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मंगलवार, फ़रवरी 11, 2025

दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम

 

दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम

वीरेन्द्र जैन

दिल्ली विधानसभा के चुनाव सम्पन्न होने के बाद उसके परिणाम आ चुके हैं। इन चुनावों में सीधे सीधे दो दलों, आम आदमी पार्टी [आप] और भारतीय जनता पार्टी [भाजपा] के बीच मुकाबला था, भले ही इस रासायनिक क्रिया में उत्प्रेरक के रूप में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस व ए आई एम आइ एम [अखिल भारतीय मुस्लिम एकता संघ ] भी थीं। यदि ये उत्प्रेरक नहीं होते तो सीटों के परिणाम में भी दोनों मुख्य प्रतिद्वन्दी बिल्कुल बराबर पर होते या विपरीत होते। अभी भी उनके मतों के बीच कुल दो प्रतिशत का अंतर है। वैसे पिछले विधानसभा चुनावों से भाजपा के वोट सात प्रतिशत बढे हैं तो आम आदमी पार्टी के आठ प्रतिशत घटे हैं। लोकसभा चुनावों में भाजपा को 50% वोट मिले थे और संयुक्त रूप से लड़ने वाली काँग्रेस [18%] व आप [22%] अर्थात कुल 40% वोट मिले थे। यह बताता है कि दिल्ली में चुनाव अनुसार मत बदलने वाले मतदाता बड़ी संख्या में हैं। जिन मतदाताओं ने तीन बार राज्य में आम आदमी की सरकार बनवायी, उन्हीं ने उसके ठीक बाद भाजपा प्रत्याशियों को लोकसभा में भेजा।

 

चूंकि हमारी प्रणाली में विजेता जनप्रतिनिधियों की संख्या का महत्व सचेत मतदाताओं की संख्या से अधिक होता है, इसलिए चुनावी जीत कुछ अर्थ रखती है। विपक्ष में रहने के दौरान लोहिया पंथियों के कथन हुआ करते थे कि ज़िन्दा कौमें पाँच साल तक इंतजार नहीं करतीं। वे निरंतर सड़क के आन्दोलन किया करते थे। अब वैसा नहीं होता। अन्ना आन्दोलन के बाद जनता का स्वतःस्फूर्त कोई आन्दोलन नहीं हुआ, भले ही वेतन आदि में वृद्धि के लिए संगठित मजदूर कर्मचारियों के प्रदर्शन भले ही हुये हों, या कुछ वर्ष पूर्व एम एस पी के लिए सम्पन्न किसानों का आन्दोलन हुआ था। पिछले दिनों विशाल बहुमत से सरकार बनाने वाले केजरीवाल और उनकी पार्टी के प्रमुख लोगों को बिना किसी ठोस सबूत के जेल में भी डाल दिया गया फिर भी इस कार्यवाही के खिलाफ कोई विरोध प्रदर्शन तक नहीं हुआ।  कारण यह रहा कि वे सब प्रभुता के मद से घिर चुके थे, और ना तो उनकी पार्टी का संगठन ही बनाया गया था और ना ही कोई ठोस कार्यक्रम ही बनाया गया था जिसकी रक्षा के लिए कार्यकर्ता आदोलन करने लगते।

विडम्बना यह रही कि उक्त विधानसभा चुनाव में दोनों प्रमुख और दोनों उत्प्रेरक दलों में से किसी ने भी लोकतांत्रिक आदर्शों के अनुरूप चुनाव नहीं लड़ा। पूरा चुनाव सत्तारूढ आम आदमी और उसके पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की आलोचना पर केन्द्रित रहा। अरविन्द केजरीवाल ने तत्कालीन काँग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ चले आन्दोलन से लोकप्रियता अर्जित की थी और उसे राजनीतिक दल में बदलकर अपनी पार्टी बना ली थी। इस पार्टी ने आरोपों से घिरी काँग्रेस पार्टी द्वारा खाली किये गये स्थान को भर कर अपना अस्तित्व बनाया था। उसका इकलौता कार्यक्रम और नीति थी, भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देना। उसने यह कर के दिखाने की कोशिश भी की। दूसरी ओर देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी भाजपा ने अपने अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा छोड़ा हुआ था और वे काँग्रेस द्वारा खाली किये गये स्थान को भरने के लिए उतावले थे, इस कारण दोनों में प्रतियोगिता थी। देश के मतदाताओं में एक बड़ा वर्ग अभी भी गैर राजनीतिक आधार पर वोट देता है इसलिए भाजपा के पास एक सुनिश्चित हिन्दू वोट बैंक है और मुस्लिम मतदाता एकजुट होकर भाजपा को हराने वाले दल को समर्थन देते हैं। दिल्ली के चुनाव में आम आदमी के साथ काँग्रेस और एआईएमआईएम के बीच बंट गया फिर भी अधिकतम हिस्सा आम आदमी पार्टी को ही मिला, पर वह सीटें जीतने वाला बहुमत नहीं अर्जित कर सकी और पिछड़ गयी। जीत दर्ज करने वाली भाजपा केवल अपनी केन्द्र सरकार को ही दुहराती रही। डबल इंजन की सरकार को प्रचार का आधार बनाना यह भी बताता है कि केन्द्र सरकार अपने ही दल की सरकार को वांछित मदद करती है। कुल मिला कर दल के आधार पर चुनाव परिणाम का निष्कर्ष निम्नानुसार है –

भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस – इसके स्थानीय नेताओं ने उनकी सरकार पर लगाये गये आरोपों का बदला लेने के लिए वोट काट कर आम आदमी पार्टी से बदला ले लिया, भले ही वे एक भी सीट नहीं जीत सके हों और जिस बड़े उद्देश्य अर्थात साम्प्रदायिक भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए बनाया गये इंडिया गठबन्धन को चोट पहुंचायी हो। काँग्रेस के बड़े नेताओं की असहमति से यह हुआ है तो काँग्रेस की एकता को भी नुकसान पहुंचा है।

भारतीय जनता पार्टी- विधानसभा चुनाव जीत गयी है किंतु उसको लोकसभा में अर्जित वोटों में घटत मिली है। पराजित आम आदमी पार्टी से कुल दो प्रतिशत मत से ही आगे है, दूसरे मुख्यमंत्री चयन के सवाल पर उसे बहुत सारे समझौते करना होंगे। प्रतियोगिता में उसने जो अतिरंजित वादे किये हैं उन्हें निभाने में मुश्किलें आयेंगीं।

आम आदमी पार्टी-  पार्टी चुनाव हार गयी है किंतु यह पार्टी एक व्यक्ति को केन्द्रित कर सिद्धांत और संगठन विहीन पार्टी थी। इसके प्रमुख नेता की छवि को भाजपा ने खराब किया, उसे और उसके सहयोगियों को महीनों जेल में डाल कर रखा। जिस ईमानदारी के आधार पर इन्होंने अपना अस्तित्व बनाया था उसे ही दागदार किया गया। इसके पास जन समर्थन तो है किंतु संसाधनों की कमी है। इनके विधानसभा अध्यक्ष ने पार्टी छोड़ कर भाजपा ज्वाइन कर ली और यही काम टिकिटों से वंचित होने पर आठ और अन्य विधायकों ने भी किया। पार्टी के संस्थापकों में से अनेक पहले ही जा चुके थे जिनमें से एक कवि तो घनघोर आलोचक हैं। इनकी प्रशासनिक ईमानदारी के इतिहास के कारण इनकी जगह भरने वाली पार्टी लम्बे समय तक सतर्क होकर काम करेगी।

ए आइ एम ए आइ एम- मुस्लिम साम्प्रदायिक पार्टी है, हर चुनाव में ध्रुवीकरण करके हिन्दू साम्प्रदायिक पार्टियों को लाभ पहुंचा कर खुद भी लाभांवित होती है। इस चुनाव में भी बिना कोई सीट जीते लाभ में रही। अन्य राज्यों की तरह दिल्ली में भी उपस्थिति बना ली।

किसी शायर का शे’र है –

अय परिन्दो हिज्र करने से भी क्या हासिल हुआ / चोंच में थे चार दाने, चार दाने ही रहे

रविवार, मार्च 01, 2020

दिल्ली दंगॉ की पड़ताल और ताहिर हुसैन


दिल्ली दंगॉ की पड़ताल और ताहिर हुसैन
वीरेन्द्र जैन
दिल्ली में हाल ही में हुये दंगों से पहले मैंने ताहिर हुसैन का नाम नहीं सुना था। पूरे देश ने भी दिल्ली के इस पार्षद का नाम दंगों की खबरों के बाद ही जाना। मुझे दिल्ली की उस बस्ती के भूगोल की कल्पना भी नहीं है, जहाँ करावल नगर विधान सभा और उसका नेहरू विहार स्थित है, इसलिए मुझे गोदी मीडिय़ा के अखबारों और टीवी के समाचारों में अचानक उसे इकलौता खलनायक और हत्यारा बना देने की सूचनाओं से उसके बारे में जानने की जिज्ञासा पैदा हुयी। दुखद है कि पिछले दिनों से मीडिया का एक वर्ग खबरें व सूचना देने की जगह सन्देह पैदा करने का काम कर रहा है।
सूचनाओं में बताया गया कि बीस साल पहले ताहिर हुसैन अमरोहा के एक गाँव से मजदूरी की तलाश में अकेला दिल्ली आया था और इस दौरान उसने न केवल अपने माँ बाप को दिल्ली बुलवा लिया अपितु उसके अनेक शुभचिंतक रिश्तेदार भी आसपास रहने लगे। वह इन लोगों का सहयोग करता था और शायद इन्हीं के दम पर वह उस क्षेत्र से पार्षद चुना गया होगा।
पार्षद अपने वार्ड का नेता होता है और इस समय तो ताहिर हुसैन उस आम आदमी का सदस्य था जिसकी पिछले छह साल सरकार रही थी और जो अब फिर से भारी बहुमत से चुन कर आ गयी है। तय है कि उसका कद बड़ा था। उसके सद्भावी होने का प्रमाण यह है कि पिछली बार कपिल मिश्रा ने इसी क्षेत्र से आम आदमी पार्टी के टिकिट पर चुनाव लड़ा था और उसके घर को उनका चुनाव कार्यालय बनाया गया था। वे जीत गये थे किंतु बीच में अति महात्वाकांक्षी मिश्रा ने आम आदमी पार्टी छोड़ दी और भाजपा की कठपुतली के रूप में अरविन्द केजरीवाल और उनके मंत्रिमण्डल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने लगे जबकि ईमानदारी ही केजरीवाल की इकलौती पूंजी थी। ताजा विधानसभा चुनावों में कपिल मिश्रा भाजपा के टिकिट पर लड़े थे और हार गये थे। विधानसभा में भले ही आम आदमी पार्टी की सरकार बन गयी हो किंतु उत्तरपूर्वी दिल्ली के जिन इलाकों में दंगे फैले वहाँ से ही भाजपा के आठ में से छह विधायक भाजपा के जीते हैं। ये क्षेत्र हैं, जाफराबाद, करावल नगर, मौजपुर बाबरपुर, करदमपुरी, भागीरथ विहार, शिवपुरी, और भजनपुर। तय है कि ताहिर हुसैन उनके आँख की किरकिरी होगा।
केन्द्र की मोदीशाह सरकार ने दिल्ली को जीतने के लिए जिस कठोर भाषा और प्रतीकों का स्तेमाल किया वह लोकतांत्रिक चुनावों की भाषा से बहुत गिरी हुयी भाषा थी, जिसमें भाजपा को वोट न देने वालों को गद्दार, पाकिस्तानी, और न जाने क्या क्या कहा गया था व ईवीएम मशीन का बटन इस तल्खी के साथ दबाने का आवाहन किया गया था कि करंट शाहीन बाग में अनशन करती हुयी महिलाओं तक पहुंचे। ज़ामिया यूनीवर्सिटी में घुस कर छात्रों के साथ जो दमन किया गया था उसी के प्रतिरोध में अहिंसक और शांतिपूर्ण आन्दोलन शाहीन बाग में चल रहा था व दमन का मौका न देने के लिए आन्दोलन में महिलाओं को उतारा गया था। हाड़ कंपा देने वाली सर्दी में हर उम्र की महिलाएं दो महीने से रात दिन धरना दे रही थीं। इसका प्रभाव पूरे देश में पड़ रहा था जिससे लगभग तीन सौ ऐसे धरने चल रहे थे जिनमें से कुछ में तो दो दो लाख की संख्या में लोगों ने भागीदारी की थी।
जाफराबाद के रास्ते में दिये जाने वाले ऐसे ही एक धरने को दमन से उखाड़ने के लिए पहुंचे कपिल मिश्रा और भाजपा के दूसरे बाहुबलियों की धमकियों से टकराव का प्रारम्भ होना बताते हैं। दंगों में दोनों ही ओर के लोगों की जानें गयी हैं, घर व दुकानें जली हैं तथा रास्तों पर खड़ी गाड़ियों में आग लगायी गयी है। मृतकों और घायलों में 85 से अधिक लोग बन्दूक पिस्तौल की गोली से घायल हुये हैं। केवल ताहिर हुसैन के घर की छत पर पैट्रोल बम, उसे फेंकने की गुलेल और एसिड की बोतलें, मिर्ची पाउडर आदि मिली बतायी जाती हैं। अन्य मामलों में गाड़ियां जलाना, गोली चलाना या लाठी और तलवार चाकू से किये गये हमले शामिल हैं। पैट्रोल तो हर गाड़ी में होता है।
जिस आईबी के सुदर्शन युवा कर्मचारी अंकित शर्मा की मृत्यु हुयी उसके शरीर पर चाकुओं के दर्जनों वार पाये गये हैं जो निजी दुश्मनी के संकेत देते हैं। उसके भाई के दो बयानों में अलग अलग वर्ग पर आरोप लगाये गये हैं। किंतु ताहिर हुसैन को घेरने के लिए उस पर सीधे सीधे इस हत्या का आरोप मढ दिया गया है। ऐसे आरोप साम्प्रदायिक अवधारणा बनाने में मदद करते हैं।
भले ही दोनों पक्षों की भागीदारी के प्रमाण मिल रहे हों किंतु परिस्तिथियां बताती हैं कि एक पक्ष तो रास्ता घेर कर धरने का प्रयास कर रहा था इसलिए हमले की शुरुआत दूसरे पक्ष की ओर से ही की गयी होगी। कपिल मिश्रा की सीधी धमकी और कुछ वीडियो फुटेज इस बात का प्रमाण भी दे रहे हैं। जब साम्प्रदायिक हमलों की आशंका हो जाती है तो हर आशंकित अपने घर में सुरक्षा के लिए कुछ हमलावर सामग्री रखने को विवश हो जाता है। ताहिर हुसैन की छत पर ऐसी सामग्री मिली है, भले ही वे कह रहे हों कि यह सुरक्षा की सामग्री उन के घर में घुस आये लोग लेकर आये थे। उनके घर में जो गुलेल मिली है वह भी जुगाड़ से बनायी गयी थी। यह आपद सोच में ही सम्भव है। उसकी छत पर मिली सामग्री रक्षात्मक ही कही जा सकती है क्योंकि दूसरे के घर में जाकर हमला करने वाली कोई वस्तु नहीं बतायी गयी है।
पार्षद होने के कारण ताहिर हुसैन अपने समुदाय के लोगों में लोकप्रिय होगा और वे लोग उसके घर में शरण लेने आये हुए हो सकते हैं। हमलावरों ने तो बाहर निकल कर घर और दुकानों को पहचान कर हमला किया होगा। उसके पास पुलिस को फोन करने और वीडियो काल करने का रिकार्ड भी है। तय है कि जिसके पास आपत्तिजनक सामग्री हो वह पुलिस को बुलाने का खतरा मोल नहीं लेता।
 हाईकोर्ट द्वारा कुछ भाजपा के नेताओं की हेट स्पीच पर कार्यवाही का जो फैसला हुआ था, जिसके बाद रातों रात उन न्यायमूर्ति का स्थानांतरण कर दिया गया,  उसका मुकाबला करने के लिए बाद में भाजपा ने सोनिया गाँधी से लेकर केजरीवाल तक के भाषणों में हेट स्पीच के अंश खोज निकाले, लगता है उसी तरह कपिल मिश्रा का वीडियो आने के बाद उन्होंने आम आदमी पार्टी के ताहिर हुसैन को खोज निकाला है। बीस साल पहले मजदूरी के लिए आया एक व्यक्ति गाँव का घर बेच कर दिल्ली में बसता है और अपनी समाज सेवा से पार्षद बन जाता है। वह राजनीति के लिए भी आम आदमी पार्टी का चुनाव करता है जो अपेक्षाकृत रूप से ईमानदार व धर्मनिरपेक्ष मानी जाती है तो उसका मूल्यांकन करते समय इसे ध्यान में रखा जाना चाहिए।
दिल्ली पुलिस की भूमिका के बारे में तो बहुत कुछ कहा जा चुका है और कुछ ऐसे वीडियो भी वायरल हो रहे हैं जिनमें पुलिस उपद्रवियों को संरक्षण दे रही है, उल्लेखनीय है कि गुजरात में भी ऐसा ही हुआ था जब दो दिन तक नेतृत्व ने मौन होकर दमन होने दिया था।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629            

रविवार, जनवरी 05, 2014

मोदी के गुब्बारे में झाड़ू की सींक

मोदी के गुब्बारे में झाड़ू की सींक
वीरेन्द्र जैन

       पाँच राज्यों में हो चुके विधानसभा चुनावों के बाद देश लोकसभा चुनाव के लिए तैयार हो रहा है और दिल्ली विधानसभा के परिणामों में आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता ने बहुत सारे समीकरण उलट दिये हैं।
       2004 के आम चुनावों में भाजपा नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन की पराजय के बाद सत्ता से दूर हुयी भाजपा लगातार विक्षिप्तों जैसी हरकतें करती रही है और ऎन केन प्रकारेण सत्ता हथियाने के लिए अलोकतांत्रिक ढंग से हाथ पैर मारती रही है। जब 2009 के आम चुनाव में भी सत्ता उनके हाथ नहीं आयी तो उनकी बौखलाहट अपनी सारी हदें पार कर गयी। उल्लेखनीय है कि 2004 में यूपीए की पहली सरकार बनी तो उसे बाम मोर्चे का समर्थन प्राप्त करना पड़ा था। बाम मोर्चा की यह नीति रही है कि उसने जब भी किसी गठबन्धन को समर्थन दिया है तो वह सरकार में शामिल हुए बिना बाहर रह कर ही दिया है। वे ऐसी किसी सरकार में सम्मलित नहीं होते हैं जो पूरी तरह से उनके कार्यक्रम पर कार्य नहीं करती। बाममोर्चा अपने समर्थन से पहले न्यूनतम साझा कार्यक्रम तय कर लेता है जिसके आधार पर ही अपना समर्थन जारी रखता है। यही कारण था कि भाजपा को यह भरोसा नहीं था कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यह सरकार साझा कार्यक्रम पर अमल कर सकेगी और पाँच साल चल पायेगी इसलिए वे इस दौरान लगातार अपने कार्यकर्ताओं को मध्यावधि चुनावों हेतु तैयार रहने के लिए कहते रहे। दूसरी ओर वे हर असहमति पर बामपंथियों को समर्थन वापिस लेने की चुनौती देते रहे। उनके दुर्भाग्यवश बामपंथियों ने गैरज़िम्मेवाराना व्यवहार नहीं किया और सरकार लगातार चार साल तक न केवल चली अपितु उसने सूचना के अधिकार को कानूनी रूप देने से लेकर मनरेगा जैसी रोजगार गारंटी देने वाली परिवर्तनकारी योजनाएं भी प्रारम्भ कीं। पाँचवें साल में न्यूनतम साझा कार्यक्रम के विपरीत अमरीका के साथ परमाणु समझौते के सवाल पर बाम मोर्चा ने समर्थन वापिस लिया तो समाजवादी पार्टी ने समर्थन देकर सरकार को अपनी अवधि तक चलने दिया और भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। सरकार चलते रहने की खीझ में उसने भाजपा ने संख्या बल के आधार पर संसद को न चलने देने की नीति अपनायी व दोनों कार्यकाल में उसकी कार्यवाही को निरंतर स्थगित कराते रहे। इस दौरान औसत बैठकों की संख्या 127 से घटकर 73 दिन रह गयी। जो सदन कभी 118 तक विधेयक पास करने का रिकार्ड बना चुके थे वे अब 18 विधेयकों तक सीमित हो गये। सदन में शोर गुल करके गर्भगृह तक आकर नारे लगाने का दृश्य आम हो गया।     
       दूसरे कार्यकाल में बामपंथियों के सहयोग की जरूरत नहीं पड़ी किंतु उनके जिम्मेवारीपूर्ण नियंत्रण के हटने से सरकार में शामिल गठबन्धन के सहयोगी दलों ने न केवल अपनी पसन्द के मंत्रालय ही चुने अपितु उन मंत्रालयों में मनमानी भी की जिसका रोग गठबन्धन के प्रमुख दल कांग्रेस के कतिपय मंत्रियों तक भी पहुँचा। भ्रष्टाचार के आरोपों का इतना असर हुआ कि सीएजी के बताये सम्भावित लाभ में कमी को भी भ्रष्टाचार मान लिया गया। भ्रष्टाचार के ये रोगाणु भाजपा शासित कर्नाटक, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में भी प्रकट हुये जिसके परिणाम स्वरूप पहले तीन राज्यों में भाजपा पराजित हो गयी, और कांग्रेस पुनः सत्तारूढ हुयी। इन चुनाव परिणामों ने भाजपा की बौखलाहट को और बढा दिया और उसने चुनाव जीतने के लिए वापिस जनसंघ वाले युग में लौटने का खतरनाक फैसला किया। आगामी आम चुनावों के लिए प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी के रूप में वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण अडवाणी की जगह कट्टरता के लिए बदनाम गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का चुनाव कर लिया जिन्होंने तीसरी बार गुजरात विधानसभा चुनाव जीतकर भाजपा में रिकार्ड बना लिया था। इसके बाद वे देश भर में आम सभाएं करते हुए साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के बीज बोने लगे। मोदी के सहारे अपनी नैया पार लगाने की सोच रखने वाली पार्टी ने मोदी को लोकप्रिय करने के लिए न केवल विदेशी प्रचार एजेंसी का ही सहारा लिया अपितु सोशल मीडिया में हजारों नकली एकाउंट बना कर मोदी को लोकप्रिय करने व कांग्रेस के नेताओं के खिलाफ कुत्सित प्रचार करने लगे। अयोध्या के रामजन्मभूमि मन्दिर आन्दोलन की तर्ज़ पर गुजरात में स्टेच्यू आफ यूनिटी की योजना बनायी गयी जिसका आकार अमेरिका की विश्व प्रसिद्ध स्टेच्यू आफ लिबर्टी से बड़ा रखने की घोषणा हुयी। इस स्टेच्यू के लिए प्रत्येक घर से लोहा एकत्रित करने की योजना उसी तरह बनायी गयी जैसी की प्रत्येक घर से ईँटें एकत्रित करने के बहाने देश भर में प्रचार और सर्वेक्षण का काम किया गया था। इसके विपरीत अपनी गुरुता, वरिष्ठता, गम्भीरता और सत्ता जनित आलस्य के वशीभूत कांग्रेस ने उनके किसी अभियान का उत्तर नहीं दिया, और न ही प्रतियोगिता में उतरे। इतना ही नहीं उसने अपना प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी तक घोषित नहीं किया जिससे भ्रम की स्थिति बनी रही। इसी बीच पाँच विधानसभाओं के चुनाव हुये जिनमें से एक राज्य उन्होंने कांग्रेस से छीन लिया व दो में सत्ता बनाये रखी।
       इन विधानसभा चुनावों में मिजोरम में कांग्रेस ने अपनी सरकार बनाये रखी तो मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ में उसने मतों के प्रतिशत में वृद्धि की। राजस्थान और दिल्ली में उसका मत प्रतिशत घटा। पाँच में से तीन राज्यों में सरकार बनने का श्रेय भी मोदी के सिर बाँधने की कोशिश की कोशिश हुयी ताकि उसका लाभ चुनावों में मिले। पश्चिमी चुनाव प्रचार की तर्ज पर मोदी के मुखौटे, आम सभाओं में मोदी के नाम की तख्तियां उठाने वाले व नारे लगाने वाले दो हजार लोगों की टीम प्रत्येक सभा में भिजवायी जाने लगी। प्रैस के कुछ हिस्से को पेड न्यूज द्वारा भीड़ की अतिरंजित संख्या बताने व ऐसे फोटो प्रसारित करने के लिए तैयार किया गया जिससे भीड़ बड़ी दिखे। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए मोदी की आम सभा में उस विधायक का सम्मान भी किया गया जिसने नकली वीडियो बनाकर मुज़फ्फरनगर में दंगा भड़काने में मुख्य भूमिका अदा की थी और जिसे उसके लिए गिरफ्तार किया गया था। मोदी की आम सभाओं की कुर्सियां तक नीलाम होना प्रायोजित किया गया जिससे लोगों में उनके प्रति दीवानगी का भ्रम बने। ऐसा भ्रम बना भी और नई सूचना तकनीक व प्रबन्धन को कैरियर बनाने वाली युवा पीढी प्रभावित भी हुयी थी पर केजरीवाल के उदय ने मोदी के सारे उफान पर पानी डाल दिया।
       पुराने औद्योगिक राज्य गुजरात में औद्योगिक विकास की निरंतरता से चमत्कृत जो युवा पीढी कांग्रेस को पुराने जमाने की पार्टी मानने लगी थी और मोदी के नकली प्रचार से प्रभावित होने लगी थी उसे आयकर विभाग के कमिश्नर पद से त्यागपत्र देकर आये आईआईटी डिग्री वाले अरविन्द केजरीवाल और उनकी टीम की सादगी और लगन ने प्रभावित किया है। दिल्ली में कांग्रेस की एंटी इनकम्बेंसी और बढती मँहगाई के आधार पर जो भाजपा अपनी जीत के प्रति आश्वस्त थी उसके ढाई प्रतिशत मत घट गये हैं। यह तब हुआ है जब भाजपा के पक्षधर सर्वेक्षण कर्ता केजरीवाल की आप पार्टी की  उपेक्षा कर रहे थे व उसकी वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज ने प्रचार के अंतिम दिन लोगों से आम आदमी पार्टी को वोट देकर अपना वोट बेकार न करने की सलाह दी थी।
       चलती ट्रेन में एक व्यक्ति खिड़की पर पैर टिकाये अधलेटा गुनगुना रहा था कि अचानक उसके पाँव की चप्पल नीचे गिर जाती है तो वह बिना देर किये हुये दूसरी चप्पल भी नीचे फेंक देता है, ताकि जिसको भी मिले तो उसके काम तो आये। कांग्रेस ने आप पार्टी को समर्थन देकर ऐसी ही समझदारी दिखायी है। नितिन गडकरी और प्रभात झा के आरोप तथा भाजपा पक्ष के प्रचारकों की प्रतिक्रियाएं साफ संकेत दे रही हैं कि इस समझदारी ने भाजपा के प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी नाम के फुलाये गये गुब्बारे में झाड़ू की सींक चुभो कर फोड़ दिया है।           
वीरेन्द्र जैन
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