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मंगलवार, फ़रवरी 11, 2025

दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम

 

दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम

वीरेन्द्र जैन

दिल्ली विधानसभा के चुनाव सम्पन्न होने के बाद उसके परिणाम आ चुके हैं। इन चुनावों में सीधे सीधे दो दलों, आम आदमी पार्टी [आप] और भारतीय जनता पार्टी [भाजपा] के बीच मुकाबला था, भले ही इस रासायनिक क्रिया में उत्प्रेरक के रूप में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस व ए आई एम आइ एम [अखिल भारतीय मुस्लिम एकता संघ ] भी थीं। यदि ये उत्प्रेरक नहीं होते तो सीटों के परिणाम में भी दोनों मुख्य प्रतिद्वन्दी बिल्कुल बराबर पर होते या विपरीत होते। अभी भी उनके मतों के बीच कुल दो प्रतिशत का अंतर है। वैसे पिछले विधानसभा चुनावों से भाजपा के वोट सात प्रतिशत बढे हैं तो आम आदमी पार्टी के आठ प्रतिशत घटे हैं। लोकसभा चुनावों में भाजपा को 50% वोट मिले थे और संयुक्त रूप से लड़ने वाली काँग्रेस [18%] व आप [22%] अर्थात कुल 40% वोट मिले थे। यह बताता है कि दिल्ली में चुनाव अनुसार मत बदलने वाले मतदाता बड़ी संख्या में हैं। जिन मतदाताओं ने तीन बार राज्य में आम आदमी की सरकार बनवायी, उन्हीं ने उसके ठीक बाद भाजपा प्रत्याशियों को लोकसभा में भेजा।

 

चूंकि हमारी प्रणाली में विजेता जनप्रतिनिधियों की संख्या का महत्व सचेत मतदाताओं की संख्या से अधिक होता है, इसलिए चुनावी जीत कुछ अर्थ रखती है। विपक्ष में रहने के दौरान लोहिया पंथियों के कथन हुआ करते थे कि ज़िन्दा कौमें पाँच साल तक इंतजार नहीं करतीं। वे निरंतर सड़क के आन्दोलन किया करते थे। अब वैसा नहीं होता। अन्ना आन्दोलन के बाद जनता का स्वतःस्फूर्त कोई आन्दोलन नहीं हुआ, भले ही वेतन आदि में वृद्धि के लिए संगठित मजदूर कर्मचारियों के प्रदर्शन भले ही हुये हों, या कुछ वर्ष पूर्व एम एस पी के लिए सम्पन्न किसानों का आन्दोलन हुआ था। पिछले दिनों विशाल बहुमत से सरकार बनाने वाले केजरीवाल और उनकी पार्टी के प्रमुख लोगों को बिना किसी ठोस सबूत के जेल में भी डाल दिया गया फिर भी इस कार्यवाही के खिलाफ कोई विरोध प्रदर्शन तक नहीं हुआ।  कारण यह रहा कि वे सब प्रभुता के मद से घिर चुके थे, और ना तो उनकी पार्टी का संगठन ही बनाया गया था और ना ही कोई ठोस कार्यक्रम ही बनाया गया था जिसकी रक्षा के लिए कार्यकर्ता आदोलन करने लगते।

विडम्बना यह रही कि उक्त विधानसभा चुनाव में दोनों प्रमुख और दोनों उत्प्रेरक दलों में से किसी ने भी लोकतांत्रिक आदर्शों के अनुरूप चुनाव नहीं लड़ा। पूरा चुनाव सत्तारूढ आम आदमी और उसके पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की आलोचना पर केन्द्रित रहा। अरविन्द केजरीवाल ने तत्कालीन काँग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ चले आन्दोलन से लोकप्रियता अर्जित की थी और उसे राजनीतिक दल में बदलकर अपनी पार्टी बना ली थी। इस पार्टी ने आरोपों से घिरी काँग्रेस पार्टी द्वारा खाली किये गये स्थान को भर कर अपना अस्तित्व बनाया था। उसका इकलौता कार्यक्रम और नीति थी, भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देना। उसने यह कर के दिखाने की कोशिश भी की। दूसरी ओर देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी भाजपा ने अपने अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा छोड़ा हुआ था और वे काँग्रेस द्वारा खाली किये गये स्थान को भरने के लिए उतावले थे, इस कारण दोनों में प्रतियोगिता थी। देश के मतदाताओं में एक बड़ा वर्ग अभी भी गैर राजनीतिक आधार पर वोट देता है इसलिए भाजपा के पास एक सुनिश्चित हिन्दू वोट बैंक है और मुस्लिम मतदाता एकजुट होकर भाजपा को हराने वाले दल को समर्थन देते हैं। दिल्ली के चुनाव में आम आदमी के साथ काँग्रेस और एआईएमआईएम के बीच बंट गया फिर भी अधिकतम हिस्सा आम आदमी पार्टी को ही मिला, पर वह सीटें जीतने वाला बहुमत नहीं अर्जित कर सकी और पिछड़ गयी। जीत दर्ज करने वाली भाजपा केवल अपनी केन्द्र सरकार को ही दुहराती रही। डबल इंजन की सरकार को प्रचार का आधार बनाना यह भी बताता है कि केन्द्र सरकार अपने ही दल की सरकार को वांछित मदद करती है। कुल मिला कर दल के आधार पर चुनाव परिणाम का निष्कर्ष निम्नानुसार है –

भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस – इसके स्थानीय नेताओं ने उनकी सरकार पर लगाये गये आरोपों का बदला लेने के लिए वोट काट कर आम आदमी पार्टी से बदला ले लिया, भले ही वे एक भी सीट नहीं जीत सके हों और जिस बड़े उद्देश्य अर्थात साम्प्रदायिक भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए बनाया गये इंडिया गठबन्धन को चोट पहुंचायी हो। काँग्रेस के बड़े नेताओं की असहमति से यह हुआ है तो काँग्रेस की एकता को भी नुकसान पहुंचा है।

भारतीय जनता पार्टी- विधानसभा चुनाव जीत गयी है किंतु उसको लोकसभा में अर्जित वोटों में घटत मिली है। पराजित आम आदमी पार्टी से कुल दो प्रतिशत मत से ही आगे है, दूसरे मुख्यमंत्री चयन के सवाल पर उसे बहुत सारे समझौते करना होंगे। प्रतियोगिता में उसने जो अतिरंजित वादे किये हैं उन्हें निभाने में मुश्किलें आयेंगीं।

आम आदमी पार्टी-  पार्टी चुनाव हार गयी है किंतु यह पार्टी एक व्यक्ति को केन्द्रित कर सिद्धांत और संगठन विहीन पार्टी थी। इसके प्रमुख नेता की छवि को भाजपा ने खराब किया, उसे और उसके सहयोगियों को महीनों जेल में डाल कर रखा। जिस ईमानदारी के आधार पर इन्होंने अपना अस्तित्व बनाया था उसे ही दागदार किया गया। इसके पास जन समर्थन तो है किंतु संसाधनों की कमी है। इनके विधानसभा अध्यक्ष ने पार्टी छोड़ कर भाजपा ज्वाइन कर ली और यही काम टिकिटों से वंचित होने पर आठ और अन्य विधायकों ने भी किया। पार्टी के संस्थापकों में से अनेक पहले ही जा चुके थे जिनमें से एक कवि तो घनघोर आलोचक हैं। इनकी प्रशासनिक ईमानदारी के इतिहास के कारण इनकी जगह भरने वाली पार्टी लम्बे समय तक सतर्क होकर काम करेगी।

ए आइ एम ए आइ एम- मुस्लिम साम्प्रदायिक पार्टी है, हर चुनाव में ध्रुवीकरण करके हिन्दू साम्प्रदायिक पार्टियों को लाभ पहुंचा कर खुद भी लाभांवित होती है। इस चुनाव में भी बिना कोई सीट जीते लाभ में रही। अन्य राज्यों की तरह दिल्ली में भी उपस्थिति बना ली।

किसी शायर का शे’र है –

अय परिन्दो हिज्र करने से भी क्या हासिल हुआ / चोंच में थे चार दाने, चार दाने ही रहे

शुक्रवार, मई 20, 2016

पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम ; उर्फ अन्धों का हाथी

पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम ; उर्फ अन्धों का हाथी
वीरेन्द्र जैन
बहुत सावधानी और सुरक्षा के लिए दो महीनों तक खींचे गये पाँच राज्यों की विधानसभाओं के चुना परिणाम तय तिथि पर घोषित हो गये। यद्यपि चुनाव सर्वेक्षण सामने दिखाई दे रहे माहौल से लगाये जा रहे अनुमान से अधिक कुछ नहीं होते हैं, सो लगभग वैसे ही परिणाम सामने आये जैसी सम्भावना सूंघी जा रही थी। ये चुनाव इस विशाल और विविधिताओं से भरे देश के उत्तर पूर्व से लेकर धुर दक्षिण तक के राज्यों में हो रहे थे और परिणाम भी वैसे ही आये। इन परिणामों से देश के मिजाज का कोई अनुमान निकालना नामुमकिन है।
चुनावों में छह मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल और अनेक राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त दल चुनाव लड़ रहे थे, जिनमें से असम में भाजपा, पादुचेरि [पाण्डुचेरी] में काँग्रेस, केरल में सीपीएम-सीपीआई के नेतृत्व वाला वाममोर्चा सरकार गठित करने जा रहा है तो दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में तृणमूल काँग्रेस और तामिलनाडु में एआईडीएमके की सरकार बनने जा रही है जो राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त व्यक्ति केन्द्रित दल हैं। इन सभी दलों की विचार धाराओं और संगठनों में कोई साम्य नहीं है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि जनता ने इसके पक्ष में, या उस विचार या कार्य के विरोध में अपना मत व्यक्त किया है।
भाजपा इसलिए खुशी का मुखौटा लगा रही है क्योंकि उसे पहली बार उत्तरपूर्व के किसी राज्य में सरकार बनाने का मौका मिला है और देश के पश्चिमी राज्यों की पार्टी होने की उसकी पहचान में बदलाव आया है। अब वह तकनीकी आधार से बाहर जाकर भी खुद को राष्ट्रीय पार्टी कह सकती है, भले ही उसके आलोचक कह रहे हों कि यह उसकी विचारधारा की जीत नहीं अपितु यह अवसर काँग्रेस के कुछ महात्वाकांक्षी विधायकों के दल बदलने से उसे मिल पाया है। आंकड़े वाले लोग कह रहे हैं कि उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनावों में ही 36.5% मत मिल चुके थे पर इन विधानसभा चुनावों में 29.8% रह गये। इसी प्रतिशत के आधार पर भाजपा पश्चिम बंगाल और केरल में सीटों की संख्या में पिछड़ने के बाद भी अपने दल का विकास दिखा रही है। जीत के इस अहंकार में कोई नहीं देख रहा कि असम में दूसरे साम्प्रदायिक और अलगाववादी दलों ने भी अपना समर्थन और सीटों दोनों में वृद्धि की है। एआईयूडीएफ ने 12.4% प्रतिशत मत लेकर 12 सीटें जीती हैं, तो बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट ने भी 3.8% प्रतिशत मत लेकर 12 सीटें जीती हैं। भाजपा ने केरल में एक सीट से प्रवेश कर के बंगाल में दो सीटें जीती हैं। गुजरात के एक् उपचुनाव में भी भाजपा ने ही जीत हासिल कर ली, भले ही काँग्रेस ने बराबर की टक्कर दी।
वाम मोर्चा बंगाल में 26 सीटों तक सिमिट कर रह गया जबकि उसके चुनावी सहयोगी काँग्रेस को 45 सीटें मिल गयीं। दूसरी ओर वह इस बात से खुश है कि उसने सबसे शिक्षित, सबसे प्रगतिशील राज्य केरल में दुबारा से सत्ता प्राप्त कर ली है। वहीं तमिलनाडु में 10% से भी अधिक मत पाकर भी पिछली विधान सभा में जीती अपनी 20 सीटें नहीं बचा सकी। उसकी ऐसी क्षति उसकी राष्ट्रीय मान्यता पर भी खतरा ला सकती है। वामपंथी दल भारतीय राजनीति के सबसे अधिक संवैधानिक नियमों का पालन करने वाले, अनुशासित और ईमानदार दल हैं जो अपने अध्य्यन और वैज्ञानिक चिंतन व व्यवहार से लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखे हुए हैं। उनकी कमजोर उपस्थिति भी महत्वपूर्ण होती है।
तामिलनाडु में व्यक्ति केन्द्रित दो दलों ने अपना वर्चस्व बना रखा है। इस इक्कीसवीं शताब्दी के लोकतंत्र में भी ऐसी अन्धभक्ति अचम्भित करती है जिसमे जयललिता के जेल जाने पर वैकल्पिक मुख्यमंत्री साष्टांग दण्डवत करता नजर आता हो और उनके जेल से बाहर आने के बाद रामकथा के भरत की तरह अपना राज पाठ जस का तस सौंप देने में रत्ती भर संकोच न करता हो। उल्लेखनीय है कि भाजपा में जब जब किसी मुख्यमंत्री को बदलने की कोशिश हाई कमान ने की वह विद्रोही हो गया व दूसरा दल बना लिया। कल्याण सिंह, उमा भारती, येदुरप्पा, मदनलाल खुराना, जैसे अनेक उदाहरण हैं। वसुन्धरा राजे ने हाई कमान की लाख कोशिशों के बाद भी पद नहीं छोड़ा था। पुराणों में वर्णित भगवानों की भूमिका करने वाले फिल्मी अभिनेता की पहचान ही दक्षिण की राजनीति का प्रवेश द्वार माना जाता है। भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल जाने के बाद भी सस्ता चावल व उपहार देने वाली पूर्व अभिनेत्री जयललिता का जादू बरकरार है भले ही वैसे ही आरोपों वाले उनके प्रतिद्वन्दी ने बराबर की टक्कर दे कर् ठीक ठाक सीटें प्राप्त कर लीं।
काँग्रेस भले ही सब ओर से पराजित नजर आ रही हो किंतु आंकड़ों के चश्मे से देखने पर वह भी आत्मसंतोष का घूंट पी सकती है। भले ही 30 सीटों वाले एक छोटे से राज्य में सरकार बनाने का अवसर मिला हो किंतु जो कभी सबसे बड़ी पार्टी रही हो उसे शून्य से मुक्ति तो मिल ही गयी है। भले ही काँग्रेस ने असम की सत्ता खो दी हो किंतु उसने अकेले चुनाव लड़ कर 31.1% मत प्राप्त किये जबकि उसकी प्रतिद्वन्दी भाजपा को कुल 29.8% मत ही मिले हैं जिसने असम गण संग्राम परिषद से समझौता करके चुनाव लड़ा था। काँग्रेस गर्व के साथ कह रही है कि उसने साम्प्रदायिक माने जाने वाले एआईयूडीएफ के आग्रह के बाद भी समझौता नहीं किया। आज के आंकड़े बता रहे हैं कि ऐसा करके वह चुनाव जीत सकती थी। बंगाल में उसने लेफ्ट फ्रंट से अधिक सीटें जीत कर विरोधी दल का हक प्राप्त कर लिया। केरल में उसके कुल 5% वोट ही कम हुये हैं, ये बात अलग है कि वहाँ एक सीट के अंतर से ही उसने पिछली सत्ता पायी थी।
सास भी कभी बहू थी की तरह तृणमूल काँग्रेस भी कभी काँग्रेस ही थी और उसी से निकली ममता बनर्जी ने काँग्रेसियों के आचरणों से अलग अपने अथक संघर्ष और कम्युनिष्टों जैसी सादगी के स्वरूप से ऐसी लोकप्रियता प्राप्त कर ली कि गुरु गुड़ ही रह गया और चेला शक्कर हो गया। वामपंथ के शासन काल में काँग्रेस की जगह तृणमूल काँग्रेस ने विपक्ष का पद हथिया लिया और एंटी इंकम्बेंसी का लाभ भी उसे ही मिला। भक्ति अन्धी ही होती है इसलिए शारदा घोटाले में उसके नेताओं के जेल जाने, और स्टिंग आपरेशन में पकड़े जाने के बाद भी उनके समर्थन में कमी नहीं आयी। माल्दा जैसी हिंसक घटनाएं भी उनका समर्थन कम नहीं कर सकीं, भले ही भाजपा ने फिल्मी कलाकारों, सुभाष बोस की फाइलों का तूमार बाँध कर उनके पड़पोते को उनके खिलाफ खड़ा कर दिया हो। संघर्षशील बौद्धिक बंगाल में ममता बनर्जी ने अपना जो स्थान बनाये रखा है वह अचम्भित करता है, पर सच है।  
चुनाव परिणामों में किसी के हाथ में हाथी का कान आया है और किसी के हाथ में उसका पांव आया है। वे उसी आधार पर अपने निष्कर्ष निकाल रहे हैं जबकि सच तो यह है कि ये चुनाव परिणाम आगे की ओर नहीं ले जाते।   
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

         

बुधवार, अप्रैल 30, 2014

सम्भावित सरकार को कौन चलायेगा?



सम्भावित सरकार को कौन चलायेगा?

वीरेन्द्र जैन
                गोएबल्स ने गलत नहीं कहा था कि किसी झूठ को बार बार दुहराने पर लोग उसका भरोसा करने लगते हैं। चैनलों पर एक ही वस्तु के लगातार प्रसारित होते विज्ञापनों का सच भी यही होता है कि वे दिमाग में खुब जाते हैं और दुकान पर सम्बन्धित वस्तु लेने जाने पर वही ब्रांड नेम याद आ जाता है। किसी समय विज्ञापनों की अति के कारण ही वनस्पति घी का नाम डालडा हो गया था और डिटर्जेंट पाउडरों का नाम सर्फ हो गया था। इस आम चुनाव में मोदी के प्रचार के लिए अनुबन्धित अमेरिकी कम्पनी भी इसी तरकीब को अपना रही है और मोदी मोदी के नाम की इस तरह से चोट दी जा रही है कि किसी साधारण जन के ध्यान में अपने क्षेत्र के उम्मीदवारों से ज्यादा मोदी का ही नाम याद रहता है। उल्लेखनीय है कि जो कम्पनी प्रतिनिधि मोदी की छवि बनाने में लगा है वही हंसा कम्पनी से भी जुड़ा है जिसने तथाकथित सर्वेक्षण के द्वारा मोदी द्वारा पूर्ण बहुमत प्राप्त कर लेने की भविष्यवाणी की गयी है।
                इस बीच विभिन्न सूचना माध्यमों द्वारा अपने सन्देशों में कुछ ऐसा प्रचारित या विचारित किया जा रहा है जैसे कि मोदी प्रधानमंत्री बन ही गये हों और उनको केवल शपथ लेना ही शेष रह गया हो। कुछ अस्थिर चित्त मतदाताओं को प्रभावित करने, शासकीय मशीनरी को अपने पक्ष में करने और उद्योग जगत व अवैध कमाई करने वालों से चुनावी चन्दा वसूलने में ऐसा प्रचार काम आता है। कहा जाता है कि ऐसी अवधारणाएं बन जाने पर चुनावी हेराफेरी पर ध्यान कम जाता है क्योंकि मतदाता पहले ही सम्बन्धित की जीत को सहन कर चुका होता है। मोदी पर प्रैस का सामना न करने का आरोप भी लगता रहा है इसलिए पिछले दिनों उन्होंने कुछ साक्षात्कार भी दिये हैं जिनमें पूछे गये सवालों के बारे में एक धारणा यह भी बनी कि ये साक्षात्कार फिक्स थे और तीखे से लगने वाले सवाल, विवादित विषयों पर उनके स्पष्टीकरण को सामने लाने के लिए ही पूछे गये लगते थे। इन साक्षात्कारों में उनके अपर्याप्त उत्तरों पर कोई प्रतिप्रश्न नहीं किये गये।  ऐसे ही फिक्स सवाल जबाब के लिए एक लतीफा बहुत प्रसिद्ध है. एक बार जब चर्चिल अपना चुनावी भाषण देकर बैठने ही वाले थे कि भीड़ में से किसी व्यक्ति ने उनसे बहुत चुटीला सवाल किया। सवाल सुन कर भी चर्चिल की मुस्कान में कोई फर्क नही आया और उन्होंने वैसा ही सटीक और चुटीला उत्तर दिया। सभा में पहले तो सन्नाटा खिंच गया और फिर पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इसी बीच सभा के दूसरे कोने से वैसा ही चुनौतीपूर्ण कठिन सवाल उठा जिसका उत्तर देने में भी चर्चिल ने पूरी सावधानी अपनायी और फिर से पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट और उनके समर्थन के नारों से गूंज उठा। इसके बाद सभा के बीच से एक तीसरा आदमी उठा उसने पहले तो सवाल पूछने की अनुमति चाही पर फिर असमंजस में सिर खुजाते हुए चर्चिल को सम्बोधित करते हुए बोला कि सर आपने मुझे जो सवाल पूछने के लिए कहा था उसे मैं भूल गया हूं।
       आमतौर पर संघ परिवार और उनकी विचारधारा से प्रेरणा प्राप्त लोग देश में विश्वसनीय नहीं माने जाते क्योंकि उनके मन और वचन में भेद रहता है। गोडसे ने महात्मा गाँधी को मारने के विचार की प्रेरणा संघ के नेतृत्व के गाँधी और काँग्रेस विरोधी विचारों से ही ली थी किंतु वह गाँधी को मारने के लिए उनके प्रशंसक की तरह हाथ जोड़ता हुआ ही प्रकट हुआ था और उन हाथों में पिस्तौल छुपायी हुयी थी। बाबरी मस्ज़िद को तोड़ने से पहले भाजपा के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह और दूसरे नेताओं ने संविधान का पालन करने का वादा किया था पर उसके विपरीत बाबरी मस्ज़िद तोड़ने वालों की मदद की थी, और बाद में उस पर खुशी मनायी थी तथा तब से लगातार उस घटना पर गर्व करते हुए शौर्य दिवस मनाते आ रहे हैं। संघ के निर्देश उनके लिए संविधान से भी ऊपर होते हैं और इन्हीं निर्देशों पर वे न केवल दूसरे धर्मों के लोगों से शत्रुवत व्यवहार करते हैं, अपितु अपने दल के अडवाणी जैसे वरिष्ठतम नेताओं को भी अलोकतांत्रिक ढंग से पहले दल की अध्यक्षता से, फिर विपक्षी दल के नेता होने से, और फिर प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी होने से भी हटा देते हैं। पिछले दिनों नरेन्द्र मोदी ने एक चैनल को दिये गये साक्षात्कारनुमा भाषण में कहा था कि वे संविधान को देश की गीता मानते हैं और उसी के अनुसार शासन करेंगे, पर इन्हीं मोदी को इन्हीं के दल के सबसे प्रमुख नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राजधर्म अर्थात संविधान का पालन न करने का दोषी पाया था।
       उपरोक्त साक्षात्कार ऐसा लगा था कि जैसे पहले उन्होंने अपना भाषण लिख कर दे दिया हो और उसी भाषण को साक्षात्कार के रूप में प्रकट किये जाने हेतु सवाल बना लिये गये हों। अगर देश का कालाधन विदेशों में जमा है तो वह देश के बड़े उद्योगपतियों, व्यापारियों, नौकरशाहों, और राजनेताओं का ही होगा। यह देखना कौतुकपूर्ण है कि सबसे अधिक उद्योगपति, नौकरशाह, और दोषी राजनेताओं का प्रवेश भाजपा में हो रहा है जहाँ उनका न केवल खुले दिल से स्वागत हो रहा है अपितु उनमें से अनेकों को प्रत्याशी बना दिया गया है और अनेकों को राज्यसभा की सदस्यता का भरोसा दिया गया है। शायद ऐसे ही लोगों को आश्वस्त करने के लिए ही मोदी ने विदेश से कालाधन लाने के बारे में कहा कि ऐसे धन की सही मात्रा का पता उन्हें नहीं है अतः सत्ता का अवसर मिलने पर वे सही मात्रा पता करने का प्रयास करेंगे, उसे जानने के लिए विभिन्न देशों से सन्धियां करेंगे और तब उचित कार्यवाही करेंगे जिसकी समय सीमा दूसरे देशों से मिलने वाले सहयोग पर निर्भर करेगी। उल्लेखनीय है कि वर्तमान सरकार द्वारा अनुभव की जा रही ऐसी ही मजबूरियों को ये अभी तक भुलाते आ रहे थे और उन्हें कटघरे में खड़ा कर रहे थे। समय सीमा के एक सवाल के उत्तर में उन्होंने कहा कि कोई भी घोषणा पत्र सरकार के कार्यकाल तक की सीमा के लिए ही होता है अर्थात पाँच साल। इस उत्तर का दूसरा पहलू यह भी है कि जब पिछले वर्षों में छह साल तक अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा की जो सरकार रही तब या तो विदेशों में जमा काला धन शून्यवत था या उस सरकार में मोदी जितनी समझदारी या ईमानदारी नहीं थी। सवाल उठता है कि उन दिनों क्यों वह सब कुछ नहीं हो सका जिस वादे पर अब वोटों को लुभाया जा रहा है। इसी साक्षात्कार में पूछे गये इस सवाल के उत्तर में कि गुजरात में किसी उद्योगपति विशेष को किस दर पर ज़मीनें दी गयीं जिन्हें कांग्रेस के नेता टाफी के रेट में ज़मीनें देना कह रहे हैं, मोदी ने कहा कि उन्हें इस समय याद नहीं है कि उनके शासन काल में किस रेट पर ज़मीनें दी गयीं पर उसी समय उन्हें यह जरूर याद आ गया कि कांग्रेस के शासनकाल में किस रेट पर ज़मीनें दी गयी थीं।   
       साक्षात्कार में यह बतानेवाले मोदी कि चुनावी भाषण में तेजतर्रारी होना अलग बात है किंतु शासन तेजतर्रारी से नहीं चलता, की बात इसलिए अविश्वसनीय लगी क्योंकि गुजरात में 2002 से लेकर हरेन पंड्या की हत्या, इशरतजहाँ की मुठभेड़ के नाम पर की गयी हत्या और सहाबुद्दीन हत्याकांड समेत राजनीति से जुड़े अनेक हत्यारों को उनकी सरकार के दौरान न केवल संरक्षण ही दिया गया अपितु महत्वपूर्ण पद देकर कानून के हाथों से बचाने की कोशिशें भी हुयीं।
       आज देश के बड़े बड़े साहित्यकार, पत्रकार, बुद्धिजीवी, कलाकार, और सच्चे धार्मिक ईमानदार लोग चुनावों में दुष्प्रचार के प्रभाव की आशंका से व्यथित हैं। जिन आधारों पर वर्तमान सरकार की लोकप्रियता कम हुयी है उनको दूर करने की कोई ठोस योजना और समयसीमा भी सामने नहीं रखी जा रही है। लोग इसलिए भी आशंकित हैं कि जो सरकार लोकतंत्र में पूर्ण आस्था नहीं रखती वह अपने अस्तित्व की रक्षा में हिंसा का सहारा लेती है और उसे हटाने में वैसी ही प्रतिहिंसा पैदा होती है, जिससे लोकतंत्र खतरे में आता है। जब संघ के नेतृत्व में भाजपा की नहीं अपितु मोदी की सरकार बनवाने के प्रयास हो रहे हों और भाजपा के उदारवादी चेहरों तक को हाशिए पर धकेला जा रहा हो तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि भाजपा का चुनाव चिन्ह जीतता है तो देश पर शासन कौन करेगा।          
वीरेन्द्र जैन
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बुधवार, फ़रवरी 26, 2014

ऐसे गठजोड़ हताशा की निशानी हैं

ऐसे गठजोड़ हताशा की निशानी हैं
वीरेन्द्र जैन

       ताज़ा राजनीतिक घटनाक्रम में उदितराज ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली है, और अपनी पार्टी इंडियन जस्टिस पार्टी का भाजपा में विलय कर दिया है। नेताओं का अचानक दल या गठबन्धन का विपरीत ध्रुवीय परिवर्तन न केवल आश्चर्यचकित करता है अपितु लोकतंत्र से जनता की आस्थाओं को कमजोर भी करता है। यह परिवर्तन अपने मतदाताओं को बँधुआ मानने के गलत विश्वास से ही सम्भव होता है।
       उदितराज दलितवर्ग में जन्म लेने वाले एक शिक्षित युवानेता हैं जो भारतीय राजस्व सेवा को छोड़ कर राजनीति में आये हैं। पिछले दो दशकों के दौरान आरक्षण के पक्ष में अपने स्पष्ट विचारों व तर्कों के साथ अनेक टीवी बहसों में सक्रिय भागीदारी करके बुद्धिजीवी दर्शकों को प्रभावित करने वाले उदितराज अपना अलग दल गठित करके चुनावों में भागीदारी भी कर चुके हैं और विचार आधारित राजनीति की विडम्बनाओं का सामना भी कर चुके हैं। सवर्ण जातिवादियों के खिलाफ वे बाबा साहब अम्बेडकर के पद चिन्हों पर चल हजारों दलितों का धर्म परिवर्तन कराके कट्टर हिन्दुत्व और उस पर आधारित राजनीतिक सामाजिक दलों व संगठनों को चुनौती भी दे चुके हैं। चुनावी राजनीति में पिछड़ने की हताशा में उनका किसी मुख्यधारा के दल में सम्मलित हो जाना तो एक मानवीय कमजोरी मानी जा सकती थी किंतु इसके लिए उस दल में सम्मलित होना विडम्बनापूर्ण है जो अब तक उन लोगों के समर्थन से चल रहा हो जिनके खिलाफ वे अब तक लड़ते रहे हैं। स्मरणीय है कि आरक्षण की व्यवस्था भले ही संविधान के लागू होते ही प्रारम्भ हो गयी थी किंतु आरक्षित वर्ग को शिक्षित होकर उसका लाभ लेने में समय लगा जिसके बाद ही आरक्षण व्यवस्था प्रभावी हुयी थी। जब से  सभी आरक्षित पदों पर अनुसूचित जातियों जनजातियों के लोग उपलब्ध होने लगे हैं तब से ही सवर्ण वर्गों द्वारा आरक्षण का विरोध भी शुरू हो गया है। इस विरोध को सत्ता के लिए सर्वाधिक लालायित पार्टी भाजपा ने परोक्ष रूप से हवा देती रही है। मनुवाद को देश का संविधान बनाने का इरादा रखने वाली यह पार्टी आरक्षण विरोधियों को सबसे अधिक सुहाती रही थी व उनका समर्थन इसी पार्टी को मिलता रहा है। दूसरी ओर उदितराज की पहचान आरक्षण के मुखर पक्षधर के रूप में बनी है इसलिए उनका विचारों से बेमेल भाजपा में सम्मलित होना चकित करता है और चुनावी राजनेताओं की सैद्धांतिकी पर सन्देह पैदा करता है।
       उत्तर भारत में दलित समाज का सर्वाधिक जातीय समर्थन बहुजन समाज पार्टी को मिलता रहा है जिसका नेतृत्व कभी कांशीराम ने किया था और अब मायावती कर रही हैं। उदितराज ने मायावती का बहुत विरोध किया किंतु वे अपनी बेहतर बौद्धिक प्रतिभा के बाद भी उनको मिलने वाले समर्थन को अपने साथ नहीं ले सके। यही कारण रहा कि वे चुनाव परिणामों में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज़ नहीं करा सके। उनका अपना वोट बैंक बहुत मामूली है, जो भाजपा जैसे मनुवादी दल के पक्ष में नहीं ले जाया जा सकता। उनकी पार्टी में उनके अलावा कोई दूसरा समतुल्य नेतृत्व भी नहीं है इसलिए भाजपा उनको उस आरक्षित सीट का टिकिट देगी जहाँ से जीत की सम्भावनाएं सबसे कम होंगीं। इससे उसके दोनों ही हाथों में लड्डू रहेंगे।            
       सोनिया गाँधी के सक्रिय राजनीति में आने के बाद भाजपा ने ईसाई मिशनरियों पर धर्म परिवर्तन का आरोप लगाने के बहाने परोक्ष में सोनिया गाँधी पर निशाना साधना प्रारम्भ कर दिया था और उसी श्रंखला में गिरिजाघरों पर हमले और मिशनरियों की हत्याएं होने लगी थीं और आरोपियों में संघ परिवार से जुड़े लोग पहचाने गये थे। इसी दौरान उदितराज ने अटलबिहारी वाजपेयी के शासन काल में पच्चीस हजार दलितों को दिल्ली में धर्म परिवर्तन कराके बौद्ध बनाया था। भले ही सामूहिक धर्म परिवर्तन की परम्परा अम्बेडकर ने नागपुर में पाँचलाख दलितों को एक साथ बौद्ध बनाकर डाली हो पर उदितराज ने इसे आगे बढा कर बहुजन समाज पार्टी से बाजी मार ली थी क्योंकि मायावती ने लम्बे समय तक उत्तर प्रदेश में शासन करने के बाद भी ऐसा कोई प्रयास नहीं किया। उल्लेखनीय है कि उस समय उदितराज का विरोध करने वालों में विभिन्न नामों से चलने वाले संघ के संगठन ही प्रमुख थे। अब स्थिति की विडम्बना यह है कि यदि उदितराज अपने उन तेवरों को वैसे ही दबा देते हैं जैसे कि भाजपा ने एनडीए सरकार चलाते समय अपने तीनों प्रमुख मुद्दे दबा दिये थे, तो वोटबैंक विहीन उदितराज की पहचान खो जायेगी, और यदि वे अपनी पहचान बनाये रखते हैं तो भाजपा के लोगों के बीच खप नहीं सकते। पार्टी का विलय होने के कारण उसकी चल अचल सम्पत्ति पर भाजपा का अधिकार हो जाना स्वाभाविक है, किंतु बाहर निकलने का अवसर आने पर उन्हें खाली हाथ ही बाहर होना पड़ेगा।
       भले ही संवैधानिक व्यवस्थाओं के अनुसार 18% सीटें अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए आरक्षित हैं जिस कारण से भाजपा को भी समुचित संख्या में उम्मीदवार चाहिये होते हैं किंतु इतिहास गवाह है कि इस मनुवादी पार्टी ने कभी भी दलित नेताओं को मन से नहीं अपनाया। संघ प्रिय गौतम से लेकर मायावती के साथ बनी सरकारों तक का अनुभव सबको मालूम है। देखना होगा कि जरूरत पर काका बना लेने वाली इस पार्टी में उदितराज कितने दिन तक टिक पायेंगे ?
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, दिसंबर 09, 2013

मताभिव्यक्ति और मतदान, सन्दर्भ म.प्र. विधानसभा चुनाव

मताभिव्यक्ति और मतदान, सन्दर्भ म.प्र. विधानसभा चुनाव  
वीरेन्द्र जैन

      लोकतंत्र नागरिक को मत व्यक्त करने की आजादी देता है। यही आज़ादी सरकार चुनने के लिए प्रत्येक नागरिक को आम चुनाव में मत देने का अधिकार देती है। किंतु देखा गया है कि सरकार बना कर सत्ता पर अधिकार करने की वासना पालने वाले तत्व चुनावों को ऎन केन प्रकारेण प्रभावित करने के लिए नागरिकों के स्वतंत्र विचारों को दुष्प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोग मतदाता की वैचारिक स्वतंत्रता को प्रभावित कर उसे एक सौदागर बनाने के लिए प्रेरित करते हैं और इसी प्रभाव में सरल मतदाता त्वरित ठोस लाभ के लिए अपने मत चन्द रुपयों, कम्बलों, या शराब की बोतलों के बदले बेच कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पथभ्रष्ट कर देते हैं।

      गत दिनों हुये विधानसभा चुनावों में दिल्ली विधानसभा चुनाव के अंतिम दिन भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने अपनी प्रैस कांफ्रेंस में कहा कि उन्हें विश्वास है कि दिल्ली के मतदाता आम आदमी पार्टी को वोट देकर अपना वोट व्यर्थ नहीं करेगा। उनका यह कथन अलोकतांत्रिक है क्योंकि मतदान का अर्थ अपने विचार को आकार देने वाले उम्मीदवार को समर्थन देकर अपने मत की अभिव्यक्ति करना होता है। उम्मीदवार का प्रतिनिधि के रूप में चयन तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुसार अधिक मत मिलने का सहज परिणाम होता है। यदि कोई किसी खास उम्मीदवार को जीतने वाला बता कर सरल मतदाता को भ्रमित करने की कोशिश करता है तो वह लोकतांत्रिक भावना को भ्रष्ट करता है। ओपीनियन पोल या प्रीपोल सर्वेक्षण, जो कभी कभी ही संयोग से ठीक निकल आते हैं, भी इसी तरह का भ्रम पैदा कर मतदाता को भटकाने का काम करते हैं।

      उपरोक्त विधानसभा चुनावों में यदि हम नमूने के तौर पर मध्य प्रदेश का उदाहरण लें तो हम देखते हैं कि इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने गत विधानसभा चुनावों में जीती 143 सीटों की तुलना में 22 सीटें अधिक जीतकर यह संख्या 165 तक पहुँचा ली है। दूसरी ओर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सीटें पिछले चुनाव में जीती 71 सीटों से घट कर 58 तक पहुँच गयी हैं। इन चुनावों का विश्लेषण करते हुए हमारे विद्वान समीक्षक भी चुनावी जीत को ही आधार बना कर ही कांग्रेस की नीतियों की समीक्षा कर रहे हैं जबकि चुनावों में जहाँ कोई उम्मीदवार तीस हजार वोट पाकर ही चुनाव जीत जाता है जैसे मेहगाँव से भाजपा प्रत्याशी मुकेश सिंह चौधरी तो कोई अस्सी हजार वोट पाकर भी चुनाव हार जाता है, जैसे मल्हारगढ विधानसभा क्षेत्र से काँग्रेस के श्यामलाल जोकचन्द। ये आँकड़े बताते हैं कि बहुदलीय चुनावों में जीत हार से केवल सरकार बनाने का अधिकार मिलता है। उल्लेखनीय है कि प्रदेश के इन विधानसभा चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को पिछले आम चुनाव से पचास लाख वोट अधिक मिले हैं जो कुल मतदान का 39.3% हैं और 7% अधिक हैं फिर भी उसकी सीटें कम हुयी हैं क्योंकि अधिक मतदान और गैर भाजपा गैर कांग्रेस दलों के मतों में आयी जबरदस्त गिरावट के कारण भाजपा को 48.7% वोट मिले हैं जो पिछले आम चुनावों में मिले मतों से 69 लाख अधिक हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि छह लाख उन्नीस हजार वोट नोटा अर्थात उपरोक्त में से किसी को नहीं को दिये गये हैं जो कुल मतों के लगभग दो प्रतिशत हैं। यह संख्या कम से कम दस विधायकों को औसत विजयी बनाने के बराबर है। चौबीस विधान सभा क्षेत्रों में तो जीत हार का अंतर उन चुनाव क्षेत्रों में नोटा को गये वोटों से भी कम है।

      उल्लेखनीय है कि 2012 में हुये उत्तरप्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ बहुजन समाज पार्टी को गत चुनावों की तुलना में चौंतीस लाख वोट अधिक मिले थे फिर भी वे कम सीटें पाकर सत्ताच्युत हो गये थे। इसी तरह पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनावों में बाम मोर्चा भी नौ लाख वोट अधिक पाकर भी सत्ता से दूर हो गया था।  

      अधिक सीटों की जीत के धूम धड़ाके में यह बात भुला दी जा रही है कि मध्य प्रदेश के दस मंत्री चुनाव में हार गये है ये मंत्री शिवराज मंत्रिमण्डल द्वारा बहु प्रचारित विकास के आंकड़ों के प्रमुख सूत्रधार रहे हैं। इन मंत्रियों में उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं कौशल विकास, संस्कृति, जनसम्पर्क, धार्मिक न्यास और धर्मस्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, चिकित्सा शिक्षा मंत्री अनूप मिश्रा, राजस्व व पुनर्वास मंत्री करण सिंह वर्मा, किसान कल्याण एवं कृषि विकास मंत्री राम कृष्ण कुसमारिया, और इसी विभाग के राज्यमंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह, आदिमजातिऔर अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री हरि शंकर खटीक, पशु पालन, मछुआ कल्याण एवं मत्सय विभाग, पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण, नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा मंत्री अजय विश्नोई, सामान्य प्रशासन, नर्मदा घाटी विकास, और विमानन के राज्यमंत्री के.एल अग्रवाल, श्रम मंत्री जगन्नाथ सिंह, और दशरथ सिंह लोधी चुनाव हार गये हैं। लोक निर्माण मंत्री नागेन्द्र सिंह ने चुनाव लड़ने से ही इंकार कर दिया था, और वित्त, योजना, आर्थिक विकास, भोपाल गैस त्रासदी राहत एवं पुनर्वास मंत्री राघव जी की कथा तो सब को पता ही है। जीत की संख्याओं के आगे ये मंत्रिपरिषद के सदस्यों की यह पराजय शासन के बारे में कुछ संकेत देती लगती है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
वीरेन्द्र जैन                                                         
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