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बुधवार, अगस्त 26, 2020

आमिर खान पर संघी हमला तर्कहीनता की सीमा लांघ रहा है


आमिर खान पर संघी हमला तर्कहीनता की सीमा लांघ रहा है
Being tolerant? Twitterati slams Aamir Khan, wants to boycott ...


वीरेन्द्र जैन
यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का युग है और यह अधिकार होना भी चाहिए। किंतु अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब कल्पनाओं को सच बताने या झूठ बोलने की आज़ादी नहीं होता। इस आज़ादी में यह निहित है कि विचार को विचार की तरह सामने लाया जाये, न कि आँखों देखे समाचार की तरह। सूत्रों से प्राप्त बतायी गयी जानकारियों में, जब तक स्पष्ट खतरा न हो, सूत्रों के नाम सामने आने चाहिए और विचारों के साथ विमर्श की गुंजाइश व उसकी जिम्मेवारी लेने का साहस होना चाहिए। उक्त गुणों के बिना कही हुयी बातें अभिव्यक्ति की आज़ादी के जुमले का गलत स्तेमाल हैं। अभिव्यक्ति की ऐसी आज़ादी नहीं है, ना ही होना चाहिए।  
भाजपा का मुखपत्र अंग्रेजी में आर्गनाइजर के नाम से व हिन्दी में वह पांचज्न्य के नाम से छपता है। मुख पत्रमें कही गयी किसी भी बात को पार्टी की आधकारिक अभिव्यक्ति माना जाता है और अगर किसी त्रुटिवश कुछ प्रकाशित हो जाता है तो तुरंत दूसरे माध्यमों और अखबार के अगले अंक में भूल सुधार छपता है, छपना भी चाहिए। गत दिनों पांचजन्य [24 अगस्त 2020] में किन्हीं विशाल ठाकुर का एक लेख छापा गया जिसका शीर्षक है ‘ ड्रैगन का प्यारा खान’। यह लेख देश के शिखर के अभिनेता निर्माता आमिर खान की छवि को नुकसान पहुंचाने की दृष्टि से रचा गया है जिसमें कुतर्कों की भरमार है। इसकी खबरें देश और दुनिया के मीडिया में छपीं किंतु भाजपा के नेताओं ने 48 घंटे बीत जाने के बाद भी इसका खंडन नहीं किया। इतना ही नहीं विभिन्न टीवी चैनलों पर भाजपा के पक्ष में जोड़े गये उसके प्रवक्ता, संघ विचारक, स्वतंत्र विश्लेषक आदि के श्रीमुख से उक्त लेख के कथ्यों का अग्निधर्मा शब्दों से बचाव किया गया। यह स्पष्ट करता है कि इसके पीछे संघ व अमित शाह की डिजाइन पर काम करने वाली भाजपा नीति ही है।
आमिरखान को दुनिया भर में भारत के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, निर्माता, निर्देशकों में गिना जाता है जिन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों पर प्रभावी व प्रेरक फिल्में बनायी हैं, जो मनोरंजन से भरपूर होने के कारण जन जन तक पहुंचती भी हैं। उनकी इस पहुंच से वह सन्देश भी समाज तक पहुंचता है जो बहुत जरूरी है। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर ‘तारे जमीं पर’ और ‘थ्री ईडियट’ जैसी फिल्में बनायीं तो नारी सशक्तिकरण पर ‘दंगल’ और सीक्रेट सुपर स्टार’ जैसी फिल्म बना कर दुनिया में देश का नाम बढाया। अन्ध विश्वासों के खिलाफ ‘पीके’ जैसी फिल्म बना कर युवाओं को सावधान किया तो ‘लगान’ और ‘मंगल पांडे’ जैसी स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी फिल्में बनायीं। ‘रंग दे बसंती’ जैसी फिल्में बना कर एक ऐसा प्रयोग किया जो भगत सिंह के आन्दोलन की भावना को वर्तमान की राजनीतिक स्थितियों से जोड़ता है और भटक रही युवा पीढी में चेतना का संचार करता है। ‘पीपली लाइव’ बना कर मीडिया की भेड़ चाल की जम कर खिल्ली उड़ायी तो स्पाट पर शूटिंग कर के गाँवों में किसान की वास्तविक दुर्दशा भी दर्शायी। उनके अन्दर एक राजकपूर बैठा है जो सामाजिक सन्देश देते समय हमेशा यह ध्यान रखता है कि मनोरंजन के लिए आये दर्शक को मनोरंजन भी मिलना चाहिए। इसलिए वे सन्देश और मनोरंजन के बीच जो समन्वय बनाते हैं वह श्रद्धा पैदा करता है और वही उनकी फिल्मों को सफल बनाता है। आमिरखान की फिल्में केवल व्यावसायिक स्तर पर ही सफल नहीं होतीं अपितु पारखियों के निगाह में भी सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं। देश विदेश का ऐसा कौन सा पुरस्कार है जो उन्हें नहीं मिला हो या उनकी फिल्में उसके लिए नामित न हुयी हों।
‘रजनी’ के बाद प्रशासनिक सामाजिक समीक्षा और उनके हल हेतु प्रेरित करने के लिए किये गये प्रयासों पर बने सीरियलों में ‘सत्यमेव’ जयते का ऎतिहासिक महत्व रहा है। इस सीरियल में जिस करुणा और संवेदनशीलता के साथ घटनाओं को पिरोया गया है वे भीतर तक भेदती रही हैं। इस से ही समाज के वास्तविक नायकों को सम्मानित करने का सिलसिला प्रारम्भ हुआ, जिसे बाद में भी दुहराया गया। उस दौरान अनेक निजी संस्थानों द्वारा  समाज सेवा के कई प्रोजेक्टों की स्थापना भी हुयी और उनसे हजारों जरूरतमन्दों को सहायता मिली। 
कला की दुनिया के माध्यम से इतना बड़ा काम करने वालों से समाज की ज्वलंत समस्याओं के प्रति विचार निरपेक्ष रहने की उम्मीद नहीं की जा सकती। समाज को कलंकित करने वाली घटनाओं पर उनका ध्यान जाना और उस पर प्रतिक्रिया आना भी स्वाभाविक है। किंतु, फिल्मी दुनिया भले ही कला की दुनिया हो, पर वह एक बड़ी लागत का व्यवसाय भी है जिस पर बहुत सारे नियंत्रक कानून भी लागू होते हैं, जिनका सरकार दुरुपयोग कर के अपना राजनीतिक हित साध सकती है। यही कारण होता है कि फिल्मी दुनिया के सभी लोग मुखर होकर अपनी प्रतिक्रिया नहीं देते। मोदी सरकार के आने के बाद कुछ साम्प्रदायिक संगठन जिस तरह से हत्याओं पर उतर आये वह खतरनाक है। न केवल गौ हत्या का आरोप मढ कर मुसलमानों व दलितों की हत्याएं हुयीं अपितु देश के प्रमुख बुद्धिजीवियों की भी हत्याएं हुयीं जिनमें वैज्ञानिक गोबिन्द पंसारे, दाभोलकर,  कलबुर्गी, गौरी लंकेश, आदि की नृशंस हत्याएं हुयीं। खेद रहा कि सरकार ने अपराधियों को पकड़ने में कोई रुचि नहीं दिखायी, ना ही दुख प्रकट किया। आतंकवाद के खिलाफ अपनी जान न्योछावर कर देने वाले पुलिस अधिकारी करकरे को गद्दार बताया जाने लगा व नेहरू गांधी मौलाना आज़ाद आदि की चरित्र हत्याएं की जाने लगीं। तब देश के अनेक लेखकों ने इस असहिष्णुता पर सरकार द्वारा दिये अपने सम्मान पुरस्कार लौटा दिये। कुछ लोगों ने दबे स्वर में सरकार की इस सोच का विरोध किया जिनमें आमिर खान भी उनमें से एक थे। जो जिस तरीके से दब सकता था, सरकार ने उसे उस तरह से दबाने की कोशिश की। आमिर आदि की फिल्मों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गयी। उनकी सम्वेदनशीलता और लोकप्रियता से ज्यादा बड़ा खतरा था इसलिए वे निशाने पर रहे।
पांचजन्य के चार पेजों में प्रकाशित लेख में आमिर की आलोचना को कुछ मामूली कारणों में केन्द्रित किया गया है। उनमें से एक यह है कि उन्होंने अपनी आगामी फिल्म की शूटिंग तुर्की में करने का विचार किया है और वे इसके लिए तुर्की की प्रथम महिला एमिन एरदुगान से मिले। इसमें अपराध यह माना गया कि तुर्की कश्मीर के मामले में पाकिस्तान के पक्ष को सही मानता है, इसलिए दुश्मन देश है। इस लेख पर चर्चा होने से पहले शायद ही किसी को पता हो कि तुर्की को दुश्मन देश माना जाता है और वहाँ पर शूटिंग करने से देश की जनता की भावनाएं आहत होती हों। इस लेख के अनुसार यह काम आमिर खान की जेहादी मानसिकता दर्शाताहै। दूसरा गम्भीर आरोप यह है कि चीन में सलमान खान की फिल्म तो नहीं चली जो सिर्फ 40 करोड़ रुपये कमा पायी किंतु आमिरखान की दंगल ने 1400 करोड़ का कारोबार किया। इसके साथ ही वे चीनी मोबाइल फोन वीवो के विज्ञापन को आमिर खान का देशद्रोह बता रहे हैं। अभी बहुत दिन नहीं बीते जब भारत के प्रधानमंत्री चीन के प्रधानमंत्री को झूल झुला कर चाय पिला रहे थे, तामिलनाडु घुमा रहे थे और भी असंख्य समझौते कर रहे थे। अभी भी उससे व्यापारिक सम्बन्ध समाप्त नहीं किये गये हैं किंतु वीवो का विज्ञापन करने से आमिर खान को देश द्रोही बताया  जाता है और अन्धभक्तों के सहारे सोशल मीडिया पर उसकी फिल्मों के बहिष्कार की अपीलें की जाने लगती हैं।
ये सरकार और इसके संगठन जिस तरह से कुछ लोगों को साम्प्रदायिकता के आधार पर एकत्रित कर उन्हें अन्धभक्त बना रहे हैं व उसी गिरोह के सहारे अपना एजेंडा चलाते हैं, वैसी ही तार्किकता के सहारे वे पूरे देश को हांकना चाहते हैं। सरकार के विरोध को देश का विरोध बताया जाने लगता है। पांचजन्य के ऐसे लेखों से तो हो सकता है कि आमिर खान की फिल्म और अधिक चल जाये किंतु यह साफ हो जाता है कि ये आम जनता को नासमझ समझते हैं। शायद इसी बात का परीक्षण कभी थाली और कभी ताली या दिया जलवा कर बार बार करते रहते हैं।  
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629
           

गुरुवार, जून 07, 2018

मनमोहन वैद्य की मनमानी बात अन्दर के भय का संकेत


मनमोहन वैद्य की मनमानी बात अन्दर के भय का संकेत
वीरेन्द्र जैन

फैज़ अहमद फैज़ का एक शे’र है जिसने पाकिस्तान की तात्कालीन सरकार को आग बबूला कर दिया था। वह शे’र था-
वो बात सारे फसाने में जिसका जिक्र न था
वो बात उनको बहुत नागवार गुजरी है
संघ की तरकीब रही है कि वे पहले अपने विरोधियों के मुँह में अपने शब्द डाल देते हैं और फिर उनका विरोध शुरू कर देते हैं। संघ के सरकार्यवाह मनमोहन वैद्य ने प्रणव मुखर्जी के संघ मुख्यालय जाने पर समाचार पत्रों में एक लेख लिखा है। उन्हें उम्मीद रही होगी कि प्रणव मुखर्जी के संघ कार्यालय जाने पर वामपंथी विरोध करेंगे इसलिए उन्होंने वाम पंथियों के बहाने वामपंथ पर हमला करने के लिए पहले से ही लेख तैयार कर लिया था। किंतु जब वामपंथ की ओर से इसे काँग्रेसियों का निजी पतन मानते हुए किसी तरह की टिप्पणी की जरूरत नहीं समझी तो खीझ कर अपनी मन की बात में मनमोहन वैद्य जी कहते हैं कि “यदि विरोध करने वालों का वैचारिक मूल देखेंगे तो आश्चर्य नहीं होगा। भारत का बौद्धिक जगत उस साम्यवादी विचारों के ‘कुल’ और ‘मूल’ के लोगों द्वारा प्रभावित है, जो पूर्णतः अभारतीय विचार है। इसलिए उनमें असहिष्णुता और हिंसा का रास्ता लेने की वृत्ति है। साम्यवादी मित्र विचार के लोगों की बातें सुनने से न केवल इंकार करते हैं अपितु उनका विरोध भी करते हैं।.....”
वैद्यजी का यह बयान गलत और हास्यास्पद है। वे मानते हैं कि संघी विचार को छोड़ कर सारे विचारों का ‘कुल’ और ‘मूल’ साम्यवाद से प्रभावित है, क्योंकि देश में कोई अन्य कोई वैचारिक दल उनके विचार से सहमत नहीं दिखता। ऐसे में वैद्यजी को अपने विश्वासों पर पुनर्विचार करना चाहिए। विचारों का मूल्यांकन उनकी मनुष्यता के प्रति उपयोगिता से किया जायेगा या उनके उद्गम के राजनीतिक भूगोल से किया जायेगा। अगर वैद्यजी साम्यवादी विचारों के दिग्दिगंत प्रसार के आतंक में वेदों को न भूल गये हों तो उन्हें याद कराना जरूरी है कि ऋगवेद का एक सूत्र कहता है-
‘आ नो भद्राः क्रतवो यंतु विश्वतः’ अर्थात अच्छे विचार विश्व से सभी ओर से आना चाहिए।
जब वैद्य और उनके प्रचारक निशि दिन यह कहते हुए नहीं थकते हैं कि साम्यवादी विचारधारा सारी दुनिया से समाप्त हो गयी है तो फिर उस कथित मृत विचारधारा का इतना आतंक क्यों कि हर विचार में उसी का कुल और मूल देख रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि उस विचारधारा का भूत महसूस कर उससे डरते हुए कह रहे हैं कि नहीं है, कोई नहीं है और जरा सी सरसराहट होते ही चीख पढते हैं। राजस्थान के सीकर में किसानों का सप्ताह भर चला बन्द हो या महाराष्ट्र में पचास हजार किसानों का लांग मार्च हो ये इस विचारधारा कि मृत बताने वालों को डराते तो होंगे।
 उक्त लेख में वे एक गलत बात स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं कि साम्यवादी लोग विचारों के आदान प्रदान में विश्वास नहीं करते जबकि यह बात खुद उनके संगठन पर लागू होती है। विचारों के आदान प्रदान के मंचों पर सबसे अधिक सक्रिय रूप से भाग लेने वालों में वामपंथी ही रहे हैं। उन्होंने सबसे अधिक सभाओं, सेमिनारों में भाग लिया है, लेख और पुस्तकें लिखी हैं, वे शिक्षा जगत में सक्रिय हैं, साहित्यकारों, और कला के क्षेत्रों में वे सबसे अधिक हैं, संसद में सबसे समझदार, जिम्मेवार और भागीदारी करने वाले सांसद विधायक वामपंथी ही हैं, विभागों की समितियों में उनके सांसद ही सबसे समझदारी वाली सलाहें देते हैं व विषय की जानकारी के साथ आते हैं। उनकी उपस्थिति सर्वाधिक होती है। वे बहसों से इसलिए नहीं भागते क्योंकि उनके अन्दर कोई अपराध बोध नहीं होता जबकि वैद्य जी के संगठन षड़यंत्रों और असत्यों की राजनीति करते हैं व पोल खुल जाने के डर से  बहसों से बचते हैं।  
क्या बहसों की जगह वही हो सकती है जिसे संघी तय करें, जहाँ अज्ञानी, कुशिक्षित, और कुतर्की लोग बाँहें चढाते हुए बैठे हुए हों, और उनकी हाँ में हाँ मिलाने वाली प्रायोजित भीड़ पहले से जोड़ कर रखी गयी हो। जहाँ पर भी स्वस्थ बहस के साथ ज्ञान के आदान प्रदान के अवसर होंगे वहाँ वैज्ञानिक विचारधारा में भरोसा करने वाला बेदाग व्यक्ति कभी संकोच नहीं करेगा। आम तौर पर जब गाँव कस्बों में लड़ाई होती है तो एक गाली दी जाती है कि हम तुम्हारे बाप को भी जानते हैं, जिसका इशारा उक्त लेख में भी वैद्यजी ने प्रणव मुखर्जी के संघ कार्यालय जाने पर विरोध करने वालों के लिए कुल और मूल का प्रयोग करते हुए किया है। इसी को अगर संघ की विचारधारा के लिए प्रयोग किया जाये तो वह हिटलर मुसोलिनी से जुड़ती है और गोएबिल्स का तरीका अपनाती है। अगर किसी के मानस और व्यवहार का पता हो तो उसके साथ निरर्थक बहस में समय बर्बाद करना ठीक बात नहीं यह बात वामपंथी समझते हैं। उसके साथ यह भी तय है कि वे किसी भी संवाद से बचने की कोशिश नहीं करते और न ही किसी को अछूत समझते हैं। ऐसा करने का कोई कारण भी नहीं है। अगर फिर वेद का उल्लेख किया जाये तो उसमें कहा गया है – वादे वादे जायते तत्व बोधः अर्थात बातचीत से ही तत्व ज्ञान प्राप्त होता है/ हो सकता है। वैज्ञानिक विचारधारा ज्ञान का सदैव स्वागत करती है।
बहरहाल संघ कार्यालय में जाने का प्रणव मुखर्जी का कदम जितना खतरनाक था, उतना ही गलत उनका विरोध करना था और विरोध करने वाले गैर जिम्मेवार काँग्रेसियों के आचरण के नाम पर वामपंथ के विरोध का अवसर तलाशना भी उतना ही गलत है।
भारत में वामपंथ पर हिंसक होने के आरोप लगाये जाते रहे हैं किंतु लोकतांत्रिक ढंग से काम करने वाले वामपंथ ने कभी राजनीति के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष हिंसा का सहारा नहीं लिया। इसके उलट वे ही सबसे अधिक हिंसा का शिकार हुये हैं। हथियारों के प्रशिक्षण की शाखाएं कौन लगाता है। देवताओं के सद्गुणों को छोड़ कर उनके हथियारों को प्रतीक कौन बनाता है! भाजपा परिवार जिस तरह अफवाह फैला कर साम्प्रदायिकता फैलाती है, उससे जनित हिंसा किसके हिस्से में आयेगी। रथयात्रा के द्वारा दंगे किसने करवाये! 1984 में सिखों के खिलाफ हिंसा हो, गुजरात की हिंसा हो, बाबरी मस्जिद टूटने के बाद भड़के मुम्बई के दंगे हों, भाषा के दंगे हों, क्षेत्र के दंगे हों, ममता बनर्जी के तृणमूल काँग्रेस के लोगों द्वारा की गयी हिंसक कार्यवाही हो इनमें वामपंथ कभी शामिल नहीं रहा। यदा कदा हिंसा से पीड़ित वामपंथी परिवार के सदस्य  प्रतिक्रिया में या आवेश में  हिंसा में लिप्त हो जाते हों तो उस इक्की दुक्की घटना को सोची समझी राजनीतिक हिंसा नहीं कहा जा सकता। यद्यपि उनके विचार का समर्थन नहीं किया जा सकता, पर, हिंसा का आरोप झेलने वाले नक्सलवादी मानते हैं कि वे वर्ग युद्ध लड़ रहे हैं इसलिए वे उन पर हमला करने वाले सशस्त्र बलों पर या मुखबिरों पर हिंसा का प्रयोग करते हैं, क्योंकि उनका मानना रहता है कि अगर उन्होंने पहले हमला नहीं किया तो वे खुद हिंसा का शिकार हो जायेंगे। वे अपनी हिंसा को रक्षात्मक बताते हुए कहते हैं कि उन्होंने लक्ष्य बना कर कभी किसी निर्दोष नागरिक को नहीं मारा।
वैद्य जी को चाहिए कि वे निष्पक्ष वैचारिक आदान प्रदान के मंचों पर वामपंथियों को आमंत्रित करें और खुद भी प्रतिनिधित्व करें।
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, मार्च 12, 2015

पी डी पी और भाजपा गठबन्धन की गाँठ



पी डी पी और भाजपा गठबन्धन की गाँठ
वीरेन्द्र जैन

राष्ट्रभक्ति की चादर ऐसी चादर है जिसके नीचे बहुत सारे पाप छुप जाते हैं, पर उस चादर की भी एक सीमा होती है। भाजपा द्वारा उस चादर के नीचे इतने पाप छुपाये गये हैं कि उन पापों के पाँव अब बाहर निकलने लगे हैं। पहले जनसंघ और अब भाजपा के नामसाथ से कार्यरत दल, संघ परिवार के साठ से अधिक अनुषांगिक संगठनों में से एक है जिसके ऊपर चुनाव प्रणाली द्वारा सत्ता हथियाने और उसके सहारे रक्षा तंत्र पर अधिकार करने की जिम्मेवारी है। यह बात भी सर्वज्ञात है कि भाजपा का कोई भी नीतिगत फैसला संघ की अनुमति के बिना नहीं होता और हर स्तर के संगठन सचिव के पद पर संघ के प्रचारक को ही नियुक्त करने का नियम है, जिससे संघ का नियंत्रण बना रहे। इतिहास बताता है कि अपनी स्थापना के बाद से भाजपा ने चुनाव प्रणाली की कमियों का दुरुपयोग करते हुए सर्वाधिक विकृतियां फैलायीं। इस पार्टी ने साम्प्रदायिकता, जातिवाद, लोकप्रियतावाद [सेलिब्रिटीज को उम्मीदवार बनाना], धन व बाहुबल का प्रयोग करते हुए मीडिया को खरीदने का काम किया है। चुनाव के बाद भी सरकार बनाने के लिए दलबदल कराना, विधायकों की खरीद फरोख्त करने की बुराइयों में भी ये अग्रणी रहे हैं। इन्हें जब भी मौका मिला है ये हर रंग और सिद्धांतों की पार्टियों के साथ सभी संविद सरकारों में सम्मलित होने के लिए अपने को प्रस्तुत करते रहे हैं और फिर उन संविद सरकारों में भी भितरघात करते रहे हैं। वर्तमान में सत्तारूढ सरकार भी कार्पोरेट लाबी द्वारा जुटाये गये धन के अटूट प्रवाह से खरीदे हुए मीडिया, कुशल प्रबन्धन, के साथ समस्त चुनावी विकृतियों के मेल से बनी है जिसमें 116 सदस्य तो दूसरी पार्टियों से आये लोग हैं। इतना कुछ करने के बाद भी उन्हें कुल डाले गये मतों के इकतीस प्रतिशत ही मत मिले थे और इनका राज्यसभा में बहुमत नहीं है जिससे कहीं न कहीं अभी भी इनके हाथ बँधे हैं, इसलिए किसी भी तरह जल्दी से जल्दी राज्यों में सराकारें बनाना इनका मुख्य लक्ष्य है। दिल्ली विधानसभा को इसी कारण से बहुत महीनों तक लम्बित रखा गया किंतु आम आदमी पार्टी की सजगता के कारण ये समुचित संख्या में विधायक नहीं तोड़ पाये तब मजबूरी में चुनाव करवाये।
संघ एक ओर तो बहुत आदर्श की बातें करता है किंतु उसने चुनाव जीतने के लिए भाजपा द्वारा की जा रही अनैतिक कार्यवाहियों और सरकारें बना लेने के बाद किये जा रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ कभी आपत्ति नहीं जतायी। मध्य प्रदेश जैसे राज्य में तो व्यापम घोटाले में संघ के पदाधिकारियों के नाम भी आये हैं और ज्यादातर आरोपी संघ से निकले नेता हैं। सरकारें बनने के बाद उनके रहन सहन और सम्पत्तियों में जो परिवर्तन देखे गये हैं वे इस संगठन में उम्मीदें देखने वालों को भी चकित करते हैं।
       जम्मू-कश्मीर राज्य में इन्होंने पीडीपी की शर्तों के आगे सभी तरह से नतमस्तक होकर सरकार बनायी और ऐसा करते हुए यह पूरी तरह भुला दिया कि इनकी लोकप्रियता का मूल आधार इनकी वे ही राष्ट्रवादी घोषणाएं हैं जिनसे समझौता करके अब इनका सरकार में दोयम दर्जे के हिस्सेदार के रूप में सम्मलित होना सम्भव हुआ है। लगातार दो महीनों तक चली वार्ता के बाद जिसमें संघ से आये राम माधव प्रमुख वार्ताकारों में से एक थे, को अपनी पहली तीन मांगों वाली धारा 370 को समाप्त करने की मांग छोड़नी पड़ी है। विधानसभा के पूरे टर्म में पीडीपी ही शासित रहेगी व मंत्रिमण्डल में विभागों का वितरण पीडीपी की मर्जी से ही होगा। सत्ता में भागीदारी बनाने के लिए इनके हाथों में पीडीपी द्वारा दिये गये मंत्रिमण्डल के कुछ विभाग हैं। चुनावों के दौरान इन्होंने अलगाववाद की मांग करने के लिए जाने जाने वाले सज्जाद गनी लोन की पार्टी से समझौता किया था जिसने वहाँ दो सीटें जीती हैं। इस तरह यह सरकार केवल भाजपा पीडीपी की ही सरकार नहीं है अपितु इसमें लोन की पार्टी जे एंड के पीपुल्स कांफ्रेंस भी सम्मलित है। इतना ही नहीं भाजपा ने घाटी में अपना दखल बनाने के लिए उन्हें अपने कोटे से मंत्री भी बनवा दिया है। घाटी में वे पीडीपी के प्रतिद्वन्दी रहे हैं, इसलिए मुफ्ती ने उन्हें भाजपा की ओर से नाम आने पर मंत्री तो बना दिया किंतु कोई प्रमुख विभाग नहीं सौंपा, जिससे वे नाराज हो गये। कोई आपराधिक प्रकरण लम्बित न होने के जिस आधार पर लोन को मंत्री बनवाया गया है उसी आधार पर मसरत को सभी मामलों में जमानत मिल जाने की बात पीडीपी के नेता कह रहे हैं। सभी जानते हैं कि सरकार ज्यादा नहीं चलने वाली इसीलिए सभी का लक्ष्य घाटी में अपना समर्थन बढाना है। दूसरी ओर पीडीपी के नेताओं का यह भी कहना है कि भाजपा में गुजरात और उत्तर प्रदेश समेत अनेक राज्यों के ऐसे नेताओं को टिकिट दिये गये थे जिन पर न केवल आर्थिक अनियमित्ताओं के आरोप थे अपितु आपराधिक प्रकरण भी चल रहे हैं व वे लोग जमानत पर बाहर हैं। 
       यही कारण रहा कि भाजपा ने आरोप लगने पर बाहर बाहर तो बहुत फूं फाँ की किंतु जम्मू में विरोध करने वाले अपने नेताओं को बुला कर रणनीति समझा दी, जिसका परिणाम हुआ कि कैबिनेट की बैठक में इस विषय को रखा ही नहीं गया और भाजपा के किसी सदस्य ने इसकी चर्चा तक नहीं की।
यही है भाजपा के राष्ट्रवाद का नमूना।    
वीरेन्द्र जैन                                                                          
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मंगलवार, अगस्त 19, 2014

हिन्दू राष्ट्र की सुरसरी के पीछे की राजनीति



हिन्दू राष्ट्र की सुरसरी के पीछे की राजनीति

वीरेन्द्र जैन
       यह सच है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लक्ष्यों में भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाने का लक्ष्य उसकी स्थापना के समय से ही रहा है, और यही कारण है कि देश के, भाजपा को छोड़ कर, सभी राजनीतिक दल उनके विचारों से असहमत रहे हैं। इसी कारण से दक्षिणपंथी और क्षेत्रीय दलों के बीच भी भाजपा अछूत रही है और उसका साथ किसी विशेष मजबूरी या सत्ता के लालच में ही अवसरवादी दलों या व्यक्तियों द्वारा लिया या दिया गया है। जब पहली बार केन्द्र में गैर काँग्रेसी सरकार बनने की नौबत आयी थी तब भी उन्हें अपने दल को विलीन कर जनता पार्टी में समाहित होने के लिए कहा गया था और उन्होंने दूरगामी कूटनीति को देखते हुये ऐसा किया भी था। उल्लेखनीय है कि इस दौरान वे जनता पार्टी के साथ भितरघात कर रहे थे जिसे पहचान कर ही राजनारायण और चौधरी चरण सिंह ने जनता पार्टी टूटने और सरकार गिरने की कीमत पर भी उन्हें बहिष्कृत किया था। स्मरणीय है कि मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी ने भी उस समय आपात काल के खिलाफ एकजुट हुयी जनता पार्टी के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था किंतु उसमें भाजपा के सम्मलित होने के कारण सरकार में साथ होने से साफ इंकार कर दिया था।
       जब 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की अल्पमत सरकार बनी थी तब उसे बहुमत के लिए मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी और भाजपा दोनों के ही समर्थन की जरूरत थी तब माकपा ने इसी शर्त पर समर्थन दिया था कि भाजपा को सरकार में न शामिल किया जाये। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनते समय भी बाइस दलों के समर्थन की जरूरत पड़ी थी और सभी ने संघ के एजेंडे को ही नहीं अपितु भाजपा के भी तीनों विवादास्पद मुद्दे छोड़ने की शर्त के साथ ही अपना समर्थन दिया था। लोकसभा में उस समय के बड़े दल तेलगुदेशम ने तो स्पष्ट कहा था कि वे काँग्रेस को सरकार बनाने से रोकने के लिए ही समर्थन दे रहे हैं पर वे सरकार में सम्मलित नहीं होंगे। बाद में अटल बिहारी वाजपेयी के विशेष अनुरोध पर उन्होंने अपने सांसद बालयोगी को लोकसभा के अध्यक्ष पद को स्वीकारने की अनुमति दी थी और उनके असामायिक निधन के बाद दूसरे किसी सदस्य को न तो अध्यक्ष बनाना स्वीकारा था और न ही सरकार में सम्मलित हुये थे।
       यह आंकड़ागत विडम्बना ही है कि इकतीस प्रतिशत मत पाकर भाजपा को इस लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत मिल गया है, पर देश के उक्त मूलभूत प्रश्नों पर अभी भी उनहत्तर प्रतिशत लोग उनके साथ नहीं हैं और कभी भी नहीं होंगे। देश के सभी समाचार पत्र जिस बात को चुनाव परिणामों के बाद से ही कहते आ रहे थे उसे हाल ही में भाजपा के सबसे वरिष्ठ नेता श्री लाल कृष्ण अडवानी ने भी कहा है कि भाजपा की यह विजय नकारात्मक है और यूपीए सरकार के विरोध में पड़े मतों के कारण है। उनकी इस बात का मतलब साफ है कि संघ परिवार को इस गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए कि उन्हें उनके मुद्दों पर देश की जनता ने समर्थन दिया है। उल्लेखनीय यह भी है कि भाजपा के दो सौ बयासी सांसदों में से एक सौ सोलह काँग्रेस या गैरसंघ की पृष्ठभूमि के लोग हैं और वे उस तरह से नहीं सोचते जिस तरह से संघ से निकले लोग सोचते हैं। 
       विचारणीय है कि श्री भागवत जो बहुत ही चतुर और सूचनासम्पन्न व्यक्ति माने जाते हैं. ने अचानक ही यह हिन्दू राष्ट्र का राग क्यों छेड़ दिया। सच तो यह है कि भाजपा को गत लोकसभा चुनावों में ऐसी सफलता मिल गयी जो उनके लिए भी अप्रत्याशित थी। वे पूर्ण समर्थन न होने के बहाने से अपने अनेक वादे टालने की रणनीति अपनाते रहे हैं, और इस बार भी ऐसी ही उम्मीद में उन्होंने अनेक न पूरे हो सकने वाले वादे कर दिये थे, जैसे कि उमा भारती ने ही कह रखा था कि पूर्ण बहुमत की सरकार बनते ही तीन महीने के अन्दर बुन्देलखण्ड राज्य की घोषणा हो जायेगी। इस बहुमत ने उन्हें धर्म संकट में ला छोड़ा है इसलिए वे देश में तेजी से मुद्दे बदलने के षड़यंत्र में जुट गये हैं। सरकार बनने के बाद समस्याएं दूर होना तो दूर की बात है पर जनता की समस्याएं और बढ गयी हैं और अपेक्षाकृत विकसित राजनीतिक चेतना व सूचना माध्यमों के प्रसार के कारण गत दो महीनें में ही जबरदस्त निराशा फैली है। हिन्दू राष्ट्र के नाम पर न केवल मुसलमान और ईसाई ही सशंकित होते हैं अपितु सिख, जैन, बौद्ध, समेत धर्मनिरपेक्षता के सभी पक्षधर भी चौंकने लगते हैं। ऐसे संवेदनशील समय में एक छोटी सी चिनगारी भी साम्प्रदायिक टकराव में बदल जाती है। यह अनायास नहीं है कि केन्द्र में भाजपा सरकार आने और जन समस्याओं के बढने के बाद दो महीने में ही साम्प्रदायिक टकराव की छह सौ से अधिक घटनाएं घट चुकी हैं।
       हिन्दू राष्ट्र जैसे नारे देश में न केवल वर्गीय चेतना को ही कमजोर करते हैं अपितु सरकार के जनविरोधी कदमों के खिलाफ जनता के राजनीतिक प्रतिरोध की दिशा को भी भटकाते हैं। उल्लेखनीय है कि कभी नोबुल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमृत्य सेन ने हिन्दू राष्ट्र की बात करने वालों से कहा था कि भारत इतिहास के किसी भी काल में हिन्दू राष्ट्र नहीं रहा और यहाँ इतिहास में एक भी हिन्दू सम्राट नहीं हुआ।
       हिन्दू को हिन्दुस्तानियों का पर्यायवाची नहीं माना जा सकता और इसे भारतीय या इंडियन की जगह प्रयोग में नहीं लाया जा सकता क्योंकि व्यवहार में इस शब्द का प्रयोग एक धर्म विशेष के लिए किया जाता है। यह बात श्री भागवत अच्छी तरह जानते हैं और पिछले चुनावों में जिस तरह से संघ ने राजनीति में खुलकर भाग लिया उससे कहा जा सकता है कि इस मामले में भी वे राजनीति ही कर रहे हैं।
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, फ़रवरी 17, 2014

डर्टी ट्रिक्स डिपार्टमेंट का हैडक्वार्टर

डर्टी ट्रिक्स डिपार्टमेंट का हैडक्वार्टर
वीरेन्द्र जैन
       आतंकी बम विस्फोटों के लिए गिरफ्तार असीमानन्द के कैरवान में प्रकाशित साक्षात्कार के बारे में भाजपा नेताओं ने इसे कांग्रेस के डर्टी ट्रिक्स डिपार्टमेंट का कारनामा बताया है। यह आरोप उस जगह से लगाया जा रहा है जहाँ इस डिपार्टमेंट का स्थापना स्थल और हैड क्वार्टर है। भाजपा के फूले से दिखते गुब्बारे में सारी हवा इसी डिपार्टमेंट के पम्प से भरी गयी है और यह काम आज से नहीं अपितु जनसंघ के समय से किया जा रहा है। आर एस एस को वर्षों से रियूमर स्पोंसरिंग संघ [अफवाह फैलाऊ संघ] के नाम से भी जाना जाता रहा है। पहले ये लोग मौखिक प्रचार के द्वारा अफवाहें फैलाते थे और बाद में कल्पित आईडी से सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलाने और गाली गलौज का काम करने लगे। अपनी पहचान को छुपा कर रखना ही इनके अपराधबोध का प्रमाण है।
       पर सबसे पहले इस विषयगत साक्षात्कार को लिया जाये। कैरवान दिल्ली प्रैस प्रकाशन ग्रुप की पत्रिका है। इस ग्रुप की प्रमुख हिन्दी पत्रिका सरिता समेत इसमें प्रकाशित सम्पादकीय टिप्पणियों को देखा जाये तो हम पाते हैं कि यह ग्रुप कभी भी कांग्रेस का पक्षधर नहीं रहा है अपितु अधिकतर घटनाओं में इसकी सहमति भाजपा के साथ बनती रही है। इसके संस्थापक विश्वनाथ तो मुक्त कण्ठ से अटलजी के प्रशंसक रहे हैं और बामपंथ की ओर प्रतीत होते झुकाव के आरोप वाले दिनों में इन्दिरा गान्धी की रीतिनीति से गहरी असहमतियां प्रकट करते रहे हैं। अब जब कैरवान की किसी पत्रकार द्वारा गत दो वर्षों के दौरान लिये गये कथित साक्षात्कार से संघ परिवार को असुविधा हो रही है तब उसके लिए कांग्रेस को जिम्मेवार ठहराना और उसके पास गलत हथकण्डे वाला एक विभाग होने का मनगढंत आरोप लगाना बिल्कुल ही दूसरी बात है। स्मरणीय है कि पिछले दिनों जब भी कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने संघ परिवार के बारे में कुछ कहा है तो भाजपा ने उनके बयान का उत्तर देने की जगह उनके पास डर्टी ट्रिक्स डिपार्टमेंट का होना बताया था व छद्म पहचान वाले लोगों से सोशल मीडिया पर गाली गलौज करवाना शुरू करते रहे हैं। रोचक यह है कि जब पत्रकारों ने उनसे उक्त घटना के बारे में जाँच करने की मांग के बारे में सवाल किये तो उनके प्रवक्ताओं ने जाँच की मांग के प्रति कोई रुचि नहीं दर्शायी। स्मरणीय यह भी है कि आज से कुछ साल पहले तक संघ परिवार के लिए आतंकवाद सबसे बड़ा खतरा होता था किंतु जैसे ही असीमानन्द, दयानन्द पांडे, प्रज्ञा सिंह आदि की गिरफ्तारियों के माध्यम से आतंकी घटनाओं के नेपथ्य के दृष्य सामने आये तब से इन्होंने आतंकवाद को खतरा बताना बन्द कर दिया। राजनीति में हिंसा का सहारा लेना एक विचार हो सकता है और जो लोग इस विचार में विश्वास रखते हैं वे इसका खतरा उठाने के लिए भी तैयार रहते हैं किंतु अपने किये हुये काम से मुकरना और उसकी जिम्मेवारियां दूसरों पर डालना एक अपराध है जो डर्टी ट्रिक्स में आता है। मालेगाँव के गैर मुस्लिम आरोपियों के यहाँ मुसलमानों जैसी पोषाकें और नकली दाढियां भी बरामद की गयी थीं व मडगाँव में आरोपी किसी हिन्दू समारोह में साइकिल पर बाँध कर बम विस्फोट करके हिन्दुओं को उत्तेजित कर साम्प्रदायिक दंगे करवाना चाहते थे किंतु दुर्भाग्य से वह विस्फोट समयपूर्व ही हो गया और रहस्य खुल गया था। अगर ये डर्टी ट्रिक्स नहीं थीं तो आतंकवाद को देश की प्रमुख समस्या बताने वाले दिनों में उन्होंने इसकी निन्दा तक करने की जरूरत क्यों नहीं समझी? 
       ज़िस गुजरात का ये बार बार गुणगान करते हैं उसके तीन हजार लोगों की मौत के अगर ये जिम्मेवार नहीं थे तो इन्होंने इन हत्याओं के अपराधियों को पकड़ने के लिए अपने प्रचारित प्रशासनिक कौशल का उपयोग क्यों नहीं किया और बाद में जिन लोगों को अदालत ने दोषी माना व सजायें दीं उन्हें टिकिट देने ही नहीं अपितु मंत्री बनाने तक में संकोच नहीं किया। क्या उनकी जानकारियां इतनी कम थीं कि जिस सत्य को सारी दुनिया जान गयी हो उसे वहाँ की सरकार नहीं जानती थी।
       डर्टी ट्रिक्स का यह खेल भाजपा के जनसंघ काल से ही जारी है। इसी अफवाह फैलाऊ संघ के दुष्प्रचार का परिणाम ही महात्मा गान्धी की हत्या थी और आज़ादी के बाद जब देश में पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से विकास की नींव रक्खी गयी तब इन्होंने न केवल खाद के उपयोग के खिलाफ वातावरण बनाया था अपितु पनबिजली योजनाओं के खिलाफ किसानों के बीच यह प्रचार भी किया कि ये सरकार पानी में से बिजली निकाल लेती है जिससे वह सिंचाई के लिए अनुपयुक्त हो जाता है। जब कांग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी या गाय बछड़ा हुआ करता था और मतपत्रों पर क्रास का निशान लगाकर मतदान होता था तब ये अफवाहें फैलाते थे कि किसी पशु को जब बध के लिए ले जाया जाता है तब उस पर क्रास का निशान बनाया जाता है और कांग्रेस को वोट देने का मतलब गौवंश की हत्या के पाप का भागीदार होना है। कम्युनिष्टों के खिलाफ ये प्रचार करते थे कि वे देश और धर्म द्रोही होते हैं और कम्युनिष्ट देशों में किसानों से जमीन छीन ली जाती है व वहाँ वृद्धों को गोली मार दी जाती है। हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान का नारा लगाने वाले ये संग़ठन न केवल गैर हिन्दुओं के खिलाफ भेद करने में लगे थे अपितु गैर हिन्दी भाषी विशेष रूप से दक्षिण भारतीय लोगों के खिलाफ वातावरण बनाने में योगदान दे रहे थे। एक समय तो तामिल भाषियों का हिन्दी थोपने का विरोध इतना उग्र हो गया था कि देश विभाजन का खतरा उत्पन्न हो गया था। विभाजन की विभीषिका से आहत देश के लोगों को मुस्लिमों के खिलाफ भड़काने में ये कभी कोई कसर नहीं छोड़ते रहे हैं और मैचों के समय मुसलमानों को पाकिस्तान का पक्षधर प्रचारित कर युवाओं में नफरत के बीज बोते रहे हैं। रामजन्म भूमि मन्दिर के नाम पर इन्होंने जो कुछ किया वह अभी बहुत पुराना नहीं हुआ है। रथयात्रा, ईंटपूजा से लेकर अस्थिकलश यात्रा तक और बाद में गोधरा गुजरात तक सब इनके अफवाह फैलाऊ अभियान का परिणाम या प्रतिक्रियाओं की उपज रहे हैं। चुनाव में सबसे अधिक धन खर्च करके मतदाताओं के एक हिस्से को चारित्रिक पतन के लिए तैयार करने से लेकर हार जाने के बाद रूस से आयात स्याही और ईवीएम मशीनों की खराबी बताने तक सब इनके डर्टी ट्रिक्स का हिस्सा हैं। सोनिया गान्धी के प्रधानमंत्री बनने की सम्भावनाओं के सामने आते ही उन्हें विदेशी मूल के बताने फिर सुषमा स्वराज और उमा भारती द्वारा वैसी दशा में सिर मुढाने, जमीन पर सोने और चने खाकर रहने की घोषणाएं करवाना भी उन्हीं ट्रिकों में आता है। यही वह काल था जब ईसाइयों पर अचानक ही ‘धर्म परिवर्तन’ का आरोप लगने लगा था और चर्चों पर हमले होने लगे थे। ये हमले सोनिया गान्धी द्वारा प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर देने के बाद बन्द हो गये थे।
       एक समय था जब कसाव और अफज़ल गुरू की फाँसी इनका मुख्य फंडा बन गया था और उसमें देरी को वे न्यायिक प्रक्रिया के दोषों में न देख कर वे इसे तुष्टीकरण की राजनीति बता कर साम्प्रदायिकता पैदा कर रहे थे। तुष्टीकरण की राजनीति के आरोप के बहाने वे यह दर्शाना चाह रहे थे कि सारे मुसलमान कसाव के साथ हैं और उसे फाँसी में होने वाली देरी से वे खुश होते हैं। जबकि सच यह था कि मुम्बई के किसी भी कब्रिस्तान ने पाकिस्तान से आये हुये आतंकियों के शवों को दफनाने से मना कर दिया था।
       सच तो यह है कि डर्टी ट्रिक्स के मामले में भाजपा को प्रवीणता प्राप्त है। दूसरे दल अच्छे या बुरे हो सकते हैं किंतु संघ परिवार से अधिक बनावटी और दुहरे चरित्र का नहीं हो सकता।
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, अप्रैल 15, 2013

मध्य प्रदेश में उमा प्रवेश


मध्य प्रदेश में उमा प्रवेश
वीरेन्द्र जैन
                पार्टी के अन्दर और बाहर नितिन गडकरी की चतुर्दिक निन्दा हो जाने के बाद भाजपा के मार्गदर्शक की भूमिका निभाने वाले आर एस एस को राजनाथ सिंह के कन्धों पर दूसरी बार अध्यक्षता का भार डालना पड़ा है। यह जिम्मेवारी मिलने के बाद राष्ट्रीय कार्यकारिणी घोषित करने में उन्हें लम्बा समय लगा, जो पार्टी के संगठन में चल रही खींचतान के संकेत देती है। भाजपा की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में तेरह उपाध्यक्ष घोषित किये गये जिनमें सदानंद गौडा, मुख्तार अब्बास नकवी,  सीपी ठाकुर, जुएल ओरांव, एसएस अहलूवालिया, बलबीर पुंज, सतपाल मलिक,  प्रभात झा,  उमा भारती, बिजॉय चक्रवर्ती, लक्ष्मीकांता चावला, किरण माहेश्वरी, स्मृति ईरानी हैं। इन तेरह नामों के बीच अखबारों में सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरने वाला नाम उमा भारती का ही था जिनका चयन नितांत अनेपक्षित था। स्मरणीय है कि उन्होंने पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेताओं को सार्वजनिक रूप से न केवल धिक्कारा ही था अपितु अपनी अलग पार्टी बना कर कई चुनावों में प्रत्याशी घोषित किये व मध्यप्रदेश में विधानसभा और लोकसभा के चुनाव लड़े जिनमें भाजपा को ही मुख्य रूप से निशाने पर रखा था। माना जाता है कि गुजरात और उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनावों में उन्होंने प्रत्याशी घोषित करने के बाद स्थानीय नेताओं से सौदा कर लिया था तथा कभी अपने गुरु के आदेश के नाम पर तो कभी हिन्दू वोटों की एकजुटता के नाम पर अपने प्रत्याशी वापिस ले लिये थे। उनका वोट बैंक भी भाजपा के वोट बैंक से निकला था तथा 2008 के मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बारह लाख वोट भी जुटा लिए थे भले ही वे कुल पाँच विधायक ही जिता पायी थीं। बड़ा मल्हरा उपचुनाव में जो उमा भारती का ही अपना चुनाव क्षेत्र था, भाजपा ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रतीक बना कर लड़ा था क्योंकि उन्हें दल के आगे व्यक्ति के महत्व को खत्म करना था और यह भी सिद्ध करना था कि उमा भारती पार्टी के बिना शून्यवत हैं और वे अपने क्षेत्र से भी अपना प्रत्याशी जिता नहीं सकतीं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने साम दाम दण्ड भेद सभी हथकण्डों से वह चुनाव भाजपा की झोली में डाल लिया था। चुनव के दौरान भाजपा के बाहुबलियों ने उनके ऊपर हमला किया था और उन्हें भाग कर एक मन्दिर के अन्दर छुप जाना पड़ा था जहाँ अन्दर से साँकल बन्द करके ही वे सुरक्षित रह पायी थीं। इस घटना पर उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर अपनी हत्या करवाने का आरोप भी लगाया था। सत्ता से दूर होने पर उनके अधिकांश समर्थक क्रमशः उनसे छिटक गये थे और वे लोग ही साथ रह गये थे जिनका भाजपा में प्रवेश पाना दुर्लभ था। निरंतर अकेली पड़ती उमा भारती कब तक केवल पैसे के सहारे राजनीति करतीं सो उन्होंने भाजपा में पुनर्प्रवेश के प्रयास किये और भाजपा नेताओं से व्यक्तिगत दुश्मनी रखने के कारण उनसे जुड़े समर्थकों को अधर में छोड़ दिया। 2009 के लोकसभा चुनाव में मैं तो उन्होंने अडवाणीजी को प्रधानमंत्री बनवाने में सहयोग करने के नाम पर भाजपा से केवल एक सीट माँगी थी जो भी उन्हें नहीं मिली थी। भाजपा में पुनर्प्रवेश के लिए उन्हें वर्षों प्रतीक्षा करना पड़ी थी व उनके प्रवेश के खिलाफ मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने उनके प्रवेश की दशा में स्तीफा देने की धमकी दी थी। जब जब उनकी माँग ठुकरा दी जाती तो साध्वीभेषी राजनेता प्रैस के सामने यह ‘सच’ कहतीं कि स्वास्थ के कारणों से वे अभी राजनीति में सक्रिय नहीं हो पा रही हैं। उनका प्रवेश कई बार टला और अंततः बाबरी मस्ज़िद ध्वंस मामले में सहअभियुक्त होने के परिप्रेक्ष्य में संघ द्वारा वीटो कर देने से उन्हें पार्टी में प्रवेश तो मिल गया पर मध्य प्रदेश में उनके प्रवेश पर पाबन्दी लगा दी गयी। उल्लेखनीय है कि भाजपा में प्रवेश मिलने के बाद उन्हें स्वास्थ सम्बन्धी कोई समस्या नहीं रही पर यह समस्या उनके भाई को हो गयी जिन्हें देखने के लिए उन्हें बार बार मध्यप्रदेश में आना पड़ता था। मध्यप्रदेश में अछूत घोषित करके भाजपा ने उन्हें गंगा शुद्धिकरण पर लगा दिया पर वे बार बार नर्मदा स्नान करके ही निर्मलता और शांति पाती रहीं, तथा धार्मिक कार्यों की ओट में आती जाती रहीं। इधर उनके आने से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और तत्कालीन पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और अधिक कलुषित व अशांत होते रहे।
       उत्तरप्रदेश के 2012 के विधानसभा चुनावों के लिए उन्हें कई दूसरे लोगों के साथ चुनाव प्रभारी घोषित किया गया किंतु इस झुनझुने की असलियत समझ कर उन्होंने उसमें रुचि नहीं ली। बाद में उन्हें उत्तरप्रदेश में विधानसभा सदस्य का प्रत्याशी बनाने हेतु प्रदेश में सरकार बनने की स्थिति में मुख्यमंत्री प्रत्याशी बनाये जाने का लालच भी दिया गया। उन्हें उत्तर प्रदेश में जितवाने हेतु मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने पूरे मन से कोशिश की व समस्त संसाधन जुटा कर जिता भी दिया ताकि वे मध्यप्रदेश से विदा हो जायें। एक प्रदेश की मुख्यमंत्री और केन्द्र में मंत्री रही उमा भारती को यह पद फाँस नहीं पाया और वे केवल शपथ ग्रहण करने के लिए ही लखनऊ गयीं। वहाँ भी उन्हें सचमुच ही इतना बाहरी समझा गया कि जब पिछले दिनों कल्याण सिंह ने भाजपा के आगे अपनी पार्टी का आत्मसमर्पण कराया तब उन्हें आमंत्रित तक नहीं किया गया।
       सब जानते हैं कि उमा भारती की जान जिस तोते में बसती है उसका नाम मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी है। इसी कारण उन्हें न गंगा की गोद में आराम मिलता है, न उत्तरप्रदेश बाँध पाता है और न ही गुजरात आकर्षित कर पाता है। स्मरणीय है कि जब उन्हें भाजपा में पुनर्प्रवेश मिला था तब मध्यप्रदेश में उनके सम्मान में कोई भी स्वागत समारोह नहीं हुआ था अपितु पार्टी में एक भयावह सन्नाटा सा छा गया था। उनके समर्थकों को ही नहीं विधायकों तक को महीनों विधानसभा में भाजपा विधायक दल की सदस्यता नहीं मिल पायी थी। उनमें से किसी के नाम पर भी किसी सम्मानित पद के लिए कभी विचार नहीं किया गया था। इस अनुभव को ध्यान में रखते हुए इस बार उमा भारती ने मध्य प्रदेश में धूम धड़ाके के साथ प्रवेश करने की योजना बनायी। अपना स्वागत कराने के लिए उन्होंने अपने व्यक्तिगत समर्थकों के नाम पर सभी स्थानीय समाचार पत्रों में पूरे पूरे पृष्ठों के विज्ञापन प्रकाशित कराये और पार्टी कार्यालय में प्रायोजित स्वागत समारोह आयोजित करवाया। संयोग से कभी उनके विरोधी रहे प्रभात झा प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाये जाने के बाद मुख्यमंत्री के विरोधी हो गये थे सो उनको भी स्वागत समारोह में बुलाना पड़ा क्योंकि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। मजबूरन मुख्यमंत्री को भी इस स्वागत समारोह में आना पड़ा और नकली हँसी हँसना पड़ी। उल्लेखनीय है कि इसी दौरान मुख्यमंत्री के प्रचार विभाग ने पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के उस साक्षात्कार को प्रकाशित करवाया जिसमें उन्होंने कहा कि 2003 के चुनावों में भाजपा की जीत में उमा भारती की कोई भूमिका नहीं थी अपितु एंटी इंकम्बेंसी के कारण भाजपा का जीतना स्वाभाविक था। उमा भारती के एकल विज्ञापनों को देख कर प्रभात झा समर्थकों ने भी प्रमुख स्थानों पर उनके होर्डिंग्स लगवा दिये जिनमें उमा भारती का अता पता दूर दूर तक नहीं था।
       भले ही उमा भारती ने अपने बयान में कहा हो कि वे कांग्रेस का पिण्डदान करने के लिए आयी हैं किंतु सब लोग जान समझ रहे हैं कि असल में वे किसका पिण्डदान करेंगीं। वह दिन दूर नहीं जब मध्य प्रदेश के अन्दर भाजपा में महाभारत शुरू हो जायेगा। संघ के इशारों पर चलने वाले दल में सह सरकार्यवाहक सुरेश सोनी ने शिवराज को सताने के लिए न केवल उमा भारती, प्रभात झा को ही केन्द्रीय संगठन में स्थान दिलवा दिया है अपितु थावर चन्द गहलौत से लेकर कैलाश विजयवर्गीय, सुधा मलैया तक को शिवराज से ऊंची या बराबर की जगह पर प्रतिष्ठित करवा दिया है। वैसे भी उनका भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबे अपने मंत्रिमण्डल के सदस्यों पर कोई नियंत्रण नहीं है, उच्च अधिकारी वैसे भी भाव नहीं देते थे और अब तो आचार संहिता लगने में कुछ ही महीने शेष रह गये हैं। पुनः भाजपा के सत्ता में आने के कोई संकेत नहीं हैं तथा उमा टिकिट वितरण में बड़ा हिस्सा माँगेंगीं। उनके जिन लोगों को भी टिकिट नहीं मिलेंगे वे स्वतंत्र रूप से उमाभारती के आशीर्वाद का दावा करते हुए चुनाव लड़ेंगे ही। भाजश के बिखर गये पुराने लोग फिर से एक जगह एकत्रित हो गये हैं। नई कार्यकारिणी के गठन के बाद उमाभारती का मध्यप्रदेश में प्रवेश खुल जाने से शिवराज के चेहरे की रौनक चली गयी है और उनकी खोखली हँसी उनके अन्दर पल रहे द्वन्द का साफ संकेत दे रही है। अँग्रेजी में एक कहावत है कि हँसने में जिसका पेट नहीं हिलता उस व्यक्ति से सावधान रहो। उनके दिल नहीं मिले केवल हाथ मिले हैं। रहीम ने कहा था-
रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय
जोड़े से फिर न जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय 
       इस जोड़ की गाँठें साफ नजर आ रही हैं
वीरेन्द्र जैन
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