्य व्यंग्य कविताओं के साथ साथ इस तरह के नये नये अनूठे कामों के लिए भी जाने जाते थे।
बहरहाल बिहार के विधानसभा चुनावों के कारण देश भर में छा गयी छठ मैया के राष्ट्रीय पटल पर उभर आने व देश के प्रधानमंत्री के शामिल होने के कारण कुछ लोगों ने फेसबुक पर उत्सुकता वश बिहारी मित्रों से छठ मैया की कथा और कथा की शास्त्रीयता के बारे में जानना चाहा, और उन्हें कोई उत्तर नहीं मिला तो मुझे संतोषी माता की याद आ गयी।
असल में यह एक राजनीति भी है, और बिहार विधान सभा के समय ही इसका उभार संकेतक है। भाजपा को इसके सहारे अपनी राजनीति चमकाने का चस्का लग चुका है और उदासीन गैर भाजपा दल इस राजनीति का उत्तर नहीं दे पा रहे या उनकी सोच में ही नहीं है। भाजपा के विकास में 1995 में गणेश मूर्तियों को दूध पिलाने की खबर को देश भर में फैलाने में मिली सफलता के बाद उसने ऐसे कई प्रयोग किये। जन्मभूमि मन्दिर को भगवान राम का मुख्य मन्दिर बना देने और आस्थाओं से राजनीति में सफलता पाकर उसने समस्त आस्था स्थलों और पर्वों को राजनीति के घेरे में समेटना शुरू कर दिया। नगरों के नाम बदलने से लेकर कुम्भ स्नानियों की संख्या को साठ करोड़ तक फैला देने से लेकर काशी और मथुरा आदि के पुराने प्रकरणों को उखाड़ देने का प्रयास भी किया गया। डूबी हुयी द्वारिका से लेकर पर्ची वाले बाबा को छोटा भाई बना लेने व उस स्थान पर राष्ट्रपति को तक ले आने के सफल प्रयास किये गये।
हर लोकप्रिय स्थल को चुनावी मंच बना देने के खिलाफ अगर गैर भाजपा दलों ने कोई प्रयास नहीं किये तो राजनीतिक आर्थिक प्रशासनिक रूप से असफल भाजपा को अभी तक की तरह चुनावी सफलता से सत्ता मिलती रहेगी। हो सकता है कि मेरी कम जानकारी हो किंतु सक्रिय राजनीति में मुझे राजकुमार भाटी या कन्हैया कुमार के अलावा दूसरे लोग मुखर प्रतिरोध करते नजर नहीं आ रहे हैं। वामपंथियों में बहुत नेता है किंतु वे मंचों का स्तेमाल कर पाने की जुगत में सफल नहीं हुये या अनैतिक लोगों के सामने नैतिक होकर लड़ रहे हैं।

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मंगलवार, फ़रवरी 11, 2025

दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम

 

दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम

वीरेन्द्र जैन

दिल्ली विधानसभा के चुनाव सम्पन्न होने के बाद उसके परिणाम आ चुके हैं। इन चुनावों में सीधे सीधे दो दलों, आम आदमी पार्टी [आप] और भारतीय जनता पार्टी [भाजपा] के बीच मुकाबला था, भले ही इस रासायनिक क्रिया में उत्प्रेरक के रूप में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस व ए आई एम आइ एम [अखिल भारतीय मुस्लिम एकता संघ ] भी थीं। यदि ये उत्प्रेरक नहीं होते तो सीटों के परिणाम में भी दोनों मुख्य प्रतिद्वन्दी बिल्कुल बराबर पर होते या विपरीत होते। अभी भी उनके मतों के बीच कुल दो प्रतिशत का अंतर है। वैसे पिछले विधानसभा चुनावों से भाजपा के वोट सात प्रतिशत बढे हैं तो आम आदमी पार्टी के आठ प्रतिशत घटे हैं। लोकसभा चुनावों में भाजपा को 50% वोट मिले थे और संयुक्त रूप से लड़ने वाली काँग्रेस [18%] व आप [22%] अर्थात कुल 40% वोट मिले थे। यह बताता है कि दिल्ली में चुनाव अनुसार मत बदलने वाले मतदाता बड़ी संख्या में हैं। जिन मतदाताओं ने तीन बार राज्य में आम आदमी की सरकार बनवायी, उन्हीं ने उसके ठीक बाद भाजपा प्रत्याशियों को लोकसभा में भेजा।

 

चूंकि हमारी प्रणाली में विजेता जनप्रतिनिधियों की संख्या का महत्व सचेत मतदाताओं की संख्या से अधिक होता है, इसलिए चुनावी जीत कुछ अर्थ रखती है। विपक्ष में रहने के दौरान लोहिया पंथियों के कथन हुआ करते थे कि ज़िन्दा कौमें पाँच साल तक इंतजार नहीं करतीं। वे निरंतर सड़क के आन्दोलन किया करते थे। अब वैसा नहीं होता। अन्ना आन्दोलन के बाद जनता का स्वतःस्फूर्त कोई आन्दोलन नहीं हुआ, भले ही वेतन आदि में वृद्धि के लिए संगठित मजदूर कर्मचारियों के प्रदर्शन भले ही हुये हों, या कुछ वर्ष पूर्व एम एस पी के लिए सम्पन्न किसानों का आन्दोलन हुआ था। पिछले दिनों विशाल बहुमत से सरकार बनाने वाले केजरीवाल और उनकी पार्टी के प्रमुख लोगों को बिना किसी ठोस सबूत के जेल में भी डाल दिया गया फिर भी इस कार्यवाही के खिलाफ कोई विरोध प्रदर्शन तक नहीं हुआ।  कारण यह रहा कि वे सब प्रभुता के मद से घिर चुके थे, और ना तो उनकी पार्टी का संगठन ही बनाया गया था और ना ही कोई ठोस कार्यक्रम ही बनाया गया था जिसकी रक्षा के लिए कार्यकर्ता आदोलन करने लगते।

विडम्बना यह रही कि उक्त विधानसभा चुनाव में दोनों प्रमुख और दोनों उत्प्रेरक दलों में से किसी ने भी लोकतांत्रिक आदर्शों के अनुरूप चुनाव नहीं लड़ा। पूरा चुनाव सत्तारूढ आम आदमी और उसके पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की आलोचना पर केन्द्रित रहा। अरविन्द केजरीवाल ने तत्कालीन काँग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ चले आन्दोलन से लोकप्रियता अर्जित की थी और उसे राजनीतिक दल में बदलकर अपनी पार्टी बना ली थी। इस पार्टी ने आरोपों से घिरी काँग्रेस पार्टी द्वारा खाली किये गये स्थान को भर कर अपना अस्तित्व बनाया था। उसका इकलौता कार्यक्रम और नीति थी, भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देना। उसने यह कर के दिखाने की कोशिश भी की। दूसरी ओर देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी भाजपा ने अपने अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा छोड़ा हुआ था और वे काँग्रेस द्वारा खाली किये गये स्थान को भरने के लिए उतावले थे, इस कारण दोनों में प्रतियोगिता थी। देश के मतदाताओं में एक बड़ा वर्ग अभी भी गैर राजनीतिक आधार पर वोट देता है इसलिए भाजपा के पास एक सुनिश्चित हिन्दू वोट बैंक है और मुस्लिम मतदाता एकजुट होकर भाजपा को हराने वाले दल को समर्थन देते हैं। दिल्ली के चुनाव में आम आदमी के साथ काँग्रेस और एआईएमआईएम के बीच बंट गया फिर भी अधिकतम हिस्सा आम आदमी पार्टी को ही मिला, पर वह सीटें जीतने वाला बहुमत नहीं अर्जित कर सकी और पिछड़ गयी। जीत दर्ज करने वाली भाजपा केवल अपनी केन्द्र सरकार को ही दुहराती रही। डबल इंजन की सरकार को प्रचार का आधार बनाना यह भी बताता है कि केन्द्र सरकार अपने ही दल की सरकार को वांछित मदद करती है। कुल मिला कर दल के आधार पर चुनाव परिणाम का निष्कर्ष निम्नानुसार है –

भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस – इसके स्थानीय नेताओं ने उनकी सरकार पर लगाये गये आरोपों का बदला लेने के लिए वोट काट कर आम आदमी पार्टी से बदला ले लिया, भले ही वे एक भी सीट नहीं जीत सके हों और जिस बड़े उद्देश्य अर्थात साम्प्रदायिक भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए बनाया गये इंडिया गठबन्धन को चोट पहुंचायी हो। काँग्रेस के बड़े नेताओं की असहमति से यह हुआ है तो काँग्रेस की एकता को भी नुकसान पहुंचा है।

भारतीय जनता पार्टी- विधानसभा चुनाव जीत गयी है किंतु उसको लोकसभा में अर्जित वोटों में घटत मिली है। पराजित आम आदमी पार्टी से कुल दो प्रतिशत मत से ही आगे है, दूसरे मुख्यमंत्री चयन के सवाल पर उसे बहुत सारे समझौते करना होंगे। प्रतियोगिता में उसने जो अतिरंजित वादे किये हैं उन्हें निभाने में मुश्किलें आयेंगीं।

आम आदमी पार्टी-  पार्टी चुनाव हार गयी है किंतु यह पार्टी एक व्यक्ति को केन्द्रित कर सिद्धांत और संगठन विहीन पार्टी थी। इसके प्रमुख नेता की छवि को भाजपा ने खराब किया, उसे और उसके सहयोगियों को महीनों जेल में डाल कर रखा। जिस ईमानदारी के आधार पर इन्होंने अपना अस्तित्व बनाया था उसे ही दागदार किया गया। इसके पास जन समर्थन तो है किंतु संसाधनों की कमी है। इनके विधानसभा अध्यक्ष ने पार्टी छोड़ कर भाजपा ज्वाइन कर ली और यही काम टिकिटों से वंचित होने पर आठ और अन्य विधायकों ने भी किया। पार्टी के संस्थापकों में से अनेक पहले ही जा चुके थे जिनमें से एक कवि तो घनघोर आलोचक हैं। इनकी प्रशासनिक ईमानदारी के इतिहास के कारण इनकी जगह भरने वाली पार्टी लम्बे समय तक सतर्क होकर काम करेगी।

ए आइ एम ए आइ एम- मुस्लिम साम्प्रदायिक पार्टी है, हर चुनाव में ध्रुवीकरण करके हिन्दू साम्प्रदायिक पार्टियों को लाभ पहुंचा कर खुद भी लाभांवित होती है। इस चुनाव में भी बिना कोई सीट जीते लाभ में रही। अन्य राज्यों की तरह दिल्ली में भी उपस्थिति बना ली।

किसी शायर का शे’र है –

अय परिन्दो हिज्र करने से भी क्या हासिल हुआ / चोंच में थे चार दाने, चार दाने ही रहे

शुक्रवार, जुलाई 26, 2024

श्रद्धांजलि / संस्मरण प्रभात झा

 

श्रद्धांजलि / संस्मरण  प्रभात झा

वीरेन्द्र जैन

दिवंगत कामरेड शैलेन्द्र शैली जिन्होंने अपने ज्ञान, अध्ययन, विवेक और संवाद कौशल के सहारे बहुत कम उम्र में शिखर के राजनेताओं, बुद्धिजीवियों, रणनीतिकारों में अपना स्थान बनाया था, इतने सहज और आत्मविश्वास से भरे रहते थे कि किसी पद, धन या डिग्रीधारी के प्रभाव में नहीं आते थे। अवैज्ञानिक समझ से खुद को समझदार दिखाने का भ्रम करने वालों के साथ तो वे बहुत विनोद से बात करते थे कि पास बैठे लोगों को समझ में आ जाता था कि किसकी क्या प्रतिभा है। इसलिए वे अपने विचारों से असहमत लोगों से भी खूब संवाद करते थे और अन्दाज यह होता है कि जैसे वरिष्ठ जन अपने बच्चों से कहते हैं कि बेटे गुड़िया की शादी कर रही हो, करो पर पकवान क्या क्या परोसोगी, मुझे बुलाओगी या नहीं, या जैसे ईशा मसीह ने शांत चित्त होकर अंतिम शब्द कहे थे कि हे ईश्वर इन्हें माफ कर देना, ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।

प्रभात झा जब ग्वालियर में पत्रकारिता में आये तब तक शैलेन्द्र शैली पहले छात्र नेता के रूप में और बाद में युवा सीपीएम के नेता के रूप में ग्वालियर में ही कार्य कर रहे थे। दोनों की विचारधारा एकदम विपरीत थी किंतु शैली जैसा युवा नेता अपने पूरे आत्म विश्वास के साथ सबसे संवाद रखता था। प्रभात झा भी उनकी इस प्रतिभा से प्रभवित थे और विमर्श करते रहते थे। उस दौर में दोनों ही सत्तारूढ काँग्रेस के विरोधी थे इसलिए एक बात में तो सहमति थी ही। शैली के अध्यन और विश्लेषण का लाभ ग्वालियर का पूरा पत्रकार जगत उठाता था। यह जानकारी मुझे तब मिली जब कामरेड शैली के निधन के बाद निकले लोकजतन के श्रद्धांजलि अंक में मैंने प्रभात झा का लेख पढा। तब तक वे भोपाल मैं भाजपा के मीडिया प्रभारी की तरह आ चुके थे। यह लेख पढने के बाद मुझे उनके बारे में जानने की जिज्ञासा हुयी तो पता चला कि दोनों के बीच में लोकतांत्रिक संवाद था। पता चला कि एक बार भाषा पर बातचीत के दौरान शैली ने मजाक में उनसे कहा था कि प्रभात तुम आर एस एस से हो इसलिए तुम्हारी मातृ भाषा मराठी होगी और मैं सी पी एम से हूं इसलिए मेरी मातृभाषा बंगाली होगी ।

जब मैं बैंक की नौकरी से मुक्त होकर भोपाल आया तो पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश क्र लिए अतिरिक्त उत्साह से भरा हुआ था इसलिए नये विषयों पर निर्भीकता से लिखता था व उसे प्रकाशित कराने के लिए  मंच की तलाश में रहता था। ऐसा ही एक अवसर आया जब म.प्र. की दिग्विजय सिंह सरकार ने इतिहास पर एक तीन दिवसीय सेमिनार का आयोजन कराया था जिसमें देश के श्रेष्ठ इतिहासकार भागीदारी कर रहे थे। इसमें पढे गये कुछ पर्चों के बारे में प्रभात झा ने दैनिक भास्कर में एक आलोचनात्मक लेख लिखा। लगे हाथ मैंने उसी दिन के कुछ अंग्रेजी अखबारों में भिन्न विचार भी पढे तो तुरंत ही एक लम्बी प्रतिक्रिया लिख कर दैनिक भास्कर के तत्कालीन सम्पादक एन के सिंह के पास पहुंच गया। उन्होंने उसे देखा तो उन्हें विषय वस्तु तो पसन्द आयी किंतु उसका प्रतिक्रिया स्वरूप पसन्द नहीं आया। उन्होंने कहा कि यह क्या है कि बार बार ‘प्रभात झा ने यह कहा है’ ‘प्रभात झा ने यह कहा है’ आ रहा है। आप तो इसी पर एक स्वतंत्र लेख लिख लाइए जिसमें किसी के कथन पर टिप्पणी नहीं की गयी हो।

मैं विधिवत इतिहास का विद्यार्थी तो रहा नहीं और ना ही इंटरनैट गूगल आदि की सुविधाएं उपलब्ध थीं  था इसलिए मुझे सन्दर्भ सहित लिखने में समय लग गया व एक दिन बाद भी उस समय ले कर पहुंचा जब तक सम्पादकीय पेज बन चुका होता है। उन्होंने अप्रसन्नता भी व्यक्त की क्योंकि वे मेरे लेख के इंतजार में काफी देर तक पेज रोके रहे थे। फिर भी उन्होंने लेकर रख लिया। किसी राष्ट्रीय विषय पर बड़े अखबार के सम्पादकीय पेज पर छप सकने के मेरे सपने का यह अवसर था और मेरे अन्दर हलचल चल रही थी। उसी दिन मुझे दतिया के लिए निकलना था और मैं चला आया। दो दिन तक लगातार अखबार देखता रहा किंतु वह लेख नहीं छपा था। सब्र कर के रह गया।

दस दिन बाद जब लौट कर भोपाल आया और डाक देखी तब उसमें एक लिफाफा दैनिक भास्कर का भी दिखा। उत्सुकतावश सबसे पहले उसे ही खोला तो उसमें वह लेख मिला और उस पर लेख के उपयोग न कर पाने की पर्ची लगी हुयी थी। दुख हुआ पर जब पेज पलटे तो लेख के अंत में सम्पादक एन के सिंह का लाल स्याही से उप सम्पादक वीरेन मुंशी के नाम नोट था, ‘कृप्या इसे छापें’। अगले दिन जब मैं लिफाफा लेकर भास्कर कार्यालय पहुंचा तो एन के सिंह नहीं थे तो सीधे उप सम्पादक की केबिन में चला गया। जो सज्जन बैठे थे उनसे मैंने पूछा कि क्या आप ही मुंशीजी हैं तो उन्होंने इंकार किया और वताया कि मुंशी जी अब अखबार में नहीं हैं। उन्होंने मेरा परिचय और नाम जानना चाहा तो बताने पर ऐसा लगा कि वे मेरे बारे में पहले से जानते है और कहा कि आपके कुछ व्यंग्य लेख पड़े हुये थे जिनमें एक कल और बाकी भी अगले सप्ताहों में छप रहे हैं।

इस घटना के कई सालों तक मेरे लेखों को भास्कर के सम्पादकीय पेज पर स्थान मिलता रहा।

बाद में प्रभात झा ने राजनीति में कई छलांगें लगायीं। वे भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष, राष्ट्रीय महामंत्री, दो बार राज्यसभा के सदस्य रहने के साथ प्रदेश के सर्वोच्च नेता के प्रतिद्वन्दी के रूप में भी पहचाने गये। कई वर्षों से वे मौन साधना कर रहे थे शायद स्वास्थ ही उसका कारण रहा हो। अपनी प्रतिभा और समर्पण से फर्श से अर्श तक पहुंचने वाले लोगों के इतिहास में उनका नाम लिखा जायेगा। वे मेरी यादों में दर्ज हैं, उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।  

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

     

शनिवार, जुलाई 20, 2024

जगीरा का काम तो हो गया, आप लाठी पीटते रहें

 

जगीरा का काम तो हो गया, आप लाठी पीटते रहें

वीरेन्द्र जैन

किसी फिल्म का डायलाग था कि तुम हमारे [जगीरा, फिल्म का खलनायक] जैसे कपड़े तो पहिन लोगे किंतु हमारे जैसा कमीनापन कहाँ से लाओगे?

वे बहुत दिनों से प्रयासरत थे कि कांवड़ यात्रा की परम्परा को ढोने वाले युवा बेरोजगार वर्ग को कैसे बजरंग दली बनायें, लगता है वे इस बार सफल हो गये। एक बार भाजपा के एक पदाधिकारी रहे मित्र से पूछा था कि आप लोग यह कैसे तय करते हैं कि किसको विश्व हिन्दू परिषद में रखना है, किसको पार्टी में रखना है, किसको बजरंग दल में भेजना है इत्यादि। उत्तर में उन्होंने नगर के कुछ चर्चित व्यक्तियों के उदाहरण दिये थे जिससे स्पष्ट हो गया था कि किंचित बौद्धिक व्यक्ति को विश्व हिन्दू परिषद में और जो बुद्धि विवेक का स्तेमाल नहीं करता उसे बजरंग दल में भेज देते हैं। उससे वैसा ही काम लेते हैं जैसे वैलंटाइन डे पर लाठी लेकर प्रेमी जोड़ों को प्रताड़ित करके ‘संस्कृति’ की रक्षा करना या धार्मिक प्रापर्टी को हथियाना। दंगों में आगजनी करना या विधर्मियों के धर्मस्थलों को तोड़ना आदि। उनका काम झूठे सच्चे उदाहरणों से तर्क करना नहीं होता।

उनका प्रयास कई वर्षों से चल रहा था, जब उन्होंने देवी और गणेश पंडालों के लिए समितियां गठित कीं तथा लागत के रूप में पीछे से खुद आर्थिक मदद करके उन्हें धर्म भीरु या भीड़ भीरुओं से चन्दा उगा कर उसे स्तेमाल करने की स्वतंत्रता दे दी थी। इसमें जुटने वाले लड़के ज्यादातर बेरोजगार थे, निम्न आय वर्ग के थे और पिछड़ी व दलित जातियों से आते थे। कथित धार्मिक कार्य में योगदान देने में उन्हें अपनी जाति के उत्थान का भ्रम हुआ और वे उसके लिए जुटने लगे। समितियों का नेतृत्व सवर्णों या सवर्ण जैसे पिछड़ों के हाथों में रहा किंतु चन्दे का उपयोग सामूहिक रूप से हुआ। इसी प्रयोग को आगे बढाने के लिए कांवड़ यात्रा के यात्रियों के लिए जगह जगह भंडारे आयोजित करवाये गये और क्रमशः उनमें पकवानों, मिष्ठानों की वृद्धि की गयी और इनका वित्त पोषण भी संघ परिवार के समर्थक व्यापारी समुदाय के सहयोग से या उनके नाम से कराया गया। पिछले कई वर्षों से उनको एक विशेष रंग की टीशर्टें भेंट करके उनका रेजीमेंटेशन कराया जाने लगा। इन पोषाकों का वित्त पोषण भी उसी रास्ते से हुआ। दूसरे राजनीतिक दल इसे धार्मिक कार्य मान कर उदासीन रहे किंतु भाजपा की सरकारों ने उन्हें इतनी सुरक्षा दी कि उ.प्र. के पुलिस अधिकारियों को उनके पांव धोने और पैर दबाने के नमूने प्रस्तुत करने के आदेश दिये गये। उन पर हैलीकाप्टर से पुष्प वर्षा करायी गयी। उन्हें खुले में शौच जाने से नहीं रोका गया।

लोकसभा चुनाव 2024 में पिछड़े व दलित वर्ग का व्यापक समर्थन न मिलने से उत्तर प्रदेश में पर्याप्त सफलता नहीं मिल सकी। इसलिए उन्होंने हिन्दू मुस्लिम टकराव का पुराना तरीका निकाला और पूर्व से कार्यरत समूहों के साथ नये प्रयोग प्रारम्भ किये। मुजफ्फरनगर जैसे संवेदनशील जिले में जहाँ कभी हिन्दू मुस्लिम दंगे हो चुके थे स्ट्रीट वैंडरों को अपना नाम लिखने के फूहड़ आदेश निकाल कर छेड़ने का काम किया क्योंकि अधिकांश वैंडर मुस्लिम समुदाय से आते हैं। जैसा के स्वाभाविक था इसके विरोध में बयानबाज विपक्षी दल मुखर हो गये जिससे एक राजनीतिक ध्रुवीकरण हो गया। हिन्दू मुस्लिम के बीच निरंतर दरार पैदा करने का काम तो ये लोग करते ही रहते हैं और उस संवेदनशील वातावरण में कोई चिनगारी लग जाती है तो उसे आग बनते देर नहीं लगती। गुजरात में 2002 में ऐसे ही बहिष्कार ने वहाँ के बेकरी उद्द्योग को बर्बाद करके मुस्लिम समुदाय को बड़ा नुकसान पहुंचाया था। वैसे कोर्ट के किसी आदेश से यह प्रयास अवैध घोषित हो सकता है किंतु जो विभाजन रेखा खिंच जाती है वह मुश्किल से मिटती है। विशेषरूप से जब सोशल मीडिया के सहारे नफरत की फैक्ट्रियां चल रही हों।

यह इकलौता षड़यंत्र नहीं है। ये लोग बहुत बारीकी से काम करते हैं। जैसे इन्होंने स्कूलों में सूर्य नमस्कार का प्रयोग किया था। प्रथम दृष्ट्या यह योगासन अच्छा और स्वास्थ के लिए लाभदायक है और इसमें कोई बुराई नहीं है किंतु जब ऐसे काम, इतिहास को विकृत कराने वाली सरकार करती है, तो मुस्लिम समुदाय को आशंका होने लगती है और वे विरोध करने लगते है। केवल मुँह चलाने वाले विपक्षी भी पीड़ित पक्ष का साथ देने लगते हैं जिससे बहुसंख्यक वर्ग के समर्थन का लाभ उन्हें मिल जाता है। पर खेल तो अब शुरू होता है जब वे मासूमियत से कह देते हैं कि जिसे सूर्य नमस्कार ना करना हो वह ना करे। इससे छात्रों और अध्यापकों में एक स्पष्ट विभाजन रेखा खिंच जाती है। एक, सूर्य नमस्कार करने वाले और दूसरे मना  करने वाले, अर्थात एक हिन्दू दूसरा मुसलमान जिनके खिलाफ पहले से ही विषबीज बोया हुआ होता है। अब कोई सूर्य नमस्कार करे या ना करे, उनका काम तो हो जाता है। ऐसा ही प्रयोग वे सरकारी स्कूलों में बच्चे के प्रवेश के समय तिलक लगा कर करने से करते हैं, और बच्चों को प्राइमरी से ही विभाजित करने लगते हैं। वन्दे मातरम गाने, न गाने को भी इसी तरह स्तेमाल किया जाता है।

वे लोगों की अनभिज्ञता का लाभ उठाते हैं और लोग समझते हैं कि डेढ सौ साल पहले शुरू हुयी रावण जलाने की प्रथा या सौ साल पहले गणेश जी की सार्वजनिक झांकी सजाना उनके धर्म और परम्परा का हिस्सा है और पर्यावरण की रक्षा में पटाखे फोड़ने से रोकना उनके धर्म में अनुचित हस्तक्षेप है। वे परम्परा को समाज हित में स्तेमाल करने की जगह उससे चुनावी लाभ हानि का गणित बैठाते हैं और उन्हें लाभ देने वाली हर गलत परम्परा को भी जारी रखना चाहते हैं। वे जनता को अंधेरे में ही रखना चाहते हैं। उजाला देने की कोशिश करने वाले नरेन्द्र दाभोलकर, गोबिन्द पंसारे या गौरी लंकेश की सरे आम हत्या हो जाती है व उनकी सुपारी देने वाले पकड़े नहीं जाते। अपराधियों को पकड़ने वाले करकरे के खिलाफ मुम्बई बन्द यही लोग बुलाते हैं किंतु उससे पहले उनकी हत्या हो जाती है। आतंकी हिंसा के आरोपियों को बचाने में मदद की जाती है, उन्हें लोकसभा का टिकिट देकर उनकी छवि सुधारी जाती है। गुजरात के बिल्किस कांड के आरोपियों को जल्दी छोड़ कर उनकी बाकी की सजा माफ कर के अपनी पक्षधरता का सन्देश दिया जाता है। दूसरे कांड की आरोपी को सजा घोषित होने तक मंत्री पद से उपकृत किया जाता है।

कानून अपनी सीमाओं में रह कर साक्ष्य मिलने पर सन्देह का लाभ या सजा देता है किंतु समाज में जिसकी छवि आरोपी की है उसकी पक्षधरता,पक्ष लेने वालों के चरित्र को प्रकट करती है। चुनावों तक सीमित विपक्ष ना आन्दोलन कर सकता है और ना ही जैसे को तैसा जबाब देने में सक्षम है। षड़यंत्र रच सकने की उसकी उनके जैसी सांगठनिक क्षमता भी नहीं है, इसलिए जगीरा जीत जाता है।   

 वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.]  

गुरुवार, अक्टूबर 08, 2020

रिया को जमानत के बड़े परिप्रेक्ष्य

 

रिया को जमानत के बड़े परिप्रेक्ष्य


वीरेन्द्र जैन

कुछ टीवी चैनलों, और लगभग भोंकने काटने के अन्दाज में चिल्लाने वाले टीवी एंकरों ने सुशांत सिंह की दुखद मृत्यु को जानबूझ कर सनसनीखेज बनाया था। यह कहना सही नहीं होगा कि रिया चक्रवर्ती को मिली जमानत ने उसका पटाक्षेप कर दिया है। सच तो यह है कि कहानी यहाँ से शुरू होना चाहिए। इस कहानी ने पूरे देश की राजनीति, अर्थव्यवस्था, कानून व्य्वस्था, संचार व्यवस्था, धर्म, संस्कृति आदि में छुपी सड़ांध को उघाड़ कर रख दिया है।

सबसे पहले तो बता दूं कि किसी भी स्वनिर्मित, सम्भावनाशील, लोकप्रिय, युवा कलाकार के असामायिक निधन पर किसी भी परिचित, अपरिचित मनुष्य को दुख होना स्वाभाविक है। यह दुख मुझे भी हुआ था, किंतु साथ ही साथ बाबा भारती की कहानी की तरह दुख और करुणा के नाम पर ठगने वालों के षड़यंत्र पर गुस्सा आना भी स्वाभाविक है, ऐसे लोगों को सबक सिखाने का तरीका भी अपनी क्षमताओं और परिवेश के अनुसार ही खोजना होगा। रिया और उसके वकील ने बिना उत्तेजित हुये इतने बड़े षड़यंत्र का सामना करने में जिस धैर्य और विवेक का प्रदर्शन करते हुये नियमों का पालन किया व न्याय का सम्मान किया उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए।

सबसे पहले टीवी चैनलों को लें। नई तकनीक आने के बाद इस बात का पता लगना आसान हो गया है कि कौन सा चैनल किस समय में कितना देखा जा रहा है। इसी टीआरपी के आधार पर विज्ञापन कम्पनियां अपने विज्ञापन देती हैं जो उनकी आय का मुख्य स्रोत है। दूसरे सत्ता पर अधिकार करने के लिए राजनीतिक दल और अपने पसन्द के नेता और दल को सत्तारूढ कराने को उत्सुक कार्पोरेट घराने, उनके नेताओं और दल के साथ साथ उनकी सरकार की छवि को बनाने के लिए निरंतर प्रचार कार्य कराते हैं, जिसके लिए टीवी जैसा दृश्य [विजुअल] मीडिया सर्वोत्तम साधन है। यही कारण है कि बहुत सारे समाचार चैनल समाचारों के नाम पर राजनीतिक नेताओं या दलों का विज्ञापन करने लगे हैं। बहसों के नाम पर तयशुदा निष्कर्ष निकालने को ड्रामा रचते हैं। इसी क्रम में वे साम्प्रदायिकता के प्रसार और विरोधियों की चरित्र हत्या की सुपारी भी लेते हैं। अपनी टीआरपी के लिए वे सामान्य घटनाओं को सनसनीखेज बनाने में भी नहीं हिचकते। जिस सामान्यजन में राजनीतिक चेतना के संचार का काम करना चाहिए था, उसे और अधिक कूपमंडूक, अन्धविश्वासी, और पोंगापंथी बनाने का काम वे लोग करा रहे हैं, जो यथास्थिति से लाभान्वित हैं। रिया के मामले में कुछ टीवी चैनलों ने यही काम किया और टीआरपी को देखते हुए लगातार तीन महीने तक जारी रखा। इस क्रम में इन चैनलों ने उसे लुटेरी, हत्यारी, चरित्रहीन, ड्रग व्यापारी, साबित करने के लिए किसी भी झूठ या अतिरंजना से गुरेज नहीं किया। उसकी अनुमति के बिना उसके निजी जीवन के फोटोग्राफ अपनी सुविधा के अनुसार संशोधित करके प्रसारित किये, जिनका खबर से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं था। नैतिकता का तकाजा है कि समाचार को समाचार की तरह और विचार को विचार की तरह उचित जगह पर विचारक के नाम के साथ देना चाहिए। अनुमानों और सम्भावनाओं को समाचार के साथ नहीं मिलाना चाहिए। जरूरत पड़ने पर हर समाचार और विचार की जिम्मेवारी लेने वाला, और भूल के लिए खेद प्रकट करने वाला कोई होना चाहिए। ऐसा खेदप्रकाश, उसी समय पर व उतने ही विस्तार के साथ दिया जाना चाहिए जितने में गलत समाचार दिया गया हो। जिनकी लोकप्रियता से उनका व्यवसाय जुड़ा है, उनके बारे में समाचार देते समय विशेष सतर्कता बरती जाना चाहिए और क्षति के अनुसार ही दण्ड मिलना चाहिए।

विचार विहीन संगठनों को गिरोह तो कह सकते हैं, पर उन्हें राजनीतिक दल नहीं कहा जा सकता। लोकतांत्रिक घोषित हमारे देश में व्यक्तियों या वंशों के नेतृत्व में गठित गिरोह राजनीतिक दलों के रूप में पहचान बनाये हुये हैं, जिन्हें कार्पोरेट घरानों की पूंजी पोषित करती रहती है। जनता को भ्रमित करने के लिए ये कभी पूर्व राजपरिवारों के वंशजों, कभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के वंशजों, कभी फिल्मों व टीवी के कलाकारों, लोकप्रिय प्रशासनिक अधिकारियों, सेना व पुलिस में रहे अधिकारियों, धार्मिक वेषभूषा वाले व्यक्तियों, खिलाडियों, साहित्यकारों, गायकों, आदि आदि लोकप्रिय व्यक्तियों को आगे रख, पूंजीपतियों से प्राप्त धन को बांट कर सत्ता पर अधिकार कर लेते हैं। इसके बाद भी उन्हें दलबदल कराने और तरह तरह के हथकंडों का सहारा लेना पड़ता है। कभी 1984 में दो सीटों पर सिमटी भाजपा आज केन्द्र व 19 राज्यों में ऐसे ही हथकण्डों से सत्तारूढ हो चुकी है, और इस सत्ता को भी बनाये रखने के लिए उसे कभी राज्यपाल की मदद से रात के अँधेरे में शपथ ग्रहण कराना होता है तो कभी होटलों में बन्धक बना कर विधायकों की व्यापक खरीद करनी पड़ती है। आगामी बिहार विधानसभा के चुनावों को देखते हुए, भाजपा ने सुशांत सिंह के मामले को ‘आपदा में अवसर’ की तरह लपका व बिहार को छोड़ कर आये उस कलाकार को, बिहार का सपूत और शहीद बनाना चाहा जिसने बिहार के नाम पर ना तो शिव सेना की ज्याद्तियों का विरोध किया ना लाकडाउन में प्रवासी मजदूरों की वापिसी में मदद की। इस योजना के लिए उसे सुशांत सिंह की लगभग स्पष्ट आत्महत्या को हत्या बताना पड़ा, मुम्बई की सबसे अच्छी मानी जाने वाली पुलिस को षड़यंत्रकारी बताना पड़ा व ऐसा करने का कारण गढने के लिए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के पुत्र का नाम घसीटना पड़ा। और यह सब उन्होंने बिहार के चुनावों में भावनाओं का छोंक लगाने के लिए रचा। इससे बात नहीं बनी तो मृतक के पिता से बिहार में इस आधार पर रिपोर्ट दर्ज करा दी कि मुम्बई पुलिस ठीक से जाँच नहीं कर रही। फिर इसी बहाने बिहार सरकार ने सीबीआई की जाँच का अनुरोध किया जिससे सीधे केन्द्र सरकार के नियंत्रण में मामला चला गया। आजकल सीबीआई की कार्यप्रणाली से सब परिचित हैं। एक कहानी यह भी गढी गयी कि सुशांत की लिव इन पार्टनर रही रिया ने उसके सत्तरह करोड़ रुपये हड़प लिये हैं, इस बहाने से केन्द्र सरकार की एक और जाँच एजेंसी ईडी [एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट] को दखल का मौका मिल गया जिसने सूत्र तलाशने की कोशिश की, और पाया कि लिव इन पार्टनर जो कि लगभग पत्नी का दर्जा रखता है के बाबजूद रिया ने सुशांत के पैसे का कोई दुरुपयोग नहीं किया। अगर उसने कुछ पाया भी होगा तो वह सुशांत के हिस्से की ही अनियमितताएं पायी होंगीं, जो किसी भी कला के व्यवसाय के अनिश्चित आय वाले व्यक्ति के खातों में देखी ही जा सकती हैं। इतना ही नहीं उन्होंने नार्कोटिक्स वालों का प्रवेश भी इसमें करा दिया क्योंकि सुशांत सिंह ड्रग एडिक्ट था और लाकडाउन के दौरान अपने मित्र की आदत को पूरा करने के लिए रिया ने अपने भाई से मदद करने के लिए कहा था और अपने पास से पैसे दिये थे।

अपने राजनीतिक लक्ष्यों को पाने के लिए किसी भी हद तक गिरने वाले इन लोगों ने बालीवुड जैसी साम्प्रदायिक सौहार्द वाली जगह में साम्प्रदायिकता का प्रवेश कराने की कोशिश की और भाईभतीजावाद जैसा हास्यास्पद आरोप लगाया। कोई पक्षपात कराके अपने रिश्तेदार को एक बार मौका तो दिला सकता है किंतु कला की दुनिया में सफलता प्रतिभा से ही मिलती है। इन्होंने अधकचरे कलाकारों द्वारा बेढंगे आरोप ही नहीं लगवाये अपितु नोएडा में हिन्दी फिल्म उद्योग स्थापित करने जैसा हास्यास्पद विचार भी सामने ले आये। यह स्पष्ट संकेत था कि भाजपा और उसकी केन्द्र सरकार इन सारी घटनाओं में एक पक्ष की तरह काम कर रही हैं।

रिया को भले ही जमानत बहुत सारे किंतु परंतुओं के बाद ही मिली है और कई शर्तें लगायी गयी हैं किंतु उसकी जमानत के फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देश भर में फैले ड्रग के जाल के प्रति आँखें मूंद लेने वाली केन्द्र सरकार किसी थानेदार की तरह किसी निर्दोष को गिरफ्तार करने के लिए गांजे की पुड़ियां सुरक्षित रखती है।

इस तरह यह मामला केवल एक रिटायर्ड सैन्य अधिकारी की स्वतंत्र विचारों वाली माडल बेटी का ही मामला नहीं है अपितु राजनीति के लिए किसी भी स्तर तक गिरने का मामला भी है। आज जो दल चुनावों में पराजित हो कर विपक्ष में बैठे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि किसी चुनावी प्रबन्धक को पार्टी अध्यक्ष पद तक पहुंचाने वाले इस दल की गतिविधियों को समय पूर्व पहचानने और षड़यंत्रों को निर्मूल कर देने पर ही उनकी सुरक्षा है। कभी आगे बढ कर हमला कर के भी सम्भावित हमले के नुकसानों को रोका जा सकता है। काश तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने गणेशजी को दूध पिलाने वाली अफवाहों की जाँच करा ली होती या दो हजार के नोट में चिप बताने वाले टीवी चैनलों के झूठ बोलने को उजागर कर दिया होता तो झूठ की इतनी व्यापक एजेंसियां नहीं खुल पातीं। अभी भी समय है। सवाल पूछा जाना चाहिए कि तीन महीने तक हैडलाइन बनने वाली रिया को जमानत मिलने की खबर पिछले पृष्ठों पर कम जगह में क्यों छपी है?

 वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

मो. 9425674629           

शुक्रवार, सितंबर 18, 2020

सुशांत सिंह का दांव कहीं भाजपा को उल्टा तो नहीं पड़ेगा?

सुशांत सिंह का दांव कहीं भाजपा को उल्टा तो नहीं पड़ेगा?

वीरेन्द्र जैन


आज की राजनीति इतनी अमानवीय है कि अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षाओं के लिए किसी को भी बलिवेदी पर चढा सकती है। इस दौर का गिरोह झूठ को सच और सच को झूठ बनाने व उसे प्रचारित करने के लिए पूरा तंत्र सुसज्जित कर के पहले भक्तों को और फिर देश को भटका रहा है। मीडिया पर इतना नियंत्रण है कि समाचार भले ही लिख लिया जाये किंतु वह जनता की पहुंच के स्तर तक छप नहीं सकता, प्रसारित नहीं हो सकता।

गोवा में भाजपा ने गठबन्धन सरकार बनायी थी जिसके कुछ घटकों ने साफ साफ कह दिया था कि वे भाजपा का नहीं अच्छी छवि वाले मनोहर पारीकर को समर्थन दे रहे हैं, और इस सरकार को यह समर्थन पारीकर के मुख्यमंत्री बने रहने तक ही सीमित है। दुर्भाग्यवश पारीकर अस्वस्थ हुये व जांच में एडवांस स्टेज के कैंसर से पीड़ित पाये गये। उन्हें अंतिम दिनों में आराम की सख्त जरूरत थी वहीं दूसरी ओर मोदी-भाजपा को सरकार बचाने के लिए उस पद पर पारीकर की जरूरत थी। उनसे इसी हालत में काम लिया गया और बजट भी पेश कराया गया ताकि सरकार बची रहे। ऐसी ही अवस्था में उनका निधन हुआ। अरुण जैटली हों, सुषमा स्वराज हों, अनंत कुमार हों, अनिल माधव दवे आदि की जरूरत प्रशासनिक निर्विकल्पता नहीं, अपितु राजनीतिक अधिक रही। एक बहुत बड़ी संख्या में सदन की सदस्यता के प्रत्याशी केवल संख्या बल के लिए सामने लाये जाते हैं और उनकी छवि के सहारे बहुमत बना कर मनमानी का अधिकार प्राप्त कर लिया जाता है। दल बदल से लेकर विधायकों के सौदे तक में उनकी पितृ संस्था के पाखंडी आदर्शवाद को कोई आपत्ति नहीं होती। उदाहरण इतने अधिक और जगजाहिर हैं कि उनका अलग से उल्लेख करने की कोई जरूरत नहीं।

इसी क्रम में इन्होंने आगमी बिहार विधानसभा के चुनावों को देखते हुए बालीवुड कलाकार सुशांत सिंह की दुखद मृत्यु पर दांव खेला और इसके लिए अपने सारे संसाधन झौंक दिये। इनका प्रयास आईपीएस भट्ट की तरह कुछ लोगों को जेल में डालने और कुछ आई ए एस को मुख्यधारा से हटा कर, गुजरात में नरसंहार के बाद भी असत्य आधारित भावनात्मक प्रचार से चुनावी लाभ उठाने जैसी योजना का हिस्सा लगता है। अब सीबीआई की जाँच के बाद सामने आये संकेतों से पुष्ट हो चुका है कि सुशांत सिंह ने आत्महत्या ही की है। सीबीआई के संकेतों के बाद उसके पिता ने भी स्वीकार कर लिया था किंतु बाद में उसका बयान बदलवा दिया गया। जिस शिवसेना को काँग्रेस समझ कर इन्होंने राजनीतिक षड़यंत्र  शुरू करवाया, वैसा ही आक्रामक जबाब अगर शिव सेना ने दिया तो भाजपा को भागते राह नहीं मिलेगी। उसके पालतू मीडिया ने आगे बढ बढ कर दो महीने तक इतने अतिरेक में काम किया कि इस विषय पर स्टोरी करने की प्रतियोगिता शुरू हो गयी। इसमें सुशांत सिंह की जिन्दगी का वह निजी पक्ष भी सामने आ गया जिसके ढके रहने पर उसकी एक मनमोहक कलाकार की स्वच्छ छवि बची रह सकती थी। इसी क्रम में यह भी सामने आ गया कि वह अपने घर से दूर होने के प्रयास में ही इंजीनियरिंग की शिक्षा को छोड़ कर बालीवुड भाग आया था, और कि वह अपने पिता को पसन्द नहीं करता था। उसे अपनी बहिनों और उनके पतियों पर भी भरोसा नहीं था, इसलिए वह अपने आसपास रहने वाली लड़कियों में ही दिली सुकून  तलाशता था, उनसे ही अपने दिल की बातें साझा करता था। अपने घर से लेकर व्यवसाय तक में वह प्रोफेशनल प्रबन्धकों पर ही निर्भर था। इसी क्रम में उसे सफलताएं भी मिलती रहीं और कम उम्र में ही उसने अपनी कल्पना से अधिक पैसा व यश कमा लिया। इसके सहारे वह बालीवुड की वर्जना मुक्त जिन्दगी का पर्याप्त आनन्द भी उठाने लगा। यही वह समय था जब वह चरस और मारजुआना आदि के नकली आनन्द का शिकार हो गया। आचार्य रजनीश जब अपनी लोकप्रियता के शिखर पर थे उसी समय दुनिया में हिप्पीवाद फैला था और यौनानन्द की सीमा से अधिक आनन्द की तलाश करने वाला समाज  मेडीटेशन की कठिन राह पर आकर्षित हुआ था। इस साधना की कठिनाई का सरल हल उन्हें उस समय के इसी तरह के नशे एलएसडी में मिलने लगा था। तब रजनीश जी ने अपना एक प्रवचन इसी विषय  पर दिया था जो बाद में “एलएसडी, ए फाल्स वे आफ मेडीटेशन” के रूप में प्रिंट मीडिया में सामने आया था। इसमें वे मानते हैं कि इस तरह के नशे भी ध्यान में मिलने वाले आनन्द के जैसा भ्रम देते हैं और यह शार्टकट आदमी को भटका देता है।

बिहार के आगामी चुनावों की राजनीति ने इस राजनीतिक हथकण्डे में उसकी मृत्यु के काफी समय के बाद सुशांत के पिता और उसकी बहिनों को इस आत्महत्या को हत्या बताने के लिये उकसाया। कहानी बनाने के लिए उसमें रिया चक्रवर्ती उसके परिवार को मुख्य साजिशकर्ता ठहराया व राजनीतिक रंग देने के लिए दिशा सालियान की आत्महत्या के समय महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के बेटे की काल्पनिक  उपस्थिति व मुम्बई पुलिस द्वारा जाँच में लापरवाही बरतने के आरोप लगा कर गठबन्धन सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की। ऐसा इसलिए किया ताकि बिहार में रिपोर्ट दर्ज करायी जा सके और रिया चक्रवर्ती को बिहार पुलिस के दबाव में मनमाना बयान दिलवाया जा सके। और इसी बहाने पिंजरे के तोते के आरोपों वाली सीबीआई को शामिल किया जा सके। फिल्मी दुनिया जैसे व्यव्साय में टैक्सों से बचने के लिए दो नम्बर की समानांतर व्यवस्था चलती है जिसका एक जाल जैसा बन जाता है। एक का काला धन दूसरे के पास भी काले धन के रूप में ही पहुंचता है। जब भी इस क्षेत्र में विस्तार से जाँच होगी तो कहीं न कहीं कुछ न कुछ निकल ही आयेगा जबकि इस जाल से जुड़े सभी लोग उसके लिए जिम्मेवार नहीं होते। रोचक यह है कि फिल्मी दुनिया को नशे की दुनिया बताने वाले व इसका विरोध करने वाले काले धन के विषय को नहीं छेड़ रहे। ईडी की जांच रिपोर्ट के बारे में भाजपा के प्रवक्ता समेत सब गुपचुप हैं।   

भाजपा की यह कोशिश थी कि सुशांत को बिहार के सपूत के साथ मुम्बई की गैर भाजपा सरकार द्वारा हुयी ज्यादती की तरह चुनाव में प्रस्तुत किया जाये। उन्होंने फिल्म उद्योग में चल रहे नेपोटिज्म के आरोप के बहाने मुस्लिम कलाकारों और गैर मुस्लिम कलाकारों के बीच तनाव का खेल भी खेलना चाहा, ताकि इसके सहारे चुनावों में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का सहारा मिल जाये। किंतु उनकी सभी चालें बिफल हो गयीं। फिल्म उद्योग हमेशा से साम्प्रदायिकता मुक्त है। अपने निकट के किसी भी व्यक्ति को एक मौका अवश्य मिल जाता है किंतु वह अपनी प्रतिभा से ही आगे बढ पाता है। ना तो अमिताभ बच्चन अपने पुत्र को प्रमोट करने में सफल हो सके और ना ही हेमा मालिनी अपनी बेटियों को। सलीम खान के दूसरे बेटे भी सलमान नहीं बन सके ना ही नितिन मुकेश मुकेश की जगह ले सके। मौका सबको दिया गया। भाजपा के सरकारी लाभांवित कलाकार भी इस मुहिम को आगे नहीं बढा सके। केवल अयोग्यता से असफल हुए व्यक्ति ही अपनी कुंठाएं इस तरह से व्यक्त करते रहे हैं।

मीडिया खबरों के अनुसार तीन तीन केन्द्रीय एजेंसियां अपनी गहन जाँच के आधार पर जिस निष्कर्ष पर पहुंचती दिख रही हैं वह यह है कि सुशांत सिंह लम्बे समय से चरस का आदी था और अपने फार्म हाउस पर पार्टियां किया करता था। पिछले एक साल से वह फिल्मों में कैरियर के सपने देखने वाली रिया चक्रवर्ती के साथ लिव इन में रह रहा था जो उसके प्रेम में थी। इसी भावना में लाकडाउन के दौरान उसने सुशांत के लिए पाउडर मंगवाने में अपने भाई की मदद ली। यह कलाकार डिप्रैशन का भी शिकार था किंतु अपनी प्रोफेशनल जरूरतों के अनुसार इस बात को सार्वजनिक नहीं होने देना चाहता था। रिया उसका इलाज करा रही थी व उसके इलाज को प्रोफेशनल कारण से ही गोपनीय रखना चाहती थी। उसके पैसे का हिसाब उसकी मैनेजर देखती थी जिसका पता ईडी की रिपोर्ट के बाद लगेगा। इससे भी छवि में निखार नहीं आयेगा। कंगना का उत्पाती प्रवेश भी विषय को और मचायेगा, अपना प्रारम्भिक नुकसान वह करा ही चुकी है, फिल्म उद्योग भी सशंकित हो जायेगा। भाजपा को इससे भी मदद नहीं मिलने वाली क्योंकि बिहार सरकार से निराश वहां का मजदूर मुम्बई वापिस जाने की राह देख रहा है।

क्या यह दांव भाजपा को उल्टा ही पड़ेगा?  

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023