स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी सेनानी मौलाना
बरकतुल्लाह भोपाली
वीरेंद्र जैन
मुसलमानों से नफरत बढाने हेतु नगरों ,
सड़कों, आदि
के नाम बदल कर व मुगलकालीन इमारतों का
इतिहास विकृत करने के क्रम में गत दिनों मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ने एक बहुत
बेहूदा फैसला लिया, वह था भोपाल के बरकतुल्ला
विश्वविद्यालय का नाम बदलने का। विश्व प्रसिद्ध नेहरू और गांधी के योगदान को कम
करने, उनकी छवि खराब करने के साथ ऐसा करना उनहें और सरल लगा क्योंकि
स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में भी मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली को वह स्थान नहीं
दिया गया जिसके वे हकदार थे
।
गांधेजी से दस और नेहरू
जी से तीस वर्ष बड़े बरकतुल्लाह का जन्म 1859 में भोपाल में हुआ था जहाँ उन्होंने
सुल्तानिया ओरंटिल कालेज [दारुल उलूम] धर्म और दर्शन शास्त्र में प्रवीणता हासिल
की। उच्च शिक्सा के लिए 1883 में बम्बई,और 1890 में लंदन गये। लंदन मं ही उन्हें अपने देश
को गुलामी से मुक्त कराने की प्रेरणा मिली। वहीं रहते हुए वे ब्रिटिश समाचार
पत्रों में लिखने लगे और लोकप्रियता हासिल की। इसी लोकप्रियता से घबरा कर ब्रिटिश
सरकार ने उनकी गतिविधियों को प्रतिबंधित करना शुरू दिया। इसी के विरोध में मुस्लिम
इंस्टीट्यूट आफ लिवरपूल ने उन्हें अपने पास बुला लिया। इस धार्मिक संस्था में
तुर्की, ईरानी, अफ्रीकी विद्वान व आमजन भी शामिल थे। लिवरपूल पहुंच
कर उनके लेखन और लोकप्रियता ने नई ऊंचाइयां छुयीं। उनके कार्यक्षेत्र में विस्तार
हुआ। संस्था की पत्रिका ' दि कंसेंट एवं इस्लामिक वर्ल्ड' में
प्रकाशित उनके लेखों से दुनिया का परिचय हुआ और हिंदुस्तान के लोगों को भी उनके
लंदन में होने की सूचना मिली। लिवरपूल यूंर्र्वर्सिटी ने उन्हें ओरियंटल कालेज में
अरबी के प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति दे दी। मुल्क की गुलामी और उसकी आज़ादी की
बात करने के लिए उन्होंने इस मंच का बेहतर स्तेमाल किया। देश के लोगों के
आर्थिक और बौद्धिक शोषण की सच्चाई को वे
विदेशियों को समझाने में सफल हो गये। एक पत्र में उन्होंने लिखा था कि पिछले दस
वर्षों में लगभग दो करोड़ लोग भूख और फाके से मर चुके हैं। ब्रिटिश हुकूमत ने भारत
के उद्योगों को नष्ट कर दिया है। यह वह दौर था जब पूर्ब के देशों में बसने वालों
को आर्थिक मूल्यों की जानकारी बहुत कम थी और कम्युनिस्म का दर्शन भी आम लोगों तक
नहीं पहुंच सका था।
विद्वान मौलाना बरकतुल्लाह को उर्दू, फारसी,, अंग्रेजी, तुर्की, जर्मन, रूसी, और
जापानी भाषाएं आती थीं।
उनकी दृष्टि में आज़ाद मुल्क के भूगोल और राजनीति की साफ
परिकल्पना थी इसलिए देश को अंग्रेजी साम्राज्यवाद से मुक्त कराने के लिए उन्होंने
दुनिया भर के अन्य देशों की और यात्राएं कीं । पहले तो उन्होंने दुनिया के इतिहास
आदि का विस्तृत अध्यन किया और इसी के दौरान वे अनेक क्रांतिकारियों के सम्पर्क में
आये। आज़ादी के इस संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने खुद को विवाह बंधन से मुक्त
रखा और आजीवन अविवाहित रहे।
1907 में उन्होंने केलीफोर्निया की विशाल सभा में इंडियन
एसोसिएशन आफ पेसिफिक फोरम की स्थापना की। अपने लक्ष्य को पाने के लिए वे निरंतर
न्यूयार्क, जर्मनी,
लंदन, जापान, तुर्की, अफगानिस्तान
आदि का भ्रमण करते रहे जिसके परिणाम स्वरूप 1913 में उन्होंने राजा महेंद्र प्रताप
सिंह के साथ गदर पार्टी का गठन किया। युवकों को स्वतंत्रता का महत्व समझाते हुए
उन्होंने ' इंडिया होम रूल सोसाइटी' बनायी
1914 में अखबार गदर ने हिंदुस्तानियों को हिंदुस्तान वापिस जाकर अंग्रेजों के
खिलाफ दहशत फैलाने का आवाहन किया जिससे वे भागने को मजबूर हो जायें। एक जनवरी 1915
को उन्होंने अफगानिस्तन की राजधानी में काबुल में काजी अब्दुर्रजाक खान के मकान पर
भारत की अंतरिम सरकार की स्थापना की जिसमें राजा महेंद्र प्रताप सिंह राष्ट्रपति
और मौलाना बरकतुल्लाह खान प्रधानमंत्री बनाये गये थे। उन्होंने स्वाधीनता के लिए
दो मिशन, एक रूप और एक जापान भेजने का फैसला लिया था। 1922
में वे ब्रुसेल्स गये व 1927 की बर्लिन की कांफ्रेस में उनकी मुलाकात जवाहरलाल
नेहरू से हुयी जो उनके विचारों से काफी प्रभावित हुये। 27 सितम्बर 1927 को
सेंनफ्रांसिस्को में उनकी मृत्यु हो गयी। । वे कह्ते थे कि उनकी तनख्वाह मौत, इनाम
शहादत और पेंशन आज़ादी है। यही पाने के लिए उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी कुर्बान कर
दी।
केंद्र सरकार ने 2021 में राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम से
विश्वविद्यालय स्थापित तो कर दिया किंतु हिंदू मुस्लिम एकता के पक्षधर इन दो
स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में एक बरकतुल्लाह के नाम पर दशकों पूर्व बने विश्वविद्यालय
का नाम बदलने का दुष्प्रयास कर रही है। इस सरकार में अगर कोई सुशिक्षित और
संवेदनशील लोग हों तो उन्हें सरकार को समझाइश देकर इस पाप से रोकना चाहिए।