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शुक्रवार, सितंबर 20, 2019

मूर्तियों का आकार

मूर्तियों का आकार
वीरेन्द्र जैन
गत दिनों भोपाल में गणेश की एक विशालकाय मूर्ति का विसर्जन करते हुए नाव पलट गयी थी और उसमें बारह युवा असमय ही मृत्यु का शिकार हो गये। ऐसे में जैसा कि होता है सत्ता में बैठे नेताओं ने जनभावनाओं के अनुरूप मुआवजे की बड़ी राशि देने की घोषणा करते हुए मृतक के परिवार के सदस्य को सरकारी नौकरी देने तक के वादे किये। कुछ लापरवाह छोटे प्रशासनिक अधिकारियों पर कार्यवाही की और नियमों को कठोर बनाने की घोषणा भी की। दूसरी ओर विपक्ष में बैठे नेताओं ने अपना कर्तव्य निभाते हुए दिये गये मुआवजे को कम बताते हुये उससे दुगनी राशि देने की मांग कर डाली और राजनीति करते हुये जिम्मेवारी को उच्च अधिकारियों से लेकर मंत्रियों तक फैलाने की कोशिश की, भले ही उनके कार्यकाल में घटित ऐसी ही दुर्घटनाओं में मुआवजे की राशि बहुत कम रही थी। सुधार की जो त्वरित घोषणाएं की गयीं उनमें मूर्ति का आकार छह फीट तक रखने की बात भी घोषित की गयी। घटना की सनसनी एक सप्ताह तक रही।
कुछ ही दिन बाद नवरात्रि पर्व का प्रारम्भ होने जा रहा है, जिसके लिए मूर्तियों का निर्माण अपने अंतिम दौर पर हैं। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार केवल भोपाल ही में दस फीट और उससे अधिक ऊंचाई की पाँच सौ से अधिक मूर्तियां निर्मित हो रही हैं। प्रशासन में इतहा साहस नहीं है कि वह इन मूर्तियों का निर्माण रुकवा सके या इनके विसर्जन को रोक सके। सरकार के सुधारात्मक सुझाव को भी धार्मिक मामला बता कर धार्मिक उन्मादियों ने सरकार के खिलाफ बयान देना शुरू कर दिया है। तय है कि विसर्जन का कार्यक्रम प्रति वर्ष की भांति ही होगा और दुर्घटनाओं की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। धर्मदण्ड के आगे दण्डवत हो जाने वाले पुलिस बल से यह उम्मीद भी नहीं की जा सकती कि वह धर्म के नाम पर कुछ भी बेतुके काम किये जाने को रोकने की कोशिश करे, भले ही उस काम की कोई सुदीर्घ परम्परा न हो। 
मूर्ति पूजा का उद्देश्य अतीत के पौराणिक देवताओं को वर्तमान समय में महसूस करना होता है इसलिए यथा सम्भव उनका स्वरूप वैसा ही बनाये जाने की कोशिश की जाती है जैसा कि पुराणों में उनका वर्णन किया गया है। वैसा ही रूप, वैसे ही वस्त्र, वैसे ही शस्त्र, वाहन, और उनके चरित्र के अनुसार उनकी मुख मुद्राएं बनायी जाती हैं। किंतु जब से राजनीति में धर्म की भूमिका ने प्रवेश किया है तब से उसका स्वरूप ही बदल गया है। आज से लगभग सौ वर्ष पूर्व तिलक ने गणपति समारोहों का प्रारम्भ महाराष्ट्र में इसलिए किया था ताकि सार्वजनिक स्थान पर हर जाति धर्म के लोग स्वतंत्रता की लड़ाई में साथ आ सकें। आजादी के बाद आयी वोटों की राजनीति में लाभ लेने हेतु एक हिन्दुत्ववादी पार्टी ने पूरे हिन्दीभाषी क्षेत्र में इसका विस्तार किया। वर्षा की ऋतु के बाद सभी जगह उत्सव मनाने की परम्परा थी किंतु प्रत्येक क्षेत्र में ये उत्सव अलग अलग तरह से मनाये जाते थे। महाराष्ट्र में गणपति की स्थापना के रूप में होता था तो बंगाल में दुर्गा पूजा के रूप में, गुजरात में नवरात्रि में देवीपूजा के साथ गरवा के रूप में होता था तो हिन्दीभाषी क्षेत्र में रामलीलाएं व दशहरा उत्सव होते थे, कांवड़ यात्रा भी निकलती थी। केरल में मनाये जाने वाला ओणम भी इसी महीने पड़ने वाला त्योहार है। वोटों की राजनीति में धर्म के प्रयोग ने सभी जगह सभी तरह के उत्सव मनाये जाने शुरू करवा दिये व कुछ लोगों को इन उत्सवों का व्यापार करना सिखा दिया।
व्यापारिक मनोवृत्ति ने निर्धन, दलित, और पिछड़े वर्ग के बेरोजगार युवाओं को झांकी सजाने और निकालने का स्वरोजगार दे दिया। वे धर्म की राजनीति करने वाले नेताओं के संरक्षण में अपने समूह की ताकत के बल पर बिना हिसाब किताब का चन्दा एकत्रित करने लगे और धार्मिक भावनाओं का छोंक लगा होने से सरलता से वसूलने भी लगे। यह जानना रोचक हो सकता है कि सर्वाधिक आकर्षण वाली झांकियां बाजारों के आसपास ही लगायी जाती हैं क्योंकि व्यापारिक अनिश्चितता में जी रहा दुकानदार युवा समूह से किसी प्रकार का टकराव नहीं चाहता। ज्यादा चन्दा वसूलने के लिए झांकियों में प्रमुख तीर्थों की प्रतिकृतियों के साथ साथ मूर्तियों का आकार भी विशाल से विशालतर होता गया। आयोजक यह भूलते गये कि किसी मूर्ति का आकार धार्मिक पुराणों में रचे गये पात्रों के अनुरूप ही होना चाहिए। पुराणों में देवताओं का आकार सामान्य मानवाकार ही दर्शाया गया है जबकि राक्षसों या खलनायकों को विशाल आकार में बताया गया है। राजनीतिक व्यापार के चक्कर में वे देवताओं का स्वरूप ही बदले दे रहे हैं। उल्लेखनीय है कि देश में लाखों लोगों की पूज्य वैष्णो देवी की मूर्तियां आकार में सामान्य होते हुए भी महत्व में बड़ी हैं। दशहरा में रावण, मेघनाथ और कुम्भकरण के पुतले लम्बे से और और लम्बे बनाये जाते रहे हैं जिनसे सामान्य आकार के पात्र ही संहार कर मुक्ति दिलाते हैं।
गणपति उत्सव, नवरात्रि उत्सव, गरवा आदि की व्यावसायिकता में कोई पंडित या विद्वान यह बताने आगे नहीं आता कि इन उत्सवों को मनाने की शास्त्रोक्त सही विधि क्या हो सकती है, और इसमें आयी विकृतियों को रोका जाना चाहिए। उन्हें ऐसा करने पर धर्मविरोधी ठहराये जाने का खतरा महसूस होता है इसलिए वे दबंगों द्वारा राजनीतिक व्यापार के हित में बनायी जा रही व्यवस्थाओं को चलाने लगते हैं। दुकानदार भी अपने बाज़ार के आसपास ऐसे उत्सव आयोजित कराने में रुचि रखते हैं ताकि भक्तों और ग्राहकों के बीच बचे खुचे भेद को भी मिटाया जा सके। त्योहारों के दौरान दैनिक उपयोग की वस्तुएं मंहगी बिकने लगती हैं, भले ही उत्सवों, व्रतों से उनका कोई सम्बन्ध नहीं हो। कारण पूछने पर वे बताते हैं कि उन्हें उत्सव के लिए चन्दा भी देना पड़ता है। कुल मिला कर इन उत्सवों का बोझ भी आम आदमी पर पड़ता है। उत्सवों के दौरान उचित दामों में सामग्री मिलने का कोई अभियान कभी नहीं चला जबकि उसे महूर्त बता कर हर व्यापारी अपना कीमती सामान बेचने के विज्ञापन देने लगता है। पितृपक्ष के दौरान नया सामान न खरीदे जाने का विश्वास लोगों में रहा है किंतु पिछले कुछ वर्षों से इसी दौरान कुछ लोकप्रिय बाबा बयान देते हैं कि पितृपक्ष में नया सामान खरीदने में कोई दोष नहीं है। जाहिर है कि उक्त अनावश्यक बयान व्यापारियों द्वारा दिलाये गये होते हैं। उत्तर भारत में नये नये फैले गणेश, दुर्गा, और गरवा उत्सवों के बीच में हमारी रामलीला विलीन हो गयी जो उत्तर भारत का सबसे पुराना जननाट्य था।
जो नये उत्सव आये हैं उनकी आचार संहिता भी बनना चाहिए और उसे अनैतिक व्यापार बनने से रोकने के लिए उसके हिसाब किताब और प्रबन्धन की देख रेख करने वाली भी कोई संस्था होनी चाहिए। अब प्रत्येक मुहल्ले के दबंगों को धन एकत्रित करने के लिए यह साधन बनता जा रहा है। धर्म की राजनीति करने वाले भी अपना प्रभावशाली कैडर भी इसी भीड़ से चुनने लगे हैं।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629
           

सोमवार, फ़रवरी 18, 2013

तीर्थ स्थलों में हादसे- बढते व्यक्तिवाद का दुष्परिणाम


तीर्थस्थलों में हादसे- बढते व्यक्तिवाद का दुष्परिणाम
वीरेन्द्र जैन
       हिन्दुओं में धर्म को मूलतयः व्यक्तिगत कर्म के रूप में ही विकसित किया गया था तथा सामूहिक रूप से किये जाने वाले धार्मिक कर्म बहुत ही कम रहे हैं। जब अंग्रेजों ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच टकराव पैदा किया तब प्रतिक्रिया में प्रभावित हिन्दुओं ने भी धार्मिक कर्मों में सामूहिकता की प्रतियोगिता शुरू की पर जिसका असर संघ परिवार के लगातार प्रयासों के बाद भी बहुत कम है।
       अपवाद स्वरूप कुम्भस्थलों या नदियों के तटों पर साधु समाज द्वारा किये जाने वाले सामूहिक स्नान और एक साथ एकत्रित साधु संतों के दर्शन व सानिध्य का लाभ लेने के लिए बड़ी संख्या में भक्त लोग कुम्भ स्नान के लिए जाते रहे हैं। इस अवसर पर एक ही स्थान पर ढेर सारे लोग एक साथ एकत्रित होकर स्नान करते रहे हैं, तथा अव्यवस्था केवल साधु संतों के पहले स्नान करने के अधिकार पर हुए झगड़ों के कारण ही फैलती रही है। पहले न केवल आबादी ही कम थी अपितु वर्ण व्यवस्था कठोर होने के कारण गैर सवर्ण लोग इस तरह के कामों में कम ही भाग लेते थे। दूसरी ओर चाह कर भी गैर सवर्णों की आर्थिक स्थिति उन्हें ऐसे अवसर कम देती थी। आजादी के बाद न केवल पिछड़ों और दलितों की आर्थिक स्थिति में ही सुधार हुआ है अपितु विभिन्न पदों पर आरक्षण मिलने के कारण उनका हीनता बोध भी कम हुआ है। यही कारण है कि अब ऐसे आयोजनों में भीड़ बड़ने लगी है। हमारी व्यवस्था ने जब दलितों पिछड़ों को सामाजिक बराबरी पर लाने के लिए आधी अधूरी जो व्यवस्थाएं कीं उसमें उन्हें नई सामाजिक चेतना से दीक्षित नहीं किया। उल्लेखनीय है कि अम्बेडकर जी ने कहा था कि मैं पैदा भले ही हिन्दू धर्म में हुआ हूं पर एक हिन्दू की तरह नहीं मरूंगा। इसीलिए उन्होंने अपनी म्रत्यु से कुछ पहले ही पाँच लाख लोगों के साथ धर्म परिवर्तन कर लिया था। दुर्भाग्य से लाभांवित गैर सवर्ण बराबरी का मतलब सवर्णों जैसे जीवन को जीने से नापने लगे व उन जैसे आचरण ही अपनाने लगे जबकि उनमें से बहुत सारे आचरणों में सुधार वांछित थे। जब भीड़ बढती है तो उसे नियंत्रित करने की जरूरत इसलिए भी होती है क्योंकि ये सारे लोग किसी सामूहिक कर्म के लिए एकत्रित नहीं होते हैं अपितु अपना व्यक्तिगत पुण्य अर्जित करने के लिए एक तय स्थान पर आ कर और तय महूर्त पर स्नान आदि के द्वारा पुण्य अर्जित करना चाहते रहे हैं। हिन्दू तीर्थ स्थलों पर जो भी हादसे हुए हैं वे दूसरों से पहले अपना धार्मिक काम सम्पन्न करने की होड़ में ही हुए हैं। स्मरणीय है कि दो वर्ष पहले नैना देवी के मन्दिर में जो हादसा हुआ था वह पहले पूजा करने के प्रयास में बलशाली लोगों द्वारा निर्बलों को कुचलते हुए आगे बढने की कोशिश में हुआ था व दुर्भाग्यपूर्ण यह भी था कि दर्जनों लोगों की मौत के बाद भी वैसी ही भगम भाग मची रही और लोग एक दूसरे से पहले पहुँचने की होड़ में लगे रहे।
       यह सचमुच बिडम्बनापूर्ण है कि जिस धार्मिक संस्कृति को दया करुणा और उदारता का जनक बताया जाता है वह घनघोर व्यकिवाद का शिकार होती जा रही है। वोट बैंक की राजनीति ने अपने अपने धर्म और जाति के लोगों की आबादी बढाने में अपना लाभ देखना शुरू कर दिया है। तत्कालीन संघ प्रमुख सुदर्शन ने तो अनेक सार्वजनिक सभाओं में हिन्दुओं को चार संतानें पैदा करने का आवाहन किया हुआ था और उसके बाद ही भाजपा शासित राज्यों में परिवार नियोजन का कार्यक्रम सुस्त पड़ गया था। यही हाल मुस्लिम समाज के नेताओं का भी है। एक ओर तो भीड़ बढने के कारण अवसरों का अभाव होता जा रहा है और दूसरी ओर धार्मिक क्षेत्र में भी व्यक्ति अपनी ताकत की दम पर दूसरों के स्वाभाविक अवसरों को नकार कर अपने लिए उन अवसरों को हथिया लेना चाहता है। इसी में कमजोर वर्ग हादसों का शिकार हो जाता है। यह बात ध्यानाकर्षण योग्य है कि ऐसे हादसों में आम तौर पर महिलाएं, वृद्ध और बच्चे ही शिकार बनते हैं। सड़कों पर होने वाले हादसों में भी यह देखा गया है कि व्यक्ति मार्गों के आकार उनकी दशा पर ध्यान न देते हुए दूसरों से आगे निकलने की होड़ में यातायात के नियमों की परवाह नहीं करते और सड़कों को वाहनों की रेस का मार्ग बना देते हैं। यातायात के इन्हीं उल्लंघनों के कारण अधिकतर सड़क हादसे होते हैं, या जाम लगते हैं।
       यह संक्रमण काल है जहाँ हमने पुरानी संस्कृति को बदले बिना नयी संस्कृति में प्रवेश कर लिया है जिससे हमारे ऊपर बोझ बढ गया है। हमारे पाँव पुरानी जमीन में गड़े हुए हैं और धड़ नई हवा में फड़फड़ा रहा है। नये वैज्ञानिक संसाधनों का प्रयोग करने वाली पीढी भी अनेक अवैज्ञानिक आचरण करती जाती है व अपनी बढी हुयी आय का एक हिस्सा अन्धविश्वासों और गलत रूढियों को बढावा देने में व्यय करती रहती है। धर्म के नाम पर कई करोड़ नाकारा पैदा हो गये हैं। ये लोग समाज पर जोंक बन कर चिपके हुए हैं तथा जो धन देश के विकास में लगना चाहिए था वह धार्मिक संस्थानों या आश्रमों में जाम होता जा रहा है। किसी धार्मिक संस्थान के पास इसकी कोई योजना नहीं है कि उन्हें उस धन का क्या करना है। इसी के परिणाम स्वरूप धार्मिक संस्थानों के आस पास अपराधों की बाढ आ गयी है व गलत राजनीति उसका दुरुपयोग कर रही है। यदि इन संस्थानों में एकत्रित धन को कुम्भ जैसे उत्सवों समारोहों की व्यवस्था में व्यय किया जाये तो दुर्घटनाएं घट सकती हैं और ये आयोजन अपेक्षाकृत अधिक सार्थकता पा सकते हैं।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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मोबाइल 9425674629