मंगलवार, दिसंबर 15, 2009

क्रांतिकारी युवा नेतृत्व की सफलता ही कांग्रेस और देश को बचा सकती है

क्रांतिकारी युवा नेतृत्व की सफलता ही कांग्रेस और देश को बचा सकती है
वीरेन्द्र जैन
भले ही कांग्रेस आज केन्द्र की सता में है किंतु न तो वह अपनी अकेली दम पर सत्ता में है और ना ही वह अपनी राजनीतिक ताकत की दम पर सत्ता में है अपितु चुनावी राजनीतिक प्रबन्धन और एक बेडौल बेढंगा सिद्धांतहीन गठबन्धन उसे सत्ता में बनाये हुये है। आम चुनाव के बाद उसका बहुमत बनाने वाले दलों में से समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, बहुजन समाज पार्टी, आदि उससे विमुख हो चुके हैं और उसकी सरकार में सम्मलित डीएमके और तृणमूल कांग्रेस प्रति दिन उसके संकटों को बढा रहे हैं। कांग्रेस की आज सबसे बड़ी ज़रूरत एक राजनीतिक दल के रूप में उसकी पुनर्स्थापना की है, जिसके लिये केवल राहुल गाँधी दिग्विजय सिंह को साथ लेकर प्रयास कर रहे हैं। आज की कांग्रेस में सत्ता की जगह संगठन को महत्व देने के ये दुर्लभ उदाहरण हैं। कह सकते हैं कि ये दोनों महासचिव एक नई कांग्रेस गढने का प्रयास कर रहे हैं।

पिछले दिनों अपने उत्तर प्रदेश के दौरे पर गये हुये राहुल गाँधी ने जो सन्देश दिये हैं और अगर वे उन पर सचमुच कायम रह कर सफलता पूर्वक अमल करवा पाते हैं, तब ही कांग्रेस का उद्धार सम्भव है अन्यथा स्वार्थी समर्थन पर टिकी वर्तमान कांग्रेस सरकार कभी भी अल्पमत में आ सकती है। बिखरी और देश के मानस से अस्वीकृत् हुयी भाजपा के अलावा दूसरा कोई ऐसा बड़ा दल नहीं है जो राष्ट्रव्यापी हो। भाजपा का भी 143 लोकसभा क्षेत्रों में कोई अस्तित्व नहीं है, तथा बामपंथी दलों की उपस्तिथि और भी क्षीण है, इसलिये कांग्रेस के पराभव का मतलब विभिन्न क्षेत्रीय, जातिवादी, भाषावादी, साम्प्रदायिक, दलों का उभार और निजी स्वार्थ के अधार पर सिद्धांतहीन गठबन्धन सरकारों का बार बार गठन और बार पतन ही होगा। इस दशा का दुष्परिणाम राष्ट्रीय एकता पर खतरे के रूप में सामने आ सकता है। चीन के किसी अखबार में भारत को 26 टुकड़ों में टूटने की सम्भावना कुछ ऐसी ही आशंका को देखते हुयी ही की गयी होगी।
स्मरणीय है कि राहुल गाँधी ने अपने उत्तर प्रदेश दौरे के दौरान कहा था कि मेरे सामने 2012 कोई लक्ष्य नहीं है अपितु युवाओं का संगठन ही मेरा लक्ष्य है। चुनाव तो 2012 के बाद में भी आयेंगे आते रहेंगे। मैं इस प्रदेश की राजनीति में बदलाव लाना चाहता हूं और मेरा इकलौता लक्ष्य ज्यादा से ज्यादा युवाओं को राजनीति में लाना है। में युवाओं के लिये काम करना चाहता हूं।
यदि राहुल गाँधी युवाओं को राजनीति की ओर मोड़ लेते हैं तो ये तय है कि ये युवा, बिल्डरों, सरकारी सप्लायरों, ठेकेदारों, माफिया गिरोहों, गुंडों, और लालची लम्पट खांटी बूढे नेताओं का स्थान लेंगे। उनके इस बयान से आज के राहुल गाँधी में उस राजीव गाँधी की झलक मिलती है जिसने प्रधान मंत्री बनने के बाद पहले कांग्रेस के अधिवेशन में कांग्रेस को माफिया से और सरकार को भ्रष्टाचार से मुक्त करने का संकल्प व्यक्त किया था। 85 पैसे और पन्द्रह पैसे वाली सच्चाई भी उसी दौरान सामने आयी थी व बेहद विवादास्पद और चर्चित हुयी थी। किंतु बाद में राजीव गांधी ने भी परिवर्तन के प्रयास से हाथ खींच लिये थे क्योंकि उनकी भी समझ में आ गया था कि इस राजनीतिक व्यवस्था में स्वच्छ प्रशासन और सिद्धांत की राजनीति सम्भव नहीं है। बाद में तो कांग्रेस को परिवर्तित करने का उनका संकल्प बिल्कुल टूट गया था और वे कांग्रेस को नहीं अपितु कांग्रेस ही उन्हें चलाने लगी थी।

तय है कि राहुल गांधी के सामने दो ही विकल्प हैं कि या तो वे इसी कांग्रेस के रंग में रंग कर प्रधान मंत्री पद को सुशोभित करने लगें या सरकार और कुर्सी को ठोकर पर रखते हुये कांग्रेस संगठन को घोषित सिद्धांतों पर अमल कराते हुये उसका निर्मम आपरेशन करें और विपक्ष में बैठने की मानसिक तैयारी के साथ करें। उसके बाद जो कांग्रेस बचेगी उस पर बाद में वही जनता भरोसा करेगी, जो आज उससे नफरत करती है। यह भरोसा कांग्रेस को फिर से सत्ता में ला सकता है। आज के राहुल गांधी दूसरे विकल्प की ओर जाते हुये दिख रहे हैं किंतु यह रास्ता त्याग और लम्बे संघर्ष का रास्ता है। यह रास्ता निरंतर चुनौतीपूर्ण है और अगर उन्होंने सचमुच अपनाया तो यह रास्ता एक समय उनकी पार्टी को स्लिम अर्थात छरहरी और फुर्तीली कर सकता है। प्रारम्भ में भले ही उन्हें अकेलापन लगे, पर यदि वे युवाओं का एक बड़ा संगठन खड़ा करके उसका स्वाभाविक नेतृत्व बनाये रख सके तो यह ताकत क्रांतिकारी होगी जो उन्हें अपने पूर्वजों से आगे ले जा सकती है।इससे जो राहुल गान्धी उभरेगा वह विरासत में मिली कुर्सी के आरोप से मुक्त होगा और अपनी अलग पहचान रखेगा।

इस समय जब किसी भी समय की तुलना में सर्वाधिक युवा आबादी हमारे पास में है तब युवाओं को अपने साथ कर लेना सबसे बड़ी राजनीतिक आवश्यकता है। आर एस एस ने भी भाजपा को युवा अध्यक्ष चुनने का निर्देश यही सोचकर दिया है। तमिलनाडु में करुणानिधि ने सन्यास लेने की घोषणा कर दी है। पंजाब में प्रकाश सिंह बादल ने अपने बेटे सुखवीर को कमान सौंपने का फैसला ले ही लिया है, मायावती युवा हैं मुलायम सिंह ने अपने बेटे बहू को आगे बढाना प्रारम्भ कर दिया है सीपीएम में युवा नेतृत्व है तेलगुदेशम और बीजू जनता दल भी युवा नेताओं के दल हैं। पूरी राजनीति में युवा नेतृत्व आ रहा है तब कांग्रेस जैसी राष्ट्रव्यापी पार्टी के राहुल गाँधी यदि अपने साथ समर्पित कार्यकर्ताओं की टीम बना लेते हैं तो वे सबसे आगे होंगे, बशर्ते वे कांग्रेस में छाये लम्पट युवाओं को दूर रख सकें और सिद्धांतों के लिये काम करने वालों को जोड़ सकें।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

2 टिप्‍पणियां:

  1. काश कि ऐसा हो सके तो बात ही क्या हो ....परिवर्तन का परिणाम देखने लायक होगा ...

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  2. मुझे भी लगता है कि राहुल गांधी में "क्रान्तिकारी" बनने के लिये वांछित सारे गुण विद्यमान हैं।

    * वे एक अभारतीय-भारतीय मां के बेते हैं।
    * उन्होने शायद स्नातक तक की परीक्षाएँ अपने बलबूते पर पास कर ली हैं।
    * वे लगातार दो-तीन मिनट तक भाषण दे सकते हैं (केवल महत्व के विषयों को छोड़कर)
    * चमचागिरी से उन्हें परहेज नहीं है या यों कहें कि चमचों के बिना उनका काम नहीं चल सकता। इस देश को आगे बढ़ाने में चमचागिरी की विशेष भूमिका रहेगी।

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