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बुधवार, दिसंबर 16, 2020

श्रद्धांजलि / संस्मरण सैयद मुहम्मद अफज़ल

 


 

श्रद्धांजलि / संस्मरण 

सैयद मुहम्मद अफज़ल 


वीरेंद्र जैन

कुछ लोग थोड़ी सी मुलाकातों में ही अपने लगने लगते हैं और उनके निधन से इतना दुख होता है जैसे पुरानी पहचान हो। यह 2020 का साल न जाने कितने और दुख देकर जायेगा।

सैयद मुहम्मद अफज़ल की एक कहानी हंस में छपी थी और ये वे दिन थे जब मैं हंस को किसी धर्मग्रंथ की तरह पढता था। यह कहानी अकबर के सेनापति अबुल फज़ल की समाधि से जुड़ी थी। अबुल फज़ल का कत्ल दक्षिण विजय से लौटते हुए रास्ते में हो गया था। कत्ल का स्थल दतिया से ग्वालियर के बीच के जंगलों में था।  

      इस कत्ल के सम्बन्ध में मेरे पिता ने एक कहानी सुनायी थी। अबुल फज़ल अकबर के सबसे विश्वस्त सलाहकार सेनापति थे और जहाँगीर [फिल्मी सलीम] से उनके विवादों के सन्दर्भ में अकबर उन्हीं से सलाह लेते थे और उन पर चलते भी थे, जिस कारण जहाँगीर उनसे नाराज रहता था। यही कारण रहा कि उनको दूर करने के लिए जहाँगीर ने उन्हें ही दक्षिण विजय के लिए भिजवाया था। संयोग से अबुल फज़ल ने दक्षिण पर विजय प्राप्त की और वह वहाँ से बहुत सारा धन और सोना लेकर आ रहा था। उस समय दतिया नगर नहीं बसा था और आज की छोटी बड़ोनी के जागीरदार श्री वीर सिंह देव थे, जो ओरछा के राजा के भाई थे। उनकी बहादुरी और अच्छे शिकारी होने का यश जहाँगीर को ज्ञात था। जहाँगीर ने उन्हें बुलवाया और अबुल फजल का सिर काट कर लाने की सुपारी दी। बदले में उसके द्वारा जीत कर लाया हुआ सारा धन देने का वादा भी किया। वीरसिंह देव महात्वाकांक्षी थे और छोटी सी रियासत से खुश नहीं थे।

      अबुल फज़ल अस्थमा का मरीज था। उन दिनों पक्के रास्ते नहीं थे और जंगलों में से रास्ता बनाते हुए चलना होता था। अपनी बीमारी के कारण अबुल फज़ल घोड़ों की टापों से उड़ने वाली धूल से बचने के लिए फौज़ से दूर हाथी पर कम सैनिकों के साथ चलता था और ज्यादातर रात्रि में सफर करता था। जब वह रात्रि में सफर कर रहा था तब वीर सिंह देव ने रास्ता भटकाने के लिए पेड़ों पर दीपक लटका दिये थे। उसके साथ के लोगों को गाँव के गलत दिशा में होने का भ्रम हो गया और वे रास्ता भटक गये। इसी दौरान वीर सिंह देव ने उनका सिर काट लिया और सिर लेकर सीधे आगरा पहुंचे जहाँ वह सिर जहाँगीर को भेंट किया। जब अबुलफज़ल के सैनिकों को पता चला तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अभी ग्वालियर से पहले आंतरी गांव में अबुलफज़ल की समाधि है। वीरसिंह देव के इस काम के बदले में उन्हें ओरछा जैसी बड़ी रियासत का राजा बना दिया गया था और बहुत सारा धन दिया गया था। वीरसिंह देव के भाई और तत्कालीन राजा बहुत धार्मिक प्रवृत्ति के थे और उन्होंने अपने भाई के लिए यह सत्ता परिवर्तन सहज स्वीकार कर लिया था और देवपूजा में लिप्त हो गये थे। जो धन जहाँगीर ने उन्हें दिया था वह बहुत अधिक था। उससे उन्होंने 52 इमारतों की नींव रखी थी। इनमें दतिया व ओरछा के सात खण्डों वाले महल भी शमिल हैं और दतिया के पास चन्देवा की बावड़ी भी है। [ओरछा के महल को तो अभी पिछले ही दिनों राष्ट्रीय धरोहर के रूप में मान्यता मिली है।] अभी भी दतिया की उड़नू की टौरिया के पास लोग खुदाई करते हुए पकड़े जाते हैं। शायद मेरे पिता को यह कहानी झांसी के सुप्रसिद्ध पुरातत्व व इतिहास विशेषज्ञ लखपत राम शर्मा ने सुनायी थी। उन्होंने ही सरकार को दतिया के गुजर्रा में सम्राट अशोक के शिलालेख की जानकारी दी थी।

जैसा कि ऐतिहासिक कहानियों में होता है अफजल साहब की कहानी में मेरे द्वारा सुनी कहानी से थोड़ा सा भेद था और में उनसे बात कर के उसका मिलान करना चाहता था। पर यह बात दिमाग में ही रही। बीच में एक शोकसभा में मेरी उनसे मुलाकात हुयी तो मैंने उनसे कहा कि आपकी वह कहानी मैंने पढी है और उसकी ऐतिहासिकता पर चर्चा करना चाहता हूं। वे खुश हुये और उन्होंने कभी भी आने को कहा। किंतु मैं अपनी व्यस्तताओं में समय नहीं निकाल सका और वैसे भी किसी जिम्मेदार अधिकारी से मुलाकात के लिए मैं उसके आमंत्रण की प्रतीक्षा की बुरी आदत से ग्रस्त हूं, सो मुलाकात नहीं हो सकी।

दूसरी मुलाकात पंकज सुबीर के उपन्यास ‘जिन्हें जुर्मे इश्क पै नाज था’ पर चर्चा के दौरान हुयी। तब तक कई वर्ष बीत चुके थे और मैं उन्हें तब तक पहचान नहीं सका जब तक कि वे बोलने के लिए मंच पर नहीं पहुंचे। उस दिन उन्होंने उपन्यास की भूरि भूरि प्रशंसा करते हुए धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में जो बोला उससे मुझे ऐसा लगा कि वे म.प्र. पुलिस सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उक्त आयोजन पर टिप्पणी लिखते हुए मैंने ऐसा लिख भी दिया था । यह तो बाद में पता चला कि मैं गलत था। इससे मुझे और खुशी हुयी कि नौकरशाही में अभी भी उम्मीदें बची हुयी हैं। उनसे लम्बी मुलाकात करने की इच्छा और बलवती हो गयी। वे आईपीएस थे और वर्तमान में आर्थिक अपराध शाखा में एडीजी थे। साहित्य से जुड़े मुहम्मद अफज़ल ज़ामिया और अलीगढ विश्व विद्यालय में रजिस्ट्रार भी रहे।  

आज फिर मुनीर नियाजी की वह नज़्म याद आ रही है- हमेशा देर कर देता हूं मैं। मुझे अफसोस रहेगा कि उनसे लम्बी चर्चा नहीं हो सकी।

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023 मो. 9425674629       

गुरुवार, नवंबर 14, 2019

अयोध्या का फैसला और भाजपा


अयोध्या का फैसला और भाजपा 
वीरेन्द्र जैन
अयोध्या के रामजन्मभूमि मन्दिर के सम्बन्ध में बहुप्रतीक्षित फैसला आ चुका है।
राजनीतिक चतुरों ने इस विवाद को ‘रामजन्म भूमि मन्दिर’ विवाद से ‘राम मन्दिर विवाद’ में प्रचारित कर दिया था, और सवाल करते थे कि बताओ अयोध्या में राम मन्दिर नहीं बनेगा तो क्या कराची में बनेगा! स्वाभाविक रूप से जो उत्तर उभरता था कि अयोध्या में ही राम मन्दिर बनेगा। यह मुद्दे की दिशा को विचलित कर देने की विधि थी। अयोध्या में एक नहीं हजारों राम मन्दिर हैं जो पुराने हैं व नये मन्दिरों के निर्माण पर कोई रोक नहीं है। वहाँ एक नहीं हजार मन्दिर और बन सकते हैं। मन्दिर का निर्माण कोई समस्या नहीं था। मुद्दा यह था कि जिस जगह पर 1528 में एक मस्ज़िद बनी थी जिसे बाबर के आदेश पर मीरबाकी ने बनवाया था। दावा था कि उस स्थान पर जिसे राम की जन्मभूमि माना जाता है, कभी रामजन्मभूमि मन्दिर था। आरोप यह था कि उक्त मन्दिर को तोड़ कर बाबरी मस्ज़िद बनायी गयी थी और पिछले लगभग सौ से अधिक वर्षों से हिन्दू उसी स्थान पर मस्जिद की जगह रामजन्म भूमि मन्दिर की पुनर्स्थापना की मांग कर रहे थे। मुगल काल से ब्रिटिश शासन काल तक इस मांग से 562 रियासतों का कोई राजा नबाब नहीं जुड़ा था इसलिए हिन्दुओं के आराध्य राम की जन्मभूमि मन्दिर की लड़ाई को बल नहीं मिल सका था। इतिहास बताता है कि धार्मिक ‘हिन्दू संगठनों’ ने 1813 में इस आधार पर पहला दावा किया था। 1859 में इस स्थान पर कब्जे के लिए हिंसा की घटना हुयी तो ब्रिटिश सरकार ने इसके चारों और कटीले तारों की बाड़ बनवायी थी। 1885 में पहली बार महंत रघुवर दास ने अदालत से मन्दिर बनाने की मांग की। 1934 में विवादित हिस्सों को तोड़ा गया था जिसकी मरम्मत ब्रिटिश सरकार ने करायी थी। कहा जाता है कि 1949 में तत्कालीन हिन्दूवादी कलैक्टर के.के. नायर के इशारे पर, रात्रि में रामलला की मूर्ति को रखवा दिया गया था। उल्लेखनीय है कि सेवानिवृत्ति के बाद यही कलैक्टर बलरामपुर से जनसंघ के टिकिट पर चुनाव लड़ कर संसद में पहुंचे थे व उसके बाद उनकी पत्नी भी सांसद बनी थीं। उन्होंने हिंसा का डर दिखा कर उस स्थान से मूर्तियों को हटाने की सलाह मानने से इंकार कर दिया था और सलाह दी थी कि केवल एक पुजारी अन्दर जाकर पूजा करेगा व जाली के बाहर से हिन्दू दर्शन कर सकेंगे। तब से मुसलमानों का प्रवेश और नमाज वहाँ बन्द हो गयी थी, और अपने अधिकार के लिए वे कोर्ट चले गये थे।
1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड द्वारा मस्ज़िद के लिए केस दर्ज करने से पहले 1950 में हिन्दू पक्ष और 1959 में निर्मोही अखाड़ा भी कोर्ट से पूजा की अनुमति मांग चुका था। 1967 के बाद उत्तर प्रदेश में अनेक गठबन्धन सरकारें बनीं जिनमें जनसंघ भागीदार रही व 1977 में केन्द्र में बनी जनता पार्टी में वे घटक की तरह सम्मलित हो गये थे किंतु उन्होंने कभी राम जन्मभूमि मन्दिर का मुद्दा नहीं उठाया। 1980 में उन्हें दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर जनता पार्टी से बाहर होना पड़ा और 1984 में श्रीमती गाँधी की हत्या के बाद हुये चुनाव में वे दो सीटों तक सिमट गये थे। अपने राजनीतिक पुनरोत्थान के लिए उन्होंने इस सुसुप्त मुद्दे को हाथ में लिया और गोबिन्दाचार्य द्वारा बनायी गयी योजना के अनुसार रथ यात्रा निकाली जिसकी सवारी श्री लालकृष्ण अडवाणी ने की।
यह टर्निंग बिन्दु था इस के साथ ही इस अभियान का दूसरा पक्ष प्रारम्भ हुआ। पहले पक्ष में केवल भावुक धार्मिक पक्षधरता थी| इसमें लड़ने के लिए न संगठन था न धन। दूसरे पक्ष में राजनीतिक पक्ष था, संगठन था और धन था।, इसमें धर्म का नाम तो था पर धर्म नहीं था। तब से राम जन्मभूमि मुद्दा गरमा गया था। तब के कमजोर प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने एक ओर शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कानून बदलवा कर जो भूल की थी उसकी बराबरी करने में अयोध्या में मन्दिर का ताला खुलवा कर दूसरी भूल कर डाली। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उन पर बोफोर्स कांड के आरोप लगाये जिसे भाजपा ने बल दिया। इससे काँग्रेस अल्पमत में आ गयी और वीपी सिंह के नेतृत्व में जनता दल की अल्पमत सरकार बनी। सीपीएम के दबाव में वी पी सिंह ने भाजपा को सरकार में शामिल नहीं किया। ग्यारह महीने में ही जनता दल बिखर गया था इसलिए काँग्रेस का मुख्य प्रतिपक्ष बनने के लिए अपेक्षाकृत संगठित भाजपा के पास उपयुक्त अवसर और हाथ में राममन्दिर अभियान था।
इस अभियान के बल पर भाजपा दो से अस्सी और फिर दो सौ तक पहुंची व इसी संख्याबल के आधार पर बाद में अटल बिहारी सरकार तक बनाने में सफल रहे। उनकी विजय का दूसरा कोई मुख्य आधार नहीं था। इसी अभियान की निरंतरता के अंतर्गत कार सेवकों के नाम से गये लोगों के कारण ही गोधरा कांड और गुजरात का नरसंहार हुआ। इसी के प्रभाव में मोदी ने गुजरात में ध्रुवीकरण के सहारे अपनी एकछत्र सत्ता हासिल की और इसी के प्रभाव में उन्होंने प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने की रेस जीती। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि भाजपा का देश की सत्ता तक पहुंचने का अभियान और राम जन्मभूमि मन्दिर एक ही आन्दोलन के हिस्से रहे हैं। इस का बने रहना भाजपा के चुनाव अभियान के लिए लाभदायक रहा है, इसलिए उसे मन्दिर बनाने की कोई जल्दी नहीं थी अपितु वे मुद्दे को गरमाये रखने में रुचि रखते थे।
सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला व्यापक जनहित में न्यायिक से ज्यादा एक प्रशासनिक फैसला है। मुख्य न्यायाधीश ने इसकी सुनवाई करते समय अपने पहले बयान में कहा था कि हमारे लिए यह आस्था का मामला नहीं अपितु भूमि के स्वामित्व का विवाद है जिसे रामलला विराजमान को लीगल एंटिटी मान कर दिया गया है।
इस अभियान के दूसरे पक्ष में अडवाणीजी की रथयात्रा से लेकर मस्जिद गिराये जाने के बाद मुम्बई, गुजरात और दूसरी जगहों में हुये दंगों में हजारों लोग मारे गये हैं, व हजारों करोड़ की सम्पत्ति बर्बाद हुयी है। जो फैसला हुआ है वह समझौते के माध्यम से पहले भी सम्भव था किंतु वे तो ध्रुवीकरण चाहते थे क्योंकि इसमें बहुसंख्यकों का दल लाभ में रहता है।
भले ही प्रकट रूप में भाजपा खुशी व्यक्त कर रही है पर क्या इस फैसले से भाजपा खुश होगी? उल्लेखनीय है कि भाजपा के नियंत्रक, संघ प्रमुख मोहन भागवत से जब पूछा गया कि राम मन्दिर के बाद काशी मथुरा के बारे में क्या योजना है, तो वे इस सवाल को टाल गये। शायद हाथ लगे फार्मूले को छोड़ना उन्हें मंजूर नहीं होगा। उनके ही आनुषांगिक संगठन विश्व हिन्दू परिषद, जिसके नाम से यह अभियान चलाया गया था, ने तो काशी मथुरा के अलावा अन्य साढे तीन सौ विवादित धर्म स्थलों की सूची जारी की हुयी है। आलोचना होने पर भाजपा कह देती थी कि यह हमारा कार्यक्रम नहीं विहिप का कार्यक्रम है, किंतु समर्थन मिलने पर सबसे पहले अपनी गरदन माला पहनने के लिए आगे कर देती रही है।
वे यह प्रकट कर रहे हैं कि फैसले में सब कुछ उनके पक्ष में अच्छा हुआ है किंतु ऐसा नहीं है। कोर्ट ने गुम्बद में मूर्तियां रखने और मस्जिद तोड़ने को आपराधिक कृत्य माना है और आरोपियों को जल्दी सजा देने की सलाह दी है। इस अवसर पर यह बात चर्चा के केन्द्र में नहीं आयी है कि आरोपियों में भाजपा के सबसे बड़े नेताओं में से सर्वश्री अडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार आदि के नाम हैं, और अगर सरकार सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानती है तो इन्हें सजा हो सकती है। क्या इसके छींटे पूरी भाजपा पर नहीं आयेंगे?
इस अभियान में प्रचार का केन्द्रीय बिन्दु यह था कि जिस जगह पर बाबरी मस्जिद बनायी गयी है, ठीक उसी स्थान पर राम का जन्म हुआ था और ठीक वहीं जन्मभूमि मन्दिर था जिसे तोड़ कर मस्जिद बनायी गयी थी।  इसी तर्क के आधार पर वे बाबरी मस्जिद को तोड़े जाने और वहीं मन्दिर निर्माण की बात करते थे। कोर्ट ने यह कह दिया है कि पुरातत्वविदों द्वारा उस स्थान पर किसी इमारत होने के प्रमाण तो पाये हैं किंतु ना तो उसका मन्दिर होना प्रमाणित है और ना ही तोड़ा जाना। उल्लेखनीय है कि विवाद के चरम पर जब मुम्बई के एक इंजीनियर ने प्रस्ताव किया था कि विवाद टालने के लिए वह ऐसा नक्शा बना सकता है जिसमें बाबरी मस्जिद के बने रहते उसके ऊपर मन्दिर का निर्माण हो सकता है, या उसके नीचे अंडरग्राउंड में मन्दिर बनाया जा सकता है जो प्राप्त अवशेषों के अनुसार सही तल पर होगा। किंतु कहा गया था कि उन्हें मन्दिर उसी तल पर चाहिए जिस तल पर मस्जिद बनी है। सच तो यह है कि उन्हें राजनीतिक लाभ के लिए मन्दिर नहीं विवाद चाहिए था।
हमें उम्मीद रखना चाहिए कि समझदारी के विकास के साथ राममन्दिर प्रेमी और उसका राजनीतिक स्तेमाल करने वाले अलग हो सकें।
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, सितंबर 17, 2019

समीक्षा – जिन्हें जुर्मे इश्क पे नाज था संवेदनात्मक ज्ञान को चरितार्थ करती पुस्तक


समीक्षा – जिन्हें जुर्मे इश्क पे नाज था 





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संवेदनात्मक ज्ञान को चरितार्थ करती पुस्तक
वीरेन्द्र जैन
मुक्तिबोध ने कहा था कि साहित्य संवेदनात्मक ज्ञान है। उन्होंने किसी विधा विशेष के बारे में ऐसा नहीं कहा अपितु साहित्य की सभी विधाओं के बारे में टिप्पणी की थी। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जिस रचना में ज्ञान और संवेदना का संतुलन है वही साहित्य की श्रेणी में आती है।  
खुशी की बात है कि विधाओं की जड़ता लगातार टूट रही है या पुरानी विधाएं नये नये रूप में सामने आ रही हैं। दूधनाथ सिंह का आखिरी कलाम हो या कमलेश्वर का कितने पाकिस्तान , काशीनाथ सिंह का काशी का अस्सी हो या वीरेन्द्र जैन [दिल्ली] का डूब, सबने यह काम किया है। पंकज सुबीर की ‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क पे नाज़ था’ इसीकी अगली कड़ी है।
       अमूमन उपन्यास अनेक चरित्रों की अनेक कहानियों का ऐसा गुम्फन होता रहा है जिनके घटित होने का कालखण्ड लम्बा होता है और जो विभिन्न स्थलों पर घटती रही हैं। यही कारण रहा है कि उसे उसकी मोटाई अर्थात पृष्ठों की संख्या देख कर भी पहचाना जाता रहा है। चर्चित पुस्तक भी उपन्यास के रूप में सामने आती है। इसका कथानक भले ही छोटा हो, जिसका कालखण्ड ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यास ‘नरक यात्रा’ की तरह एक रात्रि तक सिमिटा हो किंतु तीन सौ पृष्ठों में फैला इसमें घटित घटनाओं से जुड़ा दर्शन और इतिहास उसे सशक्त रचना का रूप देता है भले ही किसी को उपन्यास मानने में संकोच हो रहा हो। ईश्वर की परिकल्पना को नकारने वाली यह कृति विश्व में धर्मों के जन्म, उनके विस्थापन में दूसरे धर्मों से चले हिंसक टकरावों, पुराने के पराभवों व नये की स्थापना में सत्ताओं के साथ परस्पर सहयोग का इतिहास विस्तार से बताती है। देश में स्वतंत्रता संग्राम से लेकर समकालीन राजनीति तक धार्मिक भावनाओं की भूमिका को यह कृति विस्तार से बताती है। इसमें साम्प्रदायिक दुष्प्रचार से प्रभावित एक छात्र को दुष्चक्र से निकालने के लिए उसके साथ किये गये सम्वाद के साथ उसके एक रिश्तेदार से फोन पर किये गये वार्तालाप द्वारा लेखक ने समाज में उठ रहे, और उठाये जा रहे सवालों के उत्त्तर दिये हैं। पुस्तक की भूमिका तो धार्मिक राष्ट्र [या कहें हिन्दू राष्ट्र] से सम्बन्धित एक सवाल के उत्तर में दे दी गयी है, जिससे अपने समय के खतरे की पहचान की जा सकती है।
 
       “जब किसी देश के लोग अचानक हिंसक होने लगें। जब उस देश के इतिहास में हुए महापुरुषों में से चुन-चुन कर उन लोगों को महिमा मंडित किया जाने लगे, जो हिंसा के समर्थक थे। इतिहास के उन सब महापुरुषों को अपशब्द कहे जाने लगें, जो अहिंसा के हामी थे। जब धार्मिक कर्मकांड और बाहरी दिखावा अचानक ही आक्रामक स्तर पर पहुँच जाए। जब कलाओं की सारी विधाओं में भी हिंसा नज़र आने लगे, विशेषकर लोकप्रिय कलाओं की विधा में हिंसा का बोलबाला होने लगे। जब उस देश के नागरिक अपने क्रोध पर क़ाबू रखने में बिलकुल असमर्थ होने लगें। छोटी-छोटी बातों पर हत्याएँ होने लगें। जब किसी देश के लोग जोम्बीज़ की तरह दिखाई देने लगें, तब समझना चाहिए कि उस देश में अब धार्मिक सत्ता आने वाली है। किसी भी देश में अचानक बढ़ती हुई धार्मिक कट्टरता और हिंसा ही सबसे बड़ा संकेत होती है कि इस देश में अब धर्म आधारित सत्ता आने को है।’’ रामेश्वर ने समझाते हुए कहा। “     

इस पुस्तक में टेलीफोन के इंटरसेप्ट होने के तरीके से इतिहास पुरुषों में ज़िन्ना, गाँधी, नाथूराम गोडसे के साथ सम्वाद किया गया है जैसा एक प्रयोग फिल्म ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ में किया गया था। इस वार्तालाप से उक्त इतिहास पुरुषों के बारे में फैलायी गयी भ्रांतियों या दुष्प्रचार से जन्मे सवालों के उत्तर मिल जाते हैं। कथा के माध्यम से निहित स्वार्थों द्वारा कुटिलता पूर्वक धार्मिक प्रतीकों के दुरुपयोग का भी सजीव चित्रण है।
नेहरूजी के निधन पर अपने सम्वेदना सन्देश में डा. राधाकृष्णन ने कहा था कि “ टाइम इज द एसैंस आफ सिचुएशन, एंड नेहरू वाज वैल अवेयर ओफ इट”। महावीर के दर्शन में जो सामायिक है वह बतलाता है कि वस्तुओं को परखते समय हम जो आयाम देखते हैं, उनमें एक अनदेखा आयाम समय भी होता है क्योंकि शेष सारे आयाम किसी खास समय में होते हैं। जब हम उस आयाम का ध्यान रखते हैं तो हमारी परख सार्थक होती है। पंकज की यह पुस्तक जिस समय आयी है वह इस पुस्तक के आने का बहुत सही समय है। कुटिल सत्तालोलुपों द्वारा न केवल धार्मिक भावनाओं का विदोहन कर सरल लोगों को ठगा जा रहा है, अपितु इतिहास और इतिहास पुरुषों को भी विकृत किया जा रहा है। पुराणों को इतिहास बताया जा रहा है और इतिहास को झुठलाया जा रहा है। आधुनिक सूचना माध्यमों का दुरुपयोग कर झूठ को स्थापित किया जा रहा है जिससे सतही सूचनाओं से कैरियर बनाने वाली पीढी दुष्प्रभावित हो रही है जिसका लाभ सत्ता से व्यापारिक लाभ लेने वाला तंत्र अपने पिट्ठू नेताओं को सत्ता में बैठा कर ले रहे हैं। ऐसे समय में ऐसी पुस्तकों की बहुत जरूरत होती है। यह पुस्तक सही समय पर आयी है। हर सोचने समझने वाले व्यक्ति की जिम्मेवारी है कि इसे उन लोगों तक पहुँचाने का हर सम्भव प्रयास करे जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। शायद यही कारण है कि देश के महत्वपूर्ण चिंतकों ने सुबीर को उनके साहस के लिए बधाई देते हुए उन्हें सावधान रहने की सलाह दी है।       
इस कृति की कथा सुखांत है, किंतु इसके सुखांत होने में संयोगों की भी बड़ी भूमिका है। कितने शाहनवाजों को रामेश्वर जैसे धैर्यवान उदार और समझदार गुरु मिल पाते हैं! कितने जिलों के जिलाधीश वरुण कुमार जैसे साहित्य मित्र होते हैं, विनोद सिंह जैसे पुलिस अधीक्षक होते हैं, और भारत यादव जैसे रिजर्व फोर्स के पुलिस अधिकारी मिल पाते हैं, जो रामेश्वर के छात्र भी रहे होते हैं व गुरु की तरह श्रद्धाभाव भी रखते हैं। आज जब देश का मीडिया, न्यायव्यवस्था, वित्तीय संस्थाएं, जाँच एजेंसियों सहित अधिकांश खरीदे जा सकते हों या सताये जा रहे हों, तब ऐसे इक्का दुक्का लोगों की उपस्थिति से क्या खतरों का मुकाबला किया जा सकता है या इसके लिए कुछ और प्रयत्न करने होंगे?
वीरेन्द्र जैन
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