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शुक्रवार, अक्टूबर 31, 2025

जय संतोषी माता का नया संस्करण

 जय संतोषी माता का नया संस्करण

वीरेन्द्र जैन
सन 1975 में हिन्दी की अब तक की सबसे लोकप्रिय फिल्म शोले रिलीज हुयी थी। इसके समानांतर एक और फिल्म रिलीज हुयी थी जिसने उस समय की सूचनाओं के अनुसार शोले से भी अधिक बिजनेस किया था। उसका नाम था ‘जय संतोषी माता” । पुराने पंडितों धर्म धुरन्धरों से पूछने पर किसी ने भी मान्य शास्त्रों में इस देवी की कथा के बारे में नहीं बताया किंतु सत्तर के दशक में पूरे उत्तर भारत में शुक्रवार के दिन महिलाएं संतोषी माता का व्रत रखने लगी थीं और खटाई खाने व बनाने से परहेज करने लगी थीं। कई स्थानों पर उनके स्वतंत्र मन्दिर बन गये थे और कई पुराने मन्दिरों में एक वेदी भी संतोषी माता के लिए सुरक्षित कर दी गयी थी। जब मैं हाथरस में था तो मेरा एक कैशियर स्टाफ कुशल पाल सिंह शुक्रवार को संतोषी माता का व्रत रखता था जिसका उसके दूसरे साथी मजाक बनाते थे।
पिछले पन्द्रह बीस सालों में मुझे कहीं भी संतोषी माता का मन्दिर नजर नहीं आया और ना ही व्रत उपवास किये महिलाओं से मुलाकात हुयी। पुरानी भक्तिन भाभियों से पूछने पर वे हँस कर रह जाती हैं। हिन्दी के सुपरिचित आलोचक श्री राम प्रकाश त्रिपाठी जो मुरैना जिले के मूल निवासी हैं किसी पंडित जी की चर्चा करते हैं जिन्होंने कथा वार्ता का धन्धा मन्दा होने के कारण नवोन्मेष में उक्त कथा रची थी और कथा की पुस्तिकाएं छपवायी थीं और सफल रहे थे। एक दूसरी अफवाह इस कथा की रचना का श्रेय प्रसिद्ध कवि निर्भय हाथरसी को देते हैं जो अच्छी हास्य व्यंग्य कविताओं के साथ साथ इस तरह के नये नये अनूठे कामों के लिए भी जाने जाते थे।
बहरहाल बिहार के विधानसभा चुनावों के कारण देश भर में छा गयी छठ मैया के राष्ट्रीय पटल पर उभर आने व देश के प्रधानमंत्री के शामिल होने के कारण कुछ लोगों ने फेसबुक पर उत्सुकता वश बिहारी मित्रों से छठ मैया की कथा और कथा की शास्त्रीयता के बारे में जानना चाहा, और उन्हें कोई उत्तर नहीं मिला तो मुझे संतोषी माता की याद आ गयी।
असल में यह एक राजनीति भी है, और बिहार विधान सभा के समय ही इसका उभार संकेतक है। भाजपा को इसके सहारे अपनी राजनीति चमकाने का चस्का लग चुका है और उदासीन गैर भाजपा दल इस राजनीति का उत्तर नहीं दे पा रहे या उनकी सोच में ही नहीं है। भाजपा के विकास में 1995 में गणेश मूर्तियों को दूध पिलाने की खबर को देश भर में फैलाने में मिली सफलता के बाद उसने ऐसे कई प्रयोग किये। जन्मभूमि मन्दिर को भगवान राम का मुख्य मन्दिर बना देने और आस्थाओं से राजनीति में सफलता पाकर उसने समस्त आस्था स्थलों और पर्वों को राजनीति के घेरे में समेटना शुरू कर दिया। नगरों के नाम बदलने से लेकर कुम्भ स्नानियों की संख्या को साठ करोड़ तक फैला देने से लेकर काशी और मथुरा आदि के पुराने प्रकरणों को उखाड़ देने का प्रयास भी किया गया। डूबी हुयी द्वारिका से लेकर पर्ची वाले बाबा को छोटा भाई बना लेने व उस स्थान पर राष्ट्रपति को तक ले आने के सफल प्रयास किये गये।
हर लोकप्रिय स्थल को चुनावी मंच बना देने के खिलाफ अगर गैर भाजपा दलों ने कोई प्रयास नहीं किये तो राजनीतिक आर्थिक प्रशासनिक रूप से असफल भाजपा को अभी तक की तरह चुनावी सफलता से सत्ता मिलती रहेगी। हो सकता है कि मेरी कम जानकारी हो किंतु सक्रिय राजनीति में मुझे राजकुमार भाटी या कन्हैया कुमार के अलावा दूसरे लोग मुखर प्रतिरोध करते नजर नहीं आ रहे हैं। वामपंथियों में बहुत नेता है किंतु वे मंचों का स्तेमाल कर पाने की जुगत में सफल नहीं हुये या अनैतिक लोगों के सामने नैतिक होकर लड़ रहे हैं।

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गुरुवार, नवंबर 14, 2019

अयोध्या का फैसला और भाजपा


अयोध्या का फैसला और भाजपा 
वीरेन्द्र जैन
अयोध्या के रामजन्मभूमि मन्दिर के सम्बन्ध में बहुप्रतीक्षित फैसला आ चुका है।
राजनीतिक चतुरों ने इस विवाद को ‘रामजन्म भूमि मन्दिर’ विवाद से ‘राम मन्दिर विवाद’ में प्रचारित कर दिया था, और सवाल करते थे कि बताओ अयोध्या में राम मन्दिर नहीं बनेगा तो क्या कराची में बनेगा! स्वाभाविक रूप से जो उत्तर उभरता था कि अयोध्या में ही राम मन्दिर बनेगा। यह मुद्दे की दिशा को विचलित कर देने की विधि थी। अयोध्या में एक नहीं हजारों राम मन्दिर हैं जो पुराने हैं व नये मन्दिरों के निर्माण पर कोई रोक नहीं है। वहाँ एक नहीं हजार मन्दिर और बन सकते हैं। मन्दिर का निर्माण कोई समस्या नहीं था। मुद्दा यह था कि जिस जगह पर 1528 में एक मस्ज़िद बनी थी जिसे बाबर के आदेश पर मीरबाकी ने बनवाया था। दावा था कि उस स्थान पर जिसे राम की जन्मभूमि माना जाता है, कभी रामजन्मभूमि मन्दिर था। आरोप यह था कि उक्त मन्दिर को तोड़ कर बाबरी मस्ज़िद बनायी गयी थी और पिछले लगभग सौ से अधिक वर्षों से हिन्दू उसी स्थान पर मस्जिद की जगह रामजन्म भूमि मन्दिर की पुनर्स्थापना की मांग कर रहे थे। मुगल काल से ब्रिटिश शासन काल तक इस मांग से 562 रियासतों का कोई राजा नबाब नहीं जुड़ा था इसलिए हिन्दुओं के आराध्य राम की जन्मभूमि मन्दिर की लड़ाई को बल नहीं मिल सका था। इतिहास बताता है कि धार्मिक ‘हिन्दू संगठनों’ ने 1813 में इस आधार पर पहला दावा किया था। 1859 में इस स्थान पर कब्जे के लिए हिंसा की घटना हुयी तो ब्रिटिश सरकार ने इसके चारों और कटीले तारों की बाड़ बनवायी थी। 1885 में पहली बार महंत रघुवर दास ने अदालत से मन्दिर बनाने की मांग की। 1934 में विवादित हिस्सों को तोड़ा गया था जिसकी मरम्मत ब्रिटिश सरकार ने करायी थी। कहा जाता है कि 1949 में तत्कालीन हिन्दूवादी कलैक्टर के.के. नायर के इशारे पर, रात्रि में रामलला की मूर्ति को रखवा दिया गया था। उल्लेखनीय है कि सेवानिवृत्ति के बाद यही कलैक्टर बलरामपुर से जनसंघ के टिकिट पर चुनाव लड़ कर संसद में पहुंचे थे व उसके बाद उनकी पत्नी भी सांसद बनी थीं। उन्होंने हिंसा का डर दिखा कर उस स्थान से मूर्तियों को हटाने की सलाह मानने से इंकार कर दिया था और सलाह दी थी कि केवल एक पुजारी अन्दर जाकर पूजा करेगा व जाली के बाहर से हिन्दू दर्शन कर सकेंगे। तब से मुसलमानों का प्रवेश और नमाज वहाँ बन्द हो गयी थी, और अपने अधिकार के लिए वे कोर्ट चले गये थे।
1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड द्वारा मस्ज़िद के लिए केस दर्ज करने से पहले 1950 में हिन्दू पक्ष और 1959 में निर्मोही अखाड़ा भी कोर्ट से पूजा की अनुमति मांग चुका था। 1967 के बाद उत्तर प्रदेश में अनेक गठबन्धन सरकारें बनीं जिनमें जनसंघ भागीदार रही व 1977 में केन्द्र में बनी जनता पार्टी में वे घटक की तरह सम्मलित हो गये थे किंतु उन्होंने कभी राम जन्मभूमि मन्दिर का मुद्दा नहीं उठाया। 1980 में उन्हें दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर जनता पार्टी से बाहर होना पड़ा और 1984 में श्रीमती गाँधी की हत्या के बाद हुये चुनाव में वे दो सीटों तक सिमट गये थे। अपने राजनीतिक पुनरोत्थान के लिए उन्होंने इस सुसुप्त मुद्दे को हाथ में लिया और गोबिन्दाचार्य द्वारा बनायी गयी योजना के अनुसार रथ यात्रा निकाली जिसकी सवारी श्री लालकृष्ण अडवाणी ने की।
यह टर्निंग बिन्दु था इस के साथ ही इस अभियान का दूसरा पक्ष प्रारम्भ हुआ। पहले पक्ष में केवल भावुक धार्मिक पक्षधरता थी| इसमें लड़ने के लिए न संगठन था न धन। दूसरे पक्ष में राजनीतिक पक्ष था, संगठन था और धन था।, इसमें धर्म का नाम तो था पर धर्म नहीं था। तब से राम जन्मभूमि मुद्दा गरमा गया था। तब के कमजोर प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने एक ओर शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कानून बदलवा कर जो भूल की थी उसकी बराबरी करने में अयोध्या में मन्दिर का ताला खुलवा कर दूसरी भूल कर डाली। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उन पर बोफोर्स कांड के आरोप लगाये जिसे भाजपा ने बल दिया। इससे काँग्रेस अल्पमत में आ गयी और वीपी सिंह के नेतृत्व में जनता दल की अल्पमत सरकार बनी। सीपीएम के दबाव में वी पी सिंह ने भाजपा को सरकार में शामिल नहीं किया। ग्यारह महीने में ही जनता दल बिखर गया था इसलिए काँग्रेस का मुख्य प्रतिपक्ष बनने के लिए अपेक्षाकृत संगठित भाजपा के पास उपयुक्त अवसर और हाथ में राममन्दिर अभियान था।
इस अभियान के बल पर भाजपा दो से अस्सी और फिर दो सौ तक पहुंची व इसी संख्याबल के आधार पर बाद में अटल बिहारी सरकार तक बनाने में सफल रहे। उनकी विजय का दूसरा कोई मुख्य आधार नहीं था। इसी अभियान की निरंतरता के अंतर्गत कार सेवकों के नाम से गये लोगों के कारण ही गोधरा कांड और गुजरात का नरसंहार हुआ। इसी के प्रभाव में मोदी ने गुजरात में ध्रुवीकरण के सहारे अपनी एकछत्र सत्ता हासिल की और इसी के प्रभाव में उन्होंने प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने की रेस जीती। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि भाजपा का देश की सत्ता तक पहुंचने का अभियान और राम जन्मभूमि मन्दिर एक ही आन्दोलन के हिस्से रहे हैं। इस का बने रहना भाजपा के चुनाव अभियान के लिए लाभदायक रहा है, इसलिए उसे मन्दिर बनाने की कोई जल्दी नहीं थी अपितु वे मुद्दे को गरमाये रखने में रुचि रखते थे।
सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला व्यापक जनहित में न्यायिक से ज्यादा एक प्रशासनिक फैसला है। मुख्य न्यायाधीश ने इसकी सुनवाई करते समय अपने पहले बयान में कहा था कि हमारे लिए यह आस्था का मामला नहीं अपितु भूमि के स्वामित्व का विवाद है जिसे रामलला विराजमान को लीगल एंटिटी मान कर दिया गया है।
इस अभियान के दूसरे पक्ष में अडवाणीजी की रथयात्रा से लेकर मस्जिद गिराये जाने के बाद मुम्बई, गुजरात और दूसरी जगहों में हुये दंगों में हजारों लोग मारे गये हैं, व हजारों करोड़ की सम्पत्ति बर्बाद हुयी है। जो फैसला हुआ है वह समझौते के माध्यम से पहले भी सम्भव था किंतु वे तो ध्रुवीकरण चाहते थे क्योंकि इसमें बहुसंख्यकों का दल लाभ में रहता है।
भले ही प्रकट रूप में भाजपा खुशी व्यक्त कर रही है पर क्या इस फैसले से भाजपा खुश होगी? उल्लेखनीय है कि भाजपा के नियंत्रक, संघ प्रमुख मोहन भागवत से जब पूछा गया कि राम मन्दिर के बाद काशी मथुरा के बारे में क्या योजना है, तो वे इस सवाल को टाल गये। शायद हाथ लगे फार्मूले को छोड़ना उन्हें मंजूर नहीं होगा। उनके ही आनुषांगिक संगठन विश्व हिन्दू परिषद, जिसके नाम से यह अभियान चलाया गया था, ने तो काशी मथुरा के अलावा अन्य साढे तीन सौ विवादित धर्म स्थलों की सूची जारी की हुयी है। आलोचना होने पर भाजपा कह देती थी कि यह हमारा कार्यक्रम नहीं विहिप का कार्यक्रम है, किंतु समर्थन मिलने पर सबसे पहले अपनी गरदन माला पहनने के लिए आगे कर देती रही है।
वे यह प्रकट कर रहे हैं कि फैसले में सब कुछ उनके पक्ष में अच्छा हुआ है किंतु ऐसा नहीं है। कोर्ट ने गुम्बद में मूर्तियां रखने और मस्जिद तोड़ने को आपराधिक कृत्य माना है और आरोपियों को जल्दी सजा देने की सलाह दी है। इस अवसर पर यह बात चर्चा के केन्द्र में नहीं आयी है कि आरोपियों में भाजपा के सबसे बड़े नेताओं में से सर्वश्री अडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार आदि के नाम हैं, और अगर सरकार सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानती है तो इन्हें सजा हो सकती है। क्या इसके छींटे पूरी भाजपा पर नहीं आयेंगे?
इस अभियान में प्रचार का केन्द्रीय बिन्दु यह था कि जिस जगह पर बाबरी मस्जिद बनायी गयी है, ठीक उसी स्थान पर राम का जन्म हुआ था और ठीक वहीं जन्मभूमि मन्दिर था जिसे तोड़ कर मस्जिद बनायी गयी थी।  इसी तर्क के आधार पर वे बाबरी मस्जिद को तोड़े जाने और वहीं मन्दिर निर्माण की बात करते थे। कोर्ट ने यह कह दिया है कि पुरातत्वविदों द्वारा उस स्थान पर किसी इमारत होने के प्रमाण तो पाये हैं किंतु ना तो उसका मन्दिर होना प्रमाणित है और ना ही तोड़ा जाना। उल्लेखनीय है कि विवाद के चरम पर जब मुम्बई के एक इंजीनियर ने प्रस्ताव किया था कि विवाद टालने के लिए वह ऐसा नक्शा बना सकता है जिसमें बाबरी मस्जिद के बने रहते उसके ऊपर मन्दिर का निर्माण हो सकता है, या उसके नीचे अंडरग्राउंड में मन्दिर बनाया जा सकता है जो प्राप्त अवशेषों के अनुसार सही तल पर होगा। किंतु कहा गया था कि उन्हें मन्दिर उसी तल पर चाहिए जिस तल पर मस्जिद बनी है। सच तो यह है कि उन्हें राजनीतिक लाभ के लिए मन्दिर नहीं विवाद चाहिए था।
हमें उम्मीद रखना चाहिए कि समझदारी के विकास के साथ राममन्दिर प्रेमी और उसका राजनीतिक स्तेमाल करने वाले अलग हो सकें।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629




शुक्रवार, सितंबर 20, 2019

मूर्तियों का आकार

मूर्तियों का आकार
वीरेन्द्र जैन
गत दिनों भोपाल में गणेश की एक विशालकाय मूर्ति का विसर्जन करते हुए नाव पलट गयी थी और उसमें बारह युवा असमय ही मृत्यु का शिकार हो गये। ऐसे में जैसा कि होता है सत्ता में बैठे नेताओं ने जनभावनाओं के अनुरूप मुआवजे की बड़ी राशि देने की घोषणा करते हुए मृतक के परिवार के सदस्य को सरकारी नौकरी देने तक के वादे किये। कुछ लापरवाह छोटे प्रशासनिक अधिकारियों पर कार्यवाही की और नियमों को कठोर बनाने की घोषणा भी की। दूसरी ओर विपक्ष में बैठे नेताओं ने अपना कर्तव्य निभाते हुए दिये गये मुआवजे को कम बताते हुये उससे दुगनी राशि देने की मांग कर डाली और राजनीति करते हुये जिम्मेवारी को उच्च अधिकारियों से लेकर मंत्रियों तक फैलाने की कोशिश की, भले ही उनके कार्यकाल में घटित ऐसी ही दुर्घटनाओं में मुआवजे की राशि बहुत कम रही थी। सुधार की जो त्वरित घोषणाएं की गयीं उनमें मूर्ति का आकार छह फीट तक रखने की बात भी घोषित की गयी। घटना की सनसनी एक सप्ताह तक रही।
कुछ ही दिन बाद नवरात्रि पर्व का प्रारम्भ होने जा रहा है, जिसके लिए मूर्तियों का निर्माण अपने अंतिम दौर पर हैं। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार केवल भोपाल ही में दस फीट और उससे अधिक ऊंचाई की पाँच सौ से अधिक मूर्तियां निर्मित हो रही हैं। प्रशासन में इतहा साहस नहीं है कि वह इन मूर्तियों का निर्माण रुकवा सके या इनके विसर्जन को रोक सके। सरकार के सुधारात्मक सुझाव को भी धार्मिक मामला बता कर धार्मिक उन्मादियों ने सरकार के खिलाफ बयान देना शुरू कर दिया है। तय है कि विसर्जन का कार्यक्रम प्रति वर्ष की भांति ही होगा और दुर्घटनाओं की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। धर्मदण्ड के आगे दण्डवत हो जाने वाले पुलिस बल से यह उम्मीद भी नहीं की जा सकती कि वह धर्म के नाम पर कुछ भी बेतुके काम किये जाने को रोकने की कोशिश करे, भले ही उस काम की कोई सुदीर्घ परम्परा न हो। 
मूर्ति पूजा का उद्देश्य अतीत के पौराणिक देवताओं को वर्तमान समय में महसूस करना होता है इसलिए यथा सम्भव उनका स्वरूप वैसा ही बनाये जाने की कोशिश की जाती है जैसा कि पुराणों में उनका वर्णन किया गया है। वैसा ही रूप, वैसे ही वस्त्र, वैसे ही शस्त्र, वाहन, और उनके चरित्र के अनुसार उनकी मुख मुद्राएं बनायी जाती हैं। किंतु जब से राजनीति में धर्म की भूमिका ने प्रवेश किया है तब से उसका स्वरूप ही बदल गया है। आज से लगभग सौ वर्ष पूर्व तिलक ने गणपति समारोहों का प्रारम्भ महाराष्ट्र में इसलिए किया था ताकि सार्वजनिक स्थान पर हर जाति धर्म के लोग स्वतंत्रता की लड़ाई में साथ आ सकें। आजादी के बाद आयी वोटों की राजनीति में लाभ लेने हेतु एक हिन्दुत्ववादी पार्टी ने पूरे हिन्दीभाषी क्षेत्र में इसका विस्तार किया। वर्षा की ऋतु के बाद सभी जगह उत्सव मनाने की परम्परा थी किंतु प्रत्येक क्षेत्र में ये उत्सव अलग अलग तरह से मनाये जाते थे। महाराष्ट्र में गणपति की स्थापना के रूप में होता था तो बंगाल में दुर्गा पूजा के रूप में, गुजरात में नवरात्रि में देवीपूजा के साथ गरवा के रूप में होता था तो हिन्दीभाषी क्षेत्र में रामलीलाएं व दशहरा उत्सव होते थे, कांवड़ यात्रा भी निकलती थी। केरल में मनाये जाने वाला ओणम भी इसी महीने पड़ने वाला त्योहार है। वोटों की राजनीति में धर्म के प्रयोग ने सभी जगह सभी तरह के उत्सव मनाये जाने शुरू करवा दिये व कुछ लोगों को इन उत्सवों का व्यापार करना सिखा दिया।
व्यापारिक मनोवृत्ति ने निर्धन, दलित, और पिछड़े वर्ग के बेरोजगार युवाओं को झांकी सजाने और निकालने का स्वरोजगार दे दिया। वे धर्म की राजनीति करने वाले नेताओं के संरक्षण में अपने समूह की ताकत के बल पर बिना हिसाब किताब का चन्दा एकत्रित करने लगे और धार्मिक भावनाओं का छोंक लगा होने से सरलता से वसूलने भी लगे। यह जानना रोचक हो सकता है कि सर्वाधिक आकर्षण वाली झांकियां बाजारों के आसपास ही लगायी जाती हैं क्योंकि व्यापारिक अनिश्चितता में जी रहा दुकानदार युवा समूह से किसी प्रकार का टकराव नहीं चाहता। ज्यादा चन्दा वसूलने के लिए झांकियों में प्रमुख तीर्थों की प्रतिकृतियों के साथ साथ मूर्तियों का आकार भी विशाल से विशालतर होता गया। आयोजक यह भूलते गये कि किसी मूर्ति का आकार धार्मिक पुराणों में रचे गये पात्रों के अनुरूप ही होना चाहिए। पुराणों में देवताओं का आकार सामान्य मानवाकार ही दर्शाया गया है जबकि राक्षसों या खलनायकों को विशाल आकार में बताया गया है। राजनीतिक व्यापार के चक्कर में वे देवताओं का स्वरूप ही बदले दे रहे हैं। उल्लेखनीय है कि देश में लाखों लोगों की पूज्य वैष्णो देवी की मूर्तियां आकार में सामान्य होते हुए भी महत्व में बड़ी हैं। दशहरा में रावण, मेघनाथ और कुम्भकरण के पुतले लम्बे से और और लम्बे बनाये जाते रहे हैं जिनसे सामान्य आकार के पात्र ही संहार कर मुक्ति दिलाते हैं।
गणपति उत्सव, नवरात्रि उत्सव, गरवा आदि की व्यावसायिकता में कोई पंडित या विद्वान यह बताने आगे नहीं आता कि इन उत्सवों को मनाने की शास्त्रोक्त सही विधि क्या हो सकती है, और इसमें आयी विकृतियों को रोका जाना चाहिए। उन्हें ऐसा करने पर धर्मविरोधी ठहराये जाने का खतरा महसूस होता है इसलिए वे दबंगों द्वारा राजनीतिक व्यापार के हित में बनायी जा रही व्यवस्थाओं को चलाने लगते हैं। दुकानदार भी अपने बाज़ार के आसपास ऐसे उत्सव आयोजित कराने में रुचि रखते हैं ताकि भक्तों और ग्राहकों के बीच बचे खुचे भेद को भी मिटाया जा सके। त्योहारों के दौरान दैनिक उपयोग की वस्तुएं मंहगी बिकने लगती हैं, भले ही उत्सवों, व्रतों से उनका कोई सम्बन्ध नहीं हो। कारण पूछने पर वे बताते हैं कि उन्हें उत्सव के लिए चन्दा भी देना पड़ता है। कुल मिला कर इन उत्सवों का बोझ भी आम आदमी पर पड़ता है। उत्सवों के दौरान उचित दामों में सामग्री मिलने का कोई अभियान कभी नहीं चला जबकि उसे महूर्त बता कर हर व्यापारी अपना कीमती सामान बेचने के विज्ञापन देने लगता है। पितृपक्ष के दौरान नया सामान न खरीदे जाने का विश्वास लोगों में रहा है किंतु पिछले कुछ वर्षों से इसी दौरान कुछ लोकप्रिय बाबा बयान देते हैं कि पितृपक्ष में नया सामान खरीदने में कोई दोष नहीं है। जाहिर है कि उक्त अनावश्यक बयान व्यापारियों द्वारा दिलाये गये होते हैं। उत्तर भारत में नये नये फैले गणेश, दुर्गा, और गरवा उत्सवों के बीच में हमारी रामलीला विलीन हो गयी जो उत्तर भारत का सबसे पुराना जननाट्य था।
जो नये उत्सव आये हैं उनकी आचार संहिता भी बनना चाहिए और उसे अनैतिक व्यापार बनने से रोकने के लिए उसके हिसाब किताब और प्रबन्धन की देख रेख करने वाली भी कोई संस्था होनी चाहिए। अब प्रत्येक मुहल्ले के दबंगों को धन एकत्रित करने के लिए यह साधन बनता जा रहा है। धर्म की राजनीति करने वाले भी अपना प्रभावशाली कैडर भी इसी भीड़ से चुनने लगे हैं।
वीरेन्द्र जैन
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रविवार, अक्टूबर 21, 2018

कथित धार्मिक परम्पराओं में विभ्रमित मध्यम वर्ग


कथित धार्मिक परम्पराओं में विभ्रमित मध्यम वर्ग
वीरेन्द्र जैन

ईसा मसीह ने सूली पर चढते समय कहा था कि हे प्रभु इन्हें माफ कर देना ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं। आज जो कुछ भी धर्म संस्कृति के नाम पर हो रहा है वह ऐसा ही है। एक ऐसी अन्धी भेड़ चाल में मध्यम वर्ग भागा जा रहा है कि उसे होश ही नहीं है कि वह क्या कर रहा है। रावण को जलते हुए देखने को वह धर्म समझ रहा है और दुर्घटनाओं में मर जाने तक में वह दूसरों की भूल तलाशता है और अपनी भूल पर पश्चाताप नहीं करता।  
केवल एक अमृतसर में रावण दहन के दौरान घटी घटना ही अकेली दुर्घटना नहीं है अपितु प्रति वर्ष हजारों लोग किसी विशेष दिन पर किसी विशेष धर्मस्थल में पहुँचने में न केवल सड़क दुर्घटनाओं के शिकार हो जाते हैं अपितु भीड़ की भगदड़ में कुचल कर मर जाते हैं। वे जल्दी जल्दी कथित धर्मलाभ लेने के चक्कर में इतने स्वार्थी और अमानवीय हो जाते हैं कि भगदड़ में कोई व्यक्ति एक बार गिर जाता है तो वह दुबारा उठ ही नहीं पाता अपितु सैकड़ों लोग उसे कुचलते हुए आगे बढते जाते हैं। वे नहीं जानते कि ऐसी अमानवीयता धर्म की मूल भावना के ही खिलाफ है। किसी दर्शन पूजा से पुण्य लाभ का सन्देश देने वाले धर्म ने ही मानवीयता के सन्देश भी दिये हैं।
सभी धर्मों में उपवास के लिए कहा गया है और उसका प्रमुख उद्देश्य जीवन में अनुशासन लाना व इन्द्रियों की दासता से मुक्त होना होता है। किंतु पहले धर्मस्थल तक पहुँचने की कोशिश में वे सारे अनुशासन भूल जाते हैं। वे केवल दूसरे की देखादेखी किसी दिन विशेष को पहुंच कर वह सब कुछ करना चाहते हैं जिसे उनके वर्ग के दूसरे लोग करते आ रहे हैं और वे उससे पीछे नहीं रहना चाहते। किसी समय संतोषी माता का व्रत शुक्रवार को करने वाली लाखों महिलाओं ने एक दूसरे की नकल में यह किया था पर आज कोई व्रत करता नजर नहीं आता। उन्हें याद ही नहीं कि वे कब क्या और क्यों कर रहे थे। उच्च मध्यम वर्ग की नकल में निम्न मध्यम वर्ग भी जानवरों की तरह रेल के डिब्बों में ठुंसे हुये, भूखे प्यासे, जागे, या अधसोये गन्दा पानी और बासा भोजन खाते हुए वहाँ तक पहुँचते हैं और वैसी ही अवस्था में वापिस लौटते हैं। वे कभी इस बात का परीक्षण नहीं करते कि इससे उन्हें क्या हासिल हुआ है। पिछले दिनों विकसित उच्च मध्यम वर्ग के पास निजी वाहनों की संख्या भी बड़ी है किंतु मार्गों का विकास व सुधार उस अनुपात में नहीं हुआ है, जिसका परिणाम यह हुआ कि खराब मार्गों पर एक साथ अत्यधिक वाहनों के बीच होने वाली जल्दी पहुँचने की प्रतियोगिता में पचासों दुर्घटनाएं घटती हैं जिनमें न केवल सैकड़ों लोग मरते हैं अपितु हजारों जीवन भर के लिए विकलांग हो जाते हैं जो फिर भी यह मानते हैं कि देवता की कृपा से वे जीवित बच गये। मन्दिर बनवाने के लिए एक दिन में ही लाखों करोड़ों जोड़ लेने वाला समाज धर्मस्थल तक की सड़क बनवाने के लिए कुछ नहीं करता।  
किसी उद्देश्य विशेष के लिए झांकियों को किसने कब शुरू किया था यह अधिकांश लोग नहीं जानते व उनके वर्तमान स्वरूप को ही वे सदियों पुराना परम्परागत धार्मिक कार्य समझते हैं और उसमें आने वाले किसी भी व्यवधान के विरुद्ध जान देने की हद तक उत्तेजित हो सकते हैं। वे इनके लिए न केवल दूसरे धर्म वालों से उलझ सकते हैं अपितु अपने धर्म के दूसरे झांकी वालों से भी टकरा सकते हैं। विज्ञान की नई से नई उपलब्धि को भी वे अपनी परम्परा में समाहित मान लेते हैं और उसके लिए लड़ मर जाते हैं। झांकियों में लाउडस्पीकर, डीजे, बुरी फिल्मी धुनों पर रिकार्डिड भजन, रंगीन लाइटें, बड़े बड़े पंडालों में प्लास्टर आफ पेरिस की विशालकाय मूर्तियां और उनकी मँहगी सजावट के स्तेमाल को शुरू हुए बहुत दिन नहीं हुये किंतु उनकी रक्षा, धर्म की रक्षा की तरह की जाने लगी है। कागज का रावण जलाने और उसमें बारूद के पटाखों के स्तेमाल सहित आतिशबाजी को भी सैकड़ों साल नहीं हुये किंतु उसको इतना जरूरी माना जाने लगा है जैसे यह पौराणिक काल से चला आ रहा हो। दीपावली का नाम ही दीपों की श्रंखला को जलाने के कारण ही पड़ा था किंतु अगर आज किसी शहर में दीवाली के दिन बिजली न आये तो शहर में विद्युत मंडल का कार्यालय तक फूंका जा सकता है। दूसरी ओर खील बताशों के त्योहार में चाकलेट और शराब की बिक्री अपने रिकार्ड तोड़ने लगी है, पर खील बताशे भी अपनी जगह यथावत हैं। विडम्बना यह है कि हम पुराने को छोड़े बिना नई नई चीजें अपनाते जा रहे हैं और जीवन को कबाड़ से भरते जा रहे हैं। मध्यम वर्ग की नकल निम्न मध्यम वर्ग करता है और वह उसमें अपनी अर्थ व्यवस्था को बिगाड़ लेता है। तीर्थयात्रा और पर्यटन का ऐसा घालमेल होता जा रहा है कि दोनों में से कोई भी ठीक तरह से नहीं हो पा रहा है। लोग अकारण मँहगे होते जा रहे पैट्रोल, डीजल, गैस आदि के बारे में एकजुट प्रतिरोध के बारे में सोचे बिना उनका स्तेमाल बढाते जा रहे हैं , एक स्तम्भकार ने सही लिखा है कि कम से कम झांकियों में तो समाज का सही चित्रण करते हुए गलत के प्रति अपना प्रतिरोध दर्शाया जा सकता है, पर उसमें वही पौराणिक दृश्य दिखाये जा रहे हैं।
आयोजन स्थलों पर स्वच्छता, वृक्षारोपण, जल के स्तेमाल की मितव्यता का कोई सन्देश नहीं दिया जाता इसे किसी भी भंडारे के बाद उस स्थल को देख कर समझा जा सकता है। धर्म के नाम पर होने वाले इन बेतरतीब तमाशों में अनुशासन हीन भीड़ के बढते जाने और व्यवस्थाओं के प्रति ध्यान न दिये जाने के कारण भविष्य में भी दुर्घटनाएं बढने ही वाली हैं। इन दुर्घटनाओं के लिए भले ही राजनीतिक दल इस या उस सरकार या नेता को दोष देकर अपना उल्लू साधने की कोशिश करें पर अगर समय से नहीं चेते तो जान से हाथ तो जनता ही धोयेगी।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629



शनिवार, जनवरी 20, 2018

क्या तोगड़िया सफल हो गये हैं ?

क्या तोगड़िया सफल हो गये हैं ?


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वीरेन्द्र जैन 
भाजपा अपने पूर्व रूप भारतीय जनसंघ के समय से सच को जानते समझते हुए, राजनीतिक स्वार्थवश गढी हुयी कहानियों, बनाये गये इतिहासों, और मिथकों का सहारा लेती रही है। ऐसा करते समय उन्हें अनेक प्रचारकों का सहारा लेना होता है, जिसमें यह खतरा हमेशा बना रहता है कि ऐसे सहयोगी असंतुष्ट होने की दशा में सारी कूटनीति का खुलासा कर के ताश के महल को धाराशायी कर सकते हैं। यही कारण रहा है कि भाजपा ने हमेशा मीडिया को नियंत्रित करने की नीति प्राथमिकता पर रखी है, जिसमें वह अब तक सफल रही है। मोदी शाह काल में तो सच को सामने न आने देने के मामले में अति ही कर दी गई है।
उल्लेखनीय है कि भाजपा के पहले अध्यक्ष मौल्लि चन्द्र शर्मा ने संघ के हस्तक्षेप से नाराज होकर ही त्यागपत्र दिया था, व बलराज मधोक जैसे पार्टी अध्यक्ष ने पदमुक्त होने के बाद बहुत सारे रहस्य खोले थे किंतु वे आमजन तक नहीं पहुँच सके। उल्लेखनीय यह भी है कि पिछले वर्षों में जब उमा भारती ने पार्टी छोड़ कर नई पार्टी बनाई थी तब तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा था कि भाजपा में कभी खड़ा विभाजन नहीं हुआ, अर्थात यह दो फाड़ नहीं हुयी, जिन छोटे मोटे लोगों ने पार्टी से दूरी बनाई है वे हाशिए पर ही रहे। उनकी यह बात सही साबित हुई जब शिवराज सिंह के मुखर विरोध के बाद भी उमा भारती की पार्टी का भाजपा में विलय हो गया, बस शर्त केवल यह रही कि वे अपने मूल क्षेत्र मध्य प्रदेश में सक्रियता नहीं दिखायेंगीं, जहाँ उन्होंने कभी पार्टी को सत्ता दिलवायी थी व अलग पार्टी बना कर विधानसभा चुनाव लड़ने पर 12 लाख वोट प्राप्त किये थे। सखलेचा, कल्याण सिंह, मदनलाल खुराना, येदुरप्पा, केशू भाई पटेल, जसवंत सिंह, योगी आदित्यनाथ, आदि अनेक लोगों का विरोध अल्पावधि तक ही रहा और वे लौट कर घर वापिस आ गये। एक समय था जब 2004 का आम चुनाव हारने की जिम्मेवारी मोदी पर डालते हुए आज की सबसे बड़ी समर्थक स्मृति ईरानी ने उन्हें गुजरात के मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए अनशन भी किया था। प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित होने तक नरेन्द्र मोदी का चारों ओर से विरोध हुआ किंतु उसके बाद तो उनकी ऐसी अन्धभक्ति पैदा की गयी कि उन्हें देवता का दर्जा दिया जाने लगा, सम्बित पात्रा जैसे प्रवक्ताओं ने तो टीवी चैनलों पर उन्हें पिता तुल्य बतलाया। मोदी ने अपने अन्ध समर्थन की दम पर अमित शाह को न केवल निर्विरोध अध्यक्ष के पद पर प्रतिष्ठित कर दिया गया, अपितु राज्यसभा में भी बैठा दिया गया। अडवाणी, जोशी, शांता कुमार, गोबिन्दाचार्य की बोलती बन्द कर देने के बाद शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आज़ाद, भोला सिंह, आदि की आवाज तूती की आवाज बन कर रह गयी। पुणे के सांसद नाना पटोले ने तो स्तीफा ही दे दिया। किंतु पूर्ण सत्ता का पहली बार रसास्वादन कर रहे भाजपा के भक्त समर्थकों पर कोई असर नहीं हुआ भले ही नोट बन्दी, जीएसटी आदि अनेक असफल योजनाएं व्यापक आलोचना का शिकार हुयी हों और  दिल्ली, पंजाब और बिहार के चुनावों में करारी हार के साथ गोवा व मणिपुर में दल बदल का सहारा लेना पड़ा हो।
ऐसी स्थिति में संघ के ही समान महत्व के एक सहयोगी संगठन के प्रमुख तोगड़िया द्वारा मोदी की ओर इशारा करते हुए सीधे एनकाउंटर का आरोप लगाना बहुत बड़ी घटना है। शाह मोदी के प्रबन्धन से चुनाव जीत कर सत्ता सुख पा रहे समर्थकों की सम्वेदनाएं मौथरी हो चुकी हैं। वे यह भूल चुके हैं कि संसद में दो सदस्यों की संख्या तक पहुँच चुकी भाजपा को दो सौ तक पहुँचाने में राम जन्मभूमि के सुप्त विषय पर आन्दोलन खड़ा करने में योजनाकार गोबिन्दाचार्य व अडवाणी की हिंसा उकसाने वाले नारों की रथयात्रा व उमा भारती समेत विश्व हिन्दू परिषद के तोगड़िया, ऋतम्भरा जैसे लोगों के उत्तेजक भाषणों, त्रिशूल दीक्षा, विवादास्पद स्थलों पर सरस्वती पूजा, आदि की बड़ी भूमिका रही थी। इनके सहारे कभी जो ध्रुवीकरण किया गया उसी के असर को गुजरात के नरसंहार व मोदी शाह की चुनावी योजनाओं में भुनाया गया है।
जब भी संघ परिवार में मतभेद उभरता है तब संघ प्रमुख अपने विशेष अधिकार का प्रयोग करके शांत करते रहे हैं। संजय जोशी भले ही संघ के प्रिय लोगों में रहे हैं किंतु मोदी से नाराजी के चलते उन्हें कोने में बैठाने  में भी संघ के हस्तक्षेप की भूमिका रही है। उल्लेखनीय है कि तोगड़िया द्वारा बताये गये घटनाक्रम से एक दो दिन पहले उनकी भैयाजी जोशी और ऋतम्भरा के साथ बैठक हुयी थी। इससे पूर्व भुवनेश्वर में 29 दिसम्बर को विहिप के कार्यकारी बोर्ड की बैठक में तोगड़िया को कार्यकारी अध्यक्ष न बनने देने की कोशिश हुयी थी और गुजरात चुनाव में उन पर भाजपा विरोधी काम करने के आरोप भी सामने आये थे, किंतु न तो कार्यकारी अध्यक्ष तोगड़िया को हटाया जा सका और न ही अध्यक्ष राघव रेड्डी को हटाया जा सका। मोदी शाह जैसे लोगों को असहमति बिल्कुल भी स्वीकार नहीं होती इसलिए बहुत समय से लम्बित प्रकरणों को सामने लाया गया।
विहिप का ध्रुवीकरण ही भाजपा का मूल आधार रहा है। अगर किसी नाराजी में उसकी पुरानी योजनाओं का विश्वसनीय खुलासा हो जाता तो उसके विरोधियों की कही बातों को बल मिलता व उसकी ज्यादा किरकिरी होती । यह स्थिति संघ परिवार में किसी के हित में नहीं होती,  इसलिए हमेशा की तरह बात दबा दी गयी। तोगड़िया ने भी किसी ब्लैकमेलर की तरह अपने पूरे पत्ते नहीं खोले, और उचित समय का नाम लेकर धमकी दे दी। यह सौदेबाजी का अन्दाज़ था, इससे लगता है कि यह मामला अब ठंडे बस्ते में चला गया। अगर प्रकरण पहले ही वापिस लिये जाने का फैसला हो गया था तो उसे तीन साल तक कोर्ट को क्यों नहीं बताया गया व अभी सामने आने में तीन दिन क्यों लग गये! तोगड़िया ने सही समय पर नस दबा दी और बाजी पलट गयी। उमा भारती भी हमेशा इसका फायदा उठाती रही हैं।
इस घटनाक्रम से मोदी कमजोर पड़े हैं और सत्ता प्राप्ति की योजनाओं में किये गये अवैध, अनैतिक कामों में भागीदारी करने वालों का दबाव बढ सकता है। भाजपा की सफलता में महाभारत की तरह की कूटनीतियों की बड़ी भूमिका रही है, किंतु कूटनीति दुधारी तलवार होती है वह कभी कभी खुद को भी नुकसान पहुँचा देती है। सच तो यह है कि “ दादी के मरने का दुख नहीं है, दुख तो यह है कि मौत ने घर देख लिया है”।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
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शुक्रवार, अक्टूबर 13, 2017

जनान्दोलनों का विकृतीकरण

जनान्दोलनों का विकृतीकरण
वीरेन्द्र जैन
सुप्रसिद्ध लेखक व वामपंथी विचारक राजेन्द्र यादव ने अपने एक सम्पादकीय आलेख में कुछ इस तरह लिखा था कि हमारे विरोधी कई तरह के हथकण्डे स्तेमाल करते हैं। पहले वे विरोध करते हैं पर जब उसमें सफल नहीं हो पाते तब हमारे विचार को विकृत करके पेश कर नफरत पैदा करते हैं, और उसमें भी सफल न हो पाने पर वे विलीनीकरण करते हुए कहते हैं कि हमारा रास्ता तो एक जैसा है और हमारी भाईबन्दी है। उन्होंने बुद्ध धर्म का उदाहरण देते हुए बताया था कि एक समय उनका बहुत विरोध किया गया यहाँ तक कि हिंसक संघर्ष में उनके हजारों मठ नष्ट कर दिये गये व मूर्तियां तोड़ दी गयीं। उसके बाद विकृतीकरण का दौर आया और तरह तरह से उनके नियमों आचरणों का मखौल बनाया गया। बुद्धू शब्द भी बुद्ध को विकृत करके जन्मा है। पर उसके बाद बुद्ध को विष्णु के अवतार के रूप में मान्यता दे दी गयी और उनको विलीन करने की कोशिश की गयी। उल्लेखनीय है कि अभी हाल ही में भाजपा के एक सांसद मेघराज जैन ने जैन धर्माबलम्बियों को अल्पसंख्यक घोषित किये जाने को एक षड़यंत्र बताते हुए उसे हिन्दू धर्म की ही एक शाखा बताया व मांसाहारियों के साथ अल्पसंख्यक होने की घोषणा को वापिस लेने की मांग की है। रोचक यह है कि इसी दौरान उन्हीं के राज्य के एक विधायक ने स्लाटर हाउस के विरोधियों को जबाब देते हुए कहा कि देश का अस्सी प्रतिशत हिन्दू भी मांसाहारी है, उसके बारे में भी सोचो।
अब आये दिन देखा जाने लगा है कि मजदूरों, कर्मचारियों के आन्दोलन में जलूस धरने प्रदर्शन की जगह कुछ लोग सामूहिक सद्बुद्धि यज्ञ हवन या भजन कीर्तन करने लगे हैं। यह बात अलग है कि अगर प्रबन्धन और श्रमिक संगठनों के बीच पहले से सांठ गांठ न रही हो तो ऐसे धार्मिक आयोजनों के प्रभाव में कभी कोई मांग पूरी नहीं हुयी है। ऐसे आयोजनों के पीछे एक और कूटनीति छुपी होती है और वह है मजदूरों के बीच में साम्प्रदायिक विभाजन कराना। जब एक धर्म विशेष की पूजा पद्धति को आन्दोलन का हिस्सा बनाया जायेगा तो श्रमिक एकता में विभाजन को रोका नहीं जा सकेगा। इसका ही परिणाम हुआ है कि कई प्रबन्धकों ने एक धर्म विशेष के लोगों को कार्यालय के समय में उपासना के लिए छुट्टी दे कर विभाजन के बीज बो दिये हैं जबकि होना यह चाहिए था कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के कार्यालयों/ कारखानों में समस्त उपासनाएं उनके व्यक्तिगत समय में ही सीमित होना चाहिए और भक्ति या नौकरी में से किसी एक का चुनाव करने का नियम कठोरता से लागू होना चाहिए। देखने में यह बहुत मामूली सी सुविधा लगती है पर इसका प्रभाव दूरगामी होता है।
हिन्दू पुराणों में दुनिया के निर्माण के लिए एक देवता का उल्लेख आया है जिन्हें विश्वकर्मा का नाम दिया गया है। बाद में तो देश की कुछ श्रमिक जातियों जैसे लोहार, बढई आदि ने अपना जातिनाम विश्वकर्मा रखना शुरू कर दिया। दुनिया में रूस की क्रांति के बाद जब मजदूरों किसानों का महत्व पहचाना गया तब अमेरिका के शिकागो से शुरू हुये मई दिवस [मजदूर दिवस] का आयोजन हमारे देश में भी जोर शोर से होने लगा। श्रमिकों के बीच कम्युनिष्ट पार्टी से जुड़े मजदूर संगठनों की लोकप्रियता भी बढने लगी। हमारे देश के पहले संसदीय चुनावों में कम्युनिष्ट पार्टी मुख्य विपक्षी पार्टी की तरह उभरी थी। जब दुनिया में शीत युद्ध का दौर आया तो कम्युनिष्ट पार्टियों के समानांतर दक्षिणपंथी पार्टियों को उभारा गया। इनमें आरएसएस की पृष्ठभूमि वाली जनसंघ जो बाद में भाजपा की तरह अवतरित हुयी मुख्य दक्षिणपंथी पार्टी की तरह सामने आयी। इसने वामपंथी श्रमिक संगठनों के समानांतर अपने श्रमिक संगठन बनाये जो भारतीय मजदूर संघ के बैनर तले गठित किये गये। इस संघ ने कालांतर में मई दिवस के समानांतर विश्वकर्मा दिवस मनाना शुरू कर दिया व धार्मिक प्रतीक के साथ जुड़े होने के कारण हिन्दू मजदूरों में सहज लोकप्रियता प्राप्त कर ली। वैसे तो पुराणों में विश्वकर्मा जयंती दीवाली त्योहर के अगले दिन होने का उल्लेख आया है किंतु समस्त कार्यालयीन कार्य ग्रेगेरियन कलेंडर के हिसाब से होने के कारण उसे प्रतिवर्ष 17 सितम्बर को मनाया जाने लगा व भारतीय मजदूर संघ की मांग पर प्रबन्धन ने उस दिन छुट्टी भी घोषित कर दी। इस तरह मजदूरों के बीच धार्मिक आधार पर भेद पैदा कर दिया गया। नई इकाइयों के प्रारम्भ करने में हिन्दू विधि से पूजा पाठ करने, भूमि पूजन करने आदि की परम्परा ने भी जोर पकड़ा।
धर्मनिरपेक्ष समाज में साम्प्रदायिक आधार पर विभाजन के बीज बोने के बारीक काम तो बहुत सारे होते रहे जो तुरंत समझ में नहीं आते किंतु इनके परिणाम दूरगामी होते हैं, जैसे कि ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित स्कूलों की लोकप्रियता के समानांतर संघ ने शिक्षण संस्थाएं संचालित करना प्रारम्भ कीं और अपने स्कूलों का नाम सरस्वती शिशु मन्दिर रखा। विद्यालय की जगह मन्दिर का नामांकरण किसी संस्था को धर्म विशेष से जोड़ देने का महीन खेल था, जिसमें दोपहर के भोजन अवकाश के समय भोजन मंत्र का पाठ किया जाना अनिवार्य था। बाद में इनकी सरकारें बन जाने पर तो समस्त योजनाओं का नामांकरण ही इस तरह से किया जाने लगा जिसमें धर्म विशेष से सम्बन्ध प्रकट होता था। सत्ता के सुख भोगते रहने तक काँग्रेस इस के प्रति उदासीन रही।
मजदूरों के विभिन्न संगठनों में बँट जाने के बाद भी उनमें धार्मिक और जातियों के आधार पर भेद हो जाने से उनकी ताकत कमजोर हुयी है। नियमित मजदूरों की संख्या निरंतर कम होती जा रही है व ठेका मजदूरों की संख्या बढ रही है। बेरोजगारी के कारण प्रतियोगिता बढने के कारण भी वे अपनी मांगों के लिए दबाव नहीं बना पाते जिससे प्रबन्धन ही लाभ की स्थिति में रहता है। इन दिनों धर्म के नाम पर श्रम के शोषण के जो खेल चल रहे हैं उन्हें समझने की जरूरत है। गौरक्षा, घर वापिसी, मन्दिर मस्ज़िद, लव जेहाद, तीन तलाक, धर्म परिवर्तन, आदि ऐसे ही तुरुप के पत्ते हैं जो विभिन्न तरह के आन्दोलनों के खिलाफ पटक दिये जाते हैं जिन्हें खरीदा हुआ मीडिया हवा देता रहता है।
सरकारी मशीनरी और लोकतांत्रिक स्तम्भों/ संस्थाओं को पूर्ण धर्म निरपेक्ष बनाये बिना शोषण की शक्तियों से मुकाबला कठिन है।   
वीरेन्द्र जैन
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