बुधवार, अप्रैल 14, 2010

समीक्षा-हम्माम के बाहर भी- शंकर पुंताम्बेकर्

समीक्षा हम्माम के बाहर भी
शंकर पुंताम्बेकर
'हम्माम के बाहर' भी वीरेन्द्र जैन लिखित छोटीबड़ी रचनाओं का एक ऐसा व्यंग्य संग्रह है जिसे सुधी पाठक बारबार पढ़ना चाहेगा। हरीश नवल, रामविलास जांगिड़, अरविन्दर निपारी, जवाहर चौधरी जैसे कुछ लेखक इधर व्यंग्य में ऐसा कुछ लिख रहे हैं जिसे पढ़कर ऐसा लगता है कि व्यंग्य पक्की सड़क पर है। वीरेन्द्र जैन भी ऐसे ही लेखकों में सें हैं। इनका पहला व्यंग्य संग्रह था 'एक लुहार की' जो बीस वर्ष पूर्व छपा था। जैन इस बीच यदि धीमी गति से न लिखते, मैदान में कलम के साथ कमर कसे डंटे रहते तो इस लंबे अवकाश में उनके अवश्य ही चारपाँच संग्रह प्रकाशित हो जाते। इस दशा में वे औरों के संग्रहों के लिए फ्लैप मैटर लिखते, स्वयं अपने संग्रह के लिए इसकी खातिर मुहताज न होते। हाँ, जैन की कलम में ऐसी ही धार है जो ग्रंथ संरचना के अभाव में लोगों तक पहुंच नहीं पायी। कुछकुछ यही स्थिति जवाहर चौधरी के साथ है। दुख की बात है कि गुणात्मकता के आधार पर जैन और चौधरी को व्यंग्यजगत् ठीक से जानता ही नहीं।
व्यंग्य विषय में भयानक और वीभत्स है तो कथन में अद्भुत। प्रभाव में इसका सम्बन्ध रौद्र और करुण से है। सामान्यत: व्यंग्य कथन में मार खा जाता है। अंदाजे बयाँ व्यंग्य का प्राण है। ऐसा प्राण जिस तक पहुंच न पाने वालों ने व्यंग्य को मात्र शैली कह दिया। भयानक वीभत्स विषय भला कभी विचारात्मक हो सकते हैं यदि इन्हें इस ढंग से प्रस्तुत न किया जाये
• 'न्यूमेटिक पेन पढ़ेलिखे वृद्धों को होता है। जबकि गठिया गंवार बूढ़ों को!
• गर्भपात कराने में जो अपराध बोध है वह एबोर्शन कराने में विधि सम्मत नज़र आता है।
• देश में जब से सामंती व्यवस्था का नाम लोकतंत्र रख दिया गया है, तब से कई गिरोहों ने अपना नाम राजनैतिक दल के रूप में पंजीकृत करवा लिया है।
• कॉलोनी में पलने वाले कुत्ते भी ऐसे ही कुत्ते होते हैं जो किसी माँबाप, भाईबहन या गर्भ में गिरा दिये गये बच्चे के स्थान पर पलते हैं।
• मैं भी पिछले दिनों से अपने अंदर पूरा परिवर्तन महसूस कर रहा हूँ और मुझे विश्वास होने लगा है कि कुछ ही दिनों में मैं नामवर सिंह और राजेन्द्र यादव की तरह किसी भी बात को किसी भी तरह सिद्ध करने में समर्थ हो जाने वाला हूँ।
• हम प्रतीक्षा कर रहे हैं रविवार फिर आयेगा और खुशियां लायेगा। अभी तो झटपट उठ, कसरत कर, दफ्तर चल, अफसर चमचा बन, फाइल रखे।
• आप दान करेंगे तो आपका स्थान स्वर्ग में सुरक्षित हो जायेगा। पर होना यह है कि मेरे पैसे पर आप स्वर्ग में अपना आरक्षण कराते हैं और मेरे लिए जीते जी नरक तैयार करते हैं।
• विवादास्पद स्थानों पर झंडा फहराने या सामर्थ्य ठोंकने से हमारी राष्ट्रीयता और धार्मिकता अधिक मजबूत होती है।
• देश बढ़ाने के नाम पर दूध वाला दूध में पानी बढ़ा रहा है। डॉक्टर फीस बढ़ा रहा है। अदालतें तारीख बढ़ा रही है और नेता आश्वासन।''
ये चतुर कथन संदर्भ के साथ और अधिक मारक बन जाते हैं। एक सामान्य शब्द की शब्दावली भी संदर्भ के अन्तर्गत पैनी छुरी का काम करती हैं। इसके अतिरिक्त लेखक मारक प्रसंगों की विषयानुकूल कल्पना करता है। कल्पना जिसकी पतंग की डोर यथार्थ के हाथों में होती है।
'मूत्रालय' रचना के पहले वाक्य में लेखक कहता है, ''मुझे मौलिकता से प्रेम है। पिटी पिटाई विषय वस्तु पर लिखना मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है।'' लेखक की रचनाओं के जो शीर्षक हैं उनसे सचमुच उसकी मौलिकता का परिचय मिलता है यथा, ‘’बीमारी की भाषा की बीमारी’’, ‘’मकान न खरीदने का आत्म संतोष’’, ‘’किराये की कोख’’, ‘’मुन्ना नमक लेने जा रहा है’’, ‘’कबीर और विजुअल मीडिया’’, ‘’क्या जूते भी सांस लेते हैं’’, ‘’बड़े आदमी का बूढ़ा’’, ‘’वसंत में बीमारी’’, ‘’देश बढ़ाने वाले’’ आदि।
वास्तव में लेखक साम्प्रदायिक, पुरस्कार, पड़ोसी, पत्नी, प्लॉट, दहेज, विमोचन, कुत्ते, चंदा, समाज सेवा, विध्याध्यन, न्याय, मेहमान, शोकसभा, चरित्र हत्या, राजनेता, बाजार, पुलिस, दफ्तर आदि पिटे-पिटाये विषयों पर भी कलम चलाता है। युग के कटु यथार्थ को देखते हुए वह इनसे कैसे बच सकता है। व्यंग्यकार के तो ये विषय ऑक्सीजन हैं। पर लेखक इन विषयों को अपनी शैली से ताजगी प्रदान करता है, इन्हें पठनीय और विचारोत्तेजक बना देता है। व्यंग्यकार के कथन किसी बहाने से बहुत कुछ कह जाते हैं-
''हमारे देश में मूत्रालय वे केन्द्रीय स्थान होते हैं जिनके चारों ओर दस मीटर दूरी तक पेशाब की जा सकती है, एवं जहां वास्तव में पेशाब करनी चाहिए वहां पाखाना किया होता है।'' लेखक का यह वीभत्स चित्र क्या केवल मूत्रालय तक सीमित है।
चिकित्सालय में आदमी उलटी करता है जो बदबू का झटका छोड़ती है। जबकि हॉस्पिटल में की गई वोमिटिंग की बात ही कुछ और है। कहां पेशाब कहां यूरीन और कहां टट्टी कहां स्टूल। जमीन-आसमान का फर्क। यह स्थिति उन बदबूदार लोगों की भी है जो सुगंधों में जीते हैं।
वे ईद के दिन मुसलमानों से गले मिलकर साम्प्रदायिक सद्भाव मजबूत करते हैं या धार्मिक आस्था, क्योंकि साम्प्रदायिक सद्भाव मजबूत करना होता है तो ईद के अलावा किसी और दिन में गले मिला जा सकता है। यह स्थिति धर्मनिरपेक्षतावादी दुर्जनों की है जो सज्जनता के पहरेदार हैं।
मशीनरी को ठीक करने के लिए मिस्त्री की जरूरत होती है पर मिस्त्री को ठीक करने के लिए किस चीज की जरूरत होती है, यह मेरी समझ में आज तक नहीं आया’’। यहां मशीनरी क्या व्यवस्था या अंटीवाला नहीं है और मिस्त्री व्यवस्था के लोग दोनों सूरतों में?
शोषक और शोषित इन दोनों पक्षों के बीच के संघर्ष में जो निरपेक्ष दिखने की कोशिश करता है वह दरअसल शोषकों के साथ है। देश के बुद्धिजीवी क्या ऐसे ही निरपेक्ष नहीं दीख पड़ते हैं?
समाज और व्यवस्था की कितनी ही विकृतियों रचनाओं में से उभरकर सामने आती हैं।
• आज के आश्रम देखिए कैसे होते हैं। वे आश्रम बनाते हैं पर भीतर ही भीतर घर बनाते रहते हैं। आश्रम में (आ)श्रम हो, पर वह श्रम से नहीं दान से चलता है।
• दलाल न हो तो कोई पुरस्कार हमको प्राप्त नहीं हो सकता। चाहे वह साहित्यिक ही क्यों न हो। पुरस्कार भी अब गली के कुत्तों की तरह बेमानी हो गये हैं।
• देश के मानसिक अध:पतन का यह हाल है कि हमारे महापुरुष जितने महत्वहीन होते जा रहे हैं। उसी अनुपात में अमरीका का महत्व बढ़ रहा है। सो गीता को भी महत्वपूर्ण होने के लिए अमरीकी मान्यता के बिना कहीं ठौर नहीं।
• हमारा विकास बिल्डिंगों में है। जैसेजैसे मनुष्यता का पतन होता जा रहा है वैसे-वैसे बिल्डिंगें और ऊँची होती जा रही हैं।
• राजनीति में कितनी नाजायज बातें आवश्यक होती हैं। इनमें सर्वोपरि है चरित्र हत्या। नगर में प्लाट होना बड़ी से बड़ी प्रतिष्ठा की बात है। बंगला हो या गाड़ी हो, पर यदि प्लाट नहीं तो बेकार है। बंगला और गाड़ी तो उपयोगी चीजें हैं, बड़ा आदमी होने के लिए तो उसे और बड़ी चीज चाहिए।
• बाराती बड़े प्रतिष्ठित लुटेरे होते हैं। बल्कि आमंत्रित लुटेरों द्वारा दो दिन की अल्पावधि में अपने नश्वर शरीर में अधिक ग्रहण करने के लिए इनका पगला जाना कोई बड़ी बात नहीं।
• समाज में राजनीति में कितनी ही शबनम मौसियां अपने छद्म नामों से व्याप्त हैं। पर एक शबनम मौसी ने अपने वास्तविक नाम से आगे आकर इनकी कलई खोल दी है।
• आप विद्वान हों न हों, एक बार आपका नाम श्री के स्थान पर डॉक्टर के साथ लिख गया कि आप अधिक श्री को प्राप्त हो जाते हैं। अब तो यह खिताब विशिष्ट बाजार से उसकी कीमत अदाकर सहज ही आम हो जाता है।
• प्रतिष्ठा उपकरणों में निवास करती है। तभी संरक्षक कहता है राजकीय अतिथि ग्रह पहुंचने पर रिसेप्सनिस्ट ने मेरी ओर ध्यान नहीं दिया। क्योंकि मैं रिक्शे से उतरा था।
• समय के अनुरूप नारे बन गये हैं 'तुम मुझे खून दो' मैं तुम्हें आजादी दूंगा' नारा अब बासी बल्कि कहैं कि बेकार हो गया है। अब नारा है 'तुम मुझे रिश्वत दो, मैं तुम्हें परमिट दूंगा।' वैसे रिश्वत में देने वाले का खून ही होता है और परमिट तो ऐसी आजादी है जो स्वाद आजादी में नहीं है।
• न्याय के बारे में क्या कहा जाये। न्यायालय की अवमानना के डर से उचित है न्याय के बारे में चुप ही रहें।
• कौन नहीं इस बात से सहमत होगा कि नौकरशाह दीमक की तरह देश को चट करने में लगे हुए हैं। हाँ साहब निवृत्त नौकरशाह भी इस बात को स्वीकार करते हैं।
• और समाज सेवक आज ऐसे कि उसे किसी पद पर पहुंचकर सेवा करने की घोषणा करनी होती है। यद्यपि होती उसके बाद भी नहीं है
• और अंत में नेता की बात करें। नेता शायद भूखे पेट देश का नक्शा देख लेते होंगे तभी उसे खाने लगते हैं, देश को।
संग्रह की विशेष उल्लेखनीय रचनाएं हैं भावना को ठेस, कबीर और विजुअल मीडिया, शोकमग्नता, कॉलोनी का कुत्ता, दो दिन का मेहमान, देश बढ़ाने वाले।
समीक्षा के उपसंहार में
चलतेचलते कुछ बातें
युग के यथार्थ को तीक्ष्णता के साथ पकड़ना आज के व्यंग्य लेखन समय की मांग है और पाठक उसे बड़ी रुचि से पढ़ता है। इस रुचि में से पाठक की जागरूकता का परिचय मिलता है। व्यंग्य में वह समय का प्रतिबिम्ब पाता है। साथ ही इसमें वह वे शब्द पाता है जो वह खुद कहना चाहता है। इस मायने में व्यंग्य समाज का सच्चा प्रतिनिधि है। निर्भीक और निरपेक्ष आवाज का प्रतिनिधि। तथा कथित प्रतिनिधि पर तीखा प्रहार करने वाला
प्रतिनिधि। खेद की बात है कि इस प्रतिनिधि का साहित्य की संसद में कोई सवाल नहीं।
बड़ा विचित्र युग है। वीर क्रिकेट में जा बैठा है, श्रृंगार फिल्म में अठखेलियां कर रहा है, हास्य मंच पर विदूषक की भूमिका में देखा जाता है। तो करुण साहित्य में जी रहा है। राजनीति, चिकित्सा, बाज़ार, आदि वीभत्सता के अड्डे हैं। वह सरकार में रौद्र, शेष शांत कहाँ है? ये शांत है क्स्बों में, महफिलों में, टीवी में! कितना वीभत्स कि शांत क्लबों, महफिलों, टीवी में चौथा स्तम्भ कहते हैं, उसी को भूल गया!
पत्रकारिता आज राजनीति की भांति बड़ी धूर्त बन गयी है। राजनीति की ही भांति जनता कम बाजार अधिक। वह भयानक है, वीभत्स है इसका फैसला तो सुधीजन करें। हाँ, अपनी ओर से मैं यह कहना चाहूंगा कि पत्रकारिता को रौद्र होना चाहिए।
व्यंग्य ने युग की जैसी चीरफाड़ की है, साहित्य की अन्य विधाएं उस मुस्तैदी से नहीं कर सकी है। मैं वीरेन्द्र जैन, जवाहर चौधरी जैसे व्यंग्यकारों से उम्मीद करता हूँ कि वे अपनी लेखनी को मुस्तैद बनाये रखेंगे।
2ए मायादेवी नगर, जलगांव-2 (महाराष्ट्र)
[समीक्षित कृति- हम्माम के बाहर भी..., लेखक- वीरेन्द्र जैन, प्रकाशक- आलेख प्रकाशन, वी-8 नवीन शाहदरा दिल्ली-110032 मूल्य- रु.130/-]

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत जानकारी युक्त समीक्षा. श्री वीरेंदर जैन व्यंगकार के रूप में तीव्र प्रहार करते हैं,लेकिन उनका लेखन भी कम धार दार नहीं. समाज में व्याप्त अंध विश्वास पर उनके लेखन ने गहरे प्रहार किये हैं. उनकी नज़र बहुत साफ़ है और विश्लेषण किसी भी तरह की रेअयत नहीं देता. सही है की उनके नाम पर 4-5 टाईटिल और आ सकते थे, लेकिन हर लेखक का अपना मिज़ाज होता है.
    'हम्माम के बाहर भी' के लिए उन्हें बधाई !
    शीबा असलम फ़हमी

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