धर्मवीर भारती लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
धर्मवीर भारती लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, जून 28, 2021

धर्मवीर भारती – संस्मरण धर्मवीर भारती- साहित्य के कुम्भकार थे

 

धर्मवीर भारती – संस्मरण

धर्मवीर भारती- साहित्य के कुम्भकार थे

वीरेन्द्र जैन

[ आज एक व्हाट’स एप्प ग्रुप ‘व्यंग्यकार’ में शरदजोशी का एक भाषण सुना जो उन्होंने धर्मवीर भारती के सम्मान में आयोजित एक समारोह में दिया था। इससे मुझे लगभग 25 वर्ष पहले लिखा अपना एक लेख याद आ गया जो ‘हैदराबाद समाचार’ [नया नाम दक्षिण् समाचार] में 15 अक्टूबर 1997 में प्रकाशित हुआ था। मैं तो इसे भूल ही गया था किंतु बेहद प्रतिभाशाली लेखक स्वामी वाहिद काज़मी [ अम्बाला] ने 2004 में याद दिला कर इसे मांग लिया था जिससे मुझे यह आत्म संतोष मिला था कि लिखा हुआ कहीं न कहीं दर्ज होता है। पता नहीं वाहिद काज़मी अब कहाँ हैं, लगभग एक दशक से उनसे सम्पर्क नहीं हुआ। वे फोन का स्तेमाल नहीं करते थे और पत्रों का उत्तर भी नहीं दे रहे। किसी को पता हो तो सूचना देने की कृपा करें। ]

-------------------------------------------------------------

जब भारतीजी धर्मयुग के सम्पादक थे, उस दौरान मुझसे कई बार किशोरों ने पूछा था कि क्या इस पत्रिका का नाम इसीलिए ‘धर्मयुग’ है, क्योंकि इसके सम्पादक धर्मवीर भरती हैं। हर बार मेरा उत्तर नकार में होता था, पर हर बार ऐसा लगता था कि मेरे नकार में ज्यादा दम नहीं है। भले ही तथ्य के रूप में मेरी बात सही हो, पर ‘धर्मयुग’ ने भारतीजी के कार्यकाल से भारतीजी के कार्यकाल तक ही अपने को शिखर पर बनाये रखा और उनके जाने के बाद उसका क्रमशः उतार प्रारम्भ हुआ, जो उसे बन्द होने तक ले गया।

सन 1972 के होली अंक के लिए नये रचनाकारों से रचनाएं आमंत्रित की गयीं थीं और कुल प्रप्त लगभग 3100 रचनाओं में से धर्मयुग ने चौदह-पन्द्रह रचनाओं का चुनाव किया था। इन रचनाकारों में सूर्यबाला, प्रभु जोशी, सुरेश नीरव, आदि के साथ मेरा भी नाम सम्मलित था। [ तब मेरा नाम पूरा था अर्थात वीरेन्द्र कुमार जैन ] मेरी व्यंग्य रचना के चुनाव के बाद ही धर्मयुग ने इति नहीं कर दी, अपितु पत्र भेज भेज कर रचनाएं आमंत्रित कीं, ये पत्र मुझ जैसे नये रचनाकार के लिए किसी पुरस्कार से कम महत्व के नहीं थे। इसलिए मैंने भी अपना सम्पूर्ण श्रम और प्रतिभा का स्तेमाल करते हुए धर्मयुग की अपेक्षाओं को पूरा करने का प्रयास किया व मेरी रचनाएं उसी गर्मजोशी के साथ प्रकाशित भी हुईं। संयोग से मेरे हमनाम वरिष्ठ साहित्यकार श्री वीरेन्द्र कुमार जैन को ऐसा लगा कि हास्य-व्यंग्य हल्के स्तर की रचनाएं हैं और समकालीन साहित्यकारों को यह गलतफहमी हो सकती है कि वे हास्य-व्यंग भी लिखने लगे हैं। वे वरिष्ठ और आदरणीय थे और भारतीजी से पहले उनका नाम भी धर्मयुग सम्पादक के रूप में प्रस्तावित था। उनके इस प्रस्ताव का भारतीजी को भी बुरा लगा कि मेरे नाम की रचनाओं का प्रकाशन बंद कर दिया जाए। उन्होंने विनम्रता पूर्वक कहा कि मैं इस नाम का प्रकाशन बन्द कर दूंगा पर आप मुझे विश्वास दिला दीजिए कि उसके बाद कोई व्यक्ति वीरेन्द्र कुमार जैन नाम नहीं रखेगा, और रखेगा तो लिखेगा नहीं। और फिर मैं धर्मयुग में ही तो रोक सकूंगा पर आप कौन कौन सी पत्रिकाओं को रोक सकेंगे।

वे निरुत्तर होकर चले गये पर उन्होंने अपने प्रयासों में कमी नहीं आने दी। उन दिनों वे महावीर स्वामी पर अपना उपन्यास ‘अनुत्तर योगी’  लिख रहे थे और धर्मयुग आदि के मालिकों में से एक श्री श्रेयांस प्रसाद जैन को अपना लिखा हुआ सुनाने जाते थे क्योंकि श्रेयांस प्रसाद जी ने उन दिनों आँखों का आपरेशन कराया हुआ था और वे कुछ पढ नहीं पाते थे। इस स्थिति का लाभ लेते हुए जब उन्होंने दबाव बनाया तो भारतीजी को कहना पड़ा कि मैं इसे रोकूंगा तो नहीं पर इसके नाम में कुछ परिवर्तन का प्रयास करूंगा। भारती जी के सुझाव अनुसार मेरे नाम के साथ मेरे नगर का नाम भी धर्मयुग में लिखा जाने लगा। यह प्रयोग धर्मयुग के लिए सर्वथा नया था। इससे मेरी भी पूरे देश में एक अलग पहचान बन गयी थी।

‘धर्मयुग’ भले ही साहित्य-प्रधान पत्रिका रही हो पर वह मध्यमवर्गीय हिन्दी भाषी परिवारों की इकलौती साप्ताहिक पत्रिका का दर्जा पा सकी जिसकी पाँच लाख प्रतियां तक प्रकाशित हुईं।  उसमें समकालीन राजनैतिक, सामाजिक घटनाओं से लेकर महिलाओं, बच्चों, फिल्मों आदि सभी के बारे में इतनी संतुलित और विश्वसनीय सामग्री प्रकाशित होती थी कि आज अनेक लोगों के पास उनके कई वर्षों के अंक संकलित हैं।

हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास में चमकने वाले अनेकानेक सम्पादक धर्मयुग से ही निकले हैं। इनमें सुरेन्द्र प्रताप सिंह, राजकिशोर, योगेन्द्र कुमार लल्ला, हरिवंश, सुदीप. शीला झुनझुनवाला, कन्हैयालाल नन्दन, आदि अनगिनित नाम हैं और रचनाकारों का तो कोई अंत ही नहीं है।

भारतीजी का अनुशासन बहुत कठोर था। वे किसी से भी ‘धर्मयुग’ कार्यालय में नियत समय के अलावा नहीं मिलते थे और अपने स्टाफ से भे याही अपेक्षा रखते थे। रचनाओं का अंतिम चुनाव वे स्वयं  करते थे और प्रतिभा को पूरा महत्व देते थे। साहित्य की राजनीति वे इतने खूबसूरत तरीके से करते थे कि उनके ऊपर सीधे सीधे कोई उंगली नहीं उठ सकती थी। यहाँ तक कि वे सम्पादकीय भी नहीं लिखते थे।

साहित्य के लिए पूरा जीवन समर्पित कर देने वाले व प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने के लिए वे सदैव याद किये जायेंगे।

============================================================

[शरद जोशी का भाषण सुनते समय उक्त लेख में अप्रकाशित रह गई एक घटना याद आयी। 1975 में मैं कुछ दिनों के लिए मुम्बई में था और एक दिन धर्मयुग कार्यालय में गया तो सरल जी आदि से मिल कर जब आने लगा तो पाठक जी जो कार्यालय का प्रबन्धन देखते थे, ने कहा कि भारती जी से मिल कर जाना, उन्होंने पिछले दिनों तुम्हें पत्र लिखवाया था शायद मिला नहीं होगा। भारती जी एक बजे से पहले किसी से नहीं मिलते थे और मिलने वालों में एक महिला भी प्रतीक्षा रत थीं जो मुझ से पहले से बैठी थीं। भारती जी ने पहले मुझे बुलवा लिया तो वे बाहर स्टाफ से असंतोष के साथ पूछने लगीं कि ये कौन थे और इन्हें क्यों बुलवा लिया। जब लगभग 15 मिनिट बाद में बाहर आया तब उनका नम्बर आया। बाहर मुझे बताया गया कि वे उभरती हुयी फिल्मी कलाकार सविता बजाज थीं जो सहयोगी भूमिकाओं के साथ साथ धर्मयुग में फिल्मों पर लिखती भी थीं। उस दिन भारती जी ने नाम परिवर्तन के बारे में तो विस्तार से बताया ही था, साथ में याद किया कि उनके एक मित्र श्री बाबूलाल गोस्वामी दतिया में वे कैसे हैं? मैंने जब गोस्वामी जी को पत्र लिख कर बताया तो उनका भारती जी से सम्वाद स्थापित हुआ व उन्होंने एक खोजपूर्ण ऐतिहासिक लेख उनसे लिखवाकर धर्मयुग में प्रकाशित किया था। ]

बुधवार, सितंबर 04, 2019

संस्मरण धर्मवीर भारती, पुष्पा भारती, कनु प्रिया


संस्मरण
धर्मवीर भारती, पुष्पा भारती, कनु प्रिया

Image result for pushpa bharati

वीरेन्द्र जैन
गत दिनों भारत भवन में इला अरुण, के के रैना द्वारा परिकल्पित और निर्देशित नाटक ‘शब्द लीला’ के मंचन का समाचार पढने को मिला। पिछले कुछ वर्षों में भारत भवन में आमंत्रण भेजे जाने वाली सूची में संशोधन किया गया था और गत दो दशक की परम्परा को तोड़ते हुए मुझ जैसे लोगों को आमंत्रण भेजना बन्द कर दिया गया था, इनमें म.प्र. प्रगतिशील लेखक संघ के प्रदेश अध्यक्ष व ऎतिहासिक वसुधा पत्रिका के सम्पादक राजेन्द्र शर्मा भी सम्मलित हैं। यदि समय पर सूचना मिल गयी होती तो इसे देखने मैं अवश्य ही गया होता।
मेरी रुचि का कारण इसका विषय है। यह नाटक धर्मवीर भारती की प्रसिद्ध रचना ‘कनु प्रिया’ पर आधारित बताया गया है जिसके बाद में ‘अन्धायुग’ का मंचन भी किया गया था। कहा जाता है कि ‘कनु प्रिया’ रचने की प्रेरणा भारती जी को अपने निजी जीवन में उठे द्वन्द और उसे हल करने के प्रयासों से प्राप्त जीवन अनुभवों से मिली। वे इलाहाबाद विश्व विद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक थे और पुष्पा भारती उनकी कक्षा की सबसे सुन्दर लड़कियों में से एक थीं। पूर्व से विवाहित भारती जी को उनके रूप और इस आकर्षण को मिले प्रतिदान ने द्वन्द में डाल दिया था। उन दिनों इलाहाबाद हिन्दी साहित्य की राजधानी थी जहाँ भारती जी के अलावा निराला, फिराक गोरखपुरी, हरिवंशराय बच्चन, सुमित्रा नन्दन पंत, महादेवी वर्मा, उपेन्द्र नाथ अश्क, भैरव प्रसाद, मार्कण्डेय, कमलेशवर, दुष्यंत कुमार त्यागी, ज्ञानरंजन, रवीन्द्रनाथ त्यागी आदि आदि लोग सक्रिय थे। अपनी प्रेमिका छात्रा पुष्पा भारती से विवाह करने के विचार पर नैतिकतावादी भारती गहरे द्वन्द से घिरे रहे पर अंततः उनका प्रेम जीता और उन्होंने पुष्पा जी से विवाह कर लिया।
एक बार धर्मयुग में उन्होंने लोहिया जी पर एक संस्मरणात्मक लेख लिखा। इस लेख में उन्होंने लिखा था कि अपने दूसरे विवाह के सम्बन्ध में उन्होंने लगभग समस्त परिचितों और आदरणीयों से सलाह चाही थी किंतु किसी ने भी खुल कर मेरा समर्थन नहीं किया था। किंतु जब उन्होंने लोहिया जी से सलाह मांगी तब उनकी सहमति ने उन्हें बल दिया था और वे निष्कर्ष पर पहुँचे थे। जैसा कि मैं पहले भी एक संस्मरण में जिक्र कर चुका हूं कि जब पुष्पा भारती जी भोपाल आयीं थीं, और दुष्यंत संग्रहालय में मुझे उनसे बातचीत का अवसर मिला था तो मैंने उनसे भारती जी की राजनीति के बारे में जानना चाहा था। उनका उत्तर था कि भारतीजी किसी राजनीति विशेष से जुड़े हुए नहीं थे और उनके घर पर तो हर तरह की राजनीति के लोग आते थे। इस पर मैंने कुरेदते हुए लोहिया जी से उनके सम्बन्धों के बारे में जनना चाहा तो उन्होंने एक संस्मरण सुनाया।
“भारतीजी तब मुम्बई [तब की बम्बई] आ चुके थे। लोहिया जी मुम्बई आये हुये थे और रेलवे स्टेशन के रिटायरिंग रूम में रुके हुये थे। हम दोनों उनसे मिलने गये और भारती जी ने मेरा परिचय कराया तो उन्होंने छूटते ही कहा चीज तो बहुत अच्छी है। यह सुन कर मुझे आग लग गयी। जब भारतीजी ने बाहर ले जाकर मुझसे पूछा कि क्या आज शाम इन्हें खाने पर बुला लें तो मैंने साफ मना कर दिया कि इस आदमी को तो मैं कतई खाना नहीं खिला सकती। फिर भारतीजी ने कभी ऎसा प्रस्ताव नहीं किया।“
इस पर जब मैंने पुष्पाजी को धर्मयुग में लिखे भारतीजी के संस्मरण के बारे में बताते हुए यह भी बताया कि आपसे शादी का अंतिम निर्णय लोहिया जी की सलाह के बाद ही हुआ था तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ, क्योंकि उन्हें यह बात पता ही नहीं थी। वे बोलीं, तो ये बात थी। शायद उन्हें अफसोस हुआ हो।
भारतीजी की पहली पत्नी का नाम कांता था जिसे समाचार में भूल से कामता लिख दिया गया है। उन्होंने ‘रेत पर तड़फती हुयी मछली’ नाम से एक उपन्यासनुमा रचना लिखी है। इस कृति के बारे में कहा जाता है कि वह उनकी आत्मकथा है। भारतीजी से द्वेष रखने वाले किसी विश्वविद्यालय के चयनकर्ताओं ने उसे कभी कोर्स में भी लगा दिया था। कांता जी की एक लड़की भी थी जो काफी समय तक मुम्बई में रही।
भारतीजी जितने अच्छे साहित्यकार थे उतने ही अच्छे सम्पादक भी थे। मैं यह बात निजी अनुभव से कह सकता हूं कि उन्होंने देश भर में हजारों लेखकों को मांजा है, संवारा है, और पहचान दी है। छोटी छोटी पर्चियों पर लिखी उनकी संक्षिप्त टिप्पणियां आज भी मेरी धरोहर हैं।
इसी मुलाकात में पुष्पाजी ने एक और संस्मरण साझा किया था जो उन्हें लता मंगेशकर ने फोन करके बताया था। एक बार लताजी पुणे से लौट रही थीं कि दो लड़कियां लिफ्ट मांगने का इशारा करते हुयीं दिखीं तो उन्होंने ड्राइवर से उन्हें बैठा लेने को कहा। ड्राइवर ने बेमन से आदेश का पालन किया। लताजी उन लड़कियों से उनके बारे में पूछ ही रही थीं कि ड्राइवर ने सीडी प्लेयर चालू कर दिया जिसमें लताजी का ही गीत आ रहा था। उन लड़्कियों ने उन्हें रोकते हुए कहा कि रुकिए, लताजी का गीत आ रहा है। गीत समाप्त होने के बाद उन्होंने पूछा कि क्या तुम लोगों को लताजी पसन्द हैं? उत्तर में उन्होंने कहा कि वे तो हमारे लिए भगवान हैं। लताजी ने पूछा कि अगर तुम्हें लताजी से मिलवा दें तो? उन लड़कियों ने ऐसा भाव प्रकट किया कि यह तो सम्भव ही नहीं है। तब लताजी न कहा कि मैं ही लता मंगेशकर हूं तो दोनों ने इसे सबसे बड़ा चुटकला सुन लेने के अन्दाज़ में खुले मुँह पर चार उंगलियां रख कर उपहास भाव प्रकट किया। लता जी ने उनके विश्वास को तोड़ने की कोशिश न करते हुए ड्राइवर से कहा कि मुझे घर छोड़ते हुए इन्हें इनके गंतव्य तक पहुंचा देना। ड्राइवर ने जब उनके घर पर छोड़ा, जिसके बारे में वे लड़कियां शायद पहले से जानती होंगीं, तो उनकी हालत देखने लायक थी।
राजीव गाँधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद हिन्दी में सबसे पहला साक्षात्कार पुष्पा भारती को ही दिया था। इसकी व्यवस्था तत्कालीन सांसद अमिताभ बच्चन ने की थी जो उन्हें बड़ी बहिन मानते रहे हैं। स्मरणीय है कि अमिताभ की शादी के समय उन्होंने इसी भूमिका का निर्वाह किया था। अपने समय की बहुचर्चित पुष्पाजी मुम्बई में ही रहती हैं। कामना है वे स्वस्थ रहें और उम्रदराज हों।   
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023 मो. 09425674629