बुधवार, अप्रैल 07, 2010

घटते जंगल बढता जंगल राज्

नकारात्मक सुर्खियों से भरा प्रदेश
वीरेन्द्र जैन
राजनीतिक चेतना से शून्य शिथिल और उदासीन मध्य प्रदेश जिसके बारे में कभी भवानी प्रसाद मिश्र की पंक्ति ‘ऊंघते अनमने जंगल ‘ बहुत सटीक बैठती है, अपनी नकारात्मक सुर्खियों के कारण ही अपनी उपस्थिति दर्शा रहा है। प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री भले ही हाथ लगे अवसर को सुखद सपनों और सम्भावनाओं की घोषणाओं से भरने की कोशिशें करते रहते हों किंतु उनका मंत्रिमंडल, अफसरशाही, और पार्टी के लोग अपनी हरकतों से मुख्यमंत्री के मौखिक आदर्शवाद को उपहास का पात्र बनाते रहते हैं।
पिछले कुछ वर्षों के दौरान प्रदेश के कुछ मंत्रियों के नज़दीकी लोगों के यहाँ पड़े छापों में सैकड़ों करोड़ रुपयों की नकदी, बैंक ज़मा रसीदें, और ज़मीन ज़ायज़ाद की खरीद के प्रमाण मिले थे, एक मंत्री के तो ड्राइवर के लाकर से ही सवा करोढ मिले थे। ये छापे राजनीतिक आरोपों से बचने के लिए उनके निकट के अफसरों और रिश्तेदारों के यहाँ डाले गये थे, जिनकी कभी कोई ऐसी हैसियत ही नहीं रही कि वे भ्रष्टाचार से भी इतनी राशि बना सकें। इनका दोष मानते हुये प्रारम्भ में इन्हें मंत्रिपरिषद से अलग रखा गया, किंतु लोकसभा चुनाव निबटते ही उन्हें पार्टी के निर्देश पर सादर मंत्रिमण्डल में सम्मलित कर किया गया। आधा दर्ज़न से अधिक मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की अनेक जाँचें चल रही है या कह सकते हैं कि टल रही हैं। प्रति दिन कोई न कोई घोटाला सामने आ रहा है।
पिछले दिनों प्रदेश के अफसरों के ठिकानों पर आयकर विभाग के जो छापे पड़े और उन छापों में जितनी मात्रा में धन सम्पत्ति और ज़मीन ज़ायज़ाद के कागज़ात मिले उनसे अन्दर पल रही बीमारी का पता चलता है। ज़ाहिर है कि ये सम्पत्तियाँ सम्बन्धित मंत्री की जानकारी और भागीदारी के बिना नहीं बन सकतीं। यह भी लगभग तय है कि इतने व्यापक स्तर पर हो रही कमाई की जानकारी पार्टी पदाधिकारियों को भी रहती है। पार्टी ही मंत्रिमण्डल के गठन में नाम निर्देशित करती है। इसलिए यह भी तय ही है कि सतारूढ पार्टी का भव्यता पूर्वक संचालन भी सदस्यों के सहयोग से नहीं अपितु इसी भ्रष्ट तरीके से हो रहा है। रोचक यह है कि प्रदेश में कई वर्षों से लोकायुक्त प्रणाली होते हुये भी, अभी तक किसी भी राजनेता को सज़ा नहीं मिली है जबकि उसके पास प्रदेश के आठ मंत्रियों के खिलाफ शिकायतें दर्ज़ हैं।
ताज़ा आयकर के छापों में जिन अधिकारियों के निवासों, लाकरों, और बैंकों से जो राशियाँ बरामद हुयी हैं वे आँखें खोल देने वाली हैं। जहाँ यह भी तय है कि छापे में पायी गयी रकम सम्बन्धित द्वारा किये गये कुल भ्रष्टाचार का बहुत थोड़ा सा हिस्सा होती है क्योंकि बहुत सारा तो वे लोग अपने ऐयाशी पूर्ण रहन सहन में खर्च कर चुके होते हैं और बहुत सारा बेनामी तो तलाशा ही नहीं जा पाता। छापों की खबरों के दौरान पूरे अधिकारी वर्ग के चेहरों पर छायी दहशत और बीस अधिकारियों का अचानक छुट्टी पर चले जाना उनके अपने अपराधबोध का प्रमाण और सरकार के अन्दर चल रही कारिस्तानियों की खबर देती है। पिछले दो-तीन वर्षों के दौरान अधिकारियों के पास से पाँच सौ करोड़ की बरामदगी की सूची देखने पर सरकार के चरित्र का पता चलता है-
· तत्कालीन गृह सचिव राजेश राजौरा जो स्वास्थ विभाग में कमिश्नर थे जिन्होंने करोड़ों रुपयों की बोगस खरीद की थी, और कई कागज़ी कम्पनियों को आर्डर देकर बन्दरबाँट की थी के पास से कई करोड़ की नगदी के अलावा करोड़ों रुपयों के फार्म हाउस खरीदने के प्रमाण मिल्र थे।
· तत्कालीन स्वास्थ संचालक डा. योगिराज शर्मा के यहाँ से तीस करोड़ की अघोषित आय का खुलासा हुआ था। आयकर ने उन पर 12 करोड़ रुपयों का टैक्स लगाया है जिसे ज़मा न करने पर उनकी चल अचल सम्पत्ति कुर्क करने का नोटिस दिया गया है।
· स्वास्थ विभाग के ही एक अन्य स्वास्थ संचालक अशोक शर्मा को भी विभाग ने घेरे में लिया है।
· जलसंसाधन विभाग में प्रमुख सचिव रहे अर्विन्द जोशी और उनकी आई ए एस पत्नी टीनू जोशी उनके पिता पूर्व डीजीपी के यहा छापा मारने पर विभाग को करोड़ों रुपये नकद लाकरों में सोना और ज़मीन ज़ायज़ाद समेत बीमा पालसियाँ के कागज़ात मिले थे।
· पीड्ब्ल्यूडी इंजीनियर रामदास चौधरी, दीपक असाई, और जितेन्द्र भासने जो अपनी बीमी एजेंट पत्नियों के द्वारा सीधी बीमी पालिसियाँ ही बवनवाते थे के यहाँ से बीमा पालसियों के कागज़ात मिले हैं।
· विधान सभा के अपर सचिव सत्यनारायण शर्मा के पास पदस्थ दो अफसरों के के शर्मा और के पी द्विवेदी के यहाँ भी करोड़ों रुपयों की आय का पता चला है।
कुल मिला कर आयकर छापों में लगभग पाँच सौ करोड़ की सम्पत्ति तो उज़ागर ही हो चुकी है किंतु राज्य सरकार ने कुछ ही मामलों में बेमन से कमजोर सी कार्यवाही ही की है और इनकम विभाग की रिपोर्ट आने की प्रतीक्षा का बहाना ले रही है।
अपराधों का ग्राफ तो दिन प्रति दिन बढ ही रहा है जिसे राजनीतिक संरक्षण के साफ संकेत मिलते हैं। सत्तारूढ पार्टी की एक विधायक फरार चल रही हैं जिनके पति पर कई हत्याओं का पता चला है और विधायक महोदया पर हत्या में सहयोग देने का प्रकरण जाँच में है। ज़मीनों की लूट ऐसी चल रही है कि संघ से जुड़ी संस्थाओं के नाम पर करोड़ों की ज़मीन कोड़ियों के मोल बेच दी गयी है, जिनमें गौशालाएं और सरस्वती शिशु मन्दिर जैसी संस्थाएं भी शामिल हैं। सदन में विपक्ष की नेता जो मध्य प्रदेश से ही सांसद हैं, के निकट सहयोगी एक विधायक के साथ वकील से सलाह लेने दिल्ली गये भोपाल विकास प्राधिकरण के सीईओ ट्रेन से गायब मिलते हैं और उनका शव रास्ते में ट्रैन की पटरियों पर पड़ा मिलता है किंतु भाजपा विधायक साथ गये व्यक्ति के गायब होने के बाद भी भोपाल में चुपचाप अपने घर चले जाते हैं और उनके गायब होने की जानकारी किसी को देने की ज़रूरत ही नहीं समझते। किसी भी पुलिस थाने में संघ परिवार के किसी व्यक्ति को बुलाये जाने पर बजरंगी थाने में पहुँच कर उत्पात करते हैं और आरोपी को छुड़ा कर ले जाते हैं। विद्यार्थी परिषद के ज़लूस को नियंत्रित करने वाले पुलिस इंस्पेक्टर का कालर खींचते दृश्य अखबारों में छपते हैं किंतु कहीं भी कोई कार्यवाही नहीं होती। कार्यवाही हो भी कैसे सकती है जब अपने पद की शपथ लेने से पूर्व गृहमंत्री हाफ पैंट पहिन कर संघ के विशेष पथसंचालन पर निकल कर यह सन्देश देता है कि पुलिस की लाइन क्या होना चाहिये। भोपाल इन्दौर जैसे नगरों में सरे आम जंजीरें खींची जा रही हैं, बैंक के आसपास लूटें हो रही हैं, घरों में घुस कर लूटें हो रही हैं और पुलिस अपनी मजबूरी का रोना रोती है कि उसे काम करने ही नहीं दिया जा रहा। प्रदेश का गृह राज्यमंत्री अपने मंत्री, मुख्य मंत्री, और दूसरे प्रमुख मंत्री के खिलाफ बयान दे कर कहता है कि वे उसे कोई काम ही नहीं करने दे रहे और पुलिस के लोग उसकी बात ही नहीं सुनते। दूसरी ओर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस अपनी पुरानी कमाई को सुरक्षित बनाये रखने के लिए चादर तान कर सो रही और आगामी चुनाव के आने की प्रतीक्षा कर रही है।

कभी जो प्रदेश विशाल जंगलों से सम्पन्न प्रदेश था अब जंगल राज्य में बदल चुका है और जंगल कटते जा रहे हैं।
वीरेन्द्र जैन
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