सोमवार, जून 07, 2021

श्रद्धांजलि व संस्मरण नरेन्द्र कोहली,

 

श्रद्धांजलि व संस्मरण

नरेन्द्र कोहली, और कम्प्यूटर की प्रेरणा 

वीरेन्द्र जैन

आजकल मैं इतना कम्प्यूटर निर्भर हो गया हूं कि पिछले दिनों हाथ से एक आवेदन लिखना पड़ा तो मैं अपनी खराब हस्तलिपि पर व्यथित हुआ, कि इतनी खराब लिपि तो मेरी तब भी नहीं थी जब मैंने लिखना सीखा था। यूनीकोड में लिखते रहने के कारण साधरण अंग्रेजी शब्दों की स्पेलिंग में भी भूल हो जाती है। मित्र और रिश्तेदार मुझे कम्प्यूटर एडिक्ट मानने लगे हैं जिस बीमारी को कोरोना लाक डाउन और कुछ अखबारों के बन्द हो जाने ने और बढा दिया है।

आज श्री नरेन्द्र कोहली के निधन का समाचार सुन कर याद आया कि इसका संक्रमण मुझे उन्हीं से मिला था।

1995 में लखनऊ में अट्टहास का कार्यक्रम था और उस कार्यक्रम में मैं आमंत्रित था। उस वर्ष का अट्टहास सम्मान श्री नरेन्द्र कोहली जी को मिलना था जिनसे प्रत्यक्ष मुलाकात पहली बार हुयी। लखनऊ के नरही स्थित सरकारी गैस्ट हाउस में सबको ठहराया गया था और मुलायम सिंह सरकार के द्वारा  सबको स्टेट गैस्ट का दर्जा मिला हुआ था, वे ही मुख्य अतिथि के रूप में आये थे। इस आयोजन में प्रेम जनमेजय, हरीश नवल, प्रदीप चौबे, आदि अनेक पूर्व परिचित मित्र थे, जिनमें से हरीश और प्रेम तो उनके छात्र रहे होने के कारण बकायदा उन्हें गुरू का दर्जा देते आये हैं। मैंने भी सोचा कि नये परिचय से ज्यादा और नई जानकारियां हासिल करना चाहिए इसलिए दूसरे मित्रों के घूमने चले जाने के बाद भी मैंने कोहली जी के साथ बैठना उचित समझा।

मैं अपनी पूरी नौकरी के दौरान इस बात का अवसर तलाशता रहा कि किसी तरह मुझे इससे मुक्ति मिले और अगर न्यूनतम जीने की सुविधाएं सुनिश्चित हो जायें तो मुक्त लेखन कर सकूं। इस प्रयास में तीन बार बैं की नौकरी छोड़ने के उप्क्रम किये किंतु वापिस बुला लिया गया। आज सोचता हूं कि जाने किस कारण से ये भूल सफल होने से बच गयी बरना आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब होती। कोहली जी ने उस मुलाकात के दौरान बताया था कि उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय की नौकरी छोड़ दी है और इन दिनों पूर्णकालिक लेखन कर रहे हैं। इसके साथ उन्होंने यह भी बताया था कि पत्नी अभी सेवा में हैं, और बच्चे शायद विदेश में हैं। इसके साथ ही सदा की तरह उन्होंने यह भी जोड़ा था कि वे हिन्दी के सर्वाधिक रायल्टी पाने वाले लेखक हैं। मैं जिस आदर्श को जीने के सपने देखता रहा था वह नमूने के तौर पर सामने बैठा था। यद्यपि बाद में मुझे उनके सुरक्षित जीवन और अपने बीच अंतर समझ में आया था किंतु उस समय तो मैं अभिभूत था। उन्होंने कहा था कि मैं लम्बे समय तक [शायद महीनों] अपने कमरे से बाहर नहीं निकलता और अपने कम्प्यूटर पर जो भी लिखता हूं उसे वहीं से पत्र पत्रिका या प्रकाशक तक भेज देता हूं। उन दिनों ई मेल का प्रयोग नहीं चला था सो उनके कथनानुसार वे फैक्स का उपयोग करते थे।

मैंने उसी दिन सोच लिया था कि मैं भी जब खुद को नौकरी से मुक्त कर सकूंगा तो पहला काम कम्प्यूटर खरीदने का ही करूंगा। उन दिनों कम्प्यूटर बहुत मंहगे थे और मैंने बिना पेंशन के विकल्प के नौकरी छोड़ दी थी इसलिए अपना सपना पूरा करने में छह साल और लग गये। बाद में जब मैंने कम्प्यूटर हासिल किया तो वो अब तक साथ साथ है भले ही मैं रायल्टी में कुछ भी नहीं कमा सका और मुफ्त सेवा करता रहा,  किंतु विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लगभग दो हजार से अधिक लेख और अन्य रचनाएं लिखीं, वेब पत्रिकाओं में लिखने वाले उन दिनों कम लोग थे इसलिए देश विदेश की वेब पत्रिकाओं में अपना नया पुराना लेखन भेजता रहता था और वह कुछ ही मिनिटों में सामने दिख जाता था जिसे देख कर खुशी मिलती थी। फिर अपने ब्लाग बनाये तथा फेसबुक आने पर उससे जुड़ा जिससे सम्पादन मुक्त अभिव्यक्ति का अवसर मिलने के कारण मुक्ति का अहसास मिला। उन दिनों सोशल मीडिया पर बहुत कम लेखक थे इसलिए रात रात भर लम्बी लम्बी बहसें भी चलीं।

बहरहाल सच यह है कि खुशी देने वाली मेरी कम्प्यूटर की आदत के बीज नरेन्द्र कोहली जी ने ही बोये थे, भले ही उनके लेखन पर कई बार मैंने कठोर टिप्पणियां भी की थीं।

उनकी प्रेरणा पर आभार व्यक्त करते हुये उनकी स्मृति को विनम्रतम श्रद्धांजलि।       

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

मो. 9425674629

 

संस्मरण / श्रद्धांजलि विजेन्द्र

 

संस्मरण / श्रद्धांजलि

विजेन्द्र जी के साथ खट्टे मीठे अनुभव रहे


वीरेन्द्र जैन

मैं पहले हिन्दुस्तान कमर्सियल बैंक में नौकरी करता था जो एक छोटा बैंक था और उसमें अधिकारियों के स्थानांतरण पूरे देश में कहीं भी हो सकते थे। साफ साफ कह्ने के कारण मेरे पांच राज्यों में पन्द्रह स्थानांतरण हुये पर कभी कोई विभागीय दण्ड नहीं मिला। इन्हीं स्थानांतर्णों में से ही एक भरतपुर [राजस्थान] भी था। और वह वर्ष थे 1977 से 1979 के बीच।

उन दिनों मैं वामपंथियों का इकलौता दैनिक अखबार ‘जनयुग’ मंगाता था जिसकी कुछ ही प्रतियां आती थीं। याद नहीं किसके साथ वे अचानक मेरे निवास पर पधारे और घर में जनयुग को देख कर बहुत खुश हुये। उस दौरान मैं अकेला ही रहता था और कम्युनिष्टों की तरह बेतरतीब सा रहन सहन था। मकान मालिक की कृपा से निवास जरूर नया और आधुनिक सा था जिस में मेरा फोल्डिंग फर्नीचर और चारपाई उस बेतरतीबी को और बढा देते थे। फिर उनसे मुलाकातों का दौर जारी रहा।

उसी दौरान आगरा में प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन में कमलेश्वर को बुलाने के नाम पर फूट पड़ चुकी थी और नये संगठन की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी जो बाद में 1982 में जनवादी लेखक संघ के रूप में प्रकट हुयी। भरतपुर में भी अलग संगठन का समर्थन करने वाले अनेक साथी थे जिनमें मेरे निकट कामरेड रामबाबू शुक्ल, अशोक सक्सेना, आदि थे। रामबाबू जी जिन्हें हम लोग मास्साब कहते थे, ने ही वहीं मुझे अनौपचारिक मार्क्सवाद का पाठ पढाया था और सव्यसाची जी से मिलवाया था। इन लोगों की विजेन्द्र जी से तीखी तकरार चलती थी। इनके बीच में मैं सिकुड़ने की कोशिश करता था। इसी दौरान कुछ घटनाएं भी हुयीं। विजेन्द्र जी की कविता धर्मयुग में छपने वाली थी जिसकी सूचना उसके पिछले अंक में ही आ जाती थी। जाने क्या संयोग हुआ कि उक्त अंक का बंडल ही भरतपुर नहीं पहुंच सका और वह अंक रास्ते या स्टेशन से ही गायब हो गया। किसी कवि का दर्द आप समझ सकते हैं। जिस कालेज में विजेन्द्र जी थी उसी में प्रसिद्ध कहानी लेखक पानू खोलिया भी रहते थे जो प्रगतिशीलों के विरोधी थे, शैलेश मटियानी के मित्र थे। अशोक सक्सेना उनके निर्देशन में शोध कर रहे थे, जो पूरा नहीं हो सका। पानू खोलिया जी ने कम लिखा लेकिन वे स्तरीय कथाकार थे। इसी दौरान विजेन्द्र जी किसी कार्यक्रम में भोपाल आये थे और लौट कर बहुत मुदित मन से बताया था कि मैं तुम्हारे मध्य प्रदेश गया था और भोपाल में एक बेहद प्रतिभाशाली युवा से मिल कर आया हूं। वह बहुत अच्छी कविताएं लिखता है। वह युवा राजेश जोशी थे। मैंने तब तक उनका नाम नहीं सुना था और ना ही कविताओं से परिचय हुआ था।

धर्मयुग में मेरी व्यंग्य कविताएं तो छपती रहती थीं किंतु उन्हीं दिनों मेरा पहला व्यंग्य लेख छपा और उसका कुछ हिस्सा ऐसा लगता था जैसे विजेन्द्र जी पर केन्द्रित हो। जब 1984 में मेरी पहली किताब छपने को जाने लगी तो सलाह के लिए उसे मित्र प्रमोद पांडेय [कमला प्रसाद जी के भाई] छतरपुर, को दिखाया तो उन्होंने बाकी के व्यंग्यों की तारीफ करते हुए, उसे कमजोर बताया तो मैंने उसे हटा दिया।

1978 के अंत में मेरा भरतपुर छूट गया और उसके साहित्यिक रिश्ते भी छूट गये। कभी कभी जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय सम्मेलनों में साथी मिलते तो पुरानी यादों पर चर्चा कर लेते। 2001 मैं स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति लेने के बाद मैंने एक पत्रिका प्रदर्शनी लगायी तो उसके लिये जब सूची खोजी तो उसमें ‘कृति’ सम्पादक विजेन्द्र का नाम आया। मैंने तुरंत अपनी याद दिलाते हुए कृति के कुछ पुराने अंक भेजने के लिए लिखा। उत्तर में उन्होंने बमुश्किल याद करते हुए लिखा कि पहले पत्रिका का मूल्य भेजें जो शायद कुल 20/- रुपये रहा होगा। यह अपरिचय व दूरी मुझे नहीं भायी और मैंने उत्तर नहीं दिया। दो एक वर्ष पहले वे फेसबुक पर जुड़े और मार्क्सवादी सौन्दर्य शास्त्र पर कुछ सारगर्भित टिप्पणियां भेजीं, जिन्हें मैंने शेयर किया। फिर वे आनी बन्द हो गयीं।

आज किन्हीं रेवती रमन ने उनके निधन का समाचार देने की उतावली में मेरे निधन की सूचना जारी कर दी किंतु फोटो उन्हीं का लगाया हुआ था इसलिए औपचारिक रूप से मरने से बच गया।

उनकी स्मृतियों को प्रणाम करते हुए, विनम्र श्रद्धांजलि।

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

     

संस्मरण / श्रद्धांजलि प्रभु जोशी

 

संस्मरण / श्रद्धांजलि



प्रभु जोशी लेखक, चिंतक, कथाकार, चित्रकार ही नहीं व्यंग्यकार भी थे।

वीरेन्द्र जैन

अंजनी चौहान, ज्ञान चतुर्वेदी और प्रभु जोशी की मित्रता जग जाहिर है, और बहुत कुछ बातें ज्ञान चतुर्वेदी द्वारा अंजनी चौहान पर लिखे संस्मरणों में आ चुकी हैं। ये लोग तीन जिस्म और एक जान की तरह थे। अंजनी तो निशिदिन व्यंग्य में ही जीते रहे भले  ही एक अर्से बाद उन्होंने कागज पर व्यंग्य लेख लिखना और छपवाना छोड़ दिया हो किंतु उनकी बातचीत में वह हमेशा ही बना रहता है।

प्रभु जोशी ने अपने लेखों में अंग्रेजी शब्दों के स्तेमाल के बिना समकालीन विषयो, राजनीति, अर्थनीति आदि पर जो लेख लिखे, वे हिन्दी के शिखरतम पत्रकारों के लिए चुनौती बन कर सामने आये कि हिन्दी शब्दावली में भी अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर लिखने की शब्द सामर्थ्य मौजूद है।

इस विषय पर फिर कभी बाद में यहाँ में याद कर रहा था कि प्रभु की आपस की बातचीत में भी व्यंग्य का वही तेवर मौजूद रहता था जो अंजनी और ज्ञान में है। नमूने के लिए मैं 23 जुलाई 1975 मुझे लिखा वह पहला पत्र प्रस्तुत कर रहा हूं जिससे उनकी व्यंग्यमयी दृष्टि और अभिव्यक्ति का पता चलता है। उल्लेखनीय है तब मैं उ.प्र. के हरदोई जिले के बेनीगंज में पदस्थ था।
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                                               5, महाकवि कालिदास मार्ग

                                                       देवास45501

प्रिय भाई,

आपका पत्र मिला। आपसे अपरिचित नहीं हूं। कविताएं व लतीफे पढे हैं।खूब पसन्द आये हैं। बम्बई गया था। पता चला था। वीरेन्द्र कुमार जैन भारती जी से शिकायत कर रहे थे। आप इस नाम को रोको या बदलवाओ। उसी दिन पता चला कि यह वीरेन्द्र कुमार जैन बूढा नहीं, जवान आदमी है।
खत पाकर खुशी ही हुई है। तिस पर म.प्र. के आदमी हो। यह जांनकर और इजाफा हो गया।

मैं देवास जिले के ही एक दूरस्थ गाँव का गंवई हूं। बचपन से इधर ही पढाई हूं। और सम्प्रति धार में सरकार ने हैड मास्टर बना दिया है। जहाँ कुल जमा आठ दिन नौकरी की। बाकी लम्बी छुट्टी लेकर लेखन करता हूं। शिक्षा के नाम पर B.Sc. की डिग्री है।

माँ बाप तीन भाई एक बहन का कुनबा है। जो यहीं किराये के मकान में पल रहा है। एक भाई बड़े, दो छोटे हैं। पिता रिटायर्ड मास्टर हैं।

इस कुनबे में बढोत्तरी में भाभी उनके दो बच्चे और छोटे की बीबी भी शामिल है। स्मरण रहे मैं कुँवारा हूं और कुंवारा बने रहना चाहता हूं। वैसे हुस्न गड़बड़ नहीं है अपना। बाकी फिर कभी। विस्तृत ब्योरा गंगा के पण्डों के पोथों में मिलेगा।

और कुछ?

अपने विषय में लिखना।

आपका

प्रभु जोशी

23 जुलाई 75

वीरेन्द्र कुमार जैन [जवान]

हिन्दुस्तान कमर्सियल बैंक

बेनीगंज

जिला हरदोई - उ.प्र.]

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 वैसे तो हम लोग पहले पत्रों में और पत्र व्यवहार प्रथा का अंत होने के बाद आयोजनों में ही लम्बे अंतराल के बाद मिलते रहे, किंतु जब भी मिलते वे उसी ऊष्मा के साथ मिलते थे। कोरोना काल में मेरे ही नहीं सबके सम्बल टूटते जा रहे हैं। प्रभु जी के निधन के बाद निःसहायता और गहरी हो गई है।

श्रद्धांजलि के अलावा देने के लिए कुछ भी नहीं बाकी बचा। 

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

मो. 9425674629


संस्मरण / श्रद्धांजलि श्याम बाबू गुप्ता [श्रीवास्तव

 

संस्मरण / श्रद्धांजलि

श्याम बाबू गुप्ता [श्रीवास्तव]


वीरेन्द्र जैन

अब कभी समय असमय नोबाइल की घंटी बजने के बाद फोन उठाने पर लम्बा अट्टहास सुनाई नहीं देगा। और ना ही फिर पूछा जायेगा कि सो तो नहीं रहे थे, या बिजी तो नहीं थे।

श्याम का जन्म दतिया में गया प्रसाद पहलवान के घर हुआ था, वे उनकी सबसे छोटी संतानों में से एक थे। उनके अनेक भाई बहिन थे। उनके जन्म के समय परिवार नियोजन का ना तो सन्देश घर घर पहुंचा था और ना ही आदेश [ इमरजैंसी जैसा]। पहलवान गया प्रसाद जी गामा पहलवान के जमाने के पहलवान थे, उनका नगर में बहुत सम्मान था। साठ - सत्तर के दशक तक वे प्रतिवर्ष कुश्ती प्रतियोगिता का आयोजन करते रहे जिसमें देश भर के पहलवान भाग लेते थे। श्याम की शिक्षा दीक्षा भी ऐसे ही हुयी थी जैसे कि उन दिनों आम तौर पर बच्चों को सरकारी स्कूल में दाखिला दिला कर संरक्षक अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते थे, उसके बाद यह बच्चे की रुचि और परिवेश पर निर्भर करता था कि वह चाहे तो पढ ले। ऐसे ही माहौल से निकल कर बच्चे बड़े बड़े पदों तक भी पहुंचे हैं और साधारण स्तर का जीवन भी जीते रहे हैं। सामंती प्रभाव वाले दतिया में किसी भी स्तर पर जीवन जीने वालों में स्वाभिमान कम नहीं रहा। श्याम को अपनी तरह से कैरियर गढने का भरपूर मौका मिला। सम्भवतः शिक्षा में उसने बी ए पास कर लिया था, वैसे इस विषय पर कभी लम्बी बात नहीं हुयी। वह भले ही हम उम्र रहा हो किंतु पढाई में मेरा समकालीन नहीं रहा।

मेरा उससे परिचय तब हुआ जब मैं एम,ए, कर रहा था और कैरियर के लिए अनिश्चित सा कुछ करना चाहता था। लेखन और पत्रकारिता के प्रति कुछ आकर्षण था किंतु यह भी समझता था कि इसके सहारे जीवन यापन नहीं किया जा सकता।

संभाग स्तर के दो तीन अखबार दतिया में आते थे जिनके हाकर्स या एजेंट्स को ही स्थानीय संवाददाता का दर्जा प्राप्त था जो जनसम्पर्क से प्राप्त न्यूज बुलेटिंस को समाचार की तरह भेज देते थे। कभी कोई स्थानीय समाचार भेजना हो तो वे किसी सक्षम व्यक्ति से लिखवाते थे। इस विषय पर लिखते समय शिवमोहन लाल श्रीवास्तव की चर्चा किये बिना बात आगे नहीं बढ सकेगी। शिवमोहन भी एक शिक्षक परिवार और लेखक पिता की संतान थे, जिन्हें उस समय के सभी बड़े लेखक जानते थे। उनके पिता ने भी लेखन के आकर्षण में सरकारी हाईस्कूल का प्राचार्य पद छोड़ दिया था और उस भूल का आजीवन प्रायश्चित सा किया था। यह परिवार भी बड़ा परिवार था और अधिकांश शिक्षा विभाग में शिक्षक के पद पर कार्यरत रहे। उनकी अध्यापक माँ ही आधा दर्जन बच्चों को जेब खर्च देती रहीं। शिव मोहन में गज़ब की महात्वाकांक्षा थी व उनके पिता ने उनके लिए जो इकलौता बड़ा काम किया, वह था कि उन्हें अंग्रेजी में लिखने बोलने में पारंगत कर दिया था। वे लगातार विभिन्न तरह की संस्थाओं, व्यक्तियों के सम्पर्क में रहे और बाद में तो भारत सोवियत मैत्री संघ के सहयोग से रूसी भाषा प्रशिक्षण के लिए मास्को गये। लौट कर वे केन्द्र सरकार के भाषा विभाग में डायरेक्टर आफीसियल लेंगवेज के पद तक भी पहुंचे। जिस दौर की मैं चर्चा कर रहा हूं, उस दौर में शिवमोहन के पास भी कोई सुनिश्चित आय वाला काम नहीं था और वे विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में किसी भी विषय, अर्थात फिल्म से लेकर विज्ञान, साहित्य आदि की पत्रकारिता कर के नाम तो कमा रहे थे किंतु समुचित नामा नहीं कमा पा रहे थे। किसी संयोग से अखबारों के हाकरों के लिए समाचार लिख देने वाला एक ग्रुप सा बन गया था जो एक अखबार के एजेंट पत्रकार अवधेश पुरोहित के खोके नुमा आफिस में बैठ कर समाचार लिखता था। इसका मेहताना यह था कि लगभग प्रति दिन हम लोग अपने नाम् को किसी ना किसी समाचार से जोड़ देते थे। कुछ ना हो तो किसी दिवंगत व्ही आई पी की शोकसभा का समाचार बना कर अथवा किसी की जन्मतिथि या पुण्यतिथि पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने का समाचार डाल देते थे। अध्यक्षता अदल बदल कर करते थे और कुछ ऐसे नाम डाल देते थे जो लड़कियों के नाम के संक्षिप्त रूप होते थे। यह कुनबा भी बढ रहा था जिसमें बाद में श्याम और अशोक खेमरिया आदि भी जुड़ गये थे। इसी क्रम में अशोक ने एक अखबार के रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन किया जिस हेतु तीन नाम देने होते थे और उस हेतु मजाक में एक नाम मैंने सुझा दिया था ‘यंग लवर्स ‘।  और यही नाम मंजूर हो गया। बाद में अशोक ने कुछ वर्ष तक यह अखबार निकाला जिससे शायद् श्याम भी जुड़ा रहा। शायद इसलिए कि मेरी बैंक में नौकरी लग गई थी और मैं दतिया से बाहर हो गया था।

चाय के ढाबों को होटल कहा जाता था और वहाँ बीस तीस लोगों के बैठने की जगह होती थी। इनमें इसी तरह के स्वयंभू साहित्यकार, पत्रकार, संगीतकार, अध्यापक, आदि लोग बैठे रहते थे और अखबार पढते रहते थे या रेडियो पर क्रिकेट की कमेंटरी सुनते थे। इन्हीं में एक हायर सेकेंड्री स्कूल के वरिष्ठ अध्यापक वंशीधर सक्सेना भी थे, जिनका लिबास, रहन सहन और व्यवहार चुटकलों वाले फिलास्फरों जैसा था, और वे थे भी। वे सुन्दर के होटल के स्थायी स्तम्भ थे। किसी भी तरह की बनावट से मुक्त वे हर उम्र के लोगों के मित्र थे। वे घर की जिम्मेवरियों से भी मुक्त थे और होटल ही उनका स्थायी पता था। खूब पढे लिखे थे और निरंतर पढते, सुनते और गुनते रहते थे। उनमें ना तो कोई अहंकार था और ना ही कोई भेदभाव या वर्जना मानते थे। उन्हें किसी भी चीज का शौक नहीं था व निस्पृह भाव से दर्शक की भूमिका में सब कुछ देखते रहते थे। बोलते तब ही थे जब उनसे बोलने के लिए कहा जाता था, जिसमें उनका अध्य्यन बोलता था। मैंने रजनीश को पढना शुरू किया तो एक ग्रुप सा बन गया जिसमें वंशीधर जी के साथ साथ श्री राम प्रसाद कटारे, और अन्य साथी भी जुड़ गये। रजनीश के हास्य योग के प्रभाव में कटारे जी ने अभिवादन का तरीका ही यह बना लिया था कि जब भी कुछ लोग मिलें तो बिना बात के खुल कर अट्टहास करें। अट्टहास की इस शैली में अन्य दर्जन भर से अधिक लोगों के साथ श्याम भी सम्मलित था।

 इसी बीच श्याम का एक लेख सरकारी पत्रिका ‘मध्यप्रदेश सन्देश ‘ में प्रकाशित हो गया और उसके उसे 35/- रुपये पारिश्रमिक के प्राप्त हुये, तो वह खुद को सम्पूर्ण पत्रकार मानने लगा। वह पेंटर भी था और उसकी नौकरी एटलस साइकिल के विज्ञापन विभाग में वाल पेंटिंग के लिए लग गयी थी जो उसे रास नहीं आई और वह कुछ दिन बाद उसे छोड़ कर दतिया लौट आया।

दतिया में कई कवि थे और गाहे बगाहे कवि गोष्ठियां होती रह्ती थीं, एक स्थायी रूप से वार्षिक कवि सम्मेलन होता था और कभी कविता प्रेमी सरकारी अधिकारी आ जाने पर एक दो और हो जाते थे। श्याम उन कवि सम्मेलनों में मुखर दाद देने वाला सैकड़ों अन्य श्रोताओं में से एक था। खराब कविता के छन्द की पैरोडी बना कर जोर से बोल देने के लिए भी वह बदनाम हो गया।

मुझे अठारह साल दतिया से बाहर गुजारने पड़े और आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश आदि दूरस्थ स्थानों में भी रहना पड़ा इसलिए मैं दतिया की गतिविधियों से कटा रहा। श्याम की शादी एक ऐसे परिवार में हुयी थी जिनके एक रिश्तेदार बहुत सम्पन्न थे। उनके अनेक पैट्रोल पम्प आदि व्यापारिक प्रतिष्ठान थे, जिन्हें संचालन के लिए वे अपने रिश्तेदारों को ही सौंपते थे। शायद उनका फार्मूला यह था कि प्रतिमाह आय में से एक निश्चित राशि चुकाने के बाद वह रिश्तेदार ही उसका मालिक कहलाता था। इन्हीं शर्तों के साथ श्याम को भी मैहर में एक पैट्रोल पम्प मिल गया था।

उसके ससुराल पक्ष के वे रिश्तेदार उपजाति ‘गुप्ता’ लिखते थे इसलिए वह वहाँ श्रीवास्तव से गुप्ता हो गया। मैहर में कई सीमेंट कम्पनियां भी हैं और अलाउद्दीन खाँ की यह नगरी शारदा माँ के मन्दिर के लिए भी मशहूर है। फिर् पैट्रोल पम्प स्वामी श्याम का पत्रकारिता का शौक उभर आया था और वह वहाँ के पत्रकारों की विरादरी में उठने बैठने लगा था। कविता के शौकीन एक प्रसिद्ध जैन डाक्टर साहब प्रतिवर्ष एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन कराते रहे थे। वे अपनी ओर से भी भरपूर मदद करते थे व मैहर स्थित मन्दिर ट्रस्ट व सीमेंट कम्पनियां भी सहयोग करती थीं इसलिए कवि सम्मेलन स्तरीय होता था। इसी के समानांतर एक और जैन साहब जो अध्यापन से जुड़े थे व जिनका परिचय आप इससे समझ सकते हैं कि वे हंस जैसी पत्रिकाओं के नियमित पाठक थे, ने अंकुर नाम से एक साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था की स्थापना की थी, जो प्रतिवर्ष एक गरिमापूर्ण कवि सम्मेलन का आयोजन करती थी। श्याम इस संस्था से जुड़ गया, उसमें पदाधिकारी भी बना और आयोजकों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया। जैन साहब के असामायिक निधन के बाद वह संस्था का अध्यक्ष भी चुन लिया गया था।

1989 में मेरा ट्रांसफर दतिया हो गया था और जब श्याम दतिया आता तब,-या फोन पर उससे बात हो जाती थी। मेरी भी कुछ कविताएं मंचों पर सुनी जाती रही थीं और मैं विभिन्न राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहा था इसलिए श्याम ने अपनी संस्था के अध्यक्ष जैन साहब को मेरा कुछ अतिरंजित परिचय दिया होगा, सो वे मुझ से मिलने को उत्सुक हुये क्योंकि कभी कभी मेरी टिप्पणियां हंस में भी छपती रहती थीं, जिन्हें वे पढते रहते थे।

आते आते 1992 आ गया जब देश में रामजन्म भूमि मन्दिर के बहाने साम्प्रदायिक वातावरण बना दिया गया था। श्याम भी इसके प्रभाव में आ गया क्योंकि उसके दतिया और कटनी दोनों जगह के परिवारों की पृष्ठभूमि संघ से जुड़ी रही थी। बाबरी मस्जिद को षड़यंत्र पूर्वक तोड़े जाने के बाद देश भर में हुए साम्प्रदायिक तनाव व मुम्बई में हुए बम विस्फोटों व दंगो के बाद मैं बहुत आहत था और मेरी कविताओं व लेखों में मेरा दर्द प्रकट हो रहा था। इन कविताओं को पढ कर श्याम ने मुझे एक पत्र लिखा जिस में उसके दुष्प्रचार से दुष्प्रभावित होने का साफ पता चलता था। उसके पत्र के उत्तर में मैंने उसे एक लम्बा जवाब लिखा जिससे उसके जाले साफ हुये। उसने वह पत्र अपनी पत्रकारों की संस्था और साहित्यिक संस्था में पढ कर सुनाया तो उन संस्थाओं के धर्मनिरपेक्ष साथी बहुत प्रभावित हुये और श्याम से कहा कि इन्हें तो मैहर बुलवाइए। मैं और ‘दैनिक दतिया प्रकाश’ के सम्पादक रमेश मोर मैहर गये, जहाँ पत्रकारों ने बहुत भावभीना स्वागत किया और एक गोष्ठी में मुझे सुना गया। बाद में तो एक सरदार जी बोले कि तुम्हारा यह दोस्त तो यहाँ दंगा कराये देता था, वह तो आपकी चिट्ठी ने इसके मानस को बदला।

इसके बाद मुझे दो बार अंकुर के वार्षिक कवि सम्मेलन में आमंत्रित किया गया जिनमें उदयप्रताप सिंह, बुद्धिनाथ मिश्र, सरिता शर्मा, अनिल खम्परिया, रमा सिंह. सुरेश उपाध्याय, बेकल उत्साही, बुद्धि नाथ मिश्र, आदि कवि आमंत्रित थे। बाद में मेरा ट्रांसफर दतिया से भोपाल हो गया और फिर वापिस दतिया, जिससे वहाँ जाना तो नहीं हो पाया, किंतु श्याम अपनी संस्था द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनों से पहले आमंत्रित कवियों के बारे में मेरी सलाह जरूर लेता रहा। संस्था की ओर से उसी सम्मेलन में प्रति वर्ष एक चर्चित कवि का सम्मान भी किया जाता था जिसमें मुकुट बिहारी सरोज, सोम ठाकुर, आदि के बाद इस वर्ष बुद्धिनाथ मिश्र का सम्मान होना था किंतु कोरोना के कारण आयोजन टल गया था।

श्याम व्यापारी नहीं था इसलिए पैट्रोल पम्प में उधारी डूब जाने के कारण उसे छोड़ना पड़ा, उसके बाद उसे दूसरा पैट्रोल पम्प दिया गया जो भी उसके नियंत्रण से बाहर हो गया। उसके ससुराल पक्ष के लोगों ने कटनी में बन रहे एक माल के निर्माण प्रबन्धन की जिम्मेवारी सौंपी जिसके लिए वह प्रतिदिन मैहर से कटनी आता जाता रहता था। वह काम पूरा होने के बाद उसने मैहर के ही एक होटल व विवाह गृह के प्रबन्धन का काम सम्हाल लिया था। यहाँ उसे केवल बैठने और शादी ब्याह के लिए बुकिंग का काम था। बैठे बैठे जब भी खाली होता तो फोन करता रहता, कभी कभी असमय भी फोन कर देता था और फिर भूल मान कर कह देता था कि अगर कोई व्यस्तता हो तो मेरा फोन ना उठाया करो मैं तो यूं ही फोन कर देता हूं।

साधारणतयः व्यक्ति अपने मन में घुमड़ रहे विचरों और तर्क वितर्को को किसी से कह कर हल्का हो जाना चाहता है और यह भी चाहता है कि जिससे वह कह रहा है, वह उसकी गोपनीयता बनाये रखे। ना जाने क्यों मैं इस काम के लिए अनेक मित्रों द्वारा पात्र समझा जाता रहा और वे अपने मन की बात मुझे सुना कर ही चैन पाते रहे। श्याम भी उनमें से एक था। पिछले दिनों उसका पारिवार बीमारियों से घिरा रहा था, बेटे को किडनी की समस्या हो गयी थी जिसके लिए उसे दिल्ली और फिर उसके बाद लखनऊ आदि जगहों पर भटकना पड़ा। जहाँ भी वह रहता था वहाँ से विस्तार से बताता रहता था। उसके रिश्तेदारों ने भी उसको हर तरह से सहयोग दिया। कुछ ही माह पहले उसने विवाह की 50वीं सालगिरह धूमधाम से मनायी थी। बाद में पिछले महीने ही यह भी सूचना दी कि पत्नी के हार्ट का आपरेशन हुआ है और ब्लाकेड के कारण स्टेंट डलवाने पड़े हैं।

कोरोना की दूसरी लहर आने के बाद मैंने वैक्सीनेशन कराया था व उसके प्रभाव में कुछ दिन अस्वस्थ रहा, तब से प्रतिदिन फुरसत मिलने पर हाल पूछने वाला नियमित व्यक्ति श्याम ही होता था। उसके फोन इस बारम्बारता के साथ आते रहते थे कि मुझे कभी उसको फोन करने की जरूरत नहीं पड़ी।

मृत्यु से दो तीन दिन पहले उसका फोन आया था कि लगता है कि मुझे कोरोना हो गया है। मैंने पूछा कि जब तुमने टैस्ट नहीं कराया तो कैसे लगता है, इस पर वह बोला कि बुखार आ रहा है। मैंने पूछा कि स्वाद गंध आ रही तो बोला हाँ वह तो आ रही है, तो मैंने अपने ज्ञान के अनुसार कहा कि फिर बुखार ही है किसी डाक्टर को दिखा कर दवा ले लो। जब उसने कहा कि एसिडिटी भी बढ गयी है तो मैंने बताया कि आयुर्वेद का अविपत्तिकर चूर्ण ने मुझे हमेशा और तुरंत आराम दिया है. तुम चाहो तो ले लो।

कभी फोन न करने वाले मैंने अगले दिन शाम को उसे फोन किया और हाल पूछा तो उसने उत्तर दिया कि अब ठीक है, अपनी आदत के विपरीत वह जल्दी फोन बन्द करना चाहता था, पर मैंने पूछा कि एसिडिटी का क्या हुआ, वह चूर्ण लिया था तो बोला कि हाँ और लाभ भी हुआ था। मैं निश्चिंत हो गया।

इस बातचीत के तीसरे दिन ही फेसबुक खोलने पर अंकुर संस्था के अध्यक्ष वीरेन्द्र सिंह की पोस्ट पढी कि श्याम बाबू गुप्ता जो मैहर में बाबूजी के नाम से जाने जाते थे नहीं रहे। विश्वास तो नहीं होना चाहिए था किंतु रोज रोज सुन रही मौतों की खबरों के बीच अविश्वास का भी कोई कारण नहीं पाया तो मैंने भी फेसबुक पर पोस्ट डाल दी। तीन दिन बाद उसी के नम्बर पर काल किया तो उसके बेटे ने विस्तार से बताया। कि रात्रि में ही उन्होंने अस्पताल ले चलने को कहा था और सुबह नहीं रहे।

आजकल अंतिम संस्कार में आने से लोग बचते हैं इसलिए घर के लोगों ने ही अंतिम संस्कार किया। जो व्यक्ति जीवन भर सार्वजनिक रहा हो उसे अंतिम समय में परिवार तक सीमित होकर जाना पड़े इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है।

अब जब भी मोबाइल की घंटी बजती है तो दूसरे ही मिनिट याद आ जाता है कि यह फोन श्याम का तो नहीं हो सकता। उसका फोन अब कभी नहीं आयेगा।

 वीरेन्द्र जैन

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रविवार, जून 06, 2021

संस्मरण /श्रद्धांजलि रामरतन अवस्थीजी मेरे पहले साहित्यिक गुरुओं में थे

 

संस्मरण /श्रद्धांजलि

रामरतन अवस्थीजी मेरे पहले साहित्यिक गुरुओं में थे


वीरेन्द्र जैन

बचपन में पिता से मिले साहित्यिक संस्कारों के बीच जब मैंने कक्षा दस में प्रवेश किया तब शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय दतिया में मेरे कक्षा अध्यापक श्री राम रतन अवस्थी जी थे। उन दिनों मेरे स्कूल में तीन अध्यापक ऐसे थे जो साहित्य पढाते ही नहीं थे अपितु साहित्यिक सम्भावनाओं को तलाश कर उन्हें संवारने का काम भी करते थे। इनमें श्री राधारमण वैद्य के अलावा शेष दो तो चर्चित कवि भी थे जिनमें अवस्थीजी के अलावा दूसरे थे श्री घनश्याम कश्यप जो अध्यापकों के प्रतिनिधि के रूप में एक ग्रुप में विदेश यात्रा भी कर चुके थे।

यह 1962-63 का वर्ष था जब चीन के साथ हुये सीमा संघर्ष के कारण पूरे देश में भावनात्मक उबाल आया हुआ था और जिसकी सबसे मुखर अभिव्यक्ति ह्न्दी कविता के मंचों पर हो रही थी। उन्हीं दिनों मध्य प्रदेश सरकार की ओर से भी जगह जगह कवि सम्मेलन आयोजित करवाये जा रहे थे। दतिया में प्रतिवर्ष एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन की परम्परा थी जिसमें, नीरज, सोम ठाकुर, मुकुट बिहारी सरोज, आनन्द मिश्र, गोपाल सिंह नेपाली, भवानी प्रसाद मिश्र,  काका हाथरसी, बालकवि बैरागी, रमानाथ अवस्थी, रामानन्द दोषी, तन्मय बुखारिया, देवराज दिनेश जैसे लोगों के अलावा क्षेत्रीय और स्थानीय वासुदेव गोस्वामी, चतुरेश, आदि कवियों को मैंने इसी सम्मेलन के दौरान देखा और सुना था। मैं इस बात को गर्व के साथ बताता था कि इस कवि सम्मेलन का संचालन मेरे क्लास टीचर अवस्थीजी किया करते हैं। इसी वर्ष में मैं अपनी कक्षा से कक्षा प्रतिनिधि चुना गया था, जिससे मेरा सम्पर्क उनसे बढ गया था। इसी दौरान स्कूल के वार्षिक फंकशन के दौरान तात्कालिक भाषण प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ था जिसके निर्णायक भी श्री अवस्थीजी और वैद्यजी थे।

औसत से कुछ अधिक लम्बाई वाले अवस्थीजी तन कर और तीव्र गति से चलते थे। कवि गोष्ठियों में उनके गीतों को जिस ध्यान से सुना जाता था उससे उनके साहित्यिक कद का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं था। उनके गीतों में जो पूर्णता होती थी वही बात उनके पाठ में भी होती थी। यही कारण है कि मुझे आज भी उनके गीतों के मुखड़े और कुछ अंश याद हैं जैसे यह गीत-

सौ सौ दीप जलाये इस धरती के प्रांगण पर

फिर भी तम की गहराई का अंत नहीं निकला

सोचा था शायद अवनी की तपन शमन होगी

इसीलिए नीलाम्बर ने शबनम बरसाई थी

और शूल की पीर अरे शायद मिट जायेगी

इसीलिए उस पादप पर कलिका मुस्काई थी

मधुर मिलन को बाँहों की सीमा में बाँध लिया

फिर भी विरहानिल से व्याप्त दिगंत नहीं बदला

सौ सौ दीप ............................. 

कवि सम्मेलन के अवसर पर नीरज समेत अन्य कवियों को देखने की उत्सुकता बनी रहती थी और हम किशोर किसी तरह तय समय से पूर्व पहुंच कर दूसरों को यह बताने का गौरव प्राप्त करना चाहते थे कि कौन कौन आ चुका है या मैं किस किस को पहचानता हूं। उस दिन अवस्थीजी का उत्साह भी देखते बनता था। नीरज जी एक खास तरह का कालरदार कुर्ता पहिनते थे , जिसके बटन गले से ठीक नीचे नहीं अपितु दाहिने तरफ होते थे। फुर्तीले अवस्थीजी भी उस दिन वैसा ही कुर्ता पहिन कर आते थे।

फिर 1965-66 में उनका स्थानांतरण या प्रमोशन नौगाँव हो गया, और वे दतिया छोड़ गये। 1971 में मेरी नियुक्ति हरपालपुर में हो गयी। तब तक मुझे लिखने का चस्का लग चुका था और मेरी रचनाएं कुछ राष्ट्रीय पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। उन दिनों हिन्दी की राष्ट्रीय पत्रिकाएं सीमित संख्या में ही प्रकाशित होती थीं, उससे उनमें प्रकाशित रचनाकारों के नाम को दूर तक पहुंचने में मदद मिलती थी, भले ही उन्हें इसका आभास ना हो। हरपालपुर में भी प्रतिवर्ष एक कवि सम्मेलन आयोजित होता था और उसमें मुझे भी आमंत्रित किया जाता था। एक वर्ष कुछ ज्यादा ध्यान से सुन लिया गया तो मेरी ख्याति कुछ और आगे बढी व बढ कर नौगाँव तक पहुंच गयी। मुझे पता नहीं था कि वहाँ के कवि सम्मेलन का संचालन भी अवस्थीजी ही करते हैं। उनका आमंत्रण मिला और मैंने आदेश का पालन किया। अपने नगर से बाहर कविता पाठ का मेरा वह पहला कवि सम्मेलन था। पहले स्कूल में मिले पुरस्कार के बाद जिस पहले कवि सम्मेलन में मुझे कविता पाठ के लिए पारश्रमिक मिला उसका श्रेय भी अवस्थीजी को ही जाता है। इसके बाद तो जब तक मैं हरपालपुर में रहा, मुझे छतरपुर, टीकमगढ, महोबा आदि आसपास के कवि सम्मेलनों के निमंत्रण भी मिलते रहे। इसी भरोसे मैं इस दुस्साहसी विचार तक भी पहुंचने लगा था कि अगर मंच से आय होने लगे तो मैं नौकरी ना करने की अपनी दबी हुयी इच्छा पूरी कर लूं। वह तो विवेक ने समय पर साथ दिया और मैंने यह अतिवादी कदम नहीं उठाया।

प्रारम्भ में मेरी नौकरी एक छोटे बैंक में थी जिसमें अधिकारियों के स्थानांतरण अखिल भारतीय स्तर पर होते थे। इस नौकरी और मेरे कबीर स्वभाव ने मुझे बहुत भटकाया व मेरे स्थानांतरण पाँच राज्यों के पन्द्रह स्थानों में हुये। हर बार मैं अपने सभी परिचितों को पत्र लिख कर अपने ट्रांसफर और पता बदलने की सूचना देता था। सौ से अधिक की इस सूची में आदरणीय अवस्थीजी का नाम भी रहता था।

1989 से दूषित राजनीति के दुष्प्रभाव के चलते देश भर में जो विषाक्त वातावरण बनता जा रहा था उसने मुझे बहुत उद्वेलित कर दिया था। प्रतिवर्ष नववर्ष के ग्रीटिंग कार्ड के रूप में मैं कुछ काव्य पंक्तियां लिख कर छपवा कर सभी मित्रों, सम्पादकों, आदि को भेजता था, जो साम्प्रदायिक विषाक्तता के खिलाफ होती थीं। इससे जो फीडबैक मिलता था उससे मुझे पता चलता था कि दूसरे भी क्या सोच रहे हैं। मुझे खुशी होती थी जब उन पंक्तियों के लिए मुझे अवस्थीजी का आशीर्वाद मिलता रहता था। यह सिलसिला सन 2001 तक चला। उन्होंने अपनी प्रकाशित कविता पुस्तक भी मुझे भेजी। जब वे फेसबुक से जुड़े तो फेसबुक पर उनसे सम्वाद करने के अवसर निरंतर मिलते रहे। 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद तोड़ कर जो वातावरण बनाया गया था तब नववर्ष 1993 के अवसर पर भी मैंने कार्ड भेजा था, उसके उत्तर में 11 जनवरी 1993 का उनका जो लम्बा पत्र पन्ना से मिला था उसके कुछ अंश इस प्रकार हैं-

“................... यह जानकर अभिभूत हूं कि आप जैसे विज्ञ स्वजन, एक अंतराल के पश्चात भी मुझे मन के किसी कोने में स्थान दिये हैं। जिन्दा रहने के लिए इतनी खुशफहमी का टानिक पर्याप्त है। नूतन वर्ष पर अग्रज होने के नाते आपके लिए सुखद, समृद्ध, और समुन्नत भविष्य की परमप्रभु से कामना करता हूं।

यह जानकर और खुशी हुई कि आपका साहित्यकार, गतिशील है, अन्यथा मुझ जैसे तथाकथित साहित्यसेवियों को तो हालातों और सवालातों के भँवर में उलझकर अपनापा भूल जाते हैं। आपकी यह पंक्तियां बड़ी सार्थक और जीवंत लगीं;-

एक मन्दिर से बड़ा है आदमी

एक मस्जिद से बड़ा है आदमी ....

बधाई हो इन पंक्तियों के लिए। आप साहित्यसेवा में इसी तरह निरत रहें- यही मेरी कामना है ।

आज के हालातों पर मैंने भी कुछ मुक्तक लिखे थे जिनमें से एक इस तरह है-

सोये दानव को जगाया- ये क्या किया तुमने

हँसते मानव को रुलाया- ये क्या किया तुमने

बीते कल तक तो रहे थे आदमी की तरह

भेड़िया उनको बनाया – ये क्या किया तुमने

उनका निधन कोरोना काल में पटना में हुआ। उसी दौरान अन्य चर्चित लेखकों का निधन भी हुआ। फेसबुक पर श्रद्धान्जलि देने का एक दोष मुझे यह दिखायी दिया कि लेखकों के सभी मित्र, पाठक या प्रशंसक गूगल से फोटो डाउनलोड करके एक जैसे जीवन परिचय दे कर अपना सम्बन्ध प्रकट करना चाहते हैं, इससे एक घटाटोप छा जाता है और सम्वेदनाओं की गहराई कम होती जाती है। इसलिए ऐसे अवसरों पर मैं संगठनों द्वारा व्यक्ति श्रद्धांजलि के साथ ही होता हूं। यही कारण रहा कि मैं उन्हें विलम्ब से याद कर सका।

 दिल की पूरी गहराइयों से उन्हें श्रद्धांजलि। वन्दनाजी [वन्दना अवस्थी दुबे]  उनकी सभी बहिनों और माँ जी को नमन।  

    वीरेन्द्र जैन

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