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मंगलवार, मार्च 31, 2015

भाजपा की सदस्य संख्या



भाजपा की सदस्य संख्या
वीरेन्द्र जैन
       देश में सत्तारूढ भारतीय जनता पार्टी जब अपनी ऎतिहासिक विजय के बाद बहुत तेजी से अलोकप्रिय हुयी है और प्रतिष्ठापूर्ण दिल्ली विधानसभा का चुनाव बुरी तरह हार चुकी है, तब उसने दावा किया है कि वह पूरे दक्षिण एशिया की सबसे बड़ा पार्टी बन गयी है। उनका दावा है कि पिछले दिनों चले सदस्यता अभियान के बाद उसके दस करोड़ के लक्ष्य के समक्ष आठ करोड़ बयासी लाख सदस्य हो चुके हैं और हर रोज तेरह से चौदह लाख नये सदस्य बन रहे हैं। किसी भी दल की सही सदस्य संख्या का पता लगाने वाली कोई संस्था कार्यरत नहीं है और चुनाव आयोग भी मान्यता का स्तर तय करने के लिए दल को मिले मतों को आधार बनाती है। रोचक यह है कि दूसरा कोई भी राजनीतिक दल अपने सदस्यों की संख्या में गिरावट नहीं महसूस कर रहा है जिसका मतलब हुआ कि उनके सदस्यों की संख्या में वृद्धि का आधार या तो नये मतदाता होंगे या वे लोग होंगे जो अभी तक किसी दल के सदस्य नहीं थे।
       राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी को छोड़ कर किसी भी दूसरे दल में पार्टी लेवी की नियमितता उसकी सदस्यता की शर्त नहीं है इसलिए उनकी सदस्य संख्या पुष्टि का कोई तरीका नहीं है। माकपा में आय के अनुरूप जो लेवी व्यवस्था है वह बहुत आदर्श व्यवस्था है और उसे दल के रजिस्ट्रेशन के लिए सभी दलों में अपनाये जाने की स्थितियां बनायी जाना चाहिए। इस दल में कम आय वालों को कम दर से व अधिक आय वालों से अधिक दर पर लेवी ली जाती है। यह व्यवस्था पार्टी को दौलत वालों के कब्जे से बचाती और अपने सदस्यों की संख्या के साथ साथ उनकी आय पर निगाह भी रखती है। यदि सारे दल इस व्यवस्था को अपना लें तो किसी को भी बड़े बड़े पूंजीपतियों के पास चन्दा माँगने नहीं जाना पड़ेगा और उनकी पार्टी सदस्यों के योगदान से ही चल सकेगी। राजनीतिक दल तभी राजनीतिक दलों की तरह चल पाते हैं जब सदस्य स्वयं उनके पास सदस्यता का अनुरोध करते हुए आयें व पार्टी के लक्ष्य में सहयोगी होने की इच्छा बताते हुए उसके अनुशासन के पालन के लिए सहमति दें।
       भाजपा और उसके पर्यवेक्षक अगर चाहे तो कुछ ही बातों से अपनी सदस्यता की असलियत को परख सकते हैं। अभी हाल ही में देश के प्रधानमंत्री ने लोगों से गैस अनुदान त्यागने की अपील की है और भाजपा अपने   सदस्यों से गैस अनुदान त्यागने का अनुरोध कर सकती है। यदि इस आवाहन के बाद उसे सफलता मिल जाती है तो उसकी सदस्यता की पुष्टि हो जायेगी। भाजपा चाहे तो अपने सभी सदस्यों से दोपहिया वाहन चलाते समय किसी रंग विशेष का हेल्मेट पहिनने का अनुरोध कर सकती है और इससे किसी भी क्षेत्र विशेष में उसके सदस्यों के अनुपात और अनुशासन प्रियता का पता चल सकेगा। उल्लेखनीय है कि आम आदमी पार्टी ने लाखों लोगों को सफेद टोपी पहिनवा कर दिल्ली में अपने समर्थन का संकेत दे दिया था जिसके जबाब में भाजपा ने अपनी परम्परा से हटकर भगवा टोपियां  धारण कर ली थीं और काँग्रेस के लोग भी तिरंगी टोपी में दिखने लगे थे। स्मरणीय है कि प्रजा सोशलिस्ट और सोशलिस्ट पार्टी की लाल टोपी दिखना बन्द होने के बहुत बाद गले में भगवा दुपट्टा डालने की परम्परा भाजपा ने ही शुरू की थी। प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत के आवाहन पर यदि भाजपा के दस करोड़ लोग अपने परिवेश को स्वच्छ करने के लिए कोई भी सामूहिक कदम उठा लें तो कम से कम देश का पूरा पश्चिमी हिस्सा गन्दगी से मुक्त हो सकता है, व सदस्यता के पुष्टि हो सकती है।
       भाजपा द्वारा घोषित संख्याएं पहले भी गलत साबित होती रही हैं। उल्लेखनीय है कि आम चुनावों के समय उन्होंने सभी नागरिकों के खातों में पन्द्रह लाख रुपये जमा करने का वादा किया था किंतु बाद में उसे चुनावी जुमला कह कर लाखों लोगों के भरोसे को ठेस पहुँचायी है। ट्विटर पर नकली फालोअर बनवा कर भ्रम पैदा करा चुकी इस पार्टी के आंकड़ों का अक्टूबर 2013 में लन्दन की एक कम्पनी ने पर्दाफाश करते हुए गड़बड़ी पकड़ी थी और बताया था कि मोदी के दस लाख फालोअर्स का दावा करने वाली साइट के आधे से अधिक फालोअर्स नकली हैं। सोशल साइट पर भाजपा के पक्ष में लिखने और भाजपा के कामों की उचित समीक्षा करने वालों को गाली देने के लिए हजारों की संख्या में नकली फेस बुक ट्वीटर एकाउंट भी बनाये गये थे। अभी भी गाली गलौज की भाषा में लिखने वाले नकली देशभक्तों की जाँच की जाये तो इनके प्रचारतंत्र का खेल समझ में आ सकता है। कश्मीर में सैकड़ों मन्दिरों के टूटने का सच और 1989 में अयोध्या में सैकड़ों लोगों के मारे जाने की अफवाह की सच्चाई वी जी वर्गीज और दूसरे लोगों की जाँच रिपोर्ट में सामने आ चुकी हैं।
       अगर भाजपा की सदस्य संख्या सचमुच में उतनी ही है जितनी बतायी जा रही है तो इस प्रबन्धन का लाभ उनके कार्यक्रमों को मिलना चाहिए। वे नानाजी देशमुख की तरह भले ही देह्दान के लिए लोगों को प्रेरित न कर सकें तो भी नेत्रदान, रक्तदान समेत सम्पूर्ण साक्षरता और टीकाकरण आदि से तो सदस्यों को जोड़ा ही जा सकता है। सत्तासुख की जगह अगर कर्तव्यों से यह संख्या बल जुड़ सके तो उनकी राजनीति सफल रहेगी और सदस्यों में ज्यादा जोगी मठ उजाड़ जैसी नौबत नहीं आयेगी।
वीरेन्द्र जैन                                                                          
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सोमवार, जनवरी 10, 2011

राजनीतिक दलों में लेवी प्रणाली का महत्व


राजनीतिक दलों में लेवी प्रणाली का महत्व
वीरेन्द्र जैन
कोई भी व्यवस्था अपना स्वरूप अकेले नहीं गढ सकती। क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा, की तरह व्यवस्था का शरीर भी विधायिका, पुलिस, प्रशासन, न्याय, और फौज से मिल कर ही बनता है। यदि किसी एक क्षेत्र में विकृति आती है तो दूसरा क्षेत्र उस पर लगाम कस कर उसे बहकने से रोक सकता है। किंतु जब विकृति को सारे क्षेत्रों से मदद मिलने लगती है तो पूरा तंत्र प्रभावित हो जाता है। आज भ्रष्टाचार की भी यही दशा है। राजनेताओं के भ्रष्टाचार उनके जिन्दा रहने की मूल आवश्यकताओं के लिए किये गये पथ विचलन नहीं हैं, अपितु इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने की हवस में अधिक से अधिक समय तक सत्ता प्रतिष्ठानों की कुर्सी पाने, उसे बनाये रखने, और उसके लिए आर्थिक संसाधनों को जोड़ने की होड़ का हिस्सा होते हैं। यही होड़ प्रकारांतर आदत में बदल जाती है। भ्रष्टाचार की व्यापकता को देखते हुए ऐसा लगता नहीं है कि किसी सुधारात्मक उपाय से कोई बात बनने जा रही है फिर भी लोकतंत्र के प्रति आस्थावानों द्वारा सुधारात्मक उपाय किये ही जाने चाहिए। लोकतंत्र में सत्ता पाने के लिए जनता से उनका वोट रूपी समर्थन प्राप्त करना होता है जिसके लिए राजनीतिक दल न केवल उन्हें भावनात्मक रूप से भटकाते हैं अपितु उन्हें कुछ राशियां भी भेंट करने लगे हैं। ये राशियां उन्हें पूंजीपतियों से प्राप्त होती है, इसके बदले में पूंजीपति उनसे ऐसी नीतियां बनाने की अपेक्षा करते हैं जिससे उन्हें दिये गये धन से कई गुना लाभ हो। रोचक यह है कि ये पूंजीपति यह राशि किसी एक दल को नहीं देते हैं अपितु इसे स्वीकार करने वाले तमाम सत्तामुखी सम्भावित दलों को देते हैं। हमारे लोकतंत्र की बिडम्बना यह है कि हमारे देश के कुछ प्रमुख बड़े दल अपने सदस्यों के सहयोग से न चलकर पूंजीपतियों के चन्दों से चलते हैं और अपने हिसाब किताब को गोपनीय रखना अपना विशेषाधिकार मानते हैं। जो दल पूंजीपतियों के चन्दे से चलेंगे उनसे यह अपेक्षा व्यर्थ है कि वे उनके विरोध और जनता के पक्ष में नीतियां बना सकेंगे। अतः पहली जरूरत यह है कि राजनीतिक दलों की अर्थ व्यवस्था पारदर्शी हो।
यदि राजनीति को भ्रष्टाचार की गंगोत्री मान कर चला जाये तो सबसे पहला सुधार भी यहीं से करना पड़ेगा। प्रत्येक दल की अर्थ व्यवस्था को उसके सदस्यों के सहयोग तक सीमित करना होगा। इसके लिए आवश्यक होगा कि दलों में उसके सदस्यों से आय के अनुपात में लेवी लेने की व्यवस्था हो और उसे कानूनी रूप दिया जाये। हमारे देश के ही एक बामपंथी दल में ऐसी व्यवस्था है जहां आय के अनुसार सदस्यों से लेवी ली जाती है जो इस प्रकार है-
रु.300/- प्रति माह आय वाले सदस्य को 0.25 रु. प्रति माह्
रु 301/- से 500/- प्रति माह आय वाले सदस्य को रु.0.50 प्रति माह
रु.501/- से 1000/- प्रति माह आय वाले सदस्य को रु.1.00 प्रति माह
रु1001/- से 3000/- प्रति माह आय वाले सदस्य को आय का 1%
रु3001/- से 5000/- प्रति माह आय वाले सदस्य को आय का 2%
रु5001/- से 7000/- प्रति माह आय वाले सदस्य को आय का 3%
रु7001/- से 8000/- प्रति माह आय वाले सदस्य को आय का 4%
और रु8000/- से ऊपर प्रति माह आय वाले सदस्य को आय का 5%
इस व्यवस्था के अनेक लाभ हैं, जिनमें सबसे पहला तो यह कि दल में सदस्यता का उचित रिकार्ड रहता है और बोगस सदस्यता की सम्भावना क्षीण रहती है। इसके द्वारा सदस्यों की आय का भी रिकार्ड पार्टी के पास रहता है जिससे किसी भी तरह के भ्रष्टाचार के संकेत तुरंत मिल सकते हैं। यह जानना रोचक हो सकता है कि आन्ध्र प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्री वाय एस रेड्डी के पुत्र और इस समय कांग्रेस के विद्रोही सांसद जगन मोहन रेड्डी ने इस वर्ष के लिए रु.84 करोड़ आयकर जमा किया है जिसके अनुसार इस वर्ष उनकी आय रु.500 करोड़ से अधिक होना संभावित है यदि कांग्रेस में सदस्यों की आय के अनुसार लेवी प्रणाली होती तो जगन मोहन को रु.25 करोड़ की लेवी जमा करना पड़ती। यदि लेवी सदस्यता की आवश्यक शर्त होती है तो पार्टी के लिए अधिक राशि देने वाला भी आय के अनुसार कम राशि देने वाले के समान ही होगा और अधिक आर्थिक सहयोग के नाम पर कोई अमर सिंह किसी कम आय वाले लोहियावादी सदस्य से श्रेष्ठ नहीं हो सकता व हेमामालिनिओं, जया बच्चनों और जयाप्रदाओं को राजनीति में प्रवेश से पहले गहन चिंतन करना होगा । दलीय लोकतंत्र के साथ लेवी प्रणाली होने से दल पर पूंजी वाले लोग वर्चस्व नहीं बना सकते जैसा कि अभी लोकसभा में 300 से अधिक करोड़पतियों के पहुँचने से पता चलता है। यह इस बात का प्रमाण है कि सभी दलों में पैसे वालों को टिकिट मिलने में प्राथमिकता मिल जाती है, और सब जीतने के लिए धन झोंकने में समर्थ उम्मीदवारों पर दाँव लगाना चाहते हैं। स्मरणीय है कि गत लोकसभा चुनाव में स्वघोषित करोड़पति प्रत्याशियों की संख्या 1054 से अधिक थी। लेवी प्रणाली होने से पूंजीपति को सभी दलों को चन्दा देने की जगह किसी एक दल की सदस्यता ग्रहण करनी होगी और किसी एक दल को ही अपनी आय के अनुसार लेवी देनी होगी। ऐसी स्तिथि में देश की राजनीति और सदन पूंजीपतियों के दुष्प्रभाव और दबाव से कुछ हद तक मुक्त रह सकेंगे।
जब राजनीति भ्रष्टाचार से मुक्त होगी तो वह प्रशासन के भ्रष्टाचार की अनदेखी भी नहीं कर सकेगी, और ना ही उसे न्यायपलिका को भ्रष्ट करने का विचार आयेगा। आज हमारी व्यव्स्था को जो क्रोनी केपटलिस्म, और बनाना स्टेट का नाम दिया जा रहा है, लेवी प्रणाली लागू होने पर ऐसे निन्दक आरोपों से भी मुक्ति मिल सकेगी। जब सभी प्रमुख दलों पर पूंजीपति अधिकार करते जा रहे हैं तो राजनीति को उनकी दया दृष्टि और उनके अहसान से बचाने का यही तरीका हो सकता है कि लेवी प्रणाली को रजिस्टर्ड दलों में सदस्यता की आवश्यक शर्त बनायी जाये और चन्दे की दम पर उन्हें बँधुआ बनाने के दबाव से मुक्ति दिलायी जाये। एक आत्मनिर्भर पार्टी ही सच्ची वैचारिक राजनीति कर सकती है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629